शर्मिला जालान का आलेख 'स्त्री कविता का वितान : पहचानी हुई अनिवार्य स्थितियों का सजीव चित्रण'
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| शर्मिला जालान |
पुरुष और स्त्री जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। एक के बिना इस गाड़ी के आगे बढ़ने की कल्पना नहीं की जा सकती। ऋग्वेद में इन्द्राणी का कथन है कि 'मैं समाज में मूर्धन्य हूँ। मै अग्रगण्य हूँ और उद्भट वक्ता हूँ।' 'अहं केतुरहं मूर्धाऽहमुग्रा विवाचनी।' इन्द्राणी का यह कथन संकेत करता है कि मैं बलहीन नहीं हूँ, अपितु बलयुक्त हूँ। मूर्धन्यता उसने अपने बूते प्राप्त किया है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में स्त्री को अर्द्धांगिनी अर्थात पुरुष आधा भाग कहा गया है। 'अर्द्धो वा एष आत्मनः यत पत्नी'। इसके बावजूद स्त्रियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता रहा। महिलाओं ने बराबरी का जायज हक पाने के लिए अपना संघर्ष जारी रखा। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को ख़ास बनाने की शुरुआत आज से 115 बरस पहले यानी 1908 में तब हुई, जब क़रीब पंद्रह हज़ार महिलाओं ने अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में एक परेड निकाली। उनकी मांग थी कि महिलाओं के काम के घंटे कम हों। तनख़्वाह अच्छी मिले और महिलाओं को वोट डालने का हक़ भी मिले। एक साल बाद अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने पहला राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का एलान किया। इसे अंतरराष्ट्रीय बनाने का ख़याल सबसे पहले क्लारा ज़ेटकिन के ज़ेहन में आया था। क्लारा एक वामपंथी कार्यकर्ता थीं। वो महिलाओं के हक़ के लिए आवाज़ उठाती थीं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का सुझाव, 1910 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में कामकाजी महिलाओं के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दिया था। इसी क्रम में पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड में मनाया गया। इसका शताब्दी समारोह 2011 में मनाया गया। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का निर्धारण 1917 में जा कर तय हुआ। जब रूस की महिलाओं ने रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल ऐतिहासिक थी। ज़ार के सत्ता पलट के पश्चात रूस की अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया। उस समय रूस में जूलियन कैलेंडर चलता था जबकि बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर का प्रचलन था। इन दोनों की तारीखों में कुछ अन्तर था। जूलियन कैलेंडर के मुताबिक 1917 की फरवरी का आखिरी इतवार 23 फरवरी को था जबकि ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन 8 मार्च था। इसी घटना की स्मृति में 8 मार्च को पूरी दुनिया में महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को आधिकारिक तौर पर 1977 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्रदान कर दी गई थी। शायद ही कोई कवि ऐसा हो जिसकी कविताओं में स्त्री किसी न किसी रूप में न आती हो। माँ, बहन, पत्नी, बेटी जैसे अनेकानेक रिश्ते हैं जिसका जिक्र इन कविताओं में आता है। शर्मिला जालान ने चार कवियों प्रयाग शुक्ल, लाल्टू, शिवदयाल और आशीष शुक्ल की कविताओं के हवाले से स्त्री कविता के वितान की तहकीकात करने का प्रयास किया है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई इस कामना के साथ कि दुनिया की सभी महिलाएं मानवीय गरिमा के साथ अपना जीवन व्यतीत समानता और स्वतंत्रता के साथ व्यतीत कर सकें। इस अवसर पर पर पहली बार हम क्रमिक रूप से प्रमुख स्त्री स्वरों को प्रस्तुत कर रहे हैं। इस क्रम में आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं शर्मिला जालान का विशेष आलेख 'स्त्री कविता का वितान : पहचानी हुई अनिवार्य स्थितियों का सजीव चित्रण'।
'स्त्री कविता का वितान : पहचानी हुई अनिवार्य स्थितियों का सजीव चित्रण'
शर्मिला जालान
जब हम कविता के लिए समय निकालते हैं, कविता के पास जाते हैं, तब कविता पढ़ते हुए उसके अंदर के संसार से विविध ढंग से समृद्ध होते हैं।
वर्षों से कविता की पाठक हूँ। कविता में डूबते–उतरते हुए कविता के विभिन्न पक्षों को देखा-पढ़ा और जाना है। विशेषकर स्त्री संसार को देखना, पढ़ना और जानना स्त्रियों के अंधेरों और उजालों की और नजदीक से यात्रा करना है।
हर कवि का अपना सच, अपनी रुचि, अपनी समझ और अपनी दृष्टि होती है और यह उनकी परंपरा पर भी निर्भर करता है जिसमें कोई कवि लिखता है।
स्त्री जगत की समूची सचाई को कोई कवि समेटेगा ही, ऐसी पूर्णता और समग्रता का दावा नहीं किया जा सकता। कवि की स्त्री दृष्टि सीमित हो सकती है इस अर्थ में कि स्त्री को संबोधित करते हुए, उसे समझते हुए, बहुत सारा भाग छूट भी जाता है।
स्त्री जीवन का परिसर कविता में बहुत विस्तृत है। हम यह भी जानते हैं कि स्त्री जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा घर-परिवार और उसका पड़ोस होता है। यह पहली इकाई है, जहाँ से स्त्री संसार की समझ विकसित होती है। अक्सर कवि उसी घर-परिवार, पड़ोस पर दृष्टि डालते हुए अपनी भाषा को वहाँ ले जाता है, जहाँ स्त्री जीवन की जटिलताएँ और बारीकियां हैं। वह स्त्री जीवन की सच्चाई से संबंध बनाता है और संवाद करता है। कवि जितनी सूक्ष्म दृष्टि से स्त्री संसार को देखता है उतनी ही सघनता, विपुलता, उत्कंठता, स्त्री के संसार में उसे दिखाई पड़ती है। स्त्री संसार अपनी उष्मता, सूक्ष्मता और अपने सहज उच्छ्वास में भी कविता में आता है।
हम जानते हैं कि आधुनिक समय में स्त्रियों का जीवन जितना सरल हुआ है, उतना ही जटिल भी हुआ है। स्त्री के अंतर्जगत में कई प्रकार के द्वन्द्व दिखाई पड़ते हैं। कविता में स्त्री के अंतर और बाह्य जगत की जितनी परतें दिखाई देती उतनी शायद ही किसी अन्य अनुशासन-समाजशास्त्र, इतिहास आदि में मिलती है।
स्त्री संसार का विशाल वितान हिन्दी कविता में है। कवियों ने स्त्री जीवन पर करुणा के साथ लिखा है। पर सब जानना और सब पर बात करना संभव नहीं है। यहाँ स्त्रियों पर रची गई चार कवियों की कुछ कविताओं पर बात करूँगी।
मैंने यहाँ जिन कविताओं को चुना है, उन में आते हुए मानवीय संबंध और स्त्री संसार का एक पाठकीय दृष्टि से अनुभव साझा करूँगी।
जो कविताएं चुनी है उसको चुनने के पीछे कोई विशेष आग्रह नहीं है। इसका पहला आधार तो यह है कि वे कविताएं जो मैंने पिछले कुछ सालों में पढी और याद रह गई। दूसरी बात यह है कि वे कविताएं जो पकड़ में आ गई।
सबसे पहले वरिष्ठ कवि प्रयाग शुक्ल के कविता संग्रह- ‘बीते कितने बरस’ की कुछ कविताओं पर बात करूँगी, जिनमें है –‘दोपहर को एक स्त्री’, ‘वहाँ’ और ‘स्त्रियाँ लाती थीं मीलों दूर से भर कर घड़े'।
इन कविताओं में स्त्री के जीवन के विभिन्न पहलुओं को उभारा गया है—शहरी और ग्रामीण संघर्षों से ले कर व्यक्तिगत बेचैनी तक। स्त्रियाँ दैनिक जिम्मेदारियों, सामाजिक असुरक्षाओं और कठिनाइयों से जूझती हैं। वे परिवार का पोषण करती हैं, कठिन श्रम करती हैं, और बाहरी तनावों के बीच आंतरिक शांति खोजती हैं।
कविता ‘दोपहर को एक स्त्री’ में एक स्त्री के साधारण जीवन और उसकी आंतरिक मानसिक अशांति को दर्शाया गया है। बाहरी वातावरण में शहरी शोर, बच्चों की आवाज़ और दैनिक गतिविधियाँ हैं, लेकिन अंदरूनी रूप से वह स्त्री वैश्विक तनावों और व्यक्तिगत बेचैनी से जूझ रही है।
कविता ‘वहाँ’ में स्त्री विभिन्न रूपों में चित्रित है—बूढ़ी स्त्री धूप में बैठी है। एक अन्य स्त्री सब्जी काट रही है, और छोटी-सी बहन अपने भाई को संभाल रही है। दंगों के बाद का तनाव और स्त्रियों की दैनिक जिम्मेदारियाँ कविता में साधारण जीवन और असुरक्षा की झलक देते हैं।
‘स्त्रियाँ लाती थीं मीलों दूर से भर कर घड़े’
खड़े थे कई बच्चे तितर-बितर नहीं था पानी।
बिजली नहीं थी।
कीचड़ था।‘
आँधी चलती थी बूँदे गिरती थीं
रोती थीं कविता की दुनिया में रात को नदियाँ।
घोंसले बनते थे उजड़ते थे।
(‘स्त्रियाँ लाती थीं मीलों दूर से भर कर घड़े’)
कविता में ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों और स्त्रियों के संघर्ष को दर्शाया गया है। पानी की कमी, बिजली का अभाव, और कठिन श्रम के बीच स्त्रियाँ मीलों दूर से पानी लातीं, बच्चियाँ दिन भर बर्तन माँजतीं। परिवार टूटते, बच्चे गुम हो जाते, और जीवन संघर्षों से भरा होता।
नवे दशक में सामने आए सुपरिचित कवि लाल्टू जिनका मूल नाम हरजिंदर सिंह है की कविता ‘छोटे शहर की लड़कियाँ’ उन लड़कियों की भावनाओं को दर्शाती है, जो बाहरी रूप से चुप और सीमित दिखती हैं, लेकिन उनके भीतर सपनों, भावनाओं और विद्रोह की उथल-पुथल चलती रहती है। ये लड़कियाँ एक दिन अपनी चुप्पी तोड़ कर समाज की बंदिशों से बाहर निकलेंगी और स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ाएंगी।
‘कितना बोलती हैं
मौक़ा मिलते ही
फ़व्वारों-सी फूटती हैं…
एक दिन पौ-सी फटेंगी
छोटे शहर की लड़कियाँ’
(‘छोटे शहर की लड़कियाँ’)
अपने संग्रह –‘कौन देखता है, कौन दिखता’ में ‘मुंशीगंज की वे’ गद्य कविता –
‘देर रात तक धंधा कर चुकने के बाद स्त्रियाँ अपने बच्चों की खबर लेतीं। उन्हें सोता देख कर या जगे हुओं को सुला कर वे खुद सोने की तैयारी करतीं। उनमें से जो पुरानी थीं, उन्हें अपने जिस्म से घिन नहीं आती थी। वे इस पर सोचती भी नहीं थीं। अगली सुबह रोज़मर्रा के काम की चिंता अवचेतन में लिए वे सो जातीं। उनका हर दिन एक जंग है ऐसा कवि सोचते हैं, दरअसल ऐसा कुछ भी नहीं था। फुर्सत में पीर भरे गीत गातीं और उल्लास के गीत गातीं। वे रोतीं और हँसती।’
(‘मुंशीगंज की वे’)
मुंशीगंज की महिलाओं की अँधेरी दुनिया का वर्णन किया गया है जो शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना करती हैं, लेकिन फिर भी अपने बच्चों की देखभाल करतीं, अपने धंधे से जुड़े झमेलों का सामना करतीं और कभी-कभी धार्मिक गतिविधियों में भी शामिल होती हैं। इनकी ज़िंदगी एक अनवरत संघर्ष है, जिसमें वे अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं और समाज की उपेक्षाओं से जूझते हुए जीती हैं।
'मुंशीगंज की स्त्रियां' कविता जीवन की पीड़ा, संघर्ष और तात्कालिक सामाजिक असमानताओं को उजागर करती है। ये महिलाएँ समाज के बहिष्कृत वर्ग का हिस्सा हैं, जिनका जीवन एक अंतहीन संघर्ष में बदल जाता है। वे अपने सपनों, धोखे और दर्द के बावजूद जीवन को जीने की कोशिश करती हैं, लेकिन उनका अस्तित्व समाज में अक्सर अनदेखा रहता है।
'मुंशीगंज की स्त्रियां' शोषण और संघर्ष में जीती हैं, प्यार के सपने देखती हैं लेकिन धोखा पाती हैं। उनका जीवन रोज़ की जंग है, जिसमें वे शरीर की उपेक्षा कर जीती हैं। समाज में सुधार की उम्मीद है, पर बदलाव धीरे-धीरे आता है।
वरिष्ठ कवि कथाकार वैचारिक लेखन के लिए विख्यात शिवदयाल जी ने अपने नए संग्रह – ‘ताक पर दुनिया में’ कविता ‘तुपकाडीह टीसन पर दो औरतें’ में एक दृश्य के माध्यम से स्त्रियों के आपसी संवाद और उनकी दुनिया को गहराई से समझने का प्रयास किया है। कवि धीमी रफ्तार से गुजरती ट्रेन की खिड़की से दो औरतों को देखता है, जो अपने संसार में पूरी तरह से डूबी हुई हैं। उनके बीच का संवाद इतना गहन और व्यक्तिगत है कि कवि को लगता है जैसे समय उनके चारों ओर ठहर गया हो।कवि सोचता है कि उनके बीच किस तरह की बातें हो रही होंगी। क्या वे अपने परिवार, ससुराल, जीवन के दुख-सुख, या समाज की चुनौतियों पर चर्चा कर रही होंगी? यह बातचीत एक रहस्य है, और इस संवाद के भीतर जीवन के कई पहलू छिपे हैं। उन दो औरतों के लिए बाहरी दुनिया का कोई खास मतलब नहीं है।
महाकाय बोकारो इस्पात संयंत्र और धुआँ से भरा आकाश, जो उनके पास ही है, वह भी उनके संवाद के सामने महत्वहीन लगता है। उनकी दुनिया उनकी बातचीत और आपसी संबंधों में सिमटी हुई है। उनका आपसी संवाद मानो एक ऐसा स्थान है जहाँ वे अपने दुख-सुख साझा करती हैं और एक-दूसरे के साथ अपने जीवन के अनुभवों को बाँटती हैं।
कवि को लगता है कि दुनिया के रहस्य दो औरतों की बातचीत में खुलते हैं। उनकी बातचीत के माध्यम से जीवन के गहरे सत्य, रिश्तों की पेचीदगियाँ और समाज की असलियत सामने आती हैं।
शिवदयाल जी की ‘मीनू मैम...’ कविता शृंखला की पहली कविता ‘मीनू मैम का पर्स’ में
घर से निकलते-निकलते उसे टाँग लेती हैं वे
यंत्रवत् न जाने कितनी बार टटोलना पड़ता है
उसे दिन भर में
आइडेन्टिटी कार्ड और डाक्टर का प्रेस्क्रिपशन
कुछ जरूरी गोलियाँ नोट और रेजगारियाँ
चुकाए जाने वाले बिल खरीदे गए सामानों की
कुछ रसीदें टेलीफोन डायरी, नेलकटर और
पसीने और प्रसाधन की मिली-जुली गंधवाला
एक लेडिज रूमाल!
………….
जब कि मीनू मैम की पर्स में बंद है
मीनू मैम का वजूद’
(‘मीनू मैम का पर्स’)
पर्स को प्रतीक बना कर एक स्त्री के जीवन और उसकी दैनिक चुनौतियों को दिखाया गया है। पर्स में बंद चीजें उसके अस्तित्व और जीवन के विभिन्न पहलुओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। आइडेन्टिटी कार्ड, डॉक्टर के प्रेस्क्रिप्शन, जरूरी दवाइयाँ, नोट्स, रसीदें, और बाकी चीजें उसके जीवन की जिम्मेदारियों, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति और उसकी पहचान का हिस्सा हैं। पर्स उनके पूरे अस्तित्व और जीवन के संघर्षों का प्रतीक है। वह इसे हमेशा अपने साथ रखती हैं, और दिन भर की ज़रूरतों के लिए बार-बार इसका इस्तेमाल करती हैं। यह उनके जीवन में संगठित रहने और अपनी जिम्मेदारियों को निभाने का एक जरिया है। पर्स उनके आत्मसम्मान और मुकाबले के हौसले का प्रतीक बन गया है। उन्हें अपने स्वास्थ्य, आर्थिक जिम्मेदारियों और व्यक्तिगत जरूरतों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
जब मीनू मैम घर लौटती हैं, सबसे पहले पर्स अलग करना चाहती हैं, लेकिन उसी में उनका अस्तित्व भी समाया हुआ है।
इस शृंखला की दूसरी कविता ‘मीनू मैम की हँसी’ मीनू मैम की हँसी को उनके जीवन की चुनौतियों और छोटे-छोटे खुशियों के संदर्भ में देखती है। इस हँसी को बहुत संजोकर रखा गया है और इसे तभी व्यक्त किया जाता है जब जीवन में छोटे-छोटे, दुर्लभ खुशियों के क्षण सामने आते हैं।
उनके एरियर और इन्क्रीमेन्ट मिलने पर, सहकर्मी की लिफ्ट, बॉस की प्रशंसा, बच्चों का प्यार और उनकी उपलब्धियाँ, बुजुर्ग पति की छोटी-छोटी चेष्टाएँ—ये सभी घटनाएँ उनकी हँसी के स्रोत हैं। ये पल उनकी व्यस्त और कठिन दिनचर्या में मिलने वाली खुशियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
मीनू मैम की हँसी जीवन के विरल आनंद के क्षणों का सम्मान है। जब उन्हें इन छोटे-छोटे पल मिलते हैं, तो वे अपनी हँसी के माध्यम से उन पलों का उत्सव मनाती हैं। यह हँसी उनकी संतुष्टि और संघर्षों के बीच मिलने वाली खुशियों का प्रतीक है।
तीसरी कविता ‘मीनू मैम की बिन्दी’ में बिन्दी को एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है, जो मीनू के जीवन में आए बदलावों को दर्शाती है। यह बिन्दी मीनू के युवावस्था से ले कर ‘मैम’ बनने तक की यात्रा को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत करती है।
कविता की शुरुआत में मीनू के माथे पर एक समय में भरपूर सिन्दूर और उसके चमकते हुए चेहरे की छवि दिखाई गई है। सिन्दूर और बिन्दी को मीनू के उस जीवन से जोड़ा गया है जब वह मीनू थी, जीवन में नयापन, ताजगी और आत्मीयता थी। उसका माथा तब सुबह के लाल सूरज की तरह चमकता था, जो उसकी भावनात्मक, वैवाहिक और व्यक्तिगत जीवन की ऊर्जा को दर्शाता है। समय के साथ मीनू ‘मैम’ बन गई, और उसके माथे की बिन्दी अब सिन्दूर के बजाय प्लास्टिक की चिपकाई हुई बिन्दी में बदल गई। यह बदलाव उसकी जिम्मेदारियों, पेशेवर जीवन, और उसकी दिनचर्या का प्रतीक है। अब वह शोख और भावनात्मक जीवन से हटकर एक व्यावहारिक, पेशेवर जीवन में प्रवेश कर चुकी है। यह परिवर्तन उसकी पहचान और व्यक्तित्व में भी परिलक्षित होता है।
हालांकि, अब भी कभी मीनू मैम फुर्सत के रोमानी पलों में होती हैं, तब उनके माथे पर मखमली बिन्दी की झलक दिखाई देती है। यह रोमांटिक ‘चेंज’ उस मीनू की याद दिलाता है, जो अब भी कहीं अंदर जीवित है। यह दिखाता है कि जीवन के व्यावहारिक और कठिन समयों के बावजूद, मीनू मैम के अंदर का पुराना भावनात्मक और प्रेमपूर्ण व्यक्तित्व कभी-कभी उभर आता है।
समकालीन हिंदी कविता के सशक्त कवि आशीष त्रिपाठी जब स्त्री प्रसंग पर कविता रचते हैं तब उनकी कविताओं में समाज मे जड़ जमाई हुई अनीति प्रकट होती है। स्त्री के विद्रोह, अनकहे कष्ट को उनके नए कविता संग्रह- ‘शांति पर्व’ के चार खण्डों में से एक ‘सिंदूर की डिबिया’ में पढ़ा जा सकता है। सदियों से स्त्रियों पर शोषण करने वाले पुरुषों, स्वर्णो के अपराध के लिए उनके हाथ क्षमा में जुड़े हुए हैं। करुणा से ओतप्रोत अद्भुत संगीत कविता के भाव संसार में दिखाई देता है। उनकी स्त्री संदर्भ की कविताएँ स्त्री जीवन को समझना और बदलना चाहती है। उसके अलक्षित कोनों में जाना चाहती है, जिसका साक्ष्य ‘सिंदूर की डिबिया (एक गर्भवती स्त्री का त्रासद स्वप्न)’ कविता में देख सकते हैं।
‘मेरे भीतर मेरी बिटिया तीन महीने की
जैसे एक पूरी गुड़िया लाल कनेर के फूल सी…’
(कविता ‘सिंदूर की डिबिया)
(एक गर्भवती स्त्री का त्रासद स्वप्न)’
इसमें एक गर्भवती स्त्री के गर्भ में एक छोटा सा प्राणी है। वह स्त्री को अमंगलकारी ढंग से सोचने के लिए विवश कर देता है। वह शिशु लड़की ही होगी यह कौन जानता है! लेकिन स्त्री सोचती है कि वह लड़की ही होगी। एक ऊब और अमानवीय वातावरण में उनकी इस कविता में ब्योरेवार वर्णन है जिससे एक ऐसे संसार की सृष्टि होती है जो करुणा पैदा करता है। स्त्री का गर्भवती होना कोई अनहोनी घटना नहीं है लेकिन इसी घटना में कवित्व है। सिंदूर की डिब्बी औरों के मन में एक पारंपरिक प्रतीकात्मक अर्थ पैदा कर सकती है पर यहाँ वह कवि की संवेदना को अलग ढंग से छूती है और उनकी रचना भूमि बनती है। इस तरह यह कविता अप्रतिम है।
‘मेरी अदेखी दुनिया में
कि अचानक उगा वह बनैला नाखून।'
सिंदूर की डिबिया एक ऐसा सुलभ सुरक्षित कवच और कक्ष है, जहाँ बच्ची को छुपाया जा सकता है। पर आज के समय में कोई भी सुरक्षित स्थल विश्वसनीय नहीं रहे। वे सभी असुरक्षित स्थल में बदल गए है।
इस तरह यह कविता अपनी कल्पनाशीलता, प्रयोगशीलता, में अप्रतिम है। आशीष त्रिपाठी की कविता का स्त्री संसार वस्तुतः वह लोक सामान्य जीवन है जो अति सामान्य समझ कर अलक्षित रह जाता है।
एक और कविता को देखिए -
‘पटकी हुई थाली
रात के सन्नाटे को चीरती अभी अचानक गूँजी है थाली पटकने की आवाज़
जैसे किसी गौरैया ने शोर मचाया है घोंसले की ओर बढ़ते साँप को देख
जैसे घनघोर जंगल के गाँव में किसी आदिवासी ने निकाली है चेतावनी की संकेत-ध्वनि ख़तरा भाँप…..
सोचते हैं घर के मालिक
आखिर आज हुआ क्या है ऐसा
कि हमेशा चुप रहने वाली घरेलू औरत ने
पटकी है आज यूँ इस तरह यह थाली
सब वैसा ही तो है जैसा रहता है बरसों से
जब से आई है घर में यह औरत’
(‘पटकी हुई थाली’)
कविता में एक घरेलू स्त्री के आक्रोश और उसकी विद्रोहात्मक प्रतिक्रिया को थाली पटकने की प्रतीकात्मक आवाज़ के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। कविता में रात के सन्नाटे को चीरती हुई अचानक थाली पटकने की आवाज़ आती है, जो एक चुप और सहनशील स्त्री के भीतर छुपे दर्द और आक्रोश का विस्फोट है।
घरेलू स्त्री के आंतरिक संघर्ष और उसके लंबे समय से दबे हुए विद्रोह की अभिव्यक्ति है। यह थाली पटकना उस दमन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का प्रतीक है, जिसे समाज और परिवार के लोग अनदेखा करते आए हैं।
कविता में थाली पटकना एक सामाजिक चेतावनी की तरह प्रस्तुत किया गया है, जैसे किसी गौरैया ने अपने घोंसले की ओर बढ़ते हुए साँप को देख कर शोर मचाया हो या किसी आदिवासी ने जंगल में ख़तरा भाँपकर चेतावनी दी हो। यह क्रिया घोंसले को बचाने या ख़तरे से आगाह करने की कोशिश का प्रतीक है। थाली पटकना इस बात का संकेत है कि घर की व्यवस्था में कुछ गहरे असंतोष और दमन हैं, जिन्हें अब तक नज़रअंदाज किया गया था। हालाँकि, ताकतवर औरतें जल्द ही स्थिति को सँभालने और सब कुछ शांत करने की कोशिश में लग जाती हैं, यह सोचते हुए कि यह अस्थायी विद्रोह है और अगले दिन वह औरत फिर से अपने सामान्य कार्यों में लग जाएगी—पानी भरना, चौका-बर्तन करना, रोटी पकाना।
‘क्षमा में जुड़े हैं मेरे हाथ’- कविता में समाज की चुप्पी, झूठे आश्वासन और चालाकियों का उल्लेख है, जो स्त्री के दर्द को और गहरा करते हैं।
समाज उसे सिर्फ एक वर्ग, जाति या लिंग के आधार पर देखता है और उसके इंसानी होने को नजरअंदाज कर देता है। इस उपेक्षा और तटस्थता ने उसके संघर्ष को और जटिल बना दिया है।
‘क्षमा में जुड़े हैं मेरे हाथ
मैंने कोई अपराध नहीं किया तुम्हारी जानिब
फिर भी क्षमा में जुड़े हैं मेरे हाथ’
(‘क्षमा में जुड़े हैं मेरे हाथ’)
कवि खुद को दोषी महसूस करता है, भले ही उसने प्रत्यक्ष रूप से कुछ गलत नहीं किया हो। वह उस स्त्री की तकलीफ को देख कर शर्मिंदगी और पछतावे में डूब जाता है, क्योंकि वह समझता है कि वह समाज का हिस्सा है जिसने इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था को जन्म दिया है। उसकी आत्मा में भी उस स्त्री के दर्द की अनुभूति होती है।
‘तुम स्त्री हो
तुम निर्धन हो
क्या इतने अपराध एक साथ पर्याप्त नहीं
तुम्हारी हार के लिए
तुम्हारा कोई पैरोकार नहीं’
(‘क्षमा में जुड़े हैं मेरे हाथ’)
अंततः यह कहा जा सकता है कि हिंदी कविता में स्त्री दुनिया अपने विभिन्न रूपों और आकारों में, धूप और छाया में सूर्यास्त और भोर में, असीम रहस्य, आश्चर्य, सौंदर्य के साथ मौजूद है। जहाँ प्रयाग शुक्ल की कविताओं में स्त्रियों के जीवन के शहरी और ग्रामीण संघर्षों से लेकर व्यक्तिगत बेचैनी तक प्रकट होती है, वहीँ लाल्टू की कविताओं में अंधेरी दुनिया की शिनाख्त है| आशीष त्रिपाठी की कविता में एक गर्भवती स्त्री के मन में जीवन के अंधेरों को ले कर त्रासद स्वप्न है, मनोवैज्ञानिक उलझाव है। इन दोनों कवियों से इतर शिवदयाल जी की स्त्री संवाद में सुख खोजती है। आपस की बातचीत में जीवन के गहरे सत्य, रिश्तों की पेचीदगियाँ और समाज की असलियत पर नजर डालती है।
स्त्री संसार अपार है। ऊपर बहुत पहचानी हुई, अनिवार्य स्थितियों, घटनाओं और वस्तुओं को लेकर जो कविता संभव हुई है उन पर चर्चा की गई है। वे कविताएँ जो समाज के विद्रूप और विकृतियों, विडंबना व क्षोभ को अपने अर्थ और आशय में अंतर्ध्वनित करती हैं।
सम्पर्क
शर्मिला जालान
मोबाइल : 09433855014
ई मेल : sharmilajalan@gmail.com





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