रणविजय सिंह सत्यकेतु का आलेख 'मातृभाषा : नैसर्गिक विकास का सुंदर द्वार'
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| रणविजय सिंह सत्यकेतु |
भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होने के साथ साथ अपने समुदाय के साथ एकजुट होने का भी सशक्त माध्यम भी है। हम अपनी सहज और स्वाभाविक अभिव्यक्ति अपनी मातृ भाषा में ही कर सकते हैं। उपनिवेश स्थापना के क्रम में कुछ यूरोपीय देश पहला हमला अधीन देश की भाषा और संस्कृति पर ही करते थे। यही वजह है कि अफ्रीका और दक्षिण अमरीकी महाद्वीप में अवस्थित अनेक देश अपनी मूल भाषा गँवा कर उसकी जगह यूरोपीय भाषाओं मसलन अंग्रेजी, स्पेनिश, पोर्चुगीज, फ्रेंच और डच का ही प्रयोग करते हैं। धर्म के आधार पर भले ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ लेकिन भाषा वह कारक बन गई जो अन्ततः उसके विभाजन के रूप में परिणत हुआ। ढाका यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 21 फरवरी 1952 में तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की भाषायी नीति का विरोध किया। यह प्रदर्शन अपनी मातृभाषा के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए था। प्रदर्शनकारी बांग्ला भाषा को आधिकारिक दर्जा देने की मांग कर रहे थे, जिसके बदले में पाकिस्तान की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाई। लेकिन लगातार जारी विरोध के चलते अंत में सरकार को बांग्ला भाषा को आधिकारिक दर्जा देना पड़ा। भाषायी आंदोलन में शहीद हुए युवाओं को श्रद्धांजलि देने के लिए यूनेस्को ने नवंबर 1999 के जनरल कांफ्रेंस में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने का फैसला किया और इसके लिए 21 फरवरी का दिन निर्धारित किया गया। तब से 21 फरवरी को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाए जाने की शुरुआत हुई। आज इस विशेष अवसर पर पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं रणविजय सिंह सत्यकेतु का आलेख 'मातृभाषा : नैसर्गिक विकास का सुंदर द्वार'।
(अंतराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी पर विशेष)
'मातृभाषा : नैसर्गिक विकास का सुंदर द्वार'
रणविजय सिंह सत्यकेतु
निज भाषा, निज भाव, निज असन-बसन, निज चाल।
तजि परता, निजता गहूँ, यह लिखियौ, बिधि! भाल॥
प्रसिद्ध कवि वियोगी हरि ने इस दोहे में निजता के जिन बिन्दुओं को चिह्नित किया है उनमें सबसे पहला स्थान भाषा का है। यानी मन के भाव, पहनावा और व्यवहार को किसी और तरीके से व्यक्त किया जा सकता है, लेकिन निज भाषा को किसी और भाषा से स्थानापन्न नहीं किया जा सकता। इसलिए कि उस भाषा का स्रोत माँ होती है, जो निजता और अपनत्व की धात्री होती है। माँ की भाषा, माँ से सीखी भाषा या माँ से पाई भाषा ही मातृभाषा होती है। यह भाषा व्यवहार की भाषा हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है। यह सीखने में मददगार हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है। यह आगे बढ़ने का द्वार साबित हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है। किन्तु, यह अपनी जड़ों से जोड़े रखने की सबसे मजबूत और आत्मिक कड़ी होती है और कोई अन्य भाषा इसका विकल्प नहीं हो सकती।
महात्मा गांधी ने मातृभाषा की तुलना माँ के दूध से की थी। कहा था, गाय का दूध भी माँ का दूध नहीं हो सकता। इसलिए मनुष्य का जो लगाव जन्म से मृत्यु तक मातृभाषा से होता है, वह दूसरी भाषा से नहीं होता है। व्यक्ति देश-दुनिया घूम आता है। राजनीति, व्यापार, नौकरशाही में सफलता के लिए व्यावहारिक भाषा का दामन थाम लेता है लेकिन जब घर लौटता है तो परिवार वालों से उसी भाषा में संवाद करता है जिसे उसने माँ से सीखा होता है। माँ और मातृभाषा से जुड़ा यह नाभिनाल संबंध ही व्यक्ति की असल पहचान होता है। उससे ही जड़ों से जुड़ाव को मापा जाता है। इसलिए मातृभाषा किसी व्यक्ति की वह मूल भाषा होती है जिसे वह जन्म लेने के बाद पहली बार बोलता है। यह सिर्फ भाषाई ही नहीं, उसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का अंग होती है। इसमें वह अपनी भावनाओं, विचारों और जानकारियों की अभिव्यक्ति सहजता, सरलता और गहराई से करता है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने भी लिखा है,
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
भौगोलिक विशिष्टताओं, सांस्कृतिक भिन्नताओं और सभ्यतागत बदलावों के कारण दुनिया में मातृभाषाओं की संख्या असंख्य है। असंख्य इसलिए कि हजारों मातृभाषा की जानकारी के बावजूद अनेक समुदायों तक पहुंचना शेष रह गया है। कई द्वीपों और घने जंगलों में रह रहीं प्रजातियों से संपर्क होने पर संभव है अन्य नई मातृभाषाओं से परिचय हो सके। लेकिन जितनी भी मातृभाषाएं ज्ञात हैं, उनमें भी अनेक वैश्विक व्यवहार से दूर हैं। बाहरी दुनिया से दूरी बनाए रखने या सीखने और आगे बढ़ने की ललक न होने के पीछे अपनी मातृभाषा की सुरक्षा का भाव हो सकता है, लेकिन बदलती वैश्विक जरूरतों के लिहाज से इस प्रवृत्ति के कारण किसी भाषा के पिछड़ने और अंत में लुप्त हो जाने का खतरा भी रहता है।
सवाल यह उठता है कि क्या जो भाषा माँ से सीखी हुई होती है, वही पहली भाषा भी होती है? इसका उत्तर माँ भी हो सकता है और नहीं भी। माँ तब, जब माँ से सीखी भाषा ही क्षेत्र विशेष की भाषा हो। नहीं तब, जब माँ से सीखी भाषा से उस क्षेत्र की भाषा अलग हो। खानाबदोशी, यायावरी, स्थान-भेद से यह भाषाई अलगाव सामने आता है। लेकिन अमूमन माँ से सीखी गई भाषा को ही प्रथम भाषा कहा जाता है, उसे ही मातृभाषा कहा जाता है।
दुनिया तेजी से बदल रही है। कृषि और औद्योगिक क्रांतियों ने देश-दुनिया में परिवर्तन के अनेक निशान दर्ज किए हैं। वैज्ञानिक और आर्थिक विकास ने न केवल देशों को नजदीक किया है, समुदायों की दूरियां कम की हैं, बल्कि भाषाओं का मेल-मिलाप भी संभव बनाया है। भाषाई नजदीकियों ने विभिन्न और विशिष्ट सांस्कृतिक सौंदर्य का दर्शन कराया है। लोक-परंपराओं, लोक-कथाओं और लोकगीत-संगीत की शृंखला सामने आती गई है। भाषाई अनेकता ने सिद्ध किया है कि अनमोल धातुओं को अपने गर्भ में संजो कर रखने वाली यह पृथ्वी अपने वाह्य आवरण में कितनी खूबसूरत जातीय धरोहरों को सजाया हुए है।
विकास का पहिया जितनी तेजी से घूमा, भाषाओं पर संकट उतना ही गहराता चला गया। क्योंकि विकास ने बाजार को घर-घर पहुंचा दिया और बाजार ने उसी भाषा को अपनाया जिसके संपर्क में अधिकतम भाषाएं थीं। जब व्यवहार में कुछ भाषाओं को वरीयता मिलने लगी, सीखने और आगे बढ़ने के लिए संपर्क भाषाओं को अपनाया जाने लगा तो मातृभाषाएं धीरे-धीरे पिछड़ने लगीं। कई मातृभाषाओं ने संपर्क भाषा से बहनापा कर शब्दों का आदान-प्रदान कर अपना बचाव कर लिया लेकिन जो यह नहीं कर सकीं उनके अस्तित्व पर संकट आ गया। इस समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ ने महसूस किया, इसलिए हर साल 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मना कर भाषाई विविधता को बढ़ावा देने का अभियान चलाया गया।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लैटिन, संस्कृत, प्राचीन ग्रीक, गोथिक, अक्काडियन, ओल्ड नॉर्स, कॉप्टिक, सुमेरियन लुप्तप्राय भाषाओं की श्रेणी में आ गई हैं। भारत में अंगिका, बंजारा, वज्जिका, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली, गोंडी, खासी, लेपचा, संबलपुरी, और तुलु मातृभाषाओं के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। यूनेस्को और संस्कृति मंत्रालय की पहल पर केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान की ओर से इन भाषाओं का दस्तावेजीकरण और संरक्षण किया जा रहा है।
भारत में 1961 में भाषाओं की कुल संख्या 1652 थी जो 1971 में घट कर 808 रह गई। भारतीय लोकभाषा सर्वेक्षण 2013 के मुताबिक, पिछले 50 सालों में 220 भाषाएं लुप्त हो गई हैं और 197 लुप्त होने के कगार पर हैं। यह स्थिति चिंताजनक है। आज राजनैतिक कारणों से देश में भाषाई झगड़े खूब हो रहे हैं। सबसे बड़ी और संपर्क भाषा हिन्दी का अनेक राज्यों में विरोध हो रहा है। दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्य अंग्रेजी को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं लेकिन हिन्दी से मेल-मिलाप नहीं चाहते। लेकिन वे भूल जाते हैं कि खुद उनके यहां जिन भाषाओं ने अपना सिक्का जमाया है, उनके नीचे कई लोकभाषाएं और मातृभाषाएं दबी हुई हैं। तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु, मराठी, ओड़िया, बांग्ला, असमी या पंजाबी अपने अपने राज्यों की संपर्क भाषाएं ही हैं, जबकि वहां क्षेत्रीय और लोकभाषाओं की संख्या सैकड़ों हैं। हिन्दी का विरोध करते समय वे भूल जाती हैं कि उन्होंने भी कई भाषाओं को पीछे धकेल दिया है। जरूरत उन सभी भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की है जिन्हें बोलने वाला एक भी व्यक्ति बचा हुआ हो। भाषाई अस्मिता की रक्षा तभी हो सकती है।
किसी भी देश या राज्य की भाषा नीति तभी सफल हो सकती है जब वह अपने परिक्षेत्र में पाई जाने वाली प्रत्येक भाषा का संरक्षण करे, उसे सीखने का पहला पायदान स्वीकार करे। प्राथमिक कक्षाओं में पहुंचने से पहले ही बच्चा जब अपनी बात कहना, दूसरों की बात समझना और उस पर सटीक प्रतिक्रिया देना सीख लेगा तभी वह पाठ्यक्रम की बातों को आत्मसात कर पाएगा। इसलिए प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा में शिक्षा देने की वकालत की जाती है। हां, इसके बाद की कक्षाओं से संपर्क भाषाओं का ज्ञान दिया जा सकता है। आज हो यह रहा है कि पहली कक्षा से, बल्कि केजी से ही अंग्रेजी सिखाने की जिद-सी हो जाती है। गिनती के बच्चे संपर्क भाषा में पारंगत हो जाते हैं लेकिन अधिकांश बच्चों की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है। ऐसा इसलिए कि वे बच्चे मातृभाषा की अभिव्यक्ति में ही कमजोर रह जाते हैं। यह कमजोरी पूरी जिंदगी में हावी रहती है। बाजार की चाल और तेज भागती दुनिया से कदमताल न कर पाने के कारण करोड़ों कमजोर और बेरोजगार युवाओं की फौज खड़ी हो जाती है।
शिक्षा और विकास के इस असंतुलन को मातृभाषा ही दूर कर सकती है। क्योंकि मौलिक चिंतन और रचनात्मक लेखन मातृभाषा में ही संभव हो पाता है। क्षेत्रीय भाषाओं में रचा गया साहित्य अधिक सुग्राह्य और लोकप्रिय होता है। अवधी में रचा गया रामचरितमानस इसका अप्रतिम उदाहरण है। विद्यापति, कबीर, सूर, मीरा, रैदास, टैगोर, सुब्रमण्यम भारती, तिरुवल्लुवर, कंबन जैसे महाकवियों ने अपनी मातृभाषाओं को ही अपनी अभिव्यक्ति का आधार बनाया और जन-जन में प्रिय हो गए। उनके विचारों का संपर्क भाषाओं और विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। अपनी मातृभाषा के प्रति मोहब्बत को कबीर दास ने कुछ इस तरह व्यक्त किया है-
बोली हमारी पूर्व की, हमें लखै नहिं कोय।
हमको तो सोई लखै, जो धुर पूरब का होय॥
प्रसिद्ध कवि विनोद कुमार शुक्ल ने मातृभाषा से प्यार और उसके विस्तार को वाणी दी है-
अपनी भाषा में शपथ लेता हूँ
कि मैं किसी भी भाषा का
अपमान नहीं करूँगा
और मेरी मातृ भाषा
हर जन्म में बदलती रहे
इसके लिए मैं बार-बार
जन्म लेता रहूँ-
यह मैं जीव-जगत से कहता हूँ
चिड़ियों, पशुओं, कीट-पतंगों से भी।
इन पंक्तियों में मातृभाषा के साथ सभी भाषाओं के सम्मान और संरक्षण की इच्छा कवि व्यक्त करते हैं, भले इसके लिए उन्हें बार-बार जन्म लेना पड़े। वह चिड़ियों, पशुओं और कीट-पतंगों की भाषा को भी जानने के ख्वाहिशमंद हैं। अधिक से अधिक भाषाओं को जानने, उनका पक्षपोषण करने और सबको समान आदर देने का कवि का संदेश सराहनीय और युगानुकूल है।
वास्तव में, भाषा पुल का काम करती है। ज्ञान, विचार और जानकारियों को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक और एक समाज से दूसरे समाज तक पहुंचाती है। मातृभाषा के माध्यम से व्यक्ति अपने परिवेश, परंपरा, कथा, गीत आदि से संपन्न होता है। संपर्क भाषाओं के जरिए ज्ञान-विज्ञान, व्यापार और व्यवहार के वृहत्तर संदर्भों से समृद्ध होता है। इसलिए अच्छी नीति यही होती है कि प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा दी जाए जिससे बच्चों के सर्वांगीण विकास के द्वार खुल जाएं। फिर संपर्क भाषाओं से परिचित कराया जाए जो उन्हें वैश्विक जानकारियां प्राप्त करने में सहायक हों।
भूमंडलीकरण और बाजारीकरण ने मातृभाषा के लिए कई चुनौतियां खड़ी की हैं। मशीन की भाषा बाजार को ग्राह्य है। कंप्यूटर और ऑनलाइन के दौर में उन्हीं भाषाओं का बोलबाला है जो अंतर्राष्ट्रीय कही जाती हैं। शोध और प्रौद्योगिकी में भी उन्हीं भाषाओं को प्राथमिकता दी जा रही है जो तकनीक और आजीविका के अनुकूल हों। ये वो क्षेत्र हैं जिनमें आगे बढ़ने के लिए संपर्क और वैश्विक भाषाओं का ही सहारा लेना पड़ता है, मातृभाषा के कंधे यहां कमजोर दिखाई देते हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि मातृभाषा को इतना सशक्त और कौशलपूर्ण बनाया जाए ताकि युवा वर्ग अपने भविष्य के प्रति सुरक्षित महसूस करे।
भारत जैसे विशाल उपभोक्ता वाले देश में मातृभाषा को अब संसाधन के रूप में देखा जा रहा है। इंटरनेट से ले कर अभिव्यक्ति के हर माध्यम के लिए मातृभाषा में तथ्य मुहैया कराए जा रहे हैं। अपने उत्पाद बेचने के लिए कंपनियां भी मातृभाषाओं तक पहुंच बना रही हैं। अपने कर्मचारियों को क्षेत्र विशेष की मातृभाषा सीखने के लिए प्रेरित कर रही हैं। अनेक चैनल क्षेत्रीय भाषाओं में अपनी सेवाएं देने लगी हैं। इससे रोजगार भी पैदा हो रहे हैं और मातृभाषाओं का उत्थान भी हो रहा है। लेकिन यह प्रयास सिर्फ व्यापार और राजनैतिक हितों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसके महत्व को स्थायी बनाने के लिए मातृभाषा में शोधकार्य की जरूरत है। कला, विज्ञान, पत्रकारिता, साहित्य और मनोरंजन के लिए मातृभाषा का दरवाजा खोल देना चाहिए। जापान, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने अपनी मातृभाषा में नागरिकों को शिक्षा दे कर विकास की नई इबारत लिखी है। मातृभाषाओं की विशाल संपदा वाला देश होने के नाते भारत इस दिशा में बेहतर परिणाम हासिल कर सकता है।
यह महत्वपूर्ण है कि भारत की प्रमुख भाषा के तौर पर हिन्दी पूरे विश्व में बोली और समझी जाने लगी है। अंग्रेजी और मंडेरियन चाइनीज के बाद हिन्दी विश्व में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा के तौर पर उभरी है। इसके अलावा बांग्ला और तमिल भी अनेक देशों में बोली जाती हैं। अब यह हिन्दी का दायित्व है कि वह अपनी विशालता में क्षेत्रीय भाषाओं को कुंद न करे, बल्कि उन्हें संग-साथ ले कर खुद को और समृद्ध करती चले। इससे देश भर में उसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी ही, शब्द संपदा के कारण वैश्विक स्तर पर भी धाक जमेगी।
मातृभाषाओं के संरक्षण के लिए जरूरी है कि इसे न सिर्फ विषय के रूप स्थापित किया जाए, बल्कि प्रशासनिक और न्यायपालिका की भाषा के तौर पर भी स्वीकृति मिले। मजबूत लोकतंत्र और आम नागरिकों की भागीदारी के लिए यही हितकर है। इस आवश्यकता की ओर कई बार सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने भी इशारा किया है कि जनता को कोर्ट या शासन के फैसलों और बहसों की सही-सही जानकारी नहीं हो पाती क्योंकि अधिकांश लोगों को अंग्रेजी नहीं आती। इसलिए शासनादेश और कोर्ट के फैसले अंग्रेजी और हिन्दी के साथ क्षेत्रीय भाषाओं में भी जारी किए जाएं। कुछ अध्ययनों में भी साबित हुआ है कि किसी व्यक्ति के नैसर्गिक विकास में उसकी मातृभाषा में दी गई शिक्षा या जानकारी सबसे महत्त्वपूर्ण होती है। मातृभाषा दिवस मनाने का सुफल तभी मिल सकता है जब देश के एक-एक व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का ध्यान रखा जाए। ...और यह केवल मातृभाषा के संरक्षण से ही संभव है।
सम्पर्क
मोबाइल : 9532617710



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