लुत्फा हानूम सेलिमा बेगम की असमिया कविताएं


लुत्फा हानूम सेलिमा बेगम 

 

गम्भीरता से देखा जाए तो हर कवि का कविता लिखने का अपना अलग तरीका होता है। कवि की संवेदनशीलता, समझ, सूक्ष्म दृष्टि, विषय को बरतने का तरीका जैसे कई एक ऐसे कारक होते हैं जो एक कवि को और कवियों से अलग करता है। मनुष्य प्रकृति से ही सामूहिक होता है। हालांकि तमाम ऐसे काम होते हैं जिसे वह अकेले निबटा लेता है। हानूम सेलिमा बेगम अपनी एक कविता में लिखती हैं एक कप चाय अकेले पी जा सकती है। उसी तरह से तमाम और काम भी अकेले किए जा सकते हैं 'पैदल टहला जा सकता है/ किताब की दुकान तक जाया जा सकता है/ खरीददारी की जा सकती है/ मंदिर-मजार तक भी जाया जा सकता है अकेले/ ... श्मशान यात्रा ही नहीं की जा सकती अकेले/ ले जाना होगा चार लोगों को मिल कर'। दुःख की घड़ी में मनुष्य के लिए सामूहिकता बहुत जरूरी होती है। सामूहिकता के बल पर ही हम किसी प्रिय जन के बिछोह से ऊबर पाते हैं। कवयित्री लुत्फा हानूम सेलिमा बेगम असमिया कविता के क्षेत्र में अपनी अलग ढर्रे वाली कविताओं के लिए ख्यात हैं। असमिया कविता में उनका एक विशिष्ट स्थान है। उनके सात कविता संग्रह हैं और उनकी कविताओं का अंग्रेजी, हिंदी, नेपाली, बांग्ला, कन्नड़, गुजराती, राजस्थानी, उज्बेक, स्पेनिश और फ्रेंच सहित अन्य भाषाओं में अनुवाद भी किया गया है। आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं लुत्फा हानूम सेलिमा बेगम की असमिया कविताएं।  मूल असमिया से हिन्दी अनुवाद किया है कवि दिनकर कुमार ने। दिनकर जी असमिया कविता के श्रेष्ठ हिन्दी अनुवादकों में से हैं। मूल।कविता की आत्मा को छेड़े बिना उनके अनुवाद में भी भाषा का सहज प्रवाह बना रहता है। 


असमिया कविता 

लुत्फा हानूम सेलिमा बेगम की कविताएं

(मूल असमिया से हिन्दी अनुवाद : दिनकर कुमार)



अकेले रहने पर


तन्हा रहने पर तन्हा घूमने पर कुछ काम करना अच्छा है

चुपके से दुःखों को ढूंढ़ कर ला कर सुख में डुबो कर देखना

पुराना सपनों को नए-नए कपड़े-लत्ते पहनाना

सीने की आलमारी से स्मृतियों को निकाल कर सजा देना अच्छा है

सितारे आसमान और मिट्टी की तरह ही दुःख सपने और स्मृति की आवाज नहीं होती

इसीलिए तन्हा रहने पर इन सबके जुलूस में शामिल होना अच्छा है


तन्हा रहने पर

कभी भी लिखे न जाने वाले खतों को पढ़ना

धरती पर कभी भी नहीं उतरने वाली बारिश में चुपके से भीगना

कभी भी नहीं सुने गए गीतों को गुनगुनाना अच्छा है

और

कभी भी पहुंच में न आने वाले भविष्य के पताका को फहराना

उड़ने में असमर्थ पेड़ों को चुपके से उड़ने का मंत्र सिखाना

पहाड़ों को पैदल चलने की सलाह देना अच्छा है


तन्हा घूमने पर

मेरी सुबह और शाम की सैरों की बीच

एक करारनामे को खुद ही नकार कर ठुकरा कर

अपनी मर्जी से चिंदी-चिंदी फाड़ कर

कुछ टुकड़ों को मकड़ा जाल पर

कुछ टुकड़ों को दीवार पर लटका कर बिस्तर पर चित्त लेट कर

देखते रहना सचमुच अच्छा है


तन्हा रहने पर तन्हा घूमने पर

खुदकुशी की तैयारी करना या खुदकुशी करना

खुद ही खुद की कब्र खोदना, अपनी चिता में खुद ही आग लगाना अच्छा है

मेरी मौत के बाद कौन क्या करेगा यह सोचना भी अच्छा है

तन्हा रहने पर तन्‍हा घूमने पर

ईश्वर और किस्मत का आमना-सामना करना अच्छा है

उन्हें जवाबदेह ठहराने के भी कई मौके मिल जाते हैं



कविता 


सवेरे-सवेरे ही दिन को

एक ब्रेड की तरह काट-काट कर

कई टुकड़े करती हूँ


उनमें से एक टुकड़ा समाता है

मेरी संतान के नाश्ते या टिफ़िन बॉक्स में

एक टुकड़ा मेरे पति के लिए सुरक्षित

एक और टुकड़ा हड़बड़ी में

रख लेती हूँ बैग में

छात्र-छात्राओं के लिए

एक टुकड़ा रसोई में रख कर

एक और टुकड़ा पढ़ाई की मेज़ वाली दराज में

कुछ टुकड़े फ्रिज के अंदर

आकस्मिक मेहमान या परिजन 

बाज़ार या फिर दवा की दुकान के लिए


दिन के टुकड़ों का माप-तौल 

हमेशा बराबर नहीं 

कौशल की कटारी से प्रत्येक दिन को 

सावधानी से काटने की ज़रूरत है 

ताकि टुकड़ों को ढूँढ़ा जा सके


मगर किसी भी टुकड़े में मैं नहीं होती

इसीलिए सवेरे के ब्रेड को

याद कर रात में अफ़सोस होता है

मौन प्रार्थना करती हूँ

उसकी खंडित आत्मा के लिए


इसीलिए रातों को टुकड़ों में बाँ टने के लिए

मैं तैयार नहीं

रातों को तकिए के नीचे

या डायरी के भीतर छिपा कर रखती हूँ


हर एक दिन को बाँटती हुई

समय की डायनिंग टेबल पर परोस दूँगी

भविष्य के लिए एक ख़ाली प्लेट।



कल डूब चुके सूरज को 


कल डूब चुके सूरज को 

आज कहां ढूंढ पाओगे 

एक ही दुख के कारण 

आज फिर रोना चाह कर भी 

कल बहाए गए आंसू

आज वापस नहीं पाओगे

कल ईश्वर को सुनाई गई फटकार

आज वापस नहीं ले पाओगे

कल आधा देखा गया ख्वाब

आज की नींद में भी नहीं पाओगे 

मुझसे मिलना चाह कर भी

कल की “मैं” नहीं मिलेगी

सोच कर देखो


कल की तुम्हारी प्रेम की गहराई

आज जरा भी नहीं हुई है घट-बढ़

कल पढ़ी गई कविता कल सुना गया गीत

आज क्‍या एक जैसे ही लगेंगे


कल का आज

आज का कल बन जाता है





अकेले एक प्याली चाय पी जा सकती है


अकेले एक प्याली चाय पी जा सकती है

गाना सुना जा सकता है

बारिश में भीगा जा सकता है

वायलिन बजाया जा सकता है

पेड़ की जड़ों की तरह

आड़ी-तिरछी सड़कों पर भी गाड़ी चलाई जा सकती है


पैदल टहला जा सकता है

किताब की दुकान तक जाया जा सकता है

खरीददारी की जा सकती है

मंदिर-मजार तक भी जाया जा सकता है अकेले


श्मशान यात्रा ही नहीं की जा सकती अकेले

ले जाना होगा चार लोगों को मिल कर



ईश्वर 


मंदिर की सीढ़ियों से

उतर आए थे

तुम


चढ़ती जा रही थी

मैं

हाथ झपट कर ही

अदला बदली कर डाली

ईश्वर की


किसी ने

नहीं देखा



मरने के बाद 


मैं जो भी कर रही हूं

सभी देख रहे हैं


खा-पी रही हूं

सो रही हूं

विस्फोट की भाषा पढ़ रही हूं

घूमने जा रही हूं

मृतकों के ठिकाने ढूंढ़ रही हूं

मजाक की बातें कर रही हूं

घायलों की संख्या गिन रही हूं

गीत सुन रही हूं

लोगों को राख बन कर उड़ते हुए देख रही हूं

खरीददारी कर रही हूं

बीच-बीच में एक युवती बन कर

सिटी बस से उतर रही हूं

जुलूस में शामिल हो रही हूं


एक वृद्धा बन कर कभी-कभी

आटो रिक्शा में सवार हो रही हूं

दवा खरीद रही हूं

शाम के वक्‍त घर में घुस रही हूं

उपासना कर रही हूं


सभी सोच रहे हैं

मैं ठीक ही हूं


चूंकि

वे लोग नहीं जानते कि

मरने के बाद भी आदमी

यह सब करता रह सकता है





आप कितने व्यस्त हैं


आप कितने व्यस्त हैं

क्या आप जानते हैं

कभी माप कर देखते हैं


किसी से मिलने का वक्‍त नहीं

किसी के बारे में सोचने ठहरने का

वक्‍त आपके पास नहीं

फिर भी आप अकेले नहीं हैं

आपके पास 'ई मेल', 'फेसबुक' है

आपके पास है “मोबाइल फोन'

सभी रहते हैं आपके साथ

क्या आप रहते हैं किसी के साथ

खास तौर पर


आपके मोबाइल में

हवा का चांदनी का नदी का नंबर

सेव किया गया है क्या

किसी के अंदर कटाव होने पर

सपनों के राज्य से किसी के

लापता होना का “मैसेज' आने पर

आप भला किए नंबर पर फोन करते हैं


आप कितने व्यस्त हैं

आप खुद नहीं जानते

इसीलिए एक शाम किसी को कुछ बताए बगैर

सूनेपन के पार्क में जा कर बैठिएगा

उस दिन व्यस्तता की 'ब्रांडेड' शर्ट मत पहनिएगा

'करुण कुर्ता-पाजामा पहन कर ही जाइएगा

यादों का चनाचूर चबाते चबाते

वर्तमान की बेंच पर पल भर बैठ कर देखिएगा

कैसा लगता है


उस दिन आप गलती से

मोबाइल घर में ही छोड़ कर आना

मत भूलिएगा।


(उत्सर्ग : राज भंडारी)


सुख का सौन्दर्य 


सुख की याद आती रही है

बहुत दिन


मेरे विषाद के माथे को

चूम कर गुजरे हुए

बहुत दिन बीते


असल में सुख कब आता है कब जाता है

किसी को पता नहीं चलता

सुना है कभी-कभी तो

ऐश्वर्य के घोड़े पर चढ़ कर शान से आता है सुख

कभी-कभी शांति की रेल में सवार हो कर

धीरे-धीरे सदियों सदियों तक आता रहता है

बड़ी आसानी से और जल्दी-जल्दी आवाजाही करना

सुख का धर्म नहीं

कभी-कभी हवा की सुरंग से समा कर

चुपके से बह कर आता है सुख का झरना

प्राप्ति हंसी आनंद इन सबमें विचरण करने वाला

सुख असल में खुद ही अपना राजा है


मगर सुख उतावला और चंचल

स्वप्नमय और स्पर्श कातर

पल भर में उदय पल भर में अस्त 

सुख आदमी को हंसाता है रूलाता है

फिर भी जहां रहता है

राजा की तरह रहता है

झंडे की तरह लहराता है


एक ही सत्य का आवर्तन होने पर भी दुःख

भी देख नहीं पाता सुख का सौंदर्य


दोनों असल में हैं

बेहद तन्हा



शांति 


मेरे मित्रों के बीच 

आंखें हैं खास 

इसीलिए 

शरणार्थी शिविर की तरफ 

भेज दिया अपनी आंखों को 


कई दिनों तक शिविर में

हाथों में नोटबुक ले कर 

घूमती फिरी आंखें 

किसी से भी नजरें मिला नहीं पाई 

कर नहीं पाई बात 

एक जोड़ी आंखों के साथ भी 


हर आंख में लटक रहा था 

एक एक पोस्टर 

पोस्टरों पर लटक रही थी 

कुछ मांगें 

मानो धुंधली धुंधली जलती हुई 

एक एक ढिबरी 


वापस लौट कर आंखों ने 

मेरे हाथ में थमा दिया 

मांग से भरा एक पोस्टर 

छू कर समझ पाई 

आंख के जल से लिखी थी 

उसमें एक मांग 


शांति 



शरत के हाथ के अक्षर 


शरत के हाथ के अक्षर बहुत अच्छे हैं 

जहां भी लिखता है दर्शक की निगाह ठिठक जाती है 

उड़ते हुए अक्षर 

खूबसूरत अक्षर 

अक्षर में मेघ-फूल खिलते हैं 

वाक्य में झूमते हैं कांस


यादगार सांसों को लिख कर रखने के लिए 

कितने ही शरत से फरमाइश करते हैं 

हरसिंगार भी कानों में कुछ कहता है 


पेड़-वन आकाश-नदी में 

शरत छोटी छोटी कविता लिखता है 

बिम्ब का चलचित्र रचता है 


ओस के सुडौल अक्षर का 

स्पर्श करती है सूरज की उंगली 


शरत को और लिखने का जी नहीं चाहता।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



दिनकर कुमार 


अनुवादक का परिचय


कवि, अनुवादक एवं पत्रकार दिनकर कुमार का जन्म 5 अक्टूबर 1967 को बिहार के दरभंगा जिले के ब्रह्मपुरा गांव में हुआ। तेरह वर्ष की उम्र में वह असम चले गये जहां उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। गुवाहाटी कामर्स कालेज से वाणिज्य स्नातक की डिग्री प्राप्त कर वह पत्रकारिता करने लगे। विगत 36 वर्षों से वह पत्रकारिता और लेखन करते रहे हैं।वह 14 वर्षों तक गुवाहाटी से प्रकाशित हिंदी दैनिक 'सेंटिनल' के संपादक रहे। संप्रति गुवाहाटी में रह कर स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं। उनके कविता संग्रह के नाम हैं- 'आत्म निर्वासन', 'लोग मेरे लोग', 'एक हत्यारे शहर में वसंत आता है', 'मैं आपकी भावनाओं का अनुवाद बनना चाहता हूं', 'वैशाख प्रिय वैशाख', 'क्षुधा मेरी जननी', 'मेरा देश तुम्हारी घृणा की प्रयोगशाला नहीं है', 'ब्रह्मपुत्र को देखा है', 'जा सकता तो जरूर जाता', 'यही छापामार सपनों का वक्त है', 'समकाल की आवाज- चयनित कविताएं' और 'एक दिन तो ऐसा आएगा', दो उपन्यास के नाम हैं- 'नीहारिका' और 'काली पूजा'। इसके अलावा उनके असमिया से 70 पुस्तकों का अनुवाद प्रकाशित है। उनको सोमदत्त सम्मान, जस्टिस शारदाचरण मित्र स्मृति भाषा सेतु सम्मान, अनुवादश्री सम्मान और अंतर्राष्ट्रीय पुश्किन सम्मान मिल चुके हैं।


संपर्क- 


ह्वाइट बिल्डिंग, शांति पर

कलिताकुची, डाकघर उदयन विहार 

गुवाहाटी-781171(असम)


फोन 9435103755

Email- Dinkar.mail@gmail.com

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