राजेन्द्र कुमार का संस्मरण "वह लड़का - मेरा अनन्य, मेरा 'आत्म'"
![]() |
| राजेन्द्र कुमार |
किसी भी व्यक्ति की निर्मिति में उसके बचपन के परिवेश का बड़ा हाथ होता है। अगर बात रचनाकार की हो तो ये सन्दर्भ और भी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार का जन्म कानपुर में हुआ। बचपन से ही उनकी प्रवृत्ति खोजपरक और रचनात्मक थी। इन प्रवृत्तियों ने ही एक ऐसे रचनाकार का सृजन किया जिसने आगे चल कर आलोचना और कविता के क्षेत्र में नए प्रतिमान गढ़े। 'सृजन सरोकार' के जुलाई-सितम्बर 2023 अंक में राजेन्द्र जी ने एक लम्बे संस्मरण में अपने बचपन के दिनों को शिद्दत से याद किया है। लम्बी बीमारी के पश्चात कल 16 जनवरी 2026 को उनका देहावसान हो गया। उनकी स्मृति को पहली बार परिवार की तरफ से हम नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राजेन्द्र कुमार का संस्मरण "वह लड़का - मेरा अनन्य, मेरा 'आत्म'"।
"वह लड़का - मेरा अनन्य, मेरा 'आत्म'"
राजेन्द्र कुमार
स्मृतियों की साँय-साँय में ऊँघते अतीत के वीरान खंडहर। इन खंडहरों में खुद अपने को भी अपने नाम से आवाज़ दो, तो वह आवाज़ भी लौटा दी जाती है। उदास सन्नाटे की गूंज के साथ। पर हम तो न उनमें लौट सकते हैं, न उनको कुछ लौटा सकते हैं।
भूला हुआ-सा याद आ रहा है वह एक लड़का, जो तब सातवीं कक्षा में आ चुका था। तुकबंदी की शुरुआत पहले ही हो चुकी थी, अब वह कुछ-कुछ कागज़ पर उतार कर उसे सहेजने का मोह भी पाल बैठा। इस काम के लिए पूरी की पूरी एक चौंसठ पेजी कापी भी अलग कर ली उसने। इस कापी पर जब वह लिखता, तो उसे लगता-उसकी राइटिंग (हस्तलिपि) उन कापियों की तुलना में कुछ ज़्यादा ही अच्छी बन जाती है, जिन पर वह अपने स्कूल का काम करता है।
उसका पारिवारिक परिवेश आर्यसमाजी था। संस्कारों से धर्म-निष्ठ। लेकिन जबसे उसने होश संभाला, घर में किसी को पूजा-पाठ करते नहीं पाया। आम हिंदू परिवारों में जिस तरह पूजा वगैरह की जगहें तय होती हैं और देवी-देवताओं की मूर्तियों के सामने हाथ जोड़ कर बैठा जाता है, वैसा कुछ भी नहीं। हाँ, मेले-ठेले में मिट्टी के खिलौनों में ढले राम-लक्ष्मण-सीता, शिव-पार्वती या राधा-कृष्ण वगैरह दिख जाते, तो उन खिलौनों का आकर्षण बच्चों के लिए जरूर होता। उस लड़के को भी कभी-कभी ऐसे खिलौने खरीद दिए जाते थे।
पर्व-त्योहारों पर-मसलन रक्षाबंधन, होली-दीवाली के मौकों पर पारंपरिक रीति-रिवाज़ों और विधि-विधानों का अनुपालन होता था। उस लड़के को ऐसे दिनों की उत्सुक प्रतीक्षा रहती। इस प्रतीक्षा की खास वजह यह थी कि ऐसे मौकों पर खाने को तरह-तरह की चीजें मिलतीं और खाते भी सब साथ बैठ कर। वरना तो उसे अपने पिता के हाथों का बना एकरस भोजन रोज़ अकेले ही बैठ कर खाने को मिलता था।
उसके पिता-जिन्हें वह 'बाबू जी' कहता था, उसकी खुशियों का ख्याल न रखते हों, ऐसा नहीं था। सच पूछो तो, एक उम्र तक मां की कमी भी बाबू जी ने ही पूरी की। पर उनकी आर्थिक सीमाएं थीं। अपनी माँ को उस लड़के ने बस तस्वीर में ही देखा कैमरे से उतारी गई एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो- जिसमें माँ का शव ज़मीन पर रखा है। सिरहाने बाबू जी हैं। बगल में, अपनी मौसी की गोद में वह बच्चा है- जो वह खुद है। बस इतना भर। इतने भर से, वह अपनी कल्पना में उस अभाव का चित्र उकेरता है. जिसका नाम उसके लिए 'अम्मा' है।
वह सोचता है, कितना बड़ा रहा होगा वह, जब बाबू जी उसकी दूसरी माँ ले आए होंगे! उसे कसैली-सी याद है-खुद अपने बारे में 'किसी-किसी को वह यह कहने में मज़ा लेते पाता, इस बेटे को देखो, यह अपने बाप की शादी में गया था।'
शहर में कहीं कोई मेला वेला लगता तो बाबू जी उसे घुमाने ले जाते। भादों में कृष्ण जन्माष्टमी के दिनों सजाई जाने वाली झाँकियाँ दिखाने में पिता को कितना सुख मिलता होगा, इसका अनुमान करके वह रोमांचित हो उठता। कानपुर में 'कमला टॉवर' और 'काँच का मंदिर' के आस-पास के इलाके में कई मंदिर थे। भादो मास में बड़ी भव्य सजावट होती थी उनमें। बिजली की रंग-बिरंगी झालरें। मंदिरों के बाहरी बारजों और छज्जों पर दीवारों के सहारे कतार की कतार सजाई गई मूरतें बिजली-चालित भंगिमाओं में सजीव हो उठतीं। वह लड़का अपने बाबू जी का हाथ पकड़े, भीड़ में, यह सब बड़े विस्मय-विभोर भाव से देखता चलता। और घर आ कर, अपने खिलौनों में भी वैसे ही गति संचार के उपाय सोचने की कोशिश करते-करते सो जाता। बिजली से तो कुछ करना उसके लिए कहाँ संभव था? पर होते-होते हुआ यह कि दफ़्ती (कार्डबोर्ड) पर पेंसिल से कुछ आकृतियाँ बनाते-बनाते एक उपाय सूझ गया। दफ़्ती पर बनाई आकृतियों को, काट-काट के अलग निकाल लेता। उनके हाथ-पाँव में गति कैसे लाई जाए, जुगत भिड़ाता। मेलों में उसने गुब्बारे बेचने वालों को देखा था कि दफ़्ती की आकृतियों को बाँस की खपच्ची में चिपका कर, बेचते वक्त डोरे से खींचते तो उनके हाथ-पैर हिलने-डुलने लगते। बस, घर में बुआ के सिलाई के डिब्बे में रखी रील से, चुपके से उसने डोरा निकाला। उसी डोरे को अपनी दफ़्ती से काटी गई आकृतियों के हाथ-पैरों से जोड़-जोड़ कर पूरी आकृति की पीठ पर लेई से खपच्ची चिपका दी। खपच्ची के निचले सिरे को बाएँ हाथ से पकड़ कर दायें से डोरा खींचता। इस तरह आकृति के हाथ-पैर गतिशील हो उठते। उसकी अपनी सफलता के एहसास के लिए इतना भी कम न था। इसी एहसास को उस लड़के ने अपनी कापी पर एक दिन इस तरह दर्ज किया-
आओ अब घर में ही कर लें झाँकी वाली सैर
दफ़्ती के कृष्ण जी पा गए चलते-फिरते पैर।
निश्चय ही, दोहा-शैली की इस तुकबंदी की पृष्ठभूमि में कबीर-रहीम के वे दोहे रहे होंगे, जिन्हें पाँचवीं-छठी कक्षा में ही अपनी पाठ्य-पुस्तकों में उसने पढ़ रखा था। छठवीं में आते-आते तो वह अपने बाबा को 'रामचरितमानस' का एक पन्ना रोज पढ़ कर (अर्थ सहित) सुनाने की लगभग नियमित ड्यूटी पर भी लगा दिया गया था।
घर में कुछ पुरानी पोथियाँ या किताबें और भी, यहाँ-वहाँ आलमारियों के खानों में रखी दिख जातीं। कुछ पत्र-पत्रिकाएँ भी। उन्हें उलट-पुलट कर देखने का चाव सहजतया उस लड़के में रहता। 'कल्याण' के भी कुछ अंक उसके हाथ लग गए। इन सबको पढ़ने से ज़्यादा उसका मन इनमें छपी रंगीन तस्वीरों को देखने में रमता। स्कूल वाली ड्राइंग कापी के पन्नों पर इन तस्वीरों की नकल पर कलर-पेंसिलों से कुछ खींचा-खांची भी करता रहता।
'कल्याण' के आखिरी पृष्ठ पर एक कालम का शीर्षक होता था-'पढ़ो, समझो और करो'। इसे वह गौर से पढ़ता। कई बार तो जो पढ़ता, उसे अमल में लाने को उत्कठित होता। दिसंबर-जनवरी की कँपकँपा देने वाली सर्दी में भी जब सब रजाई में दुबके सो रहे होते, वह भोर से पहले ही (जिसे 'कल्याण' के उस कालम में ब्रह्म मुहूर्त' कहा गया था) उठ जाता। नहा-धो कर एक कोने में में मंत्र-सा कुछ बुदबुदाने को, पालथी मार कर जमीन पर बैठ जाता। उसके फुफेरे भाई, जिन्हें वह 'सुशील दादा' कहता था, तभी से उसे 'स्वामी जी' कह कर चिढ़ाने में मजा लेने लग गए थे।
उन दिनों सुबह मुँह अँधेरे ही मोहल्ले में इकतारा और डफली या खंजड़ी बजाते कुछ फकीरों-साधुओं के फेरे भी लगने लगते। उनके भजन-कीर्तन की आवाज़ों में नीद का खुलना उस लड़के को बहुत अच्छा लगता। मोहल्ले में एक मस्जिद भी थी। पाँच बजे सुबह की अजान भी कान में पड़ती। मंदिर में बजती घंटियों की आवाज़ भी। उस लड़के को रात में लोरियाँ गा कर सुलाने वाली माँ तो नसीब नहीं थी, पर सुबह-सवेरे जगाने वाली ये आवाजें सुनते हुए बड़ा होना उसे कभी नहीं भूलता।
सुशील दादा उसके बहराइच वाले फूफा जी के बड़े बेटे थे। उम्र में उससे कोई सात-आठ साल बड़े। बहराइच वाले फूफा जी पुराने कांग्रेसी थे। स्वतंत्रता सेनानी रह चुके थे। आज़ादी के बाद बहराइच से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतते। एम.एल.ए. रहे दो बार। खद्दर का धोती-कुर्ता पहनते थे। सर पर टोपी भी। अंग्रेजी दैनिक 'नेशनल हेराल्ड' के संवाददाता भी थे। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (P.T.I.) के सदस्य भी। उस लड़के को अपने इन फूफा जी के कानपुर आने का बड़ा इंतजार रहता। फूफा जी पान के शौकीन थे। जब वे कानपुर आते, उसकी दो ज़िम्मेदारियाँ होतीं। आते ही फूफा जी अपने कुरते की जेब से नोट निकालते और उसे पनवाड़ी की दूकान से अपनी हिदायत के अनुसार पान लगवा कर लाने को दौड़ा देते। सुबह होते ही एक काम यह भी कि पास के न्यूज़ पेपर स्टाल से अंग्रेजी के दो-तीन अखबार एक साथ लाने होते, 'नेशनल हेराल्ड', 'पायोनियर', 'स्टेट्समैन' आदि। फूफा जी प्रायः हफ्ता-दस दिन तो रहते ही। हिंदी की किसी पत्रिका का कोई अंक स्टाल पर दिख जाता, तो वह फूफा जी के दिये पैसों में से, उसे भी अपने लिए खरीद लेता।
सुशील दादा तो कानपुर में ही रह कर पढ़ रहे थे। तब बी. ए. में थे। फ़िल्मफेयर, स्क्रीन, जैसी पत्रिकाएँ कभी-कभी वो ले आते। उनमें फ़िल्मी कलाकारों के बड़े आकर्षक चित्र होते। इनमें से कुछ रंगीन तस्वीरें (खासकर अभिनेत्रियों की) काट कर सुशील दादा किताबों की आलमारी के पल्लों पर चिपका लेते। आलमारी के पल्ले भी रूमानी हो उठते। सिनेमा में उस लड़के की दिलचस्पी के बीज सुशील दादा की संगत में ही पड़े।
पर कुल मिला कर स्थिति अभी तक कुछ यही थी कि उस लड़के के लिए घर से अकेले बाहर निकलने के मौके कम ही थे। पिता की निगरानी थी। फिर भी आठवीं कक्षा तक आते-आते, स्कूल के सिवा एक जगह और थी, जहाँ अकेले जाने का अवसर उसने तलाश ही लिया। उसके स्कूल (बी.एन.एस.डी. का भवन सेक्शन) के पास ही गया प्रसाद लाइब्रेरी थी। मेस्टन रोड़ पर, आर्य समाज हाल के बगल में तिलक हाल के आगे मेन रोड पर। एक बार किसी कारणवश स्कूल में जल्दी छुट्टी हो गई। तो उस दिन, वह सीधे घर न आ कर, अपने एक सहपाठी (जिसके पिता की दूकान थी, स्टेशनरी की पास ही के चौक में) के साथ पहली बार वह गया प्रसाद लाइब्रेरी की सीढ़ियाँ चढ़ा था। फिर तो वह अकेले भी, स्कूल से गया प्रसाद लाइब्रेरी जाने का वक्त अक्सर ही निकाल लेता।
लाइब्रेरी में बैठ कर पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने का चस्का उसे इसी तरह लगा। हिंदी की लगभग सभी पत्रिकाएँ धर्मयुग, हिंदुस्तान, ज्ञानोदय और सभी अखबार वहाँ नियमित पढ़ने को मिल जाते। कुछ में रचनाओं के साथ-साथ लेखकों के पते भी नीचे दिए होते। वह लड़का उन पतों को नोट कर के रख लेता। वह सोचता, क्या कभी अपना लिखा हुआ भी कुछ इन पत्र-पत्रिकाओं में वह देख सकेगा? नोट किए हुए पतों पर अपनी कविताएँ छपी देखने का लोभ आखिर वह कब तक संवरण करता? वह भी यहाँ-वहाँ छपने की उम्मीद में कुछ-कुछ भेजने लग गया। सब लौट-लौट आता 'संपादक के अभिवादन और खेद सहित'।
स्कूल के जमीनी तल पर एक बड़ा-सा हाल था। चारों तरफ दीवारों पर कानपुर के कुछ स्वनामधन्य (यह 'स्वनामधन्य' शब्द उसने अपने हिंदी के टीचर के मुख से सुना था तो समझ में नहीं आया था) कवियों-लेखकों के बड़े-बड़े चित्र टँगे थे। राय देवीप्रसाद पूर्ण, गया प्रसाद शुक्ल 'स्नेही', बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', गणेश शंकर विद्यार्थी वगैरह के। महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस के भी। इसी हाल में कक्षाएँ शुरू होने से पहले सारे विद्यार्थी सामूहिक प्रार्थना के लिए इकट्ठे होते। यहीं समय-समय पर कविता-पाठ, वाद-विवाद प्रतियोगिता वगैरह भी आयोजित होती। फिलहाल इन्हीं कार्यक्रमों में भाग लेने का मौका पा कर वह लड़का संतोष कर लेता।
एक दिन कक्षाओं में सूचना घुमाई गई कि स्कूल की वार्षिक पत्रिका में कोई विद्यार्थी अपनी रचना देना चाहे तो अमुक तारीख तक अपने क्लासटीचर को दे सकता है। उस लड़के ने हिम्मत कर के अपनी कविता दे दी। वार्षिक पत्रिका जब आई तो उसमें वह छपी थी।
आठवीं कक्षा पास की। नवीं में उसका दाखिला गवर्नमेंट कॉलेज में करा दिया गया। वह लड़का जब भी एक कक्षा उत्तीर्ण कर के नई कक्षा में जाता तो सबसे ज़्यादा उत्सुकता इस बात की होती कि उसे अब नई किताबें मिलेंगी। नई किताब की महक ही अलग होती है। लेकिन ज़्यादातर होता यह कि उसके हाथ में जो भी किताब आती, उस पर नाम पहले से ही किसी और विद्यार्थी का लिखा होता। जो उसे पढ़ कर परीक्षा पास कर चुका होता। ऐसी किताबों को 'सेकेंड हैंड' कहा जाता था। आधे दाम पर मिल जाती थीं। उसके बाबू जी भार थोड़ा हल्का होता महसूस करते। उन किताबों के कवर अगर फटे होते, तो बाबू जी उन पर अखबार चढ़ा कर सफ़ेद चिप्पी लगाते, जिस पर गाढ़ी स्याही से अपने बेटे का नाम लिख देते।
गवर्नमेंट कॉलेज में दो अध्यापक उस लड़के को ऐसे मिले, जिनके पढ़ाने की शैली इतनी रोचक और विद्यार्थियों के प्रति इतनी आत्मीयतापूर्ण होती कि जो भी विषय वे पढ़ाते, विद्यार्थियों में उस विषय के प्रति सहज रूचि विकसित हो जाती। इनमें से एक कॉलेज लाइब्रेरी के इंचार्ज भी थे। हफ्ते में एक दिन एक पीरियड लाइब्रेरी का भी होता था। अलग-अलग कक्षाओं के लिए अलग-अलग दिन निर्धारित थे। विद्यार्थियों को कोई एक किताब घर ले जा कर पढ़ने के लिए भी इशू कराने की सुविधा थी। वह लड़का नवीं से दसवीं में आया तो उसने कॉलेज लाइब्रेरी से पहली बार इशू कराने के लिए हाथ में जो किताब ली, उसका नाम देखते ही अध्यापक महोदय ने रजिस्टर पर झुकी अपनी नजर उठा कर एकाएक इस तरह उस लड़के के चेहरे की तरफ देखा, जैसे कुछ विस्मय में हों- 'तुम ये किताब पढ़ोगे?' वह उपन्यास था. जो उस लड़के के हाथ में था-शरतचंद्र का 'देवदास'। लड़के के लिए यह समझ पाना मुश्किल था कि उसके अध्यापक वह किताब उसके हाथ में देख कर इतना विस्मित क्यों हैं। वह चुप खड़ा रहा। अध्यापक ही बोले 'ठीक है ले जाओ। पर एक शर्त है, जब लौटाने आना तो लिख कर लाना कि यह किताब तुम्हें कैसी लगी और तुमने इससे क्या सीखा?'
शरत चंद्र का नाम उस लड़के ने अपने बंगाली सहपाठी मिहिर बरन बैनर्जी से सुन रखा था। वही मिहिर बरन, जिसके साथ उस लड़के ने कॉलेज की एक वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लिया था। मिहिर बरन को उसमें प्रथम पुरस्कार मिला था और वह खुद द्वितीय स्थान पर आ गिरा था। बहरहाल जब 'देवदास' पढ़ कर लौटाया गया, तो अपने अध्यापक की शर्त उसने निभाई, जिस तरह भी उससे निभाते बनी।
फिर तो कॉलेज में कोई भी साहित्यिक गतिविधि ऐसी न होती, जिसमें उस लड़के को भाग लेने के लिए उसके अध्यापक उत्साहित न करते हों।
मिहिर को फ़िल्मी गानों का भी शौक था। स्वाभाविक था कि मिहिर की संगत में उस लड़के को भी यह शौक होना ही था।
'देवदास' पहला उपन्यास था, जो उसने पढ़ा था। और यह भी निरा संयोग नहीं था कि पहली फिल्म जो चुपके से, कक्षाएँ छोड़ कर कॉलेज टाइम में दोपहर वाले शो में, कॉलेज के पास ही की एक टाकीज़ में, मिहिर के साथ देखी, वह भी 'देवदास' ही थी- विमल राय वाली। दिलीप कुमार तभी से सिनेमा के पर्दे से उतर कर उस लड़के के स्मृति-पट से कभी न उतरने वाले देवदास बन गए। और पारो और चंद्रमुखी की भूमिका में सुचित्रा सेन और वैजयंती माला में कौन उसकी संवेदना में कितना ज़्यादा गहरे उतर सका, मिहिर का यह सवाल उसके मन में अनबूझा-सा पड़ा रहा। बहुत दिनों तक अलबत्ता देवदास की पारो से ज़्यादा, उसने अपने को चंद्रमुखी की त्रासदी से ही सीझते पाया। 'वो अदा कहाँ से लाऊँ, जिसे तू कुबूल कर ले?'
और हाँ, देवदास तो उस पर ऐसा छाया रहा बाद तक, कि कई बार सोचता कि वह खुद भी एक उपन्यास लिखेगा- 'एक और देवदास'। जो वह कभी लिख नहीं पाया।
दसवीं कक्षा में वह आया। यानी इस वर्ष उसे यू. पी. बोर्ड की हाईस्कूल की परीक्षा देनी थी। पिता बार-बार उलाहना देते- 'ये इम्तिहान पहले की तरह का नहीं है कि स्कूल के टीचर्स ही ले लेंगे और पास कर देंगे। कापियाँ जाँचने को बाहर जाएंगी। हँसी-खेल नहीं है पास होना। ज़्यादा मेहनत करनी होगी।' ज़ाहिर है, पिता को इधर-उधर की चीज़ों में उसका रुचि लेना, वक़्त की बरबादी लगता था।
वर्ष था, सन् 1957, आजादी के बाद का दूसरा 'जनरल इलेक्शन' फरवरी-मार्च में। चुनाव की सरगर्मियों की वजह से इम्तिहान भी कुछ देर में होने थे इस वर्ष। साथ ही, 1857 के विद्रोह का शताब्दी वर्ष भी था यह। दिलचस्पियों का वर्ष रहा। यह वर्ष उस लड़के लिए व्यक्तिगत रूप से खासी दिलचस्पियों का वर्ष रहा।
कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर उसने एक सूचना पढ़ी - राज्य स्तर पर एक कविता प्रतियोगिता आयोजित होनी है, जिसमें भाग लेने के लिए विभिन्न विद्यालयों से विद्यार्थियों के नाम आमंत्रित किए गए हैं।
कानपुर के गवर्नमेंट कॉलेज से उस लड़के का नाम प्रतियोगिता के लिए चुन लिया गया।
समय आने पर पता चला, प्रतियोगिता का केंद्र लखनऊ का कोई कॉलेज था। राज्य भर से हाईस्कूल स्तर के विद्यार्थियों में से चुने गए प्रतियोगियों को उसी केंद्र पर जा कर कविता लिखनी थी। कविता का विषय भी केंद्र पर ही दिया जाना था। निर्धारित तिथि पर वह अपने अध्यापक के साथ लखनऊ गया। कविता का विषय ब्लैकबोर्ड पर चाक से लिखा गया-'1857 का स्वाधीनता संग्राम'। समय दिया गया डेढ़ घंटा।
उस लड़के ने कविता लिखी और समय पर दे दी। घर लौटा। बाबा ने पूछा- 'क्या लिख आए?' अब पूरी कविता तो उसे याद न थी। जिस कागज पर लिखी थी, वह भी वहीं जमा करा लिया गया था। बहरहाल, जो पक्तियाँ याद रहीं, वो सुना दीं। बाबा ने कहा, 'कविता अच्छी तो है।' पर बाबा की तारीफ़ से क्या होता है? बाबा कोई निर्णायक तो है नहीं प्रतियोगिता के। जब उसे खुद नहीं पता, किस-किसने केसे-कैसे जौहर दिखाए होंगे। एक से एक तेज लड़के होंगे। एक से एक अच्छी कविताएँ लिख कर जमा की होंगी। तो बाबा को क्या पता?
हाईस्कूल की परीक्षा में अभी चार-पाँच महीने बाकी थे। पिता ने टोका-टोकी थोड़ी और बढ़ा दी।
ऐसे ही दिन बीत रहे थे। तभी छब्बीस जनवरी का दिन आया। गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में सभी विद्यार्थी कॉलेज के हाल में इकट्ठे हुए। मंच सजा हुआ था। मंचासीन अतिथियों, वरिष्ठ शिक्षकों के बीच प्रिंसिपल साहब बैठे हुए थे। देश-भक्तिपूर्ण भाषणों के बाद अंत में प्रिंसिपल ने अपने संबोधन का आरंभ एक ऐसी सूचना से किया, जिसे सुन कर उस लड़के को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो पा रहा था। खुशी से उस लड़के का कुछ ऐसा हाल था कि उसके नाम को जब पुकारा गया, तो उसके लिए कुछ बोल पाना मुश्किल था। उसे मंच पर अपनी वही कविता सुनाने के लिए पुकारा जा रहा था, जो उसने अंतर्राज्यीय कविता-प्रतियोगिता के मौके पर लिख कर जमा की थी। मंच पर वह पहुँचा, तो उसे उस कविता की एक कागज़ पर मुद्रित प्रति (शीशे के फ्रेम में मढ़ी) प्रिंसिपल द्वारा भेंट की गई। घोषणा की गई कि इसी कविता को प्रथम पुरस्कार दिया गया है। घोषणा में यह भी बताया गया कि आगे एक बड़ा आयोजन होगा, तब किसी विशिष्ट अतिथि के हाथों उस प्रतियोगिता में द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त प्रतियोगियों को भी आमंत्रित कर के एक साथ ही पुरस्कार स्वरूप उपहार और प्रमाणपत्र दिये जाएंगे। उस लड़के ने किसी तरह अपने को संभाला और हाथ में फ्रेम में मढ़ी उसकी जो कविता थी, उसे माइक के सामने खड़े हो कर पूरा पढ़ दिया। हाल तालियों से गूंज उठा। ताली बजाने वालों में उसके अध्यापकों के भी हाथ थे और मंचासीन अतिथियों और प्रिसिपल साहब के भी। उस लड़के की खुशी का ठिकाना न था। इधर लोकसभा के चुनावों की धूमधाम के दिन भी आ गए। रोज जुलूस निकलते। जगह-जगह जनसभाएँ होतीं। हर दल के बड़े-बड़े नेता आते। परेड मैदान घर के पास ही था। बड़ी-बड़ी मीटिंगें प्रायः वहाँ होती। गली-मोहल्ले के बच्चे तक, जिन्हें राजनीतिक समझ क्या खाक होती, वे भी सुने हुए चुनावी नारे ज़ोर-ज़ोर से दोहराते। जगह-जगह चुनाव-चिन्हों के बैनर-पोस्टर। दो बैलों की जोड़ी, हसिया हथौड़ा, झोपड़ी, बरगद, दीपक ...। उस लड़के को भी यह सब उत्सव जैसा लगता।
चुनाव संपन्न हो गए। गली-मोहल्लों का जीवन फिर पटरी पर आ गया। बहुमत प्राप्त कांग्रेस की सरकार में नेहरू जी फिर प्रधानमंत्री बने। चुनाव के दिनों में उस लड़के को हैरत होती थी, जब वह 'कांग्रेस को वोट दे कर जवाहर लाल नेहरू के हाथ मजबूत करें' जैसे नारे सुनता था। उसे बचपन के वे दिन अभी भी याद आते, जब वह इस नारे को सुन कर सोचने लगता था-नेहरू जी के हाथों को आखिर हुआ क्या है, जो उन्हें मजबूत करने की गुहार लगाई जाती है। शायद वो पहले चुनाव (सन् बावन वाले) के दिन रहे होंगे। लेकिन अब वह इस मुहावरे का मतलब समझने लगा था। अपने शहर के एक कवि सम्मेलन में उसने सुदर्शन चक्र के मुंह से अब तक एक कविता भी सुन ली, जिसकी शुरूआत इस पंक्ति से होती थी
'भारत के लेनिन को सुमिरौ।
जिनको नाम जवाहर लाल'।
खबर मिली अब वही जवाहर लाल नेहरू कानपुर आने वाले हैं। उस लड़के के अध्यापकों ने बताया, फूल बाग में (जिसे गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम पर गणेश उद्यान कहा जाने लगा है) 1857 के शताब्दी समारोह का शुभारंभ प्रधानमंत्री जवाहर लाल जी करेंगे। अंतर्राज्यीय कविता प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार भी उन्हीं के हाथों दिये जाएंगे। इसलिए उस लड़के को अपनी कविता जवाहर लाल जी की उपस्थिति में सुनाने के लिए विशेष तैयारी करनी पड़ेगी।
अब क्या था, कविता पाठ के रिहर्सल होने लगे। कविता जबानी सुनानी होगी, इसके लिए उसे अपनी कविता रटने का और उसके प्रभावी पाठ का अभ्यास कराया जाने लगा। उसके जिन दो गुरूजनों के जिम्मे यह काम था- श्रीमान शुक्ला जी (हिंदी के अध्यापक) और तिवारी जी (इतिहास के अध्यापक) वे कविता पाठ का अभ्यास केवल विद्यालय परिसर में ही करा के संतोष कर लेने वाले नहीं थे। वे उसे कानपुर के ऐसे स्थलों पर भी ले जाते, जहाँ 1857 के इतिहास की धड़कनें सुनी जा सकती थीं। जैसे कानपुर का कंपनी बाग (जिसे बाद में अंग्रेजों ने नाम दिया था मेमोरिअल गार्डेन) और जाजमऊ का 'मैसेकर घाट'। आजादी मिल जाने के बाद भी कुछ वर्षों तक कंपनी बाग में विक्टोरिया की सफेद संगमरमर की बनी विशाल मूर्ति लगी रही। बरगद का वह पेड़ भी इसी बाग में रहा होगा जिससे लटकाए गए होंगे आज़ादी के दीवाने क्रांतिकारी। विक्टोरिया की मूर्ति बाग के केंद्र में जिस जगह को वृत्ताकार घेर कर स्थापित की गई थी, उसके बारे में बताया गया कि वहाँ एक बड़ा कुआँ था। जब बिठूर के पेशवा नाना राव और तात्या टोपे अपने दल-बल के साथ अंग्रेज़ों को खदेड़ते हुए कानपुर पहुँचे तो अंग्रेजों ने कंपनी बाग में शरण लेनी चाही। लेकिन तात्या टोपे और उनके सिपाहियों ने कंपनी बाग को घेर लिया। जो अंग्रेज़ भाग सके, वहाँ से भी भागे। लेकिन करीब दो सौ अंग्रेज महिलाओं को जब भागने का कोई मौका नहीं मिला तो दहशत के मारे वे उसी कुएँ में कूदने लगी और सबको जान गंवानी पड़ी। अंग्रेज़ों ने जब फिर कानपुर पर कब्ज़ा कर लिया, तो अपनी उन मृत महिलाओं की स्मृति में इसका नाम रख दिया- 'मेमोरिअल वेल'। और कंपनी बाग हो गया 'मेमोरिअल गार्डेन'। बाद में कुएँ को पाट कर उसके ऊपर विक्टोरिया की मूर्ति स्थापित की गई। आजादी के कुछ बरसों बाद विक्टोरिया की मूर्ति हटा कर यहाँ 1857 की क्रांतिकथा के नायक 'तात्या टोपे' की मूर्ति लगाई गई और कंपनी बाग को नाना राव पार्क कहा जाने लगा।
इतना बता कर हिंदी के अध्यापक शुक्ला जी ने उस लड़के से कहा- 'अब आओ, थोड़ी देर बैठ लेते हैं। उन्हीं स्मृतियों की छाँव में, यहीं कहीं।' इतिहास के अध्यापक तिवारी जी ने उत्साह बढ़ाया 'यहीं तुम्हारी कविता सुनेंगे।'
पानी का नल लगा था, पास में। उसी के नीचे मुँह लगा कर हाथों का चुल्लू बनाया। पानी पिया सबने। फिर एक पेड़ के नीचे चबूतरे जैसे एक ठौर पर सब बैठे। शुरू हुआ कंठस्थ कविता का पाठ-
टूटें चाहे चाँद सितारे
बलिदानों की कड़ी न टूटे।
धरा सहेजे बलिदानों की बड़ी पुरानी परंपरा है
जाने कितनी आहुतियों से सदियों का इतिहास भरा है
कितनी ही माओं के बेटे
हँस-हँस कर लपटों पर लेटे
ताकि चटख कर
जग की चलती घड़ी न टूटे!
टूटें चाहे चाँद सितारे ...
यह पहला बंद था उस कविता का, जो उसे नेहरू जी की उपस्थिति में सुनानी थी। तिवारी जी बोले- 'फिर से सुनाओ'। फिर से सुना दिया गया।
शुक्ला जी बोले 'चलें अब वापस। आज इतना ही। कल 'मैसेकर घाट' चलेंगे।'
स्कूल की तरफ से कराया गया यह पहला 'तीर्थाटन' था। हाँ, तीर्थाटन शुक्ला जी और तिवारी जी ने ने यही नाम दिया था- 1857 की क्रांतिकथा से जुड़े कानपुर के स्थलों की उस यात्रा को।
गंगा जी के दो घाटों से तो वह पहले से ही परिचित था-सरसैया घाट और परमट पर स्थित आनंदेश्वर मंदिर का घाट। पर 'मैसेकर घाट' न पहले देखा था, न नाम ही सुनाया।
शुक्ला जी और तिवारी जी के साथ इस बार कल की तरह सिर्फ वह ही नहीं था। दो-चार अन्य विद्यार्थी भी थे, जिनमें से एक मिहिर बरन भी था। 1857 की कुछ घटनाएँ 'मैसेकर घाट' से भी जुड़ी सुनने को मिलीं। तिवारी जी ने बताया, इस घाट को बहुत पहले कभी सतीचौरा घाट कहते थे। कभी यहाँ दो परिवारों की महिलाएँ सती हुई होंगी, इसीलिए सती चौरा घाट। लेकिन 1857 की सत्ताइस जून को 40 नावों पर कानपुर से इलाहाबाद के लिए इसी घाट से रवाना हुए करीब तीन सौ अंग्रेज गंगा की धारा के बीच डूब गए थे। (ये वही दिन थे, जब नाना साहब ने अपनी वीरता से अंग्रेज़ों को, कानपुर से भागने के लिए विवश कर दिया था।) यह अंग्रेजी हुकूमत के लिए 'मैसेकर' था, यानी सामूहिक हत्या। इसीलिए उन्होंने इस घाट को नाम दिया 'मैसेकर घाट'। उस लड़के का दिल क्षण भर के लिए दहल गया।
तिवारी जी और शुक्ला जी, साथ आए विद्यार्थी भी सब थोड़ी देर खामोशी में डूब रहे, घाट से दूर सिकुड़ी सिमटी सी गंगा के शांत मंथर प्रवाह को देखते हुए।
शुक्ला जी को कुछ कहते हुए सुना आस-पास कोई शांत जगह हो, चलो वहीं बैठ कर रिहर्सल कर लिया जाए।'
घाट से थोड़ी दूर एक जगह दिखी। सब वहीं बैठे। आज दोनों गुरुजन खाने के लिए भी कुछ-कुछ ले कर आए थे। खाया गया। पूरी-अचार वगैरह। और, फिर वही क्रम। कविता-पाठ का। कल जहाँ तक पाठ हुआ था, उसके आगे की पक्तियाँ थीं-
कई नई कोंपलें
आज जो छोटी हैं, कल बड़ी बनेंगी।
तना किसी का छड़ी बनेंगी।
जड़ें किसी की जड़ी बनेंगी।
वे फूली फलियाँ भी देंगी
काँटे भी, कलियाँ भी देंगी।
उगा कि जो बलिदानी भू से,
जिसको सींचा गया लहू से,
उस गुलाब की लकड़ी वाली
लाल गुलाबी छड़ी न टूटे।
टूटें चाहें चाँद सितारे
मर-मर कर जिनके जीवन ने
एक प्रबल संकल्प जिया है
तिल-तिल जल जिनकी काया ने
युग का कायाकल्प किया है
वे न रूके, न रूकेंगे आगे।
वे न झुके, न झुकेंगे आगे।
क्या मानी, सीना टकराए,
शिला बड़ी से बड़ी न टूटे!
टूटें चाहें चाँद-सितारे
त्याग-तपस्या जिसके सुर हों,
घमर-घमर जिसके नूपुर हों
ऐसी ताल-थपकियों वाली
कोई भी खंजड़ी न टूटे।
टूटें चाहे चाँद सितारे ...
अभ्यास को विराम दिया गया। और तब शुक्ला जी के शब्द थे-
'कविता लिखना शब्दों को सिर्फ कागज़ पर टाँकना भर नहीं होता। कविता सुनाना भी सिर्फ बाहर के लोगों को कागज पर लिखा सुना देना मात्र नहीं होता। कविता सुनाओ तो तुम्हारे भीतर भी तुम्हारी आवाज गूंजे। कविता लिखी है तो लिखने वाला उसे खुद अपने भीतर भी महसूस करे। पढ़ने-सुनने वाले के दिल में भला वह क्या उतरेगी, अगर खुद लिखने वाले के भीतर नहीं उतरी।'
इस तरह यह अभ्यास कविता को सिर्फ रट लेने का और उसका पाठ कर देने का अभ्यास मात्र नहीं था। रचना को रचनाकार के लिए एक अंतर्लय की तरह उसके अपने संवेदन तंत्र को सौंपने का एक उपक्रम भी था। यह उपक्रम मानो उस लड़के के लिए, कविता लिखने से ज़्यादा, कविता को महसूस करने के लिए मिलने वाला पुरस्कार था।
और फिर वह दिन भी आया, जिसकी प्रतीक्षा में वह आतुर था। फूल बाग का वह मैदान, जिसे अब गणेश शंकर विद्यार्थी उद्यान कहा जाता था। जब कोई बड़ा नेता कानपुर आता तो उसके जन-संबोधन के लिए यही स्थल प्रायः सर्वोपयुक्त माना जाता था। जवाहर लाल जी को 1857 के शताब्दी समारोह के सिलसिले में यहीं आना था। पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार अंतर्राज्यीय कविता-प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार प्राप्त प्रतिभागियों को पुरस्कार-ग्रहण के लिए यहीं उपस्थित होना था। संबंधित विद्यालयों को संभवतः यह निर्देश पहले ही दे दिया गया होगा कि वे अपने यहाँ के उन अध्यापकों के नाम भी पहले से फूलबाग वाले कार्यक्रम के आयोजकों के पास भिजवा दें, जो पुरस्कार के लिए चयनित विद्यार्थियों को अपने साथ ले कर कार्यक्रम स्थल पर पहुँचेंगे। कानपुर के गवर्नमेंट कालेज से जो नाम भेजे गए, वो वही थे श्रीमान शुक्ला जी और तिवारी जी के।
निर्धारित तारीख को सभा-स्थल पर वह लड़का अपने बाबू जी के साथ समय से बहुत पहले ही पहुँच गया। लग रहा था, बाबू।जी भी कम उत्साहित न थे। लड़के को बता दिया गया था कि शुक्ला जी और तिवारी जी उसका इंतज़ार कहाँ करेंगे। बाबू जी उसे लेकर वहीं पहुँच गए।
के.ई.एम. हाल वाली बिल्डिंग के आगे मंच जहाँ बना था, वहीं सामने बाईं तरफ नीचे कतार में रखी कुर्सियों पर अपने-अपने अध्यापकों के साथ पुरस्कार ग्रहण के लिए आए विद्यार्थियों के बैठने का स्थान तय था। यथास्थान सब बैठ गए।
चारों तरफ़ भीड़ बढ़ती जा रही थी। एक-डेढ़ घंटा बीता होगा कि कुछ हलचल हुई। एकाएक सारा वायुमंडल नारों से गूंज उठा। मंच पर नेहरू जी का आगमन हुआ। फोटुओं में तो बहुत बार देखा था उस लड़के ने, उस भव्य व्यक्तित्व को, जिसे पं. जवाहर लाल नेहरू के नाम से पहचनवाया जाता था। प्रत्यक्ष देखने का अनुभव कुछ और ही था। भाव-विभोर था वह लड़का। इसलिए और अधिक, कि इन्हीं नेहरू जी के हाथों वह पुरस्कार ग्रहण करेगा। उन्हीं हाथों जिनके बारे में इलेक्शन के दिनों पोस्टरों में लिखा रहता था- 'नेहरू जी के हाथ मज़बूत कीजिए।' तिस पर और भी ज़्यादा विह्वल, यह सोच कर कि उसके बाबू जी भी कहीं बैठे होंगे देखने को वह दृश्य! बाबू जी को तो कुछ अता-पता भी नहीं है कि कौन सी कविता उसको पुरस्कृत हुई है। आज वह खुद मंच पर सुनाएगा, और बाबू जी भी सुनेंगे उसे।
खुशी के मारे उसका दिल धुकधुक कर रहा था। पर भीतर-भीतर हिलोरे मार रही भाव तरंगें आपस में कितनी गड्ड-मड्ड सी थीं- जितनी उत्सुकता, उतनी ही आशंकाएं भी। कहीं ऐसा न हों, वह मंच पर हो और कोई चूक हो जाए। या कुछ भूल जाए।
तभी उसके कानों में आवाज़ पड़ी। नाम पुकारे जा रहे थे। मंच पर तीनों पुरस्कृत विद्यार्थी पहुँचे।वह ख्यालों में खोया-खोया, जैसे कोई सपना देख रहा हो। उसने सोचा था, पहले उससे अपनी कविता सुनाने को कहा जाएगा। पर होता हुआ तो कुछ और ही दिखा। वो नेहरू जी, जिनकी उस विशाल जन-सभा में बार-बार जय बोली जा रही थी, एकदम पास खड़े थे सामने-मानी उसका स्वागत करते से। चेहरे पर सौम्य मुस्कुराहट। वह लड़का उनके पैर छूने को झुका। नेहरू जी ने उसे रोक लिया, उसके कंधे पर हाथ रखते हुए। थोड़ा झुक कर उन्होंने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ा कर उससे हाथ मिलाया। पीठ थपथपाई। उस लड़के को फिर वही, चुनावी पोस्टर याद आया, 'नेहरू जी के हाथ मजबूत करने वाला'। उसकी निगाह गौर कर रही थी उनके हाथों पर। हाथ तो खुद ही उनके कितने मजबूत हैं, उसे ख्याल आया। उन्हीं हाथों से उसे प्रथम पुरस्कार स्वरूप तिरंगे रिबन से बँधा और हल्के लाल रंग के कागज से लिपटा एक पैकेट मिला। बताया गया-इसमें कुछ किताबें हैं और प्रमाण-पत्र भी। दूसरा और तीसरा स्थान पाने वालों को भी इसी तरह पुरस्कार दिये गए। फिर क्रमशः तीनों ने अपनी पुरस्कृत कविताओं का पाठ किया। हर कविता पर श्रोताओं की तालियों की गड़गड़ाहट ने आश्वस्त किया सबको। तालियों की अनुगूँज से उत्साहित वह लड़का, अन्य लड़कों के साथ मंच से नीचे आ कर अपने स्थान पर बैठ गया। शुक्ला जी और तिवारी जी की तरफ़ उसने देखा उनकी आंखों में भी चमक थी। और उसके प्रति उमड़ता स्नेह भी।
फूलबाग में उस दिन के वो दो-तीन घंटे सिर्फ जैसे एक क्षण की तरह बीत गए। और वो एक क्षण उस लड़के की चौदह बरस की उम्र के पन्नों पर अमिट अक्षरों में लिखा रह गया।
बाबू जी उसका इंतज़ार कर रहे थे। मिल गए। आँख से आँख मिली। उसे लगा, बाबू जी की आंखों में खुशी भी थोड़ी भीगी भीगी सी थी। एक हाथ से वे उसका हाथ पकड़े थे। दूसरे हाथ में रूमाल था, जिससे वे अपनी आंखें पोछ रहे थे।
घर आ कर पैकेट खोला गया। तीन किताबें थीं। अमृत लाल नागर की लिखी 'गदर के फूल'। गाँधी जी की लिखी 'हिंद स्वराज'। और तीसरी किताब एक चित्रावली थी, नेहरू जी की बचपन से ले कर बाद तक की तस्वीरों से सजी एक सुंदर अलबम जैसी।
बाबा को क्या दिखाता। उनकी तो आंखों की रोशनी ही जाती रही थी। लेकिन बाबा ने बड़ी उत्सुकता से पूछा, तो सब कुछ बता दिया। सुनते हुए बाबा ने भी एहसास कराया, मानों उनकी आंखों में रोशनी नहीं है तो क्या? देख तो फिर भी लिया है उन्होंने कुछ अपने पौत्र में। और फिर फौरन हुक्म दिया 'जा, तो इसी खुशी में चिलम भर ला!' शाबाशी देने का उनका यह भी एक तरीका था।
हाईस्कूल की यू. पी. बोर्ड की परीक्षा देने के बाद गर्मियों की छुट्टी में वह लड़का अपने सुशील दादा के साथ अपने बुआ-फूफा के यहाँ, बहराइच चला आया। इस बार बहराइच आने के पीछे प्रलोभन यह भी था कि सुशील दादा ने गाज़ी मियां के दरगाह पर लगने वाले सालाना मेला (उर्स) दिखाने का वादा किया था और बुद्ध से संबंधित श्रावस्ती में घुमाने का भी। वादा यथा समय पूरा भी किया गया।
बहराइच में चौक क्षेत्र के स्टीलगंज नाम के मोहल्ले में फूफा जी का घर था। बाज़ार के भीड़ वाले इलाके के बीच। घर के सामने एक कुआँ था। फूफा जी के यहाँ वाटर सप्लाई वाला सरकारी नल नहीं था। चापाकल था - हैंडपंप। घर के एक हिस्से में बाहर की तरफ, कुएँ के किनारे एक कोठरी थी। एक लड़की थी, जो उस कोठरी से बाल्टी ले कर फूफा जी के घर के भीतरी आँगन में लगे चापाकल से पानी भर कर ले जाने के लिए आती। वह लड़का अगर वहाँ होता तो चापाकल चलाने में उसको मदद कर देता। मालूम हुआ कि वह पास के किसी गाँव से अपनी माँ के साथ आई थी। माँ की पेंशन के सिलसिले में। इस उम्मीद से कि फूफा जी क्षेत्र के विधायक हैं, तो उनकी सहायता मिल जाएगी। उसके बारे में ज़्यादा जानने की रूचि उस लड़के में बढ़ती गई। पता चला कि उस लड़की ने भी हाईस्कूल की परीक्षा दी है। शहर में मां-बेटी इसलिए भी रूक गई हैं कि इम्तहान का नतीजा आने वाला है। गाँव में अखबार मिलता नहीं है। शहर में, रिज़ल्ट आते ही फौरन आधी रात को भी अखबार वाले मोहल्ले-मोहल्ले आवाज़ लगाते दौड़ पड़ते हैं। सोते हुए घरों में भी लड़के-लड़कियाँ अपने इम्तिहान का नतीजा देखने के लिए रतजगा करते हुए बेसब्री से इंतज़ार करते। अखबार वालों की आवाज़ कहीं दूर से भी आती सुनाई पड़ जाती तो इम्तिहान देने वाले विद्यार्थियों के दिल की धड़कनें बढ़ जातीं।
उस वर्ष रात में नहीं, बल्कि दिन में परीक्षा-परिणाम वाले अखबार का बंडल लिए साइकिलों पर अखबार बेचने वाले निकल पड़े। कान में आवाज़ पड़ी तो उतावली से वह लड़का बाहर निकला। आशंका से घिरा, रिज़ल्ट पता नहीं क्या हो? तभी सुशील दादा अखबार लिये घर में दाखिल हुए। अखबार के पन्नों पर नज़र दौड़ाते हुए। उन्होंने उससे पूछा 'रोल नंबर क्या है तुम्हारा?' जवाब में उसकी जुबान लड़खड़ा गई। फिर संभला और नंबर बता दिया।
सुशील दादा ने सबसे पहले सेकेंड डिवीज़न वाली लिस्ट देखी। कहीं वो रोल नंबर नहीं दिखा। फिर थर्ड डिवीज़न वाली लिस्ट पर नज़र दौड़ाई। उसमें भी गोल।
लड़के का मन किया, अखबार खुद अपने हाथों में ले कर देखें। पर हिम्मत नहीं पड़ी। बाबू जी याद आ गए। जो कहते थे यह न बोर्ड का इम्तहान है। पहले की तरह का नहीं। तब तक वह लड़की आ गई, बाहर की कोठरी वाली। पीछे-पीछे उसकी माँ भी। जाहिर है, रिजल्ट देखने के लिए। सुशील दादा ने उससे भी रोल नंबर पूछा। लड़की ने जो रोल नंबर बताया, उसे भी सुशील दादा ने पहले थर्ड डिवीजन वाली लिस्ट में देखा। ऊपर से नीचे तक देख डाला, नहीं दिखा। लड़की ने थोड़े उत्साह से कहा- 'मेरे पर्चे तो बहुत अच्छे हुए थे।' और उसने अखबार अपने हाथ में ले लिया। फर्स्ट डिवीजन वाली लिस्ट अपेक्षाकृत छोटी थी। पहले वही देखी। नहीं दिखा उसे अपना रोल नंबर। सेकेंड डिवीज़न वाली लिस्ट देखी, उसमें दिख गया उसे अपना नंबर खुशी से उसकी आंखें चमक उठीं। उस लड़के ने उसका चेहरा देखा। उसकी बड़ी-बड़ी चमकदार आँखें, उसके साँवले चेहरे पर कुछ और बड़ी होती दिखीं।
उस लड़के को अपनी ओर देखते हुए वह लड़की पहले की तरह शरमाई नहीं। उसने पूछा- 'भइया, आपने अपना नंबर ठीक से देखा? फिर से देख लीजिए!' इतना कह कर, वह अपने हाथ में अखबार लिए-लिए ही पूछ बैठी 'अच्छा बताइए अपना नंबर।' लड़के को थोड़ी झेंप-सी हुई। फिर भी नंबर उसने बता दिया। लड़की ने वह रोल नंबर भी पहले फर्स्ट डिवीजन वाली लिस्ट में ही खोजने की कोशिश की। उछल पड़ी 'है तो आपका नंबर! देखिए, देखिए।' अखबार में उसी नंबर पर उंगुली रखे रखे उसने अखबार के उस पन्ने को लड़के की तरफ बढ़ाया। वह सचमुच पास था -फर्स्ट डिवीज़न। दोनों उस पन्ने पर एक साथ झुके थे। खुशी में लड़के का हाथ लड़की के कंधे पर था। अब लड़की थोड़ी शरमाती-सी दिखी। लड़के ने फौरन अपना हाथ हटा लिया।
सुशील दादा पास खड़े थे। 'अरे, यह तो चमत्कार गया। मुझे तो सपने में भी उम्मीद नहीं थी, तुम फर्स्ट डिवीज़न में पास हो सकते हो। 'फिर हँसे 'वाह स्वामी जी!' जय हो।
लड़के के मन में खुशी थी। पर, खुशी के साथ एक टीस-सा भी था कुछ। कितने आत्मविश्वास में उस लड़की ने अपना रोल नंबर पहले फर्स्ट डिवीजन वाली लिस्ट में देखा था, जो उसे वहाँ नहीं मिला। और वह खुद, जिसे फेल मान लिया गया था, उसका नंबर उस लड़की को उसी लिस्ट में दिख गया। कितने उछाह से, उसने अखबार का वह पन्ना उसे दिखाया था!
वह लड़का जब तक वहाँ रहा, उस लड़की से किसी न किसी बहाने बात किए बिना उसका मन नहीं मानता। लड़की को भी अच्छा ही लगता होगा, वह सोचता और एक तरह की उदासी उसे घेर लेती।
छुट्टियाँ ख़त्म होने को आई। वह लड़की, अपनी माँ के साथ वापस लौटने से पहले, आखिरी बार जब उससे मिली तो उसकी आखें झुकी हुई थीं। लड़के की भी। जैसे जमीन पर कुछ गिर पड़ा हो। फिर दोनों ने उदास मुस्कुराहट से छलकती हुई सी आंखों से एक-दूसरे को देखा। और वह चली गई। किसी ने किसी को एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा। वह लड़का बाकी जितने दिन बहराइच में रहा, अपनी उदासी को छिपाने की कोशिश करते हुए रहा।
कानपुर लौटा। साथ में अपनी यादों में उस लड़की को लिए हुए। याद आता रहा उसे यह भी, कि कभी उसके मन में चाव जागा था एक उपन्यास लिखने का 'एक और देवदास'। जो वह कभी लिख नहीं सका। अकेले में वह जोर से हँसता। किस बात पर हँसता, उसे खुद पता नहीं होता। शायद उपन्यास-जैसा कुछ लिखने की निरर्थक सी बात पर।
कानपुर लौटा तो उसे अपने बाबू जी थोड़ा खुश दिखे। हाईस्कूल में फर्स्ट डिवीज़न जो आई थी उसकी। बाबू जी के लिए भी शायद यह अप्रत्याशित सफलता थी।
और, एक बात जो उस लड़के के लिए एकदम अप्रत्याशित तो नहीं थी, पर हाँ वह भूल जरूर गया था कि दो-तीन महीने पहले उसने अपनी कुछ कविताएँ पत्रिकाओं में भेजी थी। बाबू जी ने एक पत्रिका भी उसे थमा दी- डाक से आई होगी। कलकत्ता से, 'आदर्श'। यही नाम था उस पत्रिका का। उसमें अपने नाम से दो-तीन कविताएँ एक साथ छपी देख कर वह इतना खुश हुआ कि खुद के बारे में कुछ सोचना भूल कर बाबू जी के बारे में सोचने लगा- बाबू जी ने भी पत्रिका उलटी-पुलटी तो होगी ही। उसकी कविताएँ पढ़कर उन्हें कैसा लगा होगा ... कुछ तो खुशी हुई ही होगी उन्हें भी ... शायद उनमें किसी और को भी पत्रिका का वह पन्ना दिखाने का उत्साह जागा हो। बहरहाल, यह पहला मौका था, जब उसकी कविता 'संपादक के अभिवादन और खेद के साथ' डाक से वापस नहीं आई थी। छप कर आई थी।
वह लड़का। उसे खोए हुए ज़माना हो गया। अब वह खोजे नहीं मिलेगा। पर उसे अब खोजने का अर्थ भी क्या? वह मेरा इतना 'अन्य' भी तो नहीं था। कि बाहर कहीं खोजें। वह मेरा अनन्य, मेरा 'आत्म'।





टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें