रणेंद्र का आलेख 'अथक सृजन की विकलता दूधनाथ सिंह'


दूधनाथ सिंह 



'अथक सृजन की विकलता दूधनाथ सिंह'


रणेंद्र


दूधनाथ सिंह की याद आते एक बहुविधा के सर्जक पुरखे की छवि मन में झलकती है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को ठीक से जानने के बाद लगता है कि सृजन की इतनी व्याकुलता, सिसृक्षा की इतनी बेचैनी हिंदी जगत में बहुत कम ही दिखती है। एक ही सर्जक, एक ही रचनाकार साहित्य की लगभग सभी विधाओं में इस तरह से अनुपम और उत्कृष्ट रच सकता है, यह अपने आप में अद्भुत है। साथ ही, केवल हर विधा में रचना ही नहीं बल्कि लीक से हट कर अपना खुद का एक नया मानक गढ़ना, यह उनके व्यक्तित्व को एक अनोखा और विशिष्ट कौंध प्रदान करता है। हालांकि उनके कथाकार' को आलोचकों ने ज्यादा तवज़्ज़ो दी है। खासकर, उनकी कुछ रचनाओं पर लगातार विवाद होते रहने के कारण सामान्य पाठक की स्मृति में वे एक कथाकार के रूप में ही अंकित हो कर रह गए। लेकिन यथार्थ यह है कि इस सर्जक की सर्जना के कई-कई रूप हैं, वे प्रवीण आलोचक, नाटककार, संपादक, संस्मरणकार और अत्यंत समर्थ सुकवि हैं।

उनकी अबाध सृजनशीलता कृतित्व पर चर्चा के पूर्व उनके व्यक्तित्व पर एक नजर डाली जाए। दरअसल उनकी इस रचने की अथक बेचैनी व्यग्रता के पीछे उनका जीवन-चरित्र है जो बड़े ऊबड़-खाबड़ रास्तों से आगे बढ़ा था। उनका अर्थ जर्जर बचपन, दूसरों की कृपा से पढ़ाई, स्नातकोत्तर की डिग्री के बाद भी आजीविका के लिए जद्दोजहद, भरी जवानी में यमदूत सा प्राणान्तक यक्ष्मा रोग, ऊपर से रोगी-देह में प्रेमी- हृदय, कवयित्री निर्मला ठाकुर से प्रेम और अंतरजातीय विवाह, प्रथम मिलन में खून की उल्टियाँ आदि-आदि ने उनके चेतन और अवचेतन पर न जाने कितने ढंग से, कितने प्रभाव छोड़े। कितना कच्चा माल उन्होंने अपने जीवन, अपने परिवेश, अपने मित्रों विजयमोहन सिंह, ज्ञानरंजन, रवींद्र कालिया, काशीनाथ सिंह आदि) और निराला-महादेवी-पन्त जैसे शुभ चिन्तकों से ग्रहण किया? किन्तु जितना भी ग्रहण किया उससे कई-कई गुना ज्यादा उन्होंने हिन्दी साहित्य जगत को लौटाया।

उनका जन्म 17 अक्टूबर 1936 में बलिया जिले के सोबन्था गांव में एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता देवकीनंदन सिंह एक छोटे किसान थे। घर में पढ़ने-पढाने का कोई माहौल नहीं था। छोटा किसान परिवार जीवन को जैसे-तैसे खींच रहा था। लेकिन किताबों के प्रति ऐसा आकर्षण कि पशु चराते वक्त भी दूधनाथ किताबें पढ़ते रहते। साथी चरवाहे जब उन पर हंसते तो पेड़ों पर चढ़ कर छुप कर पढ़ते। चाचा के सहयोग से उन्होंने स्रातक किया और बलिया के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट की सिफारिश से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एम. ए. में प्रवेश मिला। स्रातकोत्तर के बाद उन्होंने दो साल तक (1960 से 62) कोलकाता के रंगूटा हाई स्कूल में प्राचार्य के तौर पर अध्यापन का कार्य किया। वहीं राजकमल चौधरी के भी संपर्क में रहे। लेकिन 1962 में पुनः इलाहाबाद लौट आए। 1963 में दैनिक 'लीडर' में उप संपादक बने। किंतु 1964 में यक्ष्मा रोग से ग्रसित हो कर सेनेटोरियम पहुंच गए। इसी बीमारी के दौरान उन्होंने कवयित्री निर्मला ठाकुर से अंतरजातीय प्रेम विवाह किया। बीमारी से मुक्त होने के बाद चार वर्षों तक आकाशवृति की। फिर सुमित्रानंदन पंत के प्रयास से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापक हुए और 1994 अपनी सेवा में निवृत्ति तक वहीं रहे। सेवानिवृत्ति के बाद इलाहाबाद से थोड़ी दूर झूसी में जा कर बस गए और कैंसर पीड़ित हो, स्मृति शेष (12 जनवरी, 2018) होने तक अपनी सृजनशीलता की गति को अबाध बनाए रखा।



उनके कृतित्व की चर्चा का शुभारंभ उनकी कविताओं से करना चाहूंगा। उनका पहला काव्य संग्रह 'अपनी शताब्दी के नाम', 1967 में प्रकाशित हुआ। उनकी कविताओं में उनके जीवन के सघन अनुभव और सांद्र संवेदनायें एक-एक पंक्तियों में छलकती हैं। अपनी अन्य कृतियों के अनुरूप कविताओं में भी दूधनाथ सिंह सामाजिक विद्रूपताओं की सरल अनुभूति कराते हैं। यहां भी उनका सात्विक क्रोध लयबद्ध हो कर एक पहाड़ी नदी की तरह हमारे मन-मस्तिष्क में उतरता, हिलोड़े भरता है।

वेब पत्रिका 'समालोचन' के 2 फरवरी, 2018 के अंक में कवि-आलोचक सदाशिव श्रोत्रिय अपने स्मृति आलेख में कवि दूधनाथ सिंह को कुछ यूँ याद करते हैं, "धर्मयुग में 1964 में प्रकाशित उनकी एक कविता युवा खुशबू' की कतरन को मैं लंबे समय तक अपने पास संभाल कर रखे रहा। यह कविता उनके रचना चयन 'अपनी शताब्दी के नाम' में संकलित है। दुःख मेरी धरती' को भी मैं एक अद्भुत काव्य रचना पाता हूँ। यही बात मैं उनके काव्य-संग्रह 'एक और भी आदमी है' की 'तैमूरलंग', 'कृष्णकांत की खोज में दिल्ली यात्रा, तथा 'युवा खुशबू और अन्य रचनाएं' में संकलित 'नौहा, 'संगम पर गंगा', 'प्रजाकाम', 'आत्मा में', 'पूर्वज' आदि अन्य कविताओं के बारे में कह सकता हूं।

सदाशिव श्रोत्रिय ने अपने आलेख को दूधनाथ जी की एक सुदीर्घ व्यंग्य-कविता 'कृष्णकांत की खोज में दिल्ली यात्रा' पर केंद्रित किया है। वे इस कविता को हमारे समय की बेहतरीन लंबी कविताओं में गिनते हैं और इसे हिंदी की एक श्रेष्ठ व्यंग्य-रचना के रूप में देखते हैं। उन्हीं के शब्दों में, "इस कविता का कोई भी पाठक महसूस कर सकता है कि यह कविता अन्तःप्रेरणा के उस तीव्र आवेग में लिखी गई होगी जो किसी भी काव्य रचना को एक उम्दा रचना बनाती है। इस कविता के आरंभ से अंत तक यह रचनात्मक आवेग कहीं शिथिल नहीं होता और इसलिए कविता की दीर्घता के बावजूद इसकी अन्विति पूरी तरह बनी रहती है। इस कविता के कलेवर और भाषा से प्रकट है यह समूची कविता कवि द्वारा अपने किसी मित्र के प्रति गुस्से के भाव से लिखी गई है। पाठक जब इस कविता को ध्यान से पढ़ता है तो उसे जल्दी ही इस बात का अनुमान हो जाता है कि इसमें वर्णित कृष्णकांत वास्तव में कौन है क्योंकि उस समय के बहुचर्चित कवि श्रीकांत वर्मा के काव्य संग्रहों: 'भटका मेघ', 'दिनारम्भ' और 'माया दर्पण' से, जिनका उल्लेख इस कविता में परोक्ष रूप से पंक्तियों में हुआ है, उस समय का कोई भी काव्य पाठक का अपरिचित नहीं था।"

तो ऐसी है दूधनाथ सिंह की कविताओं की ताकत जो बेधड़क नंगे को नंगा कह सकती है और सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे शख्स को भी आईना दिखा सकती है। लेकिन आलोचक रघुवंश मणि और कवि अनिल सिंह के साथ अपने साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने कविता क्यों छोड़ दी? उन्हीं के शब्दों में, "कविता का रास्ता मुझ से सधा नहीं इसलिए मैंने छोड़ दिया। मैं उस किसी विधा में लिखना नहीं चाहता, जिसमें मुझसे अच्छा लिखने वाला विद्यमान हो। चाहे लोग मुझे जितना मारें पीटें, वे जानते हैं कि कथा-साहित्य में मुझे पार पाना आसान नहीं है।" (साक्षात्कार : 'कहा-सुनी')




हालांकि यह भी सच है कि कविता लिखना उन्होंने बंद नहीं किया और 2014 में इकहत्तर प्रेम कविताओं का संग्रह 'तुम्हारे लिए' और 2015 में एक और संग्रह 'एक अनाम कवि की कविताएं' प्रकाशित हुई।

आलोचक के रूप में भी उन्होंने अपने मानक खुद बनाए। उन्होंने सायास अकादमिक आलोचना के बने बनाए ढांचे को तोड़ा। महाप्राण निराला, महादेवी या मुक्तिबोध पर लिखते हुए उन्होंने अपने कथाकार या संस्मरणकार की शैली का भी उपयोग किया। इससे उनकी आलोचना की भाषा शुष्कता से अलग हट कर सरस संवादमयी हो जाती है, जो गुण संस्मरण में देखे जाते हैं वह उन्होंने आलोचना में लाने की कोशिश की।

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक कुलदीप कुमार ने द हिन्दू में 12 जनवरी, 2018 को प्रकाशित अपने स्मृति-आलेख में दूधनाथ सिंह के आलोचना कर्म को शिद्दत से याद किया है कि कैसे 1972 में जब उनकी पहली आलोचना कृति 'निरालाः आत्महंता आस्था' प्रकाशित हुई और वे आलोचक रूप में स्थापित हो गए। श्री कुमार के शब्दों में, "यह पुस्तक भी आलोचना की सामयिक रुढ़ियाँ तोड़ने वाली थी और प्रचलित अकादमिक आलोचना से एकदम अलग तरह की आलोचना प्रस्तुत करती थी। यह मूलतः एक लेखक का अपने से वरिष्ठ लेखक के साथ आत्मीय संवाद था और उस प्रक्रिया का उ‌द्घाटन था जिससे एक लेखक दूसरे लेखक को समझने के क्रम में गुजरता है।"

दूधनाथ सिंह' लौट आ, ओ धार' शीर्षक संस्मरण की पुस्तक में अपने निर्माण में महाप्राण निराला, महादेवी और सुमित्रानंदन पंत के देय को पूरी विनम्रता से स्वीकार किया है। एक तरह से इन तीनों कवियों और उनके कवित्व पर विस्तृत विश्लेषणात्मक लेखन कर उनके ऋण से उऋण होने की कोशिश की है। महीयसी महादेवी वर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उनकी पुस्तक 'महादेवी', 2009 में प्रकाशित हुई। इसके 'उपकथन' में उन्होंने स्वीकार किया है कि, 'मैंने सिर्फ और सिर्फ उनके किए धरे, उनके जीने-मरने, उनके सोचने-विचारने, उनका हठ और मौन, उनकी निर्धारिणी हंसी के परदे में छिपे संसार उनके तलघर और बाहर की मेरी निजी खुली हवा को ही अपने इतिवृत्त और विश्लेषण का आधार बनाया है। संस्मृतियाँ और महादेवी का जीवन-वृत्त लिखने की कोशिश भी उनके 'कर्तृत्व' को व्याख्यायित करने और उसके सार्थक सारतत्व तक पहुंचाने की एक बुनियाद के बतौर हैं।"



1995 में प्रकाशित अपने संस्मरण की पुस्तक, 'लौट आ, ओ धार' के प्राक्कथन में वे इलाहाबाद शहर में अपने अभिभावक तुल्य पंत जी को कुछ यूं पाद करते हैं "इसमें सुमित्रानंदन पंत हैं जो पूरी किताब में गुथे हुए हैं।"

इस पुस्तक में पंत जी से जुड़े हुए कई सुखद और सुंदर अनुभव दूधनाथ सिंह ने उकेरा है। अपने इन्हीं संस्मरणों के क्रम में वे पंत जी की उत्तर-छायावादी काव्य प्रवृतियों पर भी महत्वपूर्ण, साहसपूर्ण प्रतिकूल टिप्पणी करने से भी नहीं हिचकते।

उनकी आलोचना की तीसरी पुस्तक 'मुक्तिबोधः साहित्य में नई प्रवृत्तियां, 2013 में प्रकाशित हुई। दूधनाथ सिंह जी के शब्दों में, "वे (मुक्तिबोध) वस्तु और शिल्प के बिल्कुल नए आविष्कारक हैं। वे सिर्फ कवि ही नहीं अपने समय के बड़े आलोचक भी हैं।

रचना प्रक्रिया को ले कर उन्होंने 'तीसरा क्षण नाम से एक नया सिद्धांत प्रस्तुत किया, जो खरा समस्त भारतीय काव्यशास्त्र और पश्चिमी आलोचना सिद्धांत के लिए चुनौती है। चिंतन और सामाजिक चिंता ही मुक्तिबोध को एक समर्थ कवि और हिंदी कविता के इतिहास में एक अलग तरह का कवि बनाती है 'तार सप्तक' उनके काव्य-रचना की पहली सीढ़ी है, जिसमें वे अपने एक निजी शिल्प, एक निजी भाषिक दायित्व और एक कथ्य की खोज करते हैं।"

अब कथाकार दूधनाथ सिंह से जुड़े कुछ तथ्यों की चर्चा की जाए। वे साठोत्तरी कहानियों के दौर के अग्रणी कथाकार हैं। कुलदीप कुमार के शब्दों में, "1960 के दशक की शुरुआती वर्षों में ही स्पष्ट होने लगा था कि 'नई कहानी' अपना प्रभाव खोती जा रही है। देवीशंकर अवस्थी जैसे पैनी नजर वाले आलोचक उसमें कुछ नया नहीं देख पा रहे थे और एक तरह के बासीपन का अहसास करने लगे थे। इसी समय नवोदित कहानीकारों ने अपनी कहानी को 'साठोत्तरी' का नाम दिया और महेंद्र भल्ला, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह ज्ञानरंजन, रवींद्र कालिया और विजय मोहन सिंह इसके प्रतिनिधि रचनाकार के रूप में स्वीकृत हुए। जहाँ 'नयी कहानी' की भाषा अनुभवों से अलग किसी चमत्कार या अलंकार की तरह थी, वहीं साठोत्तरी कहानी' के कहानीकारों ने बिल्कुल नई किस्म की निजी कथा- भाषा निर्मित की जिसमें अनुभव ही पारदर्शी हो कर भाषा के रूप में ढल रहे थे।" (वही, पूर्वोक्त)

कथ्य और कहन दोनों में दूधनाथ सिंह अपने साथी कथाकारों से सर्वथा अलग थे। उन्होंने विषयों के चयन और अभिव्यक्ति की शैली दोनों ही स्तरों पर अपना एक निजपन, अपना खास सिग्नेचर ट्यून विकसित किया। और उनकी यह प्रक्रिया उनके पहले कहानी संग्रह 'सपाट चेहरे वाला आदमी' (1959) से शुरू हो कर 'सुखांत' (1971-72) तक अपने चरम पर पहुंचती है। अपनी पुस्तक 'कहा सुनी' में दूधनाथ सिंह स्वयं इस दौर की अपनी कहानियों के संदर्भ में कहते हैं, "उनकी पृष्ठभूमि में आजादी से मोह भंग है। वैचारिक संघर्ष और परिवार के टूटने, राजनीतिक दिशाहीनता की धीमी आहट, एकल परिवारों में पत्नी तथा प्रेम का द्वंद्व और अंतर विरोध इन कहानियों का उत्स है और मेरी ही नहीं उसे समय लिखने वाले सभी महत्वपूर्ण कहानीकारों की विषय वस्तु का विश्लेषण इसी तरह से है।" (पृष्ठ: 125)




'सुखांत' के लगभग बीस साल के अंतराल के बाद' माई का शोकगीत' कहानी-संग्रह आता है, उसके बाद 'धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे', 'तीन इंद्रधनुष', 'जलमुर्गियों का शिकार' आदि संग्रह प्रकाशित होते हैं!

'माई का शोकगीत' से प्रारंभ होने वाले उनके दूसरे दौर की कहानियों पर वीरेंद्र यादव की टिप्पणी है कि, "माई का शोकगीत', 'धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे', 'काशी नरेश से पूछो', आदि कहानियाँ उनके कथाकार का पुनराविष्कार है। एक तरह से ये कहानियाँ उनके मूल रचनात्मक धरातल है जहां वे राजकमल चौधरी और कोलकाता के प्रभाव से मुक्त दीखते हैं। कहा जा सकता है कि बाद के दौर की कहानियों के द्वारा उनकी अपनी जड़ों की ओर वापसी हुई थी। दरअसल वे उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के गांव में जन्मे और पले बढ़े थे और उनके भीतर कहीं गहरे ग्रामीण चेतन कुंडली जमाई बैठी थी।" (विमर्श और व्यक्तित्वः पृ-155)



उनके तीन उपन्यासों में प्रथम 'नमो अंधकारम', (1998) और दूसरा 'निष्कासन' (2002) पर बहुत ही बवाल मचा था। इन दोनों रचनाओं में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उनके परिचितों की इतनी सघन उपस्थिति थी कि हिंदी जगत की सारी गप्प गोष्ठियाँ अटकलबाजियों और अफवाहों से भर गई। इस रचना के कथ्य और कहन दोनों इतने मारक, व्यंग्य-वाणों से भरे हुए हैं कि इसके बाद तो बवाल होना ही था। रघुवंश मणि के साथ अपने साक्षात्कार में वे साफ-साफ कहते हैं कि, "नैतिक गुस्से के बिना कोई लेखक नहीं हो सकता। और जहां अनैतिकता होगी गलत काम होगा, उस पर गुस्सा करना और गुस्से को रचना एक लेखक का कर्तव्य है। मैंने किसी व्यक्ति विशेष के बारे में नहीं लिखा बल्कि नैतिक पतन की स्थितियों के बारे में लिखा यह हमेशा एक लेखक के कलात्मक अवदान का एक हिस्सा होती है। लोगों ने अपना चेहरा देखा इसका यह अर्थ है कि मेरा कलात्मक दर्पण एकदम पारदर्शी था और यह मेरी सफलता है।" (वही, पूर्वोक्त)

सुप्रसिद्ध आलोचक वीरेंद्र यादव उनकी अन्तिम उपन्यास 'आखिरी कलाम' (2003) को उनकी सृजनशीलता की चरम परिणति के रूप में देखते हैं। उन्हीं के शब्दों में, "दरअसल दूधनाथ सिंह ने अपने उपन्यास 'आखिरी कलाम' को वैचारिक हस्तक्षेप का अस्त्र बनाया था। संरचनात्मक और वैचारिक तोड़फोड़ की जुगलबंदी को जिस दक्षता के साथ उन्होंने इस उपन्यास में साधा है वह विरल है। यह करते हुए उन्होंने बहुत सी स्वीकृत मान्यताएं और निर्मितियाँ ध्वस्त की थीं। वे धर्मनिरपेक्षता को प्रश्नांकित करते हुए जहां धर्म को ही निशाने पर लेते हैं वहीं प्रतिरोध की धारा से भी उपन्यास के अंतर्वस्तु में प्रश्न करते हैं कि विचार रणनीति और जनता की सोच समझ में तालमेल क्यों नहीं बैठता?" (वही, पृः 157)



दूधनाथ सिंह जी ने संपादन का काम भी कम नहीं किया है। 1969 में 'तारापथ' में उन्होंने सुमित्रानंदन पंत की अपनी पसंदीदा कविताओं का चयन प्रस्तुत किया था। फिर 2007 में निराला की भक्तिपरक कविताओं का संग्रह "दो शरण", 2011 में 'एक शमशेर भी है', 2011 में ही केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं का संग्रह 'ओट में खड़ा मैं बोलता हूं', 2012 में 'भुवनेश्वर समग्र', 2013 में 'सात भूमिकाएं' जिसमें महादेवी वर्मा के विभिन्न काव्य संग्रहों के लिए लिखी गई ऐतिहासिक भूमिकाओं को संग्रहीत किया। 1975 में आपातकाल के प्रतिकार में उन्होंने 'पक्षधर' पत्रिका का संपादन किया था जो प्रकाशित होते ही जप्त हो गई थी।

2017 में उनकी आखिरी पुस्तक आई थी, 'सबको अमर देखना चाहता हूँ' इस पुस्तक की भूमिका में उनके शब्द थे कि, "जीवन एक आश्चर्य की तरह बचा है और शायद आश्चर्य की तरह ही नष्ट हो जाएगा। संतोष यही है कि अपना काम, अपने ढंग और अपनी कमजोरी के साथ बखूबी निभाया। कोई कोताही नहीं की।"

वीरेंद्र यादव के अनुसार, "शमशेर, भुवनेश्वर, मुक्तिबोध पर पुस्तकों के बाद उन्हें गुरु डॉ धीरेंद्र वर्मा की पांच खंडों में प्रकाश्य रचनावली के संपादन का कार्य पूरा कर लिया था। इन्हीं दिनों उन्होंने 'सात नदी बेटियां' शीर्षक से उपन्यासिका भी लिख कर समाप्त कर डाली थी जिसके कुछ अंश एक पत्रिका में प्रकाशित भी हुए थे। दुर्गम अभेद्य अबूझमाड़ पर भी उपन्यास लिखने की इरादे से कुछ नोट्स ले रखे थे। लेकिन अफसोस कि उनके ये काम उनके जीवन में अधूरे और अप्रकाशित रह गए।" (वही, पृ 159)

रघुवंशमणि और अनिल सिंह के साथ हुए साक्षात्कार में उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त की है, "रचनाकार के रूप में तो मैं चाहूंगा कि मेरी रचनाओं को लोग प्यार करें और याद रखें क्योंकि वह अपने युग का संस्मरण है। उसमें भाषाई कान्ति और छलना भी है। उसमें ऐसा बहुत कुछ है जिसे अगर लोग खोजेंगे तो अपने जीवन में भी पाएंगे। जो आदमी अपने सारे लेखन-जीवन में तिरस्कार, उपेक्षा, उदासीनता, दुष्टताओं और षड्यंत्रों का शिकार रहा है उसे थोड़ा प्यार से याद किया जाना चाहिए। यह शायद हर लेखक चाहेगा। व्यक्ति के रूप में मैं चाहूंगा कि मेरी गलतियों, बड़बोलियों और मेरे दोषों को लोग क्षमा करें कि मैं 'आदमी' था और इंसान' बनना चाहता था।" (वही, पूर्वोक्त)




सम्पर्क 


नारायण इन्क्लेव, ब्लॉक ए,

हरिहर सिंह रोड, मोरहाबादी,

राँची, झारखंड, 834008


ई मेल : kumarranendra2009@gmail.com


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