कुबेर नाथ राय का आलेख 'इतिहास और शुक-सारिका कथा'


कुबेर नाथ राय 


इतिहास को देखने की दृष्टि विभिन्न विचारधाराओं में अलग अलग रही है। इतिहास पर राय व्यक्त करने के लिए इतिहासकार होना जरूरी नहीं। साहित्यकारों ने भी इतिहास को अपने नजरिए से देखने की कोशिश की है। स्वाभाविक रूप से उनकी दृष्टि एक इतिहासकार की दृष्टि से अलग होती है। भारत पर एक लम्बे समय तक मुसलमानों ने शासन किया। स्वाभाविक रूप से इस मुस्लिम शासन के पक्ष विपक्ष में बातें की जाती हैं। एक दृष्टि सेक्यूलर इतिहासकारों की है जिन्होंने अपने विश्लेषण में समन्वयवादी दृष्टिकोण को अपनाया। इस क्रम में हिन्दू मुस्लिम समन्वय पर ध्यान दिया गया। दरअसल इतिहास को सन्दर्भों से काट कर नहीं देखा समझा जा सकता। किसी भी परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए उस समय के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहलू को देखना जरूरी होता है। कुबेर नाथ राय को हम उनके बेहतर निबंधों के लिए जानते हैं। लेकिन इतिहास पर भी उनकी अपनी राय है जिसे उन्होंने अपने एक आलेख में साफ़गोई से व्यक्त किया है। कुबेर जी के इस आलेख में हम उनके उस पारम्परिक रुझान को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं जिसका झुकाव हिन्दुत्व की तरफ है। इस दृष्टि को आज के आलोक में देखने पर बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि कट्टर हिन्दुत्व के क्या खतरे हो सकते हैं। हमारे देश की निर्मिति में हिन्दू संस्कृति के साथ साथ बौद्ध, जैन संस्कृति का एक बड़ा हाथ है। चाहें अनचाहे रूप से हमें इस सूची में मुस्लिम और ब्रिटिश संस्कृति को भी शामिल करना ही पड़ता है। इन सबको पूरा मिला कर ही समग्र भारतीय संस्कृति को देखा समझा जा सकता है अन्यथा उस मूल्यांकन के एकांगी होने का खतरा अधिक है । यह आलेख 'जमदग्नि वीथिका' से साभार लिया गया है जिसे हमें साथी संजय कृष्ण ने उपलब्ध कराया है। उनके प्रति आभार। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कुबेर नाथ राय का आलेख 'इतिहास और शुक-सारिका कथा'।



'इतिहास और शुक-सारिका कथा'


कुबेर नाथ राय


आज का साधारण भारतीय विशेषतः मूर्तिपूजक वर्ग, अपनी बुद्धि को भारतीय राजनीति के केन्द्रीय और प्रान्तीय पुरोहितों के चरणों पर सौंप कर बड़े मौज की तन्द्रा में लीन है। आखिर जब घोड़ा बेच ही दिया तो फिर जुम्मन को घास काटने की फिक्र क्यों सताए ! इधर गत वर्ष देश में प्रान्तीयता और मजहब के नाम पर काफी रक्तपात हुआ। श्वान-पुच्छ न्याय से पुरानी बातें फिर लौटीं। सरदार पटेल और गाँधी जी सभी को याद आने लगे। राष्ट्र के कर्णधारों ने सोच समझ कर तथ्य ढूंढ निकाला कि इन सारी खुराफातों की जड़ इस देश का इतिहास ही है। अतः क्यों न सर्वप्रथम उसे ही दुरुस्त किया जाय! फिर क्या था? गली-कूचे, बाग-बाजार, हर जगह, लोक सभाई विधान सभाई बन्धुओं से ले कर प्रान्त-पतियों और भारत-भाग्य- विधाता के मनसबदारों तक, सभी एक स्वर से कीर वचन बोल उठे। राष्ट्रीयता का सैलाब आ गया। 'भावात्मक एकता' की चर्चा ऐसी चली कि राष्ट्र का सारा बौद्धिक समाज डूब गया। सबने महसूस किया, इतिहास फिर से लिखा जाय। जितने संघर्षपूर्ण स्थल हैं उन्हें या तो हटा दिया जाय या इस रूप में संशोधित किया जाय कि वे 'कुश्ती' की जगह 'आलिंगन' प्रतीत हों। प्रस्ताव की भलमनसाहत से किसी को एतराज नहीं! बिल्कुल भोली-भाली बात है- बाल-सुलभ, हर के अर्थ में सुलभ। पर इतिहासकार का दायित्व क्या है? क्या यह सिद्धान्ततः उचित है कि साहित्य और इतिहास, जो विशेषज्ञों से सम्बन्धित क्षेत्र हैं, एक विशेष नीति या पूर्वाग्रह स्थापित करके लिखे जाएं चाहे उस नीति का सामयिक महत्व कितना भी अधिक क्यों न हो? क्या यह सम्भव नहीं कि व्यक्ति रूप से ऐसी छूट पा जाने पर इतिहासकार गण अपने वर्गों के निहित स्वार्थों के लिए इस सद्भावनापूर्ण लक्ष्य का दुरुपयोग करेंगे? क्या यह कदम मार्क्सवादियों की इतिहास की "पाजीटिव व्याख्या" पुनराकलन (रिवीजन) और 'दिमाग परिष्कार' (ब्रेन वाशिंग) का रूप, आगे चल कर, नहीं धारण कर सकता? इतिहासकारों की अपनी एक मर्यादा होती है। उस मर्यादा को सरकारी नीति से निगड़-बद्ध करने की यह प्रथम भूमिका (यदि 'प्रयास' नहीं तो) समस्त भारत के बुद्धिजीवियों के सामने एक चुनौती, एक प्रश्न चिह्न उपस्थित करती है।


प्रस्ताव का कल्पित अर्थ और फल

तथ्यों के ज्ञापन या अध्ययन की दो प्रक्रियाएं होती हैं "रीजनिंग (विवेचन) और 'रेशनलाइजेशन'। किसी सच्ची बात को सिद्ध करने के लिए जो तर्क पेश किये जाते हैं वे तो रीजनिंग (ऊहा)। किसी मिथ्या की वकालत के लिए जो तर्क बनाए जाते है वह है 'ऊहा' या रेशनलाइजेशन। ऐसा लगता है कि वर्तमान सरकारी इतिहास-नीति 'ऊहा' की और अधिक बल देने वाली है पर इस निष्कर्ष के पूर्व हम इसके लक्ष्य आदि पर प्रथम विचार करें तो अच्छा है।


जहाँ तक लक्ष्य का प्रश्न है तो इसकी ईमानदारी में किसी को शक नहीं हो सकता। भूमिति के साक्ष्यों में प्रतिज्ञा या कथन के दो भाग होते हैं कल्पित अर्थ और किसी को शक नहीं हो फल। हमें प्रस्ताव के कल्पित अर्थ से कोई एतराज नहीं।


इतिहास संशोधन के प्रधान व्याख्याता और हमारी संस्कृति के सरकारी विधाता प्रो० हुमायूं कबीर ने हाल ही में एक लेख लिखा है: 'भारत की राष्ट्रीय एकता'। जो इस देश के अनेक दैनिक पत्रों में प्रकाशित हुआ। उसमें सरकार की इतिहास नीति का भी एक स्पष्ट आभास मिलता है। लेख का आरम्भ इस प्रकार होता है- "भारत के इतिहास में एक ओर तो धर्म और संस्कृति के आधार पर एकत्व की ओर झुकाव दिखाई पड़ता है। दूसरी ओर भाषा, रीति-रिवाज, राजनीति और आर्थिक स्वार्थों के आधार पर टुकड़े-टुकड़े में विभक्त होने की प्रवृत्ति विद्यमान है।" (इन पंक्तियों के लेखक को इसे 'आसाम ट्रिब्यून' में दुर्गापूजा अंक,  1961 में पढ़ने का अवसर मिला) प्रो० कबीर का यह प्रारम्भिक कथन ही भ्रामक और आधारहीन है। भाषा या राजनीतिक आधार पर देश विगत काल में भी विभक्त था पर उस विभक्तता को हमने कभी भी महसूस नहीं किया। हमने कभी भी अनुभव नहीं किया कि तमिलनाडु और बंगाल अलग राष्ट्र हैं-आर्य धर्म परम्परा (वैदिक, द्रविड़, हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख आदि) संस्कृत भाषा और उसकी उत्तराधिकारिणी सधुक्कणी हिन्दी, ये दो सूत्र देश की एकता के विधायक सदैव रहे। भाषा और रीति-रिवाजों के आधार पर नेहरू-युग में संघर्ष का सूत्रपात हुआ और इसका बीज उन लोगों के भाषणों में निहित है जिनमें भारतवर्ष में सर्वप्रथम 'हिन्दी इम्पीरियम' (हिन्दी साम्राज्यवाद) शब्द की रचना की गई। गाँधी-युग में भी भाषा के आधार पर संघर्ष का कहीं भी वृहद रूप दिखाई नहीं देता। ऊपर के वक्तव्य में सत्य को उल्टा रख कर देखने की चेष्टा की गई है। भारत के प्राचीन इतिहास में संघर्ष हुआ है पर विजातीय तत्वों के साथ। अन्त में वे विजातीय तत्व आत्मसात् हो गये और शेष आत्मसात होने की प्रक्रिया में हैं। पर यह सब एक स्वाभाविक नियम के अनुसार होगा, न कि सरकारी कानून द्वारा।


आगे चल कर प्रोफेसर कबीर भी विजातीयता को ही दबी जबान से संघर्ष का मूल कारण मानते हुए प्रतीत होते हैं। उनका कथन है कि बहुत थोड़े से भारतीय ऐसे हैं जो भारत के 'सम्पूर्ण सांस्कृतिक उत्तराधिकार" को अपना निजी समझते हैं और ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं जो एक वर्ग विशेष की संस्कृति और इतिहास को ही महत्व देकर अपने को धन्य मानते हैं। मुसलमान प्राचीन भारत के नायकों यथा राम, कृष्ण, ब्यास, अशोक, चन्द्रगुपत विक्रमादित्य आदि को अपना नहीं मानते हैं। उनके नायकों की परम्परा विदेशी आक्रमणकारियों से चलती है-यथा महमूद गजनवी, "गोरी आदि। हिन्दू भी शेरशाह, अकबर, और बहादुर शाह के प्रति वैसी भक्ति नहीं दिखाते। प्रोफेसर कबीर की स्पष्टवादिता की हम सराहना ही करेंगे।


"(उर्दू के 'राष्ट्रीय' कवि इकबाल जिनकी राष्ट्रीयता का 'रेशनलाइजेशन' (ऊहा-प्रमाण) श्री नेहरू ने 'डिस्कवरी आफ इण्डिया' में दिया है, 'इस्लामी खुदा' से कहते हैं 'ऐ खुदा, इस्लाम के बन्दों ने तेरे नाम पर ही रक्तपात किया है। सब कुछ तेरे लिए-


कौम अपनी जो जर-ओ-माले जहाँ पर मरती

तो बुत-फरोशी के इबज बुत-शिकनी क्यों करती?"


यह देश के लिए दुर्भाग्य सूचक है कि 'भारतीय इतिहास' को हम 'हिन्दू इतिहास' या 'मुस्लिम इतिहास' के रूप में पढ़ें। अतः प्रोफेसर कबीर का यह निष्कर्ष कि भारतीय इतिहास को अ-साम्प्रदायिक रूप दिया जाय, इससे असहमत होने का कोई कारण नहीं।


आपत्ति का धरातल

तब प्रश्न उठता है कि आपत्ति और मतभेद की गुंजाइश कहाँ है, जब हम मूलतः स्वीकार कर लेते हैं कि भारतीय इतिहास असाम्प्रदायिक रूप में लिखा जाय? मतभेद का सूत्रपात होता है इस इतिहास के 'भारतीयकरण' की प्रणाली पर। व्यक्तिगत और वर्गगत पूर्वाग्रहों से रहित सत्य अर्थात 'निष्पक्ष सत्य' का उद्घाटन तो इतिहास का कर्तव्य ही है, इससे कौन इंकार करेगा? पर जब इसका उपयोग इतिहासकार वकील की तरह करने लगेगा और असत्य की वकालत को 'सत्य का संशोधन' का रूप देने लगेगा, तब तो मतभेद अवश्य उपस्थित होगा। प्रोफेसर कबीर ने प्रारम्भिक इतिहास पुस्तकों की चर्चा की है-उस चर्चा से ज्ञात होता है कि सरकार का किस प्रकार के इतिहास की ओर झुकाव है। जो पूर्वाग्रह सरकारी नीति से प्रारम्भिक पुस्तकों में पोषित होगा, उसे सरकार उच्च स्तर पर भी प्रोत्साहन निश्चय ही देंगी। अतः जब कोई अधिकारी प्रारम्भिक इतिहास-पुस्तकों के स्वरूप पर कोई बात करता है तो उस बात के अन्दर सरकार की इतिहास-नीति का लघु-चित्र निहित है। बड़े पैमाने पर वही चित्र बड़ा बन कर आयेगा ही। प्रोफेसर कबीर का कथन सत्य है-"स्कूलों की प्रारम्भिक इतिहास पुस्तकें केवल सच्ची बातें ही बताएं परन्तु ये आवश्यक नहीं कि प्रारम्भिक इतिहास में 'पूर्ण सत्य' दिया जाय। प्रारम्भिक इतिहास में केवल गिने-चुने प्रसंग ही रहें और वे सब प्रसंग जो विविध वर्गों या सम्प्रदायों के संघर्ष एवं घात-प्रतिघात से सम्बन्धित हैं, दिए जायें और इतिहास लेखन में भारतीय जीवन एवं संस्कृति में निहित पारम्परिक सहयोगिता पर बल दिया जाय।” अर्थात् प्रारम्भिक इतिहास पुस्तकों में (जो हायर सेकेण्ड्री स्कूलों तक चलेंगी) 'पूर्ण सत्य' देना आवश्यक नहीं। इनमें 'अर्द्धसत्य' या 'संशोधित सत्य' को ही मान्यता दी जाय, तो अच्छा है।


बात ऊपर से देखने पर उतनी आपत्तिपूर्ण नहीं लगती, जितना उसके परिणाम चिन्तन पर। 'संशोधित सत्य' को मान्यता दे कर हम 'निष्पक्ष सत्य' को उसके चरम अधिकार से वंचित करते हैं। अभी तक तो इतिहासकार का लक्ष्य था कि जहाँ तक हो सके वह 'निष्पक्ष' एवं 'पूर्वाग्रह-हीन' सत्य उपस्थित करे। अब तो वह बात रही नहीं। अब तो एक माध्यमिक (सेकेण्डरी) ध्येय उसके बुनियादी ध्येय के ऊपर बैठा दिया गया। किसी भी घटना या चरित्र के ऊपर 'समग्रता' से विचार करना, उक्त ध्येय के अनुसार, कठिन हो जायेगा। अलाउद्दीन खिलजी की लूट और रक्तपात विश्व के इतिहास में अतुलनीय है। उसने चीजों का भाव स्थिर करने की चेष्टा भी की थी। यह उसने किया था अपने लश्कर-खर्च को कम करने और हिन्दू व्यापारियों के दमन के लिए। पर आज का इतिहासकार उसे वकील की तरह देखेगा। उसके मर्मान्तक अत्याचारों की कथा तो राष्ट्रीयता के नाम पर दबा दी जायेगी और उसका उक्त प्रयत्न एक अर्थशास्त्रीय दूरदर्शिता के रूप में देखा जायेगा। फलतः नये इतिहास में अलाउद्दीन एक अत्यन्त उज्ज्वल चरित्र के रूप में आयेगा-जन-नायक, एवं जन-मंगलकारी शासक के रूप में। पर क्या यह 'सत्य' का मजाक नहीं होगा?


इतिहास के पुनराकलन एवं पुनर्गठन की आवश्यकता हम भी मानते हैं पर 'संशोधित सत्य' के फार्मूले से इतिहास लेखन अपने वर्ग के निहित स्वार्थों का भी पोषण कर सकते हैं। एक नयी किस्म का पूर्वाग्रह गढ़ सकते हैं। श्री नेहरू ने एक ऐसा ही भ्रामक पूर्वाग्रह गढ़ने की चेष्टा 'विश्व इतिहास की झलक' में की है। अलाउद्दीन खिलजी के अध्याय में वे कहते हैं कि उक्त युग के अफगान भारत वर्ष को अपना घर समझ कर अपने को भारतीय मानने लगे थे और हिन्दुओं से शादी ब्याह करने की भी चेष्टा उन्होंने की, एवं अलाउद्दीन की बीवियों में भी कई हिन्दू थीं । (यह शब्द प्रतिशब्द उद्धरण नहीं। पर श्री नेहरू के कथन का सारांश यही है) गोया ऐसा सब हुआ हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य के नाम पर ! पर इतिहास बताता है कि वास्तविकता क्या थी। यदि हिन्दू पूर्वाग्रह या मुस्लिम पूर्वाग्रह से सत्य के आधे या चौथाई पहलू को देखते थे तो इस प्रकार के गढ़े पूर्वाग्रह से हमें सत्य का वह भाग भी दिखाई नहीं पड़ेगा। 'भूषण' की कवितायें आज की पाठ्यपुस्तकों में अनुपस्थित हैं । पद्मिनी हिन्दू कुल में जन्म लेने के कारण भविष्य की पाठ्य पुस्तकों में जाति-बहिष्कृत हो जायेगी। प्रताप एक कबीले का सरदार रह जायेगा और मान सिंह एक राष्ट्रीय नायक के रूप में आयेंगे। महाराष्ट्र वालों की चढ़ी त्योरियों का डर न रहा तो शिवाजी भी काल क्रम से ........


इधर स्वतंत्रता के बाद राजनीति कुछ इस प्रकार हमारे जीवन के हर एक अंग में घुस गई है कि हमें सत्य को छिपाना धर्म प्रतीत होने लगा है। किसी भी व्यक्ति या राष्ट्र के चरित्र की प्रथम एवं अंतिम कसौटी है उसकी सत्य-ज्ञापन एवं सत्य-सहन की क्षमता। प्रौढ़ता का यही लक्षण है। पर हमें असत्य और सत्य को एक-दूसरे में गड्ड मड्ड करना आज के राष्ट्र-कर्णधार ज्यादा सिखाते हैं। अनेक लेखक, नेता और एम. पी. तहे दिल से अनेक असत्य एवं अनर्थकारी तथ्यों को नापसंद करते हैं, पर उन्हें वर्ग-विशेष या व्यक्ति-विशेष के नाखुश होने की चिन्ता अधिक है। उक्त सत्य के पालन एवं ज्ञापन की कम। इसी सिलसिले में एक "संतुलित निंदा" का नवीन सिद्धान्त निकला है, जिसमें वादी प्रतिवादी दोनों की बराबर निंदा करके सबके  तुष्टिकरण की चेष्टा की जाती है। उत्पात अलीगढ़ विश्वविद्यालय में होता है तो सजा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को भी साथ भुगतनी पड़ेगी। अथवा उक्त उत्पात को 'राष्ट्रीयता के नाम पर "चुप, चुप" करके दबा दिया जायेगा। इस "संतुलित निंदा के सिद्धान्त के आधार पर ही श्री दिनकर ने पाकिस्तान बनाने का श्रेय हिन्दुओं को दिया है। प्रो० कबीर ने औरंगजेब के अत्याचारों (लेखक ने 'मुस्लिम' शब्द का प्रयोग नहीं किया है) का उदाहरण देते हुए उसकी भूमिका में ब्राह्मणों द्वारा किये 'अत्याचारों की चर्चा इस प्रकार की है- "जब अभिनव ब्राह्मण धर्म के उदय से बौद्ध धर्म के प्रति अश्रद्धा या दमन का प्रारम्भ हुआ तो भारत का पतन शुरू हुआ।" यदि दमन का भौतिक अर्थ लिया जाय तो इतिहास साक्षी है कि धर्म के नाम पर ब्राह्मणों ने कभी भी रक्तपात नहीं किया। दो एक स्थानीय संघर्षों को छोड़ कर भारत में धर्म के नाम हत्याकाण्ड इस्लाम के पूर्व कभी नहीं हुआ। रही अश्रद्धा की बात। वह तो बौद्धिक धरातल की वस्तु है। यदि बुद्धि ने सुझाया कि यह तथ्य श्रद्धा का पात्र नहीं तो इसे क्या औरंगजेब के अत्याचार के समानान्तर रखा जायेगा? पर 'संतुलित निंदा' का राष्ट्रीय सिद्धान्त यही कहता है।





प्रोफेसर कबीर द्वारा 'संशोधित' सत्य

प्रोफेसर कबीर के अनेक भाषणों और पुस्तकों में ऐसे 'संशोधित सत्यों' की भरमार है जो उन्होंने 'नवीन राष्ट्रीयता' के नाम पर प्रसारित किया है। प्रोफेसर कबीर ने अपनी पुस्तक 'अवर इण्डियन हेरिटेज' (भारत की सांस्कृतिक विरासत या भारत का सांस्कृतिक उत्तराधिकार) में हिन्दू और इस्लामी संस्कृतियों का ऐक्य दिखाने की चेष्टा करते हुए बताया है कि बहुत संभव है कि शंकराचार्य ने अद्वैत की शिक्षा इस्लाम से ग्रहण की हो। कितनी जबरदस्ती है! दो शताब्दियों तक तो इस्लाम एक 'अनुशासन संहिता' मात्र रहा। 'कुरान' के वर्तमान संस्करण में भी दर्श नाम की वस्तु अत्यल्प है। बाद में ग्रीक प्रभाव के फलस्वरूप (या भारतीय प्रभाव के फलस्वरूप) उसमें अद्वैत लाने की चेष्टा इमाम गजाली जैसी प्रतिभाओं ने की जो 10वीं एवं 11वीं शती में उत्पन्न हुई। फिर भी इस चेष्टा से इस्लाम में 'एकेश्वरवाद' और 'अद्वैतवाद' में एक भेद होता है। उसे साधारण दार्शनिक भी जानता है। मुहम्मद साहब का जन्म होता है छठवीं शती में, और उपनिषदों की रचना हुई गौतम बुद्ध के कम से कम 500 वर्ष पूर्व। ऐसी अवस्था में शंकर को इस्लाम का ऋणी बताना बौद्धिक अराजकता है, चाहे उददेश्य कितना भी सुन्दर क्यों न हो। इस अराजकता का वास्तविक श्रेय श्री कबीर को नहीं बल्कि 'कांग्रेसी' इतिहासकार एवं नेहरू दरबार के मनसबदार श्री तारा चन्द को है।


प्रोफेसर कबीर द्वारा 'संशोधित सत्य' का दूसरा उदाहरण उनके गोहाटी विश्वविद्यालय-कमला-लेक्चर' में मिलता है जब उन्होंने अपने शोध का यह तत्व प्रस्तुत किया है कि भारत में इस्लाम का प्रवेश आक्रामक रूप में नहीं बल्कि व्यापारी-एवं नाविक संगठन के रूप में हुआ है। इसी संशोधित सत्य का उदाहरण प्रो० कबीर का विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए "हिन्दुस्तानी" को विश्व सम्मत राष्ट्रभाषा बताना भी है जिस पर 'सरस्वती' सम्पादक पण्डित श्री नारायण चतुर्वेदी ने कड़ी टीका की थी।


इसी प्रकार अन्य उदाहरण प्रोफेसर कबीर के श्री मुख से निकले अनेक वचनों से दिये जा सकते हैं। जब श्री सुनीति कुमार चटर्जी और श्री सुकुमार सेन दशकों पूर्व बहुत पहले से ही असमिया को स्वतंत्र भाषा मानते रहे हैं, तो हमारे प्रोफेसर ने 1952 में वक्तव्य दिया था कि 'असमिया" बंगला की एक बोली-मात्र है। इसका उल्लेख गत वर्ष असमिया के प्रधान साहित्यकार श्री अम्बिका गिरि चौधरी ने किया था। इन पंक्तियों का लेखक प्रोफेसर कबीर की व्यक्तिगत प्रतिभा एवं उनकी देश-भक्ति का कायल है। पर राष्ट्रीय स्तर पर तथ्यों की तोड़-मरोड़ का विरोध हरेक भारतीय द्वारा होना चाहिए, विशेषतः जब कि तथ्यों का सम्बन्ध संस्कृति और इतिहास से है। संस्कृति के विकारों का निराकरण निष्पक्ष हो कर करना आवश्यकता है, पूर्वाग्रह ले कर नहीं। यदि आज का 'हरिजनोद्धार' 'ब्राह्मण-दमन' का रूप धारण कर ले, तो उसका समर्थन कोई भी विवेकशील व्यक्ति नहीं करेगा।


ऊपर के उदाहरणों से स्पष्ट है कि सरकार द्वारा प्रसारित नीति की भावी दिशा क्या होगी। जिस देश के नागरिकों को पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, शिव-अशिव दोनों को राजनीति के नाम पर समान पूजा दे कर स्वीकृत करने की प्रेरणा दी जाती है, उस राष्ट्र की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक बरबादी निश्चित है।


इतिहास-लेखन : एक कठोर संयम

संग्रासी और इतिहासकार दोनों को चराचर-जितेन्द्रिय होना चाहिए। जिस प्रकार संग्रासी व्यक्तिगत भावों और पूर्वाग्रहों का दमन कर के विश्व के प्रति कठोर वस्तुगत (आब्जेक्टिव) दृष्टि रखता है उसी प्रकार इतिहासकार को भी व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों और वर्गगत स्वार्थों की वंचनापूर्ण मरीचिका में, जल-कमल न्याय से, निर्विकार रहना चाहिए। इतिहास लेखक के लिए ऐसे आत्म-संयम की घोर आवश्यकता है और इसी अर्थ में वह 'जितेन्द्रिय' है। इतिहासकार पर साधारणतः तीन प्रकार के पूर्वाग्रह काम करते हैं : धरातल, दिशा और बिन्दु। उसके दृष्टिकोण पर इन तीनों तथ्यों का प्रभाव पड़ता है। एक ही तथ्य तथा प्रान्तीय धरातल पर एक विशिष्ट पक्ष का महत्व रखता है और देशगत धरातल पर दूसरे प्रकार का। प्लासी की हार बंग धरातल पर नवाब की हार थी, अखिल भारतीय धरातल पर अंगरेजी साम्राज्य का बीजारोपण बनी तथा विश्व-धरातल पर औद्योगिक क्रान्ति और आधुनिक सभ्यता के उदय एवं एशिया से मुस्लिम-दर्प के अन्त की शुरुआत बन गई। घटना एक ही रही। पर इतिहास के विविध धरातलों ने उनका महत्व अन्य प्रकारों से दिखाया। दूसरा नियामक तत्त्व है दृष्टिकोण की दिशा। आर्थिक दृष्टिकोण से लिखे गये भारतीय इतिहास में वास्कोडिगामा का आगमन पानीपत की तीसरी लड़ाई से कई गुना अधिक महत्वपूर्ण घटना के रूप में आयेगा। यदि इतिहास की दिशा एक सम्प्रदाय विशेष का स्वार्थ है तो दूसरे सम्प्रदाय के चरित्रों पर वह सच्ची कलम नहीं चला सकता। बदायूँनी के दृष्टिकोण से अकबर कोई अच्छा बादशाह नहीं था, क्योंकि वह हिन्दू प्रजा से भी प्रेम करता था। दरबारी इतिहासकार सदैव राजा की तारीफ लिखते हैं क्योंकि उनका दृष्टिकोण चारू-कथन (या 'चाटु कथन' कहिए) तक ही सीमित होता है। 'रामचरित मानस' की रूसी भूमिका में इस तथ्य का उल्लेख किया गया है कि तुलसी ने रावण युग के बहाने मुगल युग का वर्णन किया है। खेद है कि मुगल युग के इतिहासकार, दरबारी लेखक, बादशाह नामों पर ही अधिक निर्भर रहते हैं पर मध्य युग के हिन्दी साहित्य के भक्तिवादी कवियों ने दैन्य का और जन पीड़न का जो चित्र रावण या कंस या कलियुग की वक्रोक्ति से दिया है उसे भूल जाते हैं। मुगल युग का इतिहास 'मानस' के 'उत्तरकाण्ड के आधार पर रचित होना चाहिए। 'उत्तरकाण्ड' ही जनमत की करुणा और आत्म-निवेदन प्रस्तुत करता है। तीसरा इतिहासकार को प्रभावित करने वाला तथ्य है उसका स्थिति-बिन्दु। दृष्टिपथ का सिद्धान्त चित्रकला का राजमार्ग है। दूर की चीज बड़ी होने पर भी छोटी नजर आती है। दृष्टिपथ या 'पर्सपेक्टिव' का प्रभाव इतिहासकार पर भी पड़ता है। भारत के अन्दर साधारणतः लोग समझते हैं कि विश्व में जो कुछ हुआ वह यहीं हुआ। दूर दराज के यूरोपियन या गोरे इतिहासकार 'ग्रीक' की पुरखागिरि के सामने मिस्र, भारत या चीन की कोई कदर ही नहीं करते। आज के इतिहासकारों में विश्वगत घरातल से हर एक घटना के निरीक्षण करने का फैशन चला है। पर इसी स्थिति-बिन्दु के कारण वे भयंकर भूलें कर बैठते हैं। सबसे विचित्र निष्कर्ष कभी-कभी प्रोफेसर टायनबी देते हैं जिनकी विशालकाय पुस्तक 'ए स्टडी आफ हिस्ट्री' उनकी प्रतिभा का प्रमाण है। और जिनको विश्वव्यापी मान्यता प्राप्त हो चुकी है। टायनबी महाशय ने अपनी पुस्तक 'सभ्यता की परीक्षा' (सिविलाइजेशन आन ट्रायल) में लिखा है कि हिन्दू सभ्यता का उदय वैदिक धर्म पर ग्रीक प्रभावों के कारण हुआ। भारतीय शिल्प पर विशेषतः गान्धार शैली की मूर्तिकला पर, ग्रीक प्रभाव अवश्य है। थोड़ा बहुत ज्योतिष पर भी प्रभाव पड़ा हो तो नहीं कह सकते, क्योंकि इस पर पर्याप्त मतभेद हैं। पर इतने से ही इतना बड़ा निष्कर्ष है कि वैदिक सभ्यता पर ग्रीक सभ्यता के प्रभाव से ब्राह्मण या हिन्दू सभ्यता का उदय हुआ, निरर्थक या अनर्थक प्रयास है तथा घोर पूर्वाग्रह का परिचायक है।


प्रत्येक इतिहासकार को इन धरातलगत, दिशागत और बिन्दुगत पूर्वाग्रहों के बीच 'निष्पक्ष सत्य' खोजना पड़ता है। 'निष्पक्ष सत्य' ही उसका लक्ष्य बिन्दु और आत्म संयम (संभावित अंशों तक) उसकी साधना है। अभी तक चरम रूप में निष्पक्ष सत्य इतिहासकार को नहीं मिला है और न तो शायद मिलेगा। फिर भी सापेक्ष सत्य के लिए भी निष्पक्षता का आदर्श "सत्य सत्य के लिए, न कि सत्य एक नीति विशेष के लिए" यह नारा इतिहासकार के लिए अंधकार की लाठी है। इस लाठी का परित्याग करने पर उसके पास कोई मार्गदर्शक नहीं रह जायेगा।


हम चाहते हैं कि भारतीय इतिहास निष्पक्ष रूप से आत्म संयम के साथ लिखा जाय। हिन्दू और मुस्लिम भाषा एवं पूर्वाग्रहों का परित्याग कर के। मुस्लिम शासन काल में केवल काले धब्बे ही नहीं, सुनहले बिन्दु भी हैं। शेरशाह और अकबर, मीर कासिम और बहादुर शाह ऐसे ही सुनहले बिन्दु हैं जिनका अभिनन्दन हिन्दू-मुसलमान-सिख-ईसाई सभी उसी भांति करें जिस तरह वे अशोक-विक्रमादित्य, पृथ्वीराज, प्रताप, शिवाजी और रणजीत सिंह का करते हैं। उसी भांति हिन्दू और मुसलमान दोनों के अन्दर सत्य सहने की इतनी क्षमता हो कि वे अत्याचारी की निन्दा सहन कर सकें, चाहें वह कोई भी क्यों न हो। प्रत्येक भारतीय को स्वीकार करना होगा कि मुहम्मद गोरी विदेशी आक्रामक था, पर शेरशाह एक स्वदेशी बन्धु। शेरशाह को स्वदेशी स्वीकार कर के गोरी के बारे में मौन धारण कर लेना या तो कायरता है अथवा भयंकर चालबाजी। यदि इतिहास लम्बा इतिहास है तो वह पूर्व और उत्तर दोनों पक्षों पर भी निर्भीक निर्णय देगा। यदि इस आब्जेक्टिव एवं नकार बौद्धिकता को मानने की क्षमता देश के अन्दर न आई तो भावात्मक एकता कभी नहीं आयेगी। महमूद गजनवी को जब एक वर्ग अपना पुरखा मानता रहेगा, तो दूसरा वर्ग अपनी घृणा और अपमान को बिलकुल भूल कर चुप रहेगा, यह सामाजिक मनोविज्ञान के प्रतिकूल है। कोई भी व्यक्ति जो मुसलमान था इसी से स्वदेशी माना जाना चाहिए। यह दुराग्रह देश को शायद ही स्वीकार होगा। साथ ही कोई भी व्यक्ति मुसलमान है इसी से वह विजातीय है, यह भी उसी किस्म का दुराग्रह है जो तथ्यहीन और भ्रामक है। नवीन भारतीय इतिहासकार इन दोनों दुराग्रहों से युद्ध कर के राष्ट्र को सत्य दृष्टि प्रदान करें, यही हमारी कामना है। आज यदि वह इन दोनों दुराग्रहों को ललकारता नहीं है तो द्रोणाचार्य की तरह उसे राष्ट्र का चीरहरण फिर 1947 की तरह, देखना पड़ेगा। "सत्यं वद, धर्म चर" की जय हो।



धर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रीय संस्कृति

कभी-कभी अधकचरे प्रगतिशीलों द्वारा और कभी-कभी कटूटरपंथी अ-हिन्दू बन्धुओं द्वारा यह प्रश्नपत्रों में आजकल उठाया जा रहा है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य में सरकारी मंत्री होली दिवाली क्यों मनाते हैं अथवा सरकारी प्रकाशनों के मुख पृष्ठों पर हिन्दू प्रतीकों द्वारा सजावट क्यों होती है एवं राजकीय समारोहों पर अभ्यर्थना-पद्धति एवं श्रृंगार-विन्यास में भी हिन्दू-धर्म द्वारा समादृत कला-प्रतीकों को क्यों महत्व दिया जाता है। दो-तीन वर्ष पूर्व कलकत्ते के एक उर्दू दैनिक में एक समाचार पढ़ा था कि असम राज्य के एक मंत्री महोदय ने महात्मा गाँधी की मूर्ति को माल्य-प्रदान करने से इसलिए इंकार कर दिया कि उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस लगने का उन्हें भय हो गया, यद्यपि अरब, मिस्र या अफगास्तिान के राजदूतों के मन में यह ठेस का भाव उठा ही नहीं। इस कार्य की कुछ क्षेत्रों में टीका-टिप्पणी होने के कारण 'जमैयत-उल-उलमाए-हिन्द', जो मुस्लिम बुद्धिजीवियों की "प्रमाणित" राष्ट्रीय संस्था है, की ओर से यह वक्तव्य निकला कि मंत्री महोदय का उक्त कार्य इस्लाम की शिक्षाओं के अनुकूल हुआ है और कोई भी भारतीय मुसलमान गैर-इस्लामी नायक या नेता के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए बाध्य नहीं है। वक्तव्य की प्रामाणिकता का तो पता नहीं, पर उक्त घटना असम के अनेक व्यक्तियों के मुँह से सुनी गई है। ये सब बातें मन में कुछ प्रश्नों को उठाती हैं। किसी देश के सांस्कृतिक उत्तराधिकार और उसके सम्प्रदायों में क्या सम्बन्ध है? हिन्दू-धर्म और हिन्दू-संस्कृति दो वस्तुएं है या एक? भारतीय संस्कृति कितने अंशों तक हिन्दू संस्कृति है ? क्या "भारतीय हिन्दू =+0" का समीकरण सत्य है? धनात्मक शून्य को सरकारी पैमाने पर कितना मूल्य मिलना चाहिए? क्या धर्मनिरपेक्ष राज्य से हिन्दू कला प्रतीकों को निष्कासित कर देने पर यह देश 'भारत' जैसा लगेगा अथवा 'अरब' या कला और हिन्दू भावधारा एवं वांग्मय के 'वेटिकन सिटी' (पोप- राज्य) जैसा? ये सारे प्रश्न हमें राष्ट्रीय संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता के सामंजस्य पर विचार करने को बाध्य करते हैं। ये प्रश्न ऐसे हैं जिन्हें भलेमानस लोग शील-मुरव्वत के कारण या धूर्तता के कारण उठाना नहीं चाहते। पर राष्ट्रीय जीवन के पीछे से प्रश्न प्रेत की तरह लगे हैं और इन्हें खटाई में डालने की अपेक्षा वीरतापूर्वक इनका सामना करना देश के लिए अधिक हितकर होगा। श्री आर० देवनन्दन ने. जो बंगलौर के कैथोलिक चर्च के मुख्य अधिकारी हैं, अखिल भारतीय एकता सेमिनार में अपना मत व्यक्त किया था कि सेमेटिक धर्म (इस्लाम और ईसाई) की प्रवृत्ति आर्य धर्म, विशेषतः हिन्दू धर्म से भिन्न है, एवं इन सेमेटिक धर्मों की मूल आत्मा है प्रचार अभियान (मिशनरी कम्पेन), जिसे राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए हिन्दू धर्म को 'बर्दाश्त' करना होगा। हम भी मानते हैं कि धर्मनिरपेक्ष ढाँचे में प्रचार अभियान की स्वतंत्रता एक विशेष सीमा तक ही सही, देनी ही होगी। यह तो ठीक ही है। पर साथ ही यह भी ठीक है कि यह 'बर्दाश्त' एकांगी नहीं होगा। सेमेटिक धर्मों को भी आर्य वातावरण में बहुत सी बातों को "बरदाश्त" करने के लिए तैयार होना होगा। सहिष्णुता के बिना राष्ट्रीय जीवन एक डग भी आगे नहीं चल सकता। पर सहिष्णुता द्विपक्षीय होती है, एकांगी नहीं। हमें आज द्विपक्षीय सहिष्णुता का सूत्र खोजना है। इस सांस्कृतिक धार्मिक संतुलन का मूल खोजने के लिए आवश्यक है कि हम धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय संस्कृति के बीच के सूक्ष्म सम्बन्धों का विवेचन करें। इस विवेचन में उपर्युक्त सारे प्रश्नों का उत्तर अपने आप आ जायेगा।




2

संस्कृति शब्द को परिभाषा की मुश्कें चढ़ा कर हम अधिक दूर तक नहीं जा सकते हैं। इससे तो अच्छा है कि इसकी कुछ सीमाएं ही निर्धारित की जायें। टी० एस० इलियट ने अपनी पुस्तक 'ए नोट टु वाईस द रिफोनिशन ऑफ कल्चर' में यही पद्धति अपनायी है। संक्षेप में, संस्कृति जीवन के किसी अंश ही नहीं, बल्कि जीवन के पीछे जो उत्स या संस्कार काम करते हैं, उनकी समूहवाचक संज्ञा है। जब हम किसी देश या जाति की संस्कृति की चर्चा करते हैं तो उसकी परिधि भोजन-वस्त्र-शयन-आवास सम्बन्धी अभिरुचि से ले कर उस देश या जाति की कलात्मक चेतना एवं दार्शनिक चिंतन धारा सब कुछ आ जाते हैं। ये सारे संस्कार एक दो पीढ़ी नहीं, बल्कि भूतकाल से आये हुए उस वर्ग विशेष के समूहगत चेतन या 'समष्टि मानस' (कलेक्टिव कांशसनेस या कलेक्टिव माइंड) से प्रत्येक व्यक्ति भी उत्तराधिकार रूप में प्राप्त होते हैं। युंग के मनोविज्ञान का यह स्वीकृत तथ्य है कि मानस की अनेक वृत्तियाँ जातिगत होती हैं जो आनुवांशिक क्रम से पिता से पुत्र, पुत्र से पौत्र तक उसी रूप में जाती हैं जिस तरह चेहरे की बनावट और नाक नक्शा। यह समष्टि-मानस उक्त वर्ग के सारे समष्टि मानसों में विकेन्द्रित पड़ा रहता है। पर यह प्रकृति की भयंकर शक्तिशाली योजना है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को अज्ञात रूप में ग्रहण करनी पड़ती है। यह समष्टि मानस राजनीतिक कानूनों या वातावरण के दबाव से नहीं बदला जा सकता। राजनीतिक कारण या वातावरण का दबाव समष्टि मानस में परिवर्तन भले ही ला दे। हाँ, यही व्यष्टि मानस का परिवर्तन जब बहुत बड़ी संख्या में और दस बीस या सौ वर्षों तक लगातार होता रहता है और यदि यह परिवर्तन मूल समष्टि मानस में सुपाच्य है तो स्वतः यह समष्टि मानस की एक नई शक्ति बन जाता है। समष्टि मानस वह विशाल वट वृक्ष है जो शाखा प्रशाखा फोडता हुआ आगे बढ़ कर छा जाता है। कालान्तर में मूल तना सड़-गल कर नष्ट हो जाने पर भी उसकी शत जटाएं धरती को विदीर्ण कर एक-एक तना बन कर खड़ी रहती हैं और विविध प्रकार की भूमियों से रस शोषण कर के सम्पूर्ण वृक्ष जाल के पत्ते-पत्ते गुम्फ-गुम्फ तक रस पहुँचाती हैं।


इस समष्टि मानस में ही समस्त जातीय प्रतीक एवं उनकी जननी जातीय अभिरुचि के संस्कार बसे रहते हैं। यहाँ हमारा तात्पर्य बौद्धिक कलात्मक दार्शनिक अभिरुचि से लेकर खानपान-सम्बन्धित अभिरुचि तक सबसे है। इन्ही अभिरुचियों के संस्कारों की समूहगत संज्ञा है 'संस्कृति'।


सभ्यता और संस्कृति में अत्यल्प अन्तर होता है। कई जगहों पर दोनों का प्रयोग एक ही अर्थ में किया जाता है। ऐसा लगता है कि सभ्यता बाह्य व्यंजना है और संस्कृति अंतर्निहित 'भाव'। जैसे एक कलाकार की कल्पनाओं का भाव उठता है वह स्थूल प्रस्तर या चित्र पट रूप मे 'व्यंजित 'होता है, उसी भांति सभ्यता भी संस्कार समूह (अर्थात 'संस्कृति') की स्थूल व्यंजना है। साथ ही सभ्यता में बहुत कुछ स्थूल नवीनता भी निहित रहती है जो जातीय संस्कार से उद्भूत न हो कर बाहर से प्रविष्ट है। यदि यह नवीनता सुपाच्य है तो वह जातीय संस्कार में अपना स्थान कालान्तर मे बना लेगी। पर जबरदस्ती या कृत्रिम दृष्टि से परिवर्तन लाने पर व्यष्टि मानस तक ही सीमित रहेगा और काल प्रवाह में पड़ कर विलीन हो जायेगा। उदाहरण के लिए फारसी बोली 16वीं शती में उत्तर प्रदेश के रईसों की खास पहचान थी। उन रईसों के बेटे चाहे लाख सर मारे पर वह हमारी सभ्यता में पच नहीं सकी है और काल के प्रवाह से अंधकार में विलीन हो चुकी है। पर संस्कृत भाषा का महत्त्व मुगल और खिलजी भी नहीं मिटा सके।


अब देखना है कि समष्टि मानस या जातीय मानस किन-किन तत्वों से संस्कारों का ग्रहण एवं पोषण करता है। ऐसे मूलतः दो स्त्रोत है : धर्म और सौन्दर्योपासना ।


आदिम काल से मनुष्य के मन पर इन दो प्रधान प्रवृत्तियों का आधिपत्य है। भयंकर बिजली की चमक और कड़क, आँधी-तूफान, वन्या, घोर वृष्टि, तप्त मरुभूमि, विविध रोग और मृत्यु आदि घटनाओं ने उसके मन में ईश्वरीय भय उत्पन्न कर दिया।


साथ ही वृष्टि, अच्छी फसल एवं सुखकर प्रभात-संध्या, आदि ने ईश्वरीय कृतज्ञता को जन्म दिया। भय और कृतज्ञता इन्हीं दोनों भावों से धर्म की उत्पत्ति हुई। दूसरी ओर सनातन प्रकृति में कुछ ऐसी वस्तुएं मिली जो मनोरम थीं पर उनका कोई उपयोगितापरक मूल्य नहीं था। रंगीन प्रभात, नील-पिंगल संध्या, चाँदनी रात, घनी-घनी हरीतिमा, तरह-तरह के फूल आदि ऐसी घटनायें उसे अभिभूत हुई जिससे उसका मन उल्लसित हो उठा। इनकी उपयोगिता नहीं थी, अतः उपर्युक्त कृतज्ञता बोध के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं था, पर उल्लास की उसे अनुभूति हुई। यही अर्थहीन उल्लास उसकी द्वितीय वृत्ति सौन्दर्योपासना का जनक बना। इन्हीं दो प्रकार की प्रवृत्तियों से जो-जो संस्कार मनुष्य को आनुवांशिक क्रम से पीढ़ी दर पीढ़ी मिलते गये जिनकी समूहगत संज्ञा है 'संस्कृति'। ये ही संस्कार हमारे खान-पान, वेश-भूषा, भाषा-साहित्य, नियम-कानून, शासन-पद्धति-समाज गठन, चित्रकला मूर्तिकला आदि नाना रूपों में 'व्यंजित' हुए । इन्हीं 'व्यंजनाओं' की समूहगत संज्ञा है सभ्यता।


जहाँ तक सौन्दर्योपासना का प्रश्न है, उसका स्थान तो संस्कृति में स्पष्ट है। संस्कृति की स्पष्टतम व्यंजना कला और साहित्य में ही होती है क्योकि इनका जन्म जातीय सौन्दर्य-संस्कृति से होता है। उदाहरण के लिए नीलवर्ण नयन या कंजी आँखे हमें चित्ताकर्षक नहीं लगती उनमें एक प्रकार की भाव शून्यता विराजती है। नील वर्ण नयन भारतीय मानस को निरंजनता, निर्विकारता, शिशुता का बोध कराते हैं, पर वे विभ्रम या 'भाव-सबलता' उत्पन्न कराने में असमर्थ लगते हैं। यह हमारी जातीय सौन्दर्य-दृष्टि (जिसकी दूसरी संज्ञा है 'जातीय अभिरुचि') का परिणाम है। मृग-मीन-कमल से परिचय होने के कारण हम मृगनयनी, मीनाक्षी, कमल-नयन आदि तो अनुभूत कर जाते हैं, पर 'नरगिस' जैसी आँखों की कोई अनुभूति नहीं होती क्योंकि 'नरगिस' क्या वस्तु है, हमें नहीं मालूम है। भारतीय संस्कृति की जातीय सौन्दर्य-दृष्टि में यहाँ के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नदी-पहाड़ एवं कवि-परम्परायें तथा कवि प्रसिद्धियां (जिन्हें अंगरेजी मे 'मोटिफ' कहते हैं) आदि ही विद्यमान रहेंगे। "उर्वशी के पदघात से नन्दन वन का अशोक मुकुलित हो गया ऐसा पढ़ कर लगता है कि हमने कुछ अनुभूत किया। "पर उर्वशी की आँखे सत्तर हीरों से जुड़ी हुई ऐसा पढ़ कर हमें भद्दापन के सिवाय और कुछ अनुभूत नहीं होता। परन्तु एक ईरानी बन्धु इसी को पढ़ कर झूम उठेगा। इस जातीय सौन्दर्य-साधना में न केवल अपने देश की प्रकृति एवं वातावरण का हाथ रहता है वरन् ऐतिहासिक घटनायें, लोक कथाओं और महाकाव्यों के चरित नायकों एवं त्योहारों-उत्सवों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहता है। ये चरित नायक देश के मन में कितना रमे रहते हैं और जातीय जीवन को कितनी गहराई तक प्रभावित किये हुए हैं इसका परिचय गत महायुद्ध में मिला। सोवियत सरकार के रूसी लेखकों ने जनता का आत्म-बल जगाने के लिए साम्राज्यवादी सम्राट पीटर महान और बोल्गा नदी का विजय-स्तवन-गान किया था। हमारे देश में कृष्ण बुद्ध-शिव आदि कला प्रतीक के रूप में बहुत पहले से सम्मानित हैं। जब ये कला प्रतीक के रूप में हमारे सामने आते हैं, तो उक्त स्थल पर इनका कोई सम्बन्ध नहीं । 'कुमार-सम्भवम्', रीतिकाल की कविताएं एवं मुगलों तथा लखनवी नवाबों का प्रिय कत्थक नृत्य आदि विशुद्ध कला प्रतीकों की उपासना प्रस्तुत करते हैं। इनमें यदि 'धर्म' का भाव निहित होता तो कालिदास अपने "जगतः पितरौ" की सम्भोग चेष्टा का वर्णन न करने जाते। यह विशुद्ध सौन्दर्योपासना है।


सौन्दर्योपासना जीवन को सत्य, शिव और सुन्दर प्रदान करने की धर्म-निरपेक्ष (सेक्यूलर) प्रणाली है। यह धर्म सम्प्रदाय वर्ग की शर्तों के ऊपर की सोचना है जिसमें किसी भी सम्प्रदाय का व्यक्ति भाग ले सकता है। दूसरे शब्दों में, संस्कृति का यह 'सेक्यूलर' पहलू है। परन्तु संस्कृति ने, चूंकि जीवन को समग्र रूप से बाँधा है अतः अन्य तथ्यों, अन्य प्रवृत्तियों का भी उस पर प्रभाव है जिनमें मुख्य प्रवृत्ति है धर्म, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है।


टी० एस० इलियट का कथन है कि धर्म और संस्कृति में कोई विशेष अन्तर नहीं। दोनों एक ही तथ्य के दो पहलू हैं। संस्कृति को धर्म का 'पुनर्जन्म' कह सकते हैं। इलियट का यह कथन सत्य है, पर आधारित होते हुए भी अधिक अलंकारपूर्ण शैली मे व्यंजित है। इलियट स्वतः कट्टर कैथोलिक हैं अतः उसकी भावुकता ही उसकी उक्त अतिशयोक्ति का कारण है। यदि धर्म और संस्कृति दोनों एक ही रहते तो चीनी संस्कृति में इस्लाम और बौद्ध धर्म दोनों कैसे चलते? स्वतः ईसाई धर्म का विकास ग्रीक-रोमन संस्कृति के ढाँचे में हुआ है। यह ढाँचा उक्त धर्म को इतनी दूर तक प्रभावित करता है उसका 75% हिब्रू स्वभाव (जिससे मूलतः वह पैदा होता है) आज शून्य में विलीन है। अतः धर्म और संस्कृति दोनों एक ही नहीं है। हाँ, उनके बीच गहरा सम्बन्ध अवश्य है। इस स्थल पर मैथ्यू आर्नाल्ड का दृष्टिकोण अधिक निष्पक्ष और भावुकता-पूर्वाग्रह-हीन ज्ञात होता है। उसका कथन है कि


(1) संस्कृति, धर्म की अपेक्षा, अधिक व्यापक सत्ता है एवं 

(2) धर्म द्वारा संस्कृति को नैतिक आधार तथा "थोड़ा-सा" रागात्मक स्पर्श मिलता है।


किसी संस्कृति के नैतिक आधार के लिए 'धर्म' आवश्यक है। पर जहाँ तक रागात्मक-स्पर्श या भाव साधना का प्रश्न है उसके लिए धर्म ही एकमात्र साधन नहीं। संस्कृति के पास उससे व्यापक साधन विद्यमान है और वह है सौन्दर्योपासना, जो मानव मन की उतनी ही बलशाली वृत्ति है जितनी कि धर्म। महाप्रभु चैतन्य को जो रागात्मक स्पर्श धर्म के माध्यम से मिला, वही कत्थक नृत्य मे लखनवी नर्तक को सौन्दर्य दृष्टि द्वारा प्राप्त हुआ। दोनो का आधार है, राधा-कृष्ण-प्रेमलीला। पर रागानुभूति का माध्यम अलग-अलग है। फलतः 'राग' के स्वभाव मे भी अन्तर है। प्रथम का आनन्द केवल गौड़ीय वैष्णव ही प्राप्त कर सकता है, परन्तु द्वितीय का आनन्द हिन्दू-मुसलमान-ईसाई सभी प्राप्त कर सकते हैं, यद्यपि कला प्रतीक दोनों रागों में उभयनिष्ठ है।




(3)

संस्कृति के तीन धरातल होते हैंः व्यक्तिगत, समूहगत और क्षेत्रगत। उत्तर प्रदेश का एक ब्राहमण 'क' है और एक चमार है 'ख', तथा तमिलनाडु का एक ब्राह्मण 'ग'। 'क' के संस्कारों में कुछ व्यक्तिगत विशेषताएं रहेगी और कुछ ऐसी भी जो 'ग' के साथ उभयनिष्ट होगी कि दोनों ब्राह्मण हैं। साथ ही बहुत सी बातों में 'क' और 'ख' दोनों समान रूप से भाग लेंगे, क्योंकि दोनों उत्तर प्रदेश के निवासी हैं। यद्यपि एक है ब्राह्मण और एक है शूद्र। संस्कृति पर विचार करते समय हमें यह 'त्रैत' सदैव ध्यान रखना चाहिए। संघर्ष वहीं प्रारम्भ होता है जब समूहगत संस्कृति के स्तर पर व्यक्तिगत या क्षेत्रगत संस्कृति-स्तर की बात घुसेड़ने लगते हैं। जो व्यक्ति किसी सम्प्रदाय का होता है तो उसके व्यक्तिगत संस्कार उसी समुदाय की भावभूमि पर पोषित होते हैं- समूहगत संस्कारों का सम्बन्ध समुदाय से तभी होता है जब समूह की कसौटी केवल सम्प्रदाय विभाजन ही हो। क्षेत्रीय संस्कृति-स्तर से तो सम्प्रदाय का तो कोई सम्बन्ध ही नहीं। मुसलमान के लिए स्वाभाविक है कि अरब के लिए उसके व्यक्तिगत संस्कारों में आस्था रहे। पर क्या यह वास्तविक नहीं है कि समूहगत स्तर या क्षेत्रगत स्तर पर उसके संस्कारों का नियमन राष्ट्रीय संस्कृति के प्रतीक करें क्योंकि वह भी भारत के महान उत्तराधिकारी का उतना ही अधिकार है जितना की हिन्दू का। पर कैसी अस्वाभाविक बात है कि वह अपने उत्तराधिकार का अपमान करने में ही अपनी मर्दानगी मानता है? चीनी मुसलमान चीनी संस्कृति पर, इण्डोनेशियाई मुसलमान इण्डोनेशियन संस्कृति पर, फारसी मुसलमान फारसी संस्कृति पर गर्व कर सकता है, तो हिन्दी मुसलमान हिन्दी संस्कृति गर्व करने में इस्लाम के नाम पर बट्ट्ठा लगाना क्यों मानता है?


हम बता चुके है कि धर्म और संस्कृति एक ही तथ्य नहीं। धर्म संस्कृति को नैतिक आधार और अत्यल्प रागात्मक स्पर्श देता है। जहाँ तक नैतिक आधार का प्रश्न है, मूलभूत नैतिकता सभी धर्मो में एक ही है। जहाँ तक सम्प्रदायगत नैतिकता का प्रश्न है, वह उक्त सम्प्रदाय तक ही सीमित है। पर समूचे देश के लिए जो नैतिक मापदण्ड चाहिए, वे हैं सत्य, दया, क्षमा, ईमानदारी, मानव-प्रेम आदि। इससे किसी मुल्ला-मौलवी या पादरी-पंडित का झगड़ा नहीं हो सकता। अब रही उक्त अत्यल्प रागात्मक स्पर्श की बात। भारतीय संस्कृति के अन्दर रागात्मक स्पर्श या भाव-साधना हिन्दू को तो 'धर्म' एवं 'सौन्दर्योपासना' दोनों माध्यमों से प्राप्त हो सकती है, परन्तु एक मुसलमान और एक ईसाई से हम निश्चय ही इस रागात्मक स्पर्श को पाने के लिए 'धर्म' का माध्यम अपनाने का दुराग्रह नहीं कर सकते। ऐसा हमें अधिकार नहीं। पर दूसरा माध्यम सौन्दर्योपासना है। यह धर्मनिरपेक्ष (सेक्यूलर) माध्यम है। इसके द्वारा, वह अपने को ईमानदारी से भारतीय मानता है तो निश्वय ही भाव-विभोर होगा और अपनी संस्कृति के प्रति उल्लास अनुभूत करेगा। यदि ऐसा नहीं तो निश्चय ही दाल मे काला है।




(4)

भारत में इस्लाम अफगानों और तुर्की द्वारा लाया गया। इस्लाम का तुर्क-संस्करण उसके अरबी-ईरानी संस्करण से भिन्न है। अरबी-ईरानी इस्लाम प्रगतिशील और सहिष्णु धर्म था। जब ईसाई मत असहिष्णुता एवं वैचारिक दासता में जकड़ा हुआ था, उस समय अरब जगत में काफी सहिष्णुता थी। इस्लाम की छत्र-छाया में यहूदी-ईसाई चर्चों की विविध शाखाएं स्वतंत्रतापूर्वक चल रही थीं। सीरिया बहुत काल तक 'नेस्टेरियन' चर्चा का केन्द्र था जब कि मसीहा के व्यक्तित्व पर मतभेद के कारण यूरोपीय ईसाई जगत में उनका क्रूरतापूर्वक दमन हो रहा था। पर भारत में इस्लाम ने क्रूरता एवं आमूल परिवर्तन की नीति ले कर प्रवेश किया। चीन या हिन्देशिया में ऐसा नहीं हुआ। माओत्से तुंग जन्मतः (सम्भवतः) मुसलमान है, यद्यपि आज वह किसी वर्ग से सम्बन्ध नहीं रखता। उसके नाम को देख कर हम यही कह सकते हैं कि वह चीनी है। इससे अधिक नहीं। पर भारत में ऐसा नहीं। यहाँ पर तो राजपूतों या भूमिहार ब्राह्मणों के वंशज कमसार के मुसलमान 'सिंह' या 'शर्मा' नहीं लिख कर अपने को अमुक 'खाँ' लिखने में गर्व करते हैं, यद्यपि इस 'खाँ' का इस्लाम से कोई सम्बन्ध नहीं। यह मंगोलों की वंशगत उपाधि है जिन्होंने प्रारम्भ में इस्लाम को क्षति ही पहुँचाई, बाद में जा कर इस्लाम ग्रहण कर लिया। चंगेज खाँ, जो शामनी मत (बौद्ध धर्म की एक शाखाः 'श्रमणिक') का अनुयायी था। बगदाद की मस्जिदों को उसी तरह ध्वस्त किया जैसे औरंगजेब ने हिन्दू मन्दिरों को। यह भी एक विचित्र बात है कि विश्व का सबसे हत्याकारी विजेता बौद्ध धर्म से, अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, सम्बन्धित हैं।


मूल कुरान में उदारता का उपदेश बिखरा पड़ा है। उदाहरण के लिए- "ऐसी कोई भी जाति नहीं जहाँ (खुदा ने) कोई रहनुमा न भेजा हो।" (35:24) " प्रत्येक कौम के लिए एक न एक पथ प्रदर्शक अवश्य दिया गया है।" (13:17)


"ओ मुहम्मद! तेरे पहले भी हमने पैगम्बरों को भेजा है। कुछ का नाम तुझे बताया गया है और कुछ का नहीं।" (40:78)


कुरान शरीफ में यहूदी-ईसाई धर्मो के पूर्व पुरूषों का नाम गिनाया गया है। ग्रीक महापुरूषों के भी नाम हैं। सिकंदर का नाम पैगम्बरों की सूची में आता है (मेण्यबुकः ए कम्पेनियन टु वर्ल्ड लिटरेचर)। राम और कृष्ण का, बुद्ध और व्यास का नाम इसलिए नहीं आया कि भारतीयों से उस समय अरबों के साथ अधिक सांस्कृतिक सम्बन्ध नहीं थे। आगे हजरत ने कई आयतों में (8-18,, 48-11) मुसलमानों को स्पष्ट आज्ञा दी है कि वे किसी कौम के पैगम्बर का अपमान न करें, क्योंकि सभी परम पिता के संवाहक हैं। वे विश्वास सिर्फ हजरत की बातों का ही करें, पर सम्मान सबका करें। यह है इस्लाम की मूल आज्ञा और हजरत मुहम्मद का मूल वचन। पर भारतीय इतिहास का साक्ष्य इसके उल्टा है। यहाँ तो शाहजहाँ जैसे कलाप्रिय मुसलमान ने भी मथुरा के मन्दिरों को धराशायी किया।


यह है इस्लाम का वास्तविक रूप और एक धर्मनिरपेक्ष ढाँचे में, एक विजातीय संस्कृति के वातावरण में, एक गैर-सेमेटिक जाति के अन्तर्गत इस्लाम इसी रूप में विकास कर सकता है। आमूल परिवर्तन का नारा आज अव्यवहारिक है। आमूल परिवर्तन का चक्र तब चल सकता है जब दिल्ली पर मुस्लिम शासक बैठे। पर इस प्रजातंत्र में यह असम्भव है।





(5)

सौन्दर्य दृष्टि का ही दूसरा नाम है अभिरुचि। रुचि को विकृत करने का अर्थ ही है संस्कृति की आत्मा को विकृत करना। कला और साहित्य में यह अभिरुचि प्रतीकों के माध्यम से प्रदर्शित होती है। किसी भी देश की जातीय अभिरुचि की जानकारी उक्त देश के कला कौशल और साहित्य से प्रदर्शित होती है और कला कौशल से साहित्य जिस 'छन्द' में प्रदर्शित होते हैं वे प्रतीक हैं। उदाहरण के लिए 'कमल' प्रतीक को लें। यह जातीय मानस के अन्दर बड़ी गहराई तक जड़ समाये हुए है। मूर्तिकला, चित्रकला, स्थापत्यकला, काव्य वह सबमें समाहित है। भारतीय चित्रकला एवं मूर्तिकला में अंग विश्वास भी कमल 'छन्द' पर आधारित होते हैं। छन्द का अर्थ वह 'मीटर' या 'वृत्त' नहीं बल्कि आकृति का पैमाना है। उदाहरण के लिए शिव, बुद्ध या किसी देवी अथवा अप्सरा के चरणों को चित्रित या उत्टंकित करते समय पाँचों उँगलियों का आकार-मुड़ाव विकसित पद्यदलों के 'छन्द' व पैटर्न में बनाया जाता है। अधरों एवं पलकों में भी छन्द विद्यमान रहता है स्तम्भों की सजावट तथा भीतरी छत के केन्द्र में केन्द्र-प्रसारी-अल्पना वृत्त सब कमल के खिले आकार का अनुगमन करते हैं। मन्दिरों के शिखरों की तैयारी चाहे गिरिशिखरपरक (पिरामिडनुमा) हो। उन्नतोदर शिखर (जगन्नाथपुरी) हो अथवा नसोदर (जैसे रामेश्वरम्), परन्तु शिखर पर कमलदल या कमल मुकुल अवश्य विद्यमान रहता है। यहाँ तक कि ताजमहल के गुम्बज का अन्तिम शिखर भी कमल के उल्टे छन्द से सुशोभित है। जहाँ तक काव्य और दर्शन का सम्बन्ध है. कमल प्रतीक पर आधारित भाव धाराओं का गहन जाल बिछा हुआ है। इसी तरह अन्य भी लोकप्रिय प्रतीक हैं, यथा सिंह, हाथी, बैल, सर्प, गाय, मयूर, हंस, कोकिल, कदंब, पीपल, वट, देवदारू (विशेषतः शिखरों की बनावट में) राधाकृष्ण, त्रिभंगिकृष्ण, नटराज, बुद्ध आदि। इन सब प्रतीकों को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बहिष्कृत कर दें तो सारा देश कुरूप हो जायेगा, अभिरुचि विकृत हो जायेगी एवं मानसिक संस्कारों के लिए कोई भूमि नहीं रह जायेगी कि वे पनप सकें। भारतीय कला और साहित्य, चिन्तन और दर्शन के बिना जी नहीं सकते। इन प्रतीकों के बहिष्कार का अर्थ होगा भारतीय कला-साहित्य एवं चिन्तन की मृत्यु क्योंकि भारतीय कला-साहित्य एवं चिन्तन की वर्णमाला उक्त प्रतीक ही है और सरकारी नीति यदि इन प्रतीकों का बहिष्कार धर्म-निरपेक्षता के नाम पर करेगी तो साहित्य, कला और चिन्तन को भी प्रकारान्तर से बहिष्कृत करेगी। अब तो राजे-महाराजे-सामन्त साक्षात नहीं रहे, सेठ-साहूकार भी कुछ दिनों के लिए ही हैं। ऐसी स्थिति में सरकार ही एक मात्र आश्रयदाता रहेगी और वह धर्मनिरपेक्ष के साथ संस्कृति-निरपेक्ष भी हो जाय, तो वह द्वार भी बन्द! वास्तविकता तो यह है कि हमारी संस्कृति ने, इस देश में जो गुणगान एवं सुर हैं पहले से ही अपना लिया है। उदाहरण के लिए पक्षी वर्ग में, शुक-सारिका, चकोर, चातक, नीलकण्ठ, गरुण, हंस, मयूर आदि पहले से ही भारतीय भाव-साधना में विद्यमान हैं। बचा है क्या? कौआ, तीतर, कठफोड़वा, भुचेंग, चील, जाँधिल और सारस। धर्म-निरपेक्षता के नाम पर यदि कुरूपता की साधना करनी हो, विकृति को सिर आँखों पर चढ़ाना हो तो ठीक है, कौआ, चील ही समावृत हों। मध्य प्रदेश की सरकार ने 'गधा बनाम गणेश जी' के झगड़े में 'गधा' का पक्ष समर्थन कर अम-निवारण पहले से ही कर दिया है। उत्तर प्रदेश और विहार की राजनीतिक प्रतिभायें भी निकट भविष्य में जौहर दिखायेंगी ही। हाँ, बंगाल, महाराष्ट्र, मैसूर, मद्रास अवश्य ही इस धर्मनिरपेक्षता की पाठशाला में विकृति उपासना की दीक्षा बहुत बाद में लेंगे। सिंहल के ईसाई चित्रकार जार्ज केट ने, जो चित्रकला की आधुनिक शैली में एशिया भर का प्रतिनिधित्व करते हैं, 'गीतगोविन्दम' के आधार पर 'क्यूबिस्ट'-शैली में कुछ चित्रों की रचना की है। उनका समादर विश्व के हर भाग के चित्रकला के प्रेमी करेंगे। पर भारत में वे चित्र सिर्फ 'हिन्दू चित्र' ही माने जायेंगे। क्या दुर्भाग्य है! ऊपर के लम्बे विवेचन का तात्पर्य यह है कि धर्मनिरपेक्षता बढ़ कर करनी चाहिए। यही कर्तव्य है, जिसका पालन करना राष्ट्रीय जीवन के लिए आवश्यक संस्कृति-निरपेक्षता नहीं बननी चाहिए। राष्ट्रीय संस्कृति की आराधना सभी वर्गों करनी चाहिए।यही कर्तव्य है जिसका पालन करना राष्ट्रीय जीवन के लिए आवश्यक है। हिन्दू-बौद्ध-जैन-सिख-आर्यसमाजी आदि संस्कृति में रागात्मक स्पर्श धर्म और सौंदर्योपासना दोनों माध्यमों से पा सकते हैं, एवं मुसलमान-ईसाई सौन्दर्योपासना मात्र धर्म द्वारा। इस्लाम का मूल रूप बहुत आसानी से उपर्युक्त ढाँचे में मेल खा सकता है, और इस्लाम का यही रूप उदात्त और हजरत-प्रणीत है। फिर यदि भारतीय मुसलमान दावा करें कि गैर मुसलिम प्रतीकों एवं गैर मुसलिम नायकों को वे समादर नहीं देते, तो यह दावा असत्य है। दारा, सिकन्दर, सोहराब, रुस्तम, बहराब, चंगेज, मूसा, सुलेमान, दाउद, युसूफ (जोजेफ), इसहाक (आइजक), अफलातून, अरस्तू आदि में कोई भी मुसलमान नहीं। ये सब नायक यूनान, फारस या सीरिया में इस्लाम के जन्म के पूर्व पैदा हुए थे। इस्लाम का जन्म तो ईसा की 6वीं शती में होता है। फिर भी भारतीय मुसलमानों द्वारा लिखित साहित्य में इन नायकों का समादर है। इसी तरह ईसाई धर्म में भी ग्रीक-रोमन और हिन्दू संस्कृति के प्रतिनिधियों से उदासीनता नहीं। तो फिर राम-कृष्ण, बुद्ध-व्यास, अशोक-विक्रम, कनिष्क शालिवाहन पर ही क्यों एतराज हो?

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'

प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण

हर्षिता त्रिपाठी की कविताएं