विनीता बाडमेरा का संस्मरण ‘वे मेरे बचपन के दिन थे’


विनीता बाड़मेरा 


बचपन का जीवन न्यारा होता है। एक तरफ सबका स्नेह सहज ही मिलता है तो दूसरी तरफ बड़े लोगों की डांट भी सुननी पड़ती है। जिम्मेदारी के नाम पर कुछ भी नहीं बस खेलना, खाना और पढ़ना। स्कूल की पढ़ाई तब मौज़ मस्ती के साथ होती थी। बच्चों को इस तरह पढ़ाया जाता कि उनका बचपन भी सुरक्षित रहे और बेहतर भविष्य की एक नींव भी पड़ जाए। वह ऐसा दौर था जब घरों की छते आपस में जुड़ी होती  थी।और खाने खिलाने का सिलसिला संयुक्त रूप से होता ही रहता था। अपने बचपन के दिनों को shयाद करते हुए विनीता बाड़मेरा लिखती हैं।''नाश्ते में नमक मिर्च के पराठे से अच्छा कुछ नहीं था। इस उम्र तक लड़के-लड़की की दोस्ती का कोई भेद किसी घर में नहीं था। मोहल्ला अपना था। लोग अपने थे। दोस्त अपने थे। इन दोस्तों ने बारिश से हुई गीली मिट्टी में मेरे बनाएं घरोंदे तोड़े और रुलाया भी। बदले में मैंने भी मुक्के मारे और रेत फेंकी। सच वे दिन बुरा लगने के दिन नहीं थे। दुख को सींचते रहने के दिन नहीं थे। किसी के लिए कड़वाहट जोड़ कर रखने के दिन नहीं थे। नफरतों के घड़े भरने के दिन नहीं थे।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विनीता बाडमेरा का संस्मरण ‘वे मेरे बचपन के दिन थे’।


संस्मरण

‘वे मेरे बचपन के दिन थे’


विनीता बाडमेरा 


बचपन जीवन का सबसे सुंदर हिस्सा, जहाँ दुख हो पर दुख का अधिक अहसास नहीं हो और सुख का मतलब भी कोई खास नहीं हो। मेरा बचपन भी बिल्कुल ऐसा था। मुझसे पहले दो और बहनें जन्म ले चुकी थी,अब तीसरी भी बेटी! मम्मी से अधिक दुख दादी को और शायद पापा को हुआ होगा पर क्या किया जा सकता है! मुझे तो इस दुनिया में आना था और मैं आख़िर आठ अगस्त उन्नीस सौ सतहत्तर को दुनिया देखने के लिए आ गई। भगवान ने कहा " भेजने वाला मैं हूं फिर काहे का डर। जा बेटा, जी ले अपनी जिंदगी!”


स्कूल के दिन

स्कूल चूंकि घर से ज्यादा दूर नहीं था। भुआ उस स्कूल में पढ़ चुकी थी और दो बड़ी बहनें उसी स्कूल में पढ़ रही थी इसलिए ऐसी परिचित स्कूल 'श्री गुरु नानक नेशनल विद्यालय' में ही मेरा भी दाखिला कराया गया। 

बचपन तो बचपन था जहाँ लोभ लालच बुरा नहीं था। सही गलत के बहुत मायने नहीं थे। स्कूल चूँकि सिक्खों का था तो गुरुद्वारा भी था। मैं गुरुद्वारे में कड़ा प्रसाद (हलवा) के लालच में कई बार माथा टेकने जाती थी। सिक्खों के मुख्य गुरु की जयंती पर जुलूस निकलता था। जुलूस में बैलगाड़ी, ऊँटगाड़ी पर बैठे-बैठे "राज करेगा खालसा" के जोर-शोर से नारे लगाए, इस लालच में कि टॉफी और बिस्कुट मिलेंगे। लंगर भी चखा है तो लंगर में रोटियां भी बेली है। जपुजी साहिब का पाठ भी किया। कीर्तन में 'वाह ओ वाह गोविंद सिंह जी' भी गाया। सब कुछ लालच में क्योंकि यहाँ भी टिफिन, पेन, पेंसिल और ज्योमेट्री बॉक्स जो इनाम में मिलता। उन दिनों ने ही तो खेल-खेल में एक नई भाषा पंजाबी और लिपि गुरुमुखी से परिचय कराया तो यह भी सिखाया कि गुरु को कभी भी पीठ नहीं दिखाते।

स्कूल में ही सर्दियों के दिनों में धूप में बैठ कर श्रुतिलेख लिखा। पहाड़े रटे और याद न करने पर डंडे भी खाए। मम्मी स्कूल न आएं, टीचर शिकायत न करे इसके लिए गुरुद्वारे में रोज हाथ जोड़े। मम्मी आती तो बहन जी, 'अविनाश बग्गा और सरला व्यास' की शिकायत थी कि "बातूनी है और जरा सी डांट पर रोने लगती है।" और कोई शिकायत नहीं थी। क्लास में पहला स्थान भले नहीं आता था लेकिन तीसरा स्थान और प्रथम श्रेणी आना मेरे लिए मायने रखता था। 

गणित तो डराता था लेकिन अंग्रेजी ने भी कम नहीं डराया। स्टोरी और लेटर तो रट-रट कर भी डर बना रहता था कहीं ऐन परीक्षा के दिन भूल न जाऊँ!

आठवीं तक स्कूल था। मेरी तरह, मेरे बाद दो बहनों का भी जन्म बेटे की आस करते-करते हुआ। इस तरह हम सभी पांचों बहनों ने उसी स्कूल से आठवीं तक पढ़ाई की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए दूसरी स्कूल में दाखिला लिया। आठवीं में जो फेयरवेल पार्टी हुई तो रोना भी आया। शायद इसलिए कि अब के बिछुड़े कब मिलेंगे! 

नवीं से बारहवीं तक की पढ़ाई 'राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय जालोरी गेट जोधपुर’ से की। घर से यह स्कूल दूर था इसलिए साइकिल का सहारा था। इसी साइकिल ने मुझे आत्मविश्वास भी दिया। इस स्कूल में आई तो देखा एक क्लास के चार सेक्शन। खूब लड़कियाँ। अलग-अलग विद्यालय से आई लड़कियाँ। पुरानी सहेलिया़ँ नहीं थी। नई सहेलियाँ बनाना आसान नहीं था। दसवीं में सैकेंड डिविजन बना। दुख तो हुआ पर दुख को नकारा नहीं जा सकता। जो मिला उसको स्वीकार  करने के अलावा कोई विकल्प भी तो नहीं था।

ग्याहरवीं में आई तो आर्ट्स विषय ले लिया। आर्ट्स में हिन्दी, इतिहास और राजनीति विज्ञान मेरे विषय थे। शुरु में राजनीति विज्ञान समझने में दिक्कत हुई पर उस विषय को पढ़ाने वाली अध्यापिका 'श्रीमती मंजू व्यास' से प्यार हुआ। मैम से प्यार तो उनके विषय पढ़ने में भी रुचि बढ़ी। उनका कहा पत्थर की लकीर था। वे नहीं आती तो मन मेरा बेचैन रहता। डांटती तो लगता कि अब कभी मैम से बात नहीं करुंगी। पर उन्होंने ही मेरा मनोबल बढ़ाया। परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ कमजोर थी तो उन्होंने ज़रूरी किताबें और पासबुक भी पढ़ने को दी। उन्हीं के कारण बारहवीं मे मैंने विद्यालय के कला संकाय के तीनों सेक्शन में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इस तरह दसवीं में जो विश्वास खुद पर से टूटा था, वह फिर जुड़ा। 

अब समय था कुछ अलग करने का इसलिए बारहवीं के बाद ‘शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान विद्याशाला' में एस.टी.सी के लिए प्रवेश ले लिया। टीचर बनने की ख्वाहिश थी और मम्मी चाहती थी कि शादी से पहले ऐसा कोर्स तो कर ही लूं जिससे भविष्य में मुझे किसी के सामने हाथ नहीं पसारने पड़े। इस तरह मैं दो साल शिक्षक बनने का प्रशिक्षण विद्याशाला जोधपुर से लेती रही। कभी बच्चों के संग बच्ची बनी और कभी बड़ी।


मोहल्ला


वे दिन कोई और दिन थे तभी तो जिसके घर में टीवी होता उस घर में चित्रहार, नाटक और फिल्म देखने सबसे पहले पहुँच कर बच्चे जगह रोक लेते। अपनी जगह के अलावा अपनी मम्मी के बैठने के लिए जगह रोकने की ड्यूटी मेरी थी। लोग भले थे। हर बात की शिकायत नहीं थी। झगड़े नहीं थे। दूसरे के घर टीवी देखना भी बुरा नहीं था।

उन दिनों जोधपुर शहर के मोहल्ले में दरवाजे सिर्फ रात को ही बंद होते थे। लोगों का लोगों पर भरोसा कायम था। भरोसे के कारण छुप्पम छुप्पी खेलते हुए किसी भी घर के दरवाजे के  पीछे हम आसानी से छुप जाते थे।अलबत्ता कोई मना नहीं करता और कोई करता तो उसको हम बच्चों ने जीभ भी दिखाई। पर हां पड़ोसी मम्मी से शिकायत भी करते कि 'छोरी ने तमीज कोनी' लेकिन मुझे कोई खास फर्क पड़ता भी नहीं था। पड़ोसी भी ज्यादा मन में गांठे रख नहीं सकता था। गांठो का बोझ उठाना उनके लिए ही भारी था क्योंकि दो रुपए की दही और आठ आन्ने का धनिया और मिर्च मैं ही ला कर देती। 

तेरह साल की हुई तब तक मोहल्ले की लड़कियों के अलावा लड़कों संग खूब पक्कड़म-पकड़ाई और लंगड़ी टांग खेली और हाँ खुद के हार जाने पर उनसे लड़ाई भी की। वे लोग खेल में चीटिंग करते थे फिर चुप कैसे रहती! पर दूसरे दिन फिर वही एक साथ खेलना। आज भी याद है कि होली के दिन इन नामुराद लड़को ने मुझे रंग मिले पानी की कुंडी में पटक दिया था।  दो दिन बात नहीं की पर वे सब एक ओर और मैं बिल्कुल अकेली। उनका कहना था कि "खेल है और होली है सब चलता है!" मैं अकेली कब तक 'रुठी रानी' बनी रहती। मनाने का इंतज़ार फिजूल था। खुद ही मानना पड़ा। फिर खेलती भी किस के साथ?

घरों की छते आपस में जुड़ी थी। गर्मियों की शाम और सर्दियों की दुपहरी को एक दूसरे की छत पर जाना तो ज़रूरी कामों में शामिल था। शाम को सबके साथ दाल, रोटी और केरी-गोंदे का अचार सबसे स्वादिष्ट पकवान था। नाश्ते में  नमक मिर्च के पराठे से अच्छा कुछ नहीं था। इस उम्र तक लड़के-लड़की की दोस्ती का कोई भेद किसी घर में नहीं था। मोहल्ला अपना था। लोग अपने थे। दोस्त अपने थे। इन दोस्तों ने बारिश से हुई गीली मिट्टी में मेरे बनाएं घरोंदे तोड़े और रुलाया भी। बदले में मैंने भी मुक्के मारे और रेत फेंकी। सच वे दिन बुरा लगने के दिन नहीं थे। दुख को सींचते रहने के दिन नहीं थे। किसी के लिए कड़वाहट जोड़ कर रखने के दिन नहीं थे। नफरतों के घड़े भरने के दिन नहीं थे।


अब आए बाबरी मस्जिद टूटने के दिन। कर्फ्यू के कारण पूरा मोहल्ला शांत और उदास। कभी-कभार  कुछ लड़के आस-पड़ोस के घर के बाहर बने चबूतरे पर ताश खेलते थे। हम कभी-कभार  बाहर यूं ही टहलते थे। समय गुजरता नहीं था। उन्हीं दिनों ताश खेलते एक लड़के ने मुझे सहेलियों से बाते करते देखा। उसका देखना जाने क्यों अच्छा लगा!

मैंने "मैंने प्यार किया" फिल्म सात बार देखी। "आजा शाम होने आई....।" गाना तो पूरा रट लिया था। कच्ची उम्र थी लेकिन कुछ दिनों बाद ही आशिकी फिल्म का गाना "अब तेरे बिन जी लेंगे हम....” गाते हुए मैं खूब रोई। क्या था पता नहीं। पता है तो बस इतना कुछ शुरू नहीं हुआ और सब खत्म हो गया।


घर और परिवार

संयुक्त परिवार वाले हमारे घर में तीन परिवार रहते थे। हमारा और दो चाचा के परिवार के अलावा बा-बाईजी (दादा- दादी) भी थे। सबके हिस्से में डेढ़-दो कमरे। घर एक लेकिन सबकी रसोई अलग-अलग। बच्चे दादी-दादा के पास ही सोते। मुझे भूत से डर लगता। बड़ी बहन को टीवी में भूत का नाटक देखते हुए देखती तो खुद को रोक नहीं पाती लेकिन फिर बाथरूम के लिए भी उठने में नानी मरती। बा (दादा जी) के पास उनकी रजाई में जा कर सोती तो लगता अब भूत नहीं दिख रहा है। बड़े मेरे सुरक्षा कवच थे।

बाईजी यानि मेरी दादी को पोतों से अधिक प्यार था इसलिए  खुद भी छुप कर आम खाती और छुपा कर चाचा के बेटों को भी देती। मैं देखती तो कल के लिए कहती। कभी-कभी गुठली और छिलका भी चूसने के लिए देती आख़िर उस पर भी खूब आम चिपका रहता। गुठली चूसने का भी अपना मजा था।

दो बहनें बड़ी और दो छोटी तो मम्मी को हर काम के लिए मैं ही नजर आती। जा, दही ला। जा, आलू ला। जा, दवाई ला और जा, साबुन ला। धनिया मिर्च ला। दो बड़ी हैं इसलिए उन्हें हर काम के बाहर भेजना नहीं और दो नासमझ है इसलिए सामान लेने कैसे जाएगी! दिन के दस चक्कर बाहर के न लगवाती तब तक मम्मी और चाचियों को चैन नहीं पड़ता।

याद है मुझे भली-भांति वह रोज भी जब चाची को अपने मायके के लिए तैयार होते देख कुछ नासमझी में मैंने गलत शब्द कह दिया। शायद वह गाली सरीखा था। चाची ने दादी से शिकायत की। सभा बैठी और मेरा अपराध घर के सभी सदस्यों के सामने रखा गया। मैंने पैर छू कर चाची और बाकी बड़ों से माफी मांगी। आइंदा ऐसा न करने का प्रण लिया। मम्मी ने समझाया, “ऐसे शब्द कभी नहीं बोलने हैं और खासतौर पर बड़ों से सोच समझ कर बात करनी है।” कितने अच्छे दिन थे जब गलती पर तुरंत माफी मांग सब सुलझा लिया जाता था। बच्चों को गलत करने पर तुरंत टोक दिया जाता था। "भय बिन प्रीत न होत गुस्साई” तुलसीदास जी ने यूं ही तो नहीं लिखा।

चाचा को मैग्जीन पढ़ने का शौक था। कभी-कभार वे हमारे लिए कॉमिक्स, नंदन,  चन्दामामा, बालहंस और बाल भारती भी लाते। इन किताबों को पहले पढ़ने की होड़ में घर के काम से आनाकानी की तो थप्पड़ भी उपहार में मिले। पर किताबें नही छूटी। भले घर का काम छूटा। 

इसी परिवार में पापा को शराब के कारण हिलते-डुलते और लड़खड़ाते देखा। कभी खुशी मनाता घर तो कभी मम्मी को रोते देखा। सब सुख सबको नहीं मिलते। बड़ी बहनों की शादी की चिंता मे मम्मी को घुलते देखा और उम्र धीरे-धीरे बढ़ रही थी यह पता तब चला जब मोहल्ले के लड़कों संग खेलने की मनाही कर दी गई। एक रोज दोनों बड़ी बहनों की शादी भी हो गई। घर की आर्थिक स्थिति डांवाडोल होने लगी। मम्मी ने घर से बाहर जा कर काम करना शुरु किया। बीत रहा था बचपन। जिम्मेदार बनी मैं। शैतानियां संजीदगी में तब्दील हुई। सिलाई का कुछ काम सीख अपना जेब-ख़र्च निकालने लगी।

दो बड़ी बहनों की शादी के बाद हर कोई मेरे ब्याह की बात करता। कारण यह था कि मेरी शादी हो तो मुझसे छोटी दो बहनों की तरफ भी ध्यान जाएगा। बेटियों की शादी बड़ा दायित्व था और यह दायित्व जितना जल्दी हो पूरा हो जाए परिवार के सदस्यों के साथ मम्मी भी यही चाहती थी। जल्दी ही एक रिश्ता आया जो दूसरे शहर का था। मैंने सोलह साल में ही सगाई के लिए हाँ कर दी। अठारह साल में शादी हुई पर अभी भी बचपना मुझसे नहीं छूटा और जब तक सांसें हैं बचपना भी मेरे साथ जिंदा रहेगा।


परिचय-

विनीता बाडमेरा

2023 में  पहला कहानी संग्रह ‘एक बार आख़िरी बार ‘राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित।

दोआबा, मधुमती, आजकल, कथा देश, आज की जनधारा, किस्सा, पाखी, वागर्थ आदि साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में कविता व कहानियां प्रकाशित।


संपर्क 


विनीता बाडमेरा 

बाड़मेरा स्टोर

कमल मेडिकल के सामने

नगरा, अजमेर 

राजस्थान 305001


 मेल-  vbadmera4@gmail.com 

 मोबाइल -9680571640

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