उद्भ्रान्त की आत्मकथा के तीसरे खंड "मैंने जो जिया- 3 : काली रात का मुसाफ़िर" की मिथिलेश श्रीवास्तव द्वारा की गई समीक्षा
आत्मकथा लिखना जितना आसान लगता है उतना यह आमतौर पर होता नहीं। यह कांटों पर चलने सरीखा होता है। आत्मकथा में लेखक से सच्चाई की अपेक्षा की जाती है न कि कथा कहानी गढ़ने की। गांधी जी की आत्मकथा 'माई एक्सपेरिमेंट विद ट्रुथ' इसीलिए एक बेहतरीन आत्मकथा मानी जाती है कि इसमें गांधी जी ने बेबाकी से अपनी गलतियों के बारे में भी लिखा। आत्मकथा लिखते समय लेखक अगर तटस्थ नहीं हो पाता तो ये दिक्कत सामने आती है। आत्मकथा कई खण्डों में भी लिखने की परम्परा है। हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा चार खंडों 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' (1969), 'नीड़ का निर्माण फिर' (1970), 'बसेरे से दूर' (1977), 'दशद्वार से सोपान तक' (1985) लिखी। रमाकांत शर्मा उद्भ्रान्त का भी लिखने के मामले में कोई जवाब नहीं। अब जब लोग महाकाव्य लिखने को बीते जमाने की बात मानने लगे हैं, उद्भ्रान्त ने कई महाकाव्य लिख डाले हैं। इन दिनों वे भी अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं। इस आत्मकथा का तीसरा खंड "मैंने जो जिया- 3 : काली रात का मुसाफ़िर" हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस खंड में उद्भ्रांत ने अपने जीवन के शुरुआती संघर्षों का बेबाकी से जिक्र किया है। वे बताते हैं कि कैसे पारिवारिक ईर्ष्या और द्वेष ने उनके शुरुआती जीवन को तकलीफदेह और कटु बना दिया था। कवि मिथिलेश श्रीवास्तव ने उद्भ्रांत की आत्मकथा के इस खण्ड की समीक्षा लिखी है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं उद्भ्रांत की आत्मकथा के तीसरा खंड "मैंने जो जिया- 3 : काली रात का मुसाफ़िर" की मिथिलेश श्रीवास्तव द्वारा की गई समीक्षा।
एक स्वाभिमानी, संवेदनशील कवि की आत्मकथा
मिथिलेश श्रीवास्तव
शब्द बहुत कमजोर माध्यम हैं आत्मकथा लिखने के लिए - उद्भ्रांत
पिछली सदी के आख़िरी दशक को जब मैं याद करता हूँ तो कई दृश्य, कई छवियां और कई चेहरे स्मृति में उभरते हैं। उनमें से एक कुबेर दत्त का चेहरा है जो न केवल एक अच्छे चर्चित कवि थे, बल्कि सरकारी दूरदर्शन संस्थान के एक बेहतरीन फ़िल्म प्रोड्यूसर थे। वे अक्सर पत्रिका कार्यक्रम में मुझे और अन्य दोस्तों को आमंत्रित करते। स्टूडियो में रिकॉर्डिंग कराने के बाद अक्सर शाम हो जाती। आकाशवाणी भवन के बाहर संसद मार्ग और अशोक रोड के चौराहे से मंडी हाउस की तरफ़ जाते हुए अशोक रोड पर एक लंबे से, ख़ूबसूरत से, अपने से उम्र में बड़े; लेकिन नौजवान दिखते एक व्यक्ति को सलीके से चलते हुए देखता तो देखते रह जाता। दोस्तों ने बतलाया यह व्यक्ति हिंदी के लेखक उद्भ्रांत हैं। मैंने उन्हें कभी टोका नहीं, क्योंकि उनके चेहरे पर गहरी ख़ामोशी रहती और नज़रें रास्ते पर। वे चलते तो चलते जाते। उनको रास्ते में रुकते हुए, किसी से मिलते हुए नहीं देखा। ख़ामोश रहना उन दिनों कवियों का प्राकृतिक स्वभाव था। कोई संकट न भी हो तो वे ख़ामोश रहते। लेकिन उद्भ्रांत की गहरी ख़ामोशी बाकी लेखकों से अलग लगती। कई बार सोचा करता कि उनकी ख़ामोशी ओढ़ी हुई नहीं हो सकती। रचनात्मकता वाली ख़ामोशी से ज़रा -सा भिन्न। यह एक रहस्य जैसा रहा मेरे मानस में। उस गहरी ख़ामोशी से उस दिन पर्दा उठा, जब मैंने हाल में प्रकाशित उनकी आत्मकथा के तीसरे खंड "मैंने जो जिया- 3 : काली रात का मुसाफ़िर" को आद्योपांत पढ़ा। यहीं मैं यह स्वीकार भी करता हूँ कि उनकी आत्मकथा के पिछले दो खंडों को अभी तक नहीं पढ़ा है। उद्भ्रांत की गहरी ख़ामोशी का राज इस खंड में खुलता है - कठिन और असंभव परिस्थितियों में भी अपनी रचनाशीलता से विमुख नहीं होना और न अपने मन को कुंठित और मलिन होने देना; पारिवारिक प्रतिकूलताओं और दुर्व्यवहारों से अविचलित रहना और अपने लेखक को अप्रभावित रखना; संकट के समय में भी पत्राचार और संवाद का रास्ता चुनना; दूसरों के अधिकार क्षेत्र में अनावश्यक हस्क्षेप से बचना और दूसरों के हस्तक्षेप को नज़रअंदाज़ करना या प्रतिवाद करना।
1987 के अंत से अप्रैल 1995 के बीच के लगभग दस वर्षों के समय की इस कथा में उद्भ्रांत का यही संघर्षपूर्ण व्यक्तित्व उभर कर आता है। यह आत्मकथा कानपुर की गलियों से होती हुई पटना, फिर उत्तरपूर्व से गुजर कर मुंबई के मार्फ़त गोरखपुर की ओर कूच करने के दृश्य पर समाप्त होती है। इस आत्मकथा में वे अभी दिल्ली नहीं आये हैं तो जाहिर है कि जिस उद्भ्रांत को अशोक राजपथ पर चलते हुए मैंने देखा था, वे आत्मकथा के अगले खंड में मिलेंगे।
पारिवारिक प्रतिकूलताओं और दुर्व्यवहारों से अविचलित रहना और अपने लेखक को अप्रभावित रखना
जो सच्चा लेखक है, जो साहित्य को अपना अनुराग बना चुका हो, उसे कोई भी इम्तिहान विचलित नहीं कर सकता। 'काली रात के मुसाफ़िर' की ज़िन्दगी की जो पहली ख़त्म न होने वाली काली रात नसीब होती है, वह उसके परिवार द्वारा दी हुई रात है। परिवार का मतलब पत्नी और बच्चों से नहीं है, बल्कि विस्तारित परिवार है जिसमें पिता, मां, बहन और भाई हैं।कानपुर में पुश्तैनी मकान है शायद उनके दादा परदादा का बनाया हुआ या फिर उनके पिता के द्वारा ख़रीदा हुआ। आत्मकथा के इस तीसरे खंड में इसका खुलासा नहीं है; हो सकता है पिछले दो खंडों में इस बात का जिक्र हुआ हो। लेकिन इस अचल संपत्ति पर उनके सभी भाइयों का हक़ है। उद्भ्रांत अपने सहित चार भाई हैं लेकिन उस परिवार से अलग हैं। वे उसी मकान के एक हिस्से में पत्नी और बच्चों के साथ रहते हैं। एक सरकारी उपक्रम की कंपनी के जनसंपर्क विभाग में सेवारत थे, किन्तु किसी वजह से उस नौकरी को छोड़ चुके हैं। इसी बिंदु से काली रात के मुसाफ़िर का जीवन-संघर्ष शुरू होता है। नौकरी खुद छोड़ दी है। पिता से मदद की ज़रा भी उम्मीद नहीं है। तीन छोटे भाइयों में से एक ठीक ठाक स्थिति में है लेकिन उसके मन में उद्भ्रांत के परिवार के प्रति दुष्टता और घृणा भरी हुई है। रहता आगरा में लेकिन जब कानपुर आता है तो उद्भ्रांत की अनुपस्थति में उनकी पत्नी को धमकाता है और बर्बाद कर देने की धमकी देता है। उससे जो छोटा भाई है वह है तो नाकारा और मानसिक रूप से अस्थिर, लेकिन लेखक की पत्नी के साथ मार-पीट और गाली-गलौज करने में सबसे आगे। पिता हैं लेकिन उनके साथ रहने वाले दोनों बेटों के पक्ष में खड़े और उनके कुकर्मों पर चादर डालने वाले। मां को बहू से बहुत शिकायत है। लेखक की पत्नी से बार-बार लेखक को छोड़ देने की हिदायतें देती हुई ताकि उसकी दूसरी शादी करा सकें। कभी दहेज़ के लिए प्रताड़ना तो कभी बेटियों को जन्म देने के उलाहने। वही मां अपनी दूसरी बहुओं के साथ मान-सम्मान के साथ पेश आती हैं। श्रीमती उदभ्रांत को अपने दैनिक जीवन में यातनाएं सहनी पड़ती थी। रोज़-रोज़ ताने सुनने और सहने की मानसिक शांति श्रीमती उद्भ्रांत की भीतरी सहन शक्ति और मज़बूती का परिचय देती है। यह पीड़ा अधिक अमानवीय हो जाती है जब इन यातनाओं की शिकायत वे लेखक से नहीं कर पातीं। सास तो खुलेआम कहती है कि हमारी शिकायत उद्भ्रांत से कर दे, वह हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता और तेरा ही सुहाग जाएगा! मझला भाई जब भी छुट्टियों में आगरा से लौटता, श्रीमती उषा उद्भ्रांत जी को धमकाता। उषा जी उद्भ्रांत से शिकायत नहीं करतीं लेकिन उनकी आँखों से बहे दुख को देख कर उद्भ्रांत उनकी पीड़ा को पकड़ लेते और पूछते। बेरोज़गार पति और उनकी साहित्यिक निष्ठा को महसूस करते हुए उषा जी अपनी तरफ़ से कोशिश करतीं कि लेखक की मानसिक कठिनाइयों को बढ़ाना नहीं चाहिए। उषा जी उद्भ्रांत के जीवन को ले कर चिंतित रहतीं, परिवार की आर्थिक अस्थिरता को ले कर चिंतित रहतीं, बच्चों के भविष्य को ले कर चिंतित रहतीं। उन्हें इस बात का भय रहता कि उद्भ्रांत के जीवन पर कोई जानलेवा हमला न हो जाए। धीरे-धीरे उद्भ्रान्त भी अपनी पत्नी और बच्चों की हिफ़ाज़त को ले कर परेशान रहने लगे। अंततः नौबत यहाँ तक आ गई कि अपने ही भाइयों के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज़ करानी पड़ी।
अपनी क़िताबों के प्रकाशन और वितरण और बिक्री को ले कर बाहर जाना पड़ता तो उद्भ्रांत जाते, लेकिन पत्नी और बच्चों की चिंता में ध्यान लगा रहता। वह ज़माना मोबाइल फ़ोन और एसटीडी का नहीं था। ट्रंककॉल महंगा पड़ता था और मोबाइल इंडिया में आम आदमी की पहुँच के बाहर की चीज़ थी। पति और पत्नी परिवार के दुर्व्यवहार और धमकियों से मानसिक कष्ट में रह रहे थे।
इस खंड में इस बात का कहीं जिक्र नहीं है कि उन मानसिक यातनाओं के दौर में क्या उनमें आपस में भी झगड़े होते थे। शायद नहीं हुए होंगे, क्योंकि पत्नी और बच्चों से लेखक का लगाव दिखता है। उषा जी ने कानपुर में एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापक की नौकरी भी की, ताकि आर्थिक स्थिति संभली रहे। उद्भ्रांत ने उषा जी को सदैव इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे नियमित रूप से डायरी लिखें ताकि मन की व्यथा अभिव्यक्ति में बह जाए। उषा जी ने नियमित डायरी तो नहीं लिखी है, लेकिन जितना लिखा उसे हरे प्रकाश उपाध्याय ने रश्मि प्रकाशन से बड़े प्यार से छापा है। उषा जी की डायरी में लिखी बातें उद्भ्रांत की आत्मकथा में वर्णित घटनाओं से मेल खाती हैं। उषा जी ने डायरी में कई बार इन्दराज किया है कि वे अपने पति की जान को ले कर चिंतित हैं, कि वे चाहती हैं कि लेखक को ऐसा माहौल मिले कि उनकी साहित्यिक गतिविधियां बाधित न हों। पति लेखक के प्रति उनका समग्र समर्पण का पता हमें उनकी डायरी से चलता है।
एक दिन दिल्ली से दूरदर्शन में नियुक्ति का पत्र उद्भ्रांत को मिलता है जिसमें आग्रह किया गया था कि सहायक स्टेशन डायरेक्टर के पद पर उनकी नियुक्ति हुई है इसलिए अविलंब पदभार ग्रहण करें-- पुलिस वेरिफ़िकेशन और डॉक्टरी जाँच की प्रक्रियाएं पद-भार ग्रहण करने के उपरांत पूरी कर ली जाएंगी। यह पत्र मिलने के पहले उद्भ्रांत तय कर चुके थे कि गीता के हिंदी में काव्यमय अनुवाद "प्रज्ञावेणु" का काम पूरा करने के बाद ही कहीं जाएंगे। उन्होंने मंत्रालय के अवर सचिव से कहा कि सारी प्रक्रियाएं पूरी हो जाने के बाद ही वे पदभार ग्रहण करेंगे।
"प्रज्ञावेणु" का काम पूरा हुआ। पटना दूरदर्शन में नियुक्ति हुई लेकिन कुछ महीनों में ही उनका ट्रांसफर उत्तर-पूर्व क्षेत्र के लिए कर दिया गया। न चाहते हुए भी उनको जाना पड़ा और वे पत्नी और तीन बेटियों के साथ इम्फाल चले गए। थोड़ी आर्थिक स्थिरता आयी; घरेलू कलह से उषा जी और उद्भ्रांत को निजात मिली।
इम्फाल में बेटियों को सेंट्रल स्कूल में प्रवेश मिल गया। नौकरी की शुरुआत हो गयी थी। लेकिन कुछ महीनों के बाद ही उद्भ्रांत को दूरदर्शन मुख्यालय से निर्देश मिलता है कि उन्हें प्रशिक्षण के लिए पुणे के फ़िल्म इंस्टिट्यूट में साढ़े तीन महीने के लिए भेजा जा रहा है। बेटियों के स्कूलों से उनका स्थानांतरण पत्र लेते हैं; पूरा घर बांधते है और पुणे चले जाते हैं। यह भी एक साहसिक कदम था। कुछ महीनों के लिए बसा-बसाया घर कंधों पर उठा कर चल देना मज़ाक तो नहीं है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद वापस इम्फाल आ कर दो साल की कार्यावधि पूर्ण करते ही जब मुंबई के लिए नियुक्ति होती है तो बाल-बच्चों और असबाबों के साथ महानगर में पहुंचते हैं। दिलचस्प है पढ़ना, कि कैसे घर की व्यवस्था करते हैं; कैसे बेटियों का स्कूलों में नामांकन कराते हैं, कैसे नौकरी संभालते हैं, कैसे मित्रों और शुभचिंतकों से लड़ते-भिड़ते हैं।
कठिन और असंभव परिस्थितियों में भी अपनी रचनाशीलता से विमुख नहीं होना और न अपने मन को कुंठित और मलिन होने देना।
![]() |
| उद्भ्रान्त |
सच्चा लेखक वही है जो कठोरतम प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने को न केवल बचाए रखता है बल्कि लेखन को समर्पित रहता है। उद्भ्रांत जो हैं, वह नहीं; बल्कि आत्मकथा के तीसरे खंड के नायक की बात हो रही है। पारिवारिक चुनौतियों और झगड़ों के बावजूद कई तरह के बहुस्तरीय संघर्षों से गुजरते इस लेखक की जीवन गाथा अत्यधिक मार्मिक और प्रेरणाप्रद है। दस वर्षों की जीवन गाथा में पारिवारिक समस्याएं बनी रहती हैं। आत्मकथा के लगभग हर अध्याय में भाइयों के अमानवीय अत्याचारों का उल्लेख आता है। वह एक ऐसी अमानवीयता थी जो लेखक को मिटा सकती थी।
इस खंड में हम पाते हैं कि उस अमानवीयता की कई असहनीय परतों को कवि पत्नी उषा जी अपने में समाहित कर लेती थीं। उषा जी का संघर्ष भी सराहनीय है। वे लेखक के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए सारे जतन करती रहीं और नाना प्रकार के पारिवारिक झमेलों से उद्भ्रान्त को बचाया। उदभ्रांत एक बातचीत में उषा जी के त्याग और बलिदान को दिल से स्वीकार करते हैं। यह उक्ति फिर से यहां दोहरायी जानी चाहिए कि एक पुरुष की सफलता के पीछे एक स्त्री की उपस्थिति रहती है। उषा जी ने अपनी डायरी में लिखा है कि "वे कहते है नियमित रूप से डायरी लिखो, लेकिन मैं समय के अभाव में लिख नहीं पाती।" और जब लिखती हैं तो उनके लिखे में से कठोर सच्चाइयां रिसने लगती हैं।
उसी संघर्षपूर्ण समय में उद्भ्रांत ने तय किया कि वे अपनी क़िताबें ख़ुद प्रकाशित करेंगे। उन्होंने प्रकाशन शुरू किया और अपनी क़िताबें छापने लगे। क़िताबों की बिक्री और वितरण का भार भी अपने कंधों पर रख लिया। कभी क़िताबों की खरीद हो जाती, कभी ख़रीद ख़ारिज़ किए जाने की चिट्ठी आ जाती। हमने देखा कि यहां भी उद्भ्रांत विचलित नहीं होते, समभाव में रहते हुए अपने भीतर उम्मीद जगाए रखते हैं। अपनी क़िताबों की प्रूफ-रीडिंग खुद करते हैँ।
एक बार मैंने पूछा था कि प्रूफ-रीडिंग करना कैसे सीखा। उद्भ्रांत ने बतलाया कि कानपुर में रहते हुए कई छोटी-मोटी पत्र-पत्रिकाओं में काम करता था। वहां प्रूफ देखना भी मेरे काम में शामिल था। मंगलेश डबराल को मैंने जनसत्ता के दफ़्तर में प्रूफ़ पढ़ते हुए देखा था। प्रूफ-रीडिंग के महत्त्व को मैंने उनके दफ़्तर में बैठ कर समझा था।
उद्भ्रांत निराशा को अपने पास नहीं फटकने देते, अपने ऊपर हावी नहीं होने देते। हर प्रतिकूल परिस्थिति में उनका लेखक बचा रहा। बचा रहा और लिखता रहा। रघुवीर सहाय कहते थे कि बचे रहना बड़ा मूल्य है।
संकट के समय में भी पत्राचार और संवाद का रास्ता चुनना
दस वर्षों का समय बहुत लंबा समय होता है। 365 गुने 10 बराबर 3650 दिन। एक दिन भी चौबीस घंटे का। एक लेखक के जीवन में हर दिन सैकड़ों चीजें घटित होती हैं। उद्भ्रांत का मानना है कि आत्मकथा के लिए शब्द बहुत कमज़ोर माध्यम हैं। जो जिया, उसे शब्दों में लिखा नहीं जा सकता। हर दिन हर घंटे, पीठ पीछे तमाम घटनाएं घटती हैं - ज़्यादातर घटनाएं लेखक के ख़िलाफ़। लेखक से ईर्ष्या का भाव समकालीन और समवयस्क लेखकों में इतनी तेजी से बढ़ता है कि लेखक परेशान होने लगता है, या होता हुआ दिखता है या नहीं होता है। जैसा भी हो, हर संकट में लेखक पत्राचार और संवाद का रास्ता चुनता है, जो कि प्रेरणाप्रद है। वह जानता है कि उसके ख़िलाफ़ मित्र लोग साज़िश करते हैं, उसकी प्रगति से जलते हैं, आपस में कानाफूसी करते हैं. जहां टांग अड़ा सकते हैं, अड़ाते हैं; जहां नहीं अड़ा सकते वहां आंख में धूल झोंकने की कोशिश करते हैं।
इतने बड़े मकड़जाल में आदमी टूटने लगता है, लेकिन उद्भ्रान्त टूटते नहीं, बल्कि पत्राचार का रास्ता अपनाते हैं और विस्तार से ऐसे मित्रों को पत्र लिखते हैं। उन्होंने ऐसे कई पत्रों की प्रतिलिपियों को आत्मकथा का हिस्सा बनाया है ज्यों का त्यों। जिन लोगों को पत्र लिखे, उनके नामों का उल्लेख करना गैरज़रूरी है; क्योंकि आत्मकथा के तीसरे खंड "मैंने जो जिया- 3: काली रात का मुसाफ़िर" में ऐसे पत्रों और उनके जवाबों को पढ़ा जा सकता है। यह समीक्षा लिखी ही जा रही है कि लोगों में उत्सुकता जगे और लोग आत्मकथा के तीनों खंडों को पढ़ें। एक पत्र ज्ञानरंजन को भी लिखा गया था। उनके उत्तर को भी पूरी उत्सुकता से पढ़ना चाहिए।
अदालतों में मुक़दमे करना भी संवाद का एक और रास्ता है। जब किसी सवाल, किसी सुब्हा या अन्याय की स्थितियों का समुचित और संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता है तो उद्भ्रांत अदालत का रुख़ करते दिखायी देते हैं। अदालती दाव-पेंच, लंबी तारीखें- बहसें और लंबा समय उन्हें परेशान नहीं करता। आम आदमी की सोच जैसी उनकी सोच नहीं है कि न्याय नहीं मिलेगा; या कि अदालतों में लंबा समय लगता है। अदालतों पर भरोसा करते हुए कोर्ट में पिटीशन फाइल करते हैं। उन अदालती पिटीशनो का क्या हुआ, इसका उल्लेख यहाँ नहीं है, लेकिन शायद अगले खंड में पता चले। उद्भ्रांत ने आत्मकथा के अंत में घोषणा की है कि चौथे खंड पर काम करेंगे और कोशिश करेंगे कि बाकी तीस वर्षों के जीवन को इसमें समेट दें।
दूसरों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप से बचना और दूसरों के हस्तक्षेप को नज़रअंदाज़ करना या प्रतिवाद करना
इस आत्मकथा में अनेक कार्यालय ज्ञापनों और सरकारी दस्तावेज़ों को आत्मकथा का हिस्सा बनाया गया है। उद्भ्रांत ने सप्रमाण यह प्रस्तुत किया है कि दूरदर्शन की कार्यप्रणाली कितनी अपरिपक्व ईर्ष्याकुल और कार्यविरोधी थी। आये दिन उनके अच्छे कार्यों की आलोचना होती और कार्यक्रमों की गुणवत्ता सुधारने की कोशिशों पर उन्हें ही उलाहने मिलते, मेमो मिलते ,मेमो को उनके पर्सनल फाइल में रखा जाता। उद्भ्रांत भी वरिष्ठों को पत्र लिख कर उनकी ग़लतियों की ओर उनका ध्यान खींचते और प्रश्न भी करते कि उनको मेमो क्यों दिया गया। अपने मातहतों को उनकी ग़लतियों और प्रक्रिया उल्लंघन पर मेमो देते। अपने दूरदर्शन के सरकारी दिनों की दुर्दशा, अवज्ञा, दुर्व्यवहार को उन्होंने खुल कर लिखा है। दूसरों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप से बचना और दूसरों के हस्तक्षेप को नज़रअंदाज़ करना या प्रतिवाद करना उनकी व्यक्तिगत विशेषताएं थीं जो कि सरकारी अफ़सरों में बहुत कम पायी जाती हैं।
पिछले साठ वर्षों से अधिक समय की साहित्य की साधना के दौरान अनेक कविता संकलन, उपन्यास, संस्मरण और आत्मकथा लिख चुके उद्भ्रांत की अब तक 150 से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे अनेक सम्मानों और पुरस्कारों से सम्मानित भी हुए हैं।
![]() |
| मिथिलेश श्रीवास्तव |
सम्पर्क
मोबाइल : 9868628602



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें