ऐन कार्सन की रचनाएँ, अनुवाद : सुमन शेखर
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| ऐन कार्सन |
दुनिया का साहित्य जगत बेसब्री से साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता के नाम की प्रतीक्षा करता है। इस प्रतीक्षा के दौरान लोग विभिन्न नामों पर कयास लगाते रहते हैं। बहरहाल इस वर्ष यह सम्मान कवयित्री, अनुवादक और निबंधकार के तौर पर दुनिया भर में जानी जाने वाली ऐन कार्सन को दिया गया है। ऐन कार्सन का जन्म 21 जून, 1950 को कनाडा के टोरंटो में हुआ था। वह मार्गरेट और रॉबर्ट कार्सन की दूसरी और आखिरी संतान थीं। उनकी माँ घर संभालती थीं और पिता टोरंटो डोमिनियन बैंक में काम करते थे। बचपन में उनका परिवार ओंटारियो के छोटे-छोटे कस्बों में एक बैंक से दूसरे बैंक जाता रहा। इनमें स्टोनी क्रीक, पोर्ट होप और टिमिन्स जैसे कस्बे शामिल थे। ऐन का व्यक्तिगत जीवन दुःख से भरा रहा। इस दुःख की प्रतिध्वनि उनकी रचनाओं में सहज ही देखी जा सकती है। वे अपने व्यक्तिगत दुःखों के मौन, विखंडित प्रेम और स्मृतियों को केवल शब्दों में पिरोती नहीं, बल्कि पन्नों पर कलाकृतियों की तरह उकेरती हैं। शब्दों, चित्रों और अनुवादों के बीच की हर सरहद को तोड़ कर साहित्य को नया कैनवास देने वाली ऐन कार्सन की लेखनी महज एक माध्यम नहीं, बल्कि प्राचीन अतीत और आधुनिक इंसानी दिल के बीच लगातार बहती हुई एक जीवंत नदी है। कार्सन की कुछ प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं Eros the Bittersweet (1986), Plainwater (1995), Autobiography of Red (1998), Men in the Off Hours (2000), The Beauty of the Husband - (2001), Decreation (2005), Red Doc (2013), Antigonick (2012), Wrong Norma (2024). ऐन कार्सन की किताब 'प्लेनवाटर' की कुछ रचनाओं का अनुवाद पहली बार के लिए सुमन शेखर ने किया है। तीस वर्ष पहले प्रकाशित इस किताब में कार्सन की कविताएँ और निबंध हैं। सुमन शेखर ख़ुद भी एक बेहतर रचनाकार हैं और विदेशी साहित्य के अध्येता हैं। उनके अनुवाद अपने आप में मौलिक रचना का अहसास कराते हैं। पहली बार के लिए सुमन ने ऐन कार्सन की अनुवादित रचनाएँ हमें उपलब्ध कराया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ऐन कार्सन की रचनाएँ।
ऐन कार्सन की गद्य रचना
कस्बे
हिन्दी अनुवाद- सुमन शेखर
कस्बे एक भ्रम हैं। ऐसा भ्रम कि चीज़ें किसी न किसी तरह एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। मेरी नाशपाती, तुम्हारी सर्दी। मैं कस्बों की जानकार हूँ, इसके लिए भगवान मेरा भला करे।
मैं क्या करती हूँ, यह समझाना बहुत आसान है। जानकार वह होता है जो किसी एक जगह खड़े हो कर चीज़ों को देखता है। उस जगह से उसे कुछ खास रेखाएँ दिखाई देती हैं। पहले तुम्हें लगेगा कि ये रेखाएँ मैं खुद बना रही हूँ, लेकिन ऐसा नहीं है। मैं तो बस यह जानती हूँ कि कहाँ खड़े होने पर वे रेखाएँ दिखाई देंगी, जो पहले से वहाँ मौजूद हैं। और सबसे रहस्यमयी बात यह है कि ये रेखाएँ अपने आप कैसे बन जाती हैं। जब कोई किनारा नहीं था, कोई कोण नहीं था, कोई अच्छाई या बुराई भी नहीं थी, तब सवाल पूछने वाला कौन था? खैर, बात को बहुत दूर तक ले जाने की ज़रूरत नहीं है। जानकार वह होता है जो सामने की बात तक ही अपने विचारों को सीमित रखना जानता है। जब कोई चीज़ अपने चारों ओर रेखाएँ खींच कर अपना रूप बना लेती है, तो एक कस्बा बनता है। इस तरह देखें तो दुनिया, जैसा कि हम कहते हैं, एक खुली किताब है। लेकिन एक ही बात को पढ़ने के अलग-अलग तरीके हों, तो क्या होगा? उदाहरण के लिए, ताओ ते चिंग के तेईसवें अध्याय में लाओत्से ने जिस कस्बे की बात कही है, उसे देखिए। रास्ते पर चलने वाला रास्ते के अनुसार चलता है। अच्छे गुणों वाला व्यक्ति अच्छे गुणों के अनुसार चलता है। और जिसने कुछ खो दिया है, वह अपने खोने के अनुसार चलता है। जो रास्ते के अनुसार चलता है, रास्ता उसे खुशी से स्वीकार कर लेता है। जो अच्छे गुणों के अनुसार चलता है, अच्छाई उसे खुशी से अपना लेती है। और जो खोने के अनुसार चलता है, उसे उसका खोना भी खुशी से स्वीकार कर लेता है। यह किसी खास कस्बे की तस्वीर लगती है, जहाँ कोई व्यक्ति चाहे तो खुद से आगे निकल सकता है या फिर खुद से मिल सकता है। लेकिन एक दूसरे जानकार काओ, लाओत्से के इस कस्बे को किसी और तरह से देखते हैं। काओ का कहना हैं, “इस पूरे हिस्से में जिस शब्द का अर्थ ‘खोना’ बताया गया है, उसका कोई मतलब ठीक से समझ में नहीं आता। हो सकता है कि लिखने में गलती हुई हो और वहाँ ‘स्वर्ग’ शब्द होना चाहिए था।” अब अगर तुम्हें या मुझे यहाँ की ज़िंदगी छोड़कर वहाँ जाना है, चाहे लाओत्से के कस्बे में या काओ के कस्बे में, तो हमें कुछ बातें साफ़-साफ़ समझनी होंगी। जैसे, काओ किस लहजे में बात कर रहे हैं? क्या वे अधीर हैं, बहुत दुखी हैं या बस मज़ाक कर रहे हैं? इस बात को लेकर तुम्हारी सोच मुझे तुमसे अलग कर सकती है। इसी वजह से कस्बे बनते हैं। और फिर जानकार भी। मैं कोई छोटी-मोटी बात नहीं कर रही हूँ। अगर मैं तुम्हारे इस अलगाव को एक बीमारी की तरह अपने भीतर लेकर उसका बोझ हल्का न करूँ, तो तुम्हारा अकेलापन तुम्हारी जान भी ले सकता है। सोचो, अगर तुम ऐसे कस्बे में फँस जाओ जहाँ नाशपाती और सर्दी एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल किए जा सकते हों। क्या तुम सर्दी को खा सकते हो? नहीं। क्या तुम छह महीने तक एक जमी हुई नाशपाती के भीतर रह सकते हो? नहीं। लेकिन एक जगह है, मैं उस जगह को जानती हूँ, जहाँ खड़े हो कर तुम नाशपाती और सर्दी को एक-दूसरे के बगल में देख सकते हो। ठीक वैसे ही, जैसे दीवारें खामोशी के बगल में खड़ी होती हैं। क्या तुम अपने आप को खामोशी की तरह विराम दे सकते हो? तब तुम देखोगे कि तुम्हारे किनारे तुमसे अलग हो कर पीछे छूट रहे हैं। तुम एक दूसरी तरह की दुनिया में लौट रहे हो, उस असली खालीपन में, जिसे कुछ लोग शून्य कहते हैं। मेरा मानना है कि हम ऐसी चीज़ें हैं जो उस हवा में मौजूद हैं, जो कभी चलती थी, लेकिन अब रुक गई है। कुछ कस्बे सीधे-सादे और व्यवस्थित होते हैं, कुछ बेतरतीब। कुछ कस्बे दुख से भरे होते हैं, कुछ शांत होते हैं और कुछ ऐसे जिन्हें हम बहुत गहराई से याद करते हैं। कुछ बेकार होने के बाद भी पूरे जोश से लड़ते रहते हैं। कुछ कस्बों में घरों की छतों से बर्फ़ इतनी तेज़ी से नीचे गिरती है कि उसकी चपेट में आ कर लोग मर जाते हैं। लेकिन कोई भी कस्बा पूरी तरह खाली नहीं होता। खाली होते हैं तो बस जानकार। और यहाँ किसी तरह का पछतावा भी नहीं है। अब आगे बढ़ो।
ऐन कार्सन की कविताएँ
अनुवाद : सुमन शेखर
प्रेरितों यानी ईश्वर का संदेश मनुष्यों तक पहुँचाने वाला दूत का कस्बा
तुम्हारी मौत के बाद
हर दिन हवा चलती थी,
हर दिन
वह हमारे सामने एक दीवार की तरह खड़ी रहती थी
और हम चलते रहे
एक-दूसरे की ओर मुँह कर के,
ऊँची आवाज़ में चिल्लाते हुए
रास्ते भर यह सब बेकार था
हमारे बीच की दूरियाँ अब सख़्त हो गई हैं
वे खाली जगहें हैं, फिर भी ठोस हैं, काली हैं
और उतनी ही दुख देने वाली हैं,
जितनी किसी बूढ़ी औरत के
दाँतों के बीच की खाली जगहें
तुम उसे बरसों पहले जानते थे
तब वह सुंदर थी
उसकी नसों में भावनाएँ इस तरह दौड़ती थीं,
जैसे किसी महल में आग लगी हो।
एक बार फिर वसंत का कस्बा
“वसंत हमेशा वैसा ही होता है, जैसा पहले हुआ करता था।”
एक बूढ़े चीनी आदमी ने कहा
खिड़कियों पर बारिश तेज़ आवाज़ के साथ गिर रही थी
बहुत दूर से उठी इच्छाएँ
हम तक पहुँचीं।
लीयर का कस्बा
शोर करती घंटियाँ
गिरती हुई घंटियाँ
घंटियों की खामोशी से पहले आती हैं
जैसे पागलपन से पहले सर्दी आती है
जैसे पिता से पहले बचपन आता है
और फिर मौत के गड्ढे में।
बतशेबा के पार जाने का कस्बा
एम्स्टर्डम के एक कमरे में
रेम्ब्रां ने जीवन की एक बूँद को चित्र में उतारा
उस बूँद में उन्होंने एक अनजान व्यक्ति को दिखाया
वह औरत की तरह कपड़े पहने हुए है
उसका शरीर लहराता हुआ लगता है
उसके भीतर नग्नता की एक झलक है
उसके हाथ में एक चिट्ठी है
वह यात्रा पर निकली हुई है
किसी विचार से निकल कर हमारी ओर चली आ रही है
उसके आने से पहले ही उसके आने की हलचल हम तक पहुँच जाती है
और जब रेम्ब्रां उस अनजान व्यक्ति को चित्रित करते हैं,
तो उसे अपने ही जैसा एक आदमी दिखाते हैं
वह उलझा हुआ है, उसके बाल बिखरे हैं
ऐसा लगता है जैसे वह अभी-अभी किसी लंबी यात्रा से लौटा हो
ऐसे रास्तों से,
जो कभी बड़ी सड़कें थीं और कभी छोटी पगडंडियाँ।
सिल्विया का कस्बा
आग जलाने वाले और भूख से तड़पने वाले लोग
फिर हरा-भरा अप्रैल आया
वह उसे जलाता रहा, उसे भूखा रखता रहा
उसकी आँखें ऊपर की ओर खिंची हुई थीं,
जैसे जड़ें मिट्टी से बाहर निकल आई हों
वह मेज़ पर पड़ी थी।
ड्रैगन की नस का कस्बा
अगर तुम्हारी नींद बहुत जल्दी खुल जाए,
तो उस आवाज़ को सुनना
एक तरह की उलटी सीटी
ऐसी आवाज़, जो आवाज़ के भीतर से ही पीछे खिंचती चली जाती है।
आख़िर वह कहाँ से लौटती है?
पहाड़ों से?
लेकिन पहाड़ों को उसे वापस करना ही होगा
रात में, ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारे रात के सपने होते हैं
नल उलटी दिशा में खुल जाते हैं
समय में
समय की ओर।
एमिली का कस्बा
एक छोटे-से कमरे में बहुत-सी दौलत
यह एक ऐसा वाक्य है जो उसे बार-बार परेशान करता है
जब से तुम्हारे भीतर का खनिज उससे अलग हो कर चला गया
बर्फ़
या कोई पुस्तकालय
या संदेश ले कर आए फ़रिश्तों का एक झुंड
लेकिन यह वह नहीं है
जिसका मतलब उसके लिए कुछ और था।
भेड़ियों का कस्बा
बाघों को उन्हें मारने दो
भालुओं को उन्हें मारने दो
पेट और शरीर में रहने वाले कीड़ों को उन्हें मारने दो
उन्हें एक-दूसरे को मारने दो
साही के काँटों को उन्हें मारने दो
ज़हरीली मछलियों से होने वाली बीमारी को उन्हें मारने दो
उन्हें किसी हड्डी से अपनी जीभ कट जाने दो और खून बहते-बहते मर जाने दो
उन्हें ठंड में जम जाने दो
बाज़ों को उन्हें बचपन में ही उठा ले जाने दो
हवा में उड़ कर आया कोई बीज उनके कान के भीतर जा कर जम जाए और उनका संतुलन बिगाड़ दे
उन्हें बहुत अच्छी सुनने की शक्ति दे दो
हाँ, उन्हें सुनने दो
अपने सिर के ऊपर से गुज़रते बादल की आवाज़।
सितंबर का कस्बा
एक डर यह है कि
रात के अँधेरे में झींगुरों की आवाज़
किसी दिन मेरा सिर कुचल देगी
उसे कागज़ की तरह बिल्कुल सपाट कर देगी
और फिर भी मुझसे उम्मीद की जाएगी कि
मैं रोज़ के काम पहले की तरह करती रहूँ
जाली वाले दरवाज़े की मरम्मत करूँ
अपने भाई को पुलिस से छिपाऊँ।
यादों का कस्बा
तुममें से हर एक के भीतर मैं चित्र बनाती हूँ
मैं खोजती हूँ
और मुझे हर किसी के भीतर रेडियोधर्मी पदार्थ का एक दबा हुआ ठिकाना मिलता है
तुम सोचते हो कि आठ मील नीचे तक जाना काफ़ी है?
पंद्रह मील?
एक सौ चालीस मील?
किस्मत का कस्बा
एक गड्ढा खोदना
अपने बच्चे को ज़िंदा दफ़नाने के लिए
ताकि वह अपनी बूढ़ी माँ के लिए खाना ख़रीद सके
एक दिन
एक आदमी को सोना मिला।
मौत का कस्बा
आज का दिन
जब भी मैं रुकती हूँ,
इसका शोर सुनाई देता है।
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| सुमन शेखर |
सम्पर्क
सुमन शेखर
मोबाइल : 8877225078



बहुत सुंदर स्पर्श
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