शिवदयाल के कविता संग्रह पर जितेन्द्र कुमार की समीक्षा शिवदयाल की कविताई : सामाजिक सरोकार से वैराग्य तक'



भारतीय दर्शन की एक लंबी एवं समृद्ध परम्परा रही है। छठी सदी ई पू में दर्शन की कई ऐसी धाराएं अस्तित्व में आईं जिन्होंने वैदिक दर्शन के समक्ष चुनौती प्रस्तुत किया। इनमें जैन और बौद्ध धर्म सर्वाधिक ख्यात हुए। आगे चल कर इसमें संन्यासियों, वीतरागियों, गोरखपंथियों, कबीरपंथियों आदि की धारा भी समाहित और समंजित हुईं। भारत की समृद्ध चिन्तन परम्परा ने साहित्य को भी काफी हद तक प्रभावित किया। कवि शिवदयाल एक्टिविस्ट भी रहे हैं। एक तरफ जे. पी. आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही है तो दूसरी तरफ भारतीय दार्शनिक धारा से वे प्रभावित रहे हैं। इसका उदाहरण उनकी कविताएं हैं। अनुभव संसार व्यापक होने के चलते उनकी कविताओं में पर्याप्त विविधता दिखाई पड़ती है। वर्ष 2024 में उनका पहला कविता-संग्रह 'ताक पर दुनिया' प्रलेक प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की समीक्षा की है जितेन्द्र कुमार ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शिवदयाल के कविता संग्रह पर जितेन्द्र कुमार की समीक्षा 'शिवदयाल की कविताई : सामाजिक सरोकार से वैराग्य तक'।


शिवदयाल की कविताई : सामाजिक सरोकार से वैराग्य तक 


जितेन्द्र कुमार 


जे. पी. आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़े, राजनीतिक विश्लेषक, वैचारिक निबंधकार, दो उपन्यासों (छिनते पल छिन, एक और दुनिया होती) के प्रणेता, एक कहानी-संग्रह 'मुन्ना बैंडवाले उस्ताद' के कहानीकार, विकास सहयात्री के संपादक, वरिष्ठ नागरिक शिवदयाल जी का पहला कविता-संग्रह 'ताक पर दुनिया' प्रलेक प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित (2024) है। एक लंबे दौर में लिखी गई उनकी 75 कविताएं इस संग्रह में संकलित हैं। किसी कविता की रचना-तिथि दर्ज़ नहीं है। वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचारों से प्रभावित हैं; वे भारतीय दर्शन के भाववादी परंपरा में आस्थावान हैं, लेकिन साम्प्रदायिक चिंतन-प्रणाली से दूर हैं। 'ताक पर दुनिया' की कविताओं से गुजरते हुए पाठक को महसूस होता है कि कवि की कविताओं की विषय-वस्तु, शिल्प और कथ्य में पर्याप्त विविधता है जिस पर उनकी वैचारिकता की आत्मा की लौ अहर्निश प्रकंपित है। वे भारतीय दर्शन की आत्मा-परमात्मा विषयक चिंतन-प्रणाली में गहरी आस्था रखते हैं। भारतीय दर्शन की लंबी परंपरा में संन्यासियों, वीतरागियों, गोरखपंथियों, कबीरपंथियों, बौद्धों, जैनियों की धारा भी पौराणिक धारा में समाहित और समंजित है। विज्ञान और तकनीक के विकास ने भी भारतीय चिंतन परंपरा को गहरे रूप में प्रभावित किया है। ओशो से लगा कर आनंदमूर्ति और गुरुनानक की परंपरा भारतवर्ष में ही खिली। कर्नाटक में लिंगायत सम्प्रदाय के संस्थापक महात्मा बसवन्ना हुए। सूची लंबी है। वर्तमान भौतिकवादी उत्तर आधुनिक जीवन शैली की चुनौती भारत की देशज आधुनिकता ही स्वीकार कर सकती है।विमर्श जारी है।' ताक पर दुनिया' को रख कर चलने की मंशा घोषित संन्यासी, संत-महात्मा, योगी भी नहीं करते। वे जंगल में पर्णकुटीर छोड़ कर महानगरों में ताप-शीत-वायु नियंत्रित कमरों में रहते हैं, हवाई यात्राओं से ले कर व्यापार और राजनीति में पेंग भरते हैं। जेल के भीतर भी आवाजाही करते हैं। आश्चर्य तो यह है कि उनके लाखों नहीं करोड़ों भक्त और अनुयायी हैं; इक्कीसवीं सदी में वे किसी भी वैज्ञानिक, कवि और राजनेता से समाज में अधिक सम्मानित हैं। राजनेता तो उनके चरणों में शीश नवाते हैं। इन वस्तुस्थितियों में 'ताक पर दुनिया' को रखना बहुत चुनौतीपूर्ण है, लेकिन आदर्श प्रशंसनीय है। कोई तो आवाज़ उठाये, वह कोई कवि ही क्यों ना हो। 'ताक पर दुनिया' को रखने की समझदारी से भारत का जेनुइन विकास-पथ उज्ज्वल और प्रशस्त होगा।


पूर्व जे. पी. सेनानी काव्य की रचना-वस्तुओं का चुनाव निजी भावात्मक जीवन अनुभूतियों से लगा कर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय जीवन-संदर्भो, अखबारों में छपे समाचारों, मानवेत्तर प्राणियों एवं वनस्पतियों तक से करते हैं। उनके रचना-संसार की विविधता और व्यापकता आश्वस्त करती है। ऐसा लगता है जैसे उनके पास थोड़े समय में बहुत कुछ कहने का ब्लू प्रिंट तैयार हो। घोंघा, बगुले, तितली, नंदी (शिव की सवारी, साँड), गिलहरियां, नेवले, मधुमक्खियां, शरणार्थी बच्चा, फेरी वाला, कंपनी एक्सक्यूटिव, किरायेदार से लगा कर सोमालिया और 'तुपकाडीह टीसन पर की दो औरतें' उनकी कविताओं के उपजीव्य बनते हैं। रचना-वस्तुओं के चुनाव में अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनीतिक, नैतिक महत्वपूर्ण घटनाएं जाने-अनजाने उनकी कविताओं की रचना-वस्तु बनने में छूट जाती हैं। जीवन की आपाधापी में दुनिया के मेले में कभी-कभी अपना भविष्य अपना ही शिशु खो जाता है। कभी-कभी सहयात्री छूट जाते हैं ....।


'ताक पर दुनिया' कविता -संग्रह में 'अंत, अंत हे गर्दनीबाग!' पाठक की स्मृतियों में बहुत दिनों तक ठहर जाने वाली कविता है। इसलिए कि कविता उन लोगों के साथ खड़ी है जो लुट गये, पिट गये चाहे वो वीतरागी नसीब मियां हो या मिट्टी की ढूहों पर खाद्य पदार्थ ढूँढ़ता नेवला। कविता में समय का यथार्थ पूरी नैतिक मानवीय संवेदना के साथ व्यंजित है। पिछले कुछ सालों में भारत में दौलतमंदों की एक ताकतवर दुनिया तेजी से उभरी है जो सत्ता के साथ सांठ-गांठ कर भारतीय संविधान की संरचना की धज्जियां उड़ाते हुए देश की तीन-चौथाई दौलत पर कब्जा कर चुकी है। यह कब्जा इवोल्यूशनरी नहीं रिवोल्यूशनरी (नकारात्मक) है। देश का विकास लाल-रथ गर्दनीबाग की बेशकीमती ज़मीन से सेमल जैसे विशाल वृक्षों सहित पुटुस की झाड़ियों, गिरगिटों-गिलहरियों के आश्रय स्थलों, नेवलों के ढूहों, वीतरागी कौव्वाल नसीब मियां और चाय दुकान वाले राजकुमार की रोजी रोटी को रौंद रहा। गर्दनीबाग देश के रूपक के रूप में पाठक की अंतर्दृष्टि में उभरता है। गर्दनीबाग का मैदान मुंबई के धारावी का रूपक लगे तो आश्चर्य नहीं। ऐसे ही लाखों एकड़ भूखंड कौड़ियों के मोल कुछ दौलतमंदों को सौंप दिये गये। 'अंत, अंत हे गर्दनीबाग!' कविता समग्रता में यथार्थ की धरातल पर ज्ञानात्मक संवेदना का नैतिक मूल्य रचती है, देश-धर्म, वैधानिक-धर्म और समकालीन काव्य-धर्म का निर्वहन करती है। साढ़े छः पृष्ठों की संग्रह की सबसे लम्बी कविता की प्रतीकात्मक काव्य-भाषा मनोजगत को छूती है -


"अपनी मिट्टी 

हवा, धूप और आकाश 

अपने खग-विहग, जीव-जंतु 

अपनी हरीतिमा और विश्रांति 


अपनी खूशबू और फैल 

अपनी सुंदरता, कोमलता और नैसर्गिक मोहकता 

अपनी सम्पन्नता और पूरेपन के साथ 

उत्सर्ग को तैयार है 

गर्दनीबाग 


कविता में वस्तुस्थितियों के काव्यगत दृश्यांकन में अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध की कोई अंतर्ध्वनि नहीं है। यथार्थ में यथार्थ ऐसा है नहीं, वस्तुजगत में अन्याय के ख़िलाफ़ प्रतिध्वनियां हैं। 'सूखे पत्ते' भी पांव तले मर्मर करते हैं। संभावित यथार्थ में रचनात्मकता है। चीज़ों को यथावत् रख देना ऐतिहासिक कार्यभार नहीं है।

        

दूसरी बात कि मानवीय संवेदना की नैतिकता दर्द के काफ़िले को गिलहरियों, गिरगिटों, नेवलों आदि मानवेत्तर रीढ़धारी प्राणियों से लगा कर अरीढ़धारी तितलियों-मधुमक्खियों जैसे कीट-पतंगों तक जाती है, लेकिन गर्दनीबाग के सरकारी क्वार्टरों के अधिवासी मजदूरों-कर्मचारियों के विस्थापन के दर्द अदेखे रह जाते हैं। खंडित यथार्थ की आयरनी यही है, शेष प्रशंसनीय है।


कविता-संग्रह में 'सोमालिया' दूसरी उल्लेखनीय कविता है। अंतरराष्ट्रीय मानवी संवेदना की दृष्टि से और महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका से लगा कर यूरोप के देशों में संकीर्ण अंधराष्ट्रवाद का ज़हर फैल रहा है। अकालग्रस्त सोमालिया उत्तरी अफ्रीका के पूरबी छोर पर और हिन्द महासागर के पश्चिमी तट पर भूख और गृह युद्ध से त्रस्त एक सम्प्रभु राष्ट्र है। कवि की काव्य अनुभूतियां निश्चित रूप से अखबारों में छपी ख़बरों पर आधृत हैं। कवि की नैतिक मानवीय संवेदना अंधराष्ट्रवादी भावनाओं को झटका देती है और पीड़ित सोमालियाई समुदाय के प्रति संवेदना प्रकट करती है। कवि मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होता है। उसकी मनीषा रागात्मक रूप से मनुष्य की पीड़ा से जुड़ जाती है। वह उनकी वेदना को काव्य-संदर्भ देता है। लेकिन उसके भीतर एक भय भी है। वह क्यों है पता नहीं।' उसकी 'शिराओं में/  बर्फीली सिहरन' दौड़ पड़ती है। सोमाली लोगों की भूख के दुश्मन "चूहे" नज़र आने लगते हैं। प्रश्न कौंधता है कि सोमाली गृह युद्ध के खलनायक और किरदार कौन हैं? लड़ाई के हथियारों का आपूर्तिकर्ता कौन है? युद्ध सरदार तो खुलेआम कहते हैं कि वे अपने हथियारों के बाज़ार के लिए युद्ध ख़ोज लेंगे।" 


"भूख और घृणा के महा-अलाव में सिंकते 

मेरी धरा (भारत) के रहवासियों 

देखो 

मुझे बख़्श दो! मैं कर भी क्या सकता हूँ

तुम्हें एक इंसानी गरिमा से पूरित 

मृत्यु देने के लिए।" 


कविता भावविह्वलता में खत्म हो जाती है। इस कविता का अंतिम अनुच्छेद भूख और घृणा के महा -अलाव में सिंकते भारतीय नागरिकों की त्रासदी पर केन्द्रित है। बौद्धिक तटस्थता पर चुभता व्यंग्य है।


तत्त्व मीमांसा की दृष्टि से संग्रह की कुछ कविताएं, मसलन : नाव, यात्रा, तिनका, ताक पर दुनिया, चादर, देखना, गांठें, होने की भूमिका, याद, लिफाफा, अन्यमनस्क, देह-माटी, छाया, बात, काम आदि-आदि उल्लेखनीय हैं। भारतीय दर्शन में स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म की कल्पना है। मनुष्य का जीवन जन्म से मृत्यु तक बस एक पड़ाव है। जो दिखता है वो माया का संसार है। तो युद्ध भी माया और शांति भी माया है। तो युद्ध और शांति के लिए क्या चिंता करना।आवागमन से मुक्ति सत्य है।मनुष्य जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है। संग्रह में कविता है,'यात्रा'-


"यात्रा में 

  चीज़ें छूटती हैं पीछे 

  छूटते जाते हैं दृश्यबंध 

  किसी-किसी यात्रा में 

  ऐसा भी होता है 

  छोड़ जाते हैं 

  कहीं खुद को भी हम 

  जाने कहां छूट जाता है 

   खुद अपना ही साथ 

   यात्रा तो होती है 

   होते नहीं हम


कवि के मन में नेमिचन्द्र जैन जैसी वैराग्य भावना है -


"सपना है जगत एक 

पल में होता विलीन 

समझा सच उसे देख 

जोड़ नाते अनेक

क्या-क्या नहीं झेला 

वह चला अकेला।" 

      

इसलिए कवि कहता है कि जगत -व्यवहार को देखने-परखने में 


"न थकाओ आँखें 

धुँधले दृश्य 

आप ही साफ़ होते जाएंगे 

तुम्हारी यात्रा में" 


जगत-व्यापार में अगर कही अन्याय है, दमन है, लूट है, भ्रष्टाचार है तो ये "धुंधले दृश्य" आप ही स्वत: spontaneously साफ़ होते जाएंगे।" ऐसा यथास्थितिवादी विमर्श रोचक भी है और बहस तलब भी क्योंकि यह कथन एक आंदोलनधर्मी जे. पी. सेनानी कवि का है। इसलिए यात्रा के दृश्यबंध देखने में आँखें न थकाओ-यह वैरागियों, यतियों और योगियों के संदर्भ में तो ठीक है, लेकिन सक्रिय जीवन जीने वालों के लिए? बदले परिप्रेक्ष्य में तो योगी, यति, संन्यासी ही जगत-व्यापार में बुरी तरह उलझ गये हैं। लगता है जैसे उन्हें काल्पनिक स्वर्ग-नरक की सच्चाई मालूम हो गई है। भले ही आदि शंकराचार्य (788 ई-820 ई) ने "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" का सिद्धांत दिया हो, लेकिन अब जीवन उतना असत्य नहीं लगता। जगत में सौंदर्यानुभूति के स्पेस हैं।


शिवदयाल


यात्रा में दृश्यबंधों के सौंदर्य से मोहाविष्ट नहीं होना है! माया-मोह में फँसना भारतीय दर्शन के अनुकूल नहीं है; दुनिया को वैरागी की तरह ताक पर रखना है।


"यह जो थोड़ी हरियाली बिछी पथ पर 

 यह जो मिली वृक्ष की थोड़ी-सी छाँह

 यह आसमान पर टँगा इकहरा बादल 

 चाहो तो इनको अपना कह सकते हो।" 


इस कविता में जो 'पड़ाव' (पड़ावों) शब्द आया है, वह जिंदगी (life) के लिए आया है। कवि का प्रबोधन भी है -


"तुम चाहो तो 

इन पड़ावों को अपना बना सकते हो।" 


दुनिया में रहते-रहते दुनियावी चीज़ों से लगाव हो ही जाता है। कविता का लगाव प्राकृतिक छवियों तक सीमित है; दृश्यबंध में जीवन-संदर्भ नहीं आते। 


इसी क्रम में 'नाव' कविता विचारणीय है।यह संग्रह की पहली कविता भी है। कविताओं की रचना-तिथि दर्ज़ नहीं है। इससे कवि के वैचारिक विकास को समझने में मदद मिलती। इस कविता में प्रतीकात्मक सौंदर्य की विभूति है। 'नयी कविता' के दौर में हिन्दी कवियों ने प्रतीकों का इस्तेमाल जम कर किया। निर्गुनिया संतों ने भी अपनी साखियों और वाणियों के लिए प्रतीकों का व्यवहार किया है। संग्रह में 16 पंक्तियों की छोटी सी कविता है, 'नाव'। इसमें कागज़, नाव, तरंग, लहरों, शिशु-मन, और सतह का अभिधात्मक नहीं, प्रतीकात्मक प्रयोग है। भारतीय दर्शन कहता है कि आत्मा अमर है; शरीर नश्वर है; शरीर जर्जर हो कर नष्ट हो जाता है। और आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है। हालांकि इसका कोई साक्ष्य आजतक नहीं मिला। बहरहाल, कविता में 'नाव' देह की प्रतीक है जो नश्वर पदार्थ कागज़ से बनी है। कविता में जीवन रूपी 'भव सागर' की अप्रस्तुत अनुभूति है। लेकिन 'लहरें' बताती हैं कि वह एहसास में है। 'लहरें' मनुष्य जीवन की इच्छाओं-वासनाओं की प्रतीक हैं। आत्मा इच्छाओं-वासनाओं रूपी आसक्तियों से आरज़ू करती है कि -


"ओ लहरो ....

   देखना 

   अपनी तरंगों की गति में 

    कहीं इसे ले न डूबना 

    यह नाव कागज़ की है!" 


भारतीय दर्शन में 'भवसागर' की कल्पना है। वह कहता है कि मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य सांसारिकता से मुक्त होना है। मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वराधना में लगे रहना है। आज तक किसी को मोक्ष मिला कि नहीं, इसका कोई प्रमाण नहीं है; लेकिन लाखों लोग निवृत्ति-मार्ग में कर्मविरत हो कर, सामाजिक-राजनीतिक-ऐतिहासिक कार्यभारों से अलग हो जाते हैं; इससे बहुत बड़ी ऐतिहासिक राष्ट्रीय क्षति हुई है।


काव्य-पुरुष लहरों को आश्वस्त करता है - 


"चलेगी (यह कागज़ रूपी देह) थोड़ी दूर 

भीगेगी, फूलेगी 

धीरे-धीरे इसमें रिसेगा पानी 

फिर खुद ही ढूँढ लेगी सतह"।


इस तरह देह में समायी आत्मा सतह (परमात्मा) का ठिकाना ढूँढ़ लेती है।यह एक आस्थावादी कविता है। व्यवहार में इस जीवन पद्धति को अपनाने वाले अपवाद में ही मिलते हैं; प्रवृत्ति मार्ग ही स्वीकृत जीवन शैली है।


इस क्रम में 'ताक पर दुनियाp' पढ़ी जा सकती है। इसमें काव्य-पुरुष के अभ्यांतर का चित्रण है।उसकी सोच -प्रक्रिया का दृश्यांकन है। काव्य- पुरुष सोचता है कि वह अपनी औकात भूल 'आवश्यकता से अधिक' भूमिका निभाने लगता है। परिप्रेक्ष्य पूरा खुलता नहीं है, विवरण में थोड़ी अस्पष्टता है। वह 'दुनिया और दुनियादारी (को) ताक पर रख छोड़ने की बात सोचता है। यह ठीक है कि कभी कभी चीज़ें कुछ समय के लिए समय के दबाव में ताक पर अल्प काल के लिए रख दी जाती हैं, रख देनी पड़ती हैं। लेकिन निजी और सामाजिक सरोकारों को ताक पर नहीं रखा जा सकता, अगर उससे दूसरे प्रभावित हो रहे हों। हालांकि, यहां कविता में आरंभ में एक स्त्री का बिंब उभरता है जो बहुत परिश्रमी है।वह सबका ख्याल रखती है, बिना किसी उम्मीद के। आयरनी है कि इसके बाद भी घर में उसकी योग्यता कम आँकी जाती है। लेकिन कविता में इस परिश्रमी स्त्री के समानांतर दो निर्जिवों की अनैच्छिक मेहनतशीलता के बिंब पिरोये मिलते हैं। एक कुर्सी का दूसरा चौकी का। कविता के अंत में काव्य पुरुष की वापसी उसके बोझ उठाने में साझेदारी की ख़ोज से होती है। 

   

इस कविता की कड़ी में, लगभग इसी मिज़ाज की 'चादर', 'देखना', 'गाँठें', 'होने की भूमिका', 'लिफाफा', 'अन्यमनस्क', 'देह माटी', 'काम', 'बात',  आदि कविताएं पढ़ी जा सकती हैं।

        

कवि-मनीषा 'अन्यमनस्क' में कहती है कि 


'सब देखा अनदेखा करके 

उसने सब अनदेखा देखा' 


यह निर्लिप्त कर्मवाद महनीय है, लेकिन हो नहीं पाता। जगत-व्यापार मत देखो। सत्ता से कुछ मत माँगो। जितना है उससे संतुष्ट रहो। संतोष ही परम सुख है। आदि आदि .....। यथास्थिवाद के ये दर्शन हैं। अमेरिका वेनेज़ुएला की संप्रभुता को चुनौती दे तो चुप रहो। लेकिन कवि की नैतिक मानवीय संवेदना अपने राष्ट्र की सीमाओं के पार भी मनुष्यता के पक्ष में खड़ी दिखती है।हिन्द महासागर पार 'सोमालिया' और एजिएन सागर के तट पर शरणार्थी बच्चे का शव कवि की संवेदना को मथ देता है। कवि-मनीषा वैश्विक जीवन -संदर्भो में निर्लिप्त रहने से इन्कार करती है।एजिएन सागर के पश्चिमी और पूर्वी तट के मुहाने पर ग्रीस स्थित है और पूर्वी तट पर तुर्की स्थित है। उस सागर तट पर मिले बच्चे (मृत) पर कवि कविता लिखता है' शरणार्थी बच्चा'। कवि की नैतिकता निर्वासित मृत बच्चे पर कविता लिखकर अंतरराष्ट्रीय मानवीय संवेदना का इज़हार करती है। यह एक खूबसूरत नैतिक कविता है -


"एजिएन सागर की फेनिल लहरों से टकराती 

  बोडरम तट पर निस्पंद पड़ी 

  तेरी देह - नन्हीं-सी 

  धरती पर संवेदना के लिए 

  और प्रेम के लिए 

   दोबारा जगह भर रही है।" 


विश्व मानवता के पक्ष में खड़ी यह कविता इस संकलन की उम्दा कविताओं में से एक है।यह रक्तपिपासुओं और युद्धोन्मादियों की भर्त्सना करते हुए मानवीय शांति और सहिष्णुता का मूल्य रचती है। यह वैश्विक शरणार्थी समस्या को मानवीय संवेदना और नैतिकता के आइने में देखने का आह्वान करती है। कविता जाति, मज़हब और राष्ट्र की सीमाओं के पार देखती है 


"वे कुर्द हैं, अफ़गान हैं, सहराती हैं 

  यज़ीदी हैं, फिलीस्तीन हैं 

  चकमा हैं, वे रोहिंग्या हैं 

  वे ईसाई हैं, मुसलमान हैं, हिन्दू हैं 

  ........... 


वे होंडुरस, ग्वाटेमाला, मेक्सिको से 

भागे चले आ रहे हैं।


कवि चेतावनी देते हैं -


हम शरणार्थियों की धरती के बाशिंदे बन 

एक दिन मानो खुद भी खदेड़ दिये जाने वाले हैं।" 


'नागरिकता' कविता भी साम्प्रदायिक संकीर्णता और जातिवादी अस्मिता का अतिक्रमण करती है।

       

संग्रह में अनेक प्रेमपरक कविताएं हैं - 'तुम्हारे प्यार में होना, 'फिर भी ....., 'लौ', 'नेह', 'श्श्श....', 'हम-तुम', 'मेरे होने से', 'एक बात', 'प्रतीक्षा', 'लकीरें', 'मेरा नरक वरदान बन जाए', 'कुमकुम', 'छुअन' आदि। संग्रह की कविताओं की विषय-वस्तु और थीम की दृष्टि से विविधता है।

      

स्पष्ट है कि ये कविताएं लंबे दौर में विभिन्न मन:स्थितियों में लिखी गई हैं - वैराग्य से सामाजिक सरोकार तक की छवियां इनमें समाहित हैं। प्रेम कविताएं अज्ञेयवादी नहीं लगतीं जहां "जहां आज के मानव का मन यौन-परिकल्पनाओं से लदा हुआ है और वे कल्पनाएं सब दमित और कुण्ठित हैं।" शिवदयाल जी की प्रेम -परक कविताओं की सौंदर्य चेतना 'यौन वर्जनाओं से दमित और कुण्ठित' नहीं हैं। उनकी प्रेम -परक कविताएं स्वकीया प्रेम के फ्रेम में जड़ित हैं। उनकी प्रेम-परक कविताओं में देशज आधुनिकता की सौंदर्य चेतना है। वे परकीया प्रेम के उत्तर आधुनिक महाजाल में नहीं फँसते।


पुस्तक : ताक पर दुनिया (कविता संग्रह) 

कवि : शिवदयाल 

प्रकाशक : प्रलेक प्रकाशन, 702, 

जे --50, ग्लोबल सिटी 

विरार (वेस्ट), मुंबई,

महाराष्ट्र -401303

मूल्य : ₹249/



जितेन्द्र कुमार 



सम्पर्क 


जितेन्द्र कुमार, आरा, बिहार 

मोबाइल : 9113426600

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