गरिमा श्रीवास्तव के उपन्यास 'आउशवित्ज: एक प्रेम कथा' पर तृप्ति श्रीवास्तव की समीक्षा
आउशवित्ज (Auschwitz) दक्षिण पोलैंड में स्थित नाजी जर्मनी का सबसे कुख्यात यातना और नरसंहार शिविर (concentration and extermination camp) समूह रह चुका है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1940-1945 के बीच, यहाँ 11 लाख से अधिक यहूदियों को गैस चैंबरों और अमानवीय परिस्थितियों में मौत के घाट उतार दिया गया था। आउशवित्ज का भयानक इतिहास मानवीय क्रूरता की पराकाष्ठा को दर्शाता है। यह उस नाजी अत्याचार का प्रतीक है जो आर्यों को दुनिया की बेहतरीन नस्ल और आर्य संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए सत्ता के लिए कुछ भी करने पर आमादा था। दरअसल मनुष्य अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए युद्ध लड़ता रहा है। ये युद्ध जातीय, नस्लीय श्रेष्ठता को स्थापित करने के क्रम में लड़े जाते रहे हैं। यूरोपीय समाज श्रेष्ठता का जितना भी दावा कर ले उसकी दिक्कत हमेशा से यही रही कि यहूदियों के प्रति नफ़रत की मानसिकता को वह कभी खत्म नहीं कर पाया। कई लेखन में पीड़ा के इस दंश को या तो जान बूझ कर उपेक्षित किया गया या फिर फैशन के तौर पर। प्रेम कुमार मणि का एक उद्धरण यहां प्रस्तुत करना समीचीन होगा जिसे लोहिया ने कहा था 'जिस बंगाल में एक दशक पूर्व भयावह अकाल पड़ा हो, जहाँ राजनीतिक बंटवारे के कारण हुई हिंसा में लाखों लोग बेघरबार हुए हों, हजारों मारे गए हों, बलात्कार और लूट-पाट की बेतहाशा घटनाएं हुई हों, जहाँ प्रतिवर्ष अकाल, महामारी, भूख और बेबसी से लाखों की मौत होती हो, वहाँ का लेखक यदि पीड़ा के अनुभव का अभाव देखता है, तब मुझे कहना पड़ेगा, हमारे देश में लिखने वाले और दुःख भोगने वाले अलग-अलग समूह से आते हैं. जो पीड़ा भोगते हैं, उनके बीच से लेखक नहीं हैं और जो लेखक हैं वे पीड़ा भोगने वाले नहीं हैं।' आज दुनिया एक बार फिर युद्ध के आगोश में है। अमरीका अपनी दादागिरी दिखाते हुए वेनेजुएला में अपना वास्तविक रूप दिखा चुका है। ग्रीनलैंड, कनाडा और पनामा नहर पर उसकी ललचाई नजरें ट्रंप के बयानों में झलकती दिख रही हैं। रूस यूक्रेन युद्ध थमता नजर नहीं आता। इजरायल की मंशा से आज कौन वाकिफ नहीं है। बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न जारी है। मॉब लिंचिंग के वाकयात अपने आस पास होता हुआ हम भी देख रहे हैं। ऐसे में गरिमा श्रीवास्तव का उपन्यास 'आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा' आज भी जैसे प्रासंगिक बना हुआ है। तृप्ति श्रीवास्तव ने इस उपन्यास की गहरी पड़ताल की हैं और शिल्प पर महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं जिन्हें बिटवीन द लाइंस पढ़ा जाना चाहिए। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं गरिमा श्रीवास्तव के उपन्यास 'आउशवित्ज: एक प्रेम कथा' पर तृप्ति श्रीवास्तव की समीक्षा 'बिजली के तारों के पार फलाँग लगाती स्त्री और आउशवित्ज'।
'बिजली के तारों के पार फलाँग लगाती स्त्री और आउशवित्ज'
तृप्ति श्रीवास्तव
उन्नीसवीं शती में एक नयी विधा के रूप में फलने-फूलने के साथ ही हिन्दी उपन्यास की यह नेमत रही है कि उसने अपने समय को बखूबी लफ्जों में पिरोया है। आज जब समय की तंगी और जीवन की आपा-धापी में कुछ गंभीर पढ़ना-सोचना मुश्किल हो चला है तब उपन्यासों ने हिन्दी पाठकों के पढ़ने की आदत बनाए रखने में मदद की है। ऐसे में यदि पाठक उपन्यास के सांचे में जज़्ब बौद्धिक खुराक़ चाहते हैं जो उन्हें देश-दुनिया के गंभीर मसलों से इत्तेफ़ाक रखने वाला उपन्यास 'आउशवित्ज: एक प्रेम कथा' पढ़ना चाहिए। इस उपन्यास को हाल ही में प्रेमचंद सम्मान देने की घोषणा हुई है।
गरिमा श्रीवास्तव का यह उपन्यास कई मामलों में उल्लेखनीय है। बीसवीं शती के उत्तरार्ध से ले कर हाल के वर्षों तक की महत्वपूर्ण वैश्विक घटनाओं की पृष्ठभूमि में लिखा गया यह उपन्यास सही सूचनाएं, आंकड़े और परिभाषाएं प्रस्तुत करता है, जिसमें केवल पात्र काल्पनिक हैं, परिवेश और घटनाएं सच्चाई के खासे करीब हैं। स्त्री की निगाह से युद्ध और समाज को देखने वाला यह उपन्यास वर्णित हर घटना और विचार की तह में जाना चाहता है। पात्रों की प्रकृति बौद्धिक है और स्वभाव अकादमिक। यह उपन्यास इस मामले में भी अलग है कि यह हिन्दी स्त्री-विमर्श की स्थापित परिपाटी का अनुगमन नहीं करता बल्कि एक नयी परिपाटी बनाता है। इस उपन्यास के कई पहलू महत्वपूर्ण हैं पर सीमित शब्दों में कहें तो 'आउशवित्ज: एक प्रेम कथा' को हिंदी स्त्री-लेखन की नई उम्मीद कहना सबसे ठीक होगा।
यह उपन्यास कई अर्थों में स्त्रीवादी है. होलोकास्ट और ‘एंटी-सेमीटिज्म’ दोनों को अंजाम पितृसत्ता और उसकी विचारधारा ने दिया है। इन विषयों पर लिखना और विरोध में लिखना स्त्रीवादी होना है। हालिया दशकों में अकादमिया के वैश्विक परिदृश्य में ‘रिलिजियस स्टडीज’ अपने उत्कर्ष पर है। धर्मों के तुलनात्मक स्वरूप, साम्राज्यवाद और उपनिवेशन में धर्म की भूमिका आदि पर चर्चा गरम है लेकिन ‘रिलिजियस स्टडीज’ से जुड़े हुए बड़े-बड़े विद्वान आज भी ‘एंटी-सेमीटिज्म’ पर बात करने से हिचकते हैं। कारण साफ़ है, पश्चिम की आधुनिकता और वैज्ञानिकता का गुणगान किया जाना चाहिए पर पश्चिमी समाज का वह हिंसात्मक पहलू जो मानवीयता को शर्मशार कर दे, उस पर बात न करना ही भला। ‘एंटी-सेमीटिज्म’ अर्थात हिब्रू बोलने वाले यहूदियों के प्रति नफ़रत की भावना पश्चिमी समाज का एक ऐसा ही कड़वा सच है। यहूदियों के प्रति नफ़रत का भाव पश्चिमी सभ्यता के मूल में है। यहूदियों ने ईसा-मसीह को सूली पर चढ़ाया ऐसी मान्यता है और वहम यह कि ‘यहूदी दुनिया की सबसे चालाक कौम है और ये किसी को भी धोखा दे सकते हैं।’ उन्नीसवीं शती में जब फ़िलोलोजी की अकादमिक विधा ने विस्तार पाया तो उसकी परिणति नस्ल और भाषाओं की आपसी पहचान में हुई। भाषाओं के आधार पर नस्लों का विभाजन और समूहन किया गया। इस समूहन में आर्य भाषा और नस्ल की श्रेष्ठता स्थापित हुई तो वहीं दूसरी तरफ सामी भाषाओं अर्थात हिब्रू, अरबी और अरामाइक आदि भाषाओं और उससे जुड़ी नस्लों के खिलाफ हिकारत का भाव जो पहले से ही मौजूद था, अब विज्ञान का सहारा पा कर और पुख्ता हो गया। ‘एंटी-सेमीटिज्म’ का वृहत इतिहास लिखने वाले लियोन पोलियाकोव ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द आर्यन मिथ’ में भाषा को नस्ल से जोड़ना यूरोपीय इतिहास की सबसे बड़ी भूल बताया है. इस भूल को स्वीकार करना तो दूर, ‘रिलिजियस स्टडीज’ के विद्वान लियोन पोलियाकोव के नाम से भी अनभिज्ञता जताते हैं। ऐसे में यह उपन्यास यहूदियों के शोषण के इतिहास, इज़राइल बनने की कहानी से ले कर इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद की मूल जड़ जैसे जटिल मुद्दों को सरल शब्दों में बयान करता है। यह होलोकास्ट की विभीषिका को पन्ने-दर-पन्ने खोलता है।
होलोकास्ट और ‘एंटी-सेमीटिज्म’ ऐसे मुद्दे हैं जिस पर हिन्दी में शायद ही किसी ने लिखा हो। अंग्रेज़ी में ऐसा नहीं है। 20वीं सदी की प्रख्यात लेखिका और नारीवादी वर्जीनिया वुल्फ ने विश्व युद्ध का उत्कट विरोध शुरू से ही किया। वर्जीनिया वुल्फ के पति लियोनार्ड वुल्फ़ यहूदी थे। युद्ध-बंदी बना लिए जाने के डर से गले में पत्थर बाँध, नदी में डूब कर वर्जिनिया ने आत्महत्या कर ली। वर्जिनिया कहती है कि 'युद्ध पुरुषों का खेल है, जान लेने वाली मशीनें पुरुष प्रकृति की होती हैं!' 'आउशवित्ज : एक प्रेम कथा' को वर्जीनिया के इस सूत्र वाक्य की पृष्ठभूमि में पढ़ना चाहिए। युद्ध की छाया में स्त्री और उसका जीवन, पुरुषों से उसके संबंध और प्रेम यह इस उपन्यास की मुख्य थीम है। उपन्यास की नायिका प्रतीति सेन पोलैंड यात्रा के दौरान आउशवित्ज में होलोकास्ट की विभीषिका के दंश को करीब से महसूस करती है तो वहीं दूसरी ओर उसकी खुद की जड़ें बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में हुए दंगों और बर्बरता से जुड़ी हैं। आउशवित्ज से ले कर हसनपुर तक युद्ध स्त्रियों के तन-मन पर क्या घाव छोड़ गया और इन घावों पर ममता और स्नेह का मलहम लगा कर स्त्रियां कितने साहस से जीवन निभा ले गईं, यह उपन्यास इन्हीं जीवट स्त्रियों के न टूटने की कहानी है।
'आउशवित्ज: एक प्रेम कथा' के चरित्र युद्ध की विभीषिका के साए में विकसित होते हैं पर उपन्यास इतने तक सीमित नहीं। यह भय और वितृष्णा से परे स्त्री-संबंधों को देखने की नयी रोशनी देता है। उपन्यास को पढ़ते हुए महाश्वेता देवी की लघुकथा 'रुदाली' याद आती है जिस पर बाद में कल्पना लाज़मी ने फिल्म बनायी। शनीचरी दुनिया के दुखों की मारी है, पर उसके दुःख का पहाड़ कभी आंसुओं में पिघलता नहीं चाहे कोइ बिपत आए। शनीचरी ने व्याह किया पर पति गंजू कालरा से चल बसा, बेटा जना पर बड़ा हुआ तो वह भी छोड़ कर चला गया, पिता तो शनीचरी के जन्म के साथ ही काल का ग्रास बन गए। शनीचरी गाँव वालों के लिए भी अपशकुन है। मां पिवली शनीचरी को छुटपन में ही छोड़ कर नौटंकी कंपनी के साथ भाग गयी। गाँव वाले उसका दोष भी शनीचरी को देते हैं. गाँव वालों के ताने सुनने, बंधुआ मजदूर बनने और यहाँ तक कि बार-बार अपनों की मौत से बेजार होने के बावजूद शनीचरी की आँखों से कभी पानी की एक बूँद भी नहीं गिरी, ऐसा शनीचरी बातों-बातों में बिकनी को बताती है. जब पिवली घर छोड़ कर नौटंकी कंपनी के साथ भागी तो वह शनीचरी को साथ क्यों नहीं ले गयी, यह सवाल शनीचरी के मन में सालता है. माँ से मिलने की दबी ख़ाहिश मन में रहती है. अंत में जब शनीचरी को पता चलता है कि दरअसल बिकनी ही पिवली है, और अब उसकी मृत्यु हो चुकी है तो शनीचरी की आँखों में सैलाब उमड़ आता है और वह रूदाली बन कर रामवतार सिंह के मरने पर बेज़ार रोती है।
शनीचरी से गुजरते हुए प्रतीति सेन याद आती है. दुखों की मारी तो प्रतीति भी है, पिता का पता नहीं, प्रेम में भी निराशा ही हाथ लगती है. शनीचरी के पास लक्षमण सिंह के स्नेह का मरहम है पर प्रतीति के पास तो वह भी नहीं। अभिरूप और प्रतीति के संबंध का कोइ सामाजार्थिक आयाम नहीं है, वह भावनाओं का आधार भर है। प्रतीति के पास माँ नहीं पर अम्मा जरूर हैं, वह अम्मा जिसने प्रतीति को कभी कोई कमी महसूस नहीं होने दी, शनीचरी के पास न तो माँ है और न ही सामाजिक स्वीकार्यता। शनीचरी बिना उम्र बूढ़ी हो चली है, वैसे ही जैसे रहमाना खातून बिना उम्र बूढी हो चली हैं। रहमाना नातिन को कातर नजरों से देखती हैं तो शनीचरी की सूखी आँखों में सैलाब उमड़ आता है माँ के मरने की खबर सुन कर। बिकनी उर्फ़ पिबली बेटी को पीछे छोड़ने का मलाल नहीं करती, प्रतीति को भी मां-बाप के न होने का मलाल नहीं सालता। समय, काल, वातावरण अलग है पर शनीचरी और रहमाना जैसी स्त्रियों का दर्द कहां अलग है? पिबली और प्रतीति की जीवनेच्छा कहाँ अलग है? कहानी के अंत में प्रतीति और शनीचरी, दोनों ही अपने अतीत की गुत्थी सुलझा कर मन का बोझा उतार फेंकती हैं। दोनों की वर्षों की जमी संवेदनाएं पिघल जाती हैं, एक की आँसूंओं में, दूसरी की संतोष में। शनीचरी को उसकी माँ पिबली क्यों छोड़ गयी, इस सवाल का जवाब प्रतीति देती है जब वह कहती है, “टिया की ज़िन्दगी – भरपूर ख़ुशहाल ज़िन्दगी को मैं अपनी उपस्थिति से नष्ट-बिनष्ट करने का उपक्रम क्यों करूं? मैं उसकी बेटी हूँ, यह मालूम है मुझे पर वह मेरी माँ होने को तो बाध्य नहीं।”
हिन्दी कथा साहित्य में यह पहली बार घटित हो रहा है जब बेटी माँ को ममता का धर्म सीखाने की बजाय, माँ से अपेक्षाएं पालने की बजाय उसे अपना जीवन जी लेने का हक़ दे रही है। स्त्री द्वारा स्त्री को नवाज़ी गयी यह सबसे बड़ी आज़ादी है। यह अलग बात है कि रुदाली बनी शनीचरी के आँसू पाठकों के मन का बोझ हल्का कर देते हैं जब कि 'आउशवित्ज: एक प्रेम कथा' पढ़ने के बाद पढ़ने वाले का जी घबरा उठता है. अप्रिय संवेदनाओं और स्पर्शों की स्मृति हर पढ़ने वाली स्त्री के ज़हन में तैर जाती है, प्रतीति द्वारा टिया को दी गयी मुक्ति या बिराजित सेन का द्रौपदी देवी उर्फ़ रहमाना खातून के प्रति अनसुलझा प्रेम, ये भाव अंत में पाठक की स्मृति पर छाप नहीं छोड़ पाते। कारण क्या है? रुदाली में अंत में कुछ अनसुलझा नहीं रह जाता, जबकि आउशवित्ज में युद्ध और स्त्री का सवाल कथा के अंत को लांघ कर यक्ष प्रश्न की तरह अनुत्तरित रहता है। वही बेचैनी का सबब है।
'आउशवित्ज' में चित्रित स्त्री इतिहास से जवाब मांगती स्त्री है, वह इतिहास के नायकों से स्त्री का हक़ मारे जाने का कारण पूछती है, न मिलने वाले जवाब की चाह में वह महात्मा गांधी से ले कर हिटलर तक के पत्र खंगालती है। रहमाना खातून कहती हैं, “गौरतलब यह है कि पूर्वी पाकिस्तान में झड़पों के दौरान होने वाली घटनाओं में स्त्रियों का जिक्र एक सिरे से नदारद था। अख़बार, मीडिया सब चुप थे, औरतें ज्यों कभी इस देश की नागरिक रहीं ही नहीं। वे न खोयीं, न सतायी गयीं, न जान बचा कर भागीं, उन्हें ज्यों ढूँढने वाला कोई नहीं। बाद के दिनों में बांग्लादेश की सरकार ने उन्हें ‘बीरांगना’ की उपाधि दी पर इस उपाधि से क्या ही होना था।”
रहमाना फिर व्यंग्य से कहती हैं, “शेख मुजीबुर्हमान को क्या मालूम कि जिन्हें वे वीरांगना कह रहे हैं, वह अपने घर–परिवार में सामाजिक कलंक का कारण हैं!”
रहमाना को फिर गांधी जी याद आते हैं, वह कह उठाती है, “अच्छा ही हुआ चले गए बापू, होते तो उनकी आँखें देश का हाल देख कर क्या समय से पहले हमेशा के लिए मूँद न जातीं।”
आउशवित्ज़ की स्त्रियों के प्रिय ऐतिहासिक चरित्र गांधी जी हैं, जिनको वे बार-बार याद करती हैं। प्रतीति भी याद करती है कि कैसे गांधी जी ने मानवता की दुहाई देते हुए हिटलर को पत्र लिखा था, जो हिटलर तक कभी नहीं पहुंचा – “...यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि आज संसार में आप ही ऐसे व्यक्ति हैं जो उस युद्ध को रोक सकते हैं, जो मानव जाति को बर्बर अवस्था में पहुंचा सकता है। क्या आपको किसी उद्देश्य के लिए इतना बड़ा मूल्य चुकाना चाहिए, फिर चाहे वह उद्देश्य आपकी दृष्टि में कितना ही महान क्यों न हो?”
दरसल, आउशवित्ज के सारे किरदार अदद बौद्धिक हैं, जो बहुत सारे मूल-भूत सवाल उठाते हैं। प्रतीति अभिरूप से पूछना चाहती है, “क्या तुम्हें लगता है कि संस्कृति और नस्ल के हिसाब से मानव-मस्तिष्क की क्षमताएं निर्धारित होती हैं?” तो रहमाना प्रतीति को ख़त में लिखती है, “इंडिया के जघन्य निर्भया काण्ड के जैसे यौन शोषण और हत्या को साबित करने में आठ लम्बे वर्ष लग जाते हैं।”
न्याय प्रक्रिया और नस्ल का सवाल ही नहीं, रहमाना तो नोटबंदी तक का जिक्र करना नहीं भूलतीं। खटिया की पाटी पर बैठी (रहमाना) सोचने लगती हैं- ये युद्ध भी क्या चीज है, जो सबसे निरीह है, बेचारा है, असहाय है, उस पर गाज बन कर गिरता है! तो वहीं रहमाना से होम्योपैथिक दवाई लेने आया मुकुल कहता है, ‘क्या राष्ट्र की चिंता ने मुझे मनुष्य से कातिल में तब्दील कर दिया, मुझे बर्बाद कर दिया, इसे आज समझ पाया हूँ, लेकिन अपने किए की ग्लानि मन से जाती नहीं?’
स्त्री की देह और उसका विमर्श वह दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है जहां यह उपन्यास हिन्दी स्त्री विमर्श की स्थापित परिपाटी का अनुगमन नहीं करता। हिन्दी उपन्यासों का रिवाज़ है कि यहाँ स्त्रियों की देह और चुहल तो दिखते हैं लेकिन स्त्री की बौद्धिकता का आकर्षण कम है। ज्यादातर उपन्यासों की नायिकाएं अपनी स्वतंत्रता और सुख शरीर के माध्यम से ही परिभाषित करती हैं। यह सही है कि यह स्त्री जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू है पर सवाल यह भी है कि स्त्री की मुक्ति और उसका जीवन क्या शरीर तक ही सीमित है? क्या शरीर से ऊपर उठ कर स्त्री होने का मतलब बौद्धिक होना भी हो सकता है? शरीर से ऊपर उठ कर जीवन के अन्य सवाल और प्रेम संबंधों से इतर अन्य संबंधों की टीस, मानव मात्र से लगाव क्या स्त्री के जीवन का दर्शन हो सकता है? दूसरे शब्दों में कहें तो क्या किशोरवय की अल्हड़ खिलखिलाहट भूल चुकी प्रौढ़ स्त्री जो अब हर बात पर दांत भींचती है और दबी मुस्कान से अपनी अन्यमनस्कता छुपा ले जाती है, क्या वह उपन्यास की नायिका नहीं होनी चाहिए? 'आउशवित्ज: एक प्रेम कथा' इन प्रश्नों पर सोचने के लिए मजबूर करती है। सबीना प्रेम का एक अलग दर्शन और कहें तो पहलू सामने रखती है- “प्रेम कभी-कभी बोझ बन जाता है जब मन से मन के संवाद का अभाव हो जाए, शायद वहीं से हमें रास्ते बदल लेने होते हैं. दरअसल पूरा जीवन हम प्रेम के लिए जी नहीं सकते क्योंकि जीवन की प्रकृति है बदलना। वह रोज़ बदलता है. दो व्यक्तियों का एक-दूसरे से एक-मेव हो जाना ...ये भाव ही किताबी-सा है।”
लेकिन सबीना जब यह कह रही है तो उसका भाव मोहन राकेश की नायिका सा नहीं है।सबीना, आधे-अधूरे की सावित्री नहीं जिसकी आधुनिकता कपड़े की तरह मर्द बदलने में और पुरुष का साथ चाहने में है, जिसकी ‘उम्र चालीस को छूती। चेहरे पर यौवन की चमक और चाह फिर भी शेष’ है। सबीना जब कहती है कि हम पूरा जीवन प्रेम के लिए नहीं जी सकते तब उसका आशय दरसल पुरुष-प्रेम से है। और इस तरह सबीना की आधुनिकता शारीरिक संबंध में परिभाषित न हो कर बौद्धिकता में अभिव्यक्त होती है। सबीना ने आंद्रेई से विवाह किया है. उसके और आंद्रेई के संबंधों में किसी तरह की गर्माहट नहीं, पर तथता का एक भाव है। उसका जीवन पति, बच्चे और रोजाना की गतिविधियों में बीत रहा है, जिसमें बहनापे के लिए खासा समय है। वह अपनी सखी प्रतीति को खासा समय देती है, और साथ ही अपनी बौद्धिकता को भी।
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| गरिमा श्रीवास्तव |
आउशवित्ज़ की स्त्रियाँ दरसल शरीर के मुद्दे को ले कर खासी सजग हैं। शरीर उनकी मुक्ति की सीमा जरूर बनता है, लेकिन वे मुक्ति को शरीर में नहीं बांधती बल्कि मुक्ति की और राहें तलाशती हैं। बलात्कार और यौन हिंसा झेलने वाली स्त्री का शरीर वीणा सा नहीं झनकता, रहमाना खातून इसकी मिसाल हैं। स्त्री के लिए उसके शरीर के क्या मायने हैं, और बाज़ार और समाज उनसे क्या चाहता है, रहमाना के विचार इस पर बड़े स्पष्ट हैं। वह प्रतीति को समझाते हुए पत्र में लिखती है- “साहित्य और कलाओं में स्त्री देह की उपभोक्तावादी मानसिकता को बदलने की भी जरूरत है...। आज के मनोरंजन उद्योग में स्त्री पहले से कहीं अधिक ‘उपभोग किए जाने वाले माल’ में तब्दील हो गयी है, इसे समझना मुश्किल नहीं है।”
इस उपन्यास में स्त्रियों के शरीर सुरूचिपूर्ण ढंग से अनावृत्त क्यों नहीं होते, हर पन्ने पर मांसल प्रेम क्यों नहीं घटित होता, रहमाना की इस बात से समझा जा सकता है। यह उपन्यास स्त्री के शरीर को उपभोग की वस्तु बनाने का प्रतिकार करता है। यह उपन्यास शरीर से आगे बढ़ कर स्त्रियों के ‘सिस्टरहुड’ को कल्पित करता है। कई बार कहा जाता है कि स्त्रियाँ ही स्त्रियों की दुश्मन होती हैं। लेकिन यह उपन्यास स्त्रियों के बहनापे की कहानी ले कर आता है। वर्तमान में बहुत सारी स्त्रियों ने परिभाषित-स्थापित संबंधों के दायरे से खुद को अलग कर दिया है। यह उपन्यास इन्हीं स्त्रियों की कहानी है। प्रतीति रहमाना को ख़त में लिखती है, “दिन के उजाले में मुझे याद ही नहीं रहता कि मैं एक सूना जीवन जीने वाली एकाकिनी हूँ। शाम ढले किसी संग साथ की जरूरत महसूस होती है तब अपने मन को कड़ाई और ढीठाई से समझाना पड़ता है कि किसी के काँधे पर सिर रख कर मन की बात कह देने का रोमांटिक बोध एक औरत को बहुत मंहगा पड़ सकता है।”
प्रतीति का सक्रिय संपर्क सबीना से ही दिखता है, वही उसकी साथिन है। अभिरूप और पुरुष प्रेम बस स्मृतियों की बात है। प्रतीति का दूसरा सक्रिय संपर्क अपनी अम्मा से रहा है। अम्मा यानी कि रहमाना खातून का भी सक्रिय संपर्क प्रतीति से है। वर्तमान समय में खासी स्त्रियों के जीवन की यही कहानी है। अपने निजी जीवन के दायरे में पुरुषों को दरकिनार कर चुकी यह वह स्त्री है जो अपने कमरे, अपने संसार में रमी है जिसे वर्जिनिया वूल्फ स्त्रियों का बहनापा कहती हैं। और इस तरह देखे तो 'आउशवित्ज: एक प्रेम कथा' स्त्री का अपना कमरा है, वही अपना कमरा जिसकी कल्पना वर्जिनिया वूल्फ करती हैं। कहानी का ज्यादातर हिस्सा प्रतीति के कमरे में घटित होता है, या सबीना के या फिर रहमाना के। कमरे की अवस्थिति भले ही कलकत्ता, पोलैंड या हसनपुर हो सकती है। प्रतीति, रहमाना, और सबीना ये एक-दूसरे का सपोर्ट सिस्टम हैं। टूटन की दहलीज आने पर एक-दूसरे का हाथ थाम कर मुश्किल पार कर लेने वाली. ऐसा ही सपोर्ट सिस्टम और सिस्टरहुड तो हम वाकई में समाज में चाहते हैं स्त्रियों के लिए, आउशवित्ज़ इस सपने को उपन्यास में साकार करता है।
स्त्री के एकाकिनी होने का मतलब पुरुषों के प्रति ग्रंथि पालने से नहीं है. 'आउशवित्ज: एक प्रेम कथा' में पुरुषों के प्रति कोई ग्रंथि नहीं है. दरिंदगी झेलने के बाद भी रहमाना पुरुषों से घृणा नहीं करती। प्रतीति और सबीना का तथता का भाव ही दरसल प्रेम है। यह तथता का भाव ही भारतीय घरों की ज्यादातर स्त्रियों का स्थाई प्रेम भाव है। प्रतीति में मां-बाप को ले कर, खुद के जन्म को ले कर कोई कुंठा नहीं है, कोई विषाद नहीं है। रहमाना ने उसे पूरा प्रेम दिया है. अभिरूप को ले कर भी उसके मन में कोई रोष नहीं। वह रहमाना से कहती है, “अम्मा तुमको तो अंदाजा होगा ही कि अभिरूप से मेरा लगभग पांच सालों के मित्रतापूर्ण संबंध के बाद अलगाव हुआ। लेकिन उसके प्रति प्रेम को मैं भुला नहीं पाती हूँ।”
इस उपन्यास का तीसरा पहलू है भूख। औरतें और उनके लिए भूख के क्या मायने होते हैं, वह क्या करवा सकती है, इस उपन्यास ने इसे बखूबी उकेरा है। भूख किन रूपों में अभिव्यक्त होती है, आउशवित्ज़ में इसका बयान है।
भात...भात...भरपेट भात से बड़ी नियामत कुछ भी नहीं।
उन्हें मालूम है कि गुरबत क्या होती है, भूख क्या होती है...भूखी रही थीं न कई दिन।
‘घर पर भूख से बिलबिलाते बच्चों को क्या मालूम कि रोज़ कुआं खोद कर पानी पीने वालों की श्रेणी के इन लोगों का धंधा चौपट हो गया रातों-रात’
किस तरह मुट्ठी भर मूडी के लिए युद्ध कैंपों में स्त्रियां बेपरवाह हुए शारीरिक यातना झेल जाती हैं, यह मार्मिक दृश्य है।
हालांकि हमारे समाज और साहित्य दोनो के लिए ही भूख कोई नया विषय नहीं है, ‘दोपहर का भोजन’ की मां सिद्धेश्वरी हो जो सबको खाना खिला कर खुद एक लोटा पानी पी कर रह जाती है या बच्चों की भूख मिटाने के लिए बैलों का जुआ खुद के कन्धे पर लेकर खेत जोतने वाली ‘मदर इंडिया’ हो या फिर पत्नी का ‘कफन’ बेंच कर पूडी-मिठाई खाने वाले घीसू-माधव हो! तरह-तरह के चरित्र समाज और साहित्य में बिखरे पडे हैं। घर-परिवार से लेकर साहित्य और जमाने तक में बस यही दिखता है कि स्त्री चुपचाप घर-परिवार की सेवा में लीन है.. भूखी! थकी! मांदी! जो हर चीज से व्याकुल होती है पर भूख से नहीं। लेकिन हालिया वर्षों में स्त्री की भूख ने अलग अभिव्यक्ति पाई है। इसकी एक मिसाल इरफ़ान अभिनीत फ़िल्म 'लंचबाक्स' भी है। दृश्य है जब नायिका के पिता की मृत्य हो गई है और वह पिता के अंतिम दर्शन करने मायके पहुंची है। चीखने-चिल्लाने की जगह मां शांत बैठी है। बेटी को देख कर वह कह उठती है, ‘इतने दिनो से बीमार थे...। सोचती थी कि ये नहीं रहेंगे तो मेरा जीवन कैसे बीतेगा पर आज जब ये नहीं हैं तो बस भूख ही भूख लग रही है!’’ शव बगल के कमरे में रखा है और मां बेटी को बस यही कहती है कि बेटा आलू के पराठे खाने हैं! मातम के अवसर पर फिल्मों सहित वास्तविक जीवन में चीखने-चिल्लाने का जो एपिसोड होता है, पिक्चर के अगले दृश्य में भी वैसा ही कुछ होगा, पर यह आम कल्पना से परे है कि पति की मृत्यु के बाद पत्नी आलू के पराठे की मांग करेगी! लंचबाक्स का यह दृश्य जेहन में बैठ जाता है और गाहे-बेगाहे उमड़ता रहता है! भूख का ऐसा ही अपवाद टीया के माध्यम से गरिमा ने खड़ा किया है, जहां स्त्री की आबरू उसकी भूख से बढ़ कर नहीं ठहरती। वरना हिन्दी पट्टी में तो अस्मत छिन जाना इतनी बड़ी बात होती है कि उसका दाग जीवन का बलिदान दे कर ही साफ़ किया जाता है।
थोड़ी बात इस उपन्यास के भाषा और शिल्प पर भी हो जाए। स्त्री लेखन में भाषा और शिल्प महत्वपूर्ण है। अपनी विशिष्ठ भाषा-शैली के आधार पर वर्जिनिया जैसी लेखिका ने स्त्री लेखन के नए मानक गढ़े हैं और बताया है कि सामान्य कथ्य के साथ विशिष्ट भाषा और शैली अपना कर किस तरह स्त्रीवादी लेखन किया जा सकता है फ्रेंच नारीवादियों का पूरा विमर्श स्त्री लेखन की विशिष्ट भाषा-शैली विकसित करने से संबंधित है। प्रसिद्ध फ्रेंच नारीवादी एवं लेखिका हेलेन सिक्सस का लेखन इसी प्रकार के लेखन का उदाहरण है। उनके लेखन की विशेषताओं को रेखांकित करती हुई टोरिल मोई लिखती हैं कि सिक्सस की शैली अधिकतर अत्यधिक लाक्षणिक, काव्यात्मक और स्पष्टतः सिद्धांत विरोधी है। भाषा में संकेतकों के माध्यम से सघन लहरों का सृजन केन्द्रीय भाव है जो किसी भी विश्लेषकीय दिमाग वाले आलोचक को सहज रूप से समझ आना मुश्किल है। पाठ स्वयं यह पूरे तौर यह स्पष्ट कर देता है कि विश्लेषण के प्रति यह प्रतिरोध इरादतन है। हेलेन सिक्सस न तो सिद्धांत में विश्वास करती हैं और न ही विश्लेषण में।
सिद्धांत, तर्क एवं विश्लेषण का जो नकार सिक्सस के यहां है वह मूलतः पुरुषवाद के हर स्थापित मूल्य का नकार है। आज का स्त्री एवं स्त्रीवादी लेखन हर पूर्व स्थापित विचार एवं संप्रत्यय को सिद्धान्ततः चुनौती दे सकता है। इस तरह पूर्वनिर्धारित हर शैली, शिल्प, विधा के प्रतिरोधस्वरूप स्त्री-लेखन बहुविधात्मक होने की राह भी चुन सकता है। उसमें कथा, निबंध, आलोचना, संस्मरण आदि सब एक साथ घुले-मिले हो सकते हैं तो वहीं कथा में, शिल्प के स्तर पर केन्द्र का अभाव भी हो सकता है। कई बार ऐसे लेखन में कथा-सूत्र एक नहीं होता तो साथ ही अर्थ के कई स्तर भी होते हैं, वाक्यों में शब्दों से ज्यादा उनकी लय, उनके बीच का मौन और बिम्बों की बहुध्वन्यात्मकता एवं बहुसंवेदनात्मकता अर्थ देती है। प्रसिद्ध नारीविद जूलिया क्रिस्तेवा के ‘शब्दों में कहें तो केवल ‘सिम्बॉलिक‘ ही नहीं ‘सिमियाटिक‘ भी अर्थोत्पत्ति की प्रक्रिया में समान भूमिका निभाता है। लूसी इरिग्रे जैसी फ्रेंच नारिवादियों का आग्रह तो स्त्री की यौनिकता और उसकी लेखन शैली एवं शिल्प को एकाकार करने का है। वे कलम को स्याही में नहीं बल्कि दूध में डुबा कर लिखने की बात करती हैं और नितांत स्त्री अनुभवों जैसे ऋतुस्राव, गर्भाधान आदि को लेखन में अभिव्यक्त करने पर जोर देती हैं।
अब जब स्त्री चिंतन भाषा और दर्शन में विलोम युग्मकों के बीच व्याप्त अतिवाद को विरचित कर उलट देने की वकालत करता है तब इस विरचन को सम्भव बनाने के टूल या उपकरण क्या हैं? यह टूल किसी भी पाठ की स्त्रीवादी पढत करना है।
'आउशवित्ज' की स्त्रीवादी पढ़त की जाए तो कुछ और पहलू उभर कर आते हैं। जैसा कि कहा गया, स्त्री-लेखन बहुविधात्मक होता है। किसी मान्य परिपाटी का अनुसरण उसमें हो भी सकता है और नहीं भी। 'आउशवित्ज' में भी पारंपरिक उपन्यास की मान्य परिपाटी का अनुसरण नहीं है। हंस में छपी समीक्षा में समीक्षक ने इस ओर ध्यान भी दिलाया है, कि इस उपन्यास में शोध-रिपोर्ट, यातना के शिकार लोगों के इंटरव्यू, डायरी, पत्र, संस्मरण आदि के सहारे उस पूरे परिदृश्य (होलोकास्ट) को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। यद्यपि यह उपन्यास के कथानक को ठीक से समझने और उस ऐतिहासिक सन्दर्भ से जुड़ने में पाठक की मदद करता है, लेकिन इसे थोड़ी और कथात्मकता के साथ प्रस्तुत किया गया होता तो कलात्मक रूप से भी उपन्यास और अधिक प्रभावशाली हो सकता था।
अमीष की इस टिप्पणी को पारंपरिक समीक्षा के उदाहरण के बतौर लिया जा सकता है। शोध-रिपोर्ट, यातना के शिकार लोगों के इंटरव्यू, डायरी, पत्र, संस्मरण आदि का जिक्र कर एक ओर अमीष इस उपन्यास की बहुविधात्मकता की ओर ध्यान दिलाते हैं जो कि स्त्री लेखन का प्रमुख लक्षण है, तो साथ ही वे कहते हैं कि ‘थोड़ी और कथात्मकता’ होती तो ‘कलात्मक रूप से भी उपन्यास और अधिक प्रभावशाली हो सकता था।’ कलात्मकता होती तो अच्छा होता, लेकिन यह कलात्मकता पुरुषवादी आग्रह भी तो है! कलात्मकता का अस्वीकार स्त्री लेखन का आग्रह भी हो सकता है। इस उपन्यास का जैसा कथ्य है उसमें कलात्मकता की गुंजाइश कम है। शब्द भावों को धक्का मार कर आलाप करते हुए संगीतमय तब होते हैं जब मन में गहरे अनुराग का भाव हो। जैसा कि विनोद कुमार शुक्ल के चरित्रों सोनसी और रघुवर प्रसाद में है। ठहरी हुई आंखों और स्तंभित हृदय की बात कहने वाली भाषा और उसका शिल्प सुस्त और अभिधात्मक हो सकते हैं और ऐसा ही इस उपन्यास में भी है। युद्ध की विभीषिका और यातनाओं की अभिव्यक्ति बहुत कलात्मक शायद हो सकती हो लेकिन उस भाव का क्या जो लेखक और पाठक के मन पर सन्नाटे की तरह छाया रहता है, इसलिए वाक्य सीधे निकलते हैं और सीधे ही धर भी दिए जाते हैं। इतने गंभीर कथानक से किसी विशेष शिल्प की अपेक्षा ज्यादती होगी। यह इस उपन्यास की कमी मानिए या चाहिए तो यही इसकी विशिष्टता और मजबूती भी है।
और अंत में, आउशवित्ज़ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें वर्णित स्त्री, उसके सवाल उपन्यास ख़त्म होने के साथ ख़त्म नहीं हो जाते और न ही उपन्यास का अंत पाठक को मुक्त करता है। इतिहास में दफ़न हर उस स्त्री जिसके अस्तित्व को युद्ध ने तार-तार कर दिया है, वह उस स्त्री के अनुत्तरित सवालों की फेहरिश्त पाठक को थमा कर बेचैन कर जाता है. प्रतीति द्वितीय विश्व युद्ध के बंदियों के आउशवित्ज़ में संग्रहित पत्र पढ़ आत्मालाप करती है,
“कहाँ है मेरा घर, कहाँ से आई हूँ,
कहाँ जाउंगी, कौन है मेरा,..
ऐसा लगता है मैं सालों से इन्हीं बैरकों में हूँ,
दोहरी झुकी कमर, दुबले गाल,
खोखली नज़र से मुक्ति की आस देखती...
रोटी के निवाले की चोरी करती हुई,
भूखी अंतड़ियों की मरोड़ को दोनों हाथों से थामे हुए,
गोद में अपना मरा बच्चा लिए हुए,
केशहीन, वस्त्रहीन, बिजली की तारों के पार फलाँग
जीवन के असंभव स्वप्न देखने की ज़द्दोजहद करती
मैं ही हूँ...”
प्रतीति का यह आत्मालाप पढ़ते हुए 'अंधायुग' का अश्वत्थामा याद आता है।
“मैं यह तुम्हारा अश्वत्थामा...
शेष हूँ अभी तक, जैसे रोगी मुर्दे के मुख में शेष रहता है
गंदा कफ, बासी थूक
शेष हूँ अभी तक मैं
आत्मघात कर लूं ?...
पिछली नरकाग्नि में उबलना पड़े
तो भी शायद
इतनी यातना नहीं होगी...
किन्तु नहीं!
जीवित रहूँगा मैं...”
(चतुर्थ अंक, अंधा युग, धर्मवीर भारती)
प्रतीति के आत्मालाप में अश्वत्थामा की पीड़ा सुनाई देती है, अंतर यह है कि अश्वत्थामा प्रतिशोध चाहता है, पर स्त्री? वह किससे प्रतिशोध लेगी? पति? प्रेमी? पुत्र? समाज और उसकी व्यवस्था जिसमें स्त्री के लिए कोई जगह नहीं? इसलिए स्त्री की शब्दावली में प्रतिशोध नहीं है! स्त्री की पीड़ा तो अश्वत्थामा से ज्यादा है लेकिन वह कुचल दिए जाने के बाद फिर से उग आने वाली दूब है जो धरती को हरा-भरा करना चाहती है, प्रतिशोध नहीं चाहती! वह बिजली के तारों के पार फलाँग लगा कर समाज की हर क्रूरता को लांघ जाना चाहती है, एक बार फिर से जीवन की संभावनाएं तलाशने के लिए!
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| तृप्ति श्रीवास्तव |
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त तृप्ति श्रीवास्तव हिन्दी भाषा और साहित्य की प्रखर अध्येता, हैं। इनकी एक महत्त्वपूर्ण किताब 'भक्ति परम्परा का प्राच्यवादी पाठ' 2018 में नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित है। भारत की बौद्धिक परंपराओं की उपनिवेशवाद से भिड़ंत सम्बन्धित बहसों और शोध में संलग्न हैं।
सम्पर्क
ई मेल : jnu.tripti@gmail.com



बहुत खूब. सुन्दर समीक्षा.
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