सुप्रिया पाठक का आलेख 'हिंदी साहित्यालोचना के स्त्रीवादी स्वर : ज्ञान परंपरा की नई आहटें'
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| सुप्रिया पाठक |
इतिहासकार ई. एच. कार लिखते हैं 'इतिहास सिर्फ समाज के ऊपरी पायदान पर बैठे लोगों का लिखा जाता है, अभिवंचित तबके का नहीं।' यह एक लम्बे समय का सच रहा है। समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होने के बावजूद स्त्रियां भी प्रायः इतिहास से बाहर ही रहीं। हालांकि महिलाओं ने मौखिक ज्ञान परंपरा के तहत लोकगीतों और कहानियों में अपने समय के सच को काफी कुछ सहेज कर रखा परंतु इतिहास की लिखित परंपरा में इनकी भूमिका का कोई जिक्र नहीं मिलता। स्त्री साहित्य को ले कर साहित्यिक जगत में उपेक्षा की प्रवृति रही जिसके कारण स्त्री आलोचना एवं लेखन को अपेक्षाकृत उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया। लेकिन इसे आखिर कब तक उपेक्षित किया जाता। परंपराओं के प्रतिरोधी पाठ के रूप में स्त्रीवादी आलोचना पुरुषवादी प्रवृति एवं शक्ति-संबंधों की शिनाख्त करती है जिसकी नींव वर्जीनिया वुल्फ ने 1929 में 'ए रूम ऑफ वन्स ओन' में रखी थी। वैश्विक स्तर पर स्त्री अधिकारों के दावे के साथ उभरे स्त्रीवाद ने अपनी मंजिल की तलाश में अनेक उतार-चढ़ाव पार किए। इसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता इस धारणा में निहित थी कि स्त्रियाँ भी मनुष्य हैं। सुप्रिया पाठक ने अपने एक गंभीर आलेख में इस बात की तहकीकात की है कि हिन्दी साहित्य में स्त्री आलोचना ने कैसे अपनी वह मुकम्मल जगह बनाई जिसने आज अपनी एक स्वतन्त्र पहचान बना ली है। इस स्त्रीवादी स्वर ने मुख्यधारा की वर्चस्वशाली ज्ञान परंपरा को प्रश्नांकित कर उसके समक्ष एक चुनौती प्रस्तुत किया है। आलोचना के क्षेत्र में सुप्रिया पाठक बिना किसी शोरोगुल के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही हैं जिसे हम पहली बार पर लगातार प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी क्रम में आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सुप्रिया पाठक का आलेख 'हिंदी साहित्यालोचना के स्त्रीवादी स्वर : ज्ञान परंपरा की नई आहटें'।
'हिंदी साहित्यालोचना के स्त्रीवादी स्वर : ज्ञान परंपरा की नई आहटें'
सुप्रिया पाठक
साहित्य में स्त्री दृष्टि निजी मुक्ति का नहीं बल्कि सामूहिक मुक्ति का आख्यान रचती है।
विगत कुछ वर्षों में रचनाओं के स्त्रीवादी पाठ का अभिनव प्रयास आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। इसने साहित्यिक आख्यानों को स्त्री दृष्टि से विश्लेषित करने की संभावनाएं पैदा की हैं। परंपराओं के प्रतिरोधी पाठ के रूप में स्त्रीवादी आलोचना पुरुषवादी प्रवृति एवं शक्ति-संबंधों की शिनाख्त करती है जिसकी नींव वर्जीनिया वुल्फ ने 1929 में 'ए रूम ऑफ वन्स ओन' में रखी थी। वैश्विक स्तर पर स्त्री अधिकारों के दावे के साथ उभरे स्त्रीवाद ने अपनी मंजिल की तलाश में अनेक उतार-चढ़ाव पार किए। इसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता इस धारणा में निहित थी कि स्त्रियाँ भी मनुष्य हैं। स्त्री पराधीनता की सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ों को समझने के लिए इसने साहित्य को अपना प्रस्थान बिंदु बनाया। साहित्य में स्त्रीवादी आलोचना की शुरुआत स्त्रियों को सांकेतिक रूप से दृश्यमान करने के इरादे से नहीं हुई थी, बल्कि सामाजिक-ऐतिहासिक प्रक्रियाओं में स्त्रियों की विविध भूमिकाओं को रेखांकित करना एवं उसका दस्तावेजीकरण इसका प्रमुख उद्देश्य था। अर्थात साहित्यिक अभिव्यक्तियों में स्त्रियों के जीवनानुभवों को समग्रता के साथ प्रस्तुत करना स्त्रीवादी ज्ञान परंपरा का प्रस्थान बिंदु था। इसने समाज विज्ञान के विभिन्न विषयों यथा समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीतिशास्त्र, इतिहास एवं संस्कृति के साथ ज्ञानात्मक संबंध कायम किया। ज्ञान उत्पादन की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करते हुए इसने यह स्थापित किया कि स्त्रियां प्रत्येक ज्ञानानुशासन में ना सिर्फ हाशिए पर हैं बल्कि उनकी भूमिका एवं योगदान को इरादतन अदृश्य रखा गया है। अपनी रचनात्मक यात्रा में इसने पाश्चात्य स्त्रीवादी दर्शन के सैद्धान्तिक पक्ष की पुनर्विवेचना करते हुए भारतीय लोक परंपरा-आख्यानों के साथ बहनापे का रिश्ता जोड़ा एवं स्त्री-मुक्ति के तीखे प्रतिरोधी स्वर को तलाशने की कोशिश शुरू की। साहित्यिक लेखन एवं मूल्यांकन के क्षेत्र में स्त्रीवादी आलोचना का सिद्धांत पैराडाइम शिफ्ट (Paradigm shift) या विश्व दृष्टि में बदलाव था।
स्त्रीवादी साहित्यालोचना की पृष्ठभूमि को समझने के लिए पश्चिम के देशों में उभरे स्त्री अस्मिता के दर्शन पर एक नज़र डालना आवश्यक है। 1929 में अपनी पुस्तक 'ए रूम वन्स ओन' में वर्जीनिया वुल्फ ने शेक्सपियर की काल्पनिक बहन ज्यूडिथ की असफल कलात्मक आकांक्षाओं को चित्रित करते हुए स्त्रियों की रचनात्मकता में बाधक सामाजिक परिवेश की चर्चा की थी जिसमें स्त्री की बौद्धिक अभिव्यक्ति के लिए न्यूनतम सम्भावनाएं मौजूद थीं। स्त्रीवाद के द्वितीय लहर की महत्वपूर्ण फ्रांसीसी विदुषी सिमोन दी बेवॉयर ने 1949 में प्रकाशित अपनी कृति 'द सेकेंड सेक्स' में लिखा कि पुरुष और स्त्री भूमिकाओं के संबंध में जिस विचार को प्राकृतिक मान लिया गया है, दरअसल वह सांस्कृतिक निर्मिति है। स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि उसे बनाया जाता है। इसी प्रकार की आलोचनात्मक प्रतिक्रिया एंग्लो-अमेरिकन और फ्रांसीसी लेखन के साथ-साथ शीला रोबोथम, जर्मेन ग्रीयर और मिशेल बैरेट जैसी ब्रिटिश नारीवादियों के लेखन में भी दिखी । 1970 में प्रकाशित केट मिलेट ने अपनी पुस्तक 'सेक्सुअल पॉलिटिक्स' में चार्ल्स डिकेंस और डी. एच. लॉरेंस जैसे प्रसिद्ध लेखकों को बिना सोचे-समझे पढ़ने और स्त्रियों के संबंध उनके विद्वेषी प्रस्तुतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया। 1977 में 'ए लिटरेचर ऑफ देयर ओन' में एलेन शोवाल्टर ने स्त्री आलोचना शब्द का प्रयोग लेखक के रूप में महिलाओं की इतिहास के प्रति चिंता को इंगित करने के लिए किया। इसमें ब्रोंटेस, एलिजाबेथ गास्केल, मैरी एलिजाबेथ ब्रैडडन और जॉर्ज एलियट जैसी लेखिकाओं द्वारा पुरुषों के छद्मनाम और पुरुष मानकों की नकल करने पर महत्वपूर्ण आलोचनात्मक टिप्पणी की गई थी। फ्रांसीसी स्त्रीवाद ने साहित्यालोचना के संदर्भ में सर्वाधिक ध्यान भाषा के प्रयोग पर केंद्रित किया। इसने शिश्न विकास (Development of phallus) के फ्रायडियन मॉडल का सहारा लेते हुए अपने विमर्श को स्थापित करने का प्रयास किया। फ्रांसीसी मनोविश्लेषक जाक लाकाँ ने भाषा को सीखने की प्रक्रियाओं को लैंगिक भिन्नताओं के साथ जोड़ कर देखने का प्रयास किया जिसे बाद में जूलिया क्रिस्टेवा, हेलेन सिक्सस और लूस इरिगारे ने आगे बढ़ाते हुए इस तर्क को स्थापित किया कि भाषा की दुनिया में बच्चे का प्रवेश माँ के जरिए होता है। भाषा एक विभाजित जेंडर संरचना को प्रतिबिंबित करती है जो पुरुष/ स्त्री, प्रकृति/ संस्कृति जैसे विरोधाभासी निर्मिति करती है। भाषा का यह पैटर्न उत्पीड़न और भाषा को पुरुषवादी सत्ता के पक्ष में न्यायोचित ढंग़ से प्रस्तुत करता है। साहित्यलोचना के क्रम में हमें भाषा के इस पुरुषवादी पैटर्न की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है।
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| Virginia Woolf |
प्रमुख स्त्रीवादी चिंतक सैंड्रा हार्डिंग इसे 'स्टैंड प्वाइंट थ्योरी' के रूप में परिभाषित करती हुई यह तर्क देती हैं कि इस समाज में प्रत्येक व्यक्ति का ज्ञान वैध है इसलिए समग्र ज्ञान (Holistic knowledge) के दावे के लिए यह आवश्यक है कि खंडित माने जाने वाली ज्ञान परम्पराओं को समावेशी दृष्टि के साथ आत्मसात किया जाए। इतिहास में स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यक समुदायों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं। युद्ध सिर्फ राजा और सेनापति ने नहीं लड़ा, बल्कि वह खानसामा भी युद्ध लड़ रहा था जो रोज हजारों सिपाहियों का भोजन तैयार करता था पर खानसामा, वैद्य, भिश्ती, लुहार, सभी युद्ध के इतिहास में अदृश्य थे। स्त्रियों की भूमिका का उल्लेख तो बहुत दूर की बात है। प्रसिद्ध इतिहासकार ई. एच. कार की मानें तो इतिहास सिर्फ समाज के ऊपरी पायदान पर बैठे लोगों का लिखा जाता है, अभिवंचित तबके का नहीं। अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि युद्ध से लौटने के बाद इस समुदाय ने भी दी - नानी के रूप में अपने बच्चों को इनकी वीरगाथाएं सुनाई होंगी। महिलाओं ने मौखिक ज्ञान परंपरा के तहत लोकगीतों और कहानियों में तो इसे सहेज कर रखा परंतु इतिहास की लिखित परंपरा में इनकी भूमिका का कोई जिक्र नहीं मिलता। हिन्दी साहित्य में लेखन एवं आलोचना के रूप में उभरता हुआ स्त्रीवादी स्वर मुख्यधारा की इसी वर्चस्वशाली ज्ञान परंपरा को प्रश्नांकित करता है।
स्त्री साहित्य को ले कर साहित्यिक जगत में लगभग यही प्रवृति रही जिसके कारण स्त्री आलोचना एवं लेखन को अपेक्षाकृत उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया। स्त्री लेखन को ‘दूध-भात’ मानने वाला साहित्यिक पुरोधाओं का समूह न सिर्फ रचना के स्तर पर बल्कि ज्ञान परंपरा की दृष्टि से भी स्त्रियों को हीन और दोयम मान रहा था। वे यह मानते थे कि स्त्री लेखन निजी संबंधों, विवाह और पारिवारिक दायरों तक ही सीमित था जिसका वृहत्तर अनुभव जगत से कोई मेल नहीं था। स्त्रियों के लेखन में वैवाहिक जीवन का खटराग था, प्रेमियों की नीरस और उबाऊ कथाएँ थी, दैहिक सम्बन्धों से पैदा हुई खीज और थकान थी जिससे वह मुक्त नहीं हो पा रही थी। स्त्री लेखन को अपने तयशुदा पैमाने से आँकता हुआ साहित्यिक समाज यह भूल गया कि तब तक वैश्विक स्त्रीवादी आंदोलन भी अवसरों की समानता (Equal opportunity) की मांग पर केंद्रित था। उसे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन में साझेदारी की दरकार थी। जब अवसरों में ही समानता नहीं थी तो लेखन समान हो, यह संभव ही नहीं था। दरअसल स्त्रीवादी आलोचना परंपरा को स्वीकार करना सत्ता विमर्श में उनकी हिस्सेदारी को सुनिश्चित करना भी था। साहित्यिक आलोचना में, स्त्री रचनाशीलता का मानचित्र स्त्री सम्बद्ध विषयों की परिधि तक सीमित रखे जाने और 'पर्सनल इज पॉलिटिकल' के आग्रह के हावी हो जाने के कारण पर्सनल की पॉलिटिकल व्याख्याओं के इतर जो भी विषय थे, वे स्त्री लेखन में केन्द्रीय उपस्थिति नहीं बना सके। अपने इस उद्देश्य में इसने कितने मुकाम हासिल किए और स्त्री आलोचकों की परंपरा किस हद तक विकसित हो पाई, यह जानना साहित्य के इतिहास लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत में हिंदी साहित्य में स्त्रीवादी आलोचना की प्रासंगिकता को समझने के लिए इतिहास लेखन की परंपरा एवं उसकी पुरुषवादी प्रवृतियों पर दृष्टिपात आवश्यक है। रामचंद्र शुक्ल 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (1929) में आधुनिक काल को गद्यकाल मान कर अपने इतिहास में बंग महिला की 'दुलाईवाली' कहानी को तो शामिल करते हैं पर आलोचना या विचार के क्षेत्र में वे किसी स्त्री के रचनात्मक अवदान का उल्लेख नहीं करते हैं। स्त्रियों के वैचारिक योगदान को नकारने का यह सिलसिला केवल रामचंद्र शुक्ल तक सीमित नहीं रहा बल्कि उनके बाद के इतिहास एवं आलोचना ग्रंथों में भी यह प्रवृति स्पष्ट रूप से दिखी। रामविलास शर्मा 'स्त्री मुक्ति के प्रश्न' नामक पुस्तक में समाज में स्त्री की स्थिति पर विचार रखते हुए उसे साहित्यिक विमर्श का विषय तो बनाते हैं पर वह भी स्त्रियों की सृजनात्मकता को आधिकारिक रूप से अपेक्षित महत्व नहीं देते हैं। हालांकि बाद में, रामस्वरूप चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक हिंदी 'साहित्य और संवेदना का विकास' (1986) में महादेवी वर्मा एवं निर्मला जैन के साहित्यिक योगदान एवं महत्व को साहित्य की एक धारा के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने महादेवी वर्मा के निबंधों को अलोचना के रूप में प्रासंगिक मानते हुए कहा कि उनके निबंध अधिकतर साहित्य या सामाजिक समस्याओं के प्रश्नों से सम्बद्ध प्रधानतः विवेचनपरक हैं जो अपने युग के काव्य की आधारभूमि खोजना चाहते हैं। वे सत्य को काव्य का साध्य और सौंदर्य को उसका साधन मानती हैं। कला सत्य को ज्ञान नहीं, बल्कि अनुभूति के माध्यम से खोजती है। विश्वनाथ त्रिपाठी की पुस्तक 'हिंदी आलोचना' (1992) में उन्होंने महादेवी वर्मा के वैचारिक अवदान को स्वीकार किया।
प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह भारतेन्दु और उनके युग के अन्य लेखकों की व्याख्या कर उन्हें आधुनिक युग का निर्माता मानने में संकोच नहीं करते पर महादेवी के लेखन की स्त्री संबंधी चिंता को राष्ट्रवाद और छायावाद के दायरे में क़ैद करते हैं। वे महादेवी वर्मा को स्त्रीवादी चिंतक नहीं मानते हैं न ही उनकी दृष्टि में वे किसी विशेष स्त्री परंपरा की प्रणेता हैं। नामवर जी यह मानते हैं कि महादेवी की प्रसिद्धि और इतिहास में उनकी अवस्थिति का आधार ‘शृंखला की कड़ियाँ’ पुस्तक नहीं है । उनका मानना है कि यदि उन्होंने केवल ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ पुस्तक ही लिखी होती; 'नीहार', 'रश्मि', 'नीरजा', 'सांध्यगीत', 'दीपशिखा', 'अग्निरेखा', 'सप्तवर्णा' जैसे ग्रंथ न लिखे होते, 'स्मृति की रेखाएँ', 'अतीत के चलचित्र' न लिखी होती तो हिन्दी साहित्य के इतिहास में अथवा भारतीय साहित्य के इतिहास में उनका स्थान क्या होता, कितना होता? पाद टिप्पणी के रूप में होता या अनुक्रम में कहीं होता या पूरा का पूरा अध्याय होता। महादेवी को केवल स्त्री के रूप में निःशेष करना क्या ठीक है? सिर्फ इसलिए कि उन्होंने प्रयाग महिला विद्यापीठ की स्थापना की और इसलिए कि उन्होंने महिला शिक्षा में काम किया। इस प्रवृति पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है। महादेवी की कविता को छायावाद के परिप्रेक्ष्य में पढ़ने से उसके मर्म को समझना संभव नहीं है। उसे स्त्रीवादी परिप्रेक्ष्य में जेंडर लेंस से तलाशने से उनकी रचनाओं की नई मिमांसा बनाती हैं। महादेवी की कविताओं की छायावाद के आलोक में रुढ़िबद्ध विवेचना होने के कारण उनका विश्लेषण कम महिमामंडन अधिक हुआ है। वर्तमान स्त्रीवादी आलोचना को महादेवी वर्मा के स्त्री संबंधी चिंतन को तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों में अवस्थित करते हुए उससे देशज स्त्रीवादी सैद्धांतिकी गढ़ने की आवश्यकता है। उन्हें निःसंदेह भारतीय संदर्भ में प्रथम स्त्रीवादी चिंतक कहा जा सकता है। हालांकि बहुत बाद के वर्षों में नामवर जी ने एक साक्षात्कार में यह कहते हुए इस भूल को स्वीकार किया है कि ‘हमने स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों पर उतना ध्यान नहीं दिया जितना दिया जाना चाहिए था। यह एक ऐसी कमजोरी थी जिसे यूरोपीय देशों खासकर अमेरिका के वामपंथी समूहों ने सबसे पहले पकड़ा।'
हिंदी की वरिष्ठ लेखिका निर्मला जैन पिछले कई दशकों से आलोचना कर्म में सक्रिय हैं। वे मुख्यतः रस-सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र की विशेषज्ञ मानी जाती हैं। इसके अतिरिक्त वे साहित्य के समाजशास्त्र एवं पाश्चात्य साहित्य की भी गंभीर अध्येता रही हैं। उन्होंने 2011 में 'कथा समय में तीन हमसफर' में अपने समकालीन रचनाकारों कृष्णा सोबती, मन्नू भण्डारी और उषा प्रियंवदा पर अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए लिखती हैं कि कुल जमा किस्सा यह है कि ‘नई कहानी’ को सुनियोजित आंदोलन के रूप में चलाने की योजना जिन लोगों ने बनाई, उन्हीं के समानांतर बिना किसी आंदोलनात्मक तेवर या मुद्रा अख्तियार किए ये तीन महिलाएं पूरी निष्ठा और समर्पित मनोभाव से कहानियां लिख रही थीं। यह कहना ज्यादा सही होगा कि इनकी आरंभिक रचनाएं अपने पुरुष हमराहियों की तुलना में बेहतर थीं। बावजूद इसके, वे स्त्रीवादी साहित्य आलोचना की आवश्यकता को सिरे से खारिज करती हैं एवं स्वयं को भी किसी खांचे में रख कर देखा जाना पसंद नहीं करतीं। स्त्री विमर्श पर अपनी प्रतिक्रिया देती हुई निर्मला जी कहती हैं “मैं इस तथाकथित स्त्रीवादी आंदोलन से बिल्कुल प्रभावित नहीं हूँ, क्योंकि जहाँ मूल समस्याएँ हैं वहाँ ये आंदोलन तो होते ही नहीं। कुछ सीमित समस्याओं को ले कर लिखने को मैं स्त्री विमर्श नहीं मानती। विमर्शों के नाम पर ये बस अपनी पहचान बनाने की कोशिश है। जिनको कलम चलाने की तमीज नहीं है वे आज स्त्री विमर्शों के सरोकार बन बैठे हैं और जो संपन्न परिवार से आती हैं उनकी अलग समस्याएँ हैं। हर घर की अपनी-अपनी समस्याएँ हैं। असलियत से कोसों दूर रहकर और रचनाओं में अन्याय अत्याचार के विरूद्ध लिख देने से स्त्री विमर्श नहीं होता।’
रचना एवं आलोचना का घनिष्ठ रिश्ता है। कोई भी रचना अपने समय के सामाजिक-राजनितिक संदर्भों से गहरे रूप में जुड़ी होती है। वह या तो सत्ता के साथ टक्कर लेती है अथवा समझौते करती है। रचना और आलोचना के ग्राफ को समझने के लिए सत्ता के साथ उसके संबंधों की शिनाख्त जरूरी है। हिंदी साहित्य में पिछले सौ वर्षों में असंख्य महत्वपूर्ण महिला रचनाकार हुईं जिन्होंने ‘स्त्री’ को अपने लेखन का विषय बनाया। महादेवी वर्मा उसमें सबसे ऊपर हैं। महादेवी वर्मा की रचना 'शृंखला की कड़ियां' 1942 में प्रकाशित हुई जिसमें उन्होंने पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों की स्थिति एवं नियति के संबंध में महत्वपूर्ण स्थापनाएं दीं। महादेवी वर्मा की लेखनी में मीरा के विद्रोह की स्पष्ट अभिव्यक्ति के साथ-साथ एक नए युग की आहट भी दिखाई देती है जिसमें महादेवी आह्वान करती है:
चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!
महादेवी वर्मा की कविताओं में स्वतः स्फूर्त व्यक्त चेतना का मूल्यांकन अपेक्षित रूप से कम हुआ जिसका परिणाम यह रहा कि पाठक ‘यह विरह की रात का कैसा सबेरा है’ जैसी प्रखर राजनीतिक चेतना से लैस पंक्तियों से अधिकांशतः दूर ही रहे। भारतीय संदर्भों में महादेवी स्त्रीवाद के द्वितीय लहर की प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखिका सिमोन द बावुवार के 'द सेकेंड सेक्स' के विचारों से भी अधिक तीखे तेवर से स्त्री-मुक्ति के प्रश्न को सिर्फ ‘शरीर की मुक्ति’ तक सीमित नहीं करतीं बल्कि स्त्री-मुक्ति को मानवता की मुक्ति के साथ जोड़कर देखती हैं जो राजनीतिक, आर्थिक एवं सांकृतिक व्यवस्थाओं में आमूलचूल परिवर्तन से ही संभव है। महादेवी के स्त्री संबंधी चिंतन में आधुनिक स्त्री की चेतना के साथ परंपरागत स्त्री की चेतना का अंतर्द्वंद्व है। महादेवी इस असंभव स्वप्न की संभावना के दरवाजे पर दस्तक देती हैं। पितृसत्ता की बज़्र किवाड़ जो थपथपाने से नहीं खुलने वाली, उसे धक्के से गिरा देने की युक्तिसंगत चुनौती को स्वीकार करती हैं। वे स्त्री को अपनी स्वाधीनता को अर्जित करने के लिए नए सिरे से स्वयं का संधान करने की सलाह देती हैं। वह स्वाधीनता का नया मार्ग चुनती हैं। महादेवी के इतने महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद भी जब साहित्यिक परंपरा में स्थान निर्धारण का प्रश्न उभरता है सर्वप्रथम जयशंकर प्रसाद और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की बारी आती है।
स्त्रीवादी आलोचना ने साहित्यिक अभिव्यक्तियों में दर्ज स्त्रियों की पुनर्रचना की। पुरुष रचित लेखन में स्त्री-पुरुष संबंधों की निर्मिति अनायास ही लैंगिक विभेद के आधार पर बनाए गए संरचनाओं को पुष्ट करती थी। किसी भी रचना के नायक के कंधों पर कथानक का भार था जिसके इर्द-गिर्द पूरी कथा घूमती थी। उन रचनाओं के स्त्री पात्रों की दृष्टि से यदि कहानी की पुनर्रचना की जाए तो निश्चित रूप से कथानक का परिदृश्य उलट जाएगा। महाभारत की ‘माधवी’ की अपेक्षा भीष्म साहनी ने अपने नाटक ‘माधवी’ में न सिर्फ माधवी की कथा की पुनर्रचना का प्रयास किया बल्कि उन्होंने स्त्री की अस्मिता, उसके अधिकार एवं अपना जीवन-साथी स्वयं चुनने के विवेक और तर्क को भी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया। भीष्म साहनी की इस रचना को स्त्रीवादी पुनर्रचना के उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि उनके लेखन की भी अपनी सीमाएं हैं। प्रेमचंद ने ‘पंच परमेश्वर’ में अलगू एवं जुम्मन शेख की मनोदशा दर्शाते हुए न्याय की निष्पक्षता के समक्ष व्यक्ति के गौण हो जाने की कथा रची। इस कहानी में पंच के रूप में पुरुष तो परमेश्वर हो गए लेकिन दरअसल यह समाज में एक अकेली वृद्ध स्त्री की कहानी है। यदि खाला की दृष्टि से इस कहानी का पुनर्लेखन किया जाता तो समाज में अकेली स्त्रियों के संपत्ति में अधिकार, वृद्धावस्था में पराश्रित हो जाने एवं न्याय के लिए दर-दर भटकने की पीड़ाजनक तस्वीर अभिव्यक्त होती क्योंकि स्त्री दृष्टि से रचित कथा में स्त्री जीवन के प्रति बहनापे का भाव होता। ‘कफ़न’ कहानी को यदि स्त्री दृष्टि से लिखा जाता तो घीसू और माधव को अमानवीय, कामचोर, लोभी और विवेकहीन पुरुष के रूप में चित्रित करते हुए बुधिया की प्रसव पीड़ा की तकलीफ बांटने उस समय दलित समाज की स्त्रियां अवश्य उपस्थित होतीं जो प्रेमचंद की कहानी में अदृश्य हैं। संभवतः उन स्त्रियों की उपस्थिति बुधिया क अकाल मृत्यु से बचा पाती और कहानी का परिदृश्य कुछ और होता। स्वयं बुधिया की मनोदशा उस वक्त क्या थी, इसे व्यक्त करने में प्रेमचंद चूक गए। प्रेमचंद द्वारा लिखित यह कहानी एक स्त्री के प्रसव पीड़ा से गुजरने की कहानी भी हो सकती है, इस पर किसी का ध्यान नहीं गया।
स्त्रीवादी आलोचना लेखक और पाठक के लैंगिक पहचान के आधार पर भाषा और रचना प्रक्रिया को व्याख्यायित करती है। भाषा के पितृसत्तात्मक स्वरूप पर गहराई से चिंतन की आवश्यकता है। स्त्रियां रोजमर्रे की जिंदगी और लोक स्मृतियों से अपनी रचनाओं के लिए बिंब, रूपक और शिल्प तलाशती हैं। उनकी कविताओं में प्रयुक्त शब्द एवं मर्म को यदि विश्लेषित किया जाए तो जुएं, नमक, तुलसी का झोला, दरवाजा, दूब-धान, ओढ़नी, चौका, रिश्ता जैसे शब्द वो सयास चुनती हैं। वे स्त्री भाषा और सौंदर्य का देशज विकल्प तलाशती हैं और स्त्रियों को हाशिए पर ढकेलने वाली भाषा की आलोचना प्रस्तुत करती हैं। वे हाशिए की अदृश्य स्त्री रचनाओं को नए सिरे से तलाश कर उसे साहित्य परंपरा में मूल्यवान योगदान के रूप में स्थापित करने का अह्वान करती हैं। स्त्रीवादी आलोचना लेखन की प्रक्रिया में अपनायी गई साहित्यिक विधाओं का सम्यक विश्लेषण करती हुए उनकी रुचियों के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ को तलाशने का प्रयास करती है। स्त्री-विमर्श को लेकर लेखिकाओं ने पिछले दो-तीन दशकों में स्त्री को समग्रता में बिना किसी प्रभा-मंडल के यथार्थवादी दृष्टि से देखा है। स्त्री विमर्श का लोकपक्ष, स्त्री विमर्श की उत्तरगाथा, स्त्रीत्व का मानचित्र, स्त्री मुक्ति की सामाजिकी, स्त्री मुक्ति साझा चूल्हा, स्वाधीनता का स्त्री पक्ष, मन मांझने की जरुरत, पानी जो पत्थर पीता है, उपनिवेश में स्त्री, अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य, कहानी का स्त्री समय, चूकते नहीं सवाल, 'स्त्री लेखन : स्वप्न एवं संकल्प', आलोचना का स्त्री पक्ष, नारीवादी निगाह से जैसी महत्वपूर्ण वैचारिक रचनाओं में लेखिकाओं ने समाज एवं साहित्य में स्त्री मुक्ति के विमर्श को स्थानीयता प्रदान की है। 'टोकरी में दिगंत' में स्त्री मुक्ति का बौद्धकालीन परिदृश्य प्रस्तुत करते हुए अपना लोकेल निर्मित करता है। साथ ही, इस धारणा का खंडन भी करता है की भारत में स्त्रीवाद पश्चिमी चिंतन परंपरा से आयातित है। थेरियों की कविताएँ के अनुभवों से भरतीय स्त्री विमर्श के आदिकाल का इतिहास एवं वितान बनता है। स्त्रीवाद की सैद्धांतिक प्रस्थापनाओं को मुखरता से प्रस्तुत करने में उर्वशी बुटालिया एवं रितु मेनन द्वारा 1984 में संचालित भारत के प्रथम स्त्रीवादी प्रकाशन काली फॉर वुमेन ने ऐतिहासिक भूमिका अदा की। इसने हमें 'द हिस्ट्री ऑफ डूइंग', 'स्टेइंग अलाइव', 'रीकास्टिंग वुमेन : एसेज इन कोलोनियल हिस्ट्री' जैसी यादगार पुस्तकें प्रदान कीं। 2003 में ज़ुबान बुक्स की शुरुआत हुई जिसने स्त्रीवादी लेखन की परंपरा को और समृद्ध किया एवं स्त्री साहित्य की गुणवत्तापूर्ण धारा निर्मित की।
हिंदी साहित्य में स्त्रीवादी आलोचना की स्थिति उस स्त्री की तरह थी जो अभी पुरुष की कद-काठी के अनुरूप बनाए गए मंचों की ऊंचाई से ही जूझ रही थी, जहाँ खड़े होने के बाद वह बमुश्किल ही दर्शकों को नज़र आती थी। अदृश्य रहने की पीड़ा एवं वृहत्तर समुदाय को संबोधित करने वाले भाषा-शिल्प को बुनती स्त्री अभिव्यक्ति रेशम के तारों की झीनी-झीनी बुनावट नहीं थी जिससे सब आर-पार दिख जाए, बल्कि रुखड़े खद्दर की कसी हुई बुनावट थी जिसका हर सूत ऊबड़-खाबड़ था। उसके पार देखने के लिए उसे छूना, महसूस करना और हर बुनावट को बारीक नज़रों से देखना जरूरी था। 20वीं सदी का स्त्री लेखन महाकाव्यात्मक भाषा का अस्वीकार था। स्त्रियों ने छोटे निबंध, कविताएं और कहानियाँ लिखीं। यह स्त्री जीवन का लेखा-जोखा था, जिसमें कुछ भी बनावटी नहीं था। एक सरल, सहज प्रवाह था। अपने जीवन अनुभवों की बात थी जो दूसरों के लिए लिखी जानी थी। आलोचना के क्षेत्र में उनकी इन्हीं रचनाओं का मूल्यांकन किया गया। यह भाषा यदि उसी भाव से पढ़ी जाती तो शायद अभिव्यक्ति की इस शैली को सराहा जाता । पुरुषवादी दृष्टि के अनुसार, स्त्री लेखन में शास्त्रीय अभिव्यंजना शैली, पांडित्यपूर्ण प्रवचन और शब्दाडंबर का नितांत अभाव था जो उसके लेखन को रचना के स्तर पर एकांगी और स्तरहीन बनाता था। हिंदी साहित्य में भाषागत, क्षेत्रगत, विचारधारात्मक भिन्नताओं को तो स्वीकार किया परंतु अस्मितामूलक पाठों को विभाजनकारी मानते हुए हमेशा इसके नकार की भावना रही। इस प्रवृति के कारण स्त्री लेखन के मूल्यांकन की कोई समृद्ध परंपरा नहीं बन पाई । आत्मकथा लेखन की प्रक्रिया में लेखिकाएं घटनाओं के चयन के दौरान जिन अंतर्द्वंद्वों से गुजरती हैं, इसकी विवेचना किया जाना भी प्रासंगिक है। आत्मकथा, कविता और कहानी की विधा को स्त्रियों ने सर्वाधिक अपनाया। संभवतः वह इन विधाओं में अधिक सहज थीं । स्त्री जीवन में ऐसा बहुत कुछ है जो अव्यक्त है पर उसे कहा जाना इतना असान भी नहीं । रचनाओं में सत्ता, शक्ति, यौनिकता तथा लैंगिक अवस्थिति का संतुलन स्त्री लेखन को प्रभावित करता रहा है। जो लेखिकाएं इनसे प्रभावित हुए बिना स्त्री भाषा में लिख पाईं उन्होंने पाठकों की अंतश्चेतना को प्रभावित किया। स्त्री लेखन के प्रति पुरुषों की चुप्पी ने स्त्री-आलोचना के दायित्व और आवश्यकता को और तीव्र किया। सावित्री सिन्हा, निर्मला जैन, गिरीश रस्तोगी के रूप में हिंदी साहित्य को उस समय स्त्री-आलोचक मिलीं जिस समय डॉ नगेंद्र, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह अपने-अपने ढंग से साहित्य संस्कृति, सौंदर्यशास्त्र और समीक्षा सिद्धांतों पर बहस कर रहे थे। लेकिन दुर्भाग्यवश ये तीनों स्त्री आलोचकों ने भाषा, कथ्य और शिल्प के स्तर पर तो रचनाओं का विश्लेषण किया पर जेंडर की सामाजिक- सांस्कृतिक संरचना को व्याख्यायित कर पाने में विफल रहीं। लैंगिक पहचान लेखन को किस प्रकर विशिष्ट बनाती है, इसे स्पष्ट करने में भी उन्हें कठिनाई हुई। इन्हें साहित्य की स्त्री आलोचक तो कहा जा सकता है पर स्त्रीवादी आलोचक कहना उचित नहीं होगा।
उन्होंने अपने लेखन में इस बात पर जोर दिया कि स्त्रियों को रचनाओं में सिर्फ प्रतीकात्मक रूप से शामिल न किया जाए बल्कि साहित्यिक परंपरा की लेखन प्रक्रिया में उनके आलोचनात्मक बौद्धिक हस्तक्षेप को अधिक समग्रता के साथ स्वीकार किया जाए । इन सभी की सीमा यह रही कि ये साहित्य की परंपरागत विधा में रहते हुए ही आलोचना की संभावना को तलाश रही थीं इसलिए आलोचना के तयशुदा पुरुषवादी मानकों के खांचे में रहकर ही इन्होंने आलोचना कर्म किया। आलोचना के क्षेत्र में आज भी स्त्री आलोचकों की संख्या न्यूनतम है। स्त्री सैद्धांतिकी के साथ आज भी हिंदी के साहित्य जगत में कोई ऐसी समीक्षक, आलोचक नहीं है जिसका बेझिझक उल्लेख किया जा सके। वह कविता, कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, जीवनी आदि का काम तो प्रचुर मात्रा में कर रही हैं पर आलोचना की वैचारिकी को स्थापित करने में पिछड़ रही है। इसके बावजूद की लेखन के क्षेत्र में स्त्रियों ने अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया, वे आलोचक के रूप में अपने रचनात्मक साहित्य का मूल्यांकन स्वयं नहीं कर पाईं, यह विचारणीय प्रश्न है। हिंदी साहित्य में आलोचना की विधा आज भी निर्विवाद रूप से पुरुषों को संबोधित है। आलोचना के क्षेत्र में जिन स्त्रियों ने योगदान दिया उनके साथ भी समस्या यह रही कि उन्होंने जिन पैमानों पर साहित्य लेखन का मूल्यांकन एवं पुनर्पाठ किया वे भी साहित्य के मानक थे। भाषा, शिल्प, कथ्य, सामाजिक संरचनाओं की समझ, सौंदर्य दृष्टि एवं रचनाओं के पात्रों के साथ संवाद की प्रक्रिया पर बात करते समय उन्होंने कमोवेश सरलीकृत तरीके से पितृसत्तात्मक व्यवस्था एवं स्त्री-पुरुष संबंधों को व्याख्यायित किया। सिर्फ इतना जोड़ देना पर्याप्त नहीं था कि अमुक लेखक की दृष्टि पुरुषवादी है अथवा इतिहास लेखन स्त्री रचनाकारों के प्रति कितना पूर्वाग्रही रहा है। आलोचना के लिए स्त्रीवाद के सैद्धांतिक प्रस्थान बिंदुओं की पहचान न कर पाने के कारण जेंडर की सामाजिक- सांस्कृतिक संरचना, श्रम का लैंगिक विभाजन, स्त्री यौनिकता के प्रति समाज का दृष्टिकोण, इतर लैंगिकता के प्रश्न, पुरुष दृष्टि के मनोवैज्ञानिक आधार, विकास प्रक्रियाओं में स्त्रियों का बहिष्करण, जाति-वर्ग एवं धर्म का स्त्रीवादी सिद्धांत, इतिहास लेखन की दोहरी दृष्टि, साम्प्रदायिकता का स्त्रीवादी पक्ष, भारत में महिला आंदोलनों का इतिहास एवं विकास तथा एक अकादमिक ज्ञानानुशासन के रूप में स्त्री अध्ययन का प्रारम्भ,भारत में दबे पांव प्रवेश कर चुकी भूमंडलीकरण, उदारीकरण तथा निजीकरण की नीतियों के कारण घर-गृहस्थी के ताने-बाने पर पड़ रहे दुष्प्रभाव, पति-पत्नी संबंधों में आ रहे अलगाव एवं स्त्री को सुपर वुमन में तब्दील कर देने की बाजार एवं पितृसत्ता के गठजोड़ की ड्यूअल सिस्टम थ्योरी की पहचान न कर पाने के कारण सैद्धांतिक तौर पर वे उसे रचनात्मक लेखन या आलोचना में शामिल कर पाने में विफल रहीं जिसका परिणाम रहा कि स्त्रीवादी आलोचना जिस तेवर और ठोस सैद्धांतिक समझ के साथ होनी चाहिए थी, उसका सर्वथा अभाव ही रहा। हिंदी साहित्य से जुड़ी लगभग सभी स्त्री आलोचकों की यह सीमा रही।
अस्सी के दशक के प्रारम्भ में भारत में भिन्नता के स्वर (Voice of deference) के रूप में स्त्रीवादी विमर्श में शर्मीला रेगे के बौद्धिक नेतृत्व में दलित स्त्रीवाद की अनुगूँज सुनाई देती है जो यह दावा पेश करती है कि दलित स्त्रियों के जीवनानुभव सवर्ण स्त्रियों से भिन्न हैं जिसे अब तक रेखांकित नहीं किया गया। उन्हें अपनी अभिव्यक्ति स्वयं करनी होगी। इस दौर में सामाजिक विमर्श में विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच अन्तर्विरोध को विश्लेषणात्मक ढाँचे के रूप में उभरता हुआ देखा गया। यह वही दौर है जब जाति, जेंडर और सामप्रदायिकता के आधार पर उत्पीड़न, वर्चस्व और भेदभाव की राजनीति को नए ढंग से समझने के प्रयास शुरू हुए। हिन्दी साहित्य के इतिहास में दलित एवं आदिवासियों स्त्रियों के अमूल्य योगदान पर एक चुप्पी छाई हुई थी। उस दौर में दलित स्त्री आत्मकथाओं, कविताओं एवं कहानियों की लेखिका के रूप में विमल थोरात, सुशीला टाकभोरे, सुमन राजे, बेबी तावले, अनीता भारती, रोज केरकेट्टा, उर्मिला पवार, रजनी तिलक, कौशल्या बैसंत्री ने प्रामाणिक लेखन किया। इसका परिणाम था कि शिकंजे का दर्द, आयदान, दोहरा अभिशाप, हिंदी दलित साहित्य में स्त्री चित्रण व पितृसत्ता, हिंदी दलित आत्मकथाएँ, दलित साहित्य का स्त्रीवादी स्वर,पदचाप, एक थी कोटेवाली, जीवन हमारा, माझ्या जालमाची चित्तरकाथा, समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध जैसी महत्वपूर्ण रचनाएं हमारे सामने आईं। उन्होंने दलित स्त्रीवादी विमर्श के सरोकारों को व्यवस्थित तरीके से उठाया और हिंदी आलोचना के प्रतिमानों को नकार कर नए प्रतिमानों को गढ़ा। अपने अस्तित्व और श्रम के अवमूल्यन को महसूस करते हुए दलित स्त्रियों ने साहित्य में अपनी उपस्थिति और स्थान के लिए संघर्ष करना शुरू किया। उन्होंने समाज और साहित्य में अपना स्थान निर्धारित करने के लिए आंदोलन किया। वे लेखन के माध्यम से अपने मुद्दों को साहित्य के केन्द्र में लाईं और सवर्ण स्त्री और पुरुष लेखन के साथ-साथ सामान्य दलित लेखन का भी जोरदार और क्रांतिकारी प्रतिकार प्रस्तुत किया। दलित स्त्री के लेखन में सत्य और प्रामाणिक अनुभवों की गूंज सुनाई देती है। स्त्री आलोचना के लिए यह आवश्यक है कि उनके आत्मकथ्य खोजे जाएँ, पुरानी रचनाओं का पुनर्पाठ किया जाए। स्त्री के आत्मकथ्य का विश्लेषण उसके समाज, समुदाय, पीड़ा, चोट, लिंग-भेद के अनुभव मनोसामाजिकी और भाषा भंगिमाओं को सामने लाने में मदद करता है । यह स्त्रीवादी आलोचना की परंपरा में नए ज्ञानानुभव का विस्तार है। एक सदी की यात्रा करते हुए स्त्रीवादी आलोचना ने साहित्य के क्षेत्र में एक लम्बा सफर तय किया है जिसे मंजिल मिलना अभी शेष है। निश्चित रूप से यह यात्रा दुर्गम रही। साहित्यिक परंपराओं की पुरुषवादी दुनिया में स्त्रियों के लिए अपना स्थान निर्मित करना आसान नहीं था परंतु स्त्री आलोचकों ने न सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई बल्कि आलोचना की स्त्री परंपरा के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया। यह नई रौशनी, नई आहट थी जिसने साहित्य आलोचना और लेखन परंपरा को समृद्ध किया।


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