पंकज मोहन नोबेल साहित्य विजेत्री ऐन कार्सन
![]() |
| ऐन कार्सन |
सौंदर्य के प्रति एक सहज आकर्षण होता है। यह आकर्षण हमें प्रेमासक्त करता है। प्रेम तात्कालिक रूप से किसी की परवाह नहीं करता। दूसरों की ही नहीं, खुद अपनी भी नहीं। ऐन कार्सन ने अपनी किताब "पति का सौन्दर्य" में प्रेम के इस पक्ष पर खुल कर बात किया है। हालांकि आगे चल कर वे प्रेम में उन्हें धोखा मिलता है लेकिन तब भी उन्हें अपने प्रेम पर कोई पश्चाताप नहीं। नोबेल साहित्य पुरस्कार की दौड़ में ऐन कार्सन पिछले कई वर्षों से बनी हुई थीं। इस वर्ष के पुरस्कार के लिए अन्ततः उनका नाम ही घोषित किया गया। पंकज मोहन ने ऐन कार्सन पर एक आलेख लिखा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पंकज मोहन नोबेल साहित्य विजेत्री ऐन कार्सन।
नोबेल साहित्य विजेत्री ऐन कार्सन
पंकज मोहन
कल जब 2026 के नोबेल पुरस्कार विजेत्री के रूप में ऐन कार्सन के नाम की घोषणा हुई, मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। पिछले कुछ वर्षों से पुरस्कार की दौड में वह शीर्षस्थ थीं।
मैंने उनके व्याख्यान के विडियो देखे थे। उन्हें सुन कर ही मुझे मालूम हुआ कि देकार्ते ने यह नहीं कहा था, मै सोचता हूं, इसलिए मैं हूं। पूरी पंक्ति है: "Dubito, ergo cogito, ergo sum", अर्थात मुझे शंका या संदेह है, इसलिए मैं सोचता हूं, इसलिए मैं हूं।
ऐन कार्सन ने हाई स्कूल में ही लैटिन और ग्रीक की पढाई शुरु कर दी थी। बी.ए., एम.ए., पीएच.डी. मे उन्होने क्लासिकल स्टडीज (पाश्चात्य जगत की प्राचीन भाषा और साहित्य) का गहन अध्ययन किया और सारा जीवन ग्रीक-लैटिन भाषा में लिखे प्राचीन ग्रंथों को पढा-पढाया। अपनी कुछ साहित्यिक कृतियों की रचना भी उन्होने ग्रीक पौराणिक कथाओं को आधुनिक युग की समस्याओं से जोड़ कर की है।
इस युग के महान आलोचक हेरोल्ड ब्लूम ने लिखा है, "यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि ऐन कार्सन हमारे युग की प्रतिभाशाली कवयित्री हैं और हमें यदि अपने जीवन काल में उनकी रचनात्मक प्रतिभा और उपलब्धियों से अवगत होने का अवसर नहीं मिला, तो यह हमारे लिए अफ़सोस की बात होगी।"
उनकी एक पुस्तक है "पति का सौन्दर्य" जो टैंगो के रूप में विरचित एक ऐसी कृति है जिसे हम कथात्मक कविता या पद्यात्मक उपन्यास कह सकते हैं। चूंकि इसका एक भाग तलाक की प्रक्रिया से गुजरती हुई पत्नी की दृष्टि से लिखा गया है और दूसरा भाग बेवफा पति की दृष्टि से, और कथानक का विकास टैंगो नृत्य की तरह होता है, इसलिए लेखिका ने इसका शीर्षक रखा, "The Beauty of the Husband: A Fictional Essay in 29 Tangos"। इस पुस्तक में स्त्री हृदय के तीव्र भाव और मनोवेग का सहज संवेदना के साथ निरूपण हुआ है। प्रेम, मोहभंग, पीड़ा, अनिश्चय, वासना और कल्पना के सूत्र से गूंथी यह कथा हृदय को छूती है।
"किसी भी चीज़ के प्रति वफ़ादार नहीं मेरा पति।
तो फिर मैंने उससे प्रेम क्यों किया, किशोरावस्था के शुरुआती दिनों से लेकर परिपक्व वयस्कता तक,
और तलाक़ का फ़ैसला डाक से क्यों आया?
"सुंदरता। इसमें कोई बहुत बड़ा रहस्य नहीं है। मुझे यह कहने में शर्म नहीं आती कि मैंने उससे उसकी सुंदरता के कारण प्रेम किया।
उसकी गंभीरता उसे तोड़ देती है।
जो लोग एक-दूसरे के साथ गंभीरता से समय बिताते हैं,
उनके बीच का रिश्ता सतही नहीं होता।
उनके बीच रखी मेज़ पर
मिनरल वॉटर की एक बोतल
और दो गिलास हैं।
किसी मादक पेय की ज़रूरत नहीं!
उसने यह नया शुद्धतावादी स्वाद
आख़िर कब विकसित कर लिया?"
इस किताब के 29 टैंगो पूरी स्पष्टता और ईमानदारी के साथ लिखे गए हैं। इसमें ऐसी अनेक पंक्तियाँ हैं, जो लेखिका की व्यथा को अन्तर्दृष्टि के साथ अभिव्यक्त करती है:
इच्छा² = प्यार
प्यार² = दीवानगी
दीवानगी² = शादी
(इच्छा का वर्ग प्रेम है, और प्रेम का वर्ग पागलपन। पागलपन का वर्ग विवाह है।)
कथानक इस प्रश्न के इर्द गिर्द बुना गया गया है कि विषाक्त प्रेमियों के प्रेमपाश में बंध कर हम अधीनस्थता को क्यों स्वीकार करते है, यह जानते हुए भी कि यह रिश्ता दुखदायी है, भयावह है और इसमें उसे हानि के सिवा और कुछ हासिल होने वाला है? यहां सुंदरता की अवधारणा सामने आती है। लेखिका जॉन कीट्स से प्रेरणा ग्रहण करती है - 'ट्रुथ इज ब्यूटी ऐंड ब्यूटी इज ट्रुथ'। सुंदरता का अर्थ व्यापक है।
इस बारे में कार्सन लिखती हैं:
**“(…) और मैं खेद व्यक्त नहीं करूंगी, क्योंकि जैसा कि मैंने कहा, इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी। मैं अस्तित्व के सामने असुरक्षित थी,
और अस्तित्व सुंदरता पर निर्भर करता है।
अंततः,
अस्तित्व तब तक नहीं रुकेगा,
जब तक वह सुंदरता प्राप्त नहीं कर लेता। और फिर उन तमाम परिणामों का सिलसिला शुरू होगा, जो अंत की ओर ले जाते हैं।
विश्लेषण को बीच में लाना व्यर्थ है।
या इससे भी कहीं अधिक संक्षिप्त रूप में:
“सुंदरता ही वासना को वासना बनाती है।”
पति के विश्वासघात की पीड़ा से त्रस्त पत्नी घातक प्रेम संबंधों की सारी क़ीमत चुकाती है। वह जानती है कि उसके साथ क्या हो रहा है, फिर भी वह बार-बार अपने सिद्धांत और आत्मसम्मान के साथ समझौता कर लेती है। परित्यक्ता के दर्द के आंसू इन पंक्तियों में छलक उठे हैं।
"अनेक पत्नियों की तरह, मैंने भी अपने पति को देवत्व तक उठाया और उसे उसी आसन पर विराजमान रखा।
शक्ति क्या है?
मित्रों या परिवार का विरोध उसे और भी मज़बूत बना देता है।
मुझे याद है, माँ की उससे पहली मुलाक़ात।
एक दिन स्कूल से लौटते हुए मैं एक किताब घर लाई थी, जिसके भीतर के खाली पन्ने पर उसका नाम लिखा था।
उस पर नज़र पड़ते ही माँ ने कहा,
“मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति पर विश्वास नहीं करूँगी, जो ख़ुद को X कहता हो।”
उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा उजागर हुआ—
उसी क्षण हमारे बीच बाबेल की मीनार जैसी भाषा की दीवार खड़ी हुई। हमने एक दूसरे को समझना बन्द कर दिया।
लोहे के स्वाद जैसी अनुभूति हुई
मां की चेतावनी भविष्यवाणी थी।
उनकी सभी भविष्यवाणियाँ सच साबित हुईं, हालाँकि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था।
“ख़ैर, यह उसका नाम है,” मैंने कहा और किताब रख दी।
वह पहली रात थी।
(मैं पंद्रह वर्ष की थी।)
मैंने अपने शयनकक्ष की खिड़की धीरे-धीरे, चरमराहट की आवाज दबाते हुए उठाई और उससे मिलने बाहर निकल गई।
उस सँकरी घाटी में, भीगे कपड़ों में भोर तक भटकती रही और उस भाषा में किए गए वादों से लिपटी रही
जो अद्भुत थी और कंठ में सबसे पहले फूटी थीं
मैं उस भाषा के सामने बेबस, मूढ-सी खड़ी रही,
देखती रही कि कैसे उसके पुराने सुनहरे और उससे भी मनोहर नीले रंग स्वयं विसर्जित हो रहे थे,
मानो मोर पिंजरों से निकल कर ईश्वर की किसी ख़ाली रसोई में जा रहे हों।
ईश्वर—
या कोई देवपुत्र शासक
नेपोलियन।
हिरोहितो।
आप जानते हैं, उपन्यासकार ओए केन्जाबुरो ने किन शब्दों में बांधा था उस क्षण को जब सम्राट हिरोहितो ने रेडियो पर एक सामान्य मनुष्य की तरह आत्मसमर्पण का संदेश दिया।
"युवा और वृद्ध रेडियो के पास बैठे और रोए।
बच्चे धूल-धूसरित सड़क पर इकट्ठा हुए और विस्मय से फुसफुसाए।
वे स्तब्ध थे, निराश भी, कि उनके सम्राट की आवाज़ भी एक साधारण मनुष्य की आवाज़ थी।
वे मूक, किंकर्तव्यविमूढ भाव से एक-दूसरे को देखते रहे।"
कैसे विश्वास करें कि गर्मियों में एक ऐसा दिन नियत होगा जब ईश्वर मनुष्य बन जाएगा?”
हमारी शादी के एक साल से भी कम समय में, मेरे पति को देर रात एक महिला का फ़ोन आने लगा।
अगर मैं फ़ोन उठाती, तो वह काट देती।
सुनते-सुनते मेरे कानों में भी जैसे खराश उतर आई।
तुम कैसी हो?
—
नहीं।
—
शायद। आठ। क्या तुम कर सकती हो?
—
सफ़ेद वाला। हाँ, बिल्कुल।
—
हाँ।
विश्वासघात की आवाज़ के मांसल आवरण की दीवार से अधिक उन्मादक, अगम्य, घातक और क्या हो सकता है?
फिर भी, काफी समय तक वह ऐसी बातचीत में लिपटा रहा जो घड़ी की टिक-टिक से भी अधिक नीरस और ऊबाऊ थी।
एक पिल्ला
इसी तरह सुनना सीखता है।
और चाँदी जैसी चमचमाती चीज की चुभन से भी उसे सीख मिलती है।
ओए लिखते हैं,
कई बच्चों से कहा गया था, और कुछ ने इस पर विश्वास भी किया था, कि युद्ध समाप्त होने पर सम्राट अपने हाथों से तुम्हारे आँसू पोंछेंगे।



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें