रबीन्द्रनाथ ठाकुर के गीत (मूल बांग्ला से अनुवाद - जयश्री पुरवार)


रबीन्द्र नाथ ठाकुर 


मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने में प्रेम की बड़ी भूमिका है। प्रेम जीवन का आकर्षण है। विपरीत से विपरीत स्थितियों में भी यह मनुष्य को संभाले रखता है। अपने लोगों के लिए जीने का जज्बा भरता है। दुनिया का शायद ही कोई कवि ऐसा होगा जिसने प्रेम पर कविताएं न लिखी हो। प्रेम जीवन ही नहीं संगीत का भी उत्स है। प्रेम एक तरफ जहां आबद्ध करता है वहीं दूसरी तरफ मुक्त भी करता है। यह उम्मीद भी जगाए रखता है। लगाव का आलम यह कि जन्म जन्मांतर तक साथ बने रहने की अभिलाषा होती है। रबीन्द्र नाथ ठाकुर के साहित्य में प्रेम केन्द्रीय तत्त्व के रूप में दिखाई पड़ता है। उनके गीतों में प्रेम की गहन अनुभूति सहज ही महसूस की जा सकती है। जयश्री पुरवार की रुचि बांग्ला कवियों और गीतकारों की रचनाओं में रही है। इस क्रम में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण बांग्ला कवियों की कविताओं का अनुवाद किया है। अनुवाद में जयश्री ने कविता की आत्मा को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। उनके अनुवाद शाब्दिक न हो कर भावानुवाद के रूप में हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रबीन्द्र नाथ ठाकुर के गीत मूल बांग्ला से अनुवाद किया है जयश्री पुरवार ने।



प्रारंभ से ही रवीन्द्र साहित्य में प्रेम का विशेष स्थान रहा है। रवीन्द्र नाथ के गीतों और कविताओं में, प्रेम और विरह के बीच एक अद्भुत रहस्यमय खेला है। वह कहते थे जब मैं प्रेम के गीत गाता हूं तो मुझे न केवल संगीत का आनंद मिलता है बल्कि प्रेम की अनुभूति भी होती है। उनके गीत प्रेम में एकाधिकार और एकाधिपत्य को तोड़ने वाले गीत हैं, विशेषकर जब उनके गीतों में प्रेम की दुनिया जागृत होती है तो संप्रभु सीमाएं और भी अधिक टूटती हैं। वह कहते है जो शब्द, सुर, लय के मेल से बनता है वही गीत है और यह हमारे मन में एक रहस्यमय हलचल पैदा करता है। “केवल प्रेम ही वास्तविकता है, ये महज एक भावना नहीं है। यह एक परम सत्य है जो सृजन के ह्रदय में वास करता है।” उनके प्रेम पर्याय के गीतों के शब्द इसी प्रेम को व्यक्त करते हैं। रबीन्द्रनाथ के कवि मन में एक सच्चे प्रेमी मन का निवास था।

यदि उनकी पहचान एक विशेष प्रकार के कवि या कलाकार के रूप में की जानी है, तो शायद उन्हें प्रेम का कवि ही  कहा जाना चाहिए। क्योंकि उनके सैकड़ों प्रेम गीतों और कविताओं में प्रेम न केवल व्यक्त हुआ, बल्कि उनकी प्रकृति पूजा और प्रेम के साथ एकाकार हो गयी। इन विभिन्न प्रकार की अभिव्यक्तियों को विश्लेषण द्वारा अलग नहीं किया जा सकता। प्रेम उनके लिए शारीरिक से अधिक भावनात्मक और आध्यात्मिक संपर्क था। उनका पालन-पोषण उस युग में हुआ था जिसमें ब्राह्मणवाद और आधुनिकतावाद का मिश्रण था। स्त्री शरीर के प्रति उनका आकर्षण उनकी प्रारंभिक युवावस्था में लिखी गई 'शेष चुंबन', 'चुंबन' और 'स्तन' जैसी कविताओं में प्रबल और स्पष्ट है। लेकिन बाद की उम्र में लिखी गई 'विजयिनी' जैसी कविताओं में उन्होंने उसे उसके शारीरिक सौंदर्य पर विजय प्राप्त करते हुए एक अवैयक्तिक रूप में भी देखा। उनके गीतों में सुंदरता के सामने देह पराजित हो जाती है।

कवि ने स्वयं लिखा है - “प्रेम का त्याग से गहरा रिश्ता है - एक ऐसा रिश्ता जिसमें यह तय करना होता है कि कौन पहले आता है और कौन बाद में। प्रेम के बिना कोई त्याग नहीं है, और त्याग के बिना कोई प्रेम नहीं हो सकता। प्रयोजन या अत्याचार के उत्पीड़न द्वारा हमसे जो छीन लिया जाता है, वह त्याग नहीं है - हम प्रेम में जो देते हैं उसे संपूर्णता से देते हैं, और उसका कुछ भी नहीं रखते हैं, और उसी देने को सार्थक मानते हैं।”

हमारे अनुरागी कवि कहते हैं कि प्रेम सभी अंतरालों को भर देता है, सभी विविधता मिल जाती है।  मनुष्य अपने सभी प्रयासों से केवल उस प्रेम की खोज करता है - जो वास्तव में उसका प्रियतम है। यदि सत्य प्रिय न होता तो क्या उसकी अनुपस्थिति में लोग इस प्रकार कुंठित होते? तो लोग अपने हृदय में यही कामना करते रहे हैं कि  मेरे सारे प्रेमों के बीच उस एक का प्रेम वर्षित हो, मेरा रोम-रोम भर उठे। मनुष्य-मनुष्य के संबंध को पात्र जैसा बना कर उसे प्रेम के अमृत रस से भरकर मनुष्य पीना चाहता है। ये ही है अंतर आत्मा की कामना, साधना, और रुदन। लेकिन अहंकार के कोलाहल में यह पुकार स्वयं उसके अपने कानों तक नहीं पहुंचती। हर बार वह सोचता है, मैं ठगा गया हूँ।

कवि फिर से दूसरे शब्दों में कहते हैं - प्रेम सिर्फ हृदय की अनुभूति  नहीं है, यह एक शक्ति है, जैसे दुनिया की गुरुत्वाकर्षण शक्ति। वह हर जगह है। स्त्रियों का प्रेम उस विश्व शक्ति को सहजता से हिला सकता है। कवि द्विजेंद्र लाल रॉय के पुत्र दिलीप रॉय रबीन्द्र नाथ के मित्र थे, हालांकि दिलीप उम्र में उनसे काफी छोटे थे। अपने परिपक्व वयस में, कवि ने एक बार दिलीप रॉय से कहा था... "लेकिन एक बात मैं गर्व से कह सकता हूं कि मैंने कभी किसी स्त्री के प्यार को तुच्छ दृष्टि से नहीं देखा, वह प्यार चाहे कैसा भी हो।" यह हैं रवीन्द्र नाथ और उनका अलौकिक प्रेम। 

जय श्री पुरवार



रबीन्द्र नाथ ठाकुर के गीत


(मूल बांग्ला से अनुवाद - जयश्री पुरवार)


प्रेम पर्याय की कविताएँ - गीत वितान से 



तुम्हीं को मैंने मान लिया जीवन का ध्रुवतारा


तुम्हीं को मैंने मान लिया जीवन का ध्रुवतारा, 

पथ नहीं भूलूँगा अब कभी इस सागर में।

जहाँ मैं नहीं जाता तुम रहती हो प्रकाशित,

आकुल नैनों के जल से तुम ढालो किरण-धारा।


तुम्हारा ही चेहरा सदा जागता है मन में गोपन में,

तिल भर का अंतर भी हो तो दिखता नहीं कुल-किनारा

कभी यदि विपथ में भटकना चाहे यह हृदय 

तो लज्जा से मर जाए देख कर वह चेहरा।



मेरे प्राण के ऊपर से चला गया कौन


मेरे प्राण के ऊपर से चला गया कौन

      वसंत की हवा की झोंके की भाँति।

वह तो छू गया, झुक गया रे—

        फूल खिला गया शत शत।

वह चला गया, कह नहीं गया —

           वह कहाँ गया वापस नहीं आया।

मेरे प्राण के ऊपर से कौन चला गया,

      वसंत की हवा की झोंके की भाँति।


जाते जाते वह क्या चाह गया 

        कुछ तो जैसे गा कर  गया —

मैं तो अनमना सा बैठा रहा 

            फूल-वन में रे।

वह तरंग की तरह बह  गया,

        चाँद के आलोक के देश में गया,

जहाँ से वह हँस के गया, 

        अपनी हँसी रख के गया रे —

लगा जैसे अँखिओं के कोर में 

         वह मुझे बुला गया रे।

मैं कहाँ जाऊँ, कहाँ जाऊँ,

          सोच रहा बैठ कर अकेले में।


वह चाँद की आँखों में 

         फेर गया नींद का घोर 

अपने प्राण की बातों से

         झूला गया फूलों का डोर।

फूल वन के ऊपर से वह,

          क्या बात बोल गया,

फूलों की सुरभि पागल बन 

         चली गई उसी के संग

हृदय मेरा हो उठा आकुल, 

           नयन मेरे मूँद आये रे —

कहाँ से हो कर वह कहाँ गया रे।।



फिर भी याद रखना 


फिर भी याद रखना, 

अगर मैं दूर चला जाऊँ।

यदि पुरातन प्रेम आच्छादित हो जाये 

नवीन प्रेम के जाल में।

यदि आस-पास ही रहूँ छाया की भाँति

फिर भी देख न पाओ हूँ या कि नहीं —

फिर भी याद रखना।


यदि आँखों में जल भर आये, 

यदि किसी दिन खेल थम जाय मधु रात्रि में, 

फिर भी याद रखना।

यदि किसी दिन शरद के प्रात: में 

काम में बाधा आ जाये —

फिर भी याद रखना।

यदि मेरी याद आये पर 

आँखों के कोर में जल न छलछलाये —

फिर भी याद रखना।


Couple 


तुम्हीं को जैसे चाहा है 


जैसे तुम्हीं को चाहा है 

शत शत रूपों में शत बार

हर जन्म में, हर युग में अनिवार।

चिरकाल से मुग्ध हृदय ने 

गुँथा है गीतों का हार, 

कितने ही रूपों में तुमने 

गले में डाला है,

लिया है वह उपहार 

हर जन्म में, हर युग में अनिवार।


जितना ही सुनता अतीत की वह गाथा,

पुरातन प्रेम की व्यथा 

अति पुरातन विरह मिलन कथा 

असीम अतीत में देखते देखते

आख़िर में दिखाई देती 

समय की अंधेरी रात को भेद कर 

तुम्हारी ही मूरत आ कर,

चिरस्मृति से पूर्ण ध्रुवतारा के वेश में।


हम दोनों बह कर आये हैं 

युगल प्रेम के स्रोत में 

अनादि काल से हृदय के कोर से।

हम दोनों ने खेला है खेल 

करोड़ों प्रेमियों के बीच 

विरह से भरपूर नयनों के जल में,

मिलन के मधुर लाज में —

पुरातन प्रेम के नित्य नूतन सज्जा में।

आज चिर काल के उस प्रेम का 

हुआ है अवसान 

एक राश बन कर तुम्हारे चरणतल में। 


अखिल जगत का सुख और दुःख, 

अखिल जगत के प्राणों की प्रीति, 

एक प्रेम के बीच आ कर मिल गई है 

सभी प्रेम की स्मृति —

सभी काल के सभी कवियों की गीति।


ऐ सखि, प्यार से, जतन से, एकांत के पलों में 


ऐ सखि, प्यार से, जतन से, एकांत के पलों में 

मेरा नाम लिख लेना—

अपने मन के मंदिर में 

मेरे प्राण में जो गान बज रहा 

उसकी लय सीख लेना 

अपने चरणों के नूपुर में।।


सहेज कर रखना, दुलार से आदर से 

मेरे मुखर पाखी को— 

अपने महल के आँगन में।

याद से सखि बांध कर रखना 

मेरे हाथ की राखी —

अपने सोने के कंगन में।


मेरी लता की एक कली 

भूल से उठा कर लगा लेना 

अपने केश के बंधन में।

मेरे स्मरण के शुभ-सिंदूर से 

एक बिंदु अंकित कर लेना—

अपने ललाट के चंदन में।

मेरे मन के मोह के माधुर्य को 

लिपटा कर रख देना 

अपने अंगों की सुरभि में।

मेरा व्याकुल जीवन-मरण 

टूट कर लूट लेना —

अपने अतुल गौरव में।।



तुम रहोगे मौन हो कर 


तुम रहोगे हृदय में मेरे मौन हो कर 

गहन एकाकी पूर्णिमा की निशा की भाँति।

मेरा जीवन-यौवन,  मेरा अखिल भुवन 

तुम भरोगे गौरव से उस रात की भाँति।


जागती रहेगी एकाकी तुम्हारी करुण आँखें, 

तुम्हारे अंचल की छाया मुझे रहेगी ढाके।

मेरा दुःख मेरी वेदना मेरे सफल स्वप्न 

तुम भर दोगे सुरभि से पूर्णिमा की निशा की भाँति।

तुम रहोगे हृदय में मेरे मौन हो कर 

गहन शांत उस रात की भाँति।


Women Face


मेरा प्राण जिसे चाहता है


मेरा प्राण जिसे चाहता है

तुम वही, तुम वही हो 

तुम्हारे सिवाय इस जगत में 

मेरा कोई नहीं, कुछ नहीं 

मेरा प्राण जिसे चाहता है 

तुम वही, तुम वही हो।


यदि तुम्हें सुख न मिले 

जाओ जाओ सुख के खोज में 

मैंने तुम्हें पाया है हृदय बीच 

और कुछ मुझे नहीं चाहिए। 

प्राण जिसे चाहता है 

तुम वही, तुम वही हो।


मैं तुम्हारे विरह में रहूँगा विलीन 

तुम में ही मेरा होगा वास 

दीर्घ दिवस, दीर्घ रजनी 

दीर्घ बरस - मास 

यदि किसी और से प्यार करो 

यदि लौट कर न आओ 

तो तुम जो चाहते हो वही मिले तुम्हें 

चाहे मुझे कितना ही मिले दुख

मेरा प्राण जिसे चाहता है 

तुम वही, तुम वही हो 



जो मेरे सपनों की साथी रही 


जो मेरे सपनों की साथी रही 

उसे मैं कभी समझ नहीं पाया।

दिन बीतते चले गये उसे खोजते खोजते

पर उसे मैं कभी जान नहीं पाया।


किस शुभ क्षण में मुझे तुमने बुलाया,

मेरी लज्जा को ढाक लिया,

तुम्हें सहज में ही समझ लिया।

कौन मुझे लौटाएगा अनादर से, 

कौन मुझे बुलाएगा पास, 

किसके प्रेम की वेदना में 

मेरा कोई मूल्य है, 

इस शंका से हाय मैं 

निरंतर जूझ नहीं पाया—

मैं सिर्फ़ तुमको ही समझ पाया।



तुम्हारे गीत ने स्मृति जगा दी 


तुम्हारे गीत ने स्मृति जगा दी 

और आखें छलछला उठी, 

जैसे बारिश के रुक जाने पर 

चमेली की कली की करुण हँसी।।

जल भरे घने बादलों के साये में 

मृदुल सुरभि फैल गई,

अनदेखे किसी स्पर्श के आघात से 

टलमला कर गिर गई।।

तुम्हारी वाणी की स्मृति आज 

बादल और पवन में व्याप्त है, 

रात्रि में बारिश गिरने की तरह 

मेरे कानो में गूंज रही है।

वह वाणी जैसे गीत में लिखा 

अंकित कर देती सुर की रेखा,

जिस पथ से हो कर हे प्रिये 

 तुम्हारे चरण चिन्ह अंकित हुए।


Women with Flower 


अगर उसे पहचान न पाऊँ 


अगर उसे पहचान न पाऊँ 

क्या वह मुझे पहचान लेगा 

इन नव फाल्गुन के दिनों में —

नहीं मालूम, नहीं मालूम।


क्या वह मेरी कली के कान में 

बात करेगा गानों में, 

उसकी आत्मा को मोह लेगा 

इन नव फाल्गुन के दिनों में—

नहीं मालूम, नहीं मालूम।


क्या वह अपने रंग से फूलों को रंगेगा 

क्या वह मर्म में आ कर नींद चुरायेगा!

नये पत्तियों का मेरा घूँघट 

क्या अचानक उसका छुअन पाएगा,

मेरी गोपन बातों को जान लेगा 

इन नव फागुन के दिनों में— 

नहीं मालूम, नहीं मालूम।


तुम्हें गीत सुनाऊँगा


तुम्हें गीत सुनाऊँगा तभी तो मुझे जगा कर रखते हो 

अरे ओ नींद छीनने वाले 

सीने में हुलस जगा कर तभी तो आवाज़ देते हो 

ओ दुःख जगाने वाले।।


अंधियारा घिर आया, पाखी लौटा नीड़ में,

तरी आया तट पर 

केवल मेरे हृदय को तो विराम न मिला 

अरे ओ दुःख जगाने वाले।।


मेरे काम-काज के बीच, रोने - 

हँसने का दोलन तुमने थमने न दिया।

मेरे प्राण को छू कर, प्रेमसुधा भर कर, 

तुम तो चले जाते हो-

शायद मेरी व्यथा के आड़ में खड़े रहते हो 

अरे ओ दुःख जगाने वाले।।


मेरी याद रहेगी या नहीं 

मेरी याद रहेगी या नहीं,

वो बात मेरे मन में नहीं।

पल पल आता हूँ द्वार तुम्हारे, 

गाता हूँ गीत बिन कारण ही।

बीतते जाते हैं दिन, जब तक हूँ 

राह चलते अगर आ जाएँ पास 

तुम्हारे चेहरे पर चकित सुख की,  

हँसी देखना चाहता हूँ —

इसलिए बिन कारण गीत गाता हूँ।


फागुन के फूल झर जाते हैं, 

फागुन के अवसान पर— 

और कुछ भी तो न जाने,  

दे पल भर को मुट्ठी भर 

दिवस होगा विगत, 

आलोक होगा मद्धिम 

गीत होगा समाप्त,  

थम जाएगी  बीन,

जब तक हूँ भर भर दोगे,   

इस खेला की नाव को ही

इसीलिए गाता हूँ गीत बिन कारण ही।


Three Bauls


यही तुमने अच्छा किया है, हे निठुर, 


यही तुमने अच्छा किया है, हे निठुर, 

तुमने यही किया है भला।

ऐसे ही तू मेरे हृदय में तीब्र ज्वाला जला।

मेरा यह धूप न जलाओ तो 

कोई सुगंध नही फैलती,

मेरा यह दीप न जलाओ तो

कोई उजियारी नहीं होती।

यही तुमने अच्छा किया है, हे निठुर,

तुमने यही किया है भला।


जब मेरा यह चित्त अवचेतन में रहता है 

तुम्हारा दिया आघात ही तो तुम्हारा स्पर्श है 

वही तो  मेरे लिए पुरस्कार है।

अंधियारे में मुझे लज्जा आती 

तुम्हें नैनों से निहार नहीं पाती,

बज्र से दहन कर डालो 

मेरे मन का सब काला।

यही तुमने अच्छा किया है, 

हे निठुर तुमने यही किया है भला 

ऐसे ही तू मेरे हृदय में तीब्र ज्वाला जला।



प्रेम आया था


प्रेम आया था, 

चला गया वह तो द्वार खोल- 

फिर कभी नहीं आयेगा।

शेष है सिर्फ़ आना एक और अतिथि का 

उसी के साथ है शेष पहचान॥ 

वह आ कर दीपक बुझा देगा एक दिन, 

ले जाएगा मुझे रथ पर—

ले जायेगा मुझे किस गृह से गृहहीन 

ग्रह तारका के पथ पर॥ 


उतने समय तक मैं द्वार खोल कर, 

अकेले बैठा रहूँगा,

अपना काम ख़त्म कर लूँगा। 

दिन आयेगा जब  एक और अतिथि के आने का, 

उसे नहीं होगी कोई बाधा लेशमात्र।

पूजा आयोजन सब ख़त्म होगा एक दिन,

तैयार रहना होगा —

चुपचाप दोनों बाहें बढ़ाये, 

उस गृहहीन अतिथि का मैं वरण कर लूँगा।


जो आज चला गया द्वार खोल कर,

वही कह गया बुला कर,

“पोंछो अश्रुजल, अभी एक और 

अतिथि का आना है शेष।"

वह कह गया, गूँथने का काम शेष कर लेना एक दिन 

जीवन के काँटों को बिन कर,

नवीन गृह बीच ले कर आना, तुम गृहहीन,

पूर्ण पुष्पमालाओं का गुच्छा।


तुम्हारे सिवा और कोई नहीं है साथी,

 सामने हैं अनंत जीवन विस्तार-

 काल का सागर  तुम करते हो पार

 पर कैसे कोई नहीं जानता यह।

जानता हूँ सिर्फ़ तुम हो इसलिए मैं हूँ, 

तुम प्राणमय हो इसीलिए मैं जीवित हूँ,

जितना पाता हूँ उतना ही याचना करता हूँ,

जितना जानता हूँ उतना नहीं जानता।


जानता हूँ तुम्हें मैं पाऊँगा निरंतर 

लोक लोकान्तर में युग से युगान्तर -

तुम्हारे और मेरे बीच में कोई नहीं 

कोई बाधा नहीं है इस धरा पर। 



दे जाता हूँ वसंत का यह गान—


वर्ष ख़त्म होगा, मालूम है 

तुम भूल जाओगे यह तान।

फिर भी फागुन की रात में 

इस गीत की वेदना में 

आँखे तुम्हारी छलछला उठेंगी 

इसे ही बहुत मानता हूँ ।

वसंत का यह गान दे जाता हूँ …


बैठे रहना नहीं चाहता 

शेष हो जाने पर वेला

तुरंत ही चला जाऊँगा 

शेष हो जाएगी खेला।

फिर फागुन लौटेगा जब 

तब सुनना फिर से 

नये पथिक के गान में ही 

यह वाणी नूतन।

दे जाता हूँ वसंत का यह गान।



सीमा के बीच असीम हो तुम


सीमा के बीच, असीम हो, तुम बजाते हो अपना सुर, 

मेरे बीच तुम्हारा प्रकाश तभी तो इतना मधुर।

कितने रंगों में, कितनी गंध में 

कितने ही गीतों में, कितने ही छंद में,

अरूप तुम्हारे रूप की लीला में जगा है हृदयपुर।

मेरे बीच तुम्हारी शोभा इतनी ही सुमधुर।

तुम्हारे और मेरे मिलन होने पर सब द्वार खुल जाता है,

विश्वसागर तरंगों की खेला में डोल उठता है। 

तुम्हारे आलोक में नहीं है छाया, 

मुझमें ही वह पाता है काया,

मेरे अश्रुजल में वह सुंदर भी है विकल।

सीमा के बीच, असीम हो तुम, बजाते हो अपना सुर 

मेरे बीच तुम्हारा प्रकाश तभी तो इतना मधुर।



जयश्री पुरवार


सम्पर्क 


मोबाइल : 7905220370

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'

प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण

हर्षिता त्रिपाठी की कविताएं