विजय कुमार तिवारी का आलेख 'महात्मा गांधी के विचार और हमारी साबरमती आश्रम की यात्रा'

विजय कुमार तिवारी


महात्मा गांधी एक युग पुरुष थे। ऐसे व्यक्तित्व इस दुनिया में कम ही दिखाई पड़ते हैं जिन्होंने सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह की कसौटी पर खुद को कसते हुए लोगों से इसकी अपेक्षाएं की। गांधी ने अपने अहिंसा के हथियार से उस समय की महाशक्ति ब्रिटेन को पराभूत कर दिया। यह सब एक दिन में नहीं हुआ। इसमें समय लगा। लेकिन गांधी जी ही विजेता के तौर पर उभर कर सामने आए। यह दुखद है कि अहिंसा के पुजारी का अन्त हिंसा से हुआ। इस बात का उन्हें बोध था कि उनकी हत्या हो सकती है। इसी क्रम में उन्होंने लिखा "अगर कोई मेरी हत्या करे और मैं मुँह से हत्यारे के लिए प्रार्थना करते हुए तथा ईश्वर का नाम जपते हुए और हृदय-मन्दिर में उसकी जीती-जागती उपस्थिति का भान रखते हुए मरूँतो ही कहा जायेगा कि मुझमें बहादुरों की अहिंसा थी।" विजय कुमार तिवारी ने गांधी जी पर यह आलेख पहली बार में प्रकाशित करने के लिए भेजा था। तब मैंने उनसे वादा किया था कि उनका आलेख 30 जनवरी को प्रकाशित किया जाएगा। इसी बीच 6 जनवरी 2026 को उनके आकस्मिक निधन की सूचना प्राप्त हुई। उनका निधन पहली बार के लिए अपूरणीय क्षति है। आज गांधी जी की पुण्य तिथि है। उनकी स्मृति को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं विजय कुमार तिवारी का आलेख 'महात्मा गांधी के विचार और हमारी साबरमती आश्रम की यात्रा'।


महात्मा गांधी के विचार और हमारी साबरमती आश्रम की यात्रा

 

विजय कुमार तिवारी

 

 

दुनिया के तमाम मनीषियोंचिन्तकों से ले कर सर्वसाधारण तक को अपने-अपने तरीके से गांधी ने आकर्षित और प्रभावित किया है। मैं भी अछूता नहीं हूँ। शुरु में ही आगाह कर देना चाहता हूँ कि मेरी सामर्थ्य नहीं हैगांधी पर विशेष लिख सकूँ। गांधी जीवित इंसान के रुप में हमारे बीच नहीं है। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं और लोगों को मार्ग-दर्शन दे रहे हैं।


मेरी समस्या यह नहीं है कि तात्कालिक परिस्थितियों में उनके निर्णय कैसे थे और देश को हानि हुई या लाभ। मुझे उनके संघर्ष और हाड़-मांस के इंसान की क्षमता के बीच ताल-मेल बैठा कर चलने की इच्छा है। मेरे चिन्तन का आधार यही है कि मैं होता तो क्या उतना कर पाताजितना गांधी ने किया। इसलिये उनके प्रति मेरी श्रद्धा यथावत है।


28 फरवरी 2021 को हम साबरमती आश्रम में थे। मौसम में थोड़ी गर्मी थी। लगा, आश्रम में वह जीवन्तता नहीं है, जैसा पढ़ा-सुना था। साबरमती के जल में कोई कमी नहीं है और वहाँ के पेड़-पौधे हरे-भरे हैं। लोगों की भीड़ भी है परन्तु, वहाँ गांधी नहीं हैं। हम गांधी से मिलने गये थे। बड़ी निराशा हुई।


गांधी को सजाया गया हैउनकी हर-एक वस्तु को समुचित ढंग से रखा गया है और कोशिश हुई है कि गांधी की सम्पूर्ण भौतिकता को प्रदर्शित किया जाय।  तब से ले कर आज तक की सभी सरकारों ने अपने-अपने हिसाब से गांधी को प्रदर्शित किया है। मुझे ऐसा भी महसूस हुआ कि अब वहाँ कोई गांधी का अनुयायी नहीं रहता। लोगों में विचित्र बेरुखी दिखी। यह भी हो सकता है कि उनके सच्चे सेवकों से मुझे मिलने का सुयोग नहीं बना हो। सभी सरकारी कर्मचारी हैं या गांधी के बारे में जानकारी रखने का दावा करने वाले और सरकार से मोटी रकम वसूलने वाले कतिपय लोग।


यह तो होना ही था। जब कोई व्यक्ति सामने ही अपनी विचारधाराओं के साथ समझौता करता है तो ऐसा ही होता है।  जब हम बातें कुछ और करते हैं और घटनायें कुछ और होने देते हैं तो इतिहास के यथार्थ मूल्यांकन के समय मामला उल्टा हो जाता है। हालांकि तत्कालीन पूरी व्यवस्था ने बहुत चालाकी से गांधी को अपने तरीके से प्रदर्शित किया। उनकी अपनी मजबूरियाँ और महत्वाकांक्षायें रही होंगी। इतिहासकारों ने भी बहुत घालमेल किया है।


गांधी बहुत विराट हैंबहुत बड़े हैं और उनका अवदान भी बड़ा है। आवश्यकता है नये सिरे से मूल्यांकन और इतिहास लेखन की। इसके खतरे भी हैं और चुनौतियाँ भी। मेरा पूर्ण विश्वास है कि इसके बाद भी गांधीगांधी ही हैं और रहेंगे। उनको वैसी ही श्रद्धाआदर-सम्मान मिलेगा जिसके हकदार हैं। हाँआरोपित चीजें सतह पर आ जायेंगी और आनी भी चाहिए। निश्चित ही गांधी निखर कर दुनिया के सामने आयेंगे। गाँधी इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि उन्होंने कुछ भी छिपाया नहीं है और अपने विचारों के विपरीत जो होने दियावह उनकी मानवीय मजबूरियाँकमजोरियाँ रही होंगीहालांकि देश को उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है और आज भी देश जुझ रहा है। मुझे किसी की वह पंक्ति अच्छी लगती है, "लमहों ने खता की हैसदियों ने सजा पाई।"


हम दोनों अपने बापू को खोजते हुए कमरे-दर-कमरे हजारों सूचनाओं की पट्टियों को पढ़ते रहेछाया-चित्रों को देखते रहे।


पुस्तक-विक्रय कक्ष से मैंने दो पुस्तकें खरीदी। पहली छोटी सी पुस्तिका है, "गांधी जी का जीवन उन्हीं के शब्दों में" इसके संग्राहक और संपादनकर्ता हैं, श्री कृष्ण कृपलानी। दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक है, "महात्मा गांधी के विचार" जिसके संकलन और संपादनकर्ता हैं, आर. के. प्रभु और यू. आर. राव। इस पुस्तक का प्राक्कथन आचार्य विनोबा भावे और डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लिखा है। हाल के दिनों में उन दोनों पुस्तकों को पढ़ा है और दावे से कह सकता हूँ कि गांधी जीवित हैं अपने विचारों में। "हरिजन" में 29/04/1933 को छपे उनके वक्तव्य को पढ़ कर मुझे उनके विराट व्यक्तित्व ही झलक मिली। पाठकों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने लिखा है-


"अपने अध्यवसायी पाठकों और उन अन्य लोगों से जिन्हें मेरे लिखे में रुचि हैमैं कह दूँ कि मुझे सुसंगत दिखाई देने की तनिक भी चिंता नहीं है। सत्य की अपनी खोज मेंमैं अनेक विचारों को त्यागता गया हूँ और नयी-नयी बातें सीखता रहा हूँ। हालांकि अब मैं बूढ़ा हो चला हूँ, पर मुझे यह अनुभव नहीं होता कि मेरा आंतरिक विकास रुक गया है अथवा मेरे पार्थिव शरीर के अवसान के साथ मेरी आंतरिक वृद्धि रुक जायेगी। मेरा सरोकार सिर्फ इस बात से है कि मैं अपने ईश्वर अर्थात् सत्य के आदेश का प्रतिक्षण पालन करने के लिए तत्पर रहूँ और इसलिए, यदि किसी को मेरी लिखी किन्हीं दो बातों में असंगति दिखाई दे और उसे फिर भी मेरी विवेकशीलता में विश्वास होतो उसे उसी विषय पर मेरी बाद की तारीख में लिखी बात को मेरा मन्तव्य मानना चाहिए।" 


उनकी साफगोई से स्पष्ट है कि छोटा से छोटा और बड़ा से बड़ा, हर व्यक्ति के जीवन में उसकी सक्रियता के आधार पर वाह्य और आंतरिक विकास होता रहता है। गांधी अपनी आंतरिक विकास यात्रा को समझते और अनुभव करते थे। यह तो हम सभी अनुभव करते ही हैं कि कल जिन बातों को सत्य मानते थेआज के अनुभव और ज्ञान से उन बातों की सत्यता बदल  चुकी होती है। हाँइस बदलाव को स्वीकार करने का साहस बड़ी बात है। गांधी में वह साहस दिखता है और उन्होंने इसे स्वीकार किया है। उन्होंने दूसरी महत्वपूर्ण सनातन चेतना की ओर संकेत किया है कि पार्थिव शरीर के अवसान के बाद भी आंतरिक वृद्धि नहीं रुकती। मुझे लगता है कि उनका आशय आत्मा से है जो सदैव चैतन्यजाग्रत, और चिन्तनशील रहती है।



गांधी लिखते हैं "मुझे आत्मकथा कहाँ लिखनी है? मुझे तो आत्मकथा के बहाने सत्य के जो अनेक प्रयोग मैंने किये हैंउनकी कथा लिखनी है।" उन्होंने अपने जीवन में आध्यात्मिक प्रयोग किये तथा माना कि इससे उनकी राजनीतिक क्षेत्र की शक्ति जन्मी और अहंकार नहीं बल्कि नम्रता की वृद्धि हुई। उन्होंने लिखा, "ज्यों-ज्यों मैं विचार करता जाता हूँत्यों-त्यों अपनी अल्पता को मैं स्पष्ट देख सकता हूँ।"


यह सबके बस की बात नहीं होती कि वह अपनी कमजोरियों और अच्छाइयों को यथार्थतः समझ सके और सर्वसाधारण के सम्मुख रख सके। गांधी उन विरले लोगों में से एक हैं। वे लिखते हैं, "मुझे कहना चाहिए कि मैं अपनी स्त्री के प्रति विषयासक्त था।" उन्होंने अनेकों बार लिखा है कि मैं अपने आचरण के प्रति बहुत सजग रहता था। अपने अनुभवों के आधार पर कह सकता हूँ कि ऐसी सजगता किसी को भी महानता के मार्ग का राही बना सकती है। बचपन में उनको बहुत दुख हुआ जब वे किसी गलती के लिए दण्डित किये गये। गांधी उस दिन खूब रोये।


उनका मानना है कि मित्रता समान गुण वालों के बीच ही शोभती और निभती है। घनिष्ठ मित्रता अनिष्ट है क्योंकि मनुष्य गुणों की अपेक्षा दोषों को जल्दी ग्रहण करता है। गांधी कहते हैं कि जो आत्मा कीईश्वर की मित्रता चाहता है उसे एकाकी रहना चाहिए। उन्होंने स्वीकार किया कि घनिष्ठ मित्रता बढ़ाने का मेरा प्रयोग निष्फल रहा।


गांधी कहते हैं," मैं बहुत डरपोक था। चोरभूतसांप आदि के डर से घिरा रहता था।"  वे मांसाहार के हिमायती थे परन्तु माता-पिता के चलते मांस खाना छोड़ दिया। दोस्तों की संगति में वे वेश्याओं की बस्ती में गये परन्तु शर्म के चलते कुछ बोल नहीं पाये। वेश्या ने खरी-खोटी सुना कर बाहर का रास्ता दिखा दिया। गांधी ने लिखा, "जिसे ईश्वर बचाना चाहता है वह गिरने की इच्छा रखते हुए भी पवित्र रह सकता है।"


उनकी समस्या यह थी कि जितना वे स्त्री-प्रेमी पति थेवैसा ही वहमी पति भी थे और अक्सर कस्तूरबा को कष्ट पहुँचाते रहते थे। इसके लिए उन्होंने स्वयं को कभी माफ नहीं किया और मानते थे कि स्त्री सहनशीलता की मूर्ति होती है। गांधी ने लिखा है, "इस सन्देह की जड़ तो तभी कटीजब मुझे अहिंसा का सूक्ष्म ज्ञान हुआयानी जब मैंने ब्रह्मचर्य की महिमा को समझा और यह समझा कि पत्नी, पति की दासी नहीं, उसकी सहचारिणी हैसहधर्मिणी है।"


गांधी लिखते हैं, "एक चीज ने मन में गहरी जड़ जमा ली- यह संसार नीति पर टिका हुआ है। नीति मात्र का समावेश सत्य में है। सत्य को तो खोजना ही होगा।"


गांधी अस्पृश्यता को हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा कलंक मानते थे। यह स्थिति उन्होंने अपने घर में सफाई के लिए आने वाले भंगी के साथ देखी थी। उन्होंने मां से कहा कि उसको छूने से पाप नहीं होता।


गांधी ने विलायत जाने से पूर्व मां से कहा, "तू मेरा विश्वास नहीं करेगी। मैं तुझे धोखा नहीं दूँगा। सौगंध खा कर कहता हूँ कि मैं इन तीनों चीजों से बचूँगा।" मैंने मांसमदिरा तथा स्त्री-संग से दूर रहने की प्रतिज्ञा की। एक दिन मित्र ने बेन्थम के ग्रंथ से उपयोगितावाद का सिद्धान्त समझाया। गांधी ने मित्र से कहा, "मैं आपसे माफी चाहता हूँ। मैं ऐसी सूक्ष्म बातें समझ नहीं पाता। मैं स्वीकार करता हूँ कि मांस खाना चाहिएपर मैं अपनी प्रतिज्ञा का बंधन तोड़ नहीं सकता। उसके लिए मैं कोई दलील नहीं दे सकता।"


गांधी लिखते हैं, "मैं रोज दस-बारह मील चलता था- एक दिन मुझे "अन्नाहारी भोजनालय" दिखा। मैंने साल्ट की "अन्नाहारी हिमायत" पुस्तक खरीदी और विलायत आने के बाद पहली बार भरपेट भोजन किया। ईश्वर ने मेरी भूख मिटायी।"


पेरिस में प्रदर्शनीएफिल टावर और वहाँ के प्राचीन गिरजाघरों को देख कर गांधी ने लिखा, "मन में यह खयाल आया कि जिन्होंने लाखों रुपये खर्च कर के ऐसे स्वर्गीय मन्दिर बनवाये हैं उनके दिल की गहराई में ईश्वर-प्रेम तो रहा ही होगा।"


गांधी लिखते हैं कि निन्दा करने वालों में टाल्स्टाय मुख्य थे। उन्होंने लिखा था कि एफिल टावर मनुष्य की मूर्खता का चिन्ह हैउसके ज्ञान का परिणाम नहीं।


गांधी वैरिस्टर बन गये और भारत वापस आ गये। उन्हें दक्षिण अफ्रीका में पोरबन्दर की मेमन फर्म का मुकदमा लड़ने का आग्रह मिला। गांधी डरबन, नेटाल पहुँच गये। कुछ दिनों बाद वे डरबन से प्रिटोरिया के लिए रवाना हुए। रास्ते में प्रथम श्रेणी का टिकट होते हुए भी उन्हें सामान सहित जबरदस्ती उतार दिया गया। ठंड बहुत थी।  गांधी लिखते हैं, "मैंने अपने धर्म का विचार किया- या तो मुझे अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए या देश लौट जाना चाहिए; या अपमान सहते हुए मुझे प्रिटोरिया पहुँचना चाहिए और मुकदमा खत्म कर के देश लौटना चाहिए।यहां का महारोग है-रंग-द्वेष। मुझे इस रंग-द्वेष को मिटाने के लिए संघर्ष करना चाहिए। जो कष्ट मिले उसे सहना चाहिए और उनका विरोध रंग-द्वेष को मिटाने की दृष्टि से करना चाहिए।"


गांधी ने वहाँ के हिन्दुस्तानियों को एकत्र कियाउनकी वस्तुस्थिति का चित्र खींचा और लम्बा-चौड़ा भाषण दिया। उन्हें सत्य पर बोलना था। गांधी को अनेक बार सिपाही धक्का दे देते थे और लात मारते थे। उन्होंने प्रवासी भारतीयों के स्वाभिमान के लिएउनकी स्थिति में बदलाव के लिए चिन्तन करना शुरु किया। गांधी ने लिखा है, "प्रिटोरिया में मुझे जो एक वर्ष मिलावह मेरे जीवन का अमूल्य वर्ष था। सार्वजनिक काम करने की अपनी शक्ति का कुछ अंदाज मुझे यहाँ हुआ। मेरी धार्मिक भावना अपने आप तीव्र होने लगी।" गांधी आगे लिखते हैं, "गरीबों की सेवा करने की मेरी प्रबल इच्छा ने गरीबों के साथ मेरा सम्बन्ध हमेशाअनायास ही जोड़ दिया है और उनके साथ एकरूप होने की शक्ति मुझे प्रदान की है।"


गांधी कहते हैं, "दूसरों को अपमानित करके लोग अपने को सम्मानित कैसे समझ सकते हैंइस पहेली को मैं आज तक हल नहीं कर सका हूँ।" उन्होंने आगे लिखा, "ईश्वर की पहचान सेवा से ही होगीयह मान कर मैंने सेवा-धर्म स्वीकार किया। मैं तो यात्रा करनेकाठियावाड़ के षड्यन्त्रों से बचने और आजीविका खोजने के लिए दक्षिण अफ्रीका गया थापरन्तु पड़ गया ईश्वर की खोज में, आत्म-दर्शन के प्रयत्न में।"


गांधी सपरिवार नेटाल गये। उन्होंने पारसी लोगों की तरह कपड़े बनवाये और अपनी जीवन शैली में बदलाव किया। मोह-भंग होने पर पुनः उसका त्याग किया। वे लिखते हैं, "शुरु में जिस तरह ये परिवर्तन दुखदायक थेउसी तरह आदत पड़ जाने के बाद उनका त्याग भी कष्टप्रद था। परआज सभ्यता की केंचुल उतार कर हम सब हल्के हो गये हैं।"


डरबन के गोरे नागरिक हमें उल्टे पैरों वापस भेजने के लिए आंदोलन कर रहे थे। उन्होंने हमें धमकाया, "अगर तुम वापस नहीं गये तो तुम्हें समुद्र में डुबो दिया जायेगा। लौट जाओगे तो लौटने का भाड़ा भी शायद मिल जाये।" गांधी यात्रियों के बीच खूब घूमे-फिरे और उन्हें धीरज बंधाया। अंततः सफलता मिली और यात्रियों को उतरने का आदेश दिया गया।


गांधी लिखते हैं, 'कुछ लड़कों ने मुझे पहचान लिया और "गांधी-गांधी" चिल्लाने लगे। भीड़ एकत्र होने लगी। मुझ पर कंकड़ों और सड़े अण्डों की वर्षा हुई। किसी ने मेरी पगड़ी उछाल कर फेंक दी। मुझे गश आ गया। मुझ पर तमाचे पड़ने लगे। मैंने पास के घर की जाली पकड़ ली और दम लिया। पुलिस अधिकारी की पत्नी वहाँ से गुजर रही थी। वह मुझे पहचानती थी। बगल में आ कर खड़ी हो गयी। धूप से बचाने के लिए उसने अपनी छतरी खोल दी।"


उस समय के उपनिवेश-मन्त्री मि. चेम्बरलेन ने नेटाल सरकार को सूचित किया कि हमला करने वालों पर मुकदमा चलाया जाय और मुझे न्याय दिलाया जाय।


गांधी ने मि. एस्कम्ब से कहा, "मुझे किसी पर मुकदमा नहीं चलाना है। उन्हें सजा दिलाने से मुझे क्या लाभ होगा? मैं हमला करने वालों को दोषी भी नहीं मानता। दोष तो बड़ों कामुझे कहने की इजाजत दें तो आपका माना जाना चाहिए। आप लोगों को सही रास्ता दिखा सकते थे। जब वस्तुस्थिति प्रकट होगी और लोगों को पता चलेगातो वे अपने व्यवहार के लिए खुद पछतायेंगे।"


समाचारपत्रों ने गांधी को निर्दोष माना और मुकदमा दायर न करने के कारण बहुत असर पड़ागोरे शर्मिन्दा हुए। इससे भारतीय समाज की प्रतिष्ठा बढ़ी और गांधी का मार्ग सरल हो गया।


गांधी सेवा-भाव से एक छोटे से अस्पताल में काम करने लगे। इस काम से उन्हें दुखी हिन्दुस्तानियों के सम्पर्क में आने का अवसर मिला। यह अनुभव भविष्य में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। गांधी बताते हैं, "अन्तिम शिशु के प्रसव के समय का सारा काम मुझे अपने हाथों करना पड़ा।"


दक्षिण अफ्रीका में कस्तूर बा के साथ गांधी जी



गांधी मानते थे कि माता-पिता को बच्चों के पालन-पोषण के लिए बाल-संगोपन का ज्ञान होना चाहिए। यह भ्रम फैला है कि पहले पाँच वर्षों में बालक को शिक्षा प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है। सच तो यह है कि पहले पाँच वर्षों में बालक को जो मिलता है वह बाद में कभी नहीं मिलता।


गांधी लिखते हैं, "समझदार दम्पति इन बातों पर विचार करेंगेवे पति-पत्नी के संग को कभी विषय-वासना की तृप्ति का साधन नहीं बनायेंगेबल्कि जब सन्तान की इच्छा होगी तभी सहवास करेंगे। रति सुख एक स्वतन्त्र वस्तु है। इस धारणा में मुझे घोर अज्ञान ही दिखाई पड़ता है। जनन क्रिया पर संसार के अस्तित्व का आधार है। संसार ईश्वर की लीला भूमि हैउसकी महिमा का प्रतिबिम्ब है। उसकी सुव्यवस्थित वृद्धि के लिए ही रति क्रिया का निर्माण हुआ है। इस बात को समझने वाला मनुष्य विषय-वासना को महाप्रयत्न करके अंकुश में रखेगा और रति सुख के परिणामस्वरूप होने वाली संतति की शारीरिकमानसिक और आध्यात्मिक रक्षा के लिए जिस ज्ञान की प्राप्ति आवश्यक होउसे प्राप्त कर केउसका लाभ अपनी सन्तान को देगा।"


गांधी लिखते हैं, "अच्छी तरह चर्चा करने और गहराई से सोचने के बाद सन 1906 में मैंने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया। व्रत लेने के दिन मैंने पत्नी से सलाह ली। उसकी ओर से मेरा कोई विरोध नहीं हुआ।"


गांधी ने विस्तार से इस सम्बन्ध में अपनी आत्मकथा में लिखा है। उन्होंने लिखा कि ब्रह्मचर्य का पालन करना हो तो स्वादेन्द्रिय पर प्रभुत्व प्राप्त करना ही चाहिए। मैंने स्वयं यह अनुभव किया है कि यदि स्वाद को जीत लिया जायतो ब्रह्मचर्य का पालन बहुत सरल हो जाता है। भोग भोगना मैंने शुरु तो कियापरन्तु वह टिक नहीं सका। घर के लिए साज-सामान भी बसायापर मेरे मन में उसके प्रति कभी मोह उत्पन्न नहीं हो सका। इसलिए घर बसाते ही मैंने खर्च कम करना शुरु कर दिया।


जिस तरह मैं धोबी की गुलामी से छूटाउसी तरह नाई की गुलामी से छूटने का अवसर आ गया। प्रिटोरिया में अंग्रेज हज्जाम ने मेरी हजामत बनाने से तिरस्कार करते हुए, साफ इनकार कर दिया। मुझे दुख हुआ। मैंने हजामत बनाने वाला सारा सामान खरीदा और स्वयं हजामत बनाने लगा। बाल जैसे-तैसे कट तो गयेपर पीछे के बाल काटने में बड़ी कठिनाई हुई। कचहरी में खूब कहकहे लगे, "तुम्हारे बाल ऐसे कैसे हो गये हैं? सिर पर चूहे तो नहीं चढ़ गये थे?"


गांधी बोअर-युद्ध की चर्चा में लिखते हैं कि उनकी सहानुभूति बोअरों के साथ थी, परन्तु ब्रिटिश राज्य के प्रति मेरी वफादारी मुझे उस युद्ध में सम्मिलित होने के लिए घसीट ले गयी। अतएव जितने साथी मिलेउतनों को ले कर और अनेक कठिनाइयाँ सह कर हमने घायलों की सेवा-सुश्रूषा करने वाली एक टुकड़ी खड़ी की। मैंने सीखासत्य एक विशाल वृक्ष है। ज्यों-ज्यों उसकी सेवा की जाती हैत्यों-त्यों उसमें से अनेक फल पैदा होते दिखाई देते हैं।


गाँधी लिखते हैं, "मनुष्य और उसका काम - ये दो भिन्न वस्तुएं हैं। अच्छे काम के प्रति आदर और बुरे काम के प्रति तिरस्कार होना ही चाहिए। भले-बुरे काम करने वालों के प्रति सदा आदर  अथवा दया रखनी चाहिए।"


गांधी कहते हैं कि समाचारपत्र केवल सेवा-भाव से ही चलाने चाहिए। समाचारपत्र एक जबरदस्त शक्ति हैकिन्तु जिस प्रकार निरंकुश पानी का प्रवाह गाँव के गाँव डुबो देता हैफसल को नष्ट कर देता है उसी प्रकार कलम का निरंकुश प्रवाह भी नाश की सृष्टि करता है। यदि ऐसा अंकुश बाहर से आता है तो वह निरंकुशता से भी अधिक विषैला सिद्ध होता है। अंकुश तो अन्दर का ही लाभदायक हो सकता है।


गांधी के विचारों से सहमत होते हुए कहना है कि आज भारत में मीडिया ने अति मचा दी है। आज की मीडिया को न मानवता से मतलब है और न राष्ट्रीयता से। देश से बाहर की शक्तियाँ लोगों को भ्रमित करने में लगी हैं और देश को तोड़ना ही उनका लक्ष्य है। गांधी की बातों के आलोक में हमें सजग और सावधान होना चाहिए।




गांधी लिखते हैं, "मेरा यह विश्वास है कि जो चीज मेरे अन्दर गहराई में छिपी पड़ी थीरस्किन के ग्रंथरत्न में मैंने उसका स्पष्ट प्रतिबिम्ब देखा। जिसने मेरे जीवन में तत्काल महत्व के रचनात्मक परिवर्तन करायेवह रस्किन की पुस्तक "अण्टु दिस लास्ट" ही कही जा सकती है।"


जुलू-विद्रोह के घायलों की सेवा के लिए गांधी गये तो वहाँ के डाक्टर ने उनका स्वागत किया और कहा, "गोरों में से कोई इन घायलों की सेवा-सुश्रूषा करने के लिए तैयार नहीं होता। मैं अकेलाकिस-किस की सेवा करूँ? इनके घाव सड़ रहे हैं। अब आप आये हैंइसे मैं इन निर्दोष लोगों पर ईश्वर की कृपा ही समझता हूँ।"


गांधी लिखते हैं, "मन-वचन-काया से ब्रह्मचर्य का पालन किस प्रकार होयह मेरी एक चिन्ता थी और सत्याग्रह के युद्ध के लिए अधिक से अधिक समय किस तरह बच सके और शुद्धि किस प्रकार हो, यह दूसरी चिन्ता थी। इन चिन्ताओं ने मुझे आहार में अधिक संयम और अधिक परिवर्तन करने के लिए प्रेरित किया। इसमें उपवास और अल्पाहार ने अधिक स्थान लिया। मैंने फलाहार आरम्भ किया। एकादशी आदि तिथियों को मैं निराहार उपवास अथवा एकाशन को अधिक महत्व देने लगा। प्रायश्चित का कोई निमित्त मिल जाता तो मैं उपवास कर डालता था।


गांधी कहते हैं, "मनुष्य को स्वाद के लिए नहीं,बल्कि शरीर के निर्वाह के लिए खाना चाहिए। जब प्रत्येक इन्द्रिय केवल शरीर के लिए और शरीर के द्वारा आत्मा के दर्शन के लिए ही काम करती हैतब उसके रस शून्यवत् हो जाते हैं और तभी यह कहा जा सकता हैवह स्वाभाविक रुप से बरतती है।" गांधी मानते हैं कि ऐसी स्वाभाविकता पाने के लिए शरीरों की आहुति देनी पड़ेवह भी कम ही है।


गांधी को जेल का पहला अनुभव 1908 में हुआ। कैदियों को सूर्यास्त से पहले पाँच बजे तक खा लेना होता था। हिन्दुस्तानी और हब्शी कैदियों को चाय या काॅफी नहीं दी जाती थी। नमक खाना हो तो अलग से लेना पड़ता था। गांधी ने महसूस किया कि ये सभी प्रतिबंध अच्छे ही हैं। उन्होंने जेल से छूटने के बाद अपने भोजन में तुरन्त परिवर्तन किया। भरसक चाय पीना बंद हो गया और शाम को जल्दी खाने की आदत डाल ली। गांधी कहते हैं," शरीर उपवास के साथ, मन का उपवास न हो तो उसकी परिणति दंभ में होती है और वह हानिकारक सिद्ध होता है।"


गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में टाल्स्टाय और फीनिक्स कालोनी आश्रम की स्थापना की। वहाँ यह नियम बनाया गया कि जो काम हम शिक्षक न करेंउस काम को बालकों से भी न कराया जाय और जिस काम में बालक लगे हों उसमें उनके साथ उसी काम को करने वाला एक शिक्षक हमेशा रहे। इसलिए बालकों ने जो सीखाउमंग के साथ सीखा। गांधी कहते हैं कि हर एक बालक को बहुत सी पुस्तकें देने की मैंने जरूरत नहीं समझी। मेरा खयाल है कि शिक्षक ही विद्यार्थी की पाठ्य पुस्तक है। शरीर की शिक्षा जिस प्रकार शारीरिक कसरत द्वारा दी जाती है और बुद्धि की शिक्षा बौद्धिक कसरत द्वाराउसी प्रकार आत्मा की शिक्षा आत्मिक कसरत द्वारा ही दी जा सकती है। आत्मा की कसरत शिक्षक के आचरण द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। मैं स्वयं झूठ बोलूँ और अपने शिष्यों को सच्चा बनाने का प्रयत्न करूँ तो वह व्यर्थ ही होगा। डरपोक शिक्षक शिष्यों को वीरता नहीं सीखा सकता। व्यभिचारी शिक्षक शिष्यों को संयम किस प्रकार सिखायेगा?


गांधी लिखते हैं कि एक बार मुझे जोहान्सबर्ग में रहते हुए दो व्यक्तियों के भयंकर नैतिक पतन के समाचार मिले। मैं तिलमिला उठा। उसी दिन फीनिक्स की गाड़ी पकड़ी।  मुझे लगा कि अपनी निगरानी में रहने वालों के पतन के लिए अभिभावक और शिक्षक भी न्यूनाधिक जिम्मेवार हैं। मैंने प्रायश्चितस्वरूप सात दिनों का उपवास और साढ़े चार महीने का एकाशन का व्रत लिया। लाभ यह हुआ कि वातावरण शुद्ध एवं पवित्र हो गया।


"वकालत के धंधे में भी कभी मैंने असत्य का प्रयोग नहीं किया, "गांधी ने लिखा और कहा, "सत्य के पुजारी को बहुत बार अंधेरे में टटोलना पड़ता है।" गांधी मानते हैं कि दक्षिण अफ्रीका में घायलों की मदद करने के लिए और हिन्दुस्तान में लड़ाई के मोर्चे पर जाने के लिए आदमियों की भरती कर के मैंने लड़ाई के उद्देश्य की मदद नहीं कीलेकिन ब्रिटिश साम्राज्य की मदद की थी। मनुष्य का जीवन कोई सीधी लकीर तो है नहीं,वह तो कर्तव्यों का एक समूह है। एक कर्तव्य दूसरे के विरूद्ध भी होता है और मनुष्य को किसी एक को पसंद करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। गांधी अहिंसा को जीवन में उतार पाने की गम्भीरता को समझते थे परन्तु कहते थे, "मेरी यह श्रद्धा दिनों दिन अधिक गहरी होती जा रही है कि अहिंसा के बिना जीवन जीने योग्य नहीं रहेगा।"


जीवन का संचालन अनेक शक्तियों के द्वारा होता है। मैं स्वयं युद्ध का विरोधी हूँ। मैं किसी भी जीव की हत्या का हिमायती नहीं हूँसभी प्राणियों का जीवन पवित्र है। लेकिन फसल को बचाने के लिए बंदरों पर हमला करने की सलाह देने से मैं नहीं झिझकता। मैं पूरी नम्रता और प्रायश्चित की भावना के साथ डरते और कांपते हुए बंदरों को चोट पहुँचाने के काम में शामिल होता हूँ।


गांधी लिखते हैं कि अहिंसा अत्यन्त गूढ़ ढंग से अपना काम करती है। मेरे लिए अहिंसा महज एक दार्शनिक सिद्धान्त ही नहीं है। यह तो मेरे जीवन का नियम हैइसके बिना मैं जी नहीं सकता। मैं जानता हूँ कि जाने-अनजाने कई बार इसके पालन में असफल रहता हूँ। अहिंसा बुद्धि का विषय नहीं है बल्कि हृदय का विषय है। सच्चा मार्ग-दर्शन तो परमात्मा की सतत प्रार्थना सेअतिशय नम्रता सेआत्म-त्याग से और हमेशा अपना बलिदान देने के लिए तैयार रहने से मिलता है। अहिंसा की साधना के लिए ऊँचे से ऊँचे प्रकार की निर्भयता और साहस की आवश्यकता है।


गांधी कहते हैं, "मेरे भीतर की ज्योति स्थिर और स्पष्ट है। अहिंसा और सत्य को छोड़ कर हमारे उद्धार का दूसरा कोई रास्ता नहीं है।" गांधी आगे कहते हैं, "मैं अगर किसी सद्गुण का दावा करता हूँ तो वह मेरी सत्यनिष्ठा और अहिंसा-परायणता ही है। मैं अपने में किसी दैवी शक्ति होने का दावा नहीं करता और न मुझे वैसी शक्ति की जरूरत है।" गांधी बताते हैं, "अपनी गलती को स्वीकार करना अच्छी बात है। उससे हृदय हल्का और साफ हो जाता है।" वे कहते हैं कि मेरा जीवन सार्वजनिक हो गया है और मेरा कुछ भी गुप्त नहीं है। सत्य से भिन्न कोई परमेश्वर हैऐसा मैंने कभी अनुभव नहीं किया। मन के विकारों को जीतनासंसार को शस्त्र युद्ध से जीतने की अपेक्षा अधिक कठिन लगता है। इसके लिए मुझे शून्यवत् बनना है। मनुष्य जब तक स्वेच्छा से अपने को सबके अन्त में नहीं रखतातब तक उसे मुक्ति नहीं मिलती। अहिंसा नम्रता की पराकाष्ठा है।


गांधी अद्भुत बात करते हैं, "दुनिया में किसी भी प्राणी से मैं द्वेष कर ही नहीं सकता। बरसों के प्रार्थनामय संयम और साधना के फलस्वरूप मैंने कोई 40 साल से किसी के प्रति द्वेष रखना छोड़ दिया है। मैं बुराई से द्वेष करता हूँ। मैं उस शासन-प्रणाली से नफरत करता हूँ जिसे अंग्रेजों ने भारतवर्ष में स्थापित किया है। भारत की जो बेतहाशा लूट हो रही हैउससे मैं नफरत करता हूँ। मैं हर तरह के प्रेमपूर्ण साधनों से ही उनका सुधार करना चाहता हूँ।" गांधी कहते हैं, "अहिंसा-धर्म का पंथ, प्रेम पंथ है। इस पंथ में आदमी को बहुत बार अकेले चलना पड़ता है।"


गांधी कहते हैं, "बीमारी से दुखित प्रियजनों को हम मारते नहीं हैं क्योंकि उनकी सेवा करने के साधन हमारे पास होते हैं और उन्हें समझ होती है। किन्तु, यदि सेवा संभव न  होजीने की आशा ही न होवे बेसुध हों और महादुख भोगते होंतो उनके प्राण-हरण में मैं लेशमात्र भी दोष नहीं देखूँगा।"


"जिस तरह रोगी के भले के लिए उसके शरीर की चीर-फाड़ करने में डाक्टर हिंसा नहीं करताबल्कि शुद्ध अहिंसा-धर्म का पालन करता है, उसी तरह रोगी को मारने में भी शुद्ध अहिंसा का पालन हो सकता है।"


"किसी को गाली देनाउसका बुरा चाहनाउसका ताड़न करनाउसे कष्ट पहुँचानासभी कुछ हिंसा है।"

 

गांधी कहते हैं, "हमें रोज ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे नाथ! असत्य का आचरण कर के जीने की अपेक्षा तू मुझे मौत ही दे देना।'


"मुझे यह कबूल कर लेना चाहिए कि मैं प्रतिक्षण हिंसा कर के ही अपना शरीर निभाता हूँइसी कारण शरीर के प्रति मेरा मोह क्षीण होता जाता है। प्रत्येक सांस लेने मे सूक्ष्म जन्तुओं की हिंसा करता हूँऐसा जानते हुए भी सांस को मैं रोक नहीं सकता। वनस्पति का आहार करने में भी मैं हिंसा करता हूँफिर भी मैं आहार का त्याग नहीं करता। मच्छरसांप आदि को मारने देता हूँ। यों, मेरी हिंसा का अन्त नहीं है। इतना ही कह सकता हूँ कि अहिंसादि महाव्रतों को पहचानने के लिए तथा उनका मन सेवचन से तथा शरीर से सम्पूर्ण पालन करने के लिए मैं सतत प्रयत्न कर रहा हूँ।"


गांधी ने लिखा है, "मैंने तय कर लिया कि मुझे समूची सम्पत्ति तथा सारे परिग्रहों का त्याग कर देना चाहिए। पहले-पहल इस त्याग की प्रगति धीमी थी। आज कह सकता हूँ कि अपनी सम्पूर्ण वस्तुओं का त्याग मेरे लिए हर्ष का विषय है। औरतब एक के बाद एकवे सारी वस्तुएं बहुत तेजी से मुझसे छूटती गई।"


"मैं अपने पापों को स्पष्ट से स्पष्ट रुप में स्वीकार कर चुका हूँ, लेकिन मैं हमेशा अपने कंधों पर उनका बोझ लादे नहीं फिरता। यदि मैं ईश्वर की ओर जा रहा हूँ और मुझे लगता है कि मैं उसकी ओर जा रहा हूँ, तो मैं सुरक्षित हूँ; क्योंकि मैं उसकी उपस्थिति के प्रखर प्रकाश का अनुभव करता हूँ।"


गांधी ने कहा है, "मेरा खयाल है कि मैं अहिंसक तरीके से जीने और मरने की कला जानता हूँ।"


गांधी कहते हैं कि सत्य और अहिंसा अनादि काल से चले आये हैं। मैंने उनका प्रयोग अपने जीवन में करने का प्रयास भर किया है। मैंने गलतियाँ की हैं और उन गलतियों से सीखा भी है। स्वभाव से मैं सत्यनिष्ठ तो था परन्तु अहिंसक नहीं था। वास्तव में सत्य की उपासना करते-करते ही मुझे अहिंसा मिली है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि सत्य से परे कोई धर्म नहीं है किन्तु शास्त्रों का यह भी कहना है कि "अहिंसा परमो धर्मः।"


"थोरो के रुप में आपने ही मुझे एक ऐसा गुरु दिया जिसके "सविनय अवज्ञा-भंग का कर्तव्य" नामक लेख से मुझे अपने उस कार्य के लिए समर्थन मिला जो मैं उन दिनों दक्षिण अफ्रीका में कर रहा था। ग्रेट ब्रिटेन ने मुझे रस्किन जैसा गुरु दिया जिसके "अण्टु दिस लास्ट" ग्रंथ ने मेरे विचारों में इतना परिवर्तन कर दिया कि मैं एक ही रात में बिल्कुल बदल गया। मैंने वकालत छोड़ीशहर में रहना छोड़ा और एक देहाती बन कर डरबन से दूर एक ऐसे फार्म में रहने लगा जो नजदीक के रेलवे स्टेशन से भी तीन मील दूर था। रुस ने टाल्स्टाय के रुप में वह गुरु दिया जिनसे मुझे अपनी अहिंसा का तर्कशुद्ध आधार मिला। उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया। मेरे नाम अपने पत्र में भविष्यवाणी की थी कि मैं एक ऐसे आंदोलन का नेतृत्व कर रहा हूँ जिसके द्वारा निश्चय ही दुनिया के पददलित लोगों को आशा का एक सन्देश प्राप्त होगा।"


गांधी जोर दे कर कहते हैं, "आश्रम में मैं चारों ओर स्त्रियों से घिरा हुआ सोता हूँ क्योंकि वे हर तरह से मेरे साथ अपने को सुरक्षित अनुभव करती हैं। सेगांव आश्रम में किसी तरह का एकान्त नहीं है। अगर मैं विषय-भोग की दृष्टि से स्त्रियों के प्रति आकर्षित हुआतो इस उम्र में भी मैं बहु-विवाह की हिमायत करने की हिम्मत रखता हूँ। मैं स्वतन्त्र प्रेम में विश्वास नहीं करता-भले ही वह गुप्त हो या खुला। स्वतन्त्रखुले प्रेम को मैंने कुत्ते का प्रेम माना है। गुप्त प्रेम में कायरता भी भरी रहती है।"


"मैं पूर्वजन्म और पुनर्जन्म को मानता हूँ। हमारे सारे सम्बन्ध पूर्वजन्मों के संस्कारों का फल होते हैं। ईश्वर का कानून अगम्य है, उसका कोई पार नहीं पा सकता।"


'जिस प्रकार मेरी सफलतायें और मेरी प्रतिभा ईश्वरदत्त वरदान हैं, उसी प्रकार मेरी अपूर्णतायें और असफलतायें भी ईश्वरदत्त वरदान हैं। मैं इन दोनों को ईश्वर के चरणों में अर्पण कर देता हूँ। जब लोगों ने देखा कि उन्हीं की जैसी कमजोरियों और खामियों वाला एक मानव अहिंसा की दिशा में आगे बढ़ रहा है तो उनमें भी अपनी शक्ति और क्षमता के बारे में विश्वास पैदा हुआ। अणु बम से हिरोशिमा के विनाश पर गांधी ने अपने आप से कहा, "अब यदि दुनिया अहिंसा को नहीं अपनाती तो उसका निश्चित परिणाम होगा-मानव-जाति की आत्महत्या।"


गांधी ने लिखा है, "मेरी इच्छा के विरुद्ध देश का बंटवारा हुआ है। उससे मुझे बड़ा आघात लगा है।"


"यह अग्नि-परीक्षा जितनी अधिक कठिन होती जाती है, उतना ही अधिक मैं ईश्वर के साथ निकट अनुसंधान अनुभव करता जाता हूँ और उतनी ही अधिक उसकी कृपा में मेरी गहरी श्रद्धा बढ़ती जाती है।"


"अगर कोई मेरी हत्या करे और मैं मुँह से हत्यारे के लिए प्रार्थना करते हुए तथा ईश्वर का नाम जपते हुए और हृदय-मन्दिर में उसकी जीती-जागती उपस्थिति का भान रखते हुए मरूँतो ही कहा जायेगा कि मुझमें बहादुरों की अहिंसा थी।"


"मेरा थोड़ा-थोड़ा अंश तुम सब में जीवित रहेगा। अगर तुम में से हर आदमी ध्येय को पहला स्थान और स्वयं को अंतिम स्थान दे, तो मेरे जाने से पैदा हुई रिक्तता बड़ी हद तक पूरी हो जायेगी।"


"मैं फिर से जन्म लेना नहीं चाहता। लेकिन अगर मेरा दूसरा जन्म हो तो मैं अछूत के रुप में पैदा होना चाहूँगा, ताकि उनके दुख-दर्दों में, उनकी मुसीबतों में और उनके अपमानों में हिस्सा ले सकूँ और स्वयं को, अछूतों को दयनीय स्थिति से मुक्त करने का प्रयत्न कर सकूँ।"

 


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