जतिन दास की पेंटिंग्स पर जॉनी एम एल का आलेख और राजेन्द्र शर्मा की कविताएँ


जतिन दास


कला किसी की मुखपेक्षी नहीं होती। वह अपने आप में स्वतन्त्र होती है। कलाकार किस बात से प्रभावित हो कर अपना सृजन करने लगे, इसका पता उसे भी नहीं होता। समय और परिस्थितियां उसे सृजन की तरफ न केवल उन्मुख करती हैं बल्कि उसे रचनाशील भी बनाती हैं। चित्रकला और कविता का सम्बन्ध घनिष्ठ है। गहराई से देखा जाए तो चित्रों में कोई न कोई कविता पढ़ने को मिल जाएगी दूसरी तरफ कविता को ध्यान से पढ़ा जाए तो कोई न कोई पेंटिंग मन मस्तिष्क में उभर आती है। जतिन दास देश के सर्वश्रेष्ठ चित्रकारों में शामिल हैं। उनकी पेंटिंग्स समय और सरोकारों से जुड़ी होती है। वे समय समय पर अपनी कूची ऐसे विषयों पर चलाते हैं जो बिल्कुल हमारे बीच के होते हैं। लेकिन अपने आप में खोये लोग उन्हें देख पहचान नहीं पाते। जतिन दास ऐसे लोगों की खोज कर न जीवन उन्हें अपनी पेंटिंग में ढालते हैं बल्कि उन्हें मुख्य धारा में ला देते हैं। सफाईकर्मी जो समाज का कूड़ा कचरा साफ करने का काम रोजाना ही करते हैं उनकी नई पेंटिंग्स का विषय हैं। सफाईकर्मियों की कई उम्दा पेंटिंग्स उन्होंने बनाई है। बकौल जॉनी एम एल - जतिन दास मेरे पास आते हैं और कहते हैं, ‘‘मैं इन गुमनाम लोगों के तीन सौ से अधिक रेखाचित्र बना चुका हूँ।’’ 11 से 15 अक्टूबर 2026 के बीच जतिन दास के पेंटिंग्स की प्रदर्शनी दिल्ली के श्रीधराणी आर्ट गैलरी में आर्ट पिलग्रिम  की ओर से आयोजित की गई। इस प्रदर्शनी को कवि राजेन्द्र शर्मा ने देखा और स्वाभाविक रूप से मन में उभर आई कुछ कविताओं के माध्यम से शब्दबद्ध करने का उम्दा प्रयास किया। इन पेंटिंग्स के मद्देनज़र जॉनी एम एल ने एक आलेख लिखा है। मूल अंग्रेजी में लिखे गए इस आलेख का हिन्दी अनुवाद भी राजेन्द्र शर्मा ने किया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं जतिन दास की पेंटिंग्स पर जॉनी एम एल का आलेख 'जतिन दास की रेखाएँ : उपेक्षित मनुष्यों से लेकर देह की स्वायत्तता तक' और राजेन्द्र शर्मा की कविताएँ। आलेख के बीच प्रयुक्त पेंटिंग्स  प्रदर्शनी में प्रस्तुत जतिन दास के हैं।




आलेख

'जतिन दास की रेखाएँ : उपेक्षित मनुष्यों से लेकर देह की स्वायत्तता तक'


मूल लेखक : जॉनी एमएल


श्रीधराणी आर्ट गैलरी में आर्ट पिलग्रिम की ओर से आयोजित जतिन दास के रेखाचित्रों की प्रदर्शनी में अखबार के पन्नों पर बने तीन चित्रों ने मेरा ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया। इन चित्रों में दिल्ली के कूड़ा बीनने वालों और सफाईकर्मियों को चित्रित किया गया था। विषयवस्तु कुछ असामान्य लगी। कृष्ण खन्ना ने दिल्ली के बैंड वालों को अपने चित्रों का विषय बनाया था। सतीश गुजराल ने लोक नर्तकों की ओर रुख किया था। मुंबई के श्रमिक वर्ग को अल्ताफ और सुधीर पटवर्धन ने अपने चित्रों का विषय बनाया। हाशिये पर मौजूद और समाज की दृष्टि से ओझल कर दिए गए लोगों के अनगिनत रेखाचित्र बनाने वाले सावी सावरकर ने भी सफाईकर्मियों को इस रूप में चित्रित नहीं किया है।

जतिन दास मेरे पास आते हैं और कहते हैं, ‘‘मैं इन गुमनाम लोगों के तीन सौ से अधिक रेखाचित्र बना चुका हूँ।’’ यह जान कर मैं प्रभावित होता हूँ। शायद इन चित्रों की एक स्वतंत्र प्रदर्शनी होनी चाहिए। जतिन दास कहते हैं, ‘‘यह बात मेरे मन में है।’’



84 वर्ष की आयु में भी वे लगातार रेखाचित्र बनाने वाले कलाकार हैं। अपनी बातों से लोगों को विचलित करने में माहिर जतिन दास का तीखा और व्यंग्यपूर्ण हास्य आज भी बहुतों को असहज कर देता है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईआईसी) के लॉन में शाम की महफिलों में प्रायः उनके कुछ रेखाचित्र भी शामिल होते हैं—कुछ मित्रों के, कुछ मित्रों के लिए। उन्हें मलयालम के कुछ शब्द और वाक्यांश याद हैं, जिनसे वे हमेशा मेरा अभिवादन करते हैं—’‘चोरु तरुमो?’’ (क्या मुझे चावल दोगे?) और ‘‘वेल्लम कुडिचो?’’ (क्या तुमने पानी पी लिया?)। मैं मुस्कराता हूँ और कभी-कभी उन्हीं शब्दों को दोहरा देता हूँ।



सामान्य रूप से ‘ड्रॉइंग्स’ शीर्षक वाली यह प्रदर्शनी जतिन दास के विभिन्न कालखंडों के कार्यों का प्रतिनिधित्व करती है। इनमें से कुछ रचनाएँ संभवतः 1970 के दशक तक जाती हैं, जब वे भारतीय पारंपरिक मूर्तिकला में दिखाई देने वाली देह-मुद्राओं के रेखाचित्र बना रहे थे। इन चित्रों को देखते हुए समझा जा सकता है कि उनकी रेखाएँ किस तरह आरंभिक सूक्ष्मता और सटीकता से विकसित हो कर प्रवाहपूर्ण हुई हैं। वे मनुष्य और पशुओं की लगभग हर कल्पनीय शारीरिक मुद्रा को अपनी रेखाओं में पकड़ लेते हैं।



उनकी रेखाओं को तेजी से लगाए गए, सशक्त और निर्भीक ब्रश-स्ट्रोक और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं। ये स्ट्रोक आकृतियों को आयतन और छाया प्रदान करते हैं। कागज पर कॉन्टे माध्यम से बने चित्र हों, जलरंग से संवर्धित रेखाएँ हों अथवा चारकोल से खींचे गए सहज स्ट्रोक—जतिन दास हर माध्यम में समान सहजता के साथ काम करते हैं।


दीवार पर लिखे वक्तव्यों में से एक में बताया गया है कि जतिन दास अपनी अधिकांश आकृतियों को नग्न बनाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इनमें अधिकतर पुरुष आकृतियाँ हैं। ऐसा इसलिए कि वे नहीं चाहते कि दूसरे लोग उनकी छवियों को अपनी ओर से वस्त्र पहना दें।


वे अपनी प्रत्येक आकृति को एक स्वतंत्र सत्ता प्रदान करते हैं। ये स्वायत्त संरचनाएँ उनके चित्रों का आधार भी बनती हैं।



यह भी उल्लेखनीय है कि पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध में सक्रिय उन कलाकारों में जतिन दास की एक अलग पहचान है, जिन पर पिकासो की रेखाओं का बहुत अधिक प्रभाव दिखाई नहीं देता। पिकासो की बाल जैसी महीन रेखाओं की प्रतिध्वनि जतिन दास के कार्यों में नहीं सुनाई देती। इसके विपरीत, उनकी रेखाएँ मोटी, तीखी और सशक्त हैं। वे कई बार वक्राकार होने के बजाय कोणीय रूप धारण कर लेती हैं।


रेखाओं की यही विशेषता जतिन दास के कार्यों को चित्रकार की अपेक्षा एक मूर्तिकार के रेखाचित्रों के अधिक निकट ले जाती है। उनके चित्र बनाने की प्रक्रिया में एक प्रकार की अधीरता भी दिखाई देती है, मानो चित्र पूरा होते ही उन्हें कहीं और निकल जाना हो। यह एक ऐसी दक्षता है, जिसका प्रदर्शन वे अपने अधिकांश रेखाचित्रों में करते हैं।


उनका दावा है कि प्रदर्शनी में शामिल कोई भी चित्र किसी मॉडल को सामने रख कर नहीं बनाया गया है। वे जोर दे कर कहते हैं, ‘‘ये मेरे मानसिक बिंब हैं।’’ इसके बाद वे मुझे अपने मित्रों के व्यक्तिचित्रों की एक पुस्तक दिखाते हैं। इन मित्रों में अनेक प्रसिद्ध लोग शामिल हैं, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है।



जतिन दास ने अपने रेखाचित्रों में स्त्रियों को किस तरह चित्रित किया है, यह जानने की मेरी उत्सुकता है। स्त्रियों के अर्धवक्ष चित्रों में एक प्रकार की फॉविस्ट संवेदना दिखाई देती है। इनमें से कुछ स्त्री-चेहरों की तिरछी, चीनी शैली की आँखें हेनरी मातिस के व्यक्तिचित्रों की याद दिलाती हैं।



जब वे नर्तकियों और साधारण स्त्रियों को चित्रित करते हैं, तो उनका ध्यान उनकी देह की भंगिमाओं की सुंदरता पर अधिक केंद्रित दिखाई देता है। वे उस शारीरिक कामुकता अथवा मांसलता की खोज में उतने लीन नहीं दिखते, जिसकी तलाश उनके समकालीन कलाकारों—जैसे सूज़ा और लक्ष्मा गौड़—के यहाँ दिखाई देती है।



अब तक जतिन दास ने लाखों रेखाचित्र बना लिए होंगे। किसी रसिक के लिए उन सभी को एक साथ देख पाना असंभव है। हालाँकि, मुझे बताया गया है कि उन्होंने अपने स्टूडियो में बनाए गए अधिकांश रेखाचित्रों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया है।



उनकी शैली को पहचानना आसान है, लेकिन उसकी नकल करना लगभग असंभव। इसका श्रेय उन रेखाचित्रों को बनाते समय बरती गई उनकी सहजता और स्वाभाविक गति को जाता है। यही गुण उन्हें जालसाजों के लिए आसानी से नकल कर पाने वाली कृतियाँ नहीं बनने देता।



हालाँकि, उनकी विपुल रचनात्मकता को देखते हुए कला बाजार में आने वाले अनेक वर्षों तक उनके रेखाचित्रों की उपलब्धता बनी रहेगी। फिर भी, आज इतने प्रसिद्ध कलाकार होने के बावजूद जतिन दास मुख्यधारा के नीलामी बाजार के चहेते कलाकार नहीं बन पाए हैं।



इसके दो कारण हो सकते हैं।

पहला, जतिन दास की कृतियाँ प्राथमिक कला बाजार में ही अपेक्षाकृत उचित कीमतों पर उपलब्ध हैं। इसका अर्थ यह भी है कि द्वितीयक बाजार में उनकी कृतियों की माँग सीमित बनी रहती है। उनकी बहुमूल्य कृतियाँ संभवतः उनके आरंभिक दौर और परिपक्व रचनात्मक काल की हैं, जिनमें से अनेक इस समय कला-संग्राहकों के निजी संग्रहों में हैं।



दूसरा कारण है उनका बेबाक व्यक्तित्व। राज्य और निजी संस्थाओं से तमाम सम्मान और मान्यताएँ प्राप्त करने के बावजूद जतिन दास सत्ता-प्रतिष्ठानों और उनकी बुनियादी ढाँचागत कमियों के मुखर आलोचक बने हुए हैं। वे उन कमियों को उजागर करने से कभी पीछे नहीं हटते, जो इन प्रतिष्ठानों की कार्यप्रणाली में साफ दिखाई देती हैं।



जतिन दास का एक दुर्लभ गुण यह भी है कि वे दिल्ली में होने वाली लगभग हर कला प्रदर्शनी देखने की कोशिश करते हैं—चाहे उन्हें आमंत्रित किया गया हो या नहीं। वे युवा कलाकारों से बातचीत करते हैं, उन्हें वास्तविकताओं से रूबरू कराते हैं और साथ ही आज की दुनिया में कलाकार होने के महत्त्व से जुड़े आकर्षक, रोमानी विचारों के पैकेट भी उनके हाथों में थमा देते हैं।


राजेन्द्र शर्मा 


जतिन दास की पेंटिंग से प्रेरित

राजेन्द्र शर्मा की कविताएँ 



देह की लय में जीवन


एक पैर धरती पर,

दूसरा जैसे समय की देहरी के पार

वह आदमी

आखिर किस ओर जा रहा है?


उसकी देह में

कितनी सदियों की थकान है,

कितनी अनकही यात्राएँ,

कितने अधूरे स्वप्न

मांसपेशियों में खिंची रेखाओं की तरह

अब भी जीवित हैं।


वह बैठा नहीं है,

न पूरी तरह खड़ा है,

न उसने उड़ने का निश्चय किया है

फिर भी उसकी देह में

एक अदृश्य गति है।


जैसे जीवन ने

उसे एक क्षण के लिए रोका हो

और मृत्यु ने

अभी उसे पुकारा न हो।


उसकी आँखें

बंद हैं या भीतर मुड़ी हुई हैं?

क्या वह बाहर की दुनिया से विरक्त है,

या अपने भीतर

किसी उजड़े हुए संसार को

फिर से बसा रहा है?


उसकी मुट्ठी में

कोई शस्त्र नहीं,

कोई ध्वज नहीं,

कोई विजय-पताका नहीं,

फिर भी उसकी देह

किसी युद्ध से लौटे योद्धा की तरह

तनाव से भरी है।


शायद उसने लड़ी है

अपने हिस्से की लड़ाई,

भूख से,

अपमान से,

समय की निर्ममता से,

और उन सपनों से भी

जो पूरे होकर

मनुष्य को कभी-कभी

और अकेला कर देते हैं।


जतिन दास की रेखाएँ

उसका चित्र नहीं बनातीं,

वे उसके भीतर उतरती हैं।


देह की हर वक्रता में

एक प्रश्न है,

हर खिंचाव में

एक प्रतिरोध,

हर ठहराव में

चलते रहने की विवशता।


यह आदमी

किसी मूर्ति की तरह सुंदर नहीं,

किसी नायक की तरह महान नहीं

वह बस मनुष्य है,

और मनुष्य होना ही

उसकी सबसे बड़ी त्रासदी,

उसकी सबसे बड़ी संभावना है।

              


उसका एक पैर

धरती को थामे हुए है,

दूसरा जैसे

धरती से मुक्त होना चाहता है।


शायद यही जीवन है—

एक ओर मिट्टी का आकर्षण,

दूसरी ओर आकाश की पुकार।


और इनके बीच

हम सब

अपनी-अपनी देह में

एक अदृश्य संतुलन साधते हुए

गिरने से पहले

उठने का स्वप्न देखते हैं।


जतिन दास की इस आकृति में

मैं एक आदमी नहीं देखता—

मैं देखता हूँ

समूची मनुष्यता को,


जो टूटती है,

झुकती है,

लड़खड़ाती है,

फिर भी

अपने भीतर की अंतिम शक्ति से

धरती पर पैर जमा कर

कहती है—


मैं अभी समाप्त नहीं हुआ हूँ।

मेरे भीतर

अभी जीवन शेष है।



रेखाओं में नृत्य

(जतिन दास की कृति देख कर) 


एक देह में कितनी लय,

एक मुद्रा में सारा आकाश।

रेखाएँ जैसे बोल उठीं,

अंग-अंग में जीवन का उल्लास।


जतिन दास ने रचा है ऐसा क्षण—

जहाँ गति भी कला है,

और मौन भी संगीत।



देह की गति


रेखाओं में थिरकता

एक अनकहा आवेग,

जतिन दास की कला में

देह नहीं-

जीवन गतिमान है।

                


रेखाओं में मौन


एक देह झुकी है,

दूसरी सिमटी हुई—

रेखाओं के बीच

कितनी अनकही पीड़ा है।


जतिन दास की कूची ने

देह नहीं, मन उकेरा है—

जहाँ स्पर्श से पहले

संवेदना का अँधेरा है।

                    

संक्षिप्त परिचय

राजेंद्र शर्मा

13 जनवरी 1966 सहारनपुर में जन्म।

मेरठ विश्वविद्यालय से स्नातक।

वर्ष 1984 से 1986 तक दिनमान, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता के लिये पत्रकारिता।

1987 से उत्तर प्रदेश राज्य कर विभाग (पूर्व में बिक्रीकर विभाग) में नौकरी। 39 वर्ष की राजकीय सेवा के उपरांत 31 जनवरी 2026 को राज्य कर अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त।

साहित्य, कला, संगीत में बचपन से रूचि। विगत दस वर्षों में नया ज्ञानोदय, अमर उजाला, आउटलुक, इंडिया टुडे, अहा जिंदगी, जनसंदेश, प्रजातंत्र, रंग संवाद के साथ साथ अग्रेंजी के समाचार पत्र The Hindu, the week or the tribune में कला संगीत संबंधी तीन सौ से अधिक आलेख प्रकाशित।

नया ज्ञानोदय में " सबरंग" कालम में नियमित लेखन।

रांची से प्रकाशित दैनिक राजनामा दुनिया के लिये साहित्य, कला, संगीत पर एक पेज प्रतिदिन का दायित्व।


सम्पर्क - 

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सहारनपुर-247001 

(उत्तर प्रदेश)


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