परांस 11 शेख़ मोहम्मद कल्याण की कविताएँ
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| कमल जीत चौधरी |
हर नौकरीपेशा व्यक्ति के लिए पहली तारीख़ एक उम्मीद का दिन होता है। आमतौर पर यह वेतन का मिलने का दिन होता है। यह घर परिवार सबकी उम्मीदों का दिन होता है। लेकिन इसके बाद कृष्ण पक्ष के चाँद की तरह यह आमदनी लगातार छिजती चली जाती है और अन्ततः एक दिन ऐसा आता है जब पूरा परिवार एक तारीख की तरफ अपनी उम्मीदें लिए बेसब्री से ताकने लगता है। अरसा पहले रेडियो सिलोन पर हर महीने की पहली तारीख को किशोर कुमार द्वारा फिल्म 'पहली तारीख' का गाया गया एक गाना जरूर बजाया जाता था 'दिन है सुहाना, आज पहली तारीख है/ दिन है सुहाना आज पहली तारीख है/ ख़ुश है ज़माना, आज पहली तारीख है/ पहली तारीख अजी, पहली तारीख है।' उन दिनों वेतन नकद मिलता था। और इस नकद वेतन में तमाम के सपने समाहित होते थे। गीत की अगली पंक्तियों से आप सारा माजरा समझ सकते हैं। 'बीवी बोली घर जरा जल्दी से आना/ आज शाम को पिया जी हमें सिनेमा दिखाना/ हमें सिनेमा दिखाना/ करो ना बहाना, हां बहाना बहाना/ करो ना बहाना, आज पहली तारीख है'। एक सामान्य मनोरंजन तक के लिए परिवार पहली के इस वेतन पर ही निर्भर होता था। शेख़ मोहम्मद की कविता पहली तारीख पढ़ते हुए इस यादगार गाने का स्मरण हो आया। शेख़ मोहम्मद लिखते हैं 'बूढ़ी माँ ने फिर दोहराया होगा/ नए सूट का पुराना स्वप्न/ और नन्हें पैरों ने भी नापी होंगी/ जूतों की कई दुकानें/ और मकान के झड़ते पलस्तर से/ झाँकती ईंटें/ आज फिर खूब हँसीं होंगी/ क्योंकि/ आज पहली तारीख है :/ सपनों के ज़िंदा होने और मर जाने का दिन'। आज भी कमोबेश वही स्थिति है। तरीका बदल गया मसलन वेतन अब खाते में आ जाता है। लेकिन महंगाई की मार इस कदर है कि वेतनभोगी की जेब खाली होते देर नहीं लगती।इस बार के परांस के कवि के रूप में हैं मोहम्मद शेख़ कल्याण।
अप्रैल 2025 से कवि कमल जीत चौधरी जम्मू कश्मीर के कवियों को सामने लाने का दायित्व संभाल रहे हैं। इस शृंखला को उन्होंने जम्मू अंचल का एक प्यारा सा नाम दिया है 'परांस'। परांस को पहले हम हर महीने के तीसरे रविवार को प्रस्तुत करते थे। अपरिहार्य कारणों से दिसम्बर महीने से यह कॉलम चौथे रविवार को प्रस्तुत किया जाने लगा है। इस कॉलम के अन्तर्गत अभी तक हम अमिता मेहता, कुमार कृष्ण शर्मा, विकास डोगरा, अदिति शर्मा, सुधीर महाजन, दीपक, शाश्विता, महाराज कृष्ण संतोषी, मनोज शर्मा और कुंवर शक्ति सिंह की कविताएं प्रस्तुत कर चुके हैं। इस क्रम में आज हम ग्यारहवें कवि शेख मोहम्मद कल्याण की कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं। कॉलम के अन्तर्गत कवि की कविताओं पर कमल जीत चौधरी ने एक सारगर्भित टिप्पणी लिखी है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शेख़ मोहम्मद कल्याण की कविताएं।
परांस-11
पहली तारीख: सपनों के ज़िंदा होने और मर जाने का दिन
कमल जीत चौधरी
'परांस'; जम्मू-कश्मीर की कविताई को रेखांकित करने के लिए लिखा जा रहा है। इसमें शामिल कवियों की विचारधारा अलग-अलग हो सकती है, मगर इनके लिखे का महत्व अक्षुण्ण है। इनका लेखन; कविताई और जनपक्षधरता की ज़रूरी शर्तें पूरी करता है। परांस' इनके लेखन के सार, मर्म और निष्कर्ष का आलोचनात्मक दस्तावेज़ है। यहाँ न्यायसंगत स्थापनाएँ हैं। यह स्तम्भ हमारे परिवेश में वैचारिक हस्तक्षेप करता है। दूसरी बात यह कि जम्मू-कश्मीर को समझने के लिए यहाँ की साहित्यिक दृष्टियों से भी इसे; देखा जाना चाहिए। इसके लिए तीन जगहों से अध्ययन-मनन करने की ज़रूरत है- जम्मू से, कश्मीर से और विस्थापित शिविरों से। अपने लेखन में पहले भी कश्मीर से निर्वासित कवि-लेखकों, कश्मीर में रहकर लिख रहे कवि-लेखकों और जम्मू खित्ते के कवि-लेखकों पर बात करता रहा हूँ:
बात बोलेगी,
हम नहीं।
भेद खोलेगी
बात ही।
सत्य का मुख
झूठ की आँखें
क्या— —देखें!
सत्य का रुख़
समय का रुख़ है ׃
अभय जनता को
सत्य ही सुख है,
सत्य ही सुख।
(बात बोलेगी- शमशेर बहादुर सिंह)
'परांस' इस बात-संवाद को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहा है। परांस-11 के कवि हैं- शेख़ मोहम्मद कल्याण। इन पर पहले भी एक आलेख लिख चुका हूँ, जो इनके 2018 तक के लेखन का मूल्यांकन करता है। इसके बाद इन्होंने जो कविताएँ लिखी हैं, उन्हें भी पढ़ चुका हूँ। 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर बहुत बदला है। इस बदलाव की दिशा में कर्तव्यच्युत होने की संभावनाएँ बढ़ी हैं। फ़िलहाल जम्मू-कश्मीर के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश की पहचान व ताईद; कम ही हो पा रही है। इधर के बरसों में शेख़ मो. कल्याण की कविताई भी गहरी डूब लगाने से चूक रही है। मगर यह उनकी सामर्थ्य के कारण है, बचने की वृत्ति के कारण नहीं। इनका साहित्यिक कद सिर्फ़ लिखने के कारण ही निर्मित नहीं हुआ है। लेखन के शुरुआती दौर में इन्हें हिन्दी कवि-लेखक व अनुवादक मनोज शर्मा और रंजूर जैसे एक्टिविस्ट साथी मिले, जिनके सानिध्य ने इन्हें कवि होने के सही मायने महसूस करवाए। इसी फलस्वरूप वे रंगकर्म और अनेक साहित्यिक संस्थाओं का हिस्सा बने, और आज भी हैं। जम्मू-कश्मीर के हिन्दी कवियों की संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं। इनमें ज़्यादातर कवि कम लिखते हैं। कम छपते हैं; और सिवाय स्थानीय गोष्ठियों के कहीं चर्चा में नहीं आते। शेख़ मोहम्मद कल्याण इसी ज़्यादातर की कोटि में आते हैं। इनका पहला कविता संग्रह, 'समय के धागे' नाम से (2003) शाया हुआ। राज्य से बाहर इसकी कोई चर्चा नहीं हुई। हिन्दी कविता में लोक पर बात करते हुए वरिष्ठ कवि-आलोचक विजेंद्र जी ने ज़रूर एकाध जगह इस संग्रह का नाम गिनाया था। इस गिनाने में शुभ भाव था। कुछ इस तरह का:
'मैं चाहता हूँ
इस गाँव में ज़िंदा रहें
पुरखों की तमाम गालियाँ
हुक्के की गुड़क ज़िंदा रहे,
ज़िंदा रहे
तालाब में उतरते
चाँद का सांवलापन'
***
'मैं बचा रहना चाहता हूँ
तुम्हारी रातों में
तुम्हारे सपनों की तरह'
××
'मैं तुम्हारे बीच हूँ
तुम मुझे हिम्मत दो
मैं तुम्हें शब्द दूँगा'
उनके द्वारा व्यक्त शुभभाव को यहाँ विस्तार दे रहा हूँ:
● कल्याण; हाशिए पर रह कर; हाशियों पर लिखने वाले कवियों में से हैं। वे बहुभाषी जम्मू-कश्मीर के साहित्यिक इदारों में एक सेतु की भूमिका निभाते हुए, स्वयं किनारों पर खड़े रहे।
● इनके पहले संग्रह, 'समय के धागे' (2003) को एक संधि स्थल माना जा सकता है। जहाँ से जम्मू-कश्मीर राज्य में लिखी जा रही पूर्ववर्ती और परवर्ती कविता का मूल्यांकन किया जा सकता है।
● 2005 के बाद जम्मू-कश्मीर राज्य में विस्थापन के इतर जो काव्य प्रवृत्तियाँ सामने आईं। इनमें प्रेम में सामाजिकता और राजनीतिक प्रतिरोध के अलावा शहरी मजदूर-दिहाड़ीदार, पिता, किसान, सैनिक, स्त्री, गाँव, पहाड़ी लोक की संवेदना के बीज इनकी कविताओं में देखे जा सकते हैं।
● इनकी कविताई; सहज की दैंनदिन है। इसमें साधारण का निसर्ग के साथ रागात्मक सम्बन्ध दर्ज़ हुआ है।
● कविताई में तमाम सीमाओं के बावजूद; वे मूलतः कवि हैं। वास्तव में लोक-परिधियों/सीमांतों की अनदेखी पर वे कुढ़ते नहीं हैं। वे तथाकथित मुख्यधारा के प्रमाणपत्रों-सम्मानों से बहुत बेपरवा हैं, और लोक की जीवटता से परिचित हैं।
उपरोक्त शुभभावों का विस्तार, अग्रलिखित बिंदुओं में दे रहा हूँ:
1- स्मृतियां: कवि पाथेय, अस्मिता और भावनाएँ
2- स्थानिकता/देशीयता
3- प्रेम में समाजिकता
4- समय, डर, चीख और प्रतिरोध
5- भाषा, बिंब, शीर्षक और कहन
6- बेटी का पिता और पिता का बेटा
7- मूलतः कवि
1- स्मृतियां: पाथेय, अस्मिता और भावनाएँ
किसी ने लिखा है- ‘स्मृतियाँ हमें गिरने नहीं देती।’ यह सम्बल और प्रेरणा हैं। मेरा मानना है कि स्मृतियाँ सामूहिक सपनों की साथी हैं। यह ऐसा अतीत हैं जो हमेशा वर्तमान में रहती हैं। यह यथार्थ को अभिव्यक्त करती हैं। यह हमारी व्यक्तिगत अस्मिता को सार्वभौमिक पहचान देती हैं। कल्याण के लिए प्रेम की स्मृतियाँ आनन्द या तुष्टि का साधन नहीं हैं बल्कि सपनों को अभिव्यक्त करने का माध्यम हैं। ऐसा करते हुए, वे सत्ता से लड़ने की बात भी करते हैं। कल्याण; स्मृतियों के बहाने पाठक के सामने दो समय रख देते हैं। पाठक अपने उलझे समय में कविता पढ़ते हुए कवि के सुन्दर सपने को भी पढ़ता है:
'यहाँ खिले थे तमाम फूल
बहार टूट टूट कर आई थी
हमने सहेजा था
मासूम क्षणों को
जितना सहेज सकते थे'
(चलते हुए)
क्या कभी ऐसा भी समय था। क्या कभी ऐसा भी समय होगा? इसका उत्तर और चुनौती पाठक को मिलती है, जब कवि लिखता है:
'माना कि राजा के आदमी
खींच लेंगे तुम्हारी ज़बान कभी भी
बह रही
यह मनमोहक हवा भी
तुम्हारी चुगली कर देगी राजा के दरबार में
लेकिन तुम सपने देखना मत छोड़ना'
(बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे)
2- स्थानिकता/देशीयता-
स्थानिकता का अर्थ मात्र भौगोलिक परिवेश नहीं है। इसमें स्थान विशेष में रहने वाले लोगों की समस्याएँ, संघर्ष, यथार्थ और बोली वाणी भी आती है। स्थानिकता कवि की पहचान होती है। यह कवि की आधार होती है। बड़ी कविता की स्थानिकता ग्लोबल होती है। कल्याण की कविताओं में जम्मू के पहाड़ी लोक, शहरी निम्न व निम्नमध्य वर्ग का संघर्ष, जिजीविषा, यथार्थ और उसकी बोली-वाणी-पानी अभिव्यक्त हुआ है। 'बूढ़ा आदमी', 'पहाड़ का आदमी', 'पहाड़ की बेटी', 'साँवली पहाड़ी लड़की' शीर्षक कविताओं में पहाड़ी लोक की छटा दिखाई देती है। 'लड़की-1' और 'लड़की- 2' कविताओं में हँसती-खेलती; पहाड़ी लड़की को एक दुर्घटना बना देने का संकेत मिलता है। इनकी ज़्यादातर कविताएँ इनके द्वारा अभिव्यक्त परिवेश के छोटे- छोटे दृश्य हैं। परिदृश्य नहीं।
यह कविताई पहाड़ और प्रकृति के दोहन, बाज़ार की घुसपैठ, लड़कियों के सपनों, बकरवालों और गाँव के बुजुर्गों को दृश्यों में अभिव्यक्त करती है। कुछ मायनों में कल्याण का लोक; हिन्दी कविता के लोक से अधिक निर्दोष लगता है। यहाँ लोक नायिका के सपनों में कोई राजकुमार नहीं आता। वह कंटीली झाड़ियों से निकल सकती है। वह लोक गीत गाती है। राहगीरों को पानी पिलाती है। और प्रकृति से अगाध नेह करती है:
'खेलती है गाय के बछड़े से
बतियाती है
बिस्तर पर अठखेलियाँ करती बिल्ली से
गाती है पहाड़ी गीत'
(पहाड़ की बेटी)
एक तरफ कवि ऐसे अछूते संसार को छूता है तो दूसरी तरफ इस अछूते स्थलों पर बाज़ारवाद और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भयावहता भी दर्शाता है। यहाँ पहाड़ का थरथराना महसूस किया जा सकता है।
'मुक़द्दमा जारी है' जैसी कविताओं में झंडों की राजनीति दिखाने का प्रयास है। यहाँ जो छटपटाहट है, वह तस्दीक़ व शिनाख़्त तक नहीं पहुँचती। 'खेल- 1' और 'खेल- 2' कविताएँ भी संकेत तक सीमित रह जाती हैं। 'खेल-1' को पढ़ें:
'किसने खेला है यह खेल?
न चलती है ठंडी हवा
न बरसता है पानी
खेल - खेल में हरे हो जाते हैं
ज़ख़्म तमाम
इस खेल में
ऐसा भी होता है कि
जीवन बन जाता है मैदान
और खेलने वाले खेल जाते हैं : खेल।'
जिस खेल से घाव हरे हो जाते हैं, वह कई-कई परतों में छुपा स्थानीय के ऊपर ग्लोबल द्वारा नियंत्रित किया जाता खेल है। इसे समझना और अभिव्यक्त करना कठिन है।
'स्कूटर चलाती बेटी', 'पहली तारीख' और 'बेटी' जैसी कविताएँ शहरी मध्यवर्ग का ग्लोबल चित्रण करती हैं। 'पहली तारीख' और 'बेटी' शीर्षक कविताएँ रिश्तों में आर्थिक पड़ताल भी करती है। जबकि स्कूटर चलाती बेटी पितृसत्ता को चुनौती देती है। 'स्कूटर चलाती बेटी' अपने आप में एक अद्भुत बिम्ब है। यह बेटियों के सपनों को बल देती कविता है। यहाँ स्कूटर की गति एक हथियार है। वह जम्मू का सतवारी या डोगरा चौक लाँघते हुए नए गवाक्ष खोलती है-
'उसे मालूम है
कैसे लाँघने हैं मर्यादाओं के चौक
समय की रफ्तार को भी
लांघ सकती है
स्कूटर चलाती बेटी ... '
(स्कूटर चलाती बेटी)
इनकी कविताओं में लोक की बेटियाँ हैं तो शहरी झोपड़पट्टी के मार्मिक चित्रण भी हैं। जम्मू-कश्मीर में ‘बंद’ एक पीड़ाजनित (व्यवस्थाजनित भी) बहुअर्थी शब्द है। कल्याण का लेखन और सांस्कृतिक कर्म उस दौर में शुरू हुआ जब कश्मीर में आतंकवाद शुरू हुआ। इसका असर जम्मू में भी हुआ। यहाँ बंद आम बात हो चली थी। किसी आपातकाल में घर के अन्दर भरपूर राशन जमा कर लेने और सोश्ल नेटवर्किंग पर नयी नयी रेसिपी साझा करने वाले वर्ग को क्या पता कि किसी भी प्रकार का बंद; ग़रीब रामदीनों के लिए कितना पीड़ादायक होता है:
'वे गुब्बारे रामदीन
नहीं बेच पाया
भरे थे
जो उसने उस फूँक से जिसने
सामने दिखती उसकी पसलियों में
रबर सा खिंचाव ला दिया था।'
(बंद)
3- प्रेम में सामाजिकता
प्रेम; हरसूरत कम या अधिक समाज को प्रभावित करता ही है। इसके बिना कोई बदलाव सम्भव नहीं है। कल्याण की प्रेम कविताएँ भी व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाती हैं। कल्याण 'आह से उपजा होगा गान' की तान पर कह उठते हैं :
'यह कैसा मौसम है
और ऐसे में
तुम कहाँ हो
प्रिय'
(गुज़र क्यों नहीं जाता)
'तुम्हारे ही बहाने से' और 'हमें जीवन महकाना है' जैसी कविताएँ प्रेम के बहाने सामाजिक चिंताएँ दर्शाती हैं। मगर यहाँ प्रेम की गहराई और कहन की परिपक्वता नहीं मिलती। यह ज़रूर है कि यह औसत होते हुए भी जीवन के हक़ में खड़ी ज़रूरी कविताएँ हैं। इनके प्रेम में जहाँ कहीं विरह और अधूरापन है, वहाँ कवि एकदम पूरा और सुन्दर है। एक सुन्दर उदाहरण देखें:
'तमाम अधूरी इच्छाएँ
अधपकी ईंटों-सी
इंतिज़ार करती रहती हैं
और समय कि भट्टी पर ताकते रहते हैं
जलते हुए हम
एक दूजे को'
(अधूरापन)
यह ताकना और जलना कितना सात्विक और सामाजिक है। इसका स्वागत हरेक को करना चाहिए। इनकी प्रेम कविताएँ पढ़कर सहज ही कहा जा सकता है कि कवि प्रेम में बहुत स्वाभाविक है। उसके लिए प्रेमपात्र; सामूहिक सपनों का साथी है। वे प्यार करते हुए यह भी बता देते हैं कि सत्ता ने समय को जटिल बना दिया है। इसके खिलाफ मुखर होना चाहिए।
4- समय, डर, चीख और प्रतिरोध
इस दौर में कहीं न दिखते हुए भी शत्रु; सर्वव्यापक है। वह आपके फोन में दोस्ती का प्रस्ताव लेकर आएगा और प्यार करते हुए गला रेत देगा। बक़ौल मंगलेश डबराल:
'वह जीत कर आया है
और जानता है कि अभी पूरी तरह नहीं जीता है ...
हमारा शत्रु किसी एक जगह नहीं रहता ...
हमारे शत्रु के पास बहुत से फोन नम्बर हैं, ढेरों मोबाइल हैं
वह लोगों को सूचना देता है आप जीत गए हैं ...
हमारा शत्रु कभी हमसे नहीं मिलता सामने नहीं आता हमें ललकारता नहीं ... '
(नए युग में शत्रु)
कल्याण की कुछ कविताएँ; समय के हाथ में चाबुक और हिंसक नाखूनों को देखने में सक्षम हैं। वे लिखते हैं:
'वही तोड़ सकेगा जंज़ीर
लगेगा जिसे कि
पाँव उसके जकड़े हैं जंज़ीर में'
(जंजीरें टूटेंगी इस तरह)
इनकी कविताओं में घातक समय अभिव्यक्त हुआ है। यहाँ डर है। चीख है, और प्रतिरोध भी। सत्ता; शोषण करने के तरीके बदलती रहती है। वह धर्म, ईश्वर, भाषा, आश्वासन, वादे, डर, उन्माद किसी भी चीज़ को अपना हथियार बना सकती है। 'डर' नाम से हिन्दी के अनुपम कवि-आलोचक विष्णु खरे जी ने अद्भुत कविता लिखी थी। जो फासीवादी समय का विकराल रूप दर्शाती है। इधर डरने के दिन चरम पर हैं। कल्याण इसे स्वीकार करते हुए लिखते हैं:
'मैं डरा हुआ हूँ
डरा ही रहना चाहता हूँ स्वयं से
और उस भीड़ से जो हमेशा डरी ही रहती है
मैं और किसी से नहीं डरता
डरता हूँ तो बस अपने भीतर खड़े
लोहे के पहाड़ से।'
(डर)
यह डर हमारी कायरता को नहीं बल्कि सत्ता की क्रूरता को दर्शाता है। इसी कविता में आगे कवि अपने भीतर खड़े लोह-पहाड़ के पिघलने से डर रहा है। क्या लोहे के पिघले रूप से कोई हथियार नहीं बनाया जा सकता? 'परांस' का यह कवि कहीं-कहीं पर शुरुआती कविताओं से भी पीछे जाता दिखाई देता है, मगर जल्दी वापस लौट आता है। यह लौटना; सुखद लगने लगता है। वे स्त्री संवेदना के भी कवि हैं। इस सन्दर्भ में वे हमारे कर्तव्यच्युत होते जाने को रेखांकित करते हैं:
'वह चीखी
और चीखती चली गई
ऐसे कि जैसे
चीखना उसकी
नियति बन गई हो
हमने सुना
और सुनते चले गए
ऐसे कि जैसे
हमने सुना ही नहीं'
(चीख)
कल्याण डरते और चीखते समय में प्रतिपक्ष और प्रतिरोध रचते हैं। इनकी ‘बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे’ और ‘हम लड़ेंगे साथी’ नामक कविताएँ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और अवतार सिंह पाश को समर्पित हैं। इनके इंकलाबी स्वर को सुनें
'हमारे साहस की फसलें अब
तुम्हारी लगाई आग से
राख़ नहीं
बारूद बनेंगी'
(हम लड़ेंगे)
अपने पहले संग्रह ‘समय के धागे’ में भी; वे चिंगारी और साहस का भाव लेकर आते हैं। वे बेड़ियों को तोड़ना चाहते हैं। उनके भावों में आमजन की हिम्मत देखने वाली है। एक जगह वे लिखते हैं–
'गिरा
मैं तब भी नहीं था --- जब अलगा दिया गया
दो जलते दीपकों को ---
बंटा नहीं मैं
तब भी
जब मुझसे मेरा साया
अलग करने की खातिर
मुझ पर ही
गिरा दी गयी
मेरे ही स्वत्व की दीवार।
पता नहीं ऐसा घटा क्योंकर,
ऐसा घटा कुछ इस तरह से
कि बहा मेरी आंखों से लहू।
तोड़ डाला गया इन्हीं आँखों के सामने
उस चिड़िया का घोंसला तक
जो मेरे लिए एहसास था
ताजी सवेर का।'
(बंटवारा)
यह बहुर्थी कविता; तीन दशक पहले लिखी गई है। यह आज और अधिक प्रासंगिक है। यहाँ दो आदमियों से लेकर; दो संस्कृतियों को विलग किए जाने की हृदयविदारक शोक है। उनकी यह पंक्तियाँ भी रेखांकित करना चाहता हूँ:
'आओ
तुम भी आओ
वक्त आ गया है कि
हवा का रुख पहचान
बादलों में आग भर दें'
(बादलों में आग)
5- भाषा, कहन, बिम्ब, शीर्षक
कल्याण के पास आम आदमी द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा है। प्रिय कवि धूमिल ने कहा था- ‘कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है’ यह भाषा और आदमी की भी सटीक परिभाषा है। इसी तर्ज पर कह रहा हूँ- कल्याण की भाषा; कविता में आदमी होने की तमीज है। यही इनका कहन है।
कविता में संवेदना के चित्र बनाने का नाम बिंब है। कविता की समीक्षा करते हुए बिंब भी एक मानदंड रहता है। आलोचकों और कवियों ने इसे अलग-अलग तरह से कविता के लिए ज़रूरी बताया है। केदार नाथ सिंह तो इसे कविता का प्राण तत्व मानते थे। यह अनुभूतियों के मूर्तिकरण का ही कमाल है कि कविताओं का मंचन भी किया जाता है। कल्याण की कविताओं में सुन्दर बिंब हैं। इनके मुहावरे में कहीं भी अबूझ बिंब नहीं मिलते। कुछ उदाहरण देखें :
'नृत्य करती
दीये की लौ'
(डर)
'यह कौन सी घड़ी है
जो चाबुक सी बज रही है'
(कुछ ठहरा हुआ सा)
'बादल बस गरजते ही हैं
और
भीग जाती हैं शहर की कई बस्तियाँ
अधिकारों की टोकरी उठाए'
(डर-2)
'समय है कि
ठीक रात के चौथे पहर
मेरी छाती पर खाँसने लगता है'
(ग़लतफहमी)
किसी की किताबों पर बात करते हुए उसकी किताबों के शीर्षक पर ज़रूर बात होनी चाहिए। कल्याण की किताबों का नामकरण प्रवृत्ति के आधार पर है। यह उचित और न्यायसंगत है। ‘समय के धागे’ शीर्षक से कोई कविता नहीं है, लेकिन यह शीर्षक; संग्रह की काव्य-प्रवृत्तियों को समाहित किए है। ‘पहाड़ अपनी जगह छोड़ रहा है’ शीर्षक व्यंजनापरक है। विकास के नाम पर पहाड़ अपनी जगह छोड़ रहा है। वह कंक्रीट, टनल, बाँध, टावर, सड़क और रेलवे में बदल रहा है। यहाँ जड़ों से छूटते लोग हैं। विस्थापित और रिक्त होती मनुष्यता है।
संप्रेषणीयता को लेकर दूसरे संग्रह की शीर्षक कविता एक कमज़ोर कविता है मगर इसका शीर्षक बहुअर्थी है। यह एक रुपक रचता है। इस संग्रह का प्रतिनधित्व करता है। वरिष्ठ लेखक नरेन्द्र मोहन जी ने भी इस किताब की भूमिका में इसके नामकरण को बहुआयामी चेतना का वाहक मेटाफर बताया है।
6- बेटी का पिता और पिता का बेटा
कविता के इतिहास में बेटी का पिता और पिता का बेटा हो कर कवियों ने काफी मार्मिक और चारु कविताएँ लिखी हैं। बेटी का पिता होकर वह गर्वित रहा है जबकि पिता का बेटा होकर वह उसका विरोधी भी रहा है। आलोच्य कवि के दूसरे कविता संग्रह में संकलित 'बेटी' शृंखला की तीन कविताएँ; इनके पहले संग्रह में भी हैं। इन कविताओं पर पिता का प्यार, समर्पण और जीवन-संघर्ष बिंबित है। यहाँ कम आय में बहुत जिम्मेदारियाँ निभाता पिता है। यह कविताएँ; निम्न मध्यवर्ग का चरित्रांकन करती हैं। एक आम वेतनभोगी छोटे कर्मी का संघर्ष और सच बताती हैं। 'बेटी- 3' कविता देखें:
'अपने सपनों में
जवान होती जा रही हो
मेरी गुड़िया
मेरे पकते बालों की तरफ देख कर
कभी तो यह सोच कर रुको
कि तेरे पापा की तनख़्वाह नहीं बढ़ रही है
तेरे कद की तरह'
(बेटी)
आम आदमी का जीवन लोहे के पहियों वाले एक रथ के समान हो गया है। इसे खींचते रहना उसकी नियति बना दी गई है। उसके सपने और उल्लास पल-प्रतिफल मर रहे हैं। कवि के शब्दों में:
'बूढ़ी माँ ने फिर दोहराया होगा
नए सूट का पुराना स्वप्न
और नन्हें पैरों ने भी नापी होंगी
जूतों की कई दुकानें
और मकान के झड़ते
पलस्तर से झाँकतीं ईंटें
आज फिर खूब हँसी होंगी
क्योंकि
आज पहली तारीख है:
सपनों के ज़िंदा और मर जाने का दिन
आज पहली तारीख है।'
(पहली तारीख)
इन कविताओं में आम आदमी का आर्थिक स्तर और पारिवारिक विवशताएँ दिखती हैं। यहाँ इनकी ईमानदारी और संवेदना के साथ-साथ निम्नमध्यवर्गीय दृष्टि भी प्रमाणित हो रही है। आलोच्य कवि की कविताओं में एक पिता का बेटा भी दिखाई देता है। एक ऐसा बेटा जो अपने आप को पिता के सीने में धड़कता प्यारा अहसास समझता है। यह बेटा दिवंगत पिता को याद करके फफक पड़ता है। द्रवित होकर भी वह कमज़ोर नहीं लगता। 'खाली आसमान के सामने दोधारी तलवार जैसे खिंचे बेटे' की व्यंजना निशब्द कर देती है। वह पिता के साहस और संघर्ष का उत्तराधिकारी है।
7- मूलत: कवि
यह नहीं कहूँगा कि 'बंद', 'मैं ही हूँ', 'बंटवारा', 'बचा रहे गाँव', 'बादलों में आग', 'चीख', 'खेल- 1', 'बेटी', 'पहली तारीख', 'चलते हुए', 'चीख और आदमी', 'पिता', 'मुक़द्दमा जारी है', 'यूँ तो रोज़ सुबह होती है', 'स्मृति', 'तुम्हारे ही बहाने से', 'डर', 'अधूरापन' जैसी कविताओं के कारण कल्याण को पढ़ा जाना चाहिए। इन्हें इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि अब तक आलोच्य कवि अमर होने की लालसा लिए नहीं है। वे जम्मू के साहित्यिक परिदृश्य में एक सेतु की भूमिका में रहे हैं। वे सांस्कृतिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहे हैं। वे दूसरे संग्रह और फेसबुक पर प्रकाशित कविताओं में भी अपनी पुरानी ज़मीन पर रहकर; अपने समकाल का चित्र खींचते हैं। दूसरा संग्रह; पहले संग्रह का दूसरा भाग कहा जा सकता है। इन्होंने पैंतीस साल के लेखन-काल में लगभग 170-180 कविताएँ लिखी हैं। यानी एक साल में औसतन पाँच कविताएँ। इस कम लिखत मगर इनकी सतत साहित्यिक सक्रियता से यह मूलत: कवि ठहरते हैं। हिन्दी में मूलत: कवि होने की भी प्रतिष्ठित परम्परा है। हिन्दी कवि-आलोचक व संपादक अविनाश मिश्र की एक कविता से इस 'परांस' को विराम दे रहा हूँ:
'आततायियों को सदा यह यक़ीन दिलाते रहो
कि तुम अब भी मूलत: कवि हो
भले वक़्त के थपेड़ों ने
तुम्हें कविता में नालायक़ बनाकर छोड़ दिया है
बावजूद इसके तुम्हारा यह कहना
कि तुम अब भी कभी-कभी कविताएँ लिखते हो
उन्हें कुछ कमज़ोर करेगा।'
(पृष्ठ-11, अज्ञातवास की कविताएँ)
यह सुखद है कि शेख़ मोहम्मद कल्याण आज भी कभी-कभी कविताएँ लिखते हैं। वे आततायियों और आम पाठक को यक़ीन दिलाते रहें कि वे अब भी मूलतः कवि हैं। इन्हें खूब जिम्मेवारियों से भरी शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ।
सम्पर्क:
कमल जीत चौधरी
ई मेल - jottra13@gmail.com
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| शेख मोहम्मद कल्याण |
कवि परिचय:
शेख़ मोहम्मद कल्याण का जन्म 13 अक्तूबर 1968 को हुआ। इन्होंने 1991 में लिखना शुरू किया। वे एक अरसे तक रंगकर्म से जुड़े रहे। समज, इप्टा, युहिले जैसी सांस्कृतिक-साहित्यिक संस्थाओं के सदस्य रहते हुए, इन्होंने अनेक छोटे-बड़े साहित्यिक आयोजन करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनके दो कविता संग्रह, 'समय के धागे' (2003) और 'पहाड़ अपनी जगह छोड़ रहा है' (2018) प्रकाशित हुए हैं। इसके अलावा इनकी चयनित कविताओं का एक संग्रह, 'समकाल की आवाज़' (2024) शृंखला के अंतर्गत शाया हुआ है। इन्होंने डोगरी की कुछ कहानियों का अनुवाद भी किया है। आकाशवाणी, दूरदर्शन और कला अकादमी समेत अनेक मंचों से काव्य-पाठ कर चुके हैं। अपने साहित्यिक मन के कारण; नौकरी से समयपूर्व ही सेवानिवृत्त हो गए। दो-तीन बरसों से अपना पूरा समय अपने परिवार, दोस्तों, रिश्तों-नातों और साहित्य को दे रहे हैं।
शेख़ मोहम्मद कल्याण की कविताएँ
बेटी
(१)
सपनों में उड़ती
परियों संग खेलती
सहेलियों से बतियाती मेरी नन्हीं बच्ची,
नहीं भूला हूँ मैं
तेरी आशाओं के क्षितिज में
अपने पसीने की आख़िरी बूँद का समर्पण।
(२)
अभी कल ही तुम्हारी सहेली
सपना की सालगिरह पर
तुम्हारे लिए लाए तोहफे का खर्च
बेशक डस गया है,
मेरी तनख़्वाह के उस हिस्से को
जिससे मैं खरीदता था
दवाइयां
तेरा मुस्कुराता हुआ चेहरा देखने के लिए।
(३)
अपने सपनों में
जवान होती जा रही हो
मेरी गुड़िया,
मेरे पकते बालों की तरफ देख कर
कभी तो यह सोच कर रुको
कि तेरे पापा की तनख़्वाह नहीं बढ़ रही है
तेरे कद की तरह।
थका हुआ आदमी
जब लौटता है घर
थका हुआ आदमी
लौटती हैं उम्मीदें
लौटते हैं सपने
लौटती हैं
बस्तों में किताबें
ज़िन्दगी लौटती है
लौटती है
चूल्हे में आग
ज़िद लौटती है जीने की
भारी कदमों से
उम्मीदों की गठरी उठाए
घर कैसे लौटा जा सकता है
जानता है
थका हुआ आदमी।
बंटवारा
गिरा
मैं तब भी नहीं था - जब अलगा दिया गया
दो जलते दीपकों को -
बंटा नहीं मैं
तब भी
जब मुझसे मेरा साया
अलग करने की खातिर
मुझ पर ही
गिरा दी गयी
मेरे ही स्वत्व की दीवार।
पता नहीं ऐसा घटा क्योंकर,
ऐसा घटा कुछ इस तरह से
कि बहा मेरी आँखों से लहू।
तोड़ डाला गया इन्हीं आँखों के सामने
उस चिड़िया का घोंसला तक
जो मेरे लिए एहसास था
ताजी सवेर का।
चलते हुए
यहाँ खिले थे तमाम फूल
बहार टूट-टूट कर आई थी
हमने सहेजा था मासूम क्षणों को
जितना सहेज सकते थे
हमने देखे थे रंगीन सपने
पाला था
जिन्हें जागती आँखों में
हमने नापा था
धरती के आख़िरी छोर को
धूप बरसात की परवाह किए बग़ैर
हम हँसे थे
और हँसते चले गए थे
भूल गए थे कि बिन बादल भी
बरस सकती है
बरसात आँखों से...
स्कूटर चलाती बेटी
स्कूटर चलाती
तेज़ दौड़ाती
हवा संग बतियाती बेटी
बढ़ रही है आगे...
परम्पराओं के सारे बंधन
तोड़ देना चाहती है
इतनी तेज़ी से चला रही है स्कूटर
कि जैसे नाप लेना चाहती है
धरती का आखरी छोर
उसे मालूम है कैसे लांघने हैं
मर्यादाओं के चौक
समय कि रफ़्तार को भी लांघ सकती है
स्कूटर चलाती बेटी...
उसे खूब आता है
मौसम के बदले मिजाज़ से लड़ना
अपने दुपट्टे में बाँध लेती है
खट्टे-मीठे अनुभव
समय के पहिये नहीं रोक पाते उसकी उड़ान
इसी समय के बीच
वह बादल हो जाती है
लांघती है अँधेरे
दौड़ाती स्कूटर
मंज़िल पहुँचती आती है उस तक
गति को बनाती है हथियार
स्कूटर चलाती,
बादल होती
हरियाली हो जाती है
स्कूटर चलाती बेटी।
बन्द
बगल वाले झोंपड़े में सुलगता
रामदीन का चूल्हा
रोटियां नहीं सेंक पा रहा है।
सिसकता दो साल का बच्चा
दूध न मिलने पर
ममता के आँगन में छटपटा रहा है,
बिलख रहा है।
शहर में आज फिर बन्द है
वे गुब्बारे रामदीन नहीं बेच पाया
भरे थे जो उसने
उस फूंक से
जिसने
सामने दिखती उसकी पसलियों में
रबर-सा खिंचाव ला दिया था।
पहाड़ की बेटी
पहाड़ों को चीर कर लाती है
मटका भर पानी
पूरे ब्रह्मांड की प्यास देखी जा सकती है
उसके होंठों पर
कितनी भोली है उसकी शरारत
जिसे आज तक नहीं खरीद पाई
कोई भी बहुराष्ट्रीय कंपनी
पूरा का पूरा बचा हुआ है
उसके सुच्चे सपनों का संसार
ठीक उसके सामने खड़े पहाड़ की तरह
बचा हुआ है उसका हौंसला
बाज़ार कभी
तैरता भी है उसकी आँखों में तो बस
मील भर दूर जानती है
वह अपने सपनों की उम्र
खेलती है गाय के बछड़े से
बतियाती है बिस्तर पर
अठखेलियाँ करती बिल्ली से
गाती है पहाड़ी गीत
फलांग आती है बड़े-बड़े पहाड़
उसे मालूम है
अपनी सीमा का आखरी छोर
वह होती है हिस्सा स्कूल के हर कार्यक्रम का
नहीं जानती कि टी. वी. के बड़े-बड़े चैनलों पर
कैसे पहुँच जाते हैं
उसकी उम्र के बच्चे
वह तो बस
गाँव की पगडंडी तक का रास्ता जानती है
इन पगडंडियों पर दौड़ सकती है वह
बेझिझक, बेधड़क
उसे नहीं मालूम, तो यह नहीं मालूम
कि जीवन कि ऐसी कितनी पगडंडियाँ
पार करनी हैं उसे
उसके हाथों की रेखाएँ ही
उसका संसार हैं
वह बने रहना चाहती है
गाँव का हिस्सा
मटके से छलकते पानी की तरह।
अधूरापन
निकलती है धूप रोज़ ही,
पक्षी रोज़ चहचहाते हैं
गुलाब की खुशबू
महका जाती हमारा आँगन
पर हमारे बीच की फ़ासलों की दीवार
उम्र की तरह बढ़ती ही जा रही है
कहने को तो हम
एक ही नाव पर सवार हैं
पर तुम्हारी जुल्फों की महक
क्यों नहीं पहुँच रही मुझ तक
साँप-सीढ़ी का खेल
किसी भ्रम से कम नहीं होता
और तराजू में तुलने वाले सम्बन्ध
मौसमों की तरह रहते हैं
तमाम अधूरी इच्छाएँ
अधपकी ईटों सी इंतिज़ार करती रहती हैं
और समय की भट्टी पर
ताकते रहते हैं
जलते हुए हम एक दूजे को।
एक दिन
सपनों की नाव पर
सवार हो
वो आया मेरे करीब
मैं उसके करीब
और फिर नहीं लौटा किनारे से
भीतर गई लहर की तरह।
हमारी सदी का सत्य
मिट्टी वाले घर में बैठ
एक बुढ़िया
कात रही है
सदी का सबसे क्रूर समय
मुहाने पर बैठी
चिड़िया सब देख रही है
दूर पहाड़ पर
गा रही है कोयल
सूरज सर पर उगते ही
चबूतरे पर
एक कौवा, काँव-काँव कर
भीड़ को पढ़ा रहा है
रटा-रटाया पहाड़ा
जिसे सुन उम्र जी चुका बूढ़ा
ज़ोर-ज़ोर से हँस रहा है
बीते वर्षों में क्या खोया
क्या पाया
इसका हिसाब
किसी भी पांडुलिपि में नही
यह हमारी सदी का नँगा सच है।
खेल-1
किसने खेला है यह खेल
न चलती है ठंडी हवा
न बरसता है पानी
खेल-खेल में हरे हो जाते हैं
ज़ख़्म तमाम
इस खेल में
ऐसा भी होता है कि
जीवन बन जाता है मैदान
और खेलने वाले खेल जाते हैं खेल।
खेल-2
खेल रहे हैं बच्चे
पड़ गई हैं माथे पर सिलवटें
सियासत की गलियों में
सुरंगें खोद रहे हैं कुछ चूहे
खेल रहे हैं बच्चे
बरसात के पानी से भिगो रहे हैं
एक दूसरे को
धरती के इस छोर से
उस छोर तक छपाक-छपाक
पैर मार रहे हैं पानी में
टटोल रही हैं अपना वजूद
खेल खेलने को कुछ जोड़ी आँखें
भीड़ से बचते हुए
मैदान भरा पड़ा है बच्चों से
खेल रहे हैं बच्चे।
पहली तारीख
पहली तारीख का काला साया
जब-जब भी मंडराने लगता
घुमड़ आते हैं काले बादल
आज फिर पहली तारीख है
पिता के हाथ में
खुजली हुई होगी
मोल भावों में तुली होगी पेंशन की रकम
बूढ़ी माँ ने फिर दोहराया होगा
नए सूट का पुराना स्वप्न
और नन्हें पैरों ने भी नापी होंगी
जूतों की कई दुकानें
और मकान के झड़ते पलस्तर से
झाँकती ईंटें
आज फिर खूब हँसीं होंगी
क्योंकि
आज पहली तारीख है :
सपनों के ज़िंदा होने और मर जाने का दिन
आज पहली तारीख है।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क :
505/2 नरवाल पाई,
सतवारी (180003)
जम्मू-कश्मीर
मोबाइल : 8825063844





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