मणिलाल पटेल की गुजराती कहानी 'बाबा का आख़िरी ख़त'


मणिलाल पटेल


एक परिवार में कई व्यक्ति होते हैं। एक परिवार का होने के बावजूद सदस्यों के अलग अलग स्वभाव होते हैं। कोई अपेक्षाकृत उदार, कोई कड़वा बोलने वाला, तो कोई मीठी मीठी बातें करने वाला। मीठी बातें करने वालों से सब भले ही खुश रहें, लेकिन उसका काईयापन खतरनाक होता है। कठोर बोलने वाले से प्रायः सभी रुष्ठ रहते हैं। लेकिन उस कठोरता के पीछे अक्सर एक संवेदनशील मन भी होता है जो अपनत्व से भरा होता है। खासकर अभिभावक को परिवार के सदस्यों के प्रति कड़ा या रुखा व्यवहार अपनाना पड़ता है जिसके पीछे तमाम कारण होते हैं। तीखे व्यवहार के पीछे छिपे सरल सहज मन के बारे में तो कभी-कभी पता भी नहीं चल पाता। और कभी कभी जब इस बात का पता चलता है तब तक देर हो गई होती है। मणिलाल पटेल की गुजराती कहानी 'बाबा का आख़िरी ख़त' इसी भाव भूमि पर आधारित संवेदनशील कहानी है। इस कहानी का खासतौर पर पहली बार के लिए अनुवाद किया है रजनीकांत एस. शाह ने। रजनीकांत ने अपने सरस अनुवाद के जरिए गुजराती के अनेक रचनाकारों की रचनाओं से हिन्दी संसार को परिचित कराया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मणिलाल पटेल की गुजराती कहानी 'बाबा का आख़िरी ख़त'। मूल गुजराती से हिन्दी में इसका अनुवाद किया है रजनीकांत एस शाह ने।



गुजराती कहानी      

'बाबा का आख़िरी ख़त'


मणिलाल पटेल


मूल गुजराती से हिन्दी अनुवाद : रजनीकान्त एस. शाह 

बाबा के आख़िरी ख़त को खोलने से पहले रतिलाल के हाथ रुक गए। कटाई के दौरान बाबा वैकुंठधाम की अनंत यात्रा पर चल पड़े थे।  


रतिलाल को तो ख़बर देर से मिली; क्रियाकाण्ड हो जाने के बाद! 


हालांकि, बीते दशक में पिता और पुत्र के बीच दूरियाँ बढ़ गई थी। इससे पहले भी, मनमुटाव, एक-दूसरे के अहम् और उनका कड़वा वाणी व्यवहार उन दोनों को मिलने से रोके हुए था। 


सुबह की धूप बगीचे के लॉन पर फैली हुई है। जंगली मेहंदी की बाड़ अच्छे से फ़ल-फूल आयी है और उस पर चढी हुई अज्ञात पुष्पलताएँ भी अब मौसम के बदलने के कारण सूखने लगी थीं। सामने वाले मकानों की दीवारों पर जमी हुई वर्षाकालीन काई भी अब तो काली पपड़ी बन कर झड़ने लगी थी।

पत्नी रेवती बीते दो दिनों से दिवाली प्रेरित सफ़ाई आदि के कारण घर की साफ़-सफ़ाई में व्यस्त हो गई है। इस वजह से भी रतिलाल जैसे घर से बाहर हो गए थे....।


अपने बहनोई द्वारा भेजे गये बाबा के आख़िरी ख़त को खोलने से पहले, रतिलाल का मन भावुक हो गया था। अपने कमरे में चुपचाप जा कर वे अपनी आँखों में आज़ तक भरे हुए सारे आँसू बहा देने के लिए मानो यहा-वहाँ हो रहे थे। ख़ुद पर काबू रख पाना मुश्किल लग रहा होने के बावजूद वे रो लेने का प्रयास करते हुए बैठे रहे थे। छोटे बंगले के कंपाउंड में पारिजातक के नीचे कुर्सी पर कागज़ लिए हुए वे बैठे थे। रतिलाल ने अपने अंतहीन काम और कई समस्याओं को याद करते हुए दृढ़ निश्चय किया। बाबा ने पुराने और पीले पड़ चुके रेखांकित कागज़ों पर एक लंबा पत्र लिखा था। अस्सी साल की उम्र में, कांपते हाथों और धुंधली आँखों से, उन्होंने मुझे ऐसा तो क्या लिखा होगा? उन्होंने कितना कष्ट क्यों उठाया होगा?— सोचते हुए, रतिलाल ने, मानो किसी घोड़े पर सामान लाद रहे हो, ऐसे अपने दिमाग को तैयार कर के ख़त पढ़ना शुरू किया।

"भाई श्री रतिलाल जी, स्वस्तिश्री गांव राजपुरा स्थित अखंड सौभाग्यवती रेवती बहू और बड़े हो गए बच्चों को गाँव कोथलिया से बहुत प्यार से याद कर रहे तुम्हारे बाबा लवजी कोदर के आख़िरी राम राम। यहाँ सभी खुशहाल हैं। आप सब भी वहाँ स्वस्थ-प्रसन्न होंगे, ऐसी गोकुलनाथ जी के चरणों में मेरी प्रार्थना। द्वारकानाथ आप सब को दीर्घायु बनाए रखे और आपकी आय में भी वृद्धि करें, ऐसे आप सबको मेरे आशीर्वाद हैं।"

यहाँ कागज और कलम का कोई ठिकाना नहीं है। मेरी आंखें धुंधली हैं फ़िर भी पनियल आँखेँ लिए यह ख़त लिख रहा हूँ। चश्मा निकाल कर बार-बार पोंछते रहना और लिखते रहना कोई कम तकलीफ़देह काम नहीं है। ऊपर से कांपता हुआ मेरा हाथ... पर अब जीवन में कहाँ ज्यादा लिखना रहने वाला है? किसी एक दिन पौ फटेगी और मैं नहीं रहूँगा – यह बात तो सूरज के उगने और अस्त होने जितनी सच है। कईं बरस बीत गए, मैंने तुम्हें बरसों तक बड़े आदर भाव के साथ ख़त लिखे हैं और बुलाया है...। आज़ `तू’ लिख कर ख़त लिखने की आख़िरी इच्छा है। अक्षर और शब्दों को सजाने में तकलीफ़ होती है। यदि लिखने और बोलने में सब गड्डमड्ड हो जाता है, तो बर्दाश्त कर लेना। मैं स्टेट के जमाने में चार तक अंग्रेजी पढ़ा था और मास्टर की नौकरी मिलने वाली थी, कि बड़े भैया के नहीं रहने से मुझे बूढ़े बापू को खेती के काम में मदद करने के लिए सब छोड़ देना पड़ा था। यदि ऐसा नहीं हुआ होता तो आप सबकी तालीम और परवरिश आदि अलग ही होती। तुम्हें मेरे बारे में जो शिकायतें रही हैं, वे भी रही नहीं होती लेकिन जिंदगी का नक्शा हमारे हाथ में कहाँ होता है, भाई! काल के गर्भ में हमारा जीवन-पथ ऊपर वाले ने बनाया होता है। मैं भी यदि मास्टर हुआ होता तो नौकरी ख़त्म होने की अवस्था में शिक्षा विभाग का कोई अफ़सर हुआ होता। लेकिन नसीब ही फूटा हुआ था तो क्या करता? पर, रतिभाई, अगर मैं आपको बताऊँ तो मैं  इन सब बातों से दु:खी नहीं हुआ हूँ...। मैं तो काम करता रहा, काम लेता रहा और जो मिलता वह सब  बाँटता रहा...। आपको ऐसा क्यों लगता रहा है, कि मैं तुम्हें सोने की मुर्गी समझ कर फ़ायदा उठाता रहा हूँ...। मेरे मन की यह पहेली इस जीवन में तो कभी सुलझने वाली है ही नहीं।

मैंने तुम्हें महीने के अंत में ख़त लिखे थे, पैसे मांगते समय हो सकता है, मैं तुम्हारे बच्चों की परवरिश और अन्य व्यवहार को नज़रअंदाज़ कर गया होऊँ, लेकिन मुझे यहाँ मेरे बाल-बच्चों वाले परिवार का निर्वाह भी करना था और समाज में अपनी प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के लिए समाज की चिंता भी करनी थी। मेरे हाथ-पैर बंधे हुए थे। जब परिवार का बेटा शहर में कमा रहा हो, तब लोग कुछ पैसे कर्ज़ के तौर पर देते नहीं हैं…  इसलिए तुम्हारी मर्यादा को जानते-समझते हुए भी मैं तुम से पैसे मांगता रहा। कर्ज़ पर उठाए रुपये वसूली के लिए लोग आते थे और बाकी लोग तुम्हारी कमाई को जान कर पैसा कर्ज़ पर लेने के लिए आते थे....। ऐसे में मैं कहाँ जाता? आकाशी खेती और छोटी सी ज़मीन। रास्ते पर घर और बड़ा इलाका। मैं रात भर मारा-मारा रहता हूँ और ऊपर से मेरा स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया है। मैं तुम्हें कड़वी बातें कह कर पछताया हूँ। पर तुम कैसे जानोगे? तुम्हारी माँ की बीमारी और भाई-बहनों के खर्च...। यदि तुम्हारे साथ कभी खुल कर बात की होती तो जिंदगी के आख़िरी छोर पर यह संताप नहीं रहा होता। लेकिन विधाता ने जो लिखा है वह कभी क्या पलट सकता है? सबने मुझे तीखा समझा तब तक तो ठीक है पर क्या मैं भावनाविहीन पत्थर सा तो नहीं ही था। फ़िर भी आज़ जो मेरे पास है, वे मुझे खिलाने-पिलाने में जैसे मुझ पर उपकार कर रहे हों और ये तुम्हारे भाई-भाभी भी मुझे कठोर और कभी तो कुपात्र समझते हैं। उनका दिया हुआ,अनादरपूर्वक दिया हुआ और जो मुझे पसंद नहीं है, ऐसा खाना भी मैं हलक से नीचे उतार गया, पर अब उन सबका मुझे कठोर कहना मेरे लिए असह्य हो गया है। मैं अपना दु:ख से भरा दिल तुम्हारे पास कैसे खोलूँ? मेरी परेशानियों का कोई अंत नहीं है। अब एकमात्र उपाय यही है, कि रस्सी टूट जाए और अपनी उंगलियों में उसमें आग लग जाए-अर्थात् मैं मर जाऊँ। अब मेरे लिए जीने की कोई वजह नहीं है... फ़िर भी मेरे दाह-कर्म के समय मौजूद रहना –मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी मौत को सँवारने के लिए आ जाना। तुम बोलना कि "भाग लो प्राण आग आ रही है...’’ कुछ खुलासे करने के लिए हो सकता है मेरे प्राण यहाँ-वहाँ कहीं भटक रहे होंगे।.... तनिक देखना।

शायद वहाँ कुछ छिपा हुआ है...। देखते हैं..." रतिलाल बेचैन हुआ।


 

कोई देख नहीं रहा था। उन्होंने अपनी आँखें पोंछी और गला साफ़ लिया। दूर हो गए पिता, इस ख़त में लिखी गई बातें, उनके दु:ख, तो क्या उन्होंने जिस पिता को देखा था वे ऐसे नहीं थे? अफ़सोस, एक बार कोई धारणा बन जाए वह कभी सही है या गलत है उसे परखा तक नहीं गया। जहाँ तक पिता की बात है, एक बार स्थापित हो गए तो स्थापित हो गए। एक बार गर्मियों में, रतिलाल अपने पैतृक घर वतन गए थे। 


उसे अपने पिता को दो बातें बतानी थीं कि कैसे उनके पिता ने अपने भाई-बहनों की संतानों की  बच्चों की सगाई जल्दबाजी में करवा कर एक गलत रिश्ता करवाया था। लेकिन उसकी भनक लग जाने के कारण बाबा दो दिन तक रतिलाल से दूरी बनाए हुए थे। निवार भरी चारपाई की ओट में मुंडी झुकाये चरखी में भिंडी के रेसे लपेट रहे थे।  

दूसरी बार गए तब रतिलाल ने ही उनकी उपेक्षा कर दी थी। 

बाबा कुछ कहना चाह रहे थे। रतिलाल के इर्दगिर्द मंडराते रहे लेकिन रतिलाल ने उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा तक नहीं था, इसलिए वे कुढ़े हुए थे, फ़िर भी यदि नज़रें मिल जाए तो मौका हाथ से जाने देना चाहते नहीं थे। रतिलाल को अक्सर अपने पैतृक गाँव में कई बार ठीक लगता नहीं था। उस दिन भी उनको अकेलापन महसूस हुआ था। घर के चारों ओर उड़ रहे कबूतरों में से एक सफेद कबूतर आ कर उसे देखने लगा। वह ज़रूर आया होगा? उन घर के आँगन में चारा चुग रहे कबूतरों में एक सफ़ेद कबूतर भी आ गया था। रतिलाल उसे देखते रहे। कहाँ से आया होगा? और घर-गाँव के कबूतर जैसे ही पास आ जाता, कि वे सारे क्यों उससे अलग हो जाते हैं या इधर-उधर हो जाते हैं? वह बेचारा सबके साथ उड़ जाता था और वापस लौट आता था। वह सबके साथ होते हुए भी, मानो वह अजनबी सा और अकेला क्यों महसूस हो रहा था... अकेला...। उसे ऐसा क्यों लग रहा था? बड़े भाईसाहब के आँगन में एक बूढ़ा बैल अपना शेष जीवन बिता रहा था। जब अन्य मवेशी खेतों में चरने चले जाते थे तब वह आँगन में वह अकेला ही रंभाता रहता और फ़िर चुपचाप बैठा रहता था। थोड़ी सी जुगाली करता और फ़िर रुक जाता था। बाबा सामने वाले घर के दालान में चारपाई पर चुपचाप बैठे थे और रतिलाल बस पकड़ने के लिए चल दिये। बाबा कुछ कुलबुलाए और उठते उठते बैठे रह गए...। उनके चेहरे की उदासी, नहीं, सिर्फ उदासी ही नहीं; दर्द, असह्य अकेलापन, रतिलाल को पूरे रास्ते दिखाई देती रही थी। उन्होंने पत्र पढ़ना शुरू किया:

"...हालाँकि अब आख़िर में खुलासे करना अर्थहीन है। लेकिन जीव लालच से बच नहीं पा रहा। तुम तो मुझसे ज़्यादा पढ़े-लिखे हो और शहर में बड़े आदमी समझे जाते रहे हो। तुझे दो-तीन बातें कह कर मैं भारमुक्त होना चाहता हूँ। मुझे मालूम है, कि पुरानी बातों को कुरेद कर राहत अनुभव करने के बजाय तनाव बढ़ेगा ही। लेकिन अब अगर आज़ मैं कुछ भी छुपाए बिना सारी बातें लिखने बैठा हूँ। तुम होशियार थे, इसलिए मैं भी चाहता था कि तुम खूब पढ़-लिख कर बड़े आदमी बनो, लेकिन मेरा सामर्थ्य नहीं था। मैं समाज से दबा हुआ था और कर्ज़ में डूबा हुआ। मैंने तुमसे पीटीसी पढ़कर मास्टर बन जाने के लिए समझाया था। उसमें भी तुम्हारी बुद्धि का घर-परिवार के सुख के लिए काम में लेने का मेरा इरादा था। जाति-बिरादरी में सरकश और शठ लोगों से तुम टक्कर ले सको, ऐसे थे। जब ​​गाँव में झगड़ा हो तो बड़ा तो सरल स्वभावी ठहरा। इसलिए ऐसे मामलों में उसका कोई काम नहीं। मेरा यह विचार था, कि यदि तुम यहीं कहीं मास्टर हो जाओ तो पीढ़ियों से चली आ रही मुखियाई और झमेले में पहली पंक्ति बनी रहे- बाकी तो जैसी भगवान की मर्ज़ी और ऐसा ही हुआ।" तुम्हारे मन में मेरे कारण ही कुछ टीस बनी रही है-ऐसा तुम बुआ को कह रहे थे। 

पहली बार जब तुम नौकरी के लिए चले थे, तब तुम्हें तुम्हारी नौकरी की जगह पर पहुंचा आने का मेरा बहुत मन था। घर में पैसे नहीं थे तो किसी से उधार ले लेता। फ़िर सोचा कि तुम तो होशियार हो, शहर में अकले ही घूमने वाले और पढ़ने वाले। तुम सारा सामान स्वयं उठा कर ले जाओगे और हर हालात से तुम निपट लोगे। तुम्हें अकेले ही बिदा कर दिया उस अल्लसब्बाह को में भूला नहीं हूँ। लेकिन तुम कहीं भी हार मानने वालों में से नहीं हो, इस बात को ले कर मैं आश्वस्त था...। आज़ भी मुझे इस बड़े और छोटे की जितनी चिंता है, उतनी चिंता मुझे तुम्हारे लिए नहीं है। घोंसले से जो पंछी पहले उड़ जाता है वह अपनी जगह बना ही लेता है। तुम मानोगे नहीं लेकिन मैंने भी तुम्हारी ही तरह जन्म ले कर जीवन में अकेलेपन और निराश्रयिता का अनुभव किया है। मुझे भी जब जब जिस वस्तु की जरूरत महसूस हुई तब तब मुझे समय पर कुछ भी मिला नहीं है। मुझे दु:ख में डुबो कर स्वजन अपने सुख में निमग्न थे। तुम्हारी तरह मेरी आँखों में भी बड़े बड़े आँसू उभरे हैं और मही (गुजरात की एक पवित्र नदी) माता की कसम! मैं भी बड़ी पीड़ा अनुभव कर रहा हूँ। मांगलिक दिनों में और मांगलिक अवसर पर मेरे हाथ तंग रहे और तुम भाई-बहनों को दु:खी देख कर मैं भी चिंतित रहा हूँ और व्यग्रता अनुभव करता रहा हूँ। पर मर्द रो कैसे सकता है। मर्द की आँखों में आँसू नहीं सुहाते हैं। रतिभाई! उन सब से लड़ लेने के लिए कड़वा हो कर मैं गुस्सा करने लगता था....। गुस्से के ज़ोर में सारे काम हो जाते थे। 


सबसे बड़ा दुश्मन तो मैं तुम्हारी स्वर्गवासिनी माँ का हुआ हूँ। वह तो जिंदा रही तब तक काम ही करती रही और उसने सुख का एक क्षण भी देखा नहीं है। ऊपर से राजसी बीमारी के कारण भी परेशान थी! और यह भी कम हो ऐसे मेरा गुस्सा और डांट-फटकार! मैंने कभी भी उसे प्यार से एक गिलास पानी तक पिला कर पुण्य कमाया नहीं हूँ। आज़ मेरी जो दुर्दशा हुई है उसमें यदि उसकी आहें नहीं हो तो भी उसके दु:खी मन की परछाई तो अवश्य होगी ही। पर यह सच है कि मैंने अपने सुख के लिए कुछ कराया नहीं है। सब कुछ संसार निभाने के लिए ही। बुआ ने तुम्हें शांत करते हुए कहा है, कि पकने पर भी निबौरी मीठी नहीं होती... यह तो मैं भी जानता हूँ... लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? निबौरी को बारिश भी ठिठुरा देती है। नम हवाएँ भी उसे ठंडे लेप लगाती हैं...। ऐसे तापमान जब अनुकूल हो जाए तो कड़वी निंबौरी थोड़ी सी मिठास पकड़ लेती है....। आज़ भी ऐसा लगता है, कि मैं तुझे और सबको इकट्ठा करूं और तुम सबसे हंसी-खुशी से बातें कर के तनाव कुछ कम करूं।... लेकिन तुम्हारी इन भाभियों के बोल तो तुम्हें मालूम ही हैं। जैसे बाप के घर से ले कर आयी हो और ऐसे कड़वी बातें सुनाती रहती हैं। दो जून की रोटी और नहाने-धोने की सुविधा देने में भी उन्हें बड़ी तकलीफ़ होती है। पांच-पंद्रह लाख की संपत्ति के मालिक की ऐसी दुर्दशा तो दुश्मन की भी नहीं होनी चाहिए!" रतिलाल फ़िर रुक गये।

उत्तेजना बढ़ गई है। रेवती ने घर का सारा सामान आंगन में बेतरतीब ढंग से रख दिया है।


नौकरानी और अन्य दो नौकर घर की सफ़ाई और सामान को झाडने में व्यस्त हैं। "इस बार तो सारे पुराने सामान को कबाड़खाने में देना है और जो भी रद्दी है उसे जला देना है। रेवती कहती है,-इस बार तो सब कुछ साफ़-सुथरा और तरतीबवार होना चाहिए। ये पुराने बक्से और यह कचरा तो जरा भी नहीं चाहिए। डिब्बों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। अब पुराने को क्या छाती से लगाए रहना है? अतीत का मोह रखना ही गलत है। वे दिन लद गए कि संचित चीज तो कभी न कभी  काम आती ही है। लिया, दिया और बात ख़त्म...!"

रतिलाल को उसके तितर-बितर हुए घर को देख कर कुछ पल के लिए थोड़ा चिंतित हुआ। अब तक के उसके अपने सारे आयोजन सफ़ल रहे हैं...। उनकी व्यवस्था को कोई भी उलट-पुलट कर नहीं सकता था। और आज़, यह रेवती?... या फ़िर रह-रह कर अंदर से उठ खड़े हो रहे बाबा-लवजी कोदर...। सभी दो दशकों से सब उन्हें 'बुढ़ऊ' कह कर बुलाने लग गए थे...। रतिलाल को आज़ यह शब्द सुहाया नहीं...। हे भगवान! 'दादा' भी नहीं? उसे अच्छा नहीं लगा। कुर्सी पर धूप आने से पुन: पारिजातक की छांव में सरक गए। कुछ फूल अभी भी मुरझाये नहीं थे।  

लवानिया पहाड़ी के संकड़े रास्ते पर पारिजातक का वन था। बाबा और बड़े भैया दीपावली के बाद उसकी डालियाँ और डंडियाँ काट कर ले लाते थे। उसमें से बैलगाड़ी का पिंजड़ा बुन लेते थे। लोग उसे पिंजड़ा कहते हैं। रतिलाल ने भी कईं बरसों के बाद यह जाना था, कि यह सब पारिजातक हैं। उनको विचार आया, कि पारिजातक जैसे देवतरू को भी नहीं जानने वाली संवेदनाहीन प्रजा के बीच बाबा का पूरा जीवन बीत गया? अफ़सोस... कंपाउंड वॉल पर एक कौआ आ कर बैठा। श्राद्धपक्ष भी बीत गया है और यह गिरनारी कौआ – रतिलाल उसे टकटकी बांधे हुए देखते रहे। मानो बाबा का शेष तर्पण मांगने तो नहीं आया हो, ऐसे देखता-हेरता हुआ बैठा हुआ है और जाने का नाम ही नहीं ले रहा।   

रतिलाल ख़त पढ़ने लगे: 

"...मुझे अच्छे से याद आ रहा है, तुझे कॉलेज के दिनों में पर्याप्त पैसे नहीं दिये जा रहे थे। जब कहीं से भी पैसा नहीं मिलने पर मैं माणेक काका के पास जाता था और वे मुझे पैसे देते भी थे। रिश्तेदारों से तो मैंने मात्र व्यवहार निभाने के लिए पैसे मांगे थे...। और मैंने दुधारू भैंसें बेच कर कर्ज़ चुकाए थे। बीमार होने पर तुम पैसे मांगने के लिए आए थे पर मैंने दिये नहीं थे...। तुम तो उल्टे पैर लौट गए थे। उस वक़्त मैं बहुत लाचार था। मुद्दे की बात तो यह है, कि तुमने अख़बार बेच कर पैसे जोड़े, तो मैंने भी बांस और पंवाड़ का व्यापार किया...। दोपहर की चाय तुम्हें मित्रों से मिल जाती थी और मेरे नसीब में तो वह भी नहीं थी। बांस और पंवाड़ का ट्रक भरवाने के लिए जब जाता था तब मात्र थोड़े से चबैने से मुझे दो तीन दिन बिताने पड़ जाते थे। पेट दर्द भी मुझे तंग करता था। सारा दिन मैं पेट दबाये घर में लोटता रहता था और लहसुन –प्याज़ सेंक कर गैस की पीड़ा का शमन करता था। तब तो ज़हर खाने के लिए भी पैसा कहाँ मिलता था? उसके बाद तो तमाकू खाने से वह दर्द काबू में आया था लेकिन तमाकू खाने से मेरा शरीर गलने लगा। बाद में मैंने उसे छोड़ दिया तो छोड़ ही दिया लेकिन शरीर के हर ज़ोड़ में वात-व्याधि है और अब तो बहुत गई और थोड़ी रह गई- वाली बात है। हम किस राजा के समक्ष फ़रियाद करने के लिए जाने वाले थे।... और राजा को भी देख लिया ही... मैंने तो!


लेकिन एक बात लिखते हुए आज़ भी मेरी आँखें महीमाता (मही नदी) का रूप धारण कर लेती हैं। –उस बात को... सोच रहा हूँ, कि जाने दो, नहीं कहनी है। तू तो समझ ही गया होगा। बिना विधि निर्वाह के किसी विधवा या त्यक्ता से विवाह करने-कराने में मानने वाली हमारी बिरादरी है। मैं जब चालीस की युवावस्था में विधुर हुआ तब दो-तीन वैधव्य जीवन जी रही और तलाकशुदा औरतों की ओर से प्रस्ताव आया था। घर में मैं न तो पूरा घरवाला और न ही बाहरवाला। मानो बीच राह में तुम्हारी माँ मुझे अकेला कर गई थी। ख़ुद से दु:खी रहना और फजीहत जैसी खेती को संभालते संभालते गंदे समाज से टक्कर लेनी होती थी। कइयों ने मुझे बिन मांगी सलाह भी दी, कि "लवजीभाई, फ़िर से शादी तो करनी ही होगी...। घर कैसे निभेगा?... लेकिन तुम्हारे भाई-बहनों का, -तुम सब बिन माँ के बच्चों के अवश मुंह देख कर मैंने जवानी को काबू में कर रखा था....। सब सही हो गया लेकिन उसमें मुझे बहुत झेलते रहना पड़ा है। तुमने सहा तो तुम बड़े आदमी हुए.... पर आज़ उस बात से पीड़ित हूँ, कि मैंने तो सह लिया... सहन करने में कोई कसर छोड़ी नहीं थी, फ़िर भी मेरा क्या हुआ? – यदि ऐसा पूछूं तो तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा और मुझे कुछ चाहिए भी नहीं। लेकिन यश मिलने के बजाय जूतियाँ खानी पड़ती है- वाली कहावत सच हुई। अरे, मुझे तो यश के बदले अपयश ही मिला है। लेकिन लाखों के मालिक के दो जून का खाना भी इस घर से उस घर टलता ही रहता है।ख़ानदान परिवार की समझ कर लायी हुई दोनों छिछोरी बहुएँ इंसानियत बरतने से भी गईं? दोष किसका? जैसा हमारा नसीब! मीठी बेल की तुम्बी में भी कड़वाहट आ गई....। भले भगवान!! 

बूढ़ा आदमी हूँ तो चिढ़ता रहूँ, कुछ गलत होते हुए या बिगड़ता हुआ सहा जाए नहीं, इसलिए की जाने वाली बकवास तुम्हारे मना करने पर भी छूट नहीं रही। एक दशक से तुम मुझ से अलग हुए हो फ़िर भी मैंने तो तुम तीनों भाइयों में कोई भेद नहीं किया। भले ही बड़ी बातों के मेरे अरमान बीच राह में ही भटक गये हों।      

      

एक और बात।

      

पुराना घर गिरा कर नयी बस्ती में आने की बात मुझे जँची नहीं है। मैं यह भी जानता और समझता हूँ। मुझे भी मन ही मन मेरे ही बनाए घर को तोड़े जाने पर बहुत दु:ख हुआ था। लेकिन मैं तो आने वाली पीढ़ी के सुख में ही ख़ुश हूँ। नदी का पानी गाँव में चला आता है। हमेशा इसका भय बना रहता है। बाद में नई बस्ती के लिए अनुकूल जगह कहाँ मिलने वाली थी? इसमें भी कडाणा बांध बन जाने के बाद, मेरा मन मान नहीं रहा था। मोरबी का डैम ढहा और शहर सारा बह गया। तो यह तो छोटी सी बस्ती ठहरी...। उसे बह जाने में कहाँ देर लगने वाली थी। और मैंने गाँठ बाँध दी। आज़, पहाड़ी की चोटी पर, नहर के किनारे, चौराहे के पास, सबको बसा हुआ देख कर, अब ऐसी कोई चिंता नहीं रही है। पुराने घर के आँगन में, तुम्हारी धमनी जैसे, तुम्हारे सींचे हुए नीम के पेड़ कटवाते हुए भी मुझे बड़ा दु:ख हुआ था।  लेकिन पैसों का अभाव हो ऐसे में क्या किए बिना रहा जा सकता है? भाई, तुम्हें तुम्हारा हिस्सा हिसाब से देते रहें ऐसा जुगाड़ मैंने तो लगाया है। अभी तो उनमें कोई पाप आया नहीं है...। कल की बात तो जाने द्वारकानाथ!  

आख़िरी बात।

मैं अपना जीवन पूरी ईमानदारी से जिया हूँ। मैंने कभी किसी को नीचा नहीं दिखाया, न ही किसी का अहित सोचा है और किसी झमेले में भी न्याय के पक्ष में रहा हूँ। मैंने समाज को खिला कर अपना हाथ ऊपर रखा है और सामाजिक व्यवहारों का पालन कर के इज्जत कमाया हूँ। किसी राह चलते हुए को बुला कर खिलाया-पिलाया भी है। अपनी पैतृक जमीन और घर आदि बचाए रख कर उसमें कुछ जोड़ भी सका हूँ। उजली संतति है... और क्या चाहिए? एक उज्ज्वल क्षेत्र है... मुझे और क्या चाहिए?... बुढ़ापे में मैं जो भी कष्ट सह रहा हूँ, वही मेरे कर्म का फ़ल होगा। ये बड़ा और छोटा तो समाज में समा जाए ऐसे हैं। सभी लोग इस समाज में शामिल हो सकते हैं। तुम्हारे बड़े लड़के ने अपनी मर्ज़ी से शादी की। तुमने उसे  सम्मति दी...। जैसी तालीम हो ऐसा व्यवहार करना चाहिए। तुम ख़ुद ब ख़ुद कॉलेज से सीधे दुल्हन देखने चले गए थे और मैं इस बात को ले कर तुम्हारे साथ नहीं रहा। -तुम्हें तो याद होगा है? लेकिन मना कर के भी मैंने तुम्हारी मर्ज़ी के बिना शादी नहीं करवायी थी। तुम्हें रेवती पसंद आयी थी। यदि मैं सच कहूँ तो वह मुझे समझ सकी थी। उसके साथ मुझे अनुकूलता रहती थी। घर में वह जितना रही, उतने दिन मुझे उसे किसी भी बात को ले कर कुछ भी कहना पड़ा नहीं है। लेकिन मुझे शहर पसंद नहीं है और हम दोनों में बनती नहीं थी। ऐसे हालात में रेवती बहू भले ही बहुत कीमती हो तब भी मुझे तो वस्त्रों के नीचे छुपी लक्ष्मीयों को तो झेलना ही है न? तुम्हारी उजली संतति तो पहाड़ में भी रास्ता बना ले ऐसी है। इसलिए इसके लिए इतनी चिंता किसलिए? लेकिन जाति-बिरादरी छोड कर लवजी कोदर का लड़का उसकी संतति को बाहर शादी करवाए – इस मुद्दे पर तो टीका-टिप्पणी होगी ही। मुझे भी सही नहीं लगता। लेकिन जमाना बदल गया है और शहर में पले-बढे लोगों को जंगल की जड़ प्रजा के साथ तकलीफ़ तो होगी ही। मैं समझ रहा हूँ। लोक तो दोधारी आरी है। तो कईं लोग तो हवा का रुख देख कर आचरण करने वाले हैं। इन लोगों की सोच पिछड़ी हुई है, इसमें कोई मीन-मेख नहीं है। उनमें जड़ता ज्यादा है। ये लोग मोटा अनाज खाते हैं और मोटे कपड़े पहनते हैं और उनका व्यवहार भी मोटा ही होता है। यदि तुम सुख चाहते हो तो अब इस तरफ़ मुड़ कर भी देखना नहीं है। इस प्रदेश को भूलने में ही तुम्हारी भलाई है। यहाँ के पढे-लिखे लोग भी पुरानी पीढ़ी को अच्छी कहलाए ऐसे कमनसीब हैं। मुझे तो जिस बात को लेकर एक दु:ख रहा हुआ है, कि यदि तुम्हारे जीवन का एकाध अवसर इस पुरखों के गाँव में, घर आँगन में मनाया गया होता, जाति-बिरादरी का हाथ जूठा करवाया होता तो तुम्हारे लिए यहाँ बड़ा और उजला होने का मौका मिला होता। भले ही तुमने ऐसा सोचा नहीं हो। मुझे तो अब जाति-बिरादरी की कोई झंखना नहीं है और टीका-टिप्पणी करने वाले भी जानते-समझते हैं, कि रतिलाल ने जो किया वह गलत नहीं है। जात-बिरादरी को तो अपना अस्तित्व बनाए रखना है इसलिए वह उसके गज से सबको नापता रहता है। हमें तो आने वाले कल को देखना है। जो हुआ सो हुआ। लंबी बातों का कोई अंत नहीं होता। कम लिखा ज्यादा मानना और रतिभाई समय समय पर छोटे-बड़ों का खयाल रखना। दूर रह कर भी जितना सहारा दिया जा सके, उतना सहारा देते रहना... मेरा राम बहुत देगा। जीते जी यदि मिल नहीं पाते हैं तो मुझे कंधा देने के लिए तो आना ही...। मैं श्मशान की चिताग्नि तक तुम्हारी प्रतीक्षा करता रहूँगा। बस, इतना ही। सही दस्तख़त लवजी कोदर का राम राम।’’     

रतिलाल बड़ी मुश्किल से टिके रह पाये। ये कौन लवजी कोदर थे? ख़ुद को सौ बार पीट लेने का मन किया। उसकी आँखें सूख गई थीं। रतिलाल को पता भी नहीं चला कि कंपाउंड में जो घर बिखरा हुआ था, वह सही हो गया था। कंपाउंड के कोने में रद्दी कागज़ और कपड़े जल रहे थे और शाम ढल रही थी। रतिलाल आग की तरफ मुड़े। मानो कोई उन्हें रास्ता न दिखा रहा हो! सब कुछ जल रहा था। वह नीचे झुके। मानो किसी ने उसे पकड़ाई हो ऐसी जलती हुई दंडी को पकड़ा। क्या वह मन ही मन उस अलाव के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे थे?... एकाध क्षण के लिए तो ऐसा लगा, कि उस आग में लवजी कोदर नहीं, बल्कि रतिलाल लवजी के देह को रखा गया है। दंडी की आग को ढेर में दागते हुए उनसे बोल दिया गया, कि "भाग लो प्राणी, आग आ रही है...’’, सब कुछ जल कर खाक हो गया तब तक वह वहीं बैठे रहे। फ़िर उठ कर  किंवाड की ओर मुड़े। ऐसा लगा जैसे किंवाड़ योजनों दूर हो ऐसे हांफ़ गए। एकदम नजदीक पहुँचने पर ख्याल आया कि बिजली गुल हो गई है।... वह रुक गये। उनके द्वारा मन ही मन पूरा ख़त पढ़ा जाने लगा।... वे बूंद-बूंद पिघल रहे हो ऐसा अनुभव करते रहे…। पुन: जब उन्होंने देखा, तो कुछ भी नहीं था। चारों ओर से उतरा हुआ अंधेरा और ज्यादा गहरा रहा था…।



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



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