लाल बहादुर वर्मा पर कविताएं
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| लाल बहादुर वर्मा |
अपने आप में एक विरल व्यक्तित्व थे प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा। इतिहास का बोध कराने वाले अकेले साधक जो ता उम्र अपने काम में एक मजदूर की तरह निरन्तर जुटे रहे। उनका मानना था कि मार्क्सवाद सिर्फ रोजी-रोटी की लड़ाई नहीं है बल्कि यह मानव जीवन को सुंदर बनाने की जद्दोजहद है। इस जद्दोजहद में वे कुछ भी कर गुजरने के लिए प्रतिबद्ध थे। सहजता और सहृदयता उनकी पूंजी थी। वे नाम के नहीं बल्कि सचमुच के प्रोफेसर थे। इसके बावजूद वे लाल बहादुर कहलाया जाना ही अधिक पसन्द करते थे। वे वह दुनिया चाहते थे जो वास्तविक अर्थों में खूबसूरत हो। जिंदगी भर दुनिया को खूबसूरत बनाने के लिए लगे रहे। आजीवन यह सपना देखते रहे और अन्ततः इस सपने के साथ ही उन्होंने अपनी अन्तिम सांस ली। इतिहास विषय पर उन्होंने कुछ मौलिक पुस्तकें लिखीं और 'इतिहास बोध' जैसी पत्रिका का सम्पादन किया। इतिहास को साहित्य से जोड़ कर देखे जाने और मौखिक इतिहास पर बल देने वाले इतिहासकार थे। उनका मूल्यांकन किया जाना आज भी बाकी है। बीते 10 जनवरी को लाल बहादुर जी का जन्मदिन था। हम उनकी स्मृति को नमन करते हुए उन पर लिखी गई दो रचनाएं प्रस्तुत कर रहे हैं। पहली एक गजल है जिसे धीरेन्द्र नाथ ने लिखा है, जबकि दूसरी रचना युवा कवि सौम्य मालवीय की कविता है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं लाल बहादुर वर्मा पर पद्य रचनाएं।
लाल बहादुर वर्मा पर पद्य रचनाएं
तुम जानते हो लालबहादुर वर्मा क्या थे
धीरेन्द्र नाथ
तुम जानते हो लालबहादुर वर्मा क्या थे
जम्हूरियत के मैकश, एक इश्क़िया बला थे
नाराज़ कभी हों गर, रह जाएँ मुस्कुरा के
कोई बात शुरू कीजे, नाख़त्म सिलसिला थे
कोई दोस्ती का मेला, कोई फ़लसफ़े की जमघट
कोई वज़्म-ए-मौसीक़ी, हर सिम्त कू कला थे
थी आश् नाई उनकी मुस्तकबिल-ए-जहाँ से
तारीख़ की हलचल से ताउम्र मुब्तला थे
मिलते नहीं कहीं अब, होती नहीं हैं बातें
आदम-ए-सुस्त-जाँ को वह डाँटते भला थे
(एक भटकी हुई ज़िद के घायल पैरों वाली हवा थे)
लाल बहादुर वर्मा
सौम्य मालवीय
कल ही मिला था इतिहास सरे-बाज़ार
फटा पुराना चोगा पहने
काँख में दबाये तथ्यों के गट्ठर
खाँसता-खखारता
फिर भी उड़ाता सिगरेट का धुआँ
मुँह से आ रही थी दारू की बास भी
छूटते ही बोला
ये लाल बहादुर कहाँ गया?
वही वर्मा जी, लाबव, प्रोफ़ेसर सा’ब
मेरी बाँह पकड़ कर लाया था
नुक्कड़ पर चाय पीने
ख़ुद ही ग़ायब हो गया!
मैं तो अभिलेखागार में सिक्यूरटी गार्ड की नौकरी करता था
पर कुछ कमाता तो था
उसे तो विश्वविद्यालय से पेंशन तक न मिलती थी
कहाँ उसकी बातों में आया
कि नौकरी भी गयी
और वो ‘जन’ तो पहचानता ही नहीं
जो लाल बहादुर के सपनों में बसता था
जाने क्या-क्या बक रहा था इतिहास
इतिहास से अधिक वर्तमान की बातें करता था
मैंने कहा छोड़ो आजकल की
कुछ प्राचीन बताओ
तो ठठा कर बोला – इतिहास का अतीत नहीं वर्तमान होता है
इतिहास के वर्तमान बोध को
इतिहासबोध कहता था लाल बहादुर
देखो ये फर्रे – इतिहासबोध के पन्ने!
देखो ये उसका हस्तलेख
जैसे कोई अब तक ना पहचानी हुई इबारत हो !
अपनी पकी हुई दाढ़ी में
मुझसे सरसों का तेल लगवाता था
कहाँ गया ये मुआ लाल बहादुर!
मैं उसका जिन्न था जिसे उसने आज़ाद कर दिया था
फिर भी जिन्नात के अपने उसूल होते हैं
सो मैं उसके साथ लगा रहा
लोग उसके आशियाने को जिन्नातों की मस्जिद कहते थे !
वो गणेश की तरह लिखता था
मैं व्यास की तरह लिखवाता था
मुझे बहुत कोफ़्त होती
जब आंदोलनों में खेंच ले जाता
ट्रैक्टरों के बीच इतिहास का ट्रैक्टर लगता था लाल बहादुर
नागरिकता के हक़ के लिए बैठी औरतों के मध्य
वो बूढ़ी मोटी औरत जान पड़ता
जो हिजाब के पीछे – जैसे तारीख़ के पीछे
दाँत निकाल कर हँसती थी!
कहीं जेल में तो नहीं डाल दिया उसे
और अब तक तय कर रहे हैं अभियोग
जैसे फ़र्द-ए-ज़ुर्म हो
किसी ऐतिहासिक गुनाह का
राज्य की सुरक्षा को ख़तरा हो जिससे
न न मेरी मुराद उमर ख़ालिद से नहीं
लाल बहादुर से है!
वैसे तो उमर भी इतिहास का तालिब है
आख़िर कहाँ गया ये उमर बहादुर?
मतलब लाल बहादुर!
मैं ठहरा भदेस, अक्खड़ और खुरदुरा
सस्ती चाय और उबले अंडों का आदी
वो बनाता था मेरे लिए
रंगीन कॉकटेल्स और नर्म कबाब
अपने दोस्तों की महफ़िल में
मुझे ही ढारता था गिलास में
फिर अपने दोस्तों को प्याले में उतार कर
मुझे पिलाता था!
कहाँ गया वो यार लाल बहादुर!
मैंने देखा
इतिहास अतीत के दफ़्तर से निकला था
मतदाता सूची से निकाला जा चुका था उसका नाम
सभ्यता के खाते में
फ़र्ज़ी पाई गयी थी उसकी प्रविष्टि
कोई ‘चीनी’ कोई ‘मोमो’
कोई कह कर ‘घुसपैठिया’ पीछे पड़ा था
कि बोल पड़ा मुझसे
उसका मणिपुर जल चुका है
आख़िर कहाँ है लाल बहादुर!
उसकी गंजी चाँद पर मैंने
उत्तर पूर्व का नक़्शा देखा है
सर पर चढ़े हुए चश्मे से
वो तमाम चेहरे देखे हैं
जो मेरी शक़्ल में शामिल हैं
शायद मैं बलत्कृत हो जाऊँ किसी मिनिस्टर से
या लिंच कर दिया जाऊँ चौराहे बीच
क्या तब भी न आएगा लाल बहादुर?
वो जिसकी बड़ी-सी गोल तोंद पर
बड़ा-बड़ा लिखा था पेरिस, मई अड़सठ
जो भाषाओं के जंगल में अनुवाद की तरह भटकता था
गाता था पॉल रॉब्सन – खाता था गुलगुले
वो लाल बहादुर...!
मैं इतिहास को उसके रैन बसेरे में ले गया
लगातार बड़बड़ाता रहा फिर सो गया इतिहास
मौजूदा दौर के सबसे संगीन विस्मरण पर्व के बीच
लाल बहादुर इतिहास को छोड़ कर चला गया था…
हाँ... हमसे तुमसे बड़ा है इतिहास का बिछोह
पर जैसे इतिहास का अतीत नहीं वर्तमान होता है
लाल बहादुर भी एक भविष्य का नाम है!
लाल बहादुर वर्मा! घटो!
घटो कि तुम्हारे घटने का समय है
समय इतिहास को ऊष्मा दो
कि रात बहुत लम्बी है
लाल बहादुर के पतले होठों के बीच
रम का सिप दिल में है
कुछ जल रहा है शिराओं में
और करवट ले रहा है एक भोजपुरी गीत
सरदार लाल बहादुर वर्मा के घर के लिए
साइकिल निकालने का वक़्त
अब हुआ चाहता है!


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