शैलेन्द्र चौहान का आलेख 'कात्यायनी की कविताएं'
'कात्यायनी की कविताएं'
शैलेन्द्र चौहान
कात्यायनी की कविताओं में स्त्री-अनुभव, सामाजिक यथार्थ और वैचारिक स्पष्टता एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि गहरे अंतर्संबंध में उपस्थित हैं। उनकी कविता में किन्हीं भावुक क्षणों या निजी अवसाद की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि वह एक व्यापक सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से जन्म लेती है। यही कारण है कि कात्यायनी की कविताएँ पढ़ते हुए पाठक को बार-बार यह अनुभव होता है कि वह केवल कवयित्री के निजी संसार में नहीं, बल्कि अपने समय के जटिल, क्रूर और विसंगत यथार्थ में प्रवेश कर रहा है। उनकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हैं - चेहरों पर आँच, सात भाइयों के बीच चम्पा, इस पौरुषपूर्ण समय में, जादू नहीं कविता, फुटपाथ पर कुर्सी, राख अँधेरे की बारिश में(सभी कविता संकलन), दुर्ग द्वार पर दस्तक (स्त्री-प्रश्न विषयक निबन्धों का संकलन), षडयंत्ररत् मृतात्माओं के बीच(साम्प्रदायिक, फासीवाद, बुद्धिजीवी प्रश्न और साहित्य की सामाजिक भूमिका पर केन्द्रित निबन्धों का संकलन),
कुछ जीवन्त, कुछ ज्वलन्त(समाज, संस्कृति और साहित्य पर केन्द्रित निबन्धों का संकलन), प्रेम, परम्परा और विद्रोह( शोधपरक निबन्ध) प्रकाशित। समकालीन भारतीय स्त्री कवियों के पेंगुइन द्वारा प्रकाशित संकलन 'इन देयर ओन वॉयस' में कविताएँ शामिल।
कात्यायनी की कविता की पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता है। यह प्रतिबद्धता किसी नारेबाज़ी या घोषित वैचारिक घोषणापत्र के रूप में नहीं आती, बल्कि जीवन की ठोस स्थितियों, संबंधों और संघर्षों के भीतर से उभरती है। उनकी कविताएँ सामाजिक अन्याय, पितृसत्ता, वर्ग-विभाजन, श्रम के शोषण और स्त्री की असुरक्षा जैसे प्रश्नों को अत्यंत सहज लेकिन तीखे ढंग से उठाती हैं। यहाँ ‘स्त्री’ कोई अमूर्त प्रतीक नहीं, बल्कि एक जीती-जागती, सोचती-समझती और प्रतिरोध करती हुई सत्ता है।
कात्यायनी की स्त्री-दृष्टि को यदि गहराई से देखा जाए तो वह केवल स्त्री-विमर्श तक सीमित नहीं रहती। वे स्त्री को समाज की संपूर्ण संरचना के भीतर रखकर देखती हैं। उनकी कविताओं में स्त्री का संघर्ष अकेला नहीं है; वह श्रमिक, दलित, अल्पसंख्यक और हाशिए पर खड़े तमाम लोगों के संघर्ष से जुड़ा हुआ है। इसीलिए उनकी कविताओं में स्त्री की पीड़ा अक्सर एक व्यापक मानवीय पीड़ा में बदल जाती है। यह दृष्टि उन्हें उन कवयित्रियों से अलग करती है जिनकी कविता केवल आत्मकथात्मक दायरे में सिमटकर रह जाती है।
भाषा के स्तर पर कात्यायनी की कविताएँ सादगी और अर्थगर्भिता का अद्भुत संतुलन प्रस्तुत करती हैं। उनकी भाषा अलंकारिक चमत्कार या दुर्बोध प्रतीकों का बोझ नहीं उठाती। वह सीधी, सपाट और रोज़मर्रा की लग सकती है, लेकिन उसी साधारणता में उसकी असाधारण शक्ति छिपी है। शब्दों का चयन ऐसा है कि कविता पाठक के भीतर देर तक गूंजती रहती है। उनकी भाषा में न तो अनावश्यक सौंदर्य प्रदर्शन है और न ही कृत्रिम क्रांतिकारिता। यह भाषा अनुभव की आँच में तपकर निकली हुई भाषा है।
कात्यायनी की कविताओं में घरेलू जीवन और सार्वजनिक जीवन के बीच की दीवारें अक्सर ढह जाती हैं। रसोई, घर, बच्चे, रिश्ते, सड़क, दफ्तर, फैक्ट्री—ये सब उनकी कविता में एक ही संसार के हिस्से के रूप में उपस्थित होते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि उनके लिए निजी और सार्वजनिक अलग-अलग क्षेत्र नहीं हैं। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के लिए ‘घर’ कोई सुरक्षित, निष्कलुष स्थान नहीं, बल्कि संघर्ष और टकराव का क्षेत्र भी है। कात्यायनी इस सच्चाई को बिना किसी अतिरंजना के सामने रखती हैं।
उनकी कविता में समय की उपस्थिति भी उल्लेखनीय है। यह समय स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर बदलता हुआ, दबाव डालता हुआ और कभी-कभी कुचल देने वाला समय है। कात्यायनी अपने समय को न तो रोमांटिक दृष्टि से देखती हैं और न ही केवल अतीत की स्मृति में शरण लेती हैं। वे वर्तमान की कठोर सच्चाइयों का सामना करती हैं और भविष्य के लिए प्रश्न छोड़ती हैं। उनकी कविताओं में एक तरह की ऐतिहासिक चेतना है, जो यह समझती है कि व्यक्तिगत अनुभव भी इतिहास से कटकर नहीं देखे जा सकते।
कात्यायनी की कविता में प्रतिरोध एक केंद्रीय तत्व है, लेकिन यह प्रतिरोध शोरगुल वाला या आक्रामक नहीं है। यह प्रतिरोध अक्सर चुपचाप, दृढ़ और अडिग रूप में सामने आता है। उनकी स्त्री रोती हुई नहीं, बल्कि सोचती हुई, सवाल करती हुई और अपने अस्तित्व को नए सिरे से परिभाषित करती हुई दिखाई देती है। कई बार यह प्रतिरोध थकान, असहायता और विफलता के बीच से जन्म लेता है, जो इसे और अधिक विश्वसनीय बनाता है।
भावनात्मक स्तर पर कात्यायनी की कविताएँ करुणा और संवेदना से भरी हुई हैं, लेकिन यह करुणा आत्मदया में नहीं बदलती। वे दुख को महिमामंडित नहीं करतीं, बल्कि उसे समझने और बदलने की कोशिश करती हैं। उनकी कविता में प्रेम भी है, लेकिन वह प्रेम किसी आदर्श या स्वप्नलोक में नहीं बसता। वह प्रेम भी सामाजिक यथार्थ से टकराता है, उसमें दरारें हैं, असमानताएँ हैं और कभी-कभी विफलताएँ भी हैं। यही यथार्थबोध उनके प्रेम-कविताओं को भी विशिष्ट बनाता है।
कात्यायनी की कविताओं में प्रकृति का चित्रण सीमित और प्रतीकात्मक है। प्रकृति यहाँ सौंदर्य का निरा उपादान नहीं, बल्कि कभी-कभी मानवीय स्थिति का विस्तार बन जाती है। पेड़, रास्ते, मौसम, अँधेरा, रोशनी—ये सब सामाजिक और मानसिक अवस्थाओं के साथ जुड़कर आते हैं। प्रकृति का यह प्रयोग कविता को अतिरिक्त अर्थ-स्तर प्रदान करता है, लेकिन वह कभी मुख्य विषय पर हावी नहीं होता।
रचना-शिल्प की दृष्टि से कात्यायनी की कविताएँ मुक्तछंद की परंपरा में हैं, लेकिन उनमें एक आंतरिक अनुशासन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। पंक्तियाँ अनावश्यक रूप से बिखरी हुई नहीं हैं। हर विराम, हर टूटन, हर रिक्ति अपने भीतर अर्थ समेटे हुए है। उनकी कविता में चुप्पी भी उतनी ही अर्थपूर्ण है जितना कि कहा गया शब्द। यह शिल्पगत सजगता उनकी कविताओं को गहराई प्रदान करती है।
कात्यायनी की कविताएं पाठक से संवाद करती हैं, भ्रम की सृष्टि नहीं करतीं। वे प्रश्न खड़े करती हैं, स्थितियाँ सामने रखती हैं और पाठक को सोचने के लिए विवश करती हैं। यही संवादात्मकता उनकी कविता को जीवंत बनाती है। उनकी कविताएँ किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से अधिक एक प्रक्रिया का हिस्सा बनती हैं—समझने, महसूस करने और बदलने की प्रक्रिया।
समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में कात्यायनी की उपस्थिति इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि वे स्त्री-अनुभव को केवल पहचान की राजनीति तक सीमित नहीं करतीं। वे उसे सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों के व्यापक संघर्ष से जोड़ती हैं। इस अर्थ में उनकी कविता केवल स्त्री की नहीं, बल्कि पूरे समाज की कविता बन जाती है।
कात्यायनी की कविताएँ यह स्पष्टतः बताती हैं कि कविता केवल सौंदर्य का उत्सव नहीं, बल्कि चेतना का कार्यभार भी है। उनकी कविता अपने समय की गवाही देती है—उस समय की, जिसमें असमानता, हिंसा और असुरक्षा व्याप्त है, लेकिन साथ ही बदलाव की आकांक्षा भी जीवित है। कात्यायनी इस आकांक्षा को शब्द देती हैं, बिना उसे खोखले आशावाद में बदले। यही संतुलन उनकी कविता की सबसे बड़ी ताकत है।
कात्यायनी की कविताएँ पाठक को असहज करती हैं, झकझोरती हैं और अपने भीतर झाँकने को मजबूर करती हैं। यह कविता मनोरंजन नहीं, बल्कि हस्तक्षेप है—संवेदनशील, विचारशील और ज़रूरी हस्तक्षेप। समकालीन हिंदी कविता में कात्यायनी का यह योगदान उन्हें एक विशिष्ट और अनिवार्य कवयित्री के रूप में स्थापित करता है।
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