नीतेश व्यास की कविताएँ


नीतेश व्यास 


बीते 8 अक्टूबर 2026 को नाना पाटेकर का अचानक हृदयाघात से निधन हो गया। नाना मराठी और हिंदी फिल्मों के उम्दा अभिनेता थे। अपने अभिनय से उन्होंने खुद को साबित किया। फिल्‍म 'परिंदा' में खलनायक की यादगार अभिनय के लिए उन्‍हें सर्वश्रेष्‍ठ सहायक अभिनेता का राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार और सर्वश्रेष्‍ठ सहायक अभिनेता का फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार भी दिया गया। इसके बाद उन्‍होंने कई बेहतरीन फिल्‍मों में काम किया। क्रांतिवीर, खामोशी, यशवंत, अब तक छप्‍पन, अपहरण, वेलकम, राजनीति उनकी प्रमुख फिल्‍मों में से एक हैं। नाना जीवन के अन्तिम समय तक कृषि कार्य से जुड़े रहे। उन्होंने एक साक्षात्कार में यह मंशा व्यक्त की थी कि मरने के बाद उनकी अन्त्येष्टि उनके फॉर्म हॉउस में की जाए जहां वह हमेशा जाते रहते थे। वे किसानों के दुख दर्द को शिद्दत से महसूस करते थे। खाने की बर्बादी से वे आहत होते थे। उनके भीतर रंगमंच को ले कर एक गहरी जिजीविषा दिखाई पड़ी इसीलिए वे किसी भी किरदार को अपने तरीक़े से जीने की कोशिश कर उसे पर्दे पर जीवन्त कर देते थे। हम उनकी स्मृति को नमन करते हुए प्रस्तुत कर रहे हैं नीतेश व्यास की कविताएँ जो उन्होंने नाना पाटेकर की स्मृति में लिखी हैं।


नीतेश व्यास की कविताएँ 


नेति नेतीति नाना


जो मर गये थे 

उन्हें मृत घोषित कर दिया

गया था

जो मरे हुए थे और ज़िन्दा

लाश बन घूम रहे चुपचाप 

उन पर किसी का ध्यान नहीं था

वो जनगणना में याद आते

जो मरने वाले थे

उनके परिजन कर रहे थे प्रतीक्षा

उनकी मृत्यु की

 

इन सब के बीच मरने का

अभिनय करते हुए तुम

ज़िन्दा थे करोड़ों लोगों के लिए 

कि जो जलाया जा रहा था

उसे तुम जला चुके थे बहुत पहले, समिधा संचयन कर

विचार, करुणा, सेवा अब नाना के पर्याय थे

और जनता का अनन्य प्रेम

अकूत सम्पत्ति


नाना


तुम कभी नहीं बने नाना

लेकिन अभिनय के जीवन को भाया 

तुम्हारा आना

एक बच्चे को खोना

टूट कर बिखरना , बिखर कर फिर उठ खड़े होना

नेति नेति उपनिषद् जिसे कहते ना, ना

तुम्हारे हर अभिनय के बाद लोग यही कहते

ना ना ये वो नाना नहीं 

मल्हार से उदय शेट्टी तक

और भी न जाने कितने रूपों को तुमने

पहना, उतार दिया तत्क्षण 

निखालिस इंसान बने रहने हेतु 

कौन-सी तपस्या की थी, 

जो बने सबके प्रिय नाना 

अब कौन बताएगा हमें?


मल्हार


वजूद मल्हार का

किसी राग की तरह भीगा-भीगा

जैसे राग भीतर आग

वैसे ही मल्हार में बैठा अश्वत्थामा

चुनौती देता ब्रह्मा को

कहता विष्णु से, अब तू नहीं हैं मेरा पालनकर्ता 

हे महादेव, अब मैं करूंगा संहार गहन अन्धकार


मैं अंधकार का स्वामी,

मैं आश्वस्त आत्मा... मैं हूँ अश्वत्थामा

तुम्हें नहीं लगा था कोई शाप 

"आश्वस्त आत्मा" ही है तुम्हारा विशेषण

ना कि अभिशप्त भटकता मणि-विहीन अश्वत्थामा 


सुना है जहां तुम रहते


प्रसिद्धियां वहां झाडू लगाती

समृद्धि भीतर आने को द्वार खटखटाती


समुद्र के किनारे हुआ था जन्म 

गर्जना और मौन का समुच्चय

एक अभेद्य-दुर्ग

जिसकी वाणी में गर्जता समुद्र

आंखों में एक मौन उदास चुप्पी

दुर्लभ वस्तुएं 

समुद्र ने ही दी है चाहे देवता हो या दानव

लेकिन समुद्र-सा मथीज कर

जीवन-गरल पी कर

हमें दिया अमृत-कलश

अपने श्रेष्ठ अभिनय का

अब वही होगा हमारा पाथेय


वह मानुष


न औपचारिक शिक्षा 

न अभिनय की विधिवत दीक्षा

अनुशासन आत्म का

मराठी थियेटर से उठते धुंए-सा

जो कब आग बन कर फैला

हिन्दी और मराठी सिनेमा का सेतु

ढह गया

ढह गया वह मानुष भी जो हाथ से पकाता 

और खिलाता अपनी गोद में खेलते गांव को


तुम्हारा चित्र कैसे करूं पूरा


सफ़ेद और काली दाढ़ी से ढका

एक सामान्य-सा चेहरा

जैसे सूखी घास से ढकी हुई

पर्वत की तलहटी

तमतमाती दो आंखें 

जैसे दो अग्निकुंड 

तीखी नाक 

मानों दूर से ही सूंघ लेती

अपने पराए की गन्ध 

कान, जिसने सुनी कई गालियां लेकिन उससे ज्यादा तालियां 

उन्नत चमकता ललाट 

जैसे मध्याह्न सूर्य का कोई टुकड़ा 

बोलने में तेजतर्रार 

खामोशी, पृथक् संसार 

चेहरे के भावों को क्षण-क्षण में बदलने की क्षमता

हृदय में शुभ्र कोमलता

नाना तुम्हारा चित्र कैसे करूं पूरा

चित्र मुख का ही अभी अधूरा 

मुझे चाहिए कैनवास बहुत भरा-पूरा



क्यूं जान बूझ कर बने रहे ताउम्र दुर्वासा


पुराणों में अत्रि और अनुसूया के पुत्र थे दुर्वासा 

जिन्हें सुलभकोपो महर्षि भी कहा गया

तुमने अपने बेटे का नाम रखा दुर्वासा 

जो दो वर्ष में ही बीमारी से चल बसा

मगर उसकी आत्मा को कस के पकड़ रखा था 

तुम्हारी आत्मा ने कि

क्रोध का एक अग्निकुंड सदैव जलता भीतर

जिसे तुमने अभिनय का आज्य प्रदान कर

जलाए रखा

कई बार तुम्हारे वाक्य अभिशाप की तरह निकले

न किसी कुन्ती को दिया वरदान 

न किसी शकुन्तला को अभिशाप 

तुम्हारे साथ रहना इतना कठिन तो नहीं था 

फिर तुम क्यूं जान बूझ कर बने रहे ताउम्र दुर्वासा


चुरा ले गयी तुम्हें मृत्यु


७५ के ही तो हुए थे अभी

वादा किया था अनिल कपूर से कि

एक बार फिर मचाएंगे धमाल

बन कर मजनू और उदय जैसे कोई किरदार 

वानप्रस्थ ही तो लगा था अभी तुम्हें 

संन्यास तो जी ही रहे थे तुम

तो शायद, तुम्हें पूर्णायुष मान

प्रेयसी की तरह चुपचाप आ कर 

चुरा ले गयी तुम्हें ...........मृत्यु


आंखों से झांकती आग थी


कभी ये भी विचार आता है

 कि वानप्रस्थ में ही तो जिए थे तुम,

अपने आस पास चारों तरफ उगा ली थी कांटेदार झाड़ियां, कि कोई न आए पास

उसके ऊपर हरी घास कि बची रह सके तुममें अभिनय की प्यास।

प्यास कहां थी अभिनय की

आंखों में,

नहीं नहीं 

आंखों से झांकती आग थी अंगारे बरसाती। 


अपने सफेद गमछे में लपेट कर रखता था काली घटाएं 


तुम्हारा सिनेमा 

बहुत कम देखा मैंने 

देखा जीवन, बिना अभिनय का

एक बेटे के खो जाने वाला जीवन

किसी टपकती छत पर पलस्तर सा लगता

किसी टूटे विद्यालय या उजड़े गांव को बसाता जीवन

अनाथ बच्चों को पढ़ाने वाला या

होते देखा बूढ़े किसान की आंखों का आंसू पीते हुए बादल सा

जो अपने सफेद गमछे में लपेट कर रखता था काली घटाएं 

जो बरसती किसान की आंखों का सपना बन।

मैने तुम्हारा जीवन देखा

अफ़सोस कि बहुत दूर से देखा


पहचान


नायक भी और खलनायक भी

मुख्य भी और सहायक भी

सर्वश्रेष्ठ भी और सबसे अन्त में खड़े आदमी के साथ भी

ये सब वही कर सकता जो

नानात्व में एक को देखता हो और

एक से ही निकले नाना को पहचानता हो


तुम


मुख्यमंत्री जी ने दिए हैं निर्देश

कि राजकीय सम्मान के साथ दी जाएगी 

नाना को अन्तिम विदाई

मुझे डर है

कि तुम चिता से उठ खड़े हो कर

देने न लग जाओ भाषण क्रान्तिवीर की तरह

कि "ऐ साला मुझे जलाने में क्यूं बर्बाद की इतनी लकड़ी

२० घरों का चूल्हा जल जाता इतने में 

डाल देते मशीन में 

और बटन दबाते ही सब राख

कहां का नाना, किस का नाना

जाओ जाओ घर, करो अपना पीना-खाना 



तुम्हारा अभिनय


प्रिय इरफ़ान के बाद 

तुम भी चले गये उसके पास 

कोई अवार्ड सेरेमनी 

थोड़े ही सजी है वहां कोई खास

कि तोड़ कर अपने प्रेमियों की आस

करने कोई अभिनय खास

चल दिये

ना लौटने की राह पर

करोड़ों भीगी आंखों का पानी

बहा ले आएगा तुम दोनों को

फिर इस धरती के पास

तब तक नाना और नाती 

दो सितारे,

टिमटिमाते रहो पास-पास 

कि तुम्हारा अभिनय देखता रहे

झिलमिल-आकाश

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