उद्भ्रांत की आत्मकथा 'काली रात का मुसाफ़िर' की अरुण आदित्य द्वारा की गई समीक्षा 'काली रात और जगमगाते जुगनुओं की बात'
जब अन्य रचनाकार अपना कविता संग्रह लाने की फिक्र में पड़े होते हैं उद्भ्रांत जी उस समय 'रुद्रावतार' और 'स्वयंप्रभा' जैसे महाकाव्यों का सृजन कर रहे होते हैं। उनकी खासियत यह है कि वे हार नहीं मानते और लगातार अपनी तरह से अपनी राह पर आगे बढ़ते रहते हैं। आजकल उद्भ्रांत जी अपनी आत्मकथा 'मैंने जो जिया' लिख रहे हैं। इसमें वे अपने जीवन संघर्षों के साथ साथ रचनात्मक यात्रा और रचनात्मक अनुभवों को शिद्दत के साथ लेखनीबद्ध कर रहे हैं। हाल ही में उनकी आत्मकथा का तीसरा खण्ड 'काली रात का मुसाफ़िर' प्रकाशित हुआ है। इसकी समीक्षा करते हुए कवि अरुण आदित्य लिखते हैं "विडंबना देखिए कि साहित्य में जहाँ वे तेजी से कदम बढ़ा रहे थे, वहीं नौकरी के क्षेत्र में लगातार अवरोधों और टकराहटों का सामना करना पड़ रहा था। लेखक के लिए इन टकराहटों का रचनात्मक योगदान भी रहा। इन्हीं की वजह से पाठक को प्रसार भारती के भीतर की राजनीति, उठापटक और प्रशानिक कार्यशैली का असल चेहरा देखने को मिलता है। कश्मकश और उठापटक के बीच वे साहित्य के लिए हर संभव प्रयास करने के लिए तत्पर रहते थे।" आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं उद्भ्रांत की आत्मकथा 'काली रात का मुसाफ़िर' की अरुण आदित्य द्वारा की गई समीक्षा 'काली रात और जगमगाते जुगनुओं की बात'।
'काली रात और जगमगाते जुगनुओं की बात'
अरुण आदित्य
आत्मकथा के नाम पर आत्मश्लाघा लिखना बहुत आसान है, परंतु आत्म संघर्ष को लेखकीय ईमानदारी के साथ लिखना अत्यंत साहस का काम है। रमाकांत शर्मा 'उद्भ्रांत' की आत्मकथा 'काली रात का मुसाफ़िर' पढ़ते हुए लेखक का साहस और ईमानदारी दोनों स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं। दरअसल यह पुस्तक उनकी आत्मकथा 'मैंने जो जिया' का तीसरा खंड है। पहले दो खंडों में उनके बचपन से ले कर नवंबर 1987 तक के जीवन और सृजन की यात्रा का लेखा-जोखा है। इस तीसरे खंड में दिसंबर 1987 के बाद के करीब 87 महीनों का ज़िन्दगीनामा है। इसमें दिसंबर 1987 से अप्रैल 1995 के बीच लेखक के निजी, सामाजिक और साहित्यिक जीवन में घटित घटनाओं का तरतीब से दस्तावेजीकरण किया गया है। यह समय लेखक के जीवन में काफी झंझावाती रहा है, लेकिन इसी अवधि में संघर्षों के बीच अनेक सफलताएं भी लेखक के नाम दर्ज हुईं। पठनीयता में यह आत्मकथा किसी उपन्यास की तरह लगती है। उपन्यास की तरह घटनाएँ एक के बाद एक घटती जाती हैं और पाठक पृष्ठ-दर-पृष्ठ आगे बढ़ता जाता है।
कश्मकश से कामयाबी तक के इस सफर की शुरुआत उस अंधेरे समय से होती है, जब उद्भ्रांत एलिम्को की अच्छी-खासी नौकरी से इस्तीफ़ा दे चुके हैं। आगे आजीविका का संकट है लेकिन उनका जीवट उन्हें नैराश्य के अंधकार में डूबने से बचाता रहता है। संघर्षों के बीच काली रात का यह मुसाफिर उजली सुबह की मंजिल की ओर सतत बढ़ता रहता है। किसी भी व्यक्ति के जीवन में संकट के समय परिवार का बहुत सहारा रहता है, लेकिन उद्भ्रांत के पिता और भाई तो उनकी राह में कांटे ही बिछाते रहे। उपन्यास जैसी पठनीयता के बावजूद यह यह पुस्तक इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसमें तथ्यों में कोई मिलावट नहीं है। यहाँ निरावृत यथार्थ है, कल्पना के लिबास से ढका हुआ गल्प नहीं है। लेखन में तटस्थता बनी रहे, इसलिए लेखक ने अपने लिए कहीं 'मैं' शब्द का प्रयोग नहीं किया है। व्यक्तिगत और नौकरी संबंधी प्रसंगों में अपने लिए 'रमाकांत शर्मा' और साहित्यिक संदर्भों में 'उद्भ्रांत' संज्ञा का प्रयोग किया है। जहां सर्वनाम की जरूरत पड़ी है, वहाँ अपने लिए 'मैं' और 'मैंने' जैसे शब्दों की जगह 'वह' और 'उसने' जैसे शब्दों का प्रयोग किया है, मानो वे अपने बारे में नहीं किसी और के बारे में बात कर रहे हों।
कालीरात के इस सफर में समय-समय पर उम्मीद के जुगनू चमकते हैं और अचानक ओझल हो जाते हैं। नौकरी से इस्तीफे के बाद उद्भ्रांत को उम्मीद थी कि आकाशवाणी के केंद्र निदेशक के पद पर उनका चयन हो जाएगा, लेकिन मामला उलझ गया। एक और उम्मीद थी कि किताबें प्रकाशित कर के आजीविका चल जाएगी, लेकिन काम शुरू करने के बाद पता चला कि किताबें बेचना कितनी टेढ़ी खीर है। इस संदर्भ में इस किताब में एक ऐसा प्रसंग भी है जो साहित्य के प्रति एक कुलपति के व्यवहार को उजागर करता है। हरिवंशराय बच्चन के पत्रों के प्रकाशन के संबंध में उद्भ्रांत लिखते हैं : वह कुलपति से मिला तो उनकी प्रतिक्रिया हतोत्साहित करने वाली थी। बोले, "बच्चन जी के पत्रों को प्रकाशित करने के लिए विश्वविद्यालय पैसा क्यों दे। अरे उनका बेटा सुपर स्टार है। आप उससे संपर्क करिए। वह किताब छापने का पूरा खर्च भी देगा और आपको किसी फ़िल्म में गीत लिखने का अवसर दिलवा देगा तो आपका नाम भी होगा और लाखों रुपये मिल जाएंगे।" यह प्रसंग पढ़ कर लगा कि पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के कुलपति ने कथाकार मनोज रूपड़ा के साथ जैसा व्यवहार किया उस परंपरा की जड़ें कितनी गहरी हैं।
इस आत्मकथा से यह भी पता चलता है कि उद्भ्रांत जहाँ बहुत उम्मीद के साथ जाते हैं, वहाँ नाउम्मीदी उनके पीछे-पीछे पहुँच जाती है। जहाँ उम्मीद नहीं की, वहाँ अयाचित ही बहुत कुछ मिल गया। एलिम्को की नौकरी छोड़ देने के बाद जब वे संघर्षरत थे तो सुमन जी उन्हें उन्नाव बुलाते हैं और भरे समारोह में अचानक उन्हें 'सुमन सम्मान' देने की घोषणा कर देते हैं। इसी तरह एक बार किताब जमा कराए बिना उन्हें 'सूर्यकांत त्रिपाठी निराला अनुशंसा पुरस्कार' प्राप्त हो गया। उन्होंने ठाकुर प्रसाद सिंह से कहा कि यह पुरस्कार उन्हें स्वीकार्य नहीं है और इसे वे वापस कर देंगे। तब उन्हें पता चला कि पुरस्कार के लिए उनकी किताब ठाकुर प्रसाद सिंह ने अपनी तरफ से जमा करवाई थी।
संघर्ष सृजन का सहचर होता है। बेरोजगारी और संघर्ष का यह दौर उद्भ्रांत के लिए साहित्यिक दृष्टि से काफी उर्वर भी रहा। संघर्ष की इसी अवधि में 'रुद्रावतार' और 'स्वयंप्रभा' जैसी उल्लेखनीय कृतियों की रचना की और अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन भी किया। इसी दौरान प्रतिष्ठित सुमन पुरस्कार से सम्मानित भी हुए। श्रीमद्भागवदगीता के श्लोकों का पुनर्सृजन करते हुए 'प्रज्ञावेणु’ नामक कृति भी इसी दौर में संभव हुई।
विडंबना देखिए कि साहित्य में जहाँ वे तेजी से कदम बढ़ा रहे थे, वहीं नौकरी के क्षेत्र में लगातार अवरोधों और टकराहटों का सामना करना पड़ रहा था। लेखक के लिए इन टकराहटों का रचनात्मक योगदान भी रहा। इन्हीं की वजह से पाठक को प्रसार भारती के भीतर की राजनीति, उठापटक और प्रशानिक कार्यशैली का असल चेहरा देखने को मिलता है। कश्मकश और उठापटक के बीच वे साहित्य के लिए हर संभव प्रयास करने के लिए तत्पर रहते थे। एक महत्वपूर्ण घटना उस दिन की है जब पटना दूरदर्शन से उनका तबादला इम्फाल हो गया था। जिस शाम उन्हें रिलीव होना था, कवि अरुण कमल उनसे मिलने आए और अनुरोध किया कि अगले दिन गाँधी मैदान में आयोजित बाबा नागार्जुन के अभिनंदन समारोह का कवरेज करा दिया जाए। उद्भ्रांत ने बताया कि उसी शाम वे रिलीव हो रहे हैं। उन्होंने वर्मा से बात की तो वर्मा ने कहा कि एक ही कैमरामैन है, जिसकी ड्यूटी स्टूडियो में रहती है। उन्होंने कहा कि एक स्ट्रिंगर कैमरामैन बुक कर सकते हैं। वर्मा ने कहा कि स्ट्रिंगर की फीस तो बहुत अधिक है। उद्भ्रांत ने कहा, बाबा के ऊपर महत्वपूर्ण कार्यक्रम हो रहा है। इसका कवरेज तो ज़रूरी है। वर्मा मौन रहे तो उन्होंने कहा, "ठीक है, स्ट्रिंगर के लिए मैं आदेश करता हूँ। अभी शाम तक तो ड्यूटी पर हूँ ही।"
![]() |
| उद्भ्रांत |
दरअसल यह किताब उद्भ्रांत के संघर्ष और सफलता की आत्म-गाथा ही नहीं, गहन दांपत्य प्रेम की दास्तान है। उद्भ्रांत की बीमारी और बेरोज़गारी में पत्नी उषा का बराबर साथ मिला। परिजनों ने उनके बीच शक पैदा करने की कोशिश भी की, लेकिन जहां प्रेम होता है, वहां विश्वास होता है। जहां विश्वास होता है वहां शक के लिए कोई गुंजाइश ही कहाँ बचती है। उद्भ्रांत ने यह पुस्तक पत्नी उषा को ही समर्पित की है। समर्पण में उन्होंने लिखा है , "उषा - जो जीवन के अभूतपूर्व संघर्षों में साथ रह कर कुछ बड़ी रचनात्मक उपलब्धियों की प्राप्ति में सहायक बनी - की जीवंत स्मृतियों के नाम।"
इस आत्मकथा में निजी जीवन के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं का भी उल्लेख है। जब हमारा जीवन-जीविका सब कुछ राजनीति ही तय करती है तो किसी लेखक की आत्मकथा समकाल की राजनीति से अछूती कैसे रह सकती है। 6 दिसंबर को बाबरी मसजिद तोड़े जाने को इतिहास का काला अध्याय कहते हुए वे लिखते हैं, 'अयोध्या से चिंताजनक खबरें आ रही थीं। देश भर से कारसेवक अयोध्या पहुंच रहे थे। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहार जोशी, अशोक सिंघल, उमा भारती, विनय कटियार आदि नेताओं के विध्वंसक बयान आ रहे थे। प्रधानमंत्री नरसिंह राव स्थिति पर नज़र रखे थे। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह आश्वासन दे रहे थे कि स्थिति नियंत्रण में है और वह हर हाल में बाबरी मस्जिद का ढांचा बचाएंगे। 4 दिसंबर तक लाख कारसेवक अयोध्या पहुंच चुके थे। स्पष्ट हो गया था कि कारसेवकों के इरादे खतरनाक हैं। पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के हजारों जवान मौजूद थे। 6 दिसंबर की सुबह छह बजे कारसेवकों, आरएसएस के स्वयंसेवकों ने ढाँचे के इर्दगिर्द घेरा बना लिया।' पुस्तक में इसी तरह के अनेक राजनीतिक प्रसंगों का वर्णन है।
आत्मकथा का 1991 से 1995 तक का समय प्रसार भारती की कार्यशैली पर एक डाक्यूमेंटरी फिल्म की स्क्रिप्ट-सा लगता है। कार्यालयीन उठापटक, दाँव-पेच, रणनीतियां, षडयंत्र, तबादलों और तमाम दुश्वारियों व उपलब्धियों को काली रात के मुसाफिर ने विस्तार से दर्ज किया है। नौकरी की मुश्किलों का असर उन्होंने अपने सृजन पर नहीं पड़ने दिया और इस बीच उनकी अनेक कृतियाँ प्रकाशित हुईं। संघर्ष की लंबी काली रात में ये सफलताएं जुगनू की तरह लेखक के रास्ते को रोशन करती रहती हैं।
उद्भ्रांत शुरू से ही स्पष्टवादी रहे हैं और स्पष्टवादिता ने कई बार उनका काफी नुकसान भी किया। ऐसी ही एक घटना तब हुई जब कवि रामरिख मनहर उन्हें राजश्री प्रोडक्शंस के मालिक राजकुमार बड़जात्या से मिलाने ले गए। उस मुलाकात का जिक्र उद्भ्रांत के शब्दों में ही पढ़िए-
आपसी कुशलक्षेम पूछने के बाद मनहर जी ने परिचय कराया - "उद्भ्रांत जी हिंदी के प्रसिद्ध कवि हैं, हमारे पुराने मित्र हैं। 'मंगलदीप' के वार्षिकांकों में सन् 1967-68 से हम इनके गीत और ग़ज़लें प्रकाशित करते आ रहे हैं।
राजकुमार बहुत प्रसन्न हुए।
मनहर कह रहे थे- "और अच्छी बात यह है कि अब ये बंबईवासी हैं। दूरदर्शन में असिस्टेंट डायरेक्टर के पद पर कुछ महीने पहले ही आए हैं।"
राजकुमार के चेहरे पर उत्साह दिखा। बोले--"उद्भ्रांत जी, आपका बंबई में स्वागत है।"
उसने (उद्भ्रांत ने) कहा- " बड़जात्या जी, मुझे भी मिल कर बहुत खुशी हुई। आपकी बनाई फिल्में बहुत पसंद आती रही हैं। 'दोस्ती' और 'अभिमान' तो कई बार देखी हैं, लेकिन यहाँ मनहर जी अचानक ले आए। सच कहूँ तो मुझे फ़िल्मी दुनिया में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है।"
बड़जात्या जी का उत्साह खत्म हो गया, चेहरा भावशून्य-सा दिखा। फिर हँसते हुए बोले--"कोई बात नहीं, इस बहाने आपके दर्शन तो हुए।"
लेकिन मनहर जी के चेहरे पर नापसंदगी और तनाव का मिश्रण दिखा। बाहर निकल कर गाड़ी में बैठते हुए बोले- "मैंने तो परिचय यह सोच कर कराया था कि आगे इनकी किसी फ़िल्म में आपको गीत लिखने का मौक़ा मिलेगा, जो यश भी देगा और अर्थ भी, पर आपने ऐसी बात कह दी।"
इस तरह अपने पाँव पर कुल्हाड़ी उद्भ्रांत जैसा कोई मनमौजी साहित्यकार ही मार सकता है।
चार सौ चालीस पृष्ठों की यह आत्मकथा तमाम झंझावातों का जिक्र करते हुए एक आत्मीय प्रसंग के साथ समाप्त होती है।
जब उद्भ्रांत बंबई से गोरखपुर के लिए रवाना होते हैं। विदा में हिलते हुए हाथों की आत्मीय तरंगों के साथ यह कृति संपन्न होती है। वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन ने इस आत्मकथा के बारे में ठीक ही लिखा है - "यह साहसपूर्ण और पारदर्शी है और हिंदी में शायद दूसरी कृति होगी 'अपनी खबर' के बाद, जो आत्मगत अवरोधों को ध्वस्त करते हुए रची गई है।"
पुस्तक : काली रात का मुसाफिर
लेखक : उद्भ्रांत
प्रकाशक : अमन प्रकाशन, कानपुर
मूल्य : ₹ 499 (पेपर बैक)
सम्पर्क
ई मेल : adityarun@gmail.com



बहुत सुंदर, सटीक समीक्षा है।
जवाब देंहटाएंकैलाश बाजपेयी, कानपुर
जवाब देंहटाएं