सेवा राम त्रिपाठी के कविता संग्रह 'ख़ुशबू बॉटती हवा' पर राजेश जोशी के कुछ नोट्स
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| राजेश जोशी |
हर एक कविता का उद्देश्य होता है सहज सुंदर सरल जीवन। जटिलता और विकृतियों भरे इस समय में कविता हमें आश्वस्त करती है। नकारात्मकता को हटा कर मनुष्य को सकारात्मकता की राह पर चलने के लिए प्रेरित करती है। सबसे पहले इस दुनिया में मनुष्यता है। मनुष्यता के बाद ही कुछ भी है। कविता जितना अपने शब्दों में होती है उससे कहीं ज्यादा अपने अर्थों में समाहित होती है। कभी-कभी कविता अपने शब्दों में उलटी बात करती हुई प्रतीत होती है जबकि उसके निहितार्थ व्यापक होते हैं। इस क्रम में कबीर की उलटबासियां महत्वपूर्ण हैं। सेवाराम त्रिपाठी के कविता संग्रह 'खुशबू बांटती हवा' की कविताओं को पढ़ते हुए राजेश जोशी को कुछ ऐसा ही लगा। सामान्य तौर पर सेवाराम त्रिपाठी की छवि एक आलोचक की है। बहुत कम लोग जानते हैं कि वह एक उम्दा कवि भी हैं। उनके कविता संग्रह 'खुशबू बांटती हवा' पर जितनी बात होनी चाहिए थी वह नहीं हुई। यह हमारे हिंदी साहित्य का सामान्य चलन बन गया है और एक बार किसी खांचे में देखने के अभ्यस्त पाठक सामान्यतया रचनाकार के दूसरी विधा में काम करने को स्वीकार नहीं कर पाते। बहरहाल आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं सेवाराम त्रिपाठी के संग्रह 'खुशबू बांटती हवा' पर चर्चित कवि राजेश जोशी की टिप्पणी 'जैसे वाक्य व्याकरण को याद करता है'।
'जैसे वाक्य व्याकरण को याद करता है'
(ख़ुशबू बॉटती हवा : कुछ नोट्स)
राजेश जोशी
सेवा राम त्रिपाठी की एक कविता को बहुत याद करता हूँ। इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं :
जैसे ससुराल में सताई जा रही बाला
अपने पीहर को याद करती है
जैसे मुसीबत में फँसा कोई
सुकून के पल याद करता है
जैसे ग़लत इस्तेमाल किये जाने पर
वाक्य व्याकरण को याद करता है
मैं रीवा को बहुत याद करता हूँ।
(बहुत याद करता हूँ)
यह मात्र अपनी स्थानीयता या अपनी जड़ों को याद करना भर नहीं है। कई बार स्मृतियाँ हमें ताकत देती हैं। सेवाराम त्रिपाठी की कविताओं में स्मृतियों और सपनों या कहें कि एक सुंदर सहज जीवन के स्वप्न की आकांक्षा केन्द्रीय रूप से उपस्थित है। इन स्मृतियों में सिर्फ़ जगहें ही नहीं हैं, ना ही केवल अपने मित्र हैं, यहाँ सुपाड़ी की कलाकृतियों के कलाकार हैं, रिक्शा खींचने वाले, सड़कें बनाने वाले, नौजवान छात्र और बेरोज़गार मित्र हैं, जिन्हें कवि उसी तरह याद करता है जैसे घोसले पक्षियों को याद करते हैं। सामान्य तार्किकता से काम लेने वालों को सेवाराम जी की कविता की पंक्तियाँ कुछ उलटबाँसी लग सकती हैं, लेकिन कविता का तर्क थोड़ा तिर्यक होता है। और संभवतः इसीलिए कविता का वाक्य सिर्फ़ अर्थ को उद्घाटित नहीं करता, वह उसके निहितार्थों को भी उद्घाटित करता है। यहाँ वाक्य व्याकरण को याद करता है। यहाँ घोसले पक्षियों को याद करते हैं। मैं पिछले दिनों एक छोटी सी किताब देख रहा था। हिरोशिमा की त्रासदी के बाद लिखी गयी इन कविताओं में, बम के कारण नष्ट हो गई घड़ी, टिफिन बाक्स और कई चीज़ों को ले कर लिखी गयी।
इन कविताओं में भी चीज़ें अपने को इस्तेमाल करने वालों को याद करती हैं। यह समय ही शायद ऐसा है जिसमें अनेक वाक्य अपना वास्तविक व्याकरण भूल गये हैं। जिसमें शब्दों की असलियत खो गई है। उनके निहितार्थ खो गए हैं। न जाने कितने शब्द, उनकी संवेदनाएँ उनकी मूल प्रपत्तियाँ अपने सही अर्थ की खोज में, व्याकरण के बियाबन में लहू-लुहान पडे़ हैं। ये पद कौन से हैं? शब्द कविता की अंतिम पंक्तियाँ इन्हीं की ओर इशारा कर रही हैं-
जैसे संवेदना, जैसे प्यार
जैसे आज़ादी, जैसे जनतन्त्र
जैसे अधिकार, जैसे कर्तव्य
जैसे मनुष्यता।
(शब्द)
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| सेवा राम त्रिपाठी |
सेवाराम त्रिपाठी की कविता की चिंता सिर्फ़ शब्द या वाक्य या व्याकरण तक सीमित नहीं है। उसकी चिंता ज़्यादा व्यापक है। उसमें जनतन्त्र है, आज़ादी है, नागरिक अधिकार हैं और मनुष्यता है। उनकी फ़िक्र है कि
‘वक्त ऐसा है कि विवेक से नहीं
धमाकों से काम चलता है
न्याय फीका पड़ गया है
कानून धरती के बहुत नीचे गड़ा है
विवेक कपूर सा उड़ गया है।‘
(महामहिम बेहद डरे हैं)
या इसी तरह 'कितना अच्छा हो' कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ हैं-
जब से इस नयी दुनिया में आये हैं
याद नहीं कभी मुस्कुराये हैं?
समस्या बुरी तरह
दिलो दिमाग में
जगह-जगह भूत प्रेतों के समूह
हाथ केवल सम्भावनाओं की पालकी उठाये हैं।
(कितना अच्छा हो)
सेवाराम त्रिपाठी की कविता हमारे समय के तमाम ज़रूरी और ज्वलंत सवालों से जूझती, एक सजग नागरिक बोध की कविता है। उनका कवि मन बेचैन भी है, अपने समय की विडम्बनाओं और व़िदूपताओं को जानता भी है और चाहता है कि-
स्वतंत्रता का सरगम बजाती हुई हो
यह दुनिया
झुलसी हुई देहों का
जो कारवाँ गुज़र रहा है लगातार
फैली है चीख
पसरा है हाहाकार का बाज़ार और व्यापार
उसके विरुद्ध
परचम उठाती हुई हो, यह प्यारी सी दुनिया।
(एक मामूली सी इच्छा)
यह वह स्वप्न है जो बार-बार सेवाराम त्रिपाठी की कविता में तरह-तरह से आता है। यह स्वप्न ही है जो उनकी कविता के केन्द्र में उपस्थित है। जो उनकी नज़र को अपने समय और समाज के अन्तर्विरोधों से हटने नहीं देता। एक ऐसे समय में जब कम से कम प्रतिरोध और ज़्यादा से ज़्यादा सहमति जताने की कोशिश हो रही है। लोग विचार और विचारधारा को कपड़े की तरह बदल रहे हों, सेवाराम त्रिपाठी की कविता यह मानती है कि - यह समय धोखाधड़ी, छल, प्रवंचनाओं के समानान्तर, अपनी आत्मा को किसी तरह/जिलाये रखने का समय है। और साथ ही
"‘अपने पंखों पर विश्वास’ करते हुए -
इस उन्मुक्त आकाश में
सतत उड़ते रहने का समय है।"
(यह कैसा समय)
सेवाराम त्रिपाठी की कविता हमारे समय की बेचैनियों का एक ऐसा पाठ है, जिसके पास बहुत बडे़ हौसले हैं, दुनिया को बेहतर दुनिया बनाने के स्वप्न हैं लेकिन हर बार अपनी कविता की सड़क पर लौटते हुए कवि को लगता है कि ज़िंदगी का महाभारत शब्दों में बँध नहीं पाता। वह घूमता है खेतों में, खदानों में, नदियों, पहाड़ों और रेगिस्तानों में-
धधकती ज्वालाओं में
उड़ता हूँ हवाओं में
आकाश के विस्तार में
तीन लोकों और चौदह भुवनों में
अपनी कविता में लौटते।
(कविता में लौटते)
ये कविताएँ हैं जो जाग रही हैं लगातार। उसके बेचैनी भरे दिनों में, जो उसकी राजदाँ हैं। जो घुप्प अँधेरी रातों में रोशनी बनी है। इन कविताओं में उसके महास्वप्न भी हैं और हमारा यथार्थ भी।
ख़ुशबू बाँटती हवा (कविता संग्रह)
कवि - सेवाराम त्रिपाठी
साहित्य भण्डार, चाहचंद, इलाहाबाद
उत्तर प्रदेश
मूल्य - रु. 250.00
सम्पर्क
राजेश जोशी
निराला नगर, भदभदा रोड,
भोपाल 462003
मोबाइल : 09424579277
ई मेल : rajesh.isliye@gmail.com


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