निर्मल वर्मा के कुछ अनुवाद
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| निर्मल वर्मा |
हाल फिलहाल तक अनुवाद करना भी एक कला ही नहीं बल्कि एक सृजनात्मक कार्य माना जाता थी। अनुवाद के इस कार्य में अनुवादक की गहरी छाप रहती थी। तमाम साहित्यकारों के अनुवाद चर्चित रहे हैं। विदेशी साहित्य से हम इन अनुवाद के जरिए ही परिचित हो पाते हैं। आज तो ए आई का जमाना है। और सभी को पता है कि ए आई एक टूल है जहाँ संवेदनाओं और अनुभूतियों के लिए कोई जगह नहीं। प्रख्यात साहित्यकार निर्मल वर्मा ने उन्होंने काफ़ी अनुवाद किये हैं। मनोज मोहन के अनुसार उनके अनुवाद उनके लिखे कथा-साहित्य के निकट हैं। आज निर्मल वर्मा की पुण्य तिथि पर हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं चेक लेखकों फ्रांतिशेक राखलीक (František Rachlík), फ्रांतिशेक पिलार और एडवर्ड पेतिश्का की लघु कहानियाँ जिनका अनुवाद किया है निर्मल वर्मा ने। प्रस्तुति मनोज मोहन की है।
निर्मल वर्मा के अनुवाद
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| फ्रांतिशेक राखलीक |
१.
दूसरी बार
फ्रांतिशेक राखलीक
(अनुवाद : निर्मल वर्मा)
वह सबसे ऊपर था...। पिता के कंधों पर बैठा था और सब कुछ देख सकता था। टैंकों की लंबी कतार को देखते हुए वह बार-बार हर्ष से चीखने लगता था और अपने नन्हे हाथों से लाल झंडा हिलाने लगता था। यह उसके पिता का ही स्वभाव था कि लाल फ़ौज का स्वागत लाल झंडे से ही करना चाहिए। माँ बेचारी को बहुत परेशानी उठानी पड़ी—लड़ाई की ग़रीबी में घर इतना ख़ाली हो गया था कि लाल कपड़ा या थिगली ढूँढ़ना कोई आसान काम नहीं था। पुराने कपड़ों को टटोलते हुए उसे दादा की लाल कमीज़ दिखायी दी। किंतु वह दादा की निशानी थी और उसने दुबारा तह करके उसे बक्स में रख दिया। "वाह, तुम भी अजीब हो, मारिया!" पिता ने कहा, "इस कमीज से बच्चे के लिए लाल झंडा बनाओगी, तो वह ज़िंदगी भर याद रखेगा कि अपने पिता के साथ उसने एक ऐसे मुक्ति-दिवस का स्वागत किया था, जब लोगों की नयी, आज़ाद ज़िंदगी शुरू हुई थी और उसकी ज़िंदगी भी। क्या हर्ज़ है अगर गैरीबाल्डी की लाल कमीज़ से इंकलाब का झंडा बनाया जाये?" माँ ने थोड़ी-बहुत आनाकानी की, किंतु अंत में मान गयी। बाद में री में आ कर उसने लाल झंडे पर पीले रिबन से हँसिया-हथौड़ा भी काढ़ा था।
दादा नहीं थे, लेकिन लगता था, मानो अपनी लाल कमीज़ के माध्यम से वह भी पिता और पुत्र के साथ उस शुभ दिन का स्वागत कर रहे हों। बाद के वर्षों में लाल झंडों की कमी नहीं रही, लेकिन उस दिन दादा की कमीज़ से जो झंडा बनाया गया, उसे माँ ने बहुत सँभाल कर संदूक़ में रख दिया था—उसे धोया भी नहीं, ज्यों-का-त्यों—याददाश्त के लिए।
फिर बरसों बाद वे दुबारा आये। वह सुबह होते ही तैयार हो गया, ताकि उन्हें देख सके। उसे लाल झंडे की याद हो आयी, जिसे दादा की कमीज़ से बनाया गया था—मुद्दत पहले। उसका दिल बोझिल-सा हो गया। पुराने कपड़ों-लत्तों का संदूक़ खोला। वह झंडा वैसा ही पड़ा था, जैसा माँ ने बरसों पहले उसे तहा कर रखा था। उसने काँपते हाथों से उसे अपनी देह के इर्द-गिर्द लपेट लिया। उसकी साँसें रह-रह कर उखड़ जाती थीं। गलियों में भगदड़ मची थी। वह तेज़ी से बैंसलेस स्क्वायर (प्राग की मुख्य सड़क) की तरफ भागने लगा।
जब उन्होंने मुर्दे को टटोला, तो कोई जाँच-पहचान की निशानी नहीं मिली।
एक सोवियत सिपाही ने दूसरे से कहा, "लिखो—सिर्फ़ एक लाल कमीज़, जिस पर क्रांति का बिल्ला, अता-पता कुछ नहीं!"
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| Frantisek Pilar |
२.
कफ़न के भीतर
फ्रांतिशेक पिलार
(अनुवाद : निर्मल वर्मा)
इनसान हर चीज़ की तमन्ना नहीं कर सकता। अच्छे लम्हे आते हैं और उनके साथ बुरे लम्हे भी और आदमी धीरे-धीरे दोनों का आदी हो जाता है। यह मैं कहता हूँ, क्योंकि कुछ अर्से से मैं कफ़न के भीतर हूँ और वहाँ रहने के अलावा मेरे पास कोई दूसरा चारा नहीं। चीज़ों को वैसे ही लेना चाहिए, जैसी वे हैं। ध्यान से चारों तरफ़ देखना चाहिए, और अगर कोई परखने लायक़ चीज़ हुई, तो उसे परखना चाहिए। यहाँ ज़मीन के नीचे काफ़ी गरमाई है, आराम है, शांति है। कफ़न के बक्स की लकड़ी अच्छी है, कहीं कोई ख़राबी नहीं। सिमिट्री में मुझे जो जगह मिली है, वह भी बुरी नहीं। पेड़ों पर पक्षी चहचहाते हैं और... मुझे यह सब अच्छा लगता है। अगर कभी-कभी कोई चीज़ मुझे परेशान करती है, तो यह कि जिस बक्स में मैं लेटा हूँ, वह ज़रूरत से कुछ ज़्यादा बड़ा है। जब उन्होंने मुझे कब्र में डाला था, तो मैं एक किनारे लुढ़क गया और तब से टेढ़ा लेटा हूँ। आदमी को सीधा लेटना चाहिए, चाहे वह जीवित ही क्यों न हो, वरना रीढ़ टेढ़ी हो जाती है और यह चीज़ मुरदों पर भी लागू होती है।
अभी कुछ दिन पहले एक घटना हुई—बिल्कुल मेरे पास एक नया पड़ोसी आ टिका है। चलो, अच्छा है, मैंने सोचा। क़ब्रगाह आख़िर मेरी संपत्ति नहीं, वह सबके लिए है। लेकिन मेरे इस पड़ोसी को समय-स्थान की कोई तमीज़ ही नहीं! दिन भर बक-बक करता रहता है। हर चीज़ पर राय देता है। बहस करता है। मैं चुपचाप लेटा हूँ और वह है कि दम नहीं लेने देता—"क्यों पड़ोसी भाई, क्या सोचते हैं देश की हालत के बारे में? बेहूदा हालत है, और क्या! आप टेढ़े लेटे हैं और मैं...मेरे सिर पर लकड़ी चुभ रही है! आपका कफ़न ज़रूरत से ज़्यादा बड़ा है और मेरा ज़रूरत से ज्यादा तंग! भला यह भी कोई बात हुई!"
मैं चुप रहता हूँ, लेकिन वह आगे जाता है—"मैं आपसे कहता हूँ कि देश के इतिहास में नंबर आठ का गहरा महत्त्व है। यह साल विपत्ति का था, लेकिन अगला साल बेहतर होगा। आप क्या सोचते हैं?"
कुछ नहीं—मैं ख़ामोश रहता हूँ। लेकिन उसकी गाड़ी नहीं रुकती—"जरूर बेहतर होगा। मैं खुद देखना चाहूँगा। देखिए, अगर हम सब मुर्दे अपना ज़ोर लगाएँ और उन लोगों का साथ दें... ज़रा सोचिए, कितने मुर्दे हैं! कितनी ज़बरदस्त हमारी ताक़त होगी! वाह!"
मैं फिर भी चुप रहता हूँ. "ज़रा सोचिए, अगर हमारे कफ़न ठीक होते, तो हम काफ़ी आराम से लेट सकते थे। जनाब, आप बोलते क्यों नहीं? आप कोई डिमोक्रेट हैं?"
"मैं मुर्दा हूँ", मैंने काफ़ी लंबे सोच-विचार के बाद कहा।
वह ख़ामोश पड़ा और आगे कुछ नहीं बोला। यह घटना रह-रह कर मुझे सालती है। शायद कफ़न की लकड़ी उसके सिर पर गड़ रही थी। किंतु फिर यह ख़्याल भी आता है कि क्या सचमुच हम मुर्दा हैं? कुछ भी हो, स्थिति कोई ज़्यादा शोभनीय नहीं। सहसा यहाँ अजीब-सा सन्नाटा घिर आया है और...।
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| Eduard Petiska |
३.
बच्चा और इतिहास
एडवर्ड पेतिश्का
(अनुवाद : निर्मल वर्मा)
"मनुष्य जाति का इतिहास," बारमैन ने कहा, "बहुत ज़बरदस्त है, लेकिन आप कर क्या सकते हैं? कुछ भी नहीं! इतिहास चलता है—अपने आप चलता है।"
बाहर बर्फ़ गिर रही थी। बियर-पब वीरान पड़ा था। सिर्फ़ एक आदमी काउंटर के सामने खड़ा था
"आपको इस तरह नहीं सोचना चाहिए।" आदमी ने भीगे काउंटर पर रखे दो बियर का मग घुमाते हुए कहा, "हर इनसान को वही काम करना चाहिए, जो उसके फ़ायदे के लिए हो और जो उसे दिलचस्प भी जान पड़े। अपने हित और आनंद के अलावा कोई काम करोगे, तो हमेशा पछताओगे।"
"मनुष्य का इतिहास" ...
बाहर बर्फ़ गिर रही थी और घरों की दीवारें धुँधलके में डूबने लगी थीं। बारमैन ने पब की पीली बत्ती जला दी।
दरवाज़े के ऊपर घंटी खनखनायी और एक छोटा-सा लड़का बाहर गली से पब के भीतर आया। उसने सिर्फ़ क़मीज-पाज़ामा पहन रखा था। लड़के ने ख़ाली जग काउंटर पर रख दिया और अपने में खोया-सा खड़ा रहा।
"दो लिटर बियर",—आख़िर उसने माथे की सिकोड़ते हुए कहा।
बारमैन ने सिर हिलाया.ल। बच्चे के बालों से बर्फ़ के गाले पानी में पिघल कर टपक रहे थे, बाल रो रहे थे, आँखें नहीं। आँखें चुपचाप ऊपर-नीचे डोल रही थीं—कभी बारमैन के गंजे सिर पर टिक जातीं, कभी ख़ामोश आदमी के चश्मे पर। एक क्षण के लिए आदमी की नज़रें बच्चे की सपाट खुली आँखों से टकरायी थीं। किंतु इस बीच जग बियर से भर चुका था। बच्चे ने अपनी मुट्ठी से मुड़ा-तुड़ा नोट निकाला। बारमैन ने रेज़गारी वापस की और बच्चे को देखने लगा, जिसकी देह पर कमीज़-पाज़ामे के अलावा कुछ भी न था। वह बियर की भारी जग उठा कर पब के बाहर चला गया था—बाहर बर्फ़ के तूफ़ान में।
"जीसस!" कुछ देर बाद आदमी हबबड़ा कर उठ खड़ा हुआ। उसने झटपट अपना कोट उतारा और उसे हाथ में ले कर बाहर अँधेरे की तरफ़ भागने लगा। गली के लैंप पोस्टों के आलोक में आकाश से ज़मीन तक गिरती हुई बर्फ़ चमक रही थी। बच्चा अँधेरे में ग़ायब हो गया था।
आदमी दोबारा बियर-पब में लौट आया।
"बर्फ़ के तूफ़ान में बिना कोट के भागना आपको दिलचस्प लगता है?" बारमैन ने पूछा, "या शायद उससे आपकी कोई फ़ायदा होने वाला था?"
" यूँ ही..." आदमी बुदबुदाया और अपनी तनी हुई मुट्ठी काउंटर पर पटक दी। उसके मस्तिष्क में तेज़ी से यह विचार दौड़ रहा था कि ज़रूर कहीं तीसरा रास्ता भी होना चाहिए, किंतु वह उस रास्ते का नाम याद नहीं कर सका।




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