भरत प्रसाद का उपन्यास अंश 5 : 'कौन ठगवा नगरिया लूटल हो!!'


भरत प्रसाद 


मनुष्य ने अपने सभ्य होने के क्रम में प्राकृतिक घटनाओं को उन अलौकिक देवताओं से संबद्ध किया जिनका वास्तविक तौर पर, या कहा जा सकता है कि स्थूल रूप में  कहीं अस्तित्व नहीं था। ये देवता भाग्य निर्धारक माने गए। ये देवता नैतिकता के निर्धारक माने गए। पाप पुण्य की संकल्पनाओं ने समाज में एक व्यवस्था की स्थापना की। भारतीय परम्परा में ऋग्वेद में कुल 33 देवताओं का जिक्र मिलता है जो आगे चल कर 33 करोड़ हो गए। इन देवताओं के साथ पशु पक्षियों और पेड़ पौधों को भी जोड़ा गया। हंस हो या मोर, उल्लू हो या कौवा, शेर हो या भैंसा या फिर चूहा, सभी को किसी न किसी देवता के साथ जोड़ दिया गया। पूर्वांचल का समाज बहुत हद तक इस धार्मिकता से जुड़ा हुआ है जिसे आज भी सहज ही देखा जा सकता है। भरत प्रसाद अपने उपन्यास कालकलौटी के केन्द्र में पूर्वांचल का समाज और संस्कृति ही है। उपन्यास अंश के पांचवीं कड़ी में भरत पूर्वांचल की इसी संस्कृति और परिवेश का जिक्र कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं भरत प्रसाद के धारावाहिक उपन्यास कालकलौटी की पांचवीं कड़ी।


उपन्यास अंश-5 : कालकलौटी

'कौन ठगवा नगरिया लूटल हो!!'


भरत प्रसाद 


हमारे पुरबिहा भैया लोग एक से बढ़ कर एक पुजेर हैं। पूजा-पाठ साधते हैं तो आठ-आठ, दस-दस घंटा ऐसे कटता है – जैसे रात एक करवट की नींद में बीत जाय। देवताओं की बड़ी लंबी कतार है। कभी न बोलने, बतियाने, सुनने, समझने वाली जादुई पहेली जैसी देवियों की कतार देवताओं से भी लंबी। काली माई, ओबा माई, शीतला मैया, समझ माई, अन्नपूर्णा मैया, माँ भवानी ये तो हुई आगे-आगे रहने वाली देवियाँ। इनके पीछे सहायक देवियों की सूची है, जिसमें से एक हैं – आदिवासिनी मैया लेहड़ा देवी। भक्तों के सिर देवियाँ जब तक न चढ़ें, उनकी शक्ति सिद्ध नहीं होती। वैसे देवियाँ सरेआम भक्तों को दर्शन देने से संकोच करती हैं। किसी की सवारी है – सिंह, किसी की सवारी ठहरा हंस, किसी का बाघ। कौन कहे कि हमारी देवियाँ गधे को भी नहीं बख्शतीं। मामूली जान को शीतला माता की गुलामी बजानी पड़ जाती है। बोघेश्वरी माता का तो नाम ही बाघ पर असवार रहने के कारण पड़ गया, वरना उनका असल नाम क्या है, कौन जाने? धैर्य रखिए और आगे सुनिए – बबुआ कबूतर, जिन्हें देखते ही तबियत खुशी के मारे झक्क सफेद हो जाती है, जानते हैं – उसकी पीठ पर बैठ कर कौन देवी उड़ती हैं? – अरे वही कामदेव की पत्नी ‘रति’ ही तो। कल्पना कीजिए कबूतर के भार से कम से कम सौ गुना। कुछ ज्यादा तो नहीं कह गए? चलिए माना 90 गुना ही। कैसे उड़ पाता होगा? बैठता कैसे होगा? ढंग से क्या सो पाता होगा? मगर इससे क्या? मइया रति को भुवन परिक्रमा जो करनी है, कामदेव की मोहिनी माया का राजपाट जो संभालना है। कबूतर भार के मारे कुकुआए, गुंगुंआए, रोए या कि कांपे ड्यूटी बजानी ही है। गंगा है तो नदी, मगर सिर्फ नदी कैसे रहने पाएगी? पुरबिहा भाई लोग की आस्था की शान पर चढ़ कर वह भी देवी बना दी गई हैं, फिर तो सवारी भी चाहिए। भई देवियां हैं – पैदल कैसे चलेंगी? इनकी सवारी बनते हैं – मगरमच्छ अंकल। मौके-मौके पर तबियत बदलने के लिए गंगा मइया मछली की पीठ पर भी सैर कर लेती हैं। गणेश देवता चूहे की पीठ पर अपना संतुलन कैसे साधते होंगे, यह आज तक पहेली है, परंतु देश के कोने-कोने में गणेश मूर्ति के साथ एक कोने में मूसक राज आराम फरमाते दिख आएँगे। सवाल तो यह भी लाजिमी है कि जो चूहा आदमी के एक पैर का भार नहीं उठा सकता – वह दोनों पैरों, चार हाथों, लम्बोदर पेट और गोल-मटोल सूंडयुक्त सिर का वजन कैसे संभालता होगा? और कहीं तल-विचल होने से उठे क्रोध के कारण हस्तिगर्जना हो गई, तब तो जीते जी चूहाराम की सिट्टीपिट्टी......? जरा गनीमत है – शिवजी की सवारी नंदी बैल ठहरा, जैसे-तैसे शंकर भोले को बैलेंस कर ही लेता होगा, मगर एक शंका यहाँ भी उठती है – साँप की फुंफकार से क्या उसकी बोटी-बोटी न काँप जाती होगी? साँप का आतंक क्या बैल की आत्मा को न रुलाता होगा? बैल एक तो पशु, ऊपर से गुलाम बना दी गई सूरत। आँखें पढ़ लीजिए तो बेबस कातरता पनिहा आँखों में हरदम जमीं रहती है। धन की स्वामिनी लक्ष्मी की सवारी ‘उल्लू बबुआ, जिनको लेकर इंसानों के बीच मुहावरा अमर हो गया – उल्लू का पट्ठा’, ‘अपना उल्लू सीधा करना’। यह ऐसा नाचीज पक्षी ठहरा, जो हो कर भी नहीं जैसा रहता है, दिख कर भी लगता है, नहीं दिखा। बड़ी मजबूरी में कांख कर बोलेगा ऐसे, जैसे सन्नाटे की रात में पाताली कुँए से कंटहा आवाज गूँजी हो। भगवान विष्णु पक्षीराज गरुड़ से नीचे शायद ही उतरते हों, वह भी तब, जब स्वर्ग से नीचे उतर कर करोड़ों भक्तों-भक्तिनियों की दुनिया का मुआयना करना होता होगा। यह है तो घोर आश्चर्य, किंतु दरसत्य कि पवनसुत हनुमान भूत, प्रेत या पिशाच को अपनी सवारी सुनिश्चित किए हुए हैं। फिर बाबा तुलसीदास ने कैसे लिख दिया – ‘भूत-पिशाच निकट नहीं आवें, महावीर जब नाम सुनावें।’

प्रातःकर्ता, निशाशत्रु, गगनेश्वर, नभ-शिरोमणि सूर्य भी बिना सवारी के नहीं रह पाते। वे दसों दिशाओं में दौड़ते हैं – सात घोड़ों के बूते जो सूरज बाबा का रथ खींचते हैं। वे घोड़े – जिन्हें चलने के लिए जमीन चाहिए, सोने के लिए अस्तबल और पेट भरने के लिए घास या चना, परंतु सूर्य का हुकुम बजाने से फुरसत मिले – तब न।


मुरुगन देवता 


देश का चप्पा-चप्पा देवी-देवताओं की सत्ता से अंटा पड़ा है। शुद्ध 33 प्रकार के देवी-देवताओं के हजारों गण हैं – जिन्हें देवगण पुकारा जाता है। मजाल क्या जो एक भी देवी या एक भी देवता जमीन पर पैदल चलने का साहस दिखाए। यह साहस तो वही दिखा पाया, जो जन्म से मृत्यु तक बस इंसान हो, न उससे कम, न उससे ज्यादा। हवा में उठा तो देवता हुआ, नीचे गया तो राक्षस। पृथ्वी को चाहिए, न आकाश का देवता, न राक्षसी शरीर। वह जीवित रहती है – जमीन पर चलने का चमत्कार करने वाले इंसानों से। हैं तो एक से बढ़ कर एक जानवर देवियों की अमर-सवारी, परंतु देवियों को गद्‍गदायमान करने के नाम पर जितने जानवर स्वाहा हुए हैं, हो रहे हैं, और अनंत युगों तक होंगे, है किसी वेद-पुराण-शास्त्र में इसका हिसाब? बनी कोई अदालत? इन मूक सवारियों की हत्या को नाजायज सिद्ध करने के लिए? उल्लू भाई, जो किसी को एक सेकेण्ड के लिए भी उल्लू नहीं बना पाता – देवी लक्ष्मी का वजन ढोता है – दीपावली की रात धनभक्तों की बलि चढ़ता है। दीपावली के मौके पर धन की देवी की पूजा कहाँ नहीं होती? अपने ही पर्व पर अपनी ही सवारी की बलि देवी लक्ष्मी कैसे सह लेती हैं? घनघोर आश्चर्य। वैसे भी उल्लू को निपट उल्लू समझने की उल्लूगिरी मत कर बैठना। जब दिशा-दिशा में नाचती रात हमारी नींदों पर पहरा देती है – तब उल्लू जागना शुरू करता है – हु-हु-हु-हु-हुह्। मानो बोली नहीं, सन्नाटे के अतल से उठती किसी गूंगी आत्मा की हूक हो। इतना ही नहीं, उल्लू की आँखें शीशे से टकराकट छिटकती रोशनी जैसी तीक्ष्ण होती हैं। उल्लू से चिपका हुआ एक सत्य और बूझ लीजिए – उसके भय के मारे साँप, चूहा, बिच्छी और बिच्छू मास्टर भी खेत में कदम नहीं देते। उल्लू के आसपास होने की हनक मिलते ही दस कदम दूर से उल्टा भाग चलते हैं। देश भर में उल्लू भइया के चाचा-चाची, नाना-नानी, दादा-परदादा ऐसे पाँव पसारे हैं कि आज की तारीख में इसकी लगभग 60 प्रजातियाँ कोने-कोने में गुलजार हैं। मोर अपनी सज-धज में कितना लकदक मोहकता से लबरेज। दौड़ा लीजिए, तो जी खोल कर भाग न पाए, भर तबियत उड़ न सके, ऐसा बेबस रहता है – अपने ‘भर-भर किलो सुंदरता’ से। मुरुगन देवता की खासमखास सवारी है। हाथी वैसे ठहरा शांति, समझदारी और कुशाग्र बुद्धि का प्रतीक, मगर किसको पड़ी है – हाथी की हुनर चीन्हने की? आदमी तो सदियों से युद्ध में इन्हें जोतता आ रहा है – देवता भी नहीं बख्शते। देवराज इंद्र ऐरावत हाथी की पीठ पर झूमते हैं। हुआ होगा कहीं समुद्र-मंथन कुछ पता नहीं, निकले होंगे 14 रत्न – किसी ने नहीं देखा। उन्हीं रत्नों में एक था – ऐरावत, जो आज तक धरती पर नहीं पाया गया। बस-बस यही न पाया जा सकने वाला हाथी इंद्र का चलन-खटोला है। आगे यमराज की महिमा किन शब्दों में गाएँ? उनके बग़ैर मृत्युलोग में पत्ता भी नहीं हिलता। कुपित हुए तो बेवक्त दरबार-ए-यमलोक से बुलावा आ जाएगा, वारंट जारी हो जाएगा। आप हँस-बोल बतिया रहे हैं – समझिए यमराज दादा की मेहबानी है। नरकलोक के जज साहब की अभयंकारी सवारी है – भैंसा, जो एक बार दोनों सींगों के बीच साध ले, तो सही-सलामत बचना मुश्किल हो जाय। यमराज ज्यादा ताकतवर हैं या भैंसा – तय करना आसान नहीं, कारण कि भैंसा पर सवार होते ही यमराज देवता कहाँ लगते हैं? आकार-प्रकार लगभग एक, रूप-रंग लगभग मिलता-जुलता। डराने की अदा भी काफी कुछ मेल खाती हुई। भैंसा भी गद्‍गद् कि मैंने भी अव्वल पट्ठे का साथ पाया है और यमराज रोम-रोम से गुब्बारा होते हुए कि भैंसा के रहते मुझे खुद के बारे में बताने की क्या जरूरत?

गोल-मोल माथा तो तब चकरा जाता है, जब खबर लगती है कि शनि महाराज की एक नहीं, नौ-नौ सवारियाँ हैं, जैसे आजकल के धनदेवों की मल्टी ब्रांडेड कारें होती हैं। एक स्वीटी के नाम, एक प्रिंस के लिए, एक मोहतरमा की सैर के लिए और कम से कम एक खास खुद के लिए। बाकी जो बच गईं – उनका काम हाथी के दाँत की तरह बूझ लीजिए। तो बात चली थी शनि बाबा की नौ सवारियों की। ये हैं – गिद्ध, घोड़ा, गधा, कुत्ता, शेर, सियार, हाथी, मोर और हिरन। इन नौ के अलावा शनि की दसवीं स्पेशल, एडवांस, रिजर्व सवारी भी है – कौवा। हाँ, जी! वही कौआ जो काँव-काँव करता ही है, घर की मुंडेर पर आसन जमा लेता है। और? और क्या? कुच्छ नहीं। पर एक सवाल तो कुलबुलाता है जरूर, जब अधिकांश देवता एक सवारी से काम चला लेते हैं – तो शनि देव के लिए दस-दस सवारी क्यों? हर दिशा के लिए अलग-अलग तो नहीं? क्या देवताओं में भी ऊँच-नीच चलता है? आदमियों की प्रचंड बीमारी वहाँ भी लगी हुई है? ऐसा हो सकता है – धरती पर अदृश्य रह कर घूमेंगे, तो छुतहा रोग का असर होगा कि नहीं? आयँ। एक रहस्य और याद कर लीजिए – कौआ को भविष्य की घटनाओं का अंतर्ज्ञान हो जाता है – इसीलिए शनि देव ने इसे स्पेशल दर्जा दे रखा है। बात जानवरों की उठे, वह भी सवारी जाँचने के अर्थ में, तो कुत्ते को इग्नोर करने की गलती कैसे हो सकती है? यह है – भैरव की सवारी, भौं-भौं झाड़ने का आदती ठहरा। खुश हुआ तो भौं-भौं, प्यार किया तो – भौं-भौं-भौं और गुस्साया – तब तो मतलब.....। भैरव ने कुत्ते को ही क्यों चुना, यह भौं-भौं की आदत से समझा जा सकता है। कुत्ते को अपनी हैसियत का अंदाज हो कि न हो – वह यम का भी दूत – अर्थात संदेशवाहक हैं। फिर तो यहाँ भी संदेश देने का मतलब भौं-भौं-भौं। कुत्ता ढेरों किलोमीटर से गंध भांप लेता है, जिससे यम को मौत की भनक मिलने में सुविधा हो।


यमराज


भोले शंकर की माया भारत में अपरंपार है। नजर तो आज तक किसी को नहीं आए मगर उनकी सब पर नजर न जाने कैसे है? नजर भी ऐसी-वैसी नहीं, प्रायः तनी हुई, क्रोधालु और खिन्न। ‘नाचे गावै, तूरै तान, ताकर दुनिया राखै मान।’ शंकर का तांडव नृत्य..... पैर उठाए, हाथ बिखराए, जटा छितराए और आँखें प्रज्ज्वलित किए हुए – कौन रोमांच के मारे सिहर न जाएगा। डमरू डम-डम बज उठा – वह अलग, काला नाग नृत्य-मुद्रा में लपलपा उठा सो अलग, त्रिशूल की नोंक से बिजलियाँ कड़क उठीं, वह अलग। अपनी ताकत के आगे ब्रह्माण्ड में किसी को रत्ती भर न सेटने वाला दंभ-शिरोमणि रावण आखिर शिव-शंकर को क्यों पूजता था? बम भोले का ‘क्षणे रुष्टा, क्षणे तुष्टा’ वाला नेचर। रावण धर लिया कमजोर नस। जम बैठता था – घंटों, शिव को खुश करने में –

जटाटवी गलज्जल प्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंग तुंगमालिकाम्।

डमड्डम डड्म निनाद वड्डमर्वयं

चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम्।।

शंकर बाबा पुलकित, अंग-अंग प्रफुल्लित, रोम-रोम लहलहाता हुआ – भर-भर लुटा देते थे वरदान छींट डालते थे – अभय वचन, लुटा देते थे – अपनी शक्ति। उनको इससे मतलब ही क्या – छोटे-मोटे, मझोले, गुमनाम, अनाम, मामूली, लोकल, चुप्पीखोर देवता लंकाधीश के भय से साँस-साँस काँपते हैं। क्या फर्क पड़ता शिव को कि उन्हें छोड़ कर और किसी को छटाँक बराबर भी भाव नहीं देता। या कि वह दानवाधीश है, ज्ञान का नशा करता है, तानाशाही का अवतार है, भाइयों का दारोगा और प्रजा के लिए दुःस्वप्न है। रावण पर आशीर्वाद लुटाते वक्त शिव की दोनों आँखें ही नहीं, तीसरा नेत्र भी बंद हो जाता था। शिव की महिमा त्रिकालदर्शी की भी है – कैसे न देख पाए कि भविष्य में यह अहंकारी मंत्रोच्चारक एक दिन धोखा दे कर सीता का अपहरण कर लेगा, वह भी साधु का भेष धर कर।

जैसे एक शब्द का एक अर्थ नहीं, एक बीज की एक शाखा नहीं, एक आदमी का एक चेहरा नहीं और एक दिन में एक जैसी धूप नहीं – वैसे ही एक देवी या एक देवता का सिर्फ एक ही नाम नहीं। किसी के एक दर्जन उपनाम, किसी की बीस-बीस उपाधियाँ, किसी की इससे भी ज्यादा। जिस देवता का ओहदा बड़ा, अधिकार बड़ा उसकी उपाधि की लाइन भी उतनी ही लंबी। मिसाल के तौर पर उठा लीजिए – शिव को। भले ही पद में वे तीसरे नंबर पर आते हैं – मगर उपाधियों की माला पहनने के मामले में सबसे आगे, नंबर वन। भोले भंडारी अपने ढब-ढाँचा, रूप-रंग, चाल-ढाल और मन-मिजाज के अनुसार गाँव-देहात के मानुष को ज्यादा भाते हैं। बदमाश बच्चों से ले कर सिधवा नवयुवतियों तक सबकी पहली च्वाइस हैं – शिव बाबा। आस्था, भक्ति या कि नजदीकीपन के नशे में एक से एक भारी-भरकम उपनाम शिव के नाम रच उठे हैं। मसलन कैलाशपति; वहाँ वे कब रहे, कैसे रहे, क्या है पता-ठिकाना? सब मन में उड़ने वाली चिंगारियाँ हैं, पर आस्था का अपना हिसाब है – जो तथ्य और हकीकत से तालमेल बिठाना जरूरी नहीं समझती। शिव भूतनाथ भी हैं – भूत-प्रेत के चेयरमैन। चंद्रमौली अर्थात् जिनके माथे पर एक कोने चन्द्रमा चमकता हो। वैसे तो चांद की अपनी रोशनी है नहीं, मगर अपना खरबों टन वजन लिए-दिए शिव के सिर पर आ रहे – तो.....? मुक्तेश्वर, विश्वनाथ, अनादिदेव, गणपति, त्रिपुरारी, मृत्युंजय और अमरनाथ को लेकर शंकर देव के 108 उपनाम। इन्हीं में से एक है – त्रिकालदर्शी, जो तीनों कालों में झाँक लेता हो। यदि ऐसा है – तो कहाँ-कब भूकंप आएगा, कब तूफान तबाही मचाएगा, कब बिजली गिरेगी, कब बाढ़ आएगी – यह जानने के लिए शंकर देव अकेले काफी हैं कि नहीं? फिर तो उन्हें यह भी खबर होगी कब, किस दिन, किस घड़ी, कितनी उम्र में किस-किसकी परमानेंट छुट्टी होगी – धरती से। मगर शिव हैं कि लाख ढूँढ़ने के बावजूद महाभक्तों को भी नहीं मिलते।

पूर्वांचल का एक नोंकदार, कच्चा, जूनियर शहर टाइप कस्बा खलीलाबाद, जिसे किसी खलीलुर्हमान ने बसाया था, जिससे होते हुए घनघटा के रास्ते पर सदियों से जमीन में पाँव धंसाए हुए मंदिर है – तामेश्वरनाथ। अरे वही शिवजी का आफिशियल निवास, जहाँ वे साकार नहीं, सशरीर नहीं, आमने-सामने नहीं – अपनी प्रस्तर-प्रतिमा के बहाने दर्शन देते हैं। मगर इससे क्या प्रेमालु, श्रद्धालु, आस्थालु, भावालु भक्तजन उन्हें मूर्ति में ही जीवित मान बैठे हैं। शिव बोलते नहीं, मगर आशीर्वचन बाँट रहे हैं। ज्ञान देते नहीं, मगर भक्तगण भर-भर अंजुरी ले रहे हैं, वरदान का ‘व’ मूर्ति के मुँह से नहीं फूटता, मगर भक्त बबुआ वरदान पा लेने की विह्वलता में रोए जा रहे हैं। जितना पुराना मंदिर, उतनी गहरी आस्था। जितने प्राचीन देवता, उतनी अखंड भक्ति, जितना अज्ञात इतिहास उतनी ही अबूझ मान्यताएँ और मनगढ़ंत किस्से। कितना सच है, कितना गप्प, कितनी हकीकत है, कितना फसाना, कितना ठोस है, कितना पोलमपोल यह इतिहास के बारे में मुश्किल से साफ हो पाता है। महाशिवरात्रि के मौके पर और सावन मास में शिव को स्नान कराने के लिए जिला-दर-जिला के अनगिनत भक्तों का रेला लगता है। आसपास तो छोड़िए, दूरदराज के हजारों गाँवों से हुजूम ऐसा उमड़ता है – मानो डायरेक्ट स्वर्ग में बसने का पासपोर्ट मिलने वाला हो। इन्हीं के बीच से एक ऐसा प्रचंड शंकर भक्त निकला जिसने देवाधिदेव के प्रेम में डूब कर जीते जी मौत को गले लगा लिया। अब यह दिव्य भक्त हुआ कि नहीं? शिव के नाम कुर्बान हुआ कि नहीं? बवाल काटने वाली भक्ति का नमूना बना कि नहीं? फिर इसके नाम मंदिर बनना तय। इनके चेलों की फौज खड़ी होना बनता है न? बिल्कुल यही हुआ भी। प्रमुख मंदिर की दैवीय माया की पकड़ बेशुमार भक्तों पर कमजोर जान पड़ी, अतः मंदिरों की फसल खड़ी कर देना निहायत लाजिमी था, फिर तो आजू-बाजू तैनात कर दिए गए 16 मंदिर, भक्तों की ताउम्र रखवाली के लिए।


शिव


जहाँ कहीं शिव मंदिर हो, वहाँ शिव लिंग गर्भगृह में न विराजमान हो, हो ही नहीं सकता। जैसे गुवाहाटी के शक्तिपीठ कामाख्या में योनिपूजा का महोत्सव होता है, वैसे ही पूर्वांचल के शिव मंदिरों में महादेव की लिंगपूजा का समारोह। वह भी एक-दो दिन नहीं – पूरे-पूरे ग्यारह दिन, ग्यारह छंटे हुए शास्त्राचार्यों द्वारा। ये आचार्य वे पहेली होते हैं, जिन्हें उनके सिवाय कोई नहीं बूझ पाया है। जो खुश होते हैं – तो संस्कृत में, क्रोधालु होते हैं, तो संस्कृत में, हँसते हैं तो संस्कृत में और भक्तों पर बिगड़ते हैं – तो संस्कृत में। उनकी वाणी के योग्य भारत में बस यही देवभाषा बची है, शेष सब आम भाषा, अतः बोलने के अयोग्य। भूलचूक से कभी आम बोलचाल में उतर आए तो झट वे संस्कृत के सिंहासन पर जा बैठते हैं, उनके लिए संस्कृत झाड़ना अंग्रेजी में रौब जमाने से कम असरदार नहीं है। रुद्र अर्थात शिव का अभिषेक, जिसका खुल्लमखुल्ला मतलब है – लिंग की ग्यारह दिवसीय पूजा-आराधना-विनती-मनुहार-चिरौरी। शिव की खुशी इतनी बड़ी कि बाकी सबकी खुशी नगण्य है। लाखों-लाख चाहे जितना दुख झेलें, मगर शिव को एक पल के लिए भी रुष्ट नहीं करना है। शिव की खुशी है भी बड़ी महंगी, बहुत खर्चकारी, दर्दकारी और नींदहारी। नियम पर चलना है तो भोरे-भोर चार बजे लाइन में हाथ जोड़ कर लग जाइए। बेहोश होने को तबियत हो रही है – तो भी काठ बन कर खड़े रहना है, पत्थर की तरह भक्त भाइयों के पीछे लुढ़कते चलना है। सन्ध्या जब पक कर रात की शक्ल में गिर जाती है – तब जाकर थमता है – शिव के दिव्य लिंग का स्नान। आदमी लोग कितने अभागे हैं, जिन्हें बस एक स्नान नसीब है – जल स्नान। यहाँ तो शिव को छोड़िए, उनके दिव्यलिंग का ही छः छः ढंग से महास्नान होता है। वह है शहद अभिषेक, दही अभिषेक, दूध अभिषेक, पंचामृत अभिषेक, घी अभिषेक, और? हाँ – याद आया जलाभिषेक भी।

जैसे ब्रह्म को बूझना सबसे जटिल रहस्य है, देवता को देखना सबसे असंभव घटना और धर्म का खेल जान लेना सबसे मुश्किल पहेली, वैसे ही संस्कृताचार्यों की वाणी समझ लेना। वैसे वे हमारे-आपके समझने के लिए संस्कृत भाखते ही नहीं, दिलोदिमाग पर, नस-नस में, चित्त में, चेतना में, अवचेतन में, होश में, बेहोशी में भी अपने विकट पांडित्य का सिक्का जमाने के लिए संस्कृत की माला जपते हैं। शिवलिंग का दिव्य स्नान एक ऐशे ही बुद्धिबेधक मंत्र से शुरू होता है 

ऊँ त्रयम्बकम यजामहे सुगंधि पुष्टिवर्धनम् ।

उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ।।

           

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