राकेश कुमार गुप्त का आलेख “सबसे बड़ा जो साहसिक कार्य हम कर सकते हैं, वह है अपने सपनों को जीना।”


राकेश कुमार गुप्त


सभी प्राणियों से मनुष्य इसलिए भी अलग है कि वह सपने देखता है। इन सपनों का वह विश्लेषण करता है और फिर इन्हें यथार्थ में ढालने की कोशिश करता है। सपने हमारी कल्पनाशीलता के पंख होते हैं। ये सपने हमारी प्रतिरोधी चेतना के वाहक होते हैं। आप किसी मनुष्य को कैद कर सकते हैं लेकिन उसके सपनों पर किसी तरह की कोई रोक नहीं लगा सकते। मनुष्य को यह प्रकृतिप्रदत्त उपहार है जिसने उसके सर्वश्रेष्ठ होने में बड़ी भूमिका निभाई है। राकेश कुमार गुप्त अपने आलेख में उचित ही लिखते हैं "मनुष्य के पूरे इतिहास को यदि एक अलग दृष्टि से पढ़ा जाए तो वह केवल युद्धों, साम्राज्यों, राजाओं, क्रांतियों और तकनीकी आविष्कारों का इतिहास नहीं दिखाई देगा; वह उन सपनों का इतिहास भी दिखाई देगा जिन्हें मनुष्य ने अपनी वर्तमान परिस्थितियों से आगे जा कर देखा था। आज जो कुछ हमें सामान्य और स्वाभाविक दिखाई देता है, वह कभी किसी मनुष्य की कल्पना में असंभव था। मनुष्य का आकाश में उड़ना, समुद्रों के पार जाना, रोगों का उपचार करना, दासता को चुनौती देना, स्त्रियों को मताधिकार देना, उपनिवेशों का स्वतंत्र होना, जाति और नस्ल के आधार पर मनुष्य की श्रेष्ठता को नकारना और अंततः मनुष्य की गरिमा को कानून के केंद्र में स्थापित करना—इन सबकी शुरुआत किसी न किसी रूप में एक ऐसी कल्पना से हुई थी जो उस समय की वास्तविकता से बड़ी थी। इसलिए सपना केवल भविष्य की कोई सुंदर तस्वीर नहीं है; वह वर्तमान की सीमाओं के विरुद्ध मनुष्य की कल्पनाशील चेतना का पहला प्रतिरोध है।" आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राकेश कुमार गुप्त का आलेख “अपने सपनों को जीना।”


आलेख

अपने सपनों को जीना


राकेश कुमार गुप्त


“सबसे बड़ा जो साहसिक कार्य हम कर सकते हैं, वह है अपने सपनों को जीना।”

मनुष्य के पूरे इतिहास को यदि एक अलग दृष्टि से पढ़ा जाए तो वह केवल युद्धों, साम्राज्यों, राजाओं, क्रांतियों और तकनीकी आविष्कारों का इतिहास नहीं दिखाई देगा; वह उन सपनों का इतिहास भी दिखाई देगा जिन्हें मनुष्य ने अपनी वर्तमान परिस्थितियों से आगे जा कर देखा था। आज जो कुछ हमें सामान्य और स्वाभाविक दिखाई देता है, वह कभी किसी मनुष्य की कल्पना में असंभव था। मनुष्य का आकाश में उड़ना, समुद्रों के पार जाना, रोगों का उपचार करना, दासता को चुनौती देना, स्त्रियों को मताधिकार देना, उपनिवेशों का स्वतंत्र होना, जाति और नस्ल के आधार पर मनुष्य की श्रेष्ठता को नकारना और अंततः मनुष्य की गरिमा को कानून के केंद्र में स्थापित करना—इन सबकी शुरुआत किसी न किसी रूप में एक ऐसी कल्पना से हुई थी जो उस समय की वास्तविकता से बड़ी थी। इसलिए सपना केवल भविष्य की कोई सुंदर तस्वीर नहीं है; वह वर्तमान की सीमाओं के विरुद्ध मनुष्य की कल्पनाशील चेतना का पहला प्रतिरोध है। जिस दिन मनुष्य यह मान लेता है कि जो कुछ अभी है, वही अंतिम और अपरिवर्तनीय सत्य है, उसी दिन परिवर्तन की संभावना समाप्त होने लगती है।

इसीलिए पाश की कविता “सबसे खतरनाक” का वह कथन कि “सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना” केवल एक काव्यात्मक पंक्ति नहीं है; वह आधुनिक मनुष्य की सबसे गहरी त्रासदियों में से एक की पहचान है। पाश के यहाँ सपना किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का नाम नहीं है। सपना उस बेचैनी का नाम है जो मनुष्य को अपने आसपास की दुनिया को देख कर प्रश्न करने के लिए विवश करती है। सबसे खतरनाक वह स्थिति नहीं है जब मनुष्य किसी संघर्ष में हार जाता है; सबसे खतरनाक वह स्थिति है जब संघर्ष करने की इच्छा ही समाप्त हो जाती है। जब अन्याय दिखाई देता है लेकिन भीतर कोई प्रतिरोध पैदा नहीं होता, जब असमानता रोज की खबर बन कर संवेदना को सुन्न कर देती है, जब मनुष्य अपनी दिनचर्या में इतना व्यस्त हो जाता है कि उसे यह सोचने की फुर्सत ही नहीं रहती कि वह किस प्रकार की दुनिया में जी रहा है और किस प्रकार की दुनिया आने वाली पीढ़ियों को सौंपेगा—तब उसके सपनों का मरना शुरू होता है। पाश की चेतावनी इसी अर्थ में राजनीतिक होने के साथ-साथ गहरी मानवीय चेतावनी भी है।

लेकिन सपना आखिर है क्या? क्या हर इच्छा सपना है? क्या किसी बड़ी नौकरी, बड़े घर, आर्थिक समृद्धि या व्यक्तिगत सफलता की आकांक्षा भी उसी अर्थ में सपना है जिस अर्थ में किसी कवि का न्यायपूर्ण समाज का सपना या किसी स्वतंत्रता सेनानी का स्वतंत्र राष्ट्र का सपना था? निश्चय ही व्यक्तिगत आकांक्षाएँ भी मनुष्य के जीवन में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सपनों की नैतिकता यहीं से शुरू होती है। एक सपना केवल यह कह सकता है कि “मैं क्या पाना चाहता हूँ”, जबकि एक बड़ा सपना यह पूछता है कि “मैं कैसी दुनिया में जीना चाहता हूँ।” पहला प्रश्न व्यक्ति को उसकी निजी उपलब्धियों तक ले जाता है; दूसरा प्रश्न उसे समाज, इतिहास और आने वाली पीढ़ियों से जोड़ देता है। इसीलिए महान सपनों में एक प्रकार का अतिक्रमण होता है—वे व्यक्ति को उसके निजी अस्तित्व से बाहर निकालकर किसी व्यापक मानवीय आकांक्षा से जोड़ देते हैं।

भारतीय परंपरा में इस व्यापक आकांक्षा की जड़ें बहुत गहरी हैं। उपनिषदों से ले कर बुद्ध, महावीर, कबीर और आधुनिक भारत के सामाजिक-राजनीतिक चिंतकों तक एक निरंतर प्रश्न दिखाई देता है—मनुष्य जैसा है, क्या उसे वैसा ही रहना चाहिए? भारतीय चिंतन में मुक्ति की अवधारणा केवल मृत्यु के बाद किसी दूसरी दुनिया में जाने की कल्पना नहीं है; वह मनुष्य की वर्तमान अवस्था से मुक्ति की खोज भी है। बुद्ध ने अपने समय के जीवन को केवल स्वीकार नहीं किया। उन्होंने दुःख को देखा, उसके कारणों को समझने का प्रयास किया और मुक्ति का मार्ग खोजा। यह अपने आप में एक महान बौद्धिक साहस था। उन्होंने उस समय के स्थापित धार्मिक अधिकारों और कर्मकांडों से अलग हो कर मनुष्य के अनुभव को अपनी खोज का आधार बनाया। यदि इस पूरी प्रक्रिया को “सपने” की भाषा में समझें तो बुद्ध का सपना किसी राज्य, साम्राज्य या व्यक्तिगत वैभव का नहीं, बल्कि मनुष्य के दुःख से मुक्त होने का सपना था। यही कारण है कि ढाई हजार वर्ष बाद भी वह सपना समाप्त नहीं हुआ।

बुद्ध के बाद भारतीय लोकचेतना में कबीर आते हैं, जिनके यहाँ सपना और विद्रोह लगभग एक-दूसरे के पर्याय बन जाते हैं। कबीर ने ऐसी दुनिया को स्वीकार करने से इनकार किया जिसमें मनुष्य की पहचान उसके जन्म, जाति, बाहरी धार्मिक पहचान या कर्मकांड से तय होती थी। उनकी कविता में मंदिर और मस्जिद से अधिक महत्वपूर्ण मनुष्य है, पंडित और मुल्ला से अधिक महत्वपूर्ण सत्य है और परंपरा से अधिक महत्वपूर्ण अनुभव। कबीर का स्वप्न किसी व्यवस्थित राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में सामने नहीं आता, लेकिन उनकी कविता उस समाज की बुनियादी संरचनाओं पर प्रश्न उठाती है जो मनुष्य को मनुष्य से अलग करती हैं। इस दृष्टि से कबीर हमें यह सिखाते हैं कि सपना हमेशा भविष्य की कोई स्पष्ट योजना नहीं होता; कभी-कभी वह वर्तमान की अस्वीकृति के रूप में जन्म लेता है। “यह ऐसा नहीं होना चाहिए”—यही वाक्य कई बार किसी बड़े परिवर्तन का पहला बीज होता है।

भारतीय आधुनिकता में यह सपना नए रूप में विवेकानंद, गांधी, टैगोर और भगत सिंह जैसे अलग-अलग और कई बार परस्पर भिन्न विचारधाराओं वाले व्यक्तित्वों में दिखाई देता है। इन सबको एक ही राजनीतिक या दार्शनिक खांचे में रखना उचित नहीं होगा, लेकिन इनके बीच एक साझा प्रश्न अवश्य दिखाई देता है—भारत कैसा बने? विवेकानंद के यहाँ मनुष्य की शक्ति, आत्मविश्वास, शिक्षा और सेवा के माध्यम से राष्ट्र के पुनर्निर्माण की आकांक्षा है। वे भारत को केवल अपने अतीत की स्मृतियों में बंद राष्ट्र के रूप में नहीं देखना चाहते थे। उनके लिए भारत का पुनर्जागरण मनुष्य के पुनर्निर्माण से जुड़ा था। यह विचार महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी राष्ट्र का सपना अंततः उसके नागरिकों के सपने से बनता है। यदि मनुष्य स्वयं अपने भीतर पराधीन है, यदि उसमें आत्मविश्वास नहीं है, यदि वह प्रश्न नहीं कर सकता और यदि वह अपने समाज की पीड़ा को अपनी पीड़ा नहीं मानता, तो केवल राजनीतिक स्वतंत्रता किसी राष्ट्र को वास्तव में स्वतंत्र नहीं बना सकती।

यही बात टैगोर के उस अमर स्वप्न में और अधिक काव्यात्मक रूप से दिखाई देती है जहाँ वे ऐसे देश की कल्पना करते हैं 

“जहाँ मन भय से मुक्त हो और मस्तक ऊँचा हो”, 

जहाँ ज्ञान स्वतंत्र हो, दुनिया संकीर्ण दीवारों में विभाजित न हो 

और तर्क अपनी राह न खो दे। 

टैगोर के लिए स्वतंत्र भारत केवल अंग्रेजी शासन से मुक्त भारत नहीं था; वह भय, अज्ञान, संकीर्णता और मानसिक गुलामी से मुक्त भारत था। उनके इस स्वप्न को आज के समय में पढ़ना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल उसके चुनावों में नहीं होती; वह इस बात में होती है कि उसके नागरिक कितनी स्वतंत्रता से सोच सकते हैं, असहमति व्यक्त कर सकते हैं, प्रश्न कर सकते हैं और अपने भविष्य की कल्पना कर सकते हैं। टैगोर का सपना हमें याद दिलाता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता और बौद्धिक स्वतंत्रता एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।



गांधी के यहाँ सपना इससे भी अधिक कठिन हो जाता है, क्योंकि गांधी सपने के साथ उसके साधनों का प्रश्न भी जोड़ देते हैं। उनके लिए भारत का भविष्य केवल सत्ता प्राप्त करने का प्रश्न नहीं था। The India of My Dreams में संकलित उनके विचारों में जिस भारत की कल्पना दिखाई देती है, वह राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ नैतिक और सामाजिक पुनर्निर्माण की भी आकांक्षा रखता है। गांधी का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शायद यही था कि हम जिस समाज का निर्माण करना चाहते हैं, क्या उसके निर्माण के साधन भी उसी समाज के मूल्यों के अनुरूप होंगे? यदि हमारा लक्ष्य न्याय है और रास्ता अन्याय का है, यदि हमारा लक्ष्य स्वतंत्रता है और साधन दमन का है, यदि हम अहिंसक समाज की कल्पना करते हैं लेकिन अपनी राजनीति को हिंसा और घृणा से संचालित करते हैं, तो क्या हम वास्तव में अपने ही सपने की नींव नहीं तोड़ रहे? गांधी के विचारों की आलोचना और उनसे असहमति के बावजूद यह प्रश्न आज भी असाधारण रूप से प्रासंगिक है कि क्या साधन और साध्य के बीच कोई नैतिक संबंध होना चाहिए? 

भगत सिंह के यहाँ सपना एक और अधिक बेचैन और राजनीतिक रूप ग्रहण करता है। उन्हें केवल एक साहसी क्रांतिकारी के रूप में याद करना उनके विचारों को अधूरा पढ़ना होगा। उनके लेखन में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि स्वतंत्रता का अर्थ क्या है और क्रांति का उद्देश्य क्या है। उनके और बटुकेश्वर दत्त के संयुक्त वक्तव्य में क्रांति को ऐसी सामाजिक व्यवस्था की दिशा से जोड़ा गया था जिसमें शोषण का अंत हो। उनके लेखन में युवाओं के लिए अध्ययन, वैचारिक अनुशासन, संगठन और दीर्घकालीन संघर्ष की आवश्यकता पर बल मिलता है। इसलिए भगत सिंह का सपना केवल विदेशी शासन को हटाने का सपना नहीं था; वह उस सामाजिक व्यवस्था पर भी प्रश्न करता था जिसमें मनुष्य मनुष्य का शोषण करता है। यही कारण है कि भगत सिंह का जीवन हमें यह सिखाता है कि सपना केवल भावना नहीं हो सकता। यदि सपना वास्तविक परिवर्तन की आकांक्षा है तो उसे विचार में बदलना होगा, विचार को संगठन में और संगठन को कर्म में। 

लेकिन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यह है कि उसमें एक ही सपना नहीं था। अलग-अलग व्यक्तियों और समूहों के भारत के बारे में अलग-अलग सपने थे। किसी के लिए स्वराज राजनीतिक स्वतंत्रता था, किसी के लिए सामाजिक समानता, किसी के लिए आर्थिक न्याय, किसी के लिए धार्मिक स्वतंत्रता, किसी के लिए किसान-मजदूर का अधिकार और किसी के लिए आधुनिक वैज्ञानिक राष्ट्र का निर्माण। इन सपनों के बीच मतभेद भी थे और संघर्ष भी। यही लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक जटिलता है। कोई राष्ट्र एक व्यक्ति के सपने से नहीं बनता; वह अनेक सपनों, असहमतियों और आकांक्षाओं के संवाद से बनता है। भारत की संविधान-निर्माण प्रक्रिया को इसी व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में देखने पर संविधान केवल शासन चलाने की नियम-पुस्तिका नहीं दिखाई देता, बल्कि स्वतंत्रता संघर्ष के अनेक स्वप्नों को एक संस्थागत भाषा में व्यक्त करने का प्रयास दिखाई देता है।

यहीं डॉ. भीमराव आंबेडकर का महत्व निर्णायक हो जाता है। आंबेडकर ने भारतीय समाज के सामने यह कठिन प्रश्न रखा कि यदि राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त भी हो जाए तो क्या वह पर्याप्त होगी? यदि मनुष्य जन्म से ही सामाजिक रूप से असमान है, यदि उसकी जाति उसके अवसर तय करती है, यदि उसके साथ सार्वजनिक जीवन में भेदभाव होता है, तो केवल विदेशी शासन का अंत मनुष्य को स्वतंत्र कैसे कर देगा? Annihilation of Caste में आंबेडकर ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को आदर्श सामाजिक व्यवस्था की बुनियादी शर्तों के रूप में रखा। उनके लिए लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की प्रणाली नहीं था; लोकतंत्र सामाजिक जीवन जीने का तरीका भी था। यही वह बिंदु है जहाँ सपना संविधान में प्रवेश करता है। समानता की कल्पना कानून का रूप लेती है, स्वतंत्रता अधिकार बनती है और बंधुत्व सामाजिक नैतिकता की मांग बन जाता है। 

इसलिए संविधान को केवल धाराओं और अनुच्छेदों में पढ़ना पर्याप्त नहीं है। संविधान के पीछे एक नैतिक कल्पना है—ऐसी कल्पना जिसमें व्यक्ति की गरिमा राज्य से बड़ी है, जिसमें जन्म मनुष्य की नियति तय करने वाला अंतिम आधार नहीं है, जिसमें कानून के सामने समानता केवल औपचारिक शब्द नहीं बल्कि सार्वजनिक जीवन का आधार है और जिसमें नागरिक केवल प्रजा नहीं बल्कि अधिकार-संपन्न मनुष्य है। संविधान इसी अर्थ में एक सामूहिक स्वप्न का दस्तावेज भी है। लेकिन संविधान स्वयं सपना पूरा नहीं करता। वह केवल यह तय करता है कि समाज किस दिशा में चलना चाहता है और उस दिशा में चलने के लिए किन मूल्यों और संस्थाओं को आधार बनाया जाएगा। सपने को वास्तविकता में बदलना प्रत्येक पीढ़ी की जिम्मेदारी बनी रहती है।

यही बात भारत के बाहर के अनुभवों में भी दिखाई देती है। अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर का “I Have a Dream” भाषण इसलिए ऐतिहासिक बना क्योंकि उसमें एक व्यक्ति का सपना लाखों लोगों की सामूहिक आकांक्षा से जुड़ गया था। 28 अगस्त 1963 को Washington में March on Washington for Jobs and Freedom के दौरान दिया गया यह भाषण नस्लीय समानता और नागरिक अधिकारों के संघर्ष के एक महत्वपूर्ण क्षण का हिस्सा था। National Archives के अनुसार उस मार्च में लगभग 2,50,000 लोग शामिल हुए थे। किंग के लिए सपना कोई काल्पनिक भविष्य नहीं था; वह उस समय की वास्तविक नस्लीय असमानता के विरुद्ध एक नैतिक और राजनीतिक मांग था। इसीलिए “I have a dream” के भीतर एक गहरी राजनीतिक संरचना छिपी थी—एक ऐसा समाज जिसमें व्यक्ति का मूल्य उसकी त्वचा के रंग से निर्धारित न हो। 

किंग के सपने की शक्ति इस बात में भी थी कि वह केवल भाषण बन कर नहीं रह गया। उसके पीछे बहिष्कार, मार्च, नागरिक अवज्ञा, संगठन और लंबे समय का संघर्ष था। यही वह बिंदु है जहाँ सपना और इतिहास एक-दूसरे से मिलते हैं। अकेला सपना कविता हो सकता है, लेकिन जब कोई समाज उस सपने को अपनी सामूहिक आकांक्षा बना लेता है तो वह राजनीतिक शक्ति बन सकता है। इतिहास में बड़े परिवर्तन इसलिए नहीं हुए कि किसी एक व्यक्ति ने सुंदर शब्द कह दिए; वे इसलिए संभव हुए कि उन शब्दों के पीछे लाखों लोगों ने अपने जीवन, समय और साहस को जोड़ा।



नेल्सन मंडेला और दक्षिण अफ्रीका का संघर्ष इसी तथ्य का एक और उदाहरण है। रंगभेद के विरुद्ध लंबा संघर्ष अंततः एक ऐसे दक्षिण अफ्रीका की संवैधानिक कल्पना तक पहुँचा जिसमें नस्ल के आधार पर नागरिक अधिकार निर्धारित नहीं होते। Nelson Mandela Foundation के अभिलेखों में मंडेला के उस “dream” का उल्लेख मिलता है जिसे नए दक्षिण अफ्रीका के निर्माण और उसके संविधान से जोड़ा गया है। लेकिन दक्षिण अफ्रीका की कहानी हमें यह भी बताती है कि किसी महान राजनीतिक परिवर्तन के बाद भी सपना समाप्त नहीं हो जाता। संविधान किसी संघर्ष का अंतिम अध्याय नहीं, बल्कि एक नई जिम्मेदारी की शुरुआत होता है। 

चे ग्वेरा का संदर्भ यहाँ एक अलग और जटिल प्रश्न खोलता है। उनके राजनीतिक जीवन और विचारों के मूल्यांकन पर व्यापक मतभेद रहे हैं, लेकिन 1965 के उनके निबंध Socialism and Man in Cuba में उन्होंने क्रांतिकारी व्यक्ति के भीतर मनुष्य के प्रति प्रेम और न्याय की भावना की बात की। यह विचार अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि वह हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि क्या किसी बेहतर समाज का सपना केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से पूरा हो सकता है। यदि किसी परिवर्तन के केंद्र में मनुष्य नहीं है, यदि उसमें दूसरे मनुष्य के प्रति सम्मान नहीं है, तो वह सपना अपनी नैतिक दिशा खो सकता है। इसीलिए किसी भी सामाजिक स्वप्न की अंतिम कसौटी शायद यही है कि वह मनुष्य की गरिमा के साथ क्या करता है। 

यहीं आ कर यह प्रश्न अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि क्या हर सपना महान होता है। निश्चित रूप से नहीं। मनुष्य साम्राज्य का भी सपना देख सकता है और स्वतंत्रता का भी; वर्चस्व का भी सपना देख सकता है और समानता का भी; किसी समुदाय को ऊपर उठाने का सपना देख सकता है और किसी दूसरे समुदाय को दबाने का भी। इसलिए केवल सपने देखना पर्याप्त नैतिक कसौटी नहीं हो सकता। हमें यह भी पूछना होगा कि हमारे सपने में कौन शामिल है और कौन बाहर रह जाता है। क्या हमारा सपना केवल “मैं” को बड़ा बनाता है या “हम” को भी? क्या उसमें दूसरे की स्वतंत्रता के लिए जगह है? क्या उसमें असहमति के लिए जगह है? क्या उसमें कमजोर मनुष्य की गरिमा सुरक्षित है? क्या वह भय पैदा करता है या स्वतंत्रता? क्या वह घृणा पर टिका है या संवाद पर? किसी सपने की महानता उसके आकार से नहीं, उसके भीतर समाई मानवीयता से तय होती है।

आज के समय में यह प्रश्न इसलिए और महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि सपना स्वयं बाजार की भाषा में बदलता जा रहा है। हमें बार-बार बताया जाता है कि हमारा सपना बड़ा घर होना चाहिए, बड़ी गाड़ी होनी चाहिए, अधिक पैसा होना चाहिए, अधिक प्रतिष्ठा होनी चाहिए और दूसरों से आगे निकलना चाहिए। इसमें कोई स्वाभाविक बुराई नहीं है; व्यक्ति को अपने जीवन को बेहतर बनाने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब व्यक्तिगत सफलता ही जीवन की अंतिम कल्पना बन जाती है। तब मनुष्य यह पूछना भूल जाता है कि वह जिस समाज में सफल हो रहा है, वह समाज कैसा है। क्या उसकी सफलता ऐसे पर्यावरण में हो रही है जिसमें आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित रहेंगी? क्या उसके बच्चों के साथ-साथ उन बच्चों के लिए भी शिक्षा की संभावना है जिनके पास संसाधन नहीं हैं? क्या उसकी स्वतंत्रता के साथ किसी दूसरे की स्वतंत्रता कुचली तो नहीं जा रही? यही वह जगह है जहाँ निजी सपना सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ता है।

इसलिए अपने सपने को जीने का अर्थ केवल अपनी इच्छा पूरी कर लेना नहीं है। अपने सपने को जीना शायद यह है कि जिस अन्याय को हम गलत मानते हैं, उसके सामने कम-से-कम अपने हिस्से की आवाज उठाएँ; जिस ज्ञान को महत्वपूर्ण मानते हैं, उसे अपने तक सीमित न रखें; जिस लोकतंत्र की प्रशंसा करते हैं, उसके भीतर असहमति के अधिकार का सम्मान करें; जिस समानता की बात करते हैं, उसे अपने निजी व्यवहार में भी जगह दें; जिस समाज को बेहतर देखना चाहते हैं, उसके निर्माण में अपने समय और श्रम का कुछ हिस्सा लगाएँ। सपना तभी जीवन का हिस्सा बनता है जब वह हमारे व्यवहार को बदलना शुरू करता है।

किसी भी बड़े सपने की परीक्षा उसकी सफलता से अधिक उसके प्रति हमारी निष्ठा में होती है। इतिहास में ऐसे असंख्य लोग हुए जिन्होंने अपने जीवन काल में अपने सपनों का पूरा परिणाम नहीं देखा। किसी ने बीज बोया, किसी ने रास्ता बनाया, किसी ने दीवार में पहली दरार पैदा की और किसी दूसरी पीढ़ी ने उस रास्ते पर चल कर मंजिल देखी। स्वतंत्रता आंदोलनों, सामाजिक सुधार आंदोलनों और नागरिक अधिकार संघर्षों की यही प्रकृति रही है। इसलिए असफलता सपना देखने का खंडन नहीं करती। कभी-कभी असफलता भी इतिहास में एक आवश्यक कदम होती है। जो व्यक्ति अपने जीवन में पेड़ की छाया नहीं देख पाता, उसका पेड़ लगाना व्यर्थ नहीं हो जाता।

यही कारण है कि सपने का सबसे बड़ा शत्रु असफलता नहीं, बल्कि उदासीनता है। असफल मनुष्य फिर प्रयास कर सकता है; लेकिन उदासीन मनुष्य प्रयास करने की आवश्यकता ही महसूस नहीं करता। “कुछ नहीं बदल सकता”, “व्यवस्था ऐसी ही है”, “लोग कभी नहीं बदलेंगे”, “हम अकेले क्या कर सकते हैं”—ये वाक्य धीरे-धीरे मनुष्य के भीतर के नागरिक को निष्क्रिय कर देते हैं। पाश का “सपनों का मर जाना” इसी मानसिक मृत्यु की ओर संकेत करता है। जब मनुष्य अपने समय से प्रश्न करना छोड़ देता है, तब वह केवल अपने सपनों को नहीं खोता; वह अपने भविष्य पर अपना अधिकार भी खोने लगता है।

हमारे समय में इसलिए सबसे जरूरी प्रश्न शायद यह नहीं है कि हम कितना विकास करेंगे, कितनी ऊँची इमारतें बनाएँगे या कितनी नई तकनीक विकसित करेंगे। ये प्रश्न महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके साथ एक बड़ा प्रश्न भी जुड़ा है—हम इस विकास का उपयोग किस प्रकार की दुनिया बनाने के लिए करेंगे? यदि तकनीक मनुष्य को अधिक स्वतंत्र, अधिक शिक्षित और अधिक मानवीय बनाती है तो वह सपना है; यदि वही तकनीक मनुष्य को और अधिक अकेला, नियंत्रित और विभाजित करती है तो हमें उसके उद्देश्य पर फिर विचार करना होगा। यदि आर्थिक विकास के साथ न्याय और गरिमा बढ़ती है तो विकास का अर्थ गहरा होता है; यदि समृद्धि कुछ हाथों में सिमट कर बहुसंख्यक लोगों की असुरक्षा बढ़ाती है तो केवल आंकड़ों की वृद्धि को मानव प्रगति कहना कठिन होगा।

आज हमें ऐसे सपनों की जरूरत है जिनमें केवल व्यक्ति नहीं, समाज भी दिखाई दे; जिनमें केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी हो; जिनमें केवल स्वतंत्रता नहीं, बंधुत्व भी हो; जिनमें केवल राष्ट्र नहीं, मानवता भी हो। ऐसा सपना किसी एक राजनीतिक दल, विचारधारा या व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं हो सकता। लोकतंत्र का स्वभाव ही यह है कि लोग अपने भविष्य की अलग-अलग कल्पनाएँ करें, उन्हें सार्वजनिक विमर्श में रखें, एक-दूसरे से असहमत हों और फिर संवैधानिक साधनों के माध्यम से अपने समाज की दिशा तय करें। लोकतंत्र वास्तव में भविष्य की अनेक संभावनाओं के बीच शांतिपूर्ण संवाद की व्यवस्था भी है।



और शायद इसी जगह सपने और संविधान एक-दूसरे से मिलते हैं। संविधान हमें यह नहीं बताता कि हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से कौन-सा सपना देखना चाहिए; वह केवल इतना सुनिश्चित करने की कोशिश करता है कि हर मनुष्य को अपने जीवन का सपना देखने और उसे गरिमा के साथ जीने की समान नागरिक जगह मिले। इसलिए संविधान की स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व की अवधारणाएँ केवल कानूनी शब्द नहीं हैं; वे उस समाज की दिशा का संकेत हैं जिसे हम सामूहिक रूप से संभव बनाना चाहते हैं। इस अर्थ में संविधान भी एक जीवित सपना है—ऐसा सपना जिसे हर पीढ़ी को अपने आचरण, संस्थाओं और सार्वजनिक जीवन में फिर से जीवित करना पड़ता है।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हमारे पास सपने हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि हमारे सपने कितने बड़े हैं और उनमें कितने लोग शामिल हैं। क्या हम केवल अपने लिए बेहतर जीवन चाहते हैं या ऐसी दुनिया भी चाहते हैं जिसमें हमारे साथ-साथ दूसरे मनुष्यों को भी सम्मानपूर्वक जीने का अवसर मिले? क्या हम केवल अपने बच्चों के भविष्य की चिंता करते हैं या उस समाज की भी चिंता करते हैं जिसमें हमारे बच्चे बड़े होंगे? क्या हम केवल इतिहास पर गर्व करते हैं या भविष्य के लिए कुछ नया बनाने का साहस भी रखते हैं?

शायद मनुष्य होने का अर्थ ही यही है कि हम वर्तमान की सीमाओं से आगे देख सकें। बुद्ध ने दुःख से मुक्ति की कल्पना की, कबीर ने मनुष्य को जाति और कर्मकांड की दीवारों से बाहर देखने को कहा, विवेकानंद ने आत्मविश्वासी मनुष्य और जाग्रत समाज की कल्पना की, गांधी ने स्वराज और नैतिक राजनीति का सपना देखा, टैगोर ने भयमुक्त और ज्ञानमय भारत की प्रार्थना की, भगत सिंह ने शोषणमुक्त समाज की आकांक्षा की, आंबेडकर ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित लोकतांत्रिक समाज की संवैधानिक कल्पना को आकार दिया, मार्टिन लूथर किंग ने नस्लीय समानता के सपने को करोड़ों लोगों की आवाज बनाया और मंडेला के संघर्ष ने एक नए दक्षिण अफ्रीका की संवैधानिक संभावना को जन्म दिया। इनके रास्ते, विचार और राजनीतिक निष्कर्ष एक जैसे नहीं थे; कई मामलों में उनमें गहरे मतभेद थे। लेकिन इन सबके अनुभवों से एक साझा मानवीय सत्य जरूर सामने आता है—मनुष्य वर्तमान से बड़ा भविष्य सोचने की क्षमता रखता है।

और यही क्षमता उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।

इसलिए हमें अपने बच्चों से केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि वे बड़े हो कर क्या बनना चाहते हैं। हमें उनसे यह भी पूछना चाहिए कि वे कैसी दुनिया में जीना चाहते हैं। हमें उनसे यह पूछना चाहिए कि उनकी सफलता में समाज का कितना हिस्सा होगा, उनके सपनों में दूसरों के लिए कितनी जगह होगी और वे अपने समय की किन समस्याओं को बदलना चाहते हैं। और उससे भी पहले हमें स्वयं से पूछना चाहिए—जिस दुनिया का हम सपना देखते हैं, उसे बनाने के लिए आज हमने क्या किया?

क्योंकि सपना भविष्य में रहता है, लेकिन उसकी कीमत वर्तमान में चुकानी पड़ती है। सपना आँखों में जन्म लेता है, विचार में आकार पाता है, संघर्ष में परीक्षा देता है, कर्म में अपना रास्ता बनाता है और कभी-कभी इतिहास में अपना घर बना लेता है। जो मनुष्य केवल वर्तमान को स्वीकार करता है, वह अपने समय का निवासी है; जो मनुष्य भविष्य की कल्पना करता है और उस भविष्य के लिए अपने वर्तमान को बदलने का साहस करता है, वह इतिहास का सहभागी बन जाता है।

इसलिए शायद पाश की चेतावनी को आज फिर से सुनने की जरूरत है—सबसे खतरनाक हमारे सपनों का मर जाना है। क्योंकि जिस दिन सपना मरता है, उस दिन केवल भविष्य की एक संभावना नहीं मरती; मनुष्य के भीतर प्रश्न करने की शक्ति, बेहतर दुनिया की कल्पना और उसे बनाने की बेचैनी भी मरने लगती है। इसके विपरीत, जब कोई मनुष्य यह कहता है कि “दुनिया ऐसी ही क्यों रहे, इसे बेहतर क्यों नहीं बनाया जा सकता?”, तभी भविष्य का पहला दरवाजा खुलता है।

और शायद इसीलिए सबसे बड़ा साहस किसी युद्ध में जाना नहीं, किसी भीड़ के सामने भाषण देना नहीं, किसी ऊँचे पर्वत पर चढ़ना भी नहीं है। सबसे बड़ा साहस कभी-कभी बहुत शांत और बहुत निजी होता है—उस दुनिया का सपना देखना जो अभी दिखाई नहीं देती, उस सपने पर विश्वास बनाए रखना जब परिस्थितियाँ उसके विरुद्ध हों, और फिर अपने जीवन के छोटे-छोटे कर्मों को उस अदृश्य दुनिया की दिशा में लगाते रहना।

क्योंकि दुनिया पहले कल्पना में बदलती है, फिर विचार में, फिर कर्म में और अंततः इतिहास में।

इसलिए अपने सपनों को केवल देखिए मत।

उन्हें समझिए।

उन्हें परखिए।

उन्हें मानवीय बनाइए।

और फिर उन्हें जीने का साहस कीजिए।

क्योंकि जो सपना केवल हमारी आँखों में रहता है, वह सपना है; लेकिन जो सपना हमारे जीवन के आचरण में उतर आता है, वही इतिहास की शुरुआत बनता है।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


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  1. राकेश कुमार जी का लेख टैगोर, आंबेडकर, भगत सिंह, मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला जैसे महापुरुषों के सपनों से प्रेरणा लेते हुए अंततः संवैधानिक मूल्यों और सामूहिक नैतिकता को व्यापक स्वप्न के रूप में प्रस्तुत करता है। लेकिन इसकी दृष्टि कहीं-कहीं अत्यधिक आदर्शवादी हो जाती है। संविधान में समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और एकता के सिद्धांतों को निर्विवाद आदर्श मान लेना भी उचित नहीं है, क्योंकि इन अधिकारों पर अनेक संवैधानिक प्रतिबंध और व्यावहारिक सीमाएँ हैं, जिनके कारण कई बार समानता के बजाय असमानता और न्याय के बजाय सामाजिक अन्याय की स्थितियाँ पैदा होती हैं। लेख समाज के अंतिम पायदान पर खड़े उस व्यक्ति की परिस्थितियों और आकांक्षाओं की भी उपेक्षा करता है, जिसके लिए रोजी-रोटी जुटाना ही सबसे बड़ा सपना है। सपनों का मूल्यांकन केवल आदर्शों से नहीं, बल्कि सामाजिक विषमता, शोषण, अन्याय और व्यक्ति की स्वतंत्रता के वास्तविक संदर्भों में भी किया जाना चाहिए।

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