अनीता राकेश से प्रज्ञा की बातचीत
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| अनीता राकेश से बात करती हुईं प्रज्ञा |
कोई भी लेखन दरअसल रचनाकार के अनुभवों से ही निःसृत होता है। इस लेखन में अनुभव के साथ साथ सूक्ष्म दृष्टि भी समाहित होती है। उस लेखन को पढ़ते हुए पाठक जब खुद को उसमें शामिल पाता है तब वह रचना अपनी सार्थकता को प्राप्त करती है। हिंदी के चर्चित नाटककार, कहानीकार मोहन राकेश ऐसे ही कहानीकार थे जिनकी रचनाएं आज भी पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। मोहन राकेश का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर पत्र पत्रिकाएं विशेषांक निकाल रही हैं। कथादेश का मोहन राकेश पर केन्द्रित अंक हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस अंक में एक महत्त्वपूर्ण बातचीत छपी है। कथाकार प्रज्ञा ने मोहन राकेश की पत्नी अनीता राकेश से बातचीत की हैं जिससे उनके जीवन के कई पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है। बकौल प्रज्ञा "अनीता राकेश जी से मेरी यह बातचीत जो आपके समक्ष प्रस्तुत है वह लंबी बातचीत के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ कर तैयार की गई है या ये कहूं कि मैंने बिखरे हिस्सों को एक मुकम्मल शक्ल देने की कोशिश की है। इसके पीछे दो कारण प्रमुख रहे। पहला, ये कि इस बातचीत में अनीता जी द्वारा बताए निजी संदर्भ अपेक्षाकृत अधिक रहे। दूसरा, पूरी बातचीत स्मृतियों पर आधारित रही। स्मृतियां जिनका सहज प्रवाह अक्सर क्रम और व्यवस्थित होने की अनदेखी भी करता चलता है। सबसे जरूरी बात ये है कि अनीता जी ने इस बातचीत के लिए तैयार हुईं। बातचीत के कई हिस्से ऐसे थे जहां स्मृतियों की रील से गुजरते हुए वे भावुक भी हुईं। उनके पुत्र संकल्प सूद ने ये मुलाकात संभव करवाई। सक्रिय साहित्यिक व्यक्तित्व न होते हुए भी अनीता जी ने अपनी स्मृतियों के आधार पर इस बातचीत मे पूछे गए सवालों के जवाब दिए हैं।" आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अनीता राकेश से प्रज्ञा की बातचीत।
अनीता राकेश से प्रज्ञा की बातचीत
जिंदगी, तेरी-मेरी कहानी
प्रज्ञा : नमस्कार, अनीता जी। आज जो बातचीत आपके साथ होगी वह नाटककार और व्यक्ति मोहन राकेश जी के जीवन पर आधारित रहेगी। मोहन राकेश हिंदी के चर्चित नाटककार, कहानीकार रहे और यदि आपके विषय में बात करें तो आपकी संस्मरणात्मक पुस्तक ‘चंद सतरें और’ एक चर्चित किताब रही। आपका कहन और उन्मुक्त अभिव्यक्ति अनूठी है। अनीता जी मोहन राकेश के नाटकों से बात शुरू करते हैं। उनके प्रमुख तीन नाटकों- ‘आधे-अधूरे’, ‘लहरों के राजहंस’ और ‘आषाढ़ का एक दिन’ में से आपका पसंदीदा नाटक कौन-सा है?
अनीता राकेश : प्रज्ञा जी, मोहन राकेश के नाटकों को देखें तो मेरा प्रिय नाटक ‘आधे-अधूरे’ ही है। यूं ‘आषाढ़ का एक दिन’ और ‘लहरों के राजहंस’ भी महत्वपूर्ण हैं पर मेरे करीब ‘आधे-अधूरे’ अधिक है। क्या आपने ये सभी नाटक देखें हैं?
प्रज्ञा : बिल्कुल, अनीता जी। अपने छात्र जीवन से ले कर बाद में भी। मुझे अच्छी तरह याद है 1992 का साल था जब 'मोहन राकेश नाट्योत्सव' दिल्ली में हुआ था। तब ये तीनों नाटक मंचित हुए थे। अपार भीड़ उमड़ी थी नाटकों को देखने। राम गोपाल बजाज के निर्देशन में ‘आषाढ़ का एक दिन’, कीर्ति जैन के निर्देशन में ‘लहरों के राजहंस’ और त्रिपुरारि शर्मा के निर्देशन में ‘आधे-अधूरे’ का मंचन हुआ था। वैसे दूरदर्शन पर बहुत पहले रंजीत कपूर के निर्देशन में मध्य वर्ग के स्वप्नों और उनके आड़े आती समस्याओं पर आधारित ‘बहुत बड़ा सवाल’ लघु नाटक भी देखा था। अनीता जी आपने ‘आधे-अधूरे’ नाटक को अनेक निर्देशकों ने निर्देशित किया। आपको इस नाटक की कौन-सी प्रस्तुति सबसे बेहतरीन थी।
अनीता राकेश : मेरी बात है तो मुझे ओमशिव पुरी के निर्देशन वाला मंचन ही अब तक का बेहतरीन मंचन लगा।
प्रज्ञा : आप दिशांतर की प्रस्तुति की बात कर रही हैं जो सन् 1969 में हुई। जिसका निर्देशन भी ओमशिव पुरी ने किया था और पुरूष एक, दो, तीन, चार की भूमिका भी उन्होंने ही निभाई थी। वैसे तो इब्राहिम अल्का ज़ी ने भी इस नाटक को निर्देशित किया था। श्यामानंद जालान, राजेंद्र नाथ, सतीश आनंद और बाद में त्रिपुरारि शर्मा आदि कई निर्देशकों ने भी इसे किया। अनेक भाषाओं में इसके अनुवाद भी खेले-सराहे गए।
अनीता राकेश : पर मुझे तो केवल ओम शिव पुरी द्वारा निर्देशित मंचन ही सबसे अच्छा लगा। मैंने शिव को बताया था कि ‘आधे-अधूरे’ मेरी ही परिवार की कहानी है। ओम शिव पुरी मुझे ‘भाभी’ कहा करते थे। जब मैंने नाटक से जुड़ा यह सच उन्हें बताया तब उनका कहना था- ‘तो हम नाटक में ओरिजनल कास्ट ही क्यूं नहीं ले लेेते?’ देखिए मुझे उनका यह सवाल बहुत ही भद्दा लगा था। दूसरी तरफ जब मैंने लिलिट दुबे को ये बात बताई कि ‘आधे-अधूरे’ मेरी ही कहानी है तो ये सुन कर वे बेहद भावुक हो गयीं। एक ही बात पर दोनों की प्रतिक्रिया को देखिए आप। लिलिट ने भी एक अन्य निर्देशन में सावित्री की भूमिका निभाई थी। नाटक की समाप्ति पर मैं मंच पर गई और लिलिट से कहा था- यह मेरी मां कितनी खूबसूरत हैं। मेरी बात सुन कर वह बेहद भावुक हुई थीं। उन्होंने ‘आधे-अधूरे’ के काफी शोज़ किए।
प्रज्ञा : लिलिट दुबे के साथ मोहन आगाशे ने पुरूष एक, दो, तीन, चार की भूमिका निभाई थी। तो आपको ‘आधे-अधूरे’ ही सर्वाधिक प्रिय रहा। जाहिर है एक मध्यवर्गीय परिवार के आधे-अधूरेपन को इस नाटक ने बड़ी ही विश्वसनीयता के साथ चित्रित किया। नाट्य जगत में इसका भरपूर स्वागत हुआ और सर्वाधिक मंचन भी हुए।
अनीता राकेश : आई लव ‘आधे-अधूरे’, मेरी अपनी कहानी। मैं तो अपने घर से भाग गई थी... वैसे आपने मेरी किताब पढ़ी है?
प्रज्ञा : बिल्कुल। ‘चंद सतरें और’ एम. ए. के दिनों में तो पढ़ी ही थी आज आपसे बातचीत की तैयारी के लिए फिर से उसे पढ़ा।
अनीता राकेश : दरअसल मेरी मां राकेश जी से बहुत गहरे तौर पर जुड़ी हुई थीं। राकेश जी के प्रति उनका झुकाव था। वे उन्हें बहुत पसन्द करती थीं। वे राकेश जी को पत्र लिखा करती थीं और पत्र के अंत में मेरा नाम लिख दिया करती थीं। यानी पत्र मेरे नाम से हुआ करते थे। वे कभी नहीं चाहती थीं कि मैं राकेश जी से विवाह करूं। मुझसे अक्सर कहा करती थीं कि उनकी दो-दो शादियां हैं और फिर तलाक भी नहीं हुआ तो ऐसे में तुम कैसे उनसे शादी कर सकती हो? वे कभी नहीं चाहती थीं कि मेरी शादी उनसे हो इसलिए हम दोनों को भागना पड़ा लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। शादी की बात सुन कर मेरी मां बेहद गुस्से में आ गईं। मामा ने पुलिस बुला ली। तब कमलेश्वर जी हम दोनों को ले कर बंबई चले गए। वे 'नई कहानी' पत्रिका के संपादक थे। मां नई पत्रिका के दफ्तर पहुंच गईं। कमलेश्वर जी ने बात को बेहद संजीदगी से संभाला। उन्होंने कहा, जो बाद में हमें बताया भी कि ‘आप चाय पीजिए, वे लोग भी चाय पी रहे होेंगे। दोनों बेहद खुश हैं।’ पर मां गुस्से में थीं। कमलेश्वर जी ने साफ कहा- ‘आप किसलिए पुलिस बुलाएंगी? आपकी बेटी बालिग है। वो अपने जीवन के फैसले खुद ले सकती है।’
प्रज्ञा : आपकी मां विदुषी थीं। आपने स्वयं अपनी किताब में लिखा है कि वे दिन में बेहद पढ़ती थीं और रात में जब तक पढ़ी हुई किताबों पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देती थीं, अपने विचार नहीं रख लेती थीं उन्हें नींद नहीं आती थी। उन्होंने घर भर में पढ़ने-लिखने का माहौल बनाया। आपके भीतर भी साहित्यिक रूचि उनके कारण ही जागी।
अनीता राकेश : ये सच है। मां बहुत पढ़ती थीं। घर का काम भी करती थीं। आज मैं दिल से महसूस करती हूं कि मेरे पिता कुछ नहीं करते थे। उस समय डालडा वनस्पति घी चलता था। उसके सैम्पल वो घर-घर बेचने जाते थे। उसके बारे में लोगों को बताते थे पर आधे से ज्यादा सैम्पल हमारे घर ही आ जाते थे। उसीे से घर का खाना बनता था। पिता जो भी काम करते थे उसमें उन्हें घाटा ही होता। उन्हें बिजनेस करना नहीं आता था। आर्थिक अभाव के चलते घर की चीजें धीरे-धीरे नीलाम होती रहीं। तब हम पुरानी दिल्ली में रहते थे। मेरी मां बहुत बहुत कर्मठ महिला थीं। घर और बाहर के दायित्वों को संभालती और गंभीरतापूर्वक पढ़ती थीं। उन्हें लिखने का भी शौक था पर उनके सपने कभी पूरे नहीं हो सके। इस तरह ‘आधे-अधूरे’ की पूरी कहानी हमारे परिवार की कहानी है। एक बात और कि राकेश जी की मुझसे तीसरी शादी थी पर वे कभी नहीं चाहते थे कि पत्नियां उन्हें छोड़ती रहें। वे घर चाहते थे। अक्सर कहते भी थे मैं घर की तलाश में बहुत थक चुका हूं। वे बच्चे चाहते थे। मोहन राकेश अकेले नहीं रह सकते थे। उन्होंने घर के लिए बहुत प्रयास किए।
प्रज्ञा : उनके तीनों ही नाटक घर की तलाश कहे जाते हैं। यहां तक कि आपकी किताब ‘चंद सतरें और’ को भी देखें तो इसकी भूमिका लिखने वाले इंद्रनाथ मदान ने भी घर की बात राकेश जी के नाटकों के संदर्भ में सामने रखी। अनीता जी ये वर्ष मोहन राकेश जी का जन्म शताब्दी वर्ष है और हाल ही में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में ग्रीष्मकालीन नाट्य समारोह में मंचित हुए नाटकों में ‘आधे-अधूरे’ भी रहा है। जिसमें प्रतिमा कन्नन और रवि खानविलकर ने प्रमुख भूमिकाएं निभाईं। मुझे याद है त्रिपुरारि शर्मा जी के निर्देशन में चर्चित और प्रशंसित हुए इस मंचन में इन्हीं अभिनेताओं ने ये भूमिकाएं निभाई थीं। क्या आपने ये मंचन देखा? और कैसा लगा आपको? हिंदी अकादमी, दिल्ली ने भी इस वर्ष ‘आषाढ़ का एक दिन’ मंचित किया।
अनिता राकेश : हां, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय मैं संकल्प (दूसरे बेटे) के साथ गई थी। नाटक मुझे जंचा नहीं।
प्रज्ञा : मोहन राकेश ने कथा साहित्य भी रचा। अनेक कहानियां और उपन्यास। आपको उनकी कौन-सी कहानी सबसे अधिक प्रिय है?
अनीता राकेश : मुझे ‘एक और जिदगी’ बहुत पसंद है क्योंकि उसमें उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की कहानी लिखी है। यह कहानी मुझे बहुत पसंद है।
प्रज्ञा: और ‘मिस पाल’? कुछ वर्ष पहले दिल्ली के श्रीराम सेंटर में उसका एक सफल मंचन भी हुआ था। कहानी के रंगमंच के अंतर्गत जिसका निर्देशन देवेंद्र राज अंकुर ने किया था। उसमें टीकम जोशी और हेमा बिष्ट ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। हालांकि अंकुर जी के निर्देशन में इस कहानी का पहला मंचन 1992 में हुआ था। बाद में कई और भी हुए।
अनीता राकेश : हां, वह भी सच्ची कहानी है। उन्होंने वास्तव में लोगों के जीवन को करीब से देखा। उसे ही लिखा।
प्रज्ञा : अनीता जी, आपने अंपनी किताब में लेखकों के विषय में लिखा है कि लेखक बड़े अजीब इंसान होते हैं। दुनिया में रहते हुए भी दुनिया से परे होते हैं। आप अपने किसी अनुभव से इस बात की तसदीक करना चाहेंगी?
अनीता राकेश : बड़ा ही मज़ेदार किस्सा है। मैंने एक बार धर्मवीर भारती से कहा ये लेखक जाने अपने आपको क्या समझते हैं। अलग ही दुनिया में रहते हैं। भारती जी ने मुझसे कहा, ये तुम कह रही हो? तुम्हारा तो अपना पति एक लेखक है फिर तुम भी तो लिखती हो। वे मुझसे नाराज़ हो गए। मुझे याद है उन्होंने मुझे धर्मयुग में छापा था। मुंबई की जिंदगी बहुत अच्छी थी। वहां कई लोग थे। बासु भट्टाचार्य थे। रिंकी थीं... और भी बहुत लोग आते थे... अब तो कोई नहीं रहा। मैं पिछली बार मुंबई गई थी। वहां इंडस कोर्ट जहां मैं इनके साथ रहती थी सब टूट गया। मैं चाहती थी जहां मैंने अपना समय बिताया उस फ्लैट को देखूं। अब वहां बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हैं। मुम्बई में हम जुहू जाते थे। खूब घूमते थे। राकेश जी की अच्छी-खासी मित्र मंडली थी। लेकिन जब घूम कर घर लौटते तो मुझे लगता था ये मेरा घर नहीं है। मैंने राकेश जी से कहा था हम वापिस दिल्ली चलते हैं। वहां हम कमलेश्वर जी के साथ रहे। भाभी के साथ। बहुत अच्छे दिन थे।
मुम्बई में गुलज़ार साहब के साथ मेरा बहुत अच्छा रिश्ता था। मैं मुंबई में उनसे मिली। मैंने गुलज़ार साहब से कहा- ‘आप राकेश जी पर कोई फिल्म बनाइये।’ उनका जवाब था कि अनीता जी, मैं भी राकेश जी पर फिल्म बनाने का इच्छुक हूं लेकिन संजीव कुमार के नहीं रहने से मेरी योजना पूरी नहीं हुई। संजीव कुमार की शक्ल मोहन राकेश से मिलती थी। प्रज्ञा जी, संजीव कुमार बहुत अच्छे अभिनेता रहे। देखिए वे राजेश खन्ना या अमिताभ बच्चन जैसे लोकप्रिय तो नहीं थे पर थे सच्चे कलाकार। कोई रोल दे दीजिए- कितनी संजीदगी से निभाया करते थे, उफ... खैर।
एक बात और ऐसा नहीं है कि ‘आधे-अधूरे’ पर फिल्म बनाने की बात सरसरी तौर पर ही हुई हो। फिल्म की योजना थी पर बीच में। फाइनेंसर ने पैसा देना बंद कर दिया। उसके बाद संजीव जी के न रहने से गुलजार साहब भी काफी दुखी हुए।
प्रज्ञा : संजीव कुमार वाकई ऊंचे कद के अभिनेता थे। उनकी इप्टा मुम्बई की ट्रेनिंग रही। बलराज साहनी जैसे कुशल अभिनेता और योग्य निर्देशक के साथ इप्टा में एकदम युवा संजीव कुमार के कई किस्से हैं। अनीता जी, आपको फिल्म देखने का शौक है। अभी मेरे आने से पहलेेेेेेेे टी.वी. पर आप कोई पुरानी फिल्म देख रही थीं।
अनीता राकेश : मुझे संजीव कुमार की फिल्में पसंद हैं। ‘आंधी’ फिल्म देखिए, क्या अभिनय है उनका। यादगार। अब भी पुरानी फिल्में देखती हूं। गुलज़ार भाईसाहब की फिल्में पसंद हैं।
प्रज्ञा : अनीता जी जिस दौर में आप दोनों साथ थे और दोनों ही लिख भी रहे थे। ऐसे में घर का माहौल कैसा रहता था? आप लोग अपनी रचना-प्रक्रिया के दौरान एक-दूसरे से बातचीत किया करते थे?
अनीता राकेश : जब राकेश लिखते थे तो हम इंतज़ार करते थे कि उनके कमरे का दरवाज़ा कब खुलेगा। मेरी बहन आती थी और हम दोनों दरवाजा खुलने के इंतजार में बैठे रहते थे। मैंने तो ‘चंद सतरें और’ लिखी। ज्यादा नहीं लिखा। कुछ कहानियां लिखीं जो ‘गुरूकुल’ में संकलित हैं।
प्रज्ञा : इनके बाद आपका मन नहीं हुआ कभी कुछ और लिखने का?
अनीता राकेश : देखिए जो लिखना-कहना था मैंने किताबों के जरिए कह-लिख दिया। कभी कहानियां भी लिखी थीं। मुझसे प्रकाशकों ने कहा भी कि कुछ लिखिए हमारे लिए। इस पर मैंने कहा जो जीवन-सत्य था लिख दिया। मनगढ़ंत कुछ नहीं लिख सकूंगी। जो लिखा जीवन की वास्तविकताओं पर आधारित लिखा।
प्रज्ञा : आपकी किताब ‘चंद सतरें और’ में आपने लिखा है कि राकेश जी में एक ‘सेल्फ रिजेक्शन’ की भावना थी। इससे संबंधित किसी घटना का हवाला आप दे सकती हैं?
अनीता राकेश : ‘सेल्फ रिजेक्शन’ की भावना थी...। पर एक बात यह भी कि यदि कोई बात उन्हें पंसद नहीं आती थी तो वे तुरंत ‘ना’ कह देते थे।
प्रज्ञा : अच्छा एक और पहलू है कि कई लेखक जब लिखते हैं तो अपने परिवार के सदस्यों से अपने प्लॉट साझा करते हैं। रचना पूरी हो जाने के बाद कभी-कभार परिवार के बीच उसे सुनाया भी करते हैं। अनेक लेखकों की रचनाओं के पहले पाठक और आलोचक उनके जीवनसाथी हुआ करते हैं। तो क्या मोहन राकेश जी के साथ आपका ऐसा कोई अनुभव भी रहा था?
अनीता राकेश : नहीं, राकेश जी ऐसा नहीं करते थे। हां, एक बात जो मुझे याद है कि जब मैंने लिखना शुरू किया और कुछ कहानियां भी लिखीं जो बाद में प्रकाशित भी हो गईं। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा- "यदि तुम्हारी कोई कहानी ‘कल्पना’ पत्रिका में छपेगी तब मैं मान लूंगा कि तुम लेखिका हो।"
प्रज्ञा: बद्रीविशाल पित्ती जी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘कल्पना’...।
अनीता राकेश : बिल्कुल और देखिए पित्ती जी ने मेरी कहानी छापी। मैंने तो कहा भी मुझे तो कमलेश्वर जी ने भी अपनी पत्रिका में छापा है तो राकेश जी कहते थे कि वो तो तुम्हारा दोस्त होने के नाते छाप रहा है पर पित्ती तुम्हारा दोस्त नहीं है। अगर ‘कल्पना’ में छप गईं तब मैं मान लूंगा कि तुम लेखिका हो। वे मुझे लेखिका कहां मानते थे। ‘कल्पना’ में छपने के बाद माना। उन्हें तो मेरा गीत गाना बहुत पंसद था। वे अक्सर मुझसे गाना गाने की फरमाईश किया करते थे। मैं बहुत गाने गाया करती थी। उन्हें गाने सुनने का बेहद शौक था। गज़ल-गीत सभी कुछ।
प्रज्ञा : अनीता जी, नई कहानी आंदोलन के अगुआ नेता रहे मोहन राकेश, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर। उस दौर में इनका लगातार घर में आना-जाना लगा रहता होगा। बहस-मुबाहिसे चलते होंगे। आप उनकी साक्षी रही होंगी।
अनीता राकेश : उस दौरान कई लोग आते थे। एक अलग दौर था। यारी-दोस्तियों का दौर। दोस्तियां परिवारों से हुआ करती थीं। राजेंद्र जी से अधिक मन्नू जी के मैं निकट रही। एक मज़ेदार किस्सा है, मन्नू जी दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में पढ़ाया करती थीं। तब उन्होंने कॉलेज के पास ही कहीं घर ले लिया था कि सुबह-सुबह कहीं दूर से कॉलेज पहुंचना उनके लिए मुश्किल था। तो हुआ ये कि पास में रहने से कॉलेज के लिए कोई ऑटो नहीं मिलता था। उन्होंने कहा ये तो और अधिक मुसीबत हो गई। मैं सोच कर नजदीक आई कि अब दूरी के कारण दिक्कत नहीं होगी और ऑटोवाला कहता है हम इतनी कम दूरी पर नहीं जाएंगे। राकेश जी ने मन्नू जी की बात काट कर कहा-फिर क्या किया मन्नू तुमने? वे हंसते हुए बोलीं- करना क्या था मैंने गाड़ी चलानी सीख ली। राकेश जी दिल खोल कर हंसते हुए बोले- मन्नू तू तो सेठानी हो गई है। गाड़ी भी चला लेती है। इस पर वे बोलीं क्या करूं राकेश जी मजबूरी है। तब कई बार राकेश जी, मन्नू जी को मजाक में ‘सेठानी’ कहा करते थे।
प्रज्ञा : उन दिनों मन्नू जी का लेखन बहुत चर्चित था। उनकी कहानियों-उपन्यासों की बहुत धूम थी। आपने उनकी रचनाएं पढ़ीं?
अनीता राकेश : मैंने उनका सारा साहित्य पढ़ा है। मुझे उनका उपन्यास ‘एक इंच मुस्कान’ बहुत अच्छा लगता था। मैंने कहा भी था उनसे कि वे मुझे अपना उपन्यास दे दें पर उनका कहना यही था कि मेरे पास अब उसकी कोई प्रति नहीं है।
प्रज्ञा : उनका ‘आपका बंटी’ उपन्यास बेहद चर्चित हुआ था और हाल ही में प्रियदर्शन जी ने ‘बेटियां मन्नू की’ नाटक लिख कर उनकी रचनाओं और उनसे उपजे सवाल अपने नाटक में उकेरे हैं। वैसे ‘एक इंच मुस्कान’ उपन्यास तो राजेंद्र जी और मन्नू जी का संयुक्त प्रयास था। धर्मयुग में सीरीज़ में प्रकाशन के दौरान मन्नू जी वाले अंश पर संपादक के नाम अनेक पत्र आते थे। राजेंद्र जी वाले अंश पर अपेक्षाकृत कम।
अनीता राकेश : ‘एक इंच मुस्कान’ लिखने के दौरान ही उनकी बेटी का जन्म हुआ था। इसीलिए उसका नाम रचना रखा गया था। ये मुझे याद है। राजेंद्र जी की मित्र मंडली लंबी-चौड़ी थी। अपने मित्रों के पत्र वे दराज़ में चाबी लगा कर रखते थे। मन्नू जी जानती थीं पर उन्हें इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मैं मन्नू जी के अधिक निकट रही। शी वॉज़ सो फ्रेंक। मैंने ऐसी महिला नहीं देखी। अपने काले रंग का भी खुद ही उपहास उड़ातीं कि मैं इतनी काली हूं जैसे कोई सड़ी हुई खुरचन होती है। उन्होंने शायद किसी कॉलम में इस बात को लिखा भी था। रंग को ले कर वे अपना उपहास खुद ही उड़ाया करती थीं। ग्रेट थीं।
उस दौर में भीष्म साहनी के साथ भी हमारा नाता रहा। भीष्म जी और उनकी पत्नी का बहुत आत्मीय, बहुत गहरा नाता था। शीला अपने पति को ‘भीषम’ पुकारती थीं और मैं राकेश जी को ‘राजे या राजा’ कहती थी। भीष्म जी और उनकी पत्नी दोनों में बहुत प्रेम था। भीष्म जी बहुत सुन्दर व्यक्ति थे। उनकी पत्नी जो असमय उन्हें छोड़ कर चली गईं, जब जीवित थीं तो उनसे कहा करती थीं कि तुम इतनी किताबें लिखते हो कभी मुझे भी एक खत लिखो। इस पर भीष्म जी ने बहुत बढ़िया जवाब उन्हें दिया- ‘तेरे को मैं चिट्ठी क्या लिखूं। तू मुझे देख कर बेहोश हो जाती है। गलती से चिट्ठी लिख देता तो तू मर ही जाती।’ दोनों दिल्ली में न्यू राजेंद्र नगर में हमारे घर के पास ही रहा करते थे। उनका खूब आना-जाना रहता था। उनकी पत्नी पंजाबी में खबरें पढ़ा करती थीं आकाशवाणी के लिए। मुझे भीष्म जी के विषय में एक बात याद आती है। जब वे मास्को गए थे तो कहीं किसी जगह किसी लेखक के कमरे को उन्होंने देखा जो पूरी तरह किताबों से भरा था। उन्होंने कहा अनीता मैं तो हैरान रह गया किताबें देख कर। मैंने तो अभी क्या लिखा है मात्र कुछ किताबें। बस।
आप भीष्म जी का ‘तमस’ देखिए फिर उन्हें तो अभिनय का भी शौक रहा। कुछ फिल्में भी कीं। बहुत बड़े इंसान और बड़े लेखक थे भीष्म साहनी।
प्रज्ञा : जिस तरह भीष्म जी और उनकी पत्नी में प्रेम था क्या आप दोनों के बीच भी वैसा ही प्रेम रहा?
अनीता राकेश : हमारी शादी कुल नौ साल की रही और उसमें भी चार साल तो वे कल्चरल एक्सचेंस में बाहर ही जाते रहे। तो चार साल वे बाहर घूमते रहे। इन नौ सालों में मेरे साथ केवल पांच बरस ही रहे। मैं इस बात का बहुत बोझ नहीं लेती थी। उनकी गैरहाजिरी में अपनी बहन को बुला लिया करती थी। पर मेरा बहुत बड़ा बल रहीं अम्मा-राकेश जी की माता जी। जिनका नाम बचन था। वे मेरी सबसे बड़ी ताकत रहीं। वे कुछ अलग तरह की सास रहीं। मैंने उनके जैसी सास नहीं देखी।
प्रज्ञा : जिस तरह आपकी मां को पढ़ने का शौक था। वे साहित्यिक अभिरूचि की थीं, क्या अम्मा भी साहित्यिक अभिरूचि की थीं?
अनीता राकेश : हां, थोड़ा-बहुत पढ़ लेती थीं। उनके पास अपना एक अलग कमरा था। वहां पढ़ती थीं। ये न्यू राजेंद्र नगर की बात है। अम्मा हमारे साथ ही रहती थीं। अम्मा को राकेश जी ने इलाहाबाद में एक कमरा दिलवाया हुआ था। फिर जब हमने शादी कर ली तो मेरा आग्रह रहा कि अम्मा हमारे साथ ही रहेंगी। मैंने साफ कहा कि राजा तुमने उनको वहां अकेला क्यों रखा हुआ है। मैं अम्मा को अपने साथ ले कर आईं। मैं इलाहाबाद में दो दिन रही और उनके सामान आदि की पैकिंग की। वे बड़े चाव से अड़ोस-पड़ोस में बताती रहीं- देखो! मेरी बहू आई है मुझे लेने। उस समय वे बेहद खुश थीं। वे हमारे साथ न्यू राजेंद्र नगर में आईं। साथ रहीं। उनकी मृत्यु भी उसी घर में हुई।
प्रज्ञा: राकेश जी का अपनी मां के साथ कैसा रिश्ता था?
अनीता राकेश : प्रज्ञा जी, ऐसा रिश्ता जो किसी ने न देखा न सुना। उन्होंने खुद मुझसे कहा था कि वे अपनी मां के बेटे हैं। मां से बेइंतहा प्यार करते थे। मैंने अपनी जिंदगी में कोई पहला ही आदमी ऐसा देखा होगा जिसने अपनी मां को इतना प्यार दिया हो। मां क्या गुजरी राकेश तो राकेश ही नहीं रहे। राकेश बहुत बौद्धिक थे और बेहद भावुक भी थे। भावुक न होते तो मुझसे शादी कैसे करते? मां के साथ-साथ अपने बच्चों को भी वे बेहद प्यार करते थे। बेटी पूर्वा को तो बेहद प्यार दिया। कहते थे जब मेरी बेटी बड़़ी हो जाएगी तो मैं उसे कॉफी हाउस ले कर जाऊंगा। अपने बेटे शाहीन को भी बहुत प्यार करते थे। दोनों बच्चों के बारे में चिंतित रहते थे। खासतौर पर मां की मृत्यु के बाद। मुझे उनके कमरे में ले जा कर कहते थे- ‘देख, मां नहीं रहीं।’ पता नहीं उन्हें क्या महसूस हो रहा था कि अपनी मां के जाने के बाद एक दिन मुझसे कहने लगे कि 'अनीता अगर मुझे कुछ हो गया तो?' मैंने उनसे कहा 'प्लीज़ अभी तो अम्मा गई हैं फिर तुम क्यों ऐसी बातें कर रहे हो'। कहने लगे 'अगर मुझे कुछ हो गया तो तू बच्चों को अकेले कैसे पालेगी'? मैंने उनसे कहा कि ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं? कहने लगे 'ऐसे ही पूछ रहा हूं बस'। मैंने उनसे कहा- 'मां हूं, पालूंगी ही। अपने बच्चे छोड़ तो नहीं सकती।'
प्रज्ञा : राकेश जी की मृत्यु के बाद आपने घर का दायित्व कैसे निभाया? तब तक तो आपका अपना स्थायी आवास भी नहीं था।
अनीता राकेश : प्रज्ञा आप मानेंगी नहीं उनके जाने के बाद कितने लोगों ने मुझे आर्थिक सहायता करते हुए थोड़ी-बहुत राशि के चेक भेजे। न्यू राजेंद्र नगर के घर में ही उनकी मां गुजरीं और वहीं राकेश जी भी। फिर हमने वो घर छोड़ दिया। मैं ओम शिवपुरी के पास चली गई। हम लोग बाराखंभा रोड पर रहने लगे। मैं सोचती रहती कि मेरा अपना घर कब होगा? आज जिस घर में हूं ये भी एक सपना ही है कि मैं यहां तक कैसे पहुंची। राकेश जी जब गए तो हमारे पास एक पैसा नहीं था। उन्होंने कभी पैसे की चिंता नहीं की। उनके शौक बहुत थे। अक्सर पहाड़ों की यात्रा। कभी ताश खेलना। कभी खाने पर लोगों को बुला लेना। हमारे यहां दावतें होती रहती थीं। दोस्तों को बुलाना, पार्टी करना उन्हें बेहद पसंद था। उनके जाने के बाद मैंने पढ़ाना शुरू किया। वहां मुझे दो सौ रूपये मिला करते थे। ए. एन. कपूर जो स्कूल के प्रिंसीपल थे उन्होंने सुझाव दिया आप अच्छा पढ़ाती हैं पर आप बी. एड. कर लीजिए। मैंने जब ट्रेनिंग पूरी की तब स्कूल में मुझे पूरा स्केल भी मिला और बच्चों की एजूकेशन भी फ्री रही।
एक और बात भी है कि राकेश जी और कमलेश्वर में एक बड़ा अंतर था। कमलेश्वर जी को जीवन में बहुत पैसा चाहिए था। राकेश जी को नहीं चाहिए था। राकेश जी को पद्मश्री से सम्मानित किए जाने की बात हुुई भी फिर पद्मविभूषण की बात हुई तो उन्होंने इंकार कर दिया। ऐसा भला कौन इंसान होगा जो ये कहेगा कि मैं इन चीजों से नहीं अपने काम से जाना, जाना चाहता हूं। उन्होंने कभी पैसे की फ्रिक नहीं की। कमलेश्वर जी सारिका के संपादक भी रहे और मुंबई गए तो फिल्म इंडस्ट्री के साथ उन्होंने रिश्ता बनाना शुरू किया। कमलेश्वर जी पहले चिटफंड का काम भी किया करते थे। राकेश जी अपने एक आदर्शवाद में जीते थे। वो कहते थे मैं ऐसा नहीं करूंगा। उनका विश्वास आदर्शवाद में था। उसके लिए भले ही आप भूखे मर जाएं। बाद में इन्होंने महसूस किया कि जीवन के लिए पैसा कितना जरूरी है। उनके गुजरने पर हमारे पास कोई सम्पत्ति नहीं थी। ओमशिव पुरी ने सहायता की। वे मुझे भाभी कहा करते थे। मेरे लिए अमिताभ बच्चन की मां तेजी बच्चन बहुत बड़ा सहारा रहीं। वो मेरे पास आया करती थीं। ये घर (ईस्ट ऑफ कैलाश, दिल्ली) उन्होंने और इंदिरा जी ने मिल कर मुझे दिलवाया। राकेश जी की अंतिम विदा में भी इंदिरा जी आई थीं। हम बच्चन जी के बेहद करीब थे। ताज्जुब की बात है जब मैं बच्चन जी से मिलने गई तो उनकी बहू जया बच्चन ने मुझे भीतर आने ही नहीं दिया। जबकि पुणे में वे आती थीं ‘आधे-अधूरे’ के दौरान। मैंने उनसे कहा मैं बच्चन जी से मिलना चाहती हूं तो बोलीं कि उनकी तबियत बहुत खराब है। मैंने कहा इसीलिए तो मिलना चाहती हूं। इस पर वे बोलीं कि नहीं, आप नहीं मिल सकतीं। खैर ये बहुत लंबी यात्रा रही है। अब तो बहुत थक चुकी हूं।
प्रज्ञा : जब घर में इस तरह के आर्थिक हालात रहे तो क्या राकेश जी की किताबों की रॉयल्टी से कोई मदद नहीं मिली? और आपने लिखने के विषय में नहीं सोचा?
अनीता राकेश : रॉयल्टी आती थी पर वो कम थी। राजकमल के ओम जी बहुत अच्छे इंसान थे। राकेश जी के जाने के बाद उन्होंने मेरे लिए बहुत कुछ किया। हमारा सारा सामान बंधवाकर रखा। वो प्रकाशक भी थे और मित्र भी। इस घर के लिए उन्होंने भी मदद की। मीटर आदि लगवाया। तब जा कर मैं यहां शिफ्ट हुई। हालांकि राकेश जी को सबसे अधिक राजपाल ने छापा। अशोक माहेश्वरी ने मुझे छापा। बाद में राकेश जी के पत्रों की किताब मैंने राजपाल को देनी चाही पर उन्होंने कहा-हम नहीं छापेंगे। यहां मैं अशोक माहेश्वरी जी की बहुत तारीफ करूंगी कि राकेश जी की जो अधूरी चीजें लिखी हुई रखी थीं उन्हें अशोक माहेश्वरी जी ने छापा। मोहन राकेश रचनावली भी राजकमल ने छापी। रवींद्र कालिया तब भारतीय ज्ञानपीठ में थे उनके संपादन में भी मोहन राकेश संचयन प्रकाशित हुआ था। अशोक जी की तारीफ इसलिए बनती है कि लेखक की अधूरी रचनाएं उन्होंने छापी। कोई प्रकाशक इसलिए ये जोखिम नहीं उठाता कि अधूरा साहित्य क्या बिकेगा और अधूरी चीजें कौन पढ़ेगा? लेकिन उन्होंने छापीं। अभी अशोक जी नाराज हैं मुझसे पर कोई बात नहीं। उनकी तारीफ तो मैं करूंगी। मेरे पास अब राकेश जी की कोई चीज नहीं है। ये सामने फोटो है उनकी मां के साथ। (टेबल पर तीन फोटो-फ्रेम में ब्लैक-एंड व्हाइट तस्वीरें रखी हैं। एक में मोहन राकेश अपनी मां के साथ हैं। दूसरी तस्वीर अनीता राकेश की मां चंदा औलक की तस्वीर है और तीसरी तस्वीर एक सुंदर युवती की तस्वीर है-अनीता राकेश की।) कुछ महीनों पहले मैंने सारी चीजें दे दी हैं। उनका गोल्ड मैडल अशोक माहेश्वरी जी को दिया। उनका टाइपराइटर, चश्मा और घड़ी सब प्रतिभा अग्रवाल को दे दिए। अर्काइव के लिए। राकेश जी जहां जाते थे अपना टाइपराइटर साथ ले कर जाते थे।
रही बात मेरे लिखने की तो अब लिख चुकी जो सच था। वास्तव में घटित हुआ था। ‘फट्टे मारना’ तो मेरे लिए बहुत मुश्किल है। मुझे अशोक माहेश्वरी जी ने कहा-आप और लिखिए पर मैं और नहीं लिखूंगी... अब क्या लिखूंगी।
प्रज्ञा : राकेश जी के गुजरने के बाद कौन-कौन लोग घर आया करते थे? साहित्यिक और गैर साहित्यिक मित्र।
अनीता राकेश : पहले तो बहुत लोग आया करते थे फिर आना कम हुआ और अब तो कई लोग रहे भी नहीं। मेरी बेस्ट फ्रेंड अमृृता प्रीतम रहीं। मैं उनके घर जाया करती थी। उनके एक दोस्त भी थे। क्या नाम था उनका?
प्रज्ञा: इमरोज़।
अनीता राकेश : हां, अमृता और इमरोज़। उन्हें किसी के सामने सिगरेट पीने में कोई हिचक नहीं थी। उस दौर में बहुत से दोस्त थे। ख्ययाम आते थे। सुधा अरोड़ा थीं। रवींद्र कालिया और ममता कालिया थे। पुष्पा जी थीं। बासु भट्टाचार्य, जतिन दास और वर्षा दास भी।
मुझे याद है अमृता प्रीतम के साथ मिलकर राकेश जी ने जलियांवाला बाग में लाइट एंड साउंड शो किया था। उसे तैयार किया था। उन्होंने प्रकाश से उस समय के खूनी मंज़र को ऐसे प्रस्तुत किया थ कि वहां बैठे दर्शक थर्रा कर भाग गए। इसे उस प्रस्तुति की सफलता ही कहा जाएगा।
प्रज्ञा : आप राकेश जी के बारे में कुछ और कहना चाहेंगी?
अनीता राकेश : क्या कहूं... उनकी कमी बहुत खलती है मुझे। वो कहते हैं न ‘ज़िंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है।’ दोनों दोस्त हों और अलग-अलग तरीके से सोचते-विचारते भी हों। साथ हों। आई हैव लॉस्ट द बेस्ट मैन ऑफ मॉय लाइफ। आई लॉस्ट हिम। आई मिस हिम। आई रियली मिस हिम। अब 83 साल की हो गई हूं। मैं सोचती हूं किसी से मिलने जाऊं पर घर में ही बैठी रहती हूं। कोई है भी नहीं किससे मिलने जाऊं? अब कोई आता भी नहीं। आज आप आईं प्रज्ञा मुझे बहुत अच्छा लगा। सच में। अच्छा किया आप आईं। मैं अपने मन की बात कर सकी। कई बार आदमी इतना भरा हुआ होता है, चाहता है कि किसी से बात करे... थैंक्यू फॉर कमिंग।
प्रज्ञा: मुझे भी आपसे बातचीत कर के अच्छा लगा। राकेश जी को मैंने आपकी जुबानी और अधिक जाना। मुझे उम्मीद है इस लंबी बातचीत से मोहन राकेश जी के विषय में जिज्ञासु पाठक समाज कुछ और समृद्ध होगा। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।
सम्पर्क
प्रज्ञा
एच-103, सेकेंड फ्लोर, साउथ सिटी
सैक्टर -50, गुरूग्राम
हरियाणा-122018



बेहद दिलचस्प साक्षात्कार .पढ़ते हुए कई बार भावुक भी हुआ. मोहन राकेश पर जयदेव तनेजा की मोटी पुस्तक भी बड़े चाव से पढी थी. आपने इसे प्रस्तुत कर अच्छा किया.हजारों लोगों तक पहुंचेगा. आभार.
जवाब देंहटाएंललन चतुर्वेदी
महत्वपूर्ण और दुर्लभ जानकारी
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