ऋतुराज का आलेख 'धूमिल'
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| धूमिल |
ब्रेन ट्यूमर के कारण 10 फरवरी 1975 को मात्र 38 वर्ष की आयु में धूमिल का निधन हो गया था। महंगे इलाज की दिक्कतें उनके सामने थीं। लेकिन स्वाभिमान भरा जीवन उनके लिए सबसे ऊपर था। धूमिल में प्रयोग करने का साहस था। कविता जो उस समय अबूझ हो चली थी, धूमिल ने अपने शिल्प के जरिए उसे पठनीय बनाया। धूमिल भाषा को विरोध की रणनीति का सबसे पैना और कारगर अस्त्र मानते थे जिसके इस्तेमाल में चूक और लापरवाही होने पर खुद घायल हो जाने का खतरा रहता है। उनकी मृत्यु के पश्चात अजमेर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका लहर ने धूमिल पर एक विशेषांक प्रकाशित किया। ऋतुराज जी ने भी एक आलेख लिखा जिसमें उन्होंने अपने अग्रज कवि को आत्मीयता से याद किया है। ऋतुराज जी अब खुद अतीत हो गए लेकिन वे अपनी रचनाओं में आज भी जिंदा हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ऋतुराज का आलेख 'धूमिल'। यह आलेख हमें रत्नशंकर पाण्डेय के सौजन्य से मिला है जिसे 'लहर' पत्रिका के नवम्बर 1977 अंक से साभार लिया गया है।
धूमिल
ऋतुराज
एक आत्मीज चेहरा गायब हो गया है और कविता इतने जिन्दा शब्दों के बावजूद हमलावरों के डर से खाली किये गये शहर की तरह दिखती है
'पतझड़'
हमने धूमिल को खो दिया है। राजकमल चौधरी, मुक्तिबोध और अब धूमिल इतने कम समय में इतनी जबरदस्त क्षति किसी और क्षेत्र में हो सकती है? हिम्मतपस्ती और खामोशी से भरे इस दौर में धूमिल का अचानक चले जाना भीषण अकेलेपन का एहसास देता है। डर लगता है कि जब इतना जानदार, हृष्टपुष्ट और अद्भुत जिजीविषा से भरा कवि इतने कम समय में अपनी जीवनकथा समाप्त कर गया, तो दिन प्रतिदिन निर्धनता, निराशा में टूटते बिखरते अन्य सहयात्रियों का क्या होगा? लेकिन इस डर को अपने भीतर पोसना धूमिल के विचारों के प्रति बेइन्साफ़ी होगी। क्योंकि वे बार-बार जोखम उठाने की बात करते थे। उनका सारा संघर्ष भाषा और व्यवहार में पायी जाने वाली कायरता के खिलाफ था :
मैंने महसूस किया कि मैं वक्त के एक शर्मनाक दौर से गुजर रहा हूँ।
उन्होंने साफ देखा कि इस दौर के बहुत से रचनाकार भाषा में झूठे साहस और व्यवहार में कायर समझौतापरस्ती के शिकार हो रहे हैं। लोग बार-बार पैंतरे बदलते हैं क्योंकि वे धारा से पिछड़ना भी नहीं चाहते और न ही इसके साथ बीच में बहने का खतरा मोल लेना चाहते हैं। साहित्यकारों के किसी भी दलगत पचड़े में पड़ने की बजाय धूमिल ने साफ कहा कि 'सवाल वयस्क और अवयस्क लेखन का है।' इसीलिये उनमें विपक्ष में खड़े रहने की दृढ़ता मौजूद थी। विपक्ष की भाषा कैसी होनी चाहिये? उसका विशिष्ट तेवर किस प्रकार आक्रामक और साथ ही आत्मरक्षात्मक हो? धूमिल के लेखन में जगह जगह भाषा के प्रति इस प्रकार की परिपक्व चेतनता दिखाई देती है :
मैं जानता हूँ कि इन्कार से भरी हुई चीख और एक समझदार चुप दोनों का मतलब एक है
'मोचीराम
भाषा के प्रति व्यक्तिवादी कलावादी रुझान रखने वालों से घूमिल को चिढ़ थी। आज भी ऐसे कवियों की भीड़ कुछ कम नहीं है, जो कविता की भाषा को सामान्य जन की भाषा से अलग एक विशिष्ट दर्जा देते हैं और शायद इसी वजह से अपनी गंदली 'समझ' को और ज्यादा गंदला देते हैं। धूमिल भाषा को विरोध की रणनीति का सबसे पैना और कारगर अस्त्र मानते थे जिसके इस्तेमाल में चूक और लापरवाही होने पर खुद घायल हो जाने का खतरा रहता है :
अपने लोगों की भीड़ में
भाषा को धीरे से धंसाओ
बिना किसी घाव के
शब्द बाहर आ जायेंगे
जैसे परखी में बोरे का अनाज
चला आता है
'मुनासिब कार्रवाई'
और जो रचनाकार भाषा द्वारा धोखा देना चाहते थे, उन्हें पटना सम्मेलन में घूमिल ने सचेत किया :
'मामूली आदमी को भाषा के स्तर पर आप धोखा नहीं दे सकते। अपनी जरूरतों के स्तर पर भी उसे धोखा नहीं दिया जा सकता। वह जानबूझ कर धोखा खाता है। भाषा वहीं होती है अपनी समूची छटपटाहट के साथ। यदि आप उस छटपटाहट में हिस्सेदार हैं तो वह आप में भी होगी। इसलिये मैं भाषा की तलाश की बात नहीं करता। असली सवाल है कि उसका इस्तेमाल करने का साहस आप में है या नहीं।'
धूमिल की कविता इसी साहस की अभिव्यक्ति है। तीखे व्यंग्य द्वारा वे उद्बोधन करते हैं कि रचनाकार का काम वस्तुस्थिति को बदलना है। उनकी कविता में उनके व्यक्तित्व जैसी ही स्वस्थ स्फूति है। कविता को काफी हद तक पठनीय बनाने का श्रेय धूमिल को ही दिया जाना चाहिये। उनके विचार की आनन्ददायी चमक और वाक्चातुर्य सबको आश्चर्यचकित कर देते थे। राजकमल चौधरी और मुक्तिबोध उनके प्रिय कवि थे। इन्हीं दोनों का मिला जुला प्रभाव उनके कृतित्व पर अवश्य पड़ा है। 'पटकथा' ऐसे ही प्रभाव की सबसे सशक्त और ईमानदार अभिव्यक्ति है। किन्तु 'मोचीराम' से ले कर 'कविता श्रीकाकुलम्' तक न जाने ऐसी कितनी रचनाएं हैं जिनमें धूमिल, सिर्फ़ धूमिल हैं- ठोस, खुरदरे और पूर्णवयस्क।
शायद यहाँ मेरे लिये अभी उपयुक्त अवसर नहीं है कि मैं धूमिल के काव्य पर इतने-छुट-पुट ढंग से लिखने की बजाय, उनके कृतित्व का विस्तृत मूल्यांकन करूं। शायद मैं इसके योग्य भी नहीं हूँ। लेकिन मैं शंकित जरूर हूँ कि कहीं कुछ मौक़ापरस्त और अखाड़ेबाज लोग अब निकट भविष्य में धूमिल का मूल्यांकन इस तरह करेंगे जो उनके फायदे में अधिक किन्तु धूमिल के व्यक्तित्व के लिए हानिकारक होगा। ये ही लोग भ्रम पैदा करते रहे कि धूमिल उनके गुट में हैं और वे ही धूमिल के एकमात्र शुभचिन्तक हैं। फिर क्या कारण था कि धूमिल दवा खरीदने के लिए पैसों के बिना मर गये? प्रशासन से मिली भीख को जो लोग आतुरता से तुरन्त स्वीकार कर लेते हैं, वे ही फिर प्रशासन की उदारता का भी यशगान करने में नहीं हिचकिचाते। शायद स्वाभिमानी धूमिल को यह स्वीकार नहीं था।
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