ज्ञानरंजन की कहानी 'मृत्यु'

ज्ञानरंजन 


मृत्यु को अन्तिम सत्य माना जाता है। वैसे जीवन का सत्य उससे भी बढ़ कर है। जहां जीवन है, वहीं मृत्यु है। जो जड़ है उसका मृत्यु से भला क्या लेना देना। मनुष्य के लिए यह शुरू से ही रहस्य का विषय रहा है। लेखक और कवि भी मृत्यु पर अपनी लेखनी चलाते रहे हैं। ज्ञानरंजन अपनी कहानियों में जीवन की तलाश करते दिखाई पड़ते हैं। इसी क्रम में वे तहकीकात करते हुए वहां पहुंच जाते हैं जो औरों की नजर से प्रायः ओझल रहता है। मनुष्य जीवन की जद्दोजहद के क्रम में आजीविका के लिए जूझता रहता है। सच कहा जाए तो यह जूझना ही जीवन बन जाता है। ज्ञानरंजन की कहानी मृत्यु पढ़ते हुए मुझे सहसा प्रेमचंद की कहानी 'पूष की रात' की याद आई। हालांकि दोनों कहानियों के सन्दर्भ बिल्कुल अलग-अलग हैं। साम बहादुर जीवन की जद्दोजहद करते हुए अन्ततः ठंड में अकड़ जाता है। कहानी का यह अंश जैसे सब कुछ बयां कर देता है। 'मैंने मन को इस तरह समझाया कि साम बहादुर में लड़ने की ताकत मुझसे अधिक है और कम्बल ले जाना चाहा। पर पता नहीं क्या सोच कर साम बहादुर के कम्बल देने पर भी मैंने वह उसे ही उढ़ा दिया। इसके बाद दूध का बर्तन और कोयले का झोला उठाये सड़क पर चला गया। साम बहादुर पत्थर पर लेटा कम्बल लपेट गुड़मुड़ा गया। लौटा तो अंगों को बुरी तरह चिपटाये वह कांप रहा था। मुझे थोड़े पास से ही साम बहादुर के स्वरों की घरघराहट और ओंठों की थरथराहट सुनाई दे रही थी। वह बुरी तरह ठिठुर रहा था। इसके बाद वह बिन शब्द निकाले सिमटता गया। मैं असहाय देख रहा था। हतप्रभ। कुछ न कर सका और साम बहादुर मेंरे पुकारते ही पुकारते ठिठुर गया।' अप्रतिम कथाकार ज्ञानरंजन की स्मृति को नमन करते हुए आज हम पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं उनकी कहानी 'मृत्यु'। 



कहानी  

मृत्यु


ज्ञानरंजन


जहाँ ढाई हज़ार फीट लगभग लम्बी लेकिन बहुत साधारण सी वादी ख़त्म होती है, वहाँ से लगभग पचास कदम बाद की ढलान पर यह तिराहा है। बहुत एकान्त और अनाकर्षक तिराहा। इस जगह से कभी-कभी एक दो मोटरें, एक दो घंटे का अंतर दे कर बसें, चरमराती बैलगाड़ियाँ और किसी बस्ती को पास के बाज़ार से लौटते साईकिल सवार रोज़मर्रा आते जाते रहते हैं। इसीलिए यह तिराहा बहुत एकांत और अनाकर्षक है। इसके इर्द-गिर्द कोई जानदार बस्ती नहीं है। घाट वाले रास्ते को काट कर तिराहा बनाने वाली सड़क के कोने में एक भूरी सी गंजी टेकरी है। बिल्कुल सपाट बंजर और बांझ टेकरी। वो भी मिट्टी की, पत्थर की नहीं। हाँ, उसके अगल-बगल ज़रूर कुछ छोटे-छोटे जमे हुए पथराव हैं। एक सड़क महोबे की तरफ और घाट वाली छतरपुर की तरफ चली गयी है। वैसे आगे जा कर इस सड़क से थोड़ी दूर पर कई रास्ते फूट जाते हैं।


आज इधर से आने जाने वाले लोगों को इस तिराहे पर रुकने का कोई लालच नहीं है। तीन चार मील दूर तक बस ढाक और रेंड के जंगल। मीलों फैला जंगल। कहीं भी खेत नज़र नहीं आते, किसी वस्तु के पीछे कोई चमकता इतिहास नहीं। पर उस भूरी टेकरी के नीचे ठीक कोने पर घटे हुए जीवन का एक बहुत ही लघुकालिक इतिहास है। उस फौज से भागे आदमी का इतिहास। पूस की कड़क रात में ग्राहकों की खातिर भीगते हुए मीलों दौड़ने भागने का दृश्य, उस छोटे से व्यापार की तड़प और सबसे बाद एक ठिठुरती मौत का करुण चित्र। साम बहादुर को आज इन अपेक्षाकृत अच्छे दिनों में भुला सकना मेरे लिए संभव नहीं हो सका।


उस कोने पर एक गुमटी थी। मेरी और साम बहादुर की गुमटी। पर वह गुमटी वैसी नहीं थी जैसी कि आमतौर पर होती हैं। वह बड़ी गरीब और मेहनत से बनाई गई गुमटी थी। यहाँ पर मोटर वाले अमीर और ढोर चराने वाले गरीब मौका पड़ने पर चाय पी लिया करते करते थे। साम बहादुर के बेडौल हाथों की चाय, जिसको पिलाने के बाद वह कभी किसी को मुस्करा कर सलूट करना नहीं भूला। 


साम बहादुर आज की दुनिया का आदमी न था। जब टौलागंज नेपाल में उसके खेत क़र्ज़ के बोझ से बिक गये तो वह अपनी औरत को छोड़ कर हिन्दुस्तान भाग आया था। बहुत दिन इधर-उधर भटकने के बाद वह मेरठ छावनी में सिपाही बन कर भरती हो गया। यह दूसरी बड़ी लड़ाई का समय था।


लेकिन लड़ाई खत्म होने से पहले ही बहुत सारे सिपाही हिन्दुस्तान लौटे उनमें सामबहादुर भी था। मेरठ आते ही वह वहाँ से किसी तरह भी भागने की फिराक़ में लगा रहा क्योंकि यह फौजी जि़न्दगी उससे निभने की नहीं।


मुझे वह भेंट अच्छी तरह याद है। सहारनपुर जेल से छूटकर मैं मीलों भागा, जैसे मुझे कोई पकड़ लेगा और फिर स्टेशन…।


हाँ, अच्छी तरह याद है कि वह देहरादून एक्सप्रेस ही थी। बड़े से डिब्बे के एक कोने में सबसे अलग दुबका हुआ मैं। गाड़ी की रफ़्तार पूरी तेजी पर थी। डब्बे की ठंड और रुआंसी-सी बत्तियों की रोशनी में सब सम्मोहित और सोये हुए। बाहर के अंधेरे घुप्प में चुराई निराश दृष्टि गड़ाता रहा। मेरा रास्ता अंधेरे में ही था और मैं उसे खोद-खोज रहा था।


मेरा कोई नहीं। अब कहाँ जाऊँगा? फिर घुटनों को सीने से भींचकर नींद खींचता रहा। पर ठंड और नींद का रिश्ता निकट नहीं आया। फिर एक झपकी और उसका खटके से टूटना। तब रेलगाड़ी कहीं रुकने के बाद नये सिरे से रेंगती हुई खिसक रही थी। मुझे लम्बे चौड़े कोट में लिपटे एक आदमी को अपनी बगल में बैठे देख अच्छा नहीं लगा। डब्बे में काफी जगह थी। फिर भी मेरे बगल वाला वह आदमी बहुत मीलों तक अपने को छुपाता रहा। और उसके पास एक खाकी सा कम्बल देख देख मेरे शरीर की ठंड बढ़ती रही। इसके बाद दिल्ली से कुछ पहले ही हम दोनों धीरे-धीरे खुल गए। और मुझे उसके खाकी कम्बल को लपेट गर्मी पाने का सुख भी मिला। वह मेरठ छावनी से रात के चुपचाप में घबड़ाकर भागा हुआ पहाड़ी सामबहादुर था। फिर मेरे न चाहते हुए भी दुख और अनिश्चित भविष्य के अन्धेरे कपाटों ने हमें आपस में प्रगाढ़ कर दिया।


उसके बाद कुछ दिनों तक मैं और सामबहादुर दोनों हार्डिंग सराय और पचकुइयां रोड पर डबलरोटी और लेमनचूस बेचा करते थे। सामबहादुर के पास उस ओवरकोट और कम्बल के अलावा सातेक रुपये भी थे। और मेरे हाथों को ज़ेबों की बहुत उधेड़बुन करने के बाद भी टूटते सूतों के अलावा और कुछ न मिलता। फिर भी कुछ दिनों तक डबलरोटी और लेमनचूस बेच-बाच कर हम दोनों किसी भी प्रकार अपना पेट पालते रहे। पर बहुत जल्दी ही वह सातेक रुपयों वाली पूंजी भी चुक गई और यह सब कुछ चल न सका तो नौकरी करने की फिकर हुई। पर हम सरीखे ख़ानाबदोशों को उस समय की परेशान और अस्तव्यस्त दिल्ली में कोई नौकरी मिलना मुमकिन नहीं हुआ। उस समय तो बस फौजी तरह की नौकरियां ही आसानी से से मिल जाती थीं। फिर भी सामबहादुर को बराबर यह डर बना रहा कि कहीं वह फिर न पकड़ लिया जाय। वह भागा हुआ जो है। बीस-बाइस दिनों में ही हमने दिल्ली छोड़ दी।


दिल्ली छोड़ते के बाद भूखी आत्मा का बोझ जि़न्दगी के लड़ैते मोह पर लादे हम इधर-उधर घूमते रहे। दो महीने से ऊपर झांसी और सतना में कुलीगिरी की। फिर इस तिराहे पर चाय की गुमटी खोलने की हिम्मत हमने कर डाली। इस निर्णय पर हम लोग बड़ी मुश्किल से पहुँच पाए थे, क्योंकि पैसे के मामले मामले में हमारे ज़ेब पूरे निठल्ले थे। लेकिन गुमटी बनाने में पैसे की बात हमारे सामने नहीं आई। हाँ, मेहनत और पसीने का भाव बहुत ऊंचा रहा।




पाँच-छह दिन में जाके गुमटी बनने का काम शुरू हुआ था। ढाक वन के उन धूप टन्नाते दिनों की याद अभी गायब नहीं हुई है। पत्थर ढोते हम हांफ जाते, लेकिन किसी लापता आस के कारण हमारी आंखों में आशा नहीं चुकती थी। सामबहादुर पहाड़ी स्नेह से मेरे माथे की चुहचुहाअट पोंछता हुआ मुझे किसी छितरी छाया के नीचे बिठा देता; मेरे लाख नकारने के बावजूद भी। रात को जेठ की गरम चांदनी में उमस के मारे जब भूखी नींद तलफलाती और सूखे पत्तों की विचित्र आहट में करवट बदलता हुआ मैं फक से आंख खोल देता तो सामबहादुर बगल में न दिखता। थोड़ी देर बाद टेकरी के शैड से बोझीली चाल में छोटे-छोटे पत्थरों की सिल्लियां ढोता आता। उस समय सामबहादुर की भक्ति में गदगदाकर चुपचाप पत्थर लाने के लिए मैं स्वयं भी ढलान में उतर जाता। थोड़ी दूर जाना पड़ता था। जब लौटता तो सामबहादुर आराम करता होता और मुझसे सोने के लिए बोलता।


हमने किसी रात चमकती अशर्फियों, उड़ती परियों या राजा रानी का सपना नहीं देखा। हाँ, इस मासूम सी गुमटी की बदौलत किसी तरह बचे-खुचे दिनों के दुख खत्म हो जाने की असीस हम परमात्मा से ज़रूर मांगते थे। सामबहादुर को अक्सर करके उस पथरीली गुमटी में एक सपना आता। उसकी दुकान के सामने से आज़ादी का जुलूस जा रहा है। उस सबेरे वह अपने मोटे सुर में कुछ गुनगुनाता रहता। कोई पहाड़ी धुन। मैं परेशान होता कि सामबहादुर केतली, चाय, गिलास और दूध चीनी आदि के लिए कैसे इन्तजाम करेगा। पर टोकने पर हर बार सामबहादुर ने न जाने किस आशा से मुझे हमेशा टाल दिया।


सामबहादुर बाजार से वापस आया। भरी दोपहर में टाट के खुरदरे दो झोलों में कुछ भरे हुए। मुझको उत्सुकता से भरता हुआ और अपने को बनी हुई मुस्कराहट से। वो मुझे शीशे के गिलास, अल्युमीनियम की केतलियाँ, चूरे वाली चाय के डब्बे, छन्नी और शक्कर का थैला दिखाता रहा। फिर एक बीड़ी का बण्डल, माचिस, ढिबरी और पसेरी भर आटा। मैं इन सब चीजों को देखने से अधिक इस बात से हैरान था कि सामबहादुर को पैसे कहां से मिले?


“क्यों साम! तुमको यह सब किसने दे दिया?’’ अन्दर ही अन्दर खुश होते हुए पूछा था।


“ये देखो! मैं दो चाय के पोस्टर भी कबाड़ लाया हूं, और साथ में दो पैसे की कील।“ कहकर सामबहादुर ने उन गोल मुड़े हुए कागजों को सीधा कर दिया। दोनों लिपटन के हरे लाल एक ही तरह के पोस्टर थे। मेरा प्रश्न उड़ा दिया गया था।

इधर मैं उस छोटे से सामान के ढेर में नज़रों को सरसराता रहा। आधी दर्जन छोटी और दो बड़ी गिलासें थीं। और दो ही केतलियाँ साधारण साइज की।


उधर सामबहादुर पुलिया की दीवार पर पत्थर से पोस्टर ठोंक रहा था। बीच-बीच में कभी मेरी तरफ और कभी तिमुहानी के इर्द-गिर्द देख लेता। लेकिन उसका ध्यान इस बात पर ज़्यादा गड़ा रहा कि चाय का यह रंगीन पोस्टर उस सड़क पर आने जाने वालों को अधिक से अधिक सुघड़ लग सके।


फिर सामबहादुर ने मुझे बुलाकर पूछा था – ‘क्यों ठीक लगता है?’ पर मैंने अनसुनी कर के पूछना चाहा। फिर पूछा भी था कि यह सारा सामान कैसे ले आया है। इसके बाद ही सामबहादुर बहुत रुआँसा हो गया। मेरे सवाल ने उसको कुरेद दिया था। वह सब कुछ बता गया। उसे इस बात की याद करके बहुत पीड़ा हो रही थी कि उसने अपने गले में पड़ा सोने का ताबीज बेच दिया है। सामबहादुर को शायद पहली बार इतने गहरे रूप में टौलागंज के उस बंजर पहाड़ी कस्बे की याद कौंधी। यह ताबीज उसकी दादी ने शादी पर पहनवाया था। दादी की दी हुई उस याद को जिसमें उसकी औरत भी जुड़ी है बीस रुपयों में बेच दिया है। वह ताबीज मसी सिंह आचार्य ने बनाया था जो उसके नामी गिरामी भगवान थे। ज्योतिषी भगवान ही होता है। दादी कहती थी कि इस ताबीज को पहन लेने से सामबहादुर की शादी के बाद के दिन अच्छे रहेंगे। कोई भूत-प्रेत नहीं सता सकेगा।


ताबीज के बिक जाने के बाद उसे दादी, बाबू-अम्मा और बीबी की याद बहुत आई। जिस दिन उसने ताबीज पहना उस दिन बड़ी धूमधाम थी और बकरे की बलि दी गई और उसके खून से मसी सिंह ने भोजपत्र पर मंत्र लिखकर खुद ताबीज में डाला था।


मेरा मन झुक गया। अपने दुख-दर्द के मोल पर किया जाने वाला उसका त्याग में भुला न सका। आज भी सोचता हूँ तो हूबहू वही सब तैरने लगता है।


मुझे साम बहादुर की तरह घर की याद बहुत कम आती। क्योंकि मां मेरे गंदे बदमाश बाप के लात-घूंसों से पहले मुक्ति पा चुकी थी और कोई स्मरणीय व्यक्ति मेरे पूर्व के जीवन में रहा नहीं था। इसलिए जब घर की याद आती तो घर मुझसे और दूर हो जाता।





हमारी इस गुमटी के पास-पड़ोस में गरीब और अमीर किसी प्रकार के घरों का वातावरण न था न तो गोबर के उपले, गूदड़ मचिया, लाठी या भोंकते कुत्ते और न फूलों की क्यारियाँ, मेहंदी की बाड़ या घास की ज़मीन की नमदार सतह। हाँ, सड़क पर सब तरह की ऊंची नीची चीज़ें जब कभी चलती-फिरती रहतीं, लेकिन हमारा कुछ न था। हमारी गुमटी चलती ज़रूर रही। डेढ़ पौने दो साल तक। 


लेकिन मरने खपने के बाद भी किसी दिन चार-पांच आने से ज़्यादा क्या बचता। हाँ, जाड़ों में कुछ और मिल जाता था। ट्रेफिक बंद हो जाने पर सामबहादुर पीछे की बस्ती से आटा मोल ले आता और दस बजे बाद उसकी मोटी कच्ची रोटियाँ थोप कर हम बची-खुची ठण्डी रोटियों के साथ उन्हें चाय में डोब डोब कर निगल जाते। जो बच जातीं उनसे सबेरे का आहार होता। इस तरह एक स्थाई काम होने के उपरान्त भी रोज कुआँ खोदकर पानी पीने वालों की तरह हमारी हालत थी।


अक्तूबर के दिन सामबहादुर को रात से ही खूब खाँसी और हरारत थी। उस सबेरे मैंने अंगीठी नहीं सुलगाई। उस सबेरे पानी बरसा तो लड़का दूध भी पहुँचा गया। सामबहादुर की इच्छा के बाद भी उसे छोड़कर दूध लाने की बात में टाल सा गया। उस दिन ऊपर से सहानुभूति दिखाने पर भी हमेशा की तरह आने वाली सवारियों, कण्डक्टर और ड्राईवरों को चाय न मिलने पर मन ही मन बड़ी खीज हुई। सामबहादुर यह जानता था। शाम को जब वह थोड़ा अच्छा था तो सूरज के टेकरी के पीछे चले जाने के बाद बरसात की उस और अधिक गर्म शाम में हम देर तक बाहर ज़मीन पर टांग पसार बैठे रहे। 


हमारे अभाग्य का एक और अध्याय बढ़ना था, नहीं तो वह हमारी मामूली सी गुमटी में आता ही क्यों? बड़ी अपमानजनक और अभूली शाम थी वह हमारी जि़न्दगी की। एक अंग्रेज़ साहब ने गाली देकर हमसे चाय मांगी थी। वह कुछ मेमों को लिये शायद खजुराहो से वापस लौट रहा था, एक नीली सी मोटर में। उसके आते ही शराब की तेज बदबू आसपास फैल गयी। मेरे चाय न दे सकने की लाचारी दिखाने पर उसने हाथ के रूल से मेरे गले पर जोर की चोट की और सामबहादुर के पांव को लड़खड़ाती ठोकर। इसके बाद वह बड़बड़ाता हुआ मोटर पर बैठकर चला गया। मैंने भद्दे ढंग से न जाने कितनी गालियां दीं। पर सामबहादुर का मन तिलमिलाती घृणा और विद्रोह से उबल गया। वह तमतमा कर कांप रहा था। मुझे चोट लगी थी पर उससे अधिक पहली बार मैंने गरीब मन पर गुलामी का नंगा वार सहा था। उधर घाट पर उस जानवर अंग्रेज़ की मोटर चढ़ती रही होगी। इधर उत्तेजना में सामबहादुर के मन पर दिल्ली के जुलूस चल रहे थे। वह बुदबुदाया – हिन्दुस्तान को आज़ादी जल्दी मिलने वाली है तब देख लेंगे, सालों….. को।


सामबहादुर की तबियत तो ठीक हो चली थी, पर हमारे बुरे दिन और बदतर होते गये। पहले सामान खरीदने के लिए पैसे निकालने के बाद रोज पाँच आने लाभ के मिल जाते थे पर कुछ महीनों में वह फायदा भी दूभर हो चला। पता नहीं किसी नये कायदे से उस तिराहे पर अब मोटर बसें नहीं रुकतीं। केवल छतरपुर जाने वाली तीन बसें रुकतीं जो कभी भी रुकना बंद कर सकती थीं। अक्सर चार पांच दिन हम अधपेट ही गुजारते, फिर किसी तरह पेट भर जाता या कभी भूखा ही रहना पड़ता। सामबहादुर का गठा शरीर मुझे अब छलनी दिखाई देने लगा था और सामबहादुर भी मेरे बारे में ऐसी ही बात कहता। फिर भी गुमटी के प्रति हमारा लगाव किसी भी सलोनी जि़न्दगी के मूल्य से कम नहीं रह गया था। कई तरह की ताकतवर परिस्थितियाँ उसे बंद करने, बरबाद करने के लिए उतरतीं पर हम तड़पड़ा कर उन्हें कमजोर कर देते।


इसके बाद सामबहादुर के साथ बरसात और जाड़े के वे कड़कते अंतिम दिन। तीन दिन से जल्दी न हटने वाले बादल एक सांस में बरस रहे थे। अपने को खाकी कम्बल और ओवरकोट में लपेटे हम बैठे ही रहे। कोयला भी न था कि सिगड़ी गरम कर लेते, फिर पैसे भी नहीं रहे कि कोयला ही आ सकता। छत के ऊपर धार की तेज आवाज और मुँह तथा बालों पर गिरने वाली बौछार की बूंदों से हम पनाह माँग गये थे। फिर भी तब तक संतोष से झेलते रहे जब तक कि तीसरी शाम पानी काफी थम न गया। चाय बनाने के लिए न तो कुछ सामान था और न पैसे। भूख से शिथिल बेचैनी का कष्ट। सामबहादुर ने कहा कि हमें घाट पार वाले बाज़ार में चलना है। मैं कम्बल लपेटे था और सामबहादुर ओवरकोट। चुपचाप उस अंधेरे घाट को हम दोनों ने जि़न्दगी के पुराने दिन याद करते हुए पार किया। सर की सुरक्षा टाट से की थी पर रास्ते में ही पांव बरफ हो गए थे।


बाज़ार के एक बनिये को बहुत खींच-तान के बाद सामबहादुर ने अपना ओवरकोट पांच रुपये में बेच दिया। एक माने में उस ओवरकोट के पीछे किसी की जि़न्दगी बिक गयी। कुछ आने में हम दोनों ने वहीं बाज़ार में तेल की तरकारी और आटे की धूल मिली चपातियाँ खाकर अपनी भरपूर तृप्ति की। फिर भी रुपये बचाकर मेरे लाख मना करने के बाद भी सामबहादुर ने बाकी पैसों की चाय और चीनी खरीद ली। गुमटी पर आ जाने वाले गिने-चुने ग्राहकों को चाय पिला सकने के लिये। रात बारह के बाद ही हम वापस लौट सके। रात भर अनिद्रित एक कम्बल में लिपट-लिपट कर हमने जोड़ जोड़ में ठण्ड भर ली। शायद रात के कई घंटों सामबहादुर बिना कम्बल के रहा। असहनीय ठण्ड में मैं कम्बल अपनी तरफ खींच लेता। झूठ बात नहीं, ऐसे मौके पर मुझे सामबहादुर की अपेक्षा अपनी जि़न्दगी का अधिक मोह लगा। बेचारे सामबहादुर ने मुझको जि़न्दा बचा सकने के लिये ऐसे ख़ौफनाक क्षणों में भी मेरे जैसा काम नहीं किया।


सबेरे-सबेरे सामबहादुर की जि़द से मुझे कोयला और दूध लेने जाना पड़ा। मैं यह अतिरिक्त कष्ट झेलना नहीं चाहता था। मैंने मन को इस तरह समझाया कि सामबहादुर में लड़ने की ताकत मुझसे अधिक है और कम्बल ले जाना चाहा। पर पता नहीं क्या सोच कर साम बहादुर के कम्बल देने पर भी मैंने वह उसे ही उढ़ा दिया। इसके बाद दूध का बर्तन और कोयले का झोला उठाये सड़क पर चला गया। साम बहादुर पत्थर पर लेटा कम्बल लपेट गुड़मुड़ा गया। लौटा तो अंगों को बुरी तरह चिपटाये वह कांप रहा था। मुझे थोड़े पास से ही साम बहादुर के स्वरों की घरघराहट और ओंठों की थरथराहट सुनाई दे रही थी। वह बुरी तरह ठिठुर रहा था। इसके बाद वह बिन शब्द निकाले सिमटता गया। मैं असहाय देख रहा था। हतप्रभ। कुछ न कर सका और सामबहादुर मेंरे पुकारते ही पुकारते ठिठुर गया।


मुझे विश्वास नहीं था कि साम बहादुर इतनी जल्दी मर सकता है।


सामबहादुर को देश की आज़ादी देखने की बड़ी तमन्ना थी, पर वह देख नहीं पाया। तिउरस साल पन्द्रह अगस्त को जब हिन्दुस्तान को आज़ादी मिली तो बरसों बीत जाने के बाद भी भावावेश में मैं उस तिराहे की तरफ गया था। सब तरफ बड़ा जोश था पर यह तिराहा उपेक्षित उदासी में ही सुनसान था। मेरी जेब में तिरंगी झंडियाँ थीं, पर वहाँ कुछ भी ऐसा नहीं बचा-मिला जिसकी खातिर यहाँ झंडियाँ फैलाता। सामबहादुर होता तो शायद गुमटी को खूब सजाता और पहाड़ी गीत गाता।


आज बरसों बाद मै तिराहे पर हूँ। गुमटी का नामो-निशान नहीं है। मैं शाम भर वहीं बैठा रहा। आज पुलिया की दीवार चूने से खूब सफेद पुती है और उस पर झण्डे के रंग की चौड़ी चमकदार धारियाँ हैं। अब पुलिया की दीवार और सुन्दर लगती है, पर उस पर चिपका हुआ लिपटन का हरा लाल पोस्टर गायब हो चुका है।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)

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