ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य 'सफल वह है जो चिरकालिक सफल पति है'
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| ललन चतुर्वेदी |
हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि पति और पत्नी एक गाड़ी के दो पहिए होते हैं। इनसे परिवार रूपी गाड़ी चलती रहती है। लेकिन सच का यही पहलू नहीं है। यह भी बात सरेआम कही सुनी जाती है कि शादी के दिन तक लड़का हँसता मुस्कुराता है लेकिन शादी के बाद लड़के को ताउम्र रोना पड़ता है। जबकि शादी के दिन लड़की रोती है लेकिन इसके बाद ता उम्र हँसती है। खैर बातें जो भी हों, यह बात तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि पति को पत्नी की हां में हां मिलानी ही पड़ती है अन्यथा बिजली गिरते देर नहीं लगती। पति बाहर कहां जाता है, क्या करता है, किन लोगों से मिलता है, इस पर पत्नी का नियंत्रण होता है। पत्नी के कहे अनुसार चले सो ठीक अन्यथा बे ठीक होने में कितनी देर लगती है। ललन चतुर्वेदी अब बाकायदा सेवानिवृत्त हो कर घर आ गए हैं। उनके पास अनुभवों की पूंजी जमा होनी शुरू हो गई है। इन्हीं अनुभवों को ले कर उन्होंने एक व्यंग्य लिखा है। उनके व्यंग्य में अनुभव की चाशनी को सहज ही महसूस किया जा सकता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य 'सफल वह है जो चिरकालिक सफल पति है'।
व्यंग्य
'सफल वह है जो चिरकालिक सफल पति है'
ललन चतुर्वेदी
वह पत्नी ही है जो पति को आदमी समझती है।मुझे इस बात की तसल्ली है कि मेरी पत्नी हैं. तसल्ली यह भी है कि वह मेरे साथ हैं। पिछले घटनाक्रम का अवलोकन करते हुए विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इस ज़माने में पत्नी का साथ बने रहना सौभाग्य है। मेरा दूसरा सौभाग्य यह है कि पत्नी सुन्दर हैं। पत्नी सुन्दर होने के अनेक फायदे हैं। यह बात उन्हें मालूम है जिनकी पत्नियाँ सुन्दर हैं। मालूम नहीं चाणक्य ने रूपवती भार्या को कैसे शत्रु बतला दिया। उनकी बातों पर मैं विश्वास नहीं करता। आप भी मत कीजिएगा। मैं पत्नी के साथ संवाद करते हुए व्याकरण के विभिन्न नियमों के प्रति सचेत रहता हूँ। जो नियम उनके अनुकूल हों, उन्हीं का प्रयोग करता हूँ। कामता प्रसाद गुरु की सलाह मानते हुए उन्हें मैंने नियमों से परे अपवाद की श्रेणी में रख दिया है। पत्नी से संवाद बना रहे यह बहुत जरूरी है।
इस प्रसंग में एक घटना का जिक्र करना चाहूँगा. एक दिन गुरु राममूर्ति जी ने सर्वनाम के प्रयोग की चर्चा करते हुए दो वाक्य रखे-
1. यह पत्नी मेरी हैं।
2. यह मेरी पत्नी हैं।
मैंने उनसे अनुरोध किया – "गुरु जी, ऐसे खतरनाक उदाहरण सार्वजनिक पटल पर मत रखा करें।" वह चुप हो गए तो मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा- "पत्नी आदरणीया होती हैं। दोनों वाक्यों में जमीन-आसमान का फर्क है। शब्दों को सही जगह पर रखना चाहिए, जैसे पत्नी को सही जगह पर प्रतिष्ठित किया जाता है। पत्नी के मान-सम्मान का ख्याल रखते हुए मैं दूसरे वाक्य के प्रयोग का पक्षधर हूँ। उन्होंने मेरा तर्क स्वीकार कर लिया और कहा कि आगे से मैं पत्नी को ले कर कोई उदाहरण नहीं दूँगा।
मेरी स्पष्ट मान्यता है कि पत्नी प्रेमिका नहीं होती. प्रेमिका के साथ बात करने की आजादी होती है. उससे कुछ भी कहा जा सकता है। वह भोली होती है। किसी भी बात पर वह सहजता से विश्वास कर लेती है। उसे चाँद-सितारा तोड़ कर लाने का वादा कीजिए। वह आप पर लहालोट हो जायेगी। कोई भी पुरुष पत्नी को यह बात बोलने का साहस नहीं जुटा सकता अन्यथा वह दिन में ही तारे दिखाने लगेगी। पत्नी के साथ बात करने के लिए अपेक्षित तैयारी जरूरी होती है। जैसे हम अफसर से बात करते समय सावधान रहते हैं उससे भी अधिक पत्नी के साथ बात करते हुए अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है। पूर्वज कह गए हैं कि अफसर के आगे और घोड़े के पीछे नहीं रहना चाहिए। मैं धर्मसंकट में पड़ जाता हूँ। मैं पत्नी के आगे चलूँ कि पीछे। मैं इसमें लोकमत का अनुसरण करता हूँ। मैं उनके कदम से कदम मिला कर चलता हूँ। आगे-पीछे चलने के अपने खतरे हैं और उनसे मैं वाकिफ हूँ।
मेरा विचार है कि पत्नी शब्द के साथ सदैव बहुवचन क्रिया का प्रयोग करना चाहिए. वैयाकरणों का भी यही मत है। इसमें आदर का भाव होता है। पत्नी का आदर होना ही चाहिए. इस पर कोई भी सवाल पूछना उचित नहीं है. कुछ स्तम्भ ऐसे बनाये गए हैं जिन पर सवाल नहीं उठाये जाते। जैसे - न्यायपालिका। अपनी बात करूं तो मैंने पत्नी को परिवार में ऊँचे आसन पर बिठाया है। यह दीगर बात है कि हमारे यहाँ दुश्मन को भी ऊँचा आसन दिया जाता है। महाभारत भी कहता है कि जितना संभव हो सके दुश्मन को क्रोध नहीं दिलाना चाहिए। मैं पत्नी को दुश्मन कहने का दुस्साहस नहीं कर सकता। प्रसंगवश बात आ गयी सो कह दिया। इस आई बात को गयी बात समझ लिया जाए। आशा करता हूँ कि भूल-सुधार विचारणीय होगा। पत्नी का निर्णय सर्वोच्च है और उसके अनुपालन को मैं सर्वोच्च प्राथमिकता देता हूँ। उनके निर्णय पर अपील का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसा नहीं कि वे तानाशाह हैं. तानाशाह से याद आया कि यह शब्द पुल्लिंग हैं. यह सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि स्त्रियाँ तानाशाह नहीं होतीं। अब इस सदी में और इस देश में एकाध हो जाएँ तो कौन सा पहाड़ टूट जायेगा। देश बड़ा है। हमें बड़े दिल से उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए। वैसे लोग चतुर हो गए हैं। वे स्वीकार कर रहे हैं, सत्कार कर रहे हैं। वे अपने आसन पर बनी हुईं हैं। उनका आसन पर बने रहना उनका और जनता दोनों का सौभाग्य है। खैर, पत्नी पर बात करते हुए भटकना उचित नहीं। इसे उन्हीं तक सीमित रखूंगा। एक उन्हीं के साथ निभा लूं तो अपने को सफल पुरुष मानूं. (सफल वह नहीं जो अरबपति है। सफल वह है जो चिरकालिक सफल पति है। सफल वह नहीं जो गृहत्यागी संन्यासी है, सफल वह है जो अहर्निश गृहवासी है।) इस सफलता के लिए उनका सहयोग अपेक्षित है। वैसे सफल भी हो जाऊंगा तो लोग कहेंगे कि हर सफल पुरुष के पीछे स्त्री होती है। बात तो सही लगती है। इस देश में सही चीजों को सही तरीके से न समझा जाता है, न प्रस्तुत किया जाता है। स्त्रियाँ पुरुष का वरण करतीं हैं। पुरुष सफलता का वरण कर लेता है, स्त्री पीछे छूट जाती है। इसका ज्यादा खुलासा नहीं करूंगा। अतीत से ले कर वर्तमान तक अनेक जीते-जागते उदाहरण हैं। उदाहरण देना खतरे का काम है। सिद्धांत की व्याख्या करना आसान है और इससे यश मिलता है। वैसे, यह सिद्धांत के अंत का समय है।
इस लेख का अंत करने के पहले एक और बात बतलाना चाहता हूँ। मेरी पत्नी जानती हैं कि मैं थोड़ा पढ़ने-लिखने वाला आदमी हूँ। इस बात पर वह कब प्रसन्न होती हैं और कब नाराज, यह आज तक मुझे पता नहीं चला। एक दिन उन्होंने कहा कि मैं तुम्हारे जीवन में हूँ, इसीलिए तुम लिख-पढ़ रहे हो। मैं इसे स्वीकार करता हूँ. स्त्रियाँ पुत्र पैदा करती हैं और पत्नियाँ उन्हें लेखक बना देती हैं। इसके अनेक उदाहरण स्वदेश और विदेश में हैं। गौर करने लायक है जो गृहस्थ लेखक हैं, वे औसत हैं और जिसे पत्नी ने जीवन से निकाल दिया उसे महाकवि बनने से कोई रोक नहीं सका। पत्नी के प्रेम से अधिक उसका अप्रेम मूल्यवान है। मैंने जब पत्नी को यह लेख पढ़ कर सुनाया तो उन्होंने कहा कि इस देश में अधिकांश मंचीय कवि पत्नी के बल पर ही आजीविका चला रहे हैं। मुझे उनके बयान में सोलहों आने सच्चाई दिखी। कवि-सम्मेलनों का दृश्य मेरी आँखों में उतर गया। मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई।
मैंने व्यावहारिक जीवन में शिद्दत से जो महसूस किया है, उसके आधार पर कह रहा हूँ। आज जब एक आदमी दूसरे को आदमी नहीं समझता वह पत्नी ही है जो अपने पति को आदमी समझती है। वह सार्वजनिक रूप से पति को आदमी कहती भी है। बस में बैठी एक स्त्री की बगल वाली सीट खाली थी। मैंने उससे पूछा कि यहाँ कोई है? उसने झट से जवाब दिया -"मेरे आदमी हैं। नीचे बिस्किट लेने गए हैं।" तब तक बस खुलने लगी। उसने कंडक्टर को बस रोकने का इशारा करते हुए कहा- "मेरे आदमी को आने दो।" ऐसे अनोखे अनुभव से गुजरने के लिए आपको यात्रा करनी पड़ेगी। लेकिन आप तो हवाई यात्री हैं। वहां तो लोगों के कंठ ही नहीं फूटते। वहां सब जेंटल मेन और वुमेन हैं। मैं दुनिया की पत्नियों के सामने श्रद्धानत हूँ और आशा करता हूँ कि वे सब अपने-अपने पति को आदमी समझती होंगी। मैं अपनी पत्नी को हाज़िर-नाज़िर मान कर और उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए घोषित करता हूँ कि आईन्दा इस विषय पर अब कोई व्यंग्य नहीं लिखूंगा। आशा करता हूँ कि वह भी मुझे आदमी समझेंगी।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की है।)
सम्पर्क :
202, असीमलता अपार्टमेंट
मानसरोवर इन्क्लेव, हटिया,
रांची-834003
ई मेल : lalancsb@gmail.com


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