चन्दन पाण्डेय की कहानी 'शुभ विवाह'
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| चन्दन पाण्डेय |
उत्तर भारतीय परिप्रेक्ष्य में लड़की का विवाह पिता की एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। विवाह के बाद लड़कियों का घर ही नहीं गोत्र भी बदल जाता है। शादी को ले कर वे जितनी सपने बुनती हैं, उससे कहीं ज्यादा इस बात को ले कर भयाक्रांत रहती हैं कि न जाने पति का व्यवहार कैसा होगा। ससुराल के अन्य लोग कैसे होंगे। उनका रवैया क्या होगा? शादी के बाद लड़की का घर ही अब उसके मायके में तब्दील हो जाता है। अगर लड़की को ससुराल में दिक्कत होती है तो उसकी माँ, पिता, भाई, बहन सभी यही समझाते हैं कि वह वहाँ की स्थिति के अनुरूप एडजस्ट करें। धीरे धीरे लड़की की ससुराल ही उसका वास्तविक घर बन जाता है जबकि वह घर जहाँ वह पली बढ़ी होती है, लगातार बेगाना होता चला जाता है। जिस घर में बाकायदा एक कमरे पर उसका कब्जा होता था, उसी घर में उसके लिए अब कोई जगह ही नहीं रह जाती। लड़की की विदाई तो अवश्यंभावी होती है। लेकिन विदाई इस मायने में मारक होती है कि यह महज शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक विदाई भी बन जाती है। शादियों के समय महिलाओं द्वारा ही गाए जाने वाले पारम्परिक गीतों में यह व्यथा सहज ही महसूस की जा सकती है। चन्दन पाण्डेय अपनी कहानी शुभ विवाह में इस व्यथा को करीने से उकेर देते हैं। कहानी का यह अंश देखिए 'यह अटूट नियम इतना कठोर था कि एक जगह से उखड़ कर दूसरी जगह आरोपित होने के यम सरीखे नियम से निजात कम से कम इस सभ्यता में असंभव था। इन लाखों, करोड़ों, अरबों, विदाईयों में इस गीत से जुड़े भाव, इसके शब्द दुहराए जाते रहे होंगे कि ऐसे मांगलिक अवसरों पर इनकी अर्थवत्ता शायद ही शेष रही हों। अकेले में, उदासी के क्षणों में यह शब्द अर्थ रखते थे, अवश्य रखते थे, लेकिन इन अवसरों पर यह सूत्र की तरह स्थिर और ठस हो चुके थे। चन्दन की यह एक उम्दा और बेजोड़ कहानी है। चन्दन अपनी कहानियों में अतिरिक्त कुछ भी नहीं कहते। एक एक शब्द कहानी का अटूट हिस्सा लगता है। यह कहानी हमने 'वनमाली कथा' से साभार लिया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं चन्दन पाण्डेय की कहानी 'शुभ विवाह'।
'शुभ विवाह'
चन्दन पाण्डेय
डगमग डोलता हुआ एक रिक्शा अहाते के पूर्वोतरी दृश्य-पटल पर नमूदार हुआ और उसे सर्वानंद पाण्डेय ने इस तरह देखा मानो रिक्शे वाले को पहचानते हों। वे पहचनाते भी थे। रास्ता कुछ उबड़ कुछ खाबड़ था इसलिए रिक्शे वाला पाँव पैदल ही रिक्शा खींच रहा था। सर्वानंद रिक्शे वाले से अधिक रिक्शा खींचने की उसकी मशक्कत देख रहे थे।
उन्होंने आसमान देखा यह अनुमान लगाना चाहा कि शाम तक कहीं धारासार बारिश के आसार तो नहीं है। सूरज की ललाई ने सुबह के होने का सन्देश बरास्ते आसमान पूरी दुनिया पर नाजिल कर दिया था। इस घर के लिए, जिसके सामने खड़ी नीम की पत्तियों को सूरज की किरणों ने सबसे पहले छुआ था, खास दिन था।
आज सर्वानंद पाण्डेय की बड़ी बिटिया महालक्ष्मी का ब्याह है। लग्न तेज है इसलिए बारिश की संभावना है। बिटिया उनकी भद्रा है इसलिए भी बारिश की संभावना है। इस तरह की हर सम्भावना से वे डरे हुए हैं। बारिश पड़ने की सूरत में सारे इंतजामात धरे रह जायेंगे। रास्तों पर फैली कींच से मुकाबला कठिन हो जाएगा और संभव है कि वर को कंधो पर बिठा कर द्वारपूजा के पीढ़े तक लाना पड़े।
इधर दरवाजे पर अष्टजाम (अष्टयाम) पिछले दिन से ही बैठा हुआ था और अब कुछ घंटों में पूरा होने वाला था। कीर्तन मंडली के साथी लोकप्रिय और सिनेमाई धुनों पर ‘हरे राम हरे कृष्ण’ गा रहे थे। अजीब स्थिति यह थी कि लाउडस्पीकर के चोंगे का मुंह घर की तरफ ही किया रखा था। इस कारण पिछले दिन से घटने वाले सारे विधान भीषण शोर के परदे में घट रहे थे।
ब्याह आदि के प्रयोजनों में यह नियम आम सा होता जा रहा है। विवाह के शुभ मुहूर्त वाले दिन से एक दिन पहले अष्टयाम बैठता है। मानों देवदूत किसी उपक्रम की आभा को तेजोमय करने के लिए पहले से ही सुशोभित होते हों। दूर दूर से कीर्तन मंडलियाँ गाने आती हैं। इन कीर्तन मंडलियों को ‘पार्टी’ कह कर पुकारा जाता है। इनकी सारी धार्मिकता तयशुदा फीस के दायरे में होती है। एक मंडली अमूमन दो घंटे से तीन घंटे के बीच का समय पूरा करती हैं और इस तरह दूसरी मंडली उन्हें राहत देने के लिए मोर्चा संभालती है। यह चौबीस घंटे तक निर्बाध चलता रहे तब अष्टजाम सफल और सम्पूर्ण माना जाता है।
चोंगे का विकराल मुँह घर की तरफ ही किया रखा था इसलिए शोर भयावह स्तर पर पहुँच जा रहा था। कभी-कभी ऐसी स्थिति बन जा रही थी कि माइक की आवाज फटने लग जाए। गायक-वृन्द माइक से मुंह सटा कर गाने लग पड़ते थे. जब गीत ख़त्म रहे होते और ढोलक तथा झाल द्रुत गति से बजाये जा रहे होते थे तब यह इमारत कांपने लगती थी।
शोर की इस विभीषिका में घर के लोग एक दूसरे से कुछ कहने के लिए श्रोता के कान तक अपना मुँह ले जाते थे और तीव्रतम आवाज में वह सब कहते थे जो कहना चाहते होंगे। श्रोता एकाध शब्द सुनता और बाकी इस अनुमान से समझता था कि वक्ता ने क्या कहना चाहा होगा अथवा उसे कौन सी जिम्मेदारी सौंपी गयी है। जो वरिष्ठ थे वे इतनी जहमत नहीं उठाते रहे थे। वे दूर से ही बोलते थे और साथ ही आवाज की लगाम खींच कर बोलते थे। बस होठों को उन शब्दों के अनुसार घुमाते जिसे वे कहना चाहते रहे होंगे। प्रयोजन की सीमा शादी, ब्याह, मेहमान, खर्च आदि तक ही बंधी होती है इसलिए श्रोता सरलता से समझ पाते थे।
बिटिया का ब्याह राजी-खुशी संपन्न हो जाए जैसी कल्पना और उस जैसी ही धुकधुकी मन में दबाये सर्वानंद पाण्डेय ओसारे में लगी कुर्सी पर बैठे हुए थे और कमान संभाले हुए थे। इन शोर-शराबों के बीच वे एकाग्रचित्त हो कर वे सारे काम भाईयों में, बेटों में, भतीजों में, पटीदारों में, मजदूरों में बांट रहे हैं जो सुबह-सुबह ही पूरा किया जाना है। मंडप यानी माड़ो की छाजन छाई जानी है और उसके लिए बांस काटना है, लोहार मय कुल्हाड़ी-दाव-बसुला आ चुका है लेकिन साथ में लोग चाहिए, बांस को बाँसवाड़ से काटना, निकालना, बत्ता चीरना, उन्हें रंगना, बांसों को आँगन में खंभवत टिकाने हेतु कनस्तरों में बालू भरना, मंडप का छज्जा छाना.... बाहर के काम मसलन पड़ोस गाँव से दूध-पनीर लाना है, सब्जी वाले के आने के बाद सब्जियों का मिलान करना है, सरयू स्नान पर जाना है, जयमाल की माला ले कर आना है, एक आदमी रसोइये और उसके दल के साथ रहेगा, न्यौता कौन लिखेगा, न्यौते की कॉपी किसके पास होनी है, न्यौते में मिली साड़ी, कपड़े कौन रखता जाएगा, आज पूरे दिन आने जाने वालों को पानी कौन पिलाएगा, नाश्ते की प्लेटें कौन सजाएगा, बारात की अगवानी में कौन-कौन से लोग जायेंगे, भाई-पट्टीदार को दिन का भतवान खिलाने का इंतजाम कैसा है, हज्जाम और उसकी पत्नी को पूरे दिन, फिर पूरी रात रुकना है, विदाई के बाद ही जाना है, बारात के आने के बाद बारातियों के नखरे उठाने वाले विनम्र वीर किनको चुना जाए... अनगिनत कामों की सूची उन्होंने दोलाईनी पन्नों वाली एक डायरी में बना रखी थी।
वे भयभीत भी थे। विवाह और तिथि तय हो जाने के कुछ दिनों बाद मालूम चला था कि भावी समधी विवेकी पांडे शाम होते ही नशा कर लेते हैं, इस सूचना से उनका भय बढ़ गया था। जब तक ब्याह की रस्म आँगन में शुरू न हो जाए, विवाह, मथढक्का की कठिन प्रक्रिया पूरी न हो जाए, माड़ो के बांध समधी-बन्धु खोल न दें, वर और सहबाले खीर न खा लें, तब तक यह भय उन्हें कुतरता रहने वाला था। बावजूद इसके या शायद इन्हीं जिम्मेदारियों के उनके समुचित निर्वहन के कारण और पट्टीदारी के आत्मीय कायदों के कारण गाँव में उपस्थित लोग उनका सम्मान कर रहे थे। उनकी बात को खुद से भी आगे रख रहे थे। सर्वानंद के इशारे लोगों के लिए आदेश थे। आज्ञा थे। कर्ज में डूबे, जिम्मेदारियों से लदे फदे सर्वानंद को अपने ओसारे में लकड़ी की मजबूत और बड़ी कुर्सी पर बैठे हुए देखना किसी महाराजा को देखना था, जिस राजा को अपनी हद के दायरे में रह कर भी अपनी हुकूमत का अंदाजा हो।
उनकी निगाह फिरी और पाया कि रिक्शा दरवाजे तक आ पहुंचा है। अष्टजाम के भयावह शोर में किसी से कुछ कहना मुनासिब न था इसलिए अपने भाई हृदयानंद के बेटे राजन की तरफ होठों और उँगलियों से इशारा किया। वह इशारा इतना विस्तारित था, मसलन उँगलियों से राजन को अपनी तरफ बुलाने का ढंग फिर बेआवाज अपने होठों को इस सूरत में हिलाना, कि मानों पीछे देखने के लिए कहा जा रहा हो।
राजन समझ गया कि उसे पीछे देखना है और यह भी कि कोई मेहमान आया है। पलट कर देखा, बृहद मैदान सरीखे दुआर पर बीचों-बीच एक रिक्शा रुक रहा है। रिक्शे पर एक महिला बैठी हैं। अपनी इक्कीस वर्ष की उम्र में वह इस महिला से महज दो बार मिल सका है। आखिरी मुलाक़ात भी दस वर्ष पहले की रही होगी। राजन के माता-पिता ने शुरू से अपने बच्चों को इस घर से दूर रखा। उन्हें लगता था कि बच्चे कहीं और बिगड़े न बिगड़े, अपने गाँव घर के लोगों से मिलने-जुलने पर शर्तिया बर्बाद हो जायेंगे। अब जब अधेड़ावस्था आई थी तब राजन के माँ बाप को गाँव के प्रयोजनों में शामिल होना आवश्यक लगने लगा था। अकेले छूटते जाने का भय जो न सिखा दे! सब कुछ छूटने के बाद कुछ शुरू करना कितना कठिन होता है! ये दोनों मियाँ-बीवी गाँव में अजनबी की तरह दाखिल होते थे। उनसे गाँव इस कदर छूट गया था कि वे गाँव आ कर भी अलग-थलग पड़े रहते थे। कहीं किसी आयोजन शामिल होते तो संभावित जिम्मेदारियों से घबरा जाते थे और फिर खुद को दूर कर लेते थे।
नाम भले ही न याद आया हो लेकिन राजन इतना तो पहचान गया था कि बुआ ही हैं।
उर्मिला बुआ थीं।
दरवाजे से बाहर दुआर पर अष्टजाम से उत्पन्न शोर था लेकिन व्याकुलता के सिरे तक पहुंचाने वाला नहीं था इसलिए वहाँ एक दूसरे की पुकार सुनी जा सकती थी। उन अभिव्यक्तियों को स्वीकारा जा सकता था जो अपनत्व लिए थीं, उन्हें सराहा जा सकता था। इक्कीस वर्षीय राजन ने अलबत्ता उस शोरो-गुल में परेशान हो जाने वाला वही अभिनय जारी रखा जो ओसारे और घर के भीतर की हकीकत थी।
बुआ के पैर छुए। पैर छूते हुए भी उसके चेहरे की त्वचा हिल नहीं सकी थी। सख्तजान बना रहा। बुआ ने पैर छूने पर उसका ठुड्डी छू कर आशीर्वाद देना चाहा। वह आशीर्वाद ममतामयी स्वरुप में दे रही थीं जिसमें आशीर्वचन से पहले अपने प्रिय हेतु अनेक विशेषण होते हैं। राजन समझ नहीं सका या चाहें जो भी वजह हो, उसने अपना चेहरा बुआ के हाथों से वापस खींच लिया था और उनका सामान उठा कर, जो लकड़ी के हैंडल वाला एक बंधा हुआ झोला था, जो अमूमन कपड़ों की दुकान पर मिलता है, अन्दर जाने लगा। उर्मिला बुआ ने हँसते हुए अपना आशीर्वाद पूरा किया और आखिरी वाक्य जो कायदन अपने भतीजे से कहना था, उसे रिक्शे वाले से कहते हुए पूरा किया, मानो वह रिक्शे वाला कोई सगा हो, जिसने राजन का बचपन देखा हो। बुआ ने कहा था, ‘बाबू सयान हो गईने’। रिक्शे वाले ने स्वीकार में अपने सिर को डुलाया था। तब तक सिर डुलाता रहा था जब तक कि बुआ ने उसे पैसे नहीं दिए, उसने पैसे नहीं गिने और छुट्टे वापस नहीं कर दिए।
ओसारे में पहुँचते ही बुआ ने पाया कि उनका पूरा संसार यहाँ बसा हुआ है। ऐसे दृश्य मन के किसी कोने में सुगंध की तरह बसे होते हैं लेकिन कल्पना उन्हें रूप नहीं दे पाती। इस आत्मीय संसार को यथार्थ में ही घटित होना होता है।
चारो भाई उपस्थित थे। लगभग सभी भतीजे, उनके बच्चे, कुछ भतीजियाँ जो दरवाजे से कीर्तन मंडली को देख रही थीं, गाँव के लोग जिन्हें बुआ ने बचपन से देखा होगा और एक दिन बुआ की शादी हो गयी होगी और ये लोग बुआ को भूलने लगे होंगे। बुआ के मन में दूरस्थ भावनाओं का ज्वार उमड़ आया। उन्हें वैसे भी ‘भेंटना’ था। वे बड़े भइया का पैर पकड़ कर भेंटती थी और बाकी भाईयों के पास खड़े हो कर, भौजाईयों और बहनों से गले मिल कर रोती थीं। भेंटना पूरी तरह मशीनी हो, ऐसा भी नहीं था। एक बार भाभी या भइया का लकार बाँधने के बाद वे वास्तव में रोने लगती थीं। वे अपनी पीढी और बाद की पीढ़ी वाली बेटियों में इकलौती थीं जो अब भी भेंटती थी वरना अब ससुराल से पीहर आने वाली लड़कियों ने प्रणाम के कमोबेश निर्लिप्त कार्य-व्यापार तक खुद को सीमित कर लिया था।
आज उन्चास वर्षीय उर्मिला के मन में अपने इन सगे-सम्बन्धियों को एक साथ एक जगह पर देख कर जो ख़ुशी प्राप्त हुई थी वह बेकल कर देने वाली थी। अकस्मात्. जैसे लहर खींच ले जाती हो वैसे उनके मन में उथल-पुथल मची होगी जिसके वशीभूत होकर उर्मिला बुआ ने अपने सर्वानंद भइया का पैर पकड़ लिया। भेंटने लगी। अष्टजाम के कीर्तन की गरजती आवाज, जो लाउडस्पीकर की मदद से सबके मन-मस्तिष्क पर कब्जा जमा चुकी थी, सबके कान के परदे लगभग छेद चुकी थी, में उर्मिला बुआ शायद खुद भी अपनी रुलाई न सुन पायी हों। वहाँ उपस्थित लगभग सभी जन इस ‘भेंट’ की भावुकता से थोड़े भावुक और थोड़े परेशान हो गए थे।
सर्वानन्द और उर्मिला जुड़वाँ थे। कुछ पलों के अंतराल से वे दोनों बड़े और छोटे की पदवी पाए हुए थे। बचपन से ही उर्मिला बुआ ने अपने भइया की कद्र की। जब वे दोनों साथ-साथ विद्यालय जाते थे और एक ही कक्षा में पढ़ते थे, तब भी बुआ ने आदर-भाव में कमी नहीं आने दी। जीवनानुभव में बुआ अपने भइया से बड़ी थीं लेकिन सामाजिक स्थिति और परम्परा भी क्या चीज हैं! मसलन जब वे दोनों मिडल स्कूल की पढाई के लायक हुए तब उर्मिला का ब्याह हो गया था। गृहस्थ जीवन इकलौती ऐसी पाठशाला है जहां के सीखे सबक रोजमर्रा के जीवन में उपयोगिता रखते हैं।
भइया लोगों को भावुक होने की छूट कम होती है। इसका निर्वाह करते हुए उन्होंने बुआ से कहना चाहा - अन्दर जाओ। लेकिन शोर!
उन्होंने उँगलियों के इशारे से आँगन की तरफ जा रही एक युवती को रोका और इशारे से ही कहा जैसे किसी वस्तु की तरफ इशारा करते हैं, ‘इसे उठा कर घर के भीतर ले जाओ।’ शोर इतना अधिक था कि इशारा भी न समझे जाने का भय हो। इसलिए उन्होंने एक झटके में यह इशारा नहीं किया। एक एक कदम को समझाते हुए कहा था। अगर घर में शान्ति होती तो इतना भर इशारा कर देते कि बहन को भीतर ले कर जाओ लेकिन अष्टयाम की गर्जना के बीच उन्होंने पहले उस युवती को बुलाने का इशारा किया। जब उस बात को पूरी तरह स्पष्ट कर लिया तब बहन की तरफ इशारा किया, मानो कह रहे हैं कि इसे देखो। तत्पश्चात बहन को उस जगह, जहाँ वह भेंट रही थीं, से उठाने का इशारा किया। जब उन्हें लगा कि घर के भीतर जाने को उत्सुक होती वह युवती उनकी इन सभी बातों को समझ गयी तब उसे फिर उँगलियों से ही दिखाया कि इसे घर के भीतर ले जाओ।
उर्मिला को भीतर जाते हुए सर्वानंद ने देखा और बेढब एक ख्याल ने कुछ पलों के लिए उन्हें अपने गिरफ्त में ले लिया कि बहन के घर वालों में क्या किसी के पास इतना वक्त नहीं था कि वे इसे पीहर छोड़ने के लिए आते? इससे आगे वे सोचते तब शायद अन्यान्य कठिन प्रश्न उनके समक्ष उमगते। मसलन ब्याह के पैंतीस वर्ष बाद बहन की हैसियत उसके घर में क्या और कैसी है या यही कि बहन का घर वह हो भी सका या नहीं। उन्होंने इन ख्यालों को रफा-दफा किया और शादी की तैयारियों में खुद को मशगूल कर लिया।
घर के भीतर का आँगन इतना बड़ा था कि उसके समूचे विस्तार को एक निगाह में समेटा नहीं जा सकता था। उर्मिला बुआ को देखते ही उनकी बड़ी भाभी आईं। गले मिलीं। मझले भाई हृदयानंद की पत्नी उन तक आईं। बुआ का चेहरा आंसुओं से भींगा अवश्य था और आंसू सूख कर सफेद पपड़ी बन चुके थे लेकिन अब वे उस कदर भावुक नहीं थीं। आकस्मिक उमगा भावनाओं का ज्वार पीछे लौट रहा था जैसे तट को सफेद फेनिल द्रव से रंगने के बाद सामुद्रिक लहरें पीछे लौटती हैं, इसलिए वे तीनों एक दूसरे से गले मिल कर भेंट रही थीं लेकिन रुलाई नहीं थीं। इनसे मिलने-जुलने के क्रम में बुआ ने देखा कि बड़े भतीजे अनिमेष की बहू अर्चना आँगन से उठ कर एक कमरे के भीतर जा रही है। शायद कोई अनहुआ काम याद आ गया होगा।
सबसे छोटे भाई अभयानंद की पत्नी चौका पूरने में व्यस्त थीं। सत्यनारायण कथा का पाठ बैठने वाला था। बुआ ने ही आगे बढ़ कर पुकार लगायी। कई दीवारों को पार करने के बाद यह आँगन था लेकिन अष्टयाम का शोर यहाँ भी दखल दे रहा था। औरतों को सुनने-सुनाने में जोर लगाना पड़ रहा था। बुआ की आवाज जब उन स्त्री तक नहीं पहुँची तब बड़ी भाभी ने आवाज दिया। घर के मालकिन की आवाज से चौका पूरती स्त्री चौंक गयी और तुरंत बुआ की तरफ उनकी नज़रें गयीं। एक मुस्कान होठों के दायरे में फ़ैल गयीं। उन्होंने इशारों में काफी कुछ बताया, मसलन दिन चढ़ आया है। उस इशारे का वास्तविक अर्थ था कि देर हो रही है। यह भी इशारा किया कि चौका पूरने के बाद आपके पास आ कर बैठती हूँ। एक भौजाई ने जरुर ठिठोली की कि अब उर्मिला जिज्जी आ गयीं इसलिए हर मौके के गीत-मांगर हो सकेंगे। बुआ ख्यात थीं। उनके पास मंगल-गीतों की पुरानी सहेजी हुई कॉपी थी। ब्याह आदि के अनेक मौकों के लिए वे खुद भी गीत बना लेती थीं अथवा पुराने गीतों में अंतरें जोड़ लेती थीं।
बुआ आँगन के ही किनारे में रखी चारपाई पर बैठ गयीं। इतना बड़ा कुनबा था कि हर दूसरे अथवा तीसरे पल कोई नया मानुष निकल आ रहा था। घर की बेटियाँ आ कर उनके पैर छूतीं, बुआ आशीर्वाद देतीं और आशीर्वचनों के पूरा होते न होते वे चली जातीं। बुआ के पास बैठने की फुर्सत किसी के पास नहीं थी। अगर किसी बहू या बेटी इनकी मुस्कराहट का जवाब मुस्कराहट से दे दिया तब बुआ उसका हाथ पकड़ कर चारपाई पर बिठाना चाहती थीं, बातें करना चाहती थीं। लेकिन सब अष्टयाम के ‘हरे राम हरे कृष्ण’ की शोर से बिंधे हुए थे। या कोई न कोई काम निकल आ रहा था। जो लड़की ट्रे में लड्डू और पानी भरे ग्लास ले कर आई थी उसने भी मुस्कुराहट से ही बुआ का स्वागत किया।
कोई वक्त तक बुआ आँगन में बैठी रहीं। वे उठीं और किसी को ढूँढने लगी जिससे अपने ठहरने का इंतजाम जान सकें। अपने ब्याह के बाद जब वे इस गाँव आती थीं; जिसे वे अपना गाँव कहती थीं, बरसों तक कहती रहीं, तब उनके घर में कदम रखने से पहले ही उनका कमरा तैयार मिलता था। वह पुराना मकान गाँव के भीतर था. मिट्टी के उस मकान में कमरे कम थे फिर भी इन्हें जगह मिलती थी। उस दौर में ये महीनों- महीने अपने नैहर में रह लेती थीं। तीनों बच्चों का लालन-पालन नैहर में ही किया।
यह मकान नया था, कमरे भी दर्जन भर थे। जिस कमरे में बुआ के ठहरने का प्रबंध था उसका दरवाजा दालान की ओर खुलता था। उन्होंने पाया कि कमरे में चार चारपाइयां हैं। वे अपने लिए एक बिस्तर चुन कर बैठ गईं। अपने झोले को सिरहाने के पास रखा था। अष्टयाम अभी चल ही रहा था। दालान वाला कमरा ओसारे के बिल्कुल नजदीक था जहां अष्टयाम के लिए कीर्तन गाने वाले अपने झाल मंजीरे और बेन्जो के साथ बैठे हुए थे इसलिए शोर का सर्वाधिक असहनीय प्रभाव भी इसी कमरे में था।
वे बिस्तर पर लेट कर बाहर देख रहीं थीं। थोड़े पहर बीत जाने के बाद जब दालान में पीला रंग सर्वाधिक जगह छेंकने लगा तब वे समझ गयी कि ‘हल्दी’ का वक्त हो चला है। गाँव की लड़कियां, घर की लडकियां पीले कपडे पहन कर या तैयार होते हुए इतने सारे काम भी निबटा रही थीं जिससे दालान, ओसारे की जगहों में उनका आना-जाना लगा हुआ था। उन्होंने ध्यान दिया तो पाया कि अष्टजाम समाप्त हो चुका है लेकिन शोर लगभग उतना ही है। यथावत रखे लाउडस्पीकर पर हल्दी के वक्त गाये जाने वाले और बजाये जाने वाले गीतों की तैयारी चल रही थी।
हल्दी की रस्म का आयोजन छत पर निर्धारित था। कनात का एक हिस्सा यहाँ भी लगाया गया था। शामियाने के सफेद परदे धूप की चुगली कर रहे थे।
‘हल्दी’ की रस्में अब स्वतंत्र उत्सव का रूप ले चुकी थीं। इसमें सिनेमाई गीत थे, रियाज से सीखे गए नृत्य प्रदर्शन थे, अपने नृत्य प्रस्तुतियों के बाद थोडा लजाना था, रील बनने थे, ‘पोज’ दिए जाने थे और इन सब के बीच बुआ को अपना वक्त याद आना चाहता था लेकिन बुआ ने उन स्मृतियों को विश्राम दिया। भतीजी के ब्याह में शामिल हो कर वे खुश थीं। आज सुबह से हासिल बेगानेपन को वे किसी और दिन के लिए सहेज कर रख चुकी थीं, आज वे खुश थीं भी और दिखना भी चाहती थीं। यह अजनबियत इतनी नयी-नकोर भी नहीं थी, इसके रेशे उनके जीवन में पहले से दाखिल होने लगे थे।
जब हल्दी में नाचना, गाना हो गया तब जैसे उर्मिला बुआ की ओर सबका ध्यान गया हो। उनकी बड़ी भाभी ने उलाहने के स्वर में कहा, ‘गावे खातिर भी आज्ञा विजय चाहीं? नेवते के पड़ी? (गाने के लिये भी निमंत्रण देना पड़ेगा क्या?)’। बुआ ने इस उलाहने को सहर्ष स्वीकार किया। जब उन्होंने हल्दी के रस्म वाले गीत के बोल कढ़ाये तब जो स्त्रियाँ पुराने जमाने की दहलीज पार कर नए में आई थीं, उन्हें अपनापन का एहसास हुआ। वे भी गीत के बोल ‘पूराने’ में लग गईं। उनके व्यवहार से लग रहा था कि नए चलन के नाच इत्यादि में वे जबरिया शामिल थीं या की गयी थीं वरना हल्दी उत्सव का असल आनंद उन्हें बुआ के साथ गाने में ही आ रहा था. वे देर तक गाती रहीं थीं -
‘कोइरिन कोइरिन तुहू मोर रानी हो,
कहिया के हरदी ऊपर कईलु आज हो,
हमरा कवन बाबा जरिये के राजा हो,
घोड़ा चढिS बेसहें हरदिया के गाँठ हो,
हमरा कवन बेटी अति सुकुआर हो,
सहलो न जाला हरदिया के झाग हो,’
यह गीत जब उर्मिला बुआ ने शुरू किया तभी से उनकी भाभी और भावी दुल्हन की माँ ने उनका हाथ पकड़ लिया था। जैसे लोग अनजाने उत्कंठा से घबरा कर किसी का हाथ थाम लेते हैं। सुबह का बेगानापन जो रिश्तों की धुंध के कारण उपजा था वह अब इसलिए धुलता-घुलता जा रहा था क्योंकि रिश्ते से ऊपर उठ कर दो स्त्रियाँ एक दूसरे का दुःख समझ रही थीं, समझा रही थीं।
गीत ख़त्म होने से पहले ही महालक्ष्मी की माँ रोने लगी थीं। चुप कराने पर चुप हुईं और फिर रोने लगीं थीं। आंसुओं को पल्लू से निबेड़ते हुआ बुआ से ही कहा था, ‘काल्हि बबुनि विदा हो जईहें। (कल बेटी विदा हो जायेगी)।’
ऐसा नहीं था कि बुआ के गाये मार्मिक गीत के बोल की वजह से महालक्ष्मी की माँ अपने हृदय के उदगार रोक न पाई हों। दरअसल उस गीत की लय में कुछ अलग था जो उन्हें आगामी वक्त की स्थिति का एहसास कराता था। यह गीत माँ और बुआ आधी सदी से सुनती आ रही थीं और बाद में समझने भी लगी थीं। वह गीत सामंती अवशेष वाले समाज के चंद खुशनुमा पहलुओं पर था जिसमें दुल्हन की माँ हल्दी की गुणवत्ता की प्रशंसा उस स्त्री से कर रही है जो हल्दी की गांठें ले कर आई हैं। जवाब में वह स्त्री कहती है कि हमारे पिता राजा हैं और वे घोडा चढ़ कर यह हल्दी खरीदने गए थे। वह स्त्री उस भावी दुल्हन की नाजुकी भी बयान कर रही है और कह रही है कि यह बच्ची तो हल्दी के झाग भी नहीं बर्दाश्त कर पा रही हैं।
दुल्हनों की माँये देखते-देखते रोने लगती थीं। महालक्ष्मी की माँ को अपनी माँ याद आई जो ब्याह की तारीख तय होने के बाद गेहूं पीसते हुए, धान कूटते हुए, दाल दलते हुए रोने लगती थीं। वे दूर बैठी या पास आ कर माँ का रोना देखती रहती थीं और बूझ नहीं पाती थीं कि उन्हें क्या करना चाहिए? आंसुओं की वजह वे खुद ही रही थीं।
हल्दी के बाद जब सब छत से नीचे आये तब बुआ आँगन में देर तक बैठी रहीं। इस बार वे किसी को पास बिठा लेने के इन्तजार में नहीं बैठी थीं। उनका चेहरा निरपेक्षता का भाव लिए हुए था। सुबह से मिल रही अमिट अजनबियत की मुहर ने उन्हें यह मौका दिया था कि वे विवाह संबंधी क्रियाकलापों को निरपेक्ष भाव से देख सकें। मसलन ‘चुमावन’ की घड़ी में जब अक्षत कम पड़ने लगी तो वे किसी हडबडाहट का शिकार नहीं हुईं। वे देख रही थीं। किसी ने जब अक्षत के कम होने की बात कही तो इन्होने तस्दीक भर कर दिया था। गाँव का कोई आदमी या कोई रिश्तेदार जो इनसे परिचित रहा हो, आँगन में अगर आता तब इन्हें दंड-प्रणाम करता और ये आशीर्वाद में उस व्यक्ति को खुश-निगाही से देख भर ले रहीं थीं।
जिसे कन्यादान देना होता है वह दम्पत्ति व्रत रहता है - यह एक नियम है। इससे अलग एक अनकहा नियम होता है कि कन्यादान चूंकि माता पिता के अतिरिक्त चाचा, चाची, बुआ, फूफा सब कर रहे होते हैं, इसलिए सब व्रत रहते हैं। लड़की के माँ पिता व्रत थे, चाचा चाची व्रत थे, सो बुआ ने भी व्रत रखना स्वीकार लिया। वे चाहती थीं कि अपने पतिदेव के हिस्से का व्रत भी रख लें क्योंकि वे इस विवाह में शामिल नहीं होने वाले थे। व्रतियों के लिए घोली हुई चीनी और दही का शर्बत था। उसका ग्लास इनकी तरफ भी घूमा. इस बीच एक बात हुई जिसे बुआ ही ध्यान दे सकती थीं। महालक्ष्मी की माँ इस भीड़-भड़क्के में भी उर्मिला बुआ के लिए एक कप चाय बना लाई थी। अपने आँचल में छिपा कर लाई थी. सबके लिये चाय बनाना मुश्किल था। साथ में व्रती के भोजन के लिए भूनी हुई मूंगफली थी। बुआ को यह बात अच्छी लगी लेकिन वे जानती थीं कि घर के इस नए अनुशासन में उनकी जगह सिमट रही है, इसलिए मुस्कुरा कर अपनी भाभी के हाथों से मूंगफली का कटोरा और चाय का कप थाम लिया। उनकी कोई योजना नहीं थी लेकिन भाभी की इस आत्मीय पहल ने उन्हें अतिशय भावुक कर दिया और चाय पीते हुए, खुद मूंगफली के दाने खाते हुए और उन दानों के छिलके अपनी आहिस्ता फूंक से उड़ा कर अपनी भाभी को भी दाने खिलाते हुए उन्होंने यों ही एक बात कही, ‘पुराने घर से हो कर आती हूँ’। भाभी ने धूप की धौंस दिखाई, प्रयोजनों का हवाला दिया लेकिन इन्होने मन बना लिया था। कहा, ‘भाभी पता नहीं वापसी का मौका फिर कब मौका मिलेगा?’
कड़ी धूप में लिपटी दोपहर के वक्त, जब रस्मों का शोर जरा थमा और लोग इस लिहाज से सुस्ता रहे थे कि अब जब अपने कामों में भिड़ेंगे तब फिर कल सुबह दुल्हन की विदाई के बाद ही आराम उनके हिस्से में आयेगा, बुआ बड़े पनहे की सूती साड़ी में खुद को संभालती हुई गाँव के भीतर दाखिल हुई थीं। जब वे पुराने घर की तरफ निकल रही थीं तभी उनके छोटे भाई उन तक आये थे। संवाद न्यूनतम। बस पूछा, ‘केन्ने बहिना? ( किधर, बहिन?)’ उर्मिला ने भी इतना ही कहा, ‘एहिंगा ( इसी तरह)।’ फिर भाई ने कुछ नहीं पूछा, बहन ने कुछ भी नहीं कहा, उस संवाद की गूँज का पीछा करते हुए पुराने घर के रास्ते पर निकल आई थीं। जिन्हें पहचान सकी उन्हें नमस्कार करती हुई, जिन्हें नहीं पहचाना उन्हें देख कर मुस्कुराती हुई वे उस जगह पर पहुँची जहां उनका पुराना घर हुआ करता था।
उनके हृदय को कचोटता हुआ एक धक्का सा लगा था। अगर सुबह से हासिल बेगानेपन ने उन्हें होशियार न किया होता तब वे शायद वहीं बैठ जातीं। पिछली बार जब देखा था, घर तब भी गिर चुका था लेकिन तब तक दीवारें शेष थीं। उस स्थिति में घर, आँगन, रसोई, दालान, ओसारा आदि को वे उपस्थित दीवारों की मदद से अपने मन में रच सकी थीं लेकिन इस मर्तबा सब कुछ जमींदोज हो चुका था।
वे देर तक खड़ी रहीं।
आस-पास के घरों की प्रौढायें निकल आई थीं। सबके साथ मनचर्चा के बीच बुआ बार-बार उन जगहों, कमरों को याद कर रही थीं जिनमें मौजूद उनकी स्मृतियाँ उनके मन में ताजादम उपस्थिति दर्ज किये हुए थीं। उनकी कल्पना-शक्ति जवाब दे जा रही थी। हर कमरे, हर कोने की कल्पना उन्हें उनकी उस रसोई तक ले जाती थी जो उनके तथाकथित अपने घर यानी उनके ससुराल में थी। वह चाह कर भी उस रसोई को अपने जेहन से हटा नहीं पा रही थीं ताकि अपने बचपन की स्मृति का भेद लगा सकें। वे अभी इतना भी नहीं याद कर पा रही थीं कि जब उनका ब्याह तय हुआ था और मिट्टी के घर की दीवारे चिकनी मिट्टी के घोल से पुती थीं तब उन्होंने अपने हाथों से सफेद रंग के फूल दीवालों पर बनाए थे, वे किस तरफ थे? उन्हें अच्छी तरह याद है कि चौके की बाहरी दीवार पर दो वाक्यांश भी बेलबूटों की नक्काशी में उन्होंने अपने ही हाथों से लिखे थे - एक तरफ ‘शुभ विवाह’ लिखा था फिर बीच में सर्पिल बेल-बूटे और दूसरी तरफ ‘दुल्हन ही दहेज़ है’। यह चलन था। लोग घर की दीवार पर दूसरा कुछ लिखें न लिखें, ब्याह आदि के वर्षों में ‘शुभ विवाह’ अवश्य लिखाते थे। इसे देख कर लोग जान लेते थे कि या तो पिछले कुछ महीनों में इस घर में विवाह हुआ है या आगामी महीनों में होने वाला है। जैसे ही उन्होंने इस पुराने घर के चौके की जगह याद करनी चाही उन्हें फिर अपने ‘घर’ का रसोईघर याद आ गया था।
पुराने घर से लौट कर बुआ घर बाहर हर तरफ की आवश्यकता और उत्सवों में शामिल होती रहीं। बीतती दोपहर में एक वक्त ऐसा भी आया कि पाँचों भाई-बहन एक साथ देखे जा सकते थे। वे सायास एक साथ दीखते तो अलग-सी कोई बात होती। ओसारे की जगह थी। हृदया और जगत झंपोलियों पर सजावट के रंगीन कागज़ चिपका रहे थे। अभयानंद ठंडा हो चुके लड्डूओं और खाझा-खजोली के परात ओसारे में रख रहे थे। उर्मिला उन झंपोलियो में घर की बालिकाओं के साथ मिठाईयों को रखती जा रही थीं। सर्वानंद उसी ओसारे में बैठे प्लेट आदि लगवाने की तैयारी कर रहे थे और साथ ही बीच बीच में अपने भाईयों और बहन को देख रहे थे। कोई चाहता तो इन सभी की एक तस्वीर उतार सकता था। उस तस्वीर में अलग-अलग वे सब बेध्यानी में दीखते लेकिन मुकम्मल एक तस्वीर जो उभर कर आती वह उनकी उपस्थिति होती. उस सार्वकालिक उपस्थिति में उनका आड़ा-बेड़ा होना, बेख्याल होना गौण हो जाता। वह तस्वीर इस तरह याद की जाती कि एक तस्वीर थी जिसमें पाँचों भाई बहन थे।
उस दिन की शाम गाजे-बाजे के साथ उतरी थी।बारात विलम्ब से ही सही लेकिन दरवाजे पर आ गयी थी। आवाजों और शोर का ऐसा भीषण प्रदर्शन तो देखा ही नहीं गया हो शायद। घर का लाउडस्पीकर अलग शोर कर रहा था। बारात के बैंड-पार्टी का लाउडस्पीकर दूसरी गर्जना कर रहा था जो दूल्हे की गाड़ी के सामने था। बारात का ऑर्केस्ट्रा अलग चिंघाड़ रहा था। नाचने वाले कौन से माईक की धुन पर नाचे जा रहे थे यह पता करना मुश्किल था और गैरजरुरी भी। भीड़ और शोर अपने किसी शिखर छू रहे थे। बारात के आने का वक्त और द्वारपूजा के समय ऐसी स्थिति बनी थी कि बुआ अब धीरे-धीरे घर के दायरों से छिटक कर गाँव की महिलाओं वाली जमात का हिस्सा हो चुकी थीं।
यह छत के एक कोने में खड़ा महिलाओं का समूह था। वहाँ से वे द्वारागमन और द्वारपूजा देख रही थीं। वहाँ महिलायें बिना किसी माईक के द्वारपूजा के मंगल गीत गा रही थीं। बुआ निर्लिप्त भाव से उन गीतों के बोल दुहरा भर रही थीं। हजारों की उपस्थिति के बीच इन महिलाओं की उपस्थिति इतने अँधेरे में थी कि कोई ध्यान से न देखे अगर, तो इनके होने से अनजान रह सकता था।
बुआ ने देखा कि ये सभी महिलायें इन वैवाहिक उत्सवों को बड़े गौर से देखती हैं। प्रत्येक विवाह की एक-एक बारीकी इन्हें याद रहती थीं। कोई इस गाँव की बहू थी कोई बेटी और ज्यादातर ब्याहतायें ही थीं। कोई इनसे पूछता कि विवाह ने इनके जीवन की क्या गत बनायी तब वे अपनी स्थिति शायद ही बता सकती थीं। अगर वे किसी आईने में इस खास भीड़ को देख पाती तो ‘बिआह-देखनी’ की इस भीड़ में खुद को शामिल पातीं।
बुआ नीचे लौट गयी थीं। सारी भीड़ बाहर थी इसलिए घर का आँगन अपेक्षाकृत सूना था। कोई भागता हुआ आता, छूटा कोई काम पूरा करता और बाहर चला जाता। बुआ दरवाजे-दरवाजे यह नया घर देख रही थीं। सभी कमरे वैवाहिक गहमा-गहमी में अस्त व्यस्त लग रहे थे. इस क्रम वे बड़ी भाभी के कमरे तक पहुँची। वहाँ नववधू के रूप में उनकी भतीजी महालक्ष्मी तैयार हो कर बैठी हुई थी। रूप-सज्जा के लिए आई स्त्रियों ने मेक-अप कर दिया था। लहंगे में उस लड़की का शृंगार किसी मूर्ति की तरह किया गया था। उसके मेक-अप का ‘फाउंडेशन’ पसीने की तरलता में बह न जाए इसलिए उसके सामने दो पंखे चला कर रखे गए थे।
महालक्ष्मी ने अपनी आँखे उठा कर बुआ को देखा। नववधू बनी उनकी भतीजी की दृष्टि में कई सारे भाव पनप रहे थे। पूरा घर बाहर बारात के आगमन और द्वारपूजा में उलझा हुआ था ऐसे में परिचित चेहरे को पाकर दुल्हन बनी भतीजी के सजाये गए चेहरे पर आश्वस्ति का भाव उभर आया था। दुल्हन की आँखें मानो धन्यवाद कहना चाहती हों। बुआ ने उसे देखा और उसकी आँखों में उतराई बेचैनी को वह पहचान गयी थीं. अकेली बच्ची को इस तरह बैठा देखना, उन्हें भीतर तक परेशान कर गया. वे कमरे के चौखट तक आईं पर वहाँ ठिठकी थीं। चौखट पर खड़े हो कर उन्होंने कमरे का मुआयना किया. महालक्ष्मी आँखों से मुस्कुराई थी। पुकारा, ‘बुआ!’ बुआ मुस्कुराई थी और उन्होंने कहा था, ‘अपरूप सुन्दरी’। महालक्ष्मी ने आवाज को थोडा ऊँचा कर कहा था, ‘बुआ...’ बुआ ने कहा था, ‘खूब खुश रहो.’ महालक्ष्मी ने कहा था, ‘अन्दर आओ न बुआ।’ बुआ ने महालक्ष्मी के संवरे सिर को हाथ लगाते हुए आशीर्वाद दिया था। उसके चेहरे को खूब देर तक निहारती रही थीं। जब घर में गहमा-गहमी बढ़ने लगी तब बुआ ने महालक्ष्मी से पूछा था, ‘जाऊं’? महालक्ष्मी ने कहा था, ‘नहीं’। फिर कहा था, ‘यहीं रहो न बुआ, मेरे पास।’ जब बुआ अपनी दुल्हन भतीजी के करीब आ गई थीं तब महालक्ष्मी ने अपना सिर हल्का सा झुका कर बुआ के आँचल पर टिका लिया था। जब तक वह अपना सिर टिकाये रखी थी, तब तक बुआ उसका सिर सहलाती रहीं। देर तक वे दोनों एक साथ रहीं। बुआ ने फिर तब तक कुछ नहीं कहा जब तक वह कमरा दूसरों से भर नहीं गया।
जयमाल के बाद शोर और शराबे तो वैसे ही रहे लेकिन दरवाजे की भीड़ छंटने लगी थी। ‘ब्याह बैठने’ वाला था। इस क्रम में इतनी रस्में थीं कि उनके पूरा होते होते सुबह हो जानी थीं। शुरुआती रस्मों में घर पूरा भरा रहा था। आँगन और दालान और गलियारे बेतरह भरे हुए थे। वधू-निरीक्षण का उत्सव सर्वाधिक भीड़ भरा था। ब्याह देखने वाली स्त्रियों और युवतियों के बीच बुआ ने भी जगह पा लिया था। वे चाहती थीं कि कोई उन्हें कुर्सी दे देता अथवा कोई पीढ़ा या मचिया ही थमा देता क्योंकि नीचे जमीन पर बैठने से भोर तक, विवाह के समाप्त होने तक बैठे रहने से घुटनों को सूज जाना था। चारों ओर निगाह दौड़ा लेने के बाद भी किसी से अपनी इच्छा जतलाने का साहस बुआ में नहीं आया।
‘वधू निरीक्षण कार्यक्रम’ के लिए दूल्हे के बड़े भाई और अन्य रिश्तेदार बतौर मेहमान आये थे। रस्म यह थी कि जितने भी गहने, कपड़े वधू को मिलने होते हैं वह दूल्हे का बड़ा भाई मंत्रोचार के दरमियान दुल्हन को सौंपता है। यह अंतिम से भी अंतिम मौका होता है कि जब दूल्हे का बड़ा भाई इस नववधू को गहने इत्यादि सौंपने के मार्फ़त स्पर्श करता है।
विवाह और फेरों के वक्त दूल्हा पक्ष से ग्यारह पंडित थे और ग्यारहों के मंत्रोचार में घरु पंडित की आवाज दब सी गयी थी। फेरे संपन्न होते-होते आँगन केवल स्त्रियों का हो कर रह गया था और यह तकरीबन तीन बजे रात की बात होगी। दुल्हन पक्ष से निर्धारित घरू पंडित के अलावा सारे पंडित जा चुके थे।
शुक्र तारा नजर आने लगा था। भोर और रात की संधि पर समय टिका था और आवश्यक बारातियों का इन्तजार हो रहा था। मथढक्का का कार्यक्रम शुरू होने वाला था। बारात स्थल से समधी विवेकी पांडे और उनके सारे भाई आ रहे थे। बैंड बाजे के साथ आने की रस्म थी इसलिए दो ताशे वाले साथ आये थे और दरवाजे पर पहुँचते ही उन्होंने ताशा पीटना रोक दिया। वह आवाज थमी तब फिर सारी आवाजें थम गयी थीं। बाहर भीतर कोई आवाज नहीं। जो मकान सुबह से गर्जनाओं का ग्रास बना हुआ था, अथाह शोर में डूबा हुआ था, वह मकान अब पूरी तरह शान्ति का वरण कर चुका था। बाराती घर से बहुत दूर टिकाये गए थे और फोहश ऑर्केस्ट्रा में गानों की अश्लीतम कल्पनाओं से थक कर सभी सो चुके थे। नाचने वाली पार्टी भी जा चुकी थी। यहाँ जिस दरवाजे पर ब्याह संपन्न होने वाला था, वहाँ भी माईक बंद हो चुका था। अब जो गीत मांगर गाये जा रहे थे वे मौकों के अनुरूप थे।
पंडित भी थक चुके थे। अगर रस्मों को पूरा करने को ले कर घर जागरूक न होता तो वह अब तक शादी निबटा चुके होते और बाहर किसी चारपाई पर सो रहे होते। गाँव की कुछ बुजुर्ग, अधेड़ महिलायें आँगन में बैठी थीं। विवाह की सारी रस्मों को आखिर आखिर तक देखना था। कुछ नवयुवतियां भी थीं। इनके लिए ब्याह एक स्वप्न था। गाँव का जीवन ऐसा है कि एक उम्र के बाद आप विवाह के स्वप्न को जीने लगते हैं। घर की महिलायें थीं। दुल्हन की माँ, चाचियाँ, बहनें और बुआ। पुरुष वही वही थे जिनकी आवश्यकता हो सकती थी। मसलन हर मौके पर पंडित को और हज्जाम को पैसे देने पड़ते थे इसलिए सर्वानंद उपस्थित थे। उनके सभी भाई थे, उनके कुछ भतीजे भी उपस्थित थे और अब मथढक्का की रस्म हेतु सर्वानंद के समधी विवेकी पांडे अपने अनुज और अग्रजों के साथ आ चुके थे। उनके साथ एक गंध भी आई थी और आ कर आँगन में बैठ गयी थी जो ब्याह तय होने के समय से ही चर्चा में थी।
नींद लेकिन सब पर छाई हुई थी। बाहर शामियाना समेटने वाले लड़के थे अगर उन्हें छोड़ दें तो सब के सब सो जाना चाहते थे। कोई शराब और दूसरे नशे में था। किसी पर चांदनी रात का ही ज़हर इस कदर फैला था कि वह जहां जगह पाता सो जाता। इतनी शान्ति थी कि दिन में शोर के कारण जिन दीवारों की तरफ निगाह करना भी मुश्किल था, अब वे स्पष्ट दिखाई दे रहीं थीं। यह घर अब बड़ा दिख रहा था।
रस्म अदायगी शुरू हुई।
पंडित के मंत्र उनके होठों तक फ़ैल कर रह जा रहे थे। आँगन में बैठी कुछ अधेड़ स्त्रियों ने रस्म से जुड़े गीत गाने चाहें पर वे भी गीत का मुखड़ा कढ़ा कर चुप रह गई थीं, उन्हें किसी का साथ नहीं मिला जो गीत को पूराए, कोरस का निर्माण करे। उनके गीत की लय टूट जा रही थी।
सब शांति से बीत जाना था। मथढक्का ख़त्म होता, लगे हाथ माड़ो खोलने का कार्यक्रम पूरा होता जिसमें नेग के बतौर हर समधी को सोने की अंगूठी देना दहेज़ में ही तय हो गया था. विवेकी पांडे चाहते थे कि उनके सम्मान में कोई कमी रह जाए तो रह जाए लेकिन उनके भाईयों के सम्मान में कोई कमी न रहे। सभी के लिए नेग तैयार थे। तत्पश्चात दुल्हन की विदाई हो जाती जो कि मुहूर्त के अनुसार भोर में ही हो जानी थी।
हुआ भी यही सब लेकिन थोड़ी हरकत ले कर हुआ। स्वसुर ने दुल्हन के माथे पर साड़ी रखी और उस दुल्हन के सुन्दर, उन्नत ललाट को सदा सर्वदा के लिए ढंके रहने का मंत्र निन्दियाये पंडित ने पढ़ा। जब बारातियों तथा घरातियों की संतुष्टि के लिए उस मंत्र के मारक प्रभाव को हिन्दी में फिर भोजपुरी में बता रहा था तभी कोने में बैठी उर्मिला बुआ की नजर दुल्हन के नवेले घूंघट पर गयी। बुआ को लगा कि उनकी बेदोष भतीजी का जीवन सदा-सदा के लिए ढँक दिया गया। यही वजह रही होगी क्योंकि दूसरी कोई वजह समझ नहीं आती कि उन्होंने एक गीत के बोल अपने गले से कढ़ाया -
हाय दुःख की घडी आ रही है
आज बेटी विदा हो रही है।
बुआ की रागिनी नींद और दुःख में पगी हुई थी। उनकी आवाज में थकन, जिसकी वजह आप इस एक थकाऊ दिन और रतजगे को बता सकते थे अथवा उनके पूरे जीवन को इस थकावट का उद्गम बता सकते थे, इस कदर तारी थी कि लग रहा था, उनकी स्वरलहरियां एक दूसरे पर गिरी जा रही थीं। इससे उन शब्दों का प्रभाव गाढा ही होता जा रहा था। बुआ इस गीत के मुखड़े को दुहराए जा रही थीं -
देखो दुःख की घड़ी आ रही है
आज बेटी विदा हो रही है।
एक-एक व्यंजन और एक-एक स्वर को माड़ो ( मंडप) के कुश, बांस, बाँध सब पर टिकाती हुई, उनकी जगह सुनिश्चित करती हुई बुआ की आवाज ने सबको चौंकाया भर हो, ऐसा नहीं था. सबने जैसे उन शब्दों से, उस उदास स्वर-लहरी से तादात्म्य स्थापित कर लिया था।
बुआ ने पहले भी यह गीत गाया होगा। कितने विवाह उन्होंने संपन्न होते हुए देखे होंगे। उससे भी पहले से बेटियाँ विदा होती रही हैं, यह अटूट नियम इतना कठोर था कि एक जगह से उखड़ कर दूसरी जगह आरोपित होने के यम सरीखे नियम से निजात कम से कम इस सभ्यता में असंभव था। इन लाखों, करोड़ों, अरबों, विदाईयों में इस गीत से जुड़े भाव, इसके शब्द दुहराए जाते रहे होंगे कि ऐसे मांगलिक अवसरों पर इनकी अर्थवत्ता शायद ही शेष रही हों। अकेले में, उदासी के क्षणों में यह शब्द अर्थ रखते थे, अवश्य रखते थे, लेकिन इन अवसरों पर यह सूत्र की तरह स्थिर और ठस हो चुके थे।
जिस बुआ की आवाज अलसुबह से कहीं नहीं पहुँच पा रही थी वह आवाज अब घर की ईंटों के सहारे, सीढ़ियों से होते हुए, छत से हो कर बाहर तक पहुँच रही थी। बुआ का उद्देश्य ऐसा नहीं था। वह किसी प्रतिशोध से संचालित नहीं थीं। वे बस अपने अतीत को इस नववधु – दुल्हन- बालिका के भविष्य में देख रही थीं और वह प्रतिदर्श-मात्र ही इतना बेकल कर देने वाला था कि उनके शब्द स्वतः ही वे अर्थ पाते जा रहे थे जो वांछित था।
जब तीसरी बार बुआ ने मुखड़े को गाया और गाते हुए अपने सिर को ऊपर कर लिया था तब मंडप में उपस्थित एक-एक स्त्री रो रही थी। अभी विदाई का वक्त नहीं आया था। देर थी लेकिन रुलाई ने सबको घेर लिया था। सब रोये जा रहीं थीं। कोई इस गीत को समझते हुए, कोई ताउम्र अपनी गुलामी को याद करते हुए, कोई अपनी उम्र को याद करते हुए जिसे उसके ससुराल वाले खरीद लाये थे तो कोई दूसरे के आंसुओं की आवाज का कोरस पूराते हुए रो रही थी लेकिन सब रोये जा रही थीं। सबसे पूछा जाता तब सबका जवाब यही आता कि वे इस रात की सुबह में होने वाली अवश्यम्भावी विदाई के लिए रो रही हैं।
पंडित मंत्र की लय में था लेकिन हज्जाम ने आँखें ढांप ली थीं।
सर्वानंद के रोने की नहीं हल्दी से रंगे अपने गमछे में मुंह ढांक कर फफकने की आवाज सुन कर बाकी के भाई भी ग़मगीन हो गए थे। दहेज़ के इस व्यापार में, वर-वधू खरीद-फरोख्त को शुभ विवाह के आवरण में ढंके कार्य व्यापार में जो लाभार्थी थे यानी परिवार के समधी, महालक्ष्मी के स्वसुर विवेकी पांडे भी बुआ के वेदना-गीत से बिंध चुके थे। सिर पर दोनों हाथ लगाया और गीत का मुखड़ा तीसरी बार पूरा होते न होते कमजोर पड़ती आवाज में कह बैठे थे, ‘समझने वाले की मौत है, इसकी माँ का।’
सर्वानंद ने समधी के शब्द नहीं सुने। उनका बुदुबुदाना सुना। समझा, उन लोगों से कोई चूक हो गयी है। समधी का क्रोध वे किसी सूरत में मोल नहीं ले सकते थे। चारो भाई लपक पड़े: ‘महाराज कोई समस्या?’ विवेकी पांडे अब भी वहीं उसी अर्थ और उन्हीं स्वरंजलियों में उलझे थे। जिन्हें लगा कि बुआ के गीत से समधी नाराज हैं, वे बुआ को चुप कराने दौड़े। बुआ की आवाज चढ़ती जा रही थी। सर्वानंद ने तेज आवाज में बरजा: ‘हो गईल, हो गईल। बंद करो यह सब।’ लेकिन उर्मिला अपनी आवाज भी कहाँ सुन रही थी।
चारो भाईयों ने फिर पूछा: महाराज कोई दिक्कत? विवेकी पांडे ने इस बार गाली अपने पास रख ली और इतना भर कहा, ‘कौन गा रहा है भाई।’ अपने मन में फिर से वही बात कही, ‘समझने वाले की मौत है।’ यह कहते हुए वे आँगन से बाहर आ गए थे।
सर्वानंद के तीनों भाई दौड़ते हुए बाहर आये थे। हृदयानंद ने खींच कर एक कुर्सी रखी। जगत बाबू दौड़ कर पानी लाने गए थे और अभिनन्दन ने अतिरिक्त बच गयी खाली झंपोली के ढक्कन से पंखा झलना शुरू कर दिया था। नींद, नशे और गीत के प्रभाव में विवेकी पांडे सुस्त से पड़ गए थे। उन्हें लग रहा था कि वह स्त्री आवाज उनका पीछा करते करते बाहर आ गयी है और शामियाने पर पसर रही है। उन्होंने यह भी पाया कि आवाज अकेली नहीं रह गयी है। दूसरी स्त्रियाँ उस गीत को पूरा रहीं थीं, जैसे धागे में एक एक मूंगा पूरते हैं, मोती पूरते हैं, ठीक वैसे ही।
रस्मों को पूरा करने हेतु विवेकी पांडे को आग्रहपूर्वक भीतर ले जाया गया। विवेकी ने अपने भाव जगत को संभाला और जिम्मेदारी पूरे करने को तैयार मुद्रा में ही अन्दर आये थे। स्त्रियाँ विदाई का वही गीत अब भी गा रही थीं।
माड़ों के बाँध खोलने का काम शुरू हो चुका था।
उस एक गीत ने घर में हलचल पैदा कर दी थी. छतों पर सो रहे लोग नींद से उठ कर आने जाने लगे थे। अचानक यह घर जग गया था. शामियाने की रोशनी के बाहर घना अँधेरा अभी भी मौजूद था। शामियाने वाले लड़के सब ताबड़तोड़ कुर्सियां बटोर रहे थे। मंच खोल लिया गया था। दुल्हन अभी विदा भी नहीं हुई थी और शामियाना लगभग उजड़ चुका था।
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(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
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