सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'ज्ञानरंजन : बेबाक मिजाज़ का जादू'

 

ज्ञानरंजन


साठोत्तरी कहानी के चार यारों में ज्ञानरंजन सबसे अलहदा कहानीकार के रूप में दिखाई पड़ते हैं। एक रचनाकार उनके व्यक्तित्व में आजीवन बना रहा। उनकी कहानियां बदलते हुए समय की दस्तावेज हैं। उनके लेखन के केन्द्र में वह मध्य वर्ग रहा जो समाज को एक नई दिशा प्रदान करता है। बदल रहे मूल्यों- रिश्तों के घनत्व, समय की बुनावट, जद्दोजहद और उनकी आंतरिक अनुभूतियों और बेचैनियों को उजगार करती है। परिवार के परिवेश के घनत्व से उत्पन्न ये कहानियां कई प्रकार के वृतान्तों तक यात्रा करती हैं। कथाकार और उनके मित्र दूध नाथ सिंह ने अपने एक संस्मरण में लिखा है - “दरअसल ज्ञानरंजन की सारी कहानियां एक ही कथा एक ही उपन्यास की छोटे-छोटे द्वीप हैं। दो कहानियों के बीच के अंतरालों को वृतांत की डोर से जोड़ दीजिए। तब एक छोटे से, खंड-खंड अखंड कथा संसार का रूप खड़ा हो जाएगा। एक मध्यवर्गीय उदास महोत्सव, जिसमें पिता, माँ, भाई, बहनें, प्रेमिकाएं, पत्नियां, सेक्स की भूखी औरतें, एक चाईं और चौकन्ना, मैं, और अराजक बिगड़ैल किंतु कमनीय दोस्तों का एक स्वर्णिम नरक, अत्यंत ठंडी, चमकदार और नव कवित्वपूर्ण गद्य-भाषा में वर्णित है।” हिन्दी साहित्य को उन्होंने 'पहल' जैसी अनूठी पत्रिका दी। पहल में छपना किसी भी कवि लेखक के लिए एक उपलब्धि की तरह होता था। आज ज्ञान जी के न रहने की खबर है। उनके देहावसान से हम हतप्रभ हैं। पहली बार की तरफ से उन्हें सादर नमन। सेवाराम जी ने उनके 87वें जन्म दिन पर एक आलेख लिखा था जो अभी तक अप्रकाशित था। आज पहली बार के पाठकों के लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'ज्ञानरंजन : बेबाक मिजाज़ का जादू'।


'ज्ञानरंजन : बेबाक मिजाज़ का जादू'


सेवाराम त्रिपाठी 


“बाहर एक बांसुरी सुनाई देती है

एक और बांसुरी है

जो तुम्हारे भीतर बजती है

और सुनाई नहीं देती

एक दिन वह चुप हो जाती है

तब सुनाई देता है उसका विलाप

उसके छेदों से गिरती है राख”

(मंगलेश डबराल)


ज्ञान जी टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं मिलते और न उनको टुकड़ों-टुकड़ों में जाना ही जा सकता है। उनका सब कुछ साफ़-साफ़ है लेकिन बहुत कुछ गुपचुप भी है और एक बेहद ठंडा चुपचाप भी रहा है। वे वाचालताओं के कोरस से बहुत दूर हैं लेकिन मस्ती और प्यार में होते हैं तो बोलते बहुत हैं। और कभी-कभी तो 'चकनाचूर स्टाइल' में भी हो जाया करते हैं। सोचिए हमेशा पीछे की पंक्ति में बैठने वाला आदमी कैसे रहता है आगे-आगे। ज्ञान जी खुद लहूलुहान होते हैं और अपनी उमड़न-घुमड़न में ही अक्सर पाए जाते हैं। एक चिरंतन द्वंद्व उनमें निरंतर पाया जाता है। कुछ खोजने की मुद्रा में और उससे निकले तत्वों से जुड़ने के लिए। यह सतत उत्खनन की प्रवृत्ति उनकी है। तथ्य यह है कि उनके ऑब्जर्वेशन निजी विशिष्ट हैं जिन्हें उनका तयशुदा संसार भी कहा जा सकता है, जो उनके लिए एकदम उत्पादक और ग्राह्य है, उसे वे छोड़ते नहीं। वे जितने सहज हैं उतने ही असहज भी हैं। वे होने और न होने के बीच भी हैं और उससे बाहर भी हैं। ज्ञानरंजन के एक साक्षात्कार का जिक्र कर रहा हूँ। कुछ तथाकथित भलेमानुष, कलावादी उसे उठाते और खोदते रहते हैं। उसी सिलसिले में ज्ञानरंजन जी ने एक पते की बात बताई है-'वैसे भी जिस तरह कला, विचार को आधा छुपाती है और आधा दिखाती है उसी तरह सूक्ष्म रूप से साहित्य में भी विचार रहता ही है। विचारधारा किसी लेखक को बड़ा नहीं बनाती। लेखक बड़ा और महान बनता है अपनी संवेदनाओं के कारण। विचारधारा तो बाद की बात होती है। जनवादी विचारधारा ने तो कुछ बड़े लेखकों को पैदा भी किया लेकिन पूंजीवादी विचारधारा एक भी बड़ा लेखक पैदा नहीं कर पाई।' (उपस्थिति का अर्थ - पृष्ठ - 182)


ज्ञान जी को मैं लगभग 1973 से जानता हूँ। मध्यप्रदेश में प्रगतिशील लेखक संघ के नवोन्मेष के पूर्व से। मेरी जानकारी में 'पहल' पत्रिका की पहली योजना सतना में बनी थी। इस पत्रिका की पहल ने अपने समय-समाज और राष्ट्र को ऊर्जा से ओतप्रोत कर दिया। यह हमारे महादेश की एक विशिष्ट आवाज़ की तरह उभरी थी। अपने प्रारंभिक दौर में पहल का रिश्ता कमला प्रसाद जी के साथ जुड़ा। जिसे अनुभव किया जाना चाहिए था। ज्ञानरंजन और कमला प्रसाद जी के संपादन में इसके कई अंक प्रकाशित हुए। दोनों की भूमिकाओं को किसी भी सूरत में अलग नहीं किया जा सकता।


ज्ञान जी की दुनिया कई तरह के उतार-चढ़ावों की दुनिया है। इसे उनके निर्माण की दुनिया भी कहा जा सकता है। इलाहाबाद से शुरू हुई यात्रा जबलपुर में विकसित और दुनिया के कोने-कोने तक सुगंध की तरह पहुंचती है। इसे इसी रूप में ट्रीट किया जाना चाहिए। ज्ञान जी द्वारा संपादित पालित पोषित 'पहल' ने एक अमिट पहचान बनाई है जिसकी गूंज देश तो क्या विदेशों तक में सुनाई देती है। 'पहल' की एक भूमिका और धाक भी रही है। 'पहल' की छाप और दस्तक 1973 से आज तक लगातार सुनी जा रही है। वह 125 अंकों के बाद फ़िलहाल स्थगित है। यह साहित्य की दुनिया में एक विशेष किस्म का अंदाजेबयां है। और एक ख़ास किस्म की संजीदगी के रूप में इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। खैर, ज्ञान जी में एक विशेष प्रकार की हेकड़ी भी है और बेबाकपन भी। उनके अपने व्यक्तित्व और संपादन प्रक्रिया का जादू भी है। कम लिख कर भी कोई इतनी ऊंचाई पा सकता है, यह आश्चर्यजनक भी और अन्यों के लिए ईर्ष्या का वायस भी हो सकता है। यह उनकी संपादन क्षमता का सक्षम उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। अपने सोच को अभिव्यक्त करने के लिए और अपने किरदार के लिए ज्ञान जी जब अपनी पर आ जाते हैं तो वो किसी का कोई लिहाज़ भी नहीं करते। किसी से भी ख़ौफनाक तरीके से टकरा सकते हैं। ज़िंदगी के उच्च रक्तचापों से जुड़ कर भी। उनके प्यार जताने का तरीका भी सामान्य नहीं है। उनके रिश्तों में एक अजीब गर्माहट और जीवनशैली में एक विशेष प्रकार की थरथराहट भी देखी जा सकती है। ताज़्जुब तो यह है कि कोई उसे सहज ही परिभाषित भी नहीं कर सकता। न कोई उसकी नाप-जोख ही तलाश सकता। उनकी परिभाषाएं स्वयं निर्मित-विकसित और ध्वनित होती हैं। वे मित्रों के मित्र हैं लेकिन ऐसे कारीगर भी हैं कि अपने मनोविज्ञान से बाहर किसी के उल्लघंन करते ही या उनको महसूस हो जाय तो भी वे मित्रता को पूरी तरह तोड़ते नहीं उसकी एक डोर हिलगाए रहते हैं और सब कुछ बिखरता हुआ निस्पृह भाव से देखते रहते हैं। शायद उन्हें कोई पीड़ा भी नहीं होती होगी। हाँ, एक विशेष किस्म की हलचल ज़रूर होती होगी। लेकिन इस संदर्भ में निश्चित रूप से कुछ कहा भी नहीं जा सकता? इसलिए कि उनके प्यार और निर्ममता को आप किसी भी सूरत में थाह नहीं सकते। केवल कुड़कुड़ा सकते हैं या भुनभुना सकते हैं चाहें तो उसे झुंझलाना भी कह सकते हैं। जिससे किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। उनके मन के गणित के सवालों को कोई जल्दी हल भी नहीं कर सकता। यही उनकी जीवन-शैली और कार्य-शैली है।


ज्ञान जी से जब पहली बार मिला था शायद 1973 में तब से मेरे मन में उनकी 'एक स्टार लेखक' की छवि रही है। क्रमशः वे स्टार संपादक के रूप में भी उभरे। अब भी वे स्टार ही हैं। वे स्टार संपादक भी हैं और स्टार विश्लेषक भी। स्टार मित्र भी और न जाने क्या-क्या उनका 'स्टारडम' है। इसी स्टार प्लस सुविधा में वे परम सुरक्षति और चमकदार भी रहते आए हैं। इसके लिए उन्होंने अपना एक अभेद्य दुर्ग भी बना लिया है। जिसका भेदन न तो किसी तरह सहज है और न ही शायद संभव।




प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशनों में सबसे पीछे की पंक्ति में बैठे रहने के बाद भी वे हमेशा अग्रिम पंक्ति में होते रहे हैं। उनके संचालन की यही विधि रही है। जब कि ज़्यादातर लोग मंच में चढ़ जाने को अपनी उपलब्धि मानते रहे हैं लेकिन उन्होंने कभी भी ऐसा नहीं किया। कम लिख कर भी उनकी धाक में कोई कमी नहीं आई। हर काम को सुगढ़ता के साथ अंजाम देने में वे कुशल कारीगर और सिद्धहस्त रहे हैं। उन्हें कोई भी चीज़ लचड़-पचड़ नहीं चाहिए। नही उनकी पसंदगी में ही है और न कोई ऐसी चीज़ उन्हें चाहिए। उन्हें हर हाल में चाहिए एकदम उम्दा।' पहल सम्मान ' और पहल के कार्यक्रम और पहल पत्रिका की तमाम परम जादुई योजनाएं इसका जीता जागता प्रमाण मानी जा सकती हैं। प्रलेस के तमाम कार्यक्रम भी इसी अंदाज़ में उन्होंने संपन्न किए हैं। पहल सम्मान समारोह भी। उनके द्वारा मुझे लिखी गई चिट्ठियां इसका प्रमाण हैं और उनकी चिंताओं के क्षितिज में दुनिया के बदलाव के अनेक आकाश भी रहे हैं। मैं उन्हें अच्छे कथाकार के रूप में मानता जानता हूँ । लेकिन कथाएं भले ही ठहर गईं।जिसकी ट्रेन 'आउटर पर' न जाने कब से रुकी हुई है । लगभग पच्चीस-तीस कहानियां लिख कर भी वे कहानीकार के रूप में 2023-24में भी पर्याप्त मात्रा में चर्चित हैं। उनकी कहानियां पढ़ते हुए आप कविता जैसा आनंद ले सकते हैं। उसकी रम्यता को भी अनुभव कर सकते हैं।कविता से वे किड़मिड़ा कर प्यार करने वालों लोगों में से रहे हैं। कविता के पारखी भी हैं।ज़ाहिर है कि उनकी कहानियों में कविता जैसा आस्वाद है। उनकी भाषा चमकदार, जीवंत और 'पुरलुत्फ' भी है। उनकी कहानियां बदलते हुए मध्य वर्ग पर फोकस करती हैं। बदल रहे मूल्यों- रिश्तों के घनत्व, समय की बुनावट, जद्दोजहद और उनकी आंतरिक अनुभूतियों और बेचैनियों को उजगार करती है। परिवार के परिवेश के घनत्व से उत्पन्न ये कहानियां कई प्रकार के वृतान्तों तक यात्रा करती हैं। कथाकर और उनके मित्र दूध नाथ सिंह ने अपने एक संस्मरण में लिखा है - “दरअसल ज्ञानरंजन की सारी कहानियां एक ही कथा एक ही उपन्यास की छोटे-छोटे द्वीप हैं। दो कहानियों के बीच के अंतरालों को वृतांत की डोर से जोड़ दीजिए ।तब एक छोटे से, खंड-खंड अखंड कथा संसार का रूप खड़ा हो जाएगा। एक मध्यवर्गीय उदास महोत्सव, जिसमें पिता, माँ, भाई, बहनें, प्रेमिकाएं, पत्नियां, सेक्स की भूखी औरतें, एक चाईं और चौकन्ना, मैं, और अराजक बिगड़ैल किंतु कमनीय दोस्तों का एक स्वर्णिम नरक, अत्यंत ठंडी, चमकदार और नव कवित्वपूर्ण गद्य - भाषा में वर्णित है।” (लौट आ ओ धार - पृष्ठ- 121) यह ज्ञान जी का आंतरिक संसार है। और उनके जीवन की स्थाई चीज़ भी।


सच तो यह है कि ज्ञान जी कथाकार के अलावा कई दूसरे फार्मों में पर्याप्त गतिशील और चलनशील भी रहे हैं। ज्ञान जी की खासियत यह भी है कि वे समय की गिरफ्त में होते हुए भी उससे बाहर निकल कर अपनी स्वाभाविक दुनिया सजा लेते हैं। एक आभामंडल उनका होता है जो उनके आसपास होता है। यहीं उनकी 'रहन' है। यह तटस्थता ही उन्हें विरल और उनके क़द को बड़ा बनाती है। उन्हें कोई भी बाज़ार प्रलोभन से आक्रांत नहीं कर सकता। जबकि हर जगह बाज़ार हमें ग्रसने को आतुर है। कितने लेखक कलाकार और संस्कृतिकर्मी इसमें फंस गए हैं। यहीं वो आह कर रहे हैं और यहीं वाह।


ज्ञान जी चाहे जितनी उड़ान में हों वे बार-बार अपने में और अपनी निर्मित दुनिया में लौटते हैं और किसी भी हालत में अपने मूल को कभी नहीं छोड़ते? यह मूल ही उन्हें ताक़त देता है। यही कारण है कि उनकी पर्याप्त साख भी है। ज्ञानरंजन जी अपना ख़ास आसन जमा कर एक विशेष किस्म की समाधि में भी होते हैं। ज्ञान जी की समाधि लीला विकट है। भालचंद जोशी की कविता के लिए ये पंक्तियां उन्होंने कभी उद्धृत की हैं -


"अभी भी सूर्य को बोया नहीं तो

तिनके भर भी जगह नहीं मिलेगी

चुरा के लाए सितारों के लिए”




उनमें जितना बड़ा तूफानी तापमान है उसी के बरक्स एक आनुपातिक ठंडापन भी है। सच है कि यह विपर्यय है लेकिन ज्ञान जी के यहाँ यह पर्याप्त पलता पुसता रहा है। इसे वे अपने आप की हरित क्रांति को छोटी-छोटी टिप्पणियों में उम्दा तरीके से सहेज देते हैं। लेकिन इसे हमें किसी भी 'उलटबांसी' में नहीं समझना चाहिए और न ही लेना चाहिए। आदमियों के बारे में, स्थितियों के बारे में उनके ऑब्जरवेशन बिल्कुल भिन्न किस्म के होते हैं। उनके भीतर निवास करने वाला व्यक्ति एक अवारागर्द शख्सियत का जीता जागता हुआ एक बैचेन बेलौस और ज़िंदा रूप है। जिसके अनंत तारे जगमगाते रहते हैं।सच कहूं उनके व्यक्तित्व में जहाँ एक ओर जबर्दस्त आकर्षण है वहीं दूसरी तरफ़ घने अंधेरे में पैठने का साहस भी है और साथ ही साथ मुश्किलों से लड़ने की अपार क्षमता भी। उनकी खूबी यह है कि या तो वे लिखेंगे या चुप्पी साध लेंगे। या तो रिश्तों की ऊष्मा में होंगे या बेतादाद ठंडेपन में। लेकिन ज़ाहिर है कि उनकी चुप्पी में भी एक बांकपन है या एक गहन आकर्षण है। ज्ञान जी सबके बावजूद सतत जागृत, संलग्न और कर्मठ हैं। उनकी विलक्षणता कथ्य में है और शिल्प-भाषा में भी। यही नहीं उनके व्यक्तित्व में भी एक बेधक और जबर्दस्त विलक्षणता है। वे अपनी रचनात्मकता से और दोस्ती से भी दूसरों को सम्मोहित करने में समर्थ हैं। उनके भीतर अर्थ की तमाम जादुई क्षमताएं नृत्य करती हैं। वे हर समय चौकस, संजीदा और उत्तेजक बने रहते हैं। उनका जीवन तूफानी स्मृतियों का अखंड वैभव है जिसे वे सहेजते रहते हैं और उनके मन के अनुकूल न हुआ था तो बड़ी आसानी से त्याग भी देते हैं। यही नहीं वहाँ एक विचित्र प्रकार की कृतज्ञता का ताना-बाना है। एक गहन आत्मपरीक्षण, एक जीवंत स्वप्न, एक लगातार जिरह, एक पुख्ता सोच-विचार भी है और भरपूर मंथन भी। उनके भीतर एक कुशल इंजीनियर की तरह बनाए गए नक्शे और डिजाइन भी हैं। उनमें लगातार असंतुष्टि की व्याप्ति है लेकिन एक आवारापन, बंजारापन और खिलंदड़ापन भी है। उनका समग्र जीवन अद्वितीयता, सर्वोच्चता, उत्कृष्टता और श्रेष्ठताओं की तलाश का भी है, जिसकी पहरेदारी उनके यहाँ लगातार है। वे निरंतर टकराने वाले, भिड़ने वाले और भिडंत चाहने वाले लोगों में से एक विशेष किस्म की स्पृहा से भी पहचाने जा सकते हैं। ज्ञान जी के बारे में इस तरह की आधी अधूरी टिप्पणियां मुझमें बजती रहती हैं। इन्हीं को यहाँ रख रहा हूँ।


मेरे और ज्ञान जी के रिश्ते कभी लेन देन के रिश्ते नहीं रहे हैं। उनमें लेना और पावना का संसार और चाहत भी नहीं रही। मेरी उनसे दोस्ती किसी के कारण नहीं हैऔर न किसी के कारण किसी तरह का भाव ही है। बस एक विचित्र प्रकार का रिश्ता है तो है। ज्ञान जी क्या सोचते और बांचते रहे हैं ये वे जाने। मेरी दुनिया 'सहज सुभाय छुआ छल नाहीं' के रूप में ही गुज़री है। मेरे और ज्ञान जी के बीच रिश्तों में पर्याप्त गर्मी भी है और पर्याप्त बर्फीला ठंडापन भी है। पिपरिया में जब पदस्थ था तो अक्सर शनिवार को उनके 763, अग्रवाल कॉलोनी, जबलपुर वाले घर में रुकता, उनसे खूब बातें करता, हरिशंकर परसाई के यहाँ जाता, लौटता तो खाना खा कर ऊपर के घर जहाँ हरि भटनागर रहते थे वहाँ बतियाता और सोता। सुबह ज्ञान जी मुझे मदन महल स्टेशन में ट्रेन पकड़ाते थे। यह उस दौर का एक अटूट नियम और हिस्सा भी था। वे स्मृतियां सघन हैं और अभी भी हैं। कोई उन्हें चाह कर भी धो- पोंछ नहीं सकता। मैंने कुछ किताबें उन तक भेजीं, कुछ हाथो-हाथ दीं किसी प्रतिक्रिया के लिए नहीं। कहीं छपाने के लिए भी नहीं दीं।केवल पढ़ने के लिए या देखने के लिए।वे पढ़ें न पढ़े, देख ज़रूर लें । क्योंकि ज्ञान जी का देखना भी विशेष किस्म का होता है। वह चितवन ही कुछ और है।


ज्ञान जी के लिए मैं वही सेवाराम हूँ किसी भी चाहना से परे। बिना लाग लपेट वाला। ज्ञान जी के प्रशंसकों की एक बहुत बड़ी दुनिया है।मैं बहुत 'टेलीफोनिक' भी नहीं हूँ। खैर, यह सही है कि ज्ञान जी को बिना स्टार हुए जीना पसंद नहीं है। उनका जीना अगड़म-बगड़म ढंग से जीना भी नहीं होता है। उनके व्यक्तित्व में एक अवारागर्द आदमी है तो एक सुरुचि संपन्न किस्म का अंतर्राग भी। उनकी आवारागर्दी में भी एक मस्ती और नफासत है। उनके निजी रंगमंच में बिना उनकी इच्छा के कोई सहज या असहज ढंग से प्रवेश कर ही नहीं सकता। वे यारों के यार हैं। कितने ऐसे हैं जो उन्हें वर्षो से ढूंढ रहे हैं लेकिन अभी तक लाइन में लगे हैं और ढूंढते चले जा रहे हैं। लेकिन उनकी जीवन पट्टिका में लिखा है कि' ढूंढते ही रह जाओगे? किसी भी सूरत में पाओगे नहीं। इन वर्षो में देखता रहा हूँ कि उन्होंने नई कहानियां तो प्रायः लिखी नहीं लेकिन उन्होंने अपनी कहानियां बनाईं हैं। ये धांसू कहानियां निष्ठा, समर्पण और मूल्यों का ज्योतिपुंज है। उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की कहानी बनाई और पत्रिका पहल की भी, पहल कार्यक्रम की और पहल सम्मानों की भी। वे जहाँ भी रहेंगे कहानियां बनाएंगे या उनकी कहानियां बनेगी ही। पत्रिका कैसे निकाली जाती है यह ज्ञान जी से सीखा जा सकता है। संपादन कैसे किया जाता है, यह भी उनसे सीखा जा सकता है। वे एक साथ कई तरह की भूमिकायें निभाते हैं, यानी 'आल इन वन’। पहल सम्मान की उनकी अद्भुत योजनायें रही हैं। उनके साथ काम करते अरसा हो गया। वे प्रगतिशील लेखक संघ में हों या नहीं हों, मेरे लिए कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वे कभी उस भूमिका से अलग नहीं हैं। प्रगतिशीलता एक ऐसा रसायन है जिसके बगैर वे 'साँस' भी नहीं ले सकते। उन जैसा निर्मम होना भी मुश्किल है। मैं जानता हूँ कि उनमें टूट फूट बहुत है लेकिन यह उनकी अपनी निगाह है। अपना किया धरा है। वे जितने प्यारे और संबद्ध हैं उतने ही संवेदनशील और निजी विशिष्ट भी हैं। निजता उनकी ज़िंदगी का खाका भी और उनकी दुनिया भी। निजता नहीं तो वो भी नहीं हैं। निजता के बिना वो जी ही नहीं सकते। लोगों को अपने घेरे में शामिल भी करते हैं लेकिन अपने रिज़र्वेशन के साथ। उनको ही पता है कि कौन निजी विशिष्ट है और कौन कितना अंतरंग। निजता ही उनकी 'तुरुप का पत्ता' है। वे ही तय करते हैं कि कब कितना खुलना है और कब कितना बंद होना है। किससे कैसे पेश होना है। हमारी पीढ़ी को वे कितना प्रभावित करते हैं और नई पीढ़ी के लिए कितने सेतु निर्मित करते हैं। ऐसे न जाने उन्होने कितने सेतु निर्मित किए हैं। समय ही फैसला करेगा कि आख़िर उनकी असली दुनिया क्या है। पहल के माध्यम से उन्होंने न जाने कितने पाठक बनाए और न जाने कितने लेखक। उनसे सहमत लोग हैं और असहमत लोग भी हैं। लेकिन वे सतत सावधान और चैतन्य आदमी हैं। वे जितने धरती में हैं उतने ही आकाश में भी। ज्ञान जी वरेण्य और मान्य लेखक हैं। वे सहमत असहमत के बीच एकदम निर्द्वंद्व हैं। विश्वास करिए कि वे कभी बूढ़े नहीं हो सकते क्योंकि, उनके भीतर एक नौजवान दाएं-बाएं यानी लेफ्ट राइट कर रहा है।उन्होंने न जाने कितनी चिट्ठियां लिखी हैं। हर कोई या उनके संपर्क में आया शख़्स उनकी चिट्ठियां चिपकाए सरपट दौड़ रहा है। साहित्य की दुनिया में उनका क़द बड़ा है और यही नहीं उनकी उपस्थिति का महत्व भी बहुत प्रभावी है। ऐसे अग्रज को सतासी वसंत पूरा करने पर हर्ष विभोर हूँ। उनका सातत्य एक लंबे अरसे तक मिले। यही कामना है।



सम्पर्क


मोबाइल : 7987921206

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही समग्र मूल्यांकन है ज्ञान जी की रचनाधर्मिता का। बेहद पठनीय लेख 🙏🙏

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  2. बहुत अच्छा लिखा ज्ञान जी के बारे में। उनको नमन 🙏

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