विनोद दास का आलेख 'साधारणता के कवि'
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| राजेन्द्र कुमार |
सामान्य तौर पर कविता का मूल्यांकन कवि का नाम देख कर किए जाने की परम्परा है, जबकि होना यह चाहिए कि कविता की गुणवत्ता देख कर उसका मूल्यांकन किया जाए। राजेन्द्र कुमार जी का भी यही मानना था। उनका कहना होता था कि आलोचक के पास रचनाकार का नाम दिए बिना किसी रचना की समीक्षा करायी जाए और उसे पत्रिका में प्रकाशित किया जाए। हालांकि साहित्य जगत उन्हें उनके आलोचना कार्य के लिए जानता है लेकिन खुद को वे कवि ही मानते थे। उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हुए। उनकी कविताएं समय की नब्ज पर हाथ रखती हैं और जन सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। ये कविताएं तर्क की कसौटी पर खरी उतरती हैं और विज्ञान के साथ भी अपना तादात्म्य स्थापित करती हैं। विनोद दास ने कुछ कविताओं के जरिए उनकी कवि कर्म पर दृष्टिपात किया है। यह आलेख पक्षधर के हालिया अंक से साभार लिया गया है। आलेख के साथ विनोद जी की एक टिप्पणी भी दी जा रही है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विनोद दास का आलेख 'साधारणता के कवि'।
डॉक्टर राजेन्द्र कुमार से मेरा पत्राचार रहा। कभी मिलना नहीं हुआ। कथाकार मित्र अखिलेश के माध्यम से लखनऊ प्रवास के दौरान पता चला कि वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के श्रेष्ठ शिक्षकों में थे। उनके द्वारा संपादित पत्रिका अभिप्राय के अंक मिलते रहे थे। अंतिम समय में मुंबई में मिलने का कार्यक्रम बना लेकिन उनके पुत्र से पता चला कि वह वापस इलाहाबाद लौटने वाले हैं। फिर उनका एक दिन फोन आया। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि मैं उनकी कविताओं पर कुछ लिखूँ। संपादक पक्षधर विनोद तिवारी के आग्रह पर उनकी कविताओं पर टिप्पणी वहाँ छप कर आ गयी लेकिन काश वह पढ़ पाते!
'साधारणता के कवि'
विनोद दास
प्रोफेसर (डॉक्टर) राजेन्द्र कुमार का व्यक्तित्व बहुआयामी रहा है। उनका नाम आते ही एक योग्य और आत्मीय शिक्षक की छवि मस्तिष्क में कौंधती रही है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बड़ी संख्या में उनके छात्र उनके शिक्षण कौशल के साक्ष्य रहे हैं जिन्होंने साहित्य के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट जगह बनायी है। एक शिक्षक के रूप में सम्मान पाना आज के ऐसे समय में विरल है जहाँ अधिकांश छात्र शिक्षक का गुणगान तभी तक करते है जब तक वह उनके किसी स्वार्थ या लाभ के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकें। ऐसे माहौल में जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी के बीच आपसी सरोकार तेजी से कम होते जा रहे हैं, डॉक्टर राजेन्द्र कुमार अत्यंत सहज रूप से अपने छात्रों के बीच अपनी विद्वता, आत्मीयता और लगावों के कारण लोकप्रिय बने रहे हैं।
राजेन्द्र कुमार के व्यक्तित्व का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू उनका आलोचकीय कर्म है। हिन्दी में लगभग हर शिक्षक आलोचक होता ही है। राजेन्द्र कुमार ऐसे आलोचक नहीं रहे हैं जो केवल पाठ्यक्रम की दृष्टि से आलोचना में अपना हाथ आजमाते रहते हैं। मुझे स्मरण है कि जब मैं 'अंतर्दृष्टि' पत्रिका का सम्पादन कर रहा था, तब उन्होंने पाठ आधारित आलोचना पर बल देने के लिए आग्रह किया था। उनका मानना था कि अक्सर आलोचक या समीक्षक किसी रचना का आकलन उसके नाम की कीर्ति के आलोक में करते हैं जिससे उस रचना का विवेकपूर्ण पाठ संभव नहीं हो पाता और उनके मूल्यांकन में विसंगतियाँ आ जाती हैं। उनका प्रस्ताव था कि आलोचक के पास रचनाकार का नाम दिए बिना किसी रचना की समीक्षा करायी जाए और उसे पत्रिका में प्रकाशित किया जाए।
आलोचना के अलावा राजेन्द्र कुमार लंबे अरसे से कविताएं भी लिखते रहे हैं। यह रोचक संयोग है कि मेरे पास राजेन्द्र कुमार जी की ग्यारह कविताएं पाठ के लिए उपस्थित हैं और मेरे पास राजेन्द्र कुमार की कविता की स्मृति का कोई भार नहीं है। सच कहूं तो मैं पहली बार राजेन्द्र कुमार की कविता से साक्षात्कार कर रहा हूँ। ऐसे में उनकी कविता पर मेरा मन्तव्य पूर्वाग्रहरहित और उनकी कीर्ति से मुक्त माना जा सकता है।
इन ग्यारह कविताओं में अगर कोई मूल प्रवृत्ति खोजी जाए तो उसमें खोज को ले कर एक कवि की विकलता से साक्षात्कार होता है। कवि अकेला है और सम्पूर्ण चराचर में उसे तलाश कर रहा है जो खो गया है। जिस दूज के चंद्रमा को कवि किसी के साथ देखता था और उसको ले कर दोनों की अपनी आज़ाद तथा मुखत्लिफ़ राय होती थी। वह जो तारों के बीच अपनी जगह तलाश करती थी। वह अब चंद्रमा से ऊपर इशारे से बुला रही है। कवि उसकी आवाज़ की सुवास को अपने पतझड़ के सन्नाटे में खिलती हुई कलियों की इबारत में खोज रहा है। उसे लगता है जितना वह दूर चला गया है, उतना ही वह लौट रहा है, जहाँ से उसने विदा ली थी। वह द्वार उसे याद आता है जहाँ खड़े हो कर उसने दस्तक दी थी और अब अपनी पाँवों की छाप वहाँ देख रहा है जो किसी के स्वागत में रंगोली सी सजी हुई है। कवि फिर उस नाम को याद करता है जो सम्बोधन उसने दिया है। यह दोनों की अपनी निजी धरोहर है जिसमें उन दोनों की वज़ूद का साझा हक है। नाम जिसे फासले के बावजूद कवि खोना नहीं चाहता। कवि किस तरह अपनी भूख से आटा ले कर और प्यास से पानी ले कर उसे गूँथता है, फिर पानी ले ले कर वह किस तरह रोटी पोती हैं और वह उसकी हथेली पर पनेथी रह कर, रोटी रख कर उसके भूख-प्यास का इंतज़ाम करती थी जिसमें उसे अनिर्वचनीय स्वाद मिलता था और अपूर्व तृप्ति मिलती थी। वह होंठों के मुस्कुराहट की तरह ज़िंदगी की बारिश से बचते-बचाते हुए उसके पास आई और अपने रसभीगे चुंबन से कवि को ऐसा सहेज दिया कि उसे कभी किसी कामधेनु की कामना की जरूरत ही नहीं रही। कवि उन क्षणों को याद करता है जब दुनिया की खोज खबर जानने के लिए चाय की चुस्की के साथ अखबार पढ़ने में मुब्तिला है जबकि उसके लेखे अखबार अब इश्तहार सरीखा हो गया है जहाँ प्रेम और बलात्कार, न्याय-अन्याय में कोई फ़र्क नहीं होता। वह इस क्षरण पर उदास होती है और कवि को उसके आँखों की वह उदासी उसकी अनुपस्थित में खोजता है जो यह ताकीद करती थी कि दुनिया में ऐसा नहीं होना चाहिए। जो कवि को भीतर से पुकारती है और कहती है कि एकांत में नहीं, जीवन के रणसंग्राम में मिलूँगी जहाँ ज़िंदगी के सेज पर सलवटे पड़ी मटमैली चादर से पड़ा है। वह कवि को अपना ठिकाना बताती है कि वह कहाँ मिलेगी। वह बताती है कि खायी-अघायी उन औरतों के बीच खोजने वह नहीं मिलेगी जो माल या मल्टीप्लेक्स में घूमती हैं और कवि के अकेलेपन पर तरस खा कर उनसे भेंट करने आती हैं और सभा-संगोष्ठी या किटी पार्टी में शामिल होने के लिए अधीर रहती हैं। वह चीटियों की तरह रेंगते हुए कमजोर मनुष्य के माथे पर पसीने को देखने का आग्रह करती हैं। वह कहती है कि वह कवि की स्मृतियों की न तो परछाईं है और न ही दस्तक बल्कि एक अदृश्य आत्मीय पुकार है जो अनसुना नहीं रहना चाहती। कहना न होगा कि ग्यारह में से नौ कविताएं की भावभूमि का यही आधार है। अन्य दो कविताओं का मिज़ाज अलग है। इनमें राजनीतिक ऊहापोह और सामाजिक हलचल है।
ये नौ कविताएं आपको उस मार्मिक संवेदन के निकट ले जाती हैं जहाँ न तो आप डूबते हैं और न ही उबरते हैं। काव्य संवेदन की प्रस्तुति में एक नियंत्रण है। जैसे आप उसकी संवेदना में डूबने को तत्पर होते हैं, कवि अपने संवेदना की रास खींच लेता है। जब आप उससे उबरते हैं, तो फिर आपको अपनी काव्य संवेदना के दायरे में वापस ले आता है। इस तरह यहाँ कवि का भावों पर कसा नियंत्रण है। हालाँकि कवि का काव्यानुभव निजी है जिसके कारण कवि सिर्फ़ अपने आप से सामना करता है। वह खुद अपने संबंधों को जीता है। इस खोने का और स्मृति में पाने के संबंध का निमित्त सिर्फ़ रचनाकार कवि के लिए है। इसके काव्य संवेदन की पहुँच केवल उन तक है जो इस रचनात्मक अनुभव में शामिल होने के योग्य हों। इस कवि के लिए स्त्री न तो कल्पना की वस्तु है और न उपभोग की। वह स्मृति में जरूर है लेकिन कवि के साथ उसकी लंबी दूरी होने के बावजूद उसकी उपस्थिति हमेशा बनी रहती है। इनमें एक गृहस्थ का प्रेम और घरेलू आत्मीयता की एक जीवंत लेकिन क्षीण धारा बहती रहती है।
यह देखा गया है कि निजी और स्व निर्भर काव्यानुभव की कविताओं को पाठकों को तभी संवेदित कर पाती है जब वह अपने एकल और एकांत अनुभव को सार्वजनीन अनुभव में रूपांतरित करने में समर्थ होती है। इसके लिए प्रायः कवि ऐसे भाव बिंबों या प्रतीकों का उपयोग करते हैं जो सार्वजनीन जीवन से गढ़े और चुने होते हैं। इसके लिए प्रकृति के बिम्ब और प्रतीक सबसे अधिक सरलता से काव्य संसार में उपलब्ध रहते हैं। राजेन्द्र कुमार भी ऐसा करते हैं। उनकी इन कविताओं में भी चाँद, तारे, बसन्त, पतझर, पत्ते, टहनियाँ का उपयोग किया गया है। दरअसल वह इनके माध्यम से पाठक से संवाद करते हैं।
किन्तु 'भूख-प्यास' कविता में राजेन्द्र कुमार एक पारंपरिक किन्तु सार्वकालिक अनुभव के माध्यम से अपनी संवेदना को व्यक्त करते हैं। यह कविता रसोईं के खांचे में स्त्री को जकड़ने के लिए आलोचना का शिकार हो सकती थी लेकिन कवि ने इसे बहुत चतुराई से बचा लेता है जब वह रोटी पकाने की किया में स्वयं शामिल हो जाता है और अपनी भूख से आटा और अपनी प्यास से पानी ले कर आटा गूँथता है और रोटी पोने का काम स्त्री खुद चुनती है। इस तरह कवि दाम्पत्य में साझेदारी का उत्सव मनाता है और उसी में तृप्ति महसूस करता है।
ये नौ कविताएं साधारण मनुष्य की राग-विराग की अभिव्यक्तियाँ हैं। इतनी साधारण अभिव्यक्तियाँ कि कई बार पाठक को लग सकता है कि वह इन काव्यानुभावों से पहले भी गुज़र चुका है मसलन चंद्रमा से ऊपर इशारे करने का प्रसंग आम जीवन में अक्सर आता है। राजेन्द्र कुमार अन्यतम बनने के लोभ में दूर की कौड़ी लाने में शायद विश्वास नहीं करते। वह साधारणता के कवि हैं। इनके संबंध राग में आधुनिक पीढ़ी की तरह प्रदर्शनप्रियता और दैहिक कोलाहल नहीं है। पहले की पीढ़ी अपने राग-विराग को सार्वजनिक रूप से खुल्लमखुल्ला व्यक्त करने में झिझकती और संकोच करती थी। उसमें खुला-अधखुला सा भाव होता था। जीवन राग के अनुभवों चाहे व्यथा हो या ऐंद्रिक उत्तेजना, वह उन्हें संकेतों की मर्यादा में बांध कर व्यक्त करती थी। राजेन्द्र कुमार इसी बोध के कवि हैं। वह अपनी इन कविताओं में जीवन राग की संवेदना को धीमी आंच में पकाते हैं। उनकी सहचर की पोई रोटी के लिए कवि की हथेली की थोड़ी सी आंच सेकने की खातिर काफी होती है। ऐसे में अपनी भाव संवेदना को ऊंचे बुर्ज से ऐलान करने वाले आज के कोलाहल और प्रदर्शनप्रिय युवा मन को उनकी कविता का धीमा स्वर कुछ अनुत्तेजक, कुछ-कुछ पुराना और किंचित ठंडा भी लग सकता है।
राजेन्द्र कुमार राजनीतिक और सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध रचनाकार के रूप में जाने जाते रहे है। रंगों का मुक्ति पाठ और एक अराजनीतिक मित्र-वार्ता का दुखांत कविताओं में उनके ऐसे सरोकार स्पष्ट रूप से लक्षित किए जा सकते हैं। राजनीतिक कविताओं का सबसे बड़ा संकट यह होता है कि विचार को अनुभूति की आंच में पकाये बिना उसे कच्चे-अधकच्चे भोजन की तरह परोस दिया जाता है। एक लंबे अरसे से साहित्य का अध्यापन करने वाले राजेन्द्र जी स्वयं इस काव्य प्रवृत्ति से अच्छी तरह परिचित होंगे लेकिन इन कविताओं में वह इस काव्य-साधना को सम्हाल नहीं सके है। ये दोनों कविताएं राजनीतिक सदिच्छाओं की विचार स्फीति और शब्द स्फीति से ग्रस्त लगती हैं। लेकिन हमें यह विस्मरण नहीं करना चाहिए कि ऐसे दुर्धर्ष अंधेरे समय में हमें ऐसी कविताओं की भी बेहद जरूरत है जो कलात्मक रूप से चाहे अनगढ़ हो लेकिन उनके विचारों की रोशनी में आम आदमी अपने जीवन की दुश्वारियों को देख और पहचान सकें।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग कवि विजेन्द्र जी की है।)
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| विनोद दास |
सम्पर्क
मोबाइल : 9867448697



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