रवि रंजन का आलेख 'साम्प्रदायिकता का समाजशास्त्र और अशोक वाजपेयी की ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता का उत्तर-संरचनावादी पाठ'
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| अशोक वाजपेई |
'साम्प्रदायिकता का समाजशास्त्र और अशोक वाजपेयी की ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता का उत्तर-संरचनावादी पाठ।'
रवि रंजन
वह बूढ़ा मुसलमान
भोर हो चुकी होती है—
सुबह घूमने वाले आधा रास्ता पार कर चुके होते हैं,
तब नई कॉलोनी के किसी दफ़्तर की
रात भर चौकीदारी करने के बाद
वह बूढ़ा मुसलमान
अपनी सफ़ेद दाढ़ी और यातना से तपा चेहरा लिए
आता है,
और ढाल पर बिछे उस बोगनबेलिया के बग़ीचे को
पार करते हुए
पुराने शहर की ओर उतर जाता है।
एक देवता की तरह निस्संग और नि:स्पृह
वह अपनी समूची ज़िंदगी और उसके सुख-दु:खों को
पान की पोटली की तरह
एक छोटी-सी झोली में डाले हुए,
हर रोज़ जाता है
किसी जनाकीर्ण मुहल्ले के धीरे-धीरे ढहते घर की ओर।
वह किसे देखता है और किसे नहीं
यह कहना मुश्किल है—
उसके चेहरे पर मुतमईन होने का भाव होता है
कि उसने रात की चौकीदारी ठीक से पूरी की।
वह बग़ीचे के घुमावदार रास्तों पर नहीं
ख़ुद अपनी बनाई पगडंडी पर चुपचाप चलता जाता है—
उसके पास शायद नहीं है शहर की वारदातों की ख़बर,
तंदरुस्ती बनाए रखने के लिए
सुबह-सुबह चिकनी-चुपड़ी सड़कों पर घूमते
खाए-पिए लोगों की ख़बर,
चिड़ियों-पक्षियों, सूखी पत्तियों, रात की नमी और
पँखुरियों के एक चकत्ते पर सोई आदिवासी मज़दूरिन की ख़बर—
पर कभी-कभार वह सिर ऐसे झटक ऊपर देखता है आसमान की तरफ़
मानो किसी बूढ़े ईश्वर की तरफ़
जैसे उसे हर हालत में अपने आदमी होने की पूरी ख़बर है।
अशोक वाजपेयी
सांप्रदायिकता केवल एक राजनीतिक शब्दावली नहीं है, बल्कि यह एक जटिल मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संरचना भी है जो पहचान, स्मृति और भय के त्रिकोण पर टिकी होती है। जब हम अशोक वाजपेयी, केदार नाथ सिंह और देवी प्रसाद मिश्र की कविताओं के माध्यम से भारतीय समाज में मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय पर नज़र डालते हैं, तो इस सन्दर्भ में हमें समाजशास्त्रीय सिद्धांतों और मनोवैज्ञानिक गुत्थियों का एक ऐसा जाल दिखाई देता है जो आधुनिक राष्ट्र-राज्य की विसंगतियों को उजागर करता है। इन कवियों ने धर्म को एक ईश्वरीय आस्था के बजाय एक नागरिक अनुभव, एक ऐतिहासिक बोझ और एक अस्तित्वपरक संघर्ष के रूप में देखा है। विशेषकर अशोक वाजपेयी की कविता 'वह बूढ़ा मुसलमान' उस खामोश त्रासदी को स्वर देती है जहाँ एक व्यक्ति अपनी पहचान को बोझ की तरह ढोने के बजाय एक गरिमापूर्ण 'कर्तव्य' की तरह जीता है, जबकि समाज उसे हाशिए की ओर धकेलता रहता है।
अशोक वाजपेयी की ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता समकालीन हिंदी कविता में एक ऐसे पाठ के रूप में सामने आती है, जो किसी प्रत्यक्ष राजनीतिक घोषणापत्र, वैचारिक नारे या भावनात्मक उभार के बिना भारतीय समाज की सबसे जटिल और संवेदनशील संरचनाओं को उद्घाटित करती है। यह कविता एक अत्यंत साधारण, लगभग अनदेखे रह जाने वाले दृश्य के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की नैतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परतों को खोलती है। इसमें केदार नाथ सिंह की ‘सन 1947 को याद करते हुए’ शीर्षक सुप्रसिद्ध कविता में आए ‘नूर मियाँ’ जैसे किसी पात्र से प्रगीतात्मक संवाद के माध्यम से किसी ऐतिहासिक घटना का उल्लेख या देवीप्रसाद मिश्र की बहुचर्चित ‘मुसलमान’ कविता में आए धूमिल शैली के मुहावरेदार बयानों की भरमार के बजाय से भिन्न कुछ साधारण दृश्यों के विवरणों को ही कविता का सबसे बड़ा सौंदर्यात्मक और वैचारिक उपकरण बनाया गया है। दूसरे शब्दों में, विवेच्य कविता का सौंदर्य किसी अलंकारिक चमत्कार में नहीं, बल्कि देखने की एक विशेष नैतिक मुद्रा में निहित है। यही कारण है कि यह रचना पाठक से मुसलमानों के प्रति सहानुभूति नहीं, बल्कि संवेदनशील चौकन्नेपन की माँग करती है।
‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता को यदि संरचनावादी दृष्टि से पढ़ा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इसका अर्थ किसी एक कथन या प्रतीक में निहित नहीं है। इसका अर्थ वस्तुत: संबंधों, द्वैतों, स्थानिक और कालिक विन्यास, देह, मौन और गति के माध्यम से निर्मित होता है। फर्डिनेंड द सॉस्यूर (Ferdinand de Saussure, 1857–1913) द्वारा प्रतिपादित संरचनावादी सिद्धांत के अनुसार भाषा और अर्थ स्थिर वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि वे संबंधों की एक प्रणाली में उत्पन्न होते हैं। इसी तरह साहित्यिक पाठ भी अपने अर्थ को अलग-अलग घटकों के आपसी संबंधों के माध्यम से रचता है। ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता किसी एक विचार को प्रतिपादित करने के बजाय ऐसी संरचना निर्मित करती है, जिसके भीतर पाठक सामाजिक यथार्थ को स्वयं पहचानने के लिए विवश होता है।
कविता की पहली पंक्ति -‘भोर हो चुकी होती है’- देखने में अत्यंत सामान्य लगती है, किंतु संरचनात्मक स्तर पर यह पूरी कविता की समय-संरचना को निर्धारित कर देती है। भोर न तो पूरी तरह रात है, न पूरा दिन। यह संक्रमण का समय है, जिसमें अंधकार पूरी तरह गया नहीं है और प्रकाश पूरी तरह आया नहीं है। क्लोद लेवी-स्ट्रॉस (Claude Lévi-Strauss, 1908–2009) के संरचनावादी मानवशास्त्र में संक्रमणकालिक अवस्थाओं को विशेष महत्व प्राप्त है, क्योंकि इन्हीं अवस्थाओं में सामाजिक अर्थ सबसे अधिक सक्रिय और अस्थिर होते हैं। इस कविता का समय भी ऐसा ही संक्रमणशील है। बूढ़ा मुसलमान न रात का निवासी है, न दिन का; वह रात की चौकीदारी कर के लौटता है, जब दिन के लोग अपनी सैर पर निकल चुके होते हैं। इस प्रकार उसका अस्तित्व स्वयं समय के हाशिये पर स्थित है।
इसके तुरंत बाद कविता में ‘सुबह घूमने वाले’ लोगों का उल्लेख आता है, जो आधा रास्ता पार कर चुके होते हैं। ये लोग स्वस्थ, खाए-पिए और साफ़ सुथरी सड़कों पर चलने वाले हैं। इनके समानांतर बूढ़ा मुसलमान प्रवेश करता है, जो रात भर श्रम करने के बाद लौट रहा है। यहाँ कविता एक मौलिक द्वैत रचती है—आराम और श्रम, दृश्य और अदृश्य, दिन और रात, उपभोग और सेवा। संरचनावाद के अनुसार ऐसे द्वैत विरोध के लिए नहीं, बल्कि अर्थ-निर्माण के लिए आवश्यक होते हैं। बूढ़ा मुसलमान इन सुबह घूमने वालों के बिना पूरी तरह समझा नहीं जा सकता, और ये घूमने वाले भी उसके बिना अधूरे हैं। लेकिन सामाजिक संरचना इन दोनों को बराबरी के स्तर पर नहीं रखती। कविता इसी असमानता को बिना किसी नैतिक टिप्पणी के सिर्फ़ दृश्य के माध्यम से उजागर करती है।
कविता का स्थान-विन्यास भी इसी संरचनात्मक द्वंद्व को गहराई देता है। ‘नई कॉलोनी’ और ‘पुराना शहर’ केवल भौगोलिक संकेत नहीं हैं, बल्कि आधुनिक भारतीय समाज की दो भिन्न सामाजिक संरचनाओं के प्रतिनिधि हैं। नई कॉलोनी नियोजित, सुरक्षित, मध्यवर्गीय और सत्ता के समीप है, जबकि पुराना शहर अतीत, भीड़, श्रम और हाशिए का क्षेत्र है। बूढ़ा मुसलमान रात भर नई कॉलोनी के किसी दफ़्तर की चौकीदारी करता है और भोर में पुराने शहर की ओर उतर जाता है। यह आवाजाही कविता की केंद्रीय संरचना बन जाती है। वह उस स्थान की रक्षा करता है, जो उसकी सामाजिक दुनिया नहीं है। यह स्थिति संरचनावादी अर्थ में केंद्र और परिधि के संबंध को उजागर करती है। केंद्र अपनी सुरक्षा परिधि से करवाता है, लेकिन परिधि को केंद्र में स्थान नहीं देता।
कविता में बूढ़े मुसलमान की पहचान किसी व्यक्तिगत नाम से नहीं, बल्कि सामाजिक श्रेणियों के माध्यम से होती है। वह बूढ़ा है, वह मुसलमान है, वह चौकीदार है। यह नामकरण स्वयं एक सामाजिक संरचना का परिणाम है, जिसमें व्यक्ति की पहचान उसके निजी गुणों से नहीं, बल्कि सामूहिक संकेतकों से तय होती है। लेकिन कविता इस संरचना को स्थिर नहीं रहने देती। बूढ़ा मुसलमान केवल ‘मुसलमान’ नहीं रह जाता, बल्कि वह एक श्रमिक देह, एक थका हुआ जीवन और एक नैतिक चेतना में रूपांतरित हो जाता है। इस तरह कविता पहचान की संरचना के प्रत्यक्ष रूप से नकारे बिना उसे भीतर से ढीला करती है ।
देह का चित्रण इस कविता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संरचनात्मक तत्त्व है। ‘सफ़ेद दाढ़ी’ और ‘यातना से तपा चेहरा’ केवल शारीरिक विवरण नहीं हैं, बल्कि समय और इतिहास के चिह्न हैं। यह देह किसी वीरता या बलिदान की देह नहीं है, बल्कि श्रम, उपेक्षा और निरंतर सतर्कता की देह है। मिशेल फूको (Michel Foucault, 1926–1984) ने अपनी पुस्तक ‘डिसिप्लीन एंड पनिश’ (Discipline and Punish : 1975) में दिखाया है कि आधुनिक समाज में सत्ता कैसे काम की लय, निगरानी, थकान और अनुशासन के माध्यम से देह पर अंकित होती है । कविता इस देह को करुणा या दया का विषय नहीं बनाती, बल्कि उसे दृश्य का हिस्सा बना कर उसकी गरिमा को बनाए रखती है।
कविता की भाषा अत्यंत संयमित है। केदार नाथ सिंह की ‘सन 1947 को याद करते हुए’ या देवीप्रसाद मिश्र की ‘मुसलमान’ कविता से भिन्न यहाँ कोई भावनात्मक विस्फोट या कोई नाटकीय मोड़ नहीं नहीं। अशोक वाजपेयी की इस रचना में पंक्तियाँ लंबी हैं, उनमें विराम हैं, और गति धीमी है। यह धीमी गति केवल शिल्पगत चुनाव नहीं, बल्कि कथ्य की लय है। बूढ़ा मुसलमान धीरे-धीरे चलता है, चुपचाप चलता है, और कविता भी उसी लय में चलती है। यहाँ रूप और अंतर्वस्तु का द्वंद्वात्मक संबंध स्पष्ट दिखाई देता है। कविता जो कहती है, वह उसके कहने के ढंग से अलग नहीं रहता। यही द्वंद्वात्मकता इस कविता को साधारण यथार्थ-चित्रण से अलग करती है।
‘ख़ुद अपनी बनाई पगडंडी’ का उल्लेख इस कविता की संरचनात्मक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण पंक्तियों में से एक है। बग़ीचे के घुमावदार रास्ते योजनाबद्ध, स्वीकृत और नियंत्रित हैं, जबकि पगडंडी अनौपचारिक, अदृश्य और आत्मनिर्मित है। यह अंतर केवल भौतिक नहीं, बल्कि सामाजिक है। मुख्य रास्ते सत्ता और मध्यवर्ग के लिए हैं, जबकि पगडंडी हाशिए पर के लोगों के वास्ते है। लेकिन कविता इस पदानुक्रम को उलट देती है। जीवन मुख्य रास्तों पर नहीं, बल्कि पगडंडी पर चलता है। यह संरचनात्मक उलटाव कविता की सबसे सूक्ष्म राजनीतिक क्रिया है।
‘मौन’ विवेच्य कविता का केंद्रीय तत्त्व है। बूढ़ा मुसलमान बोलता नहीं, और कविता भी उसकी ओर से बोलने का दावा नहीं करती। संरचनावादी दृष्टि से ‘मौन’ भाषा का अभाव नहीं, बल्कि उसका एक सक्रिय घटक है। रोमन याकॉबसन (Roman Jakobson, 1896–1982) के अनुसार संप्रेषण में जो कहा नहीं जाता, वह भी अर्थ रचता है। इस कविता में मौन सामाजिक भय, ऐतिहासिक अनुभव और आत्म-संरक्षण की संरचना को प्रकट करता है। कविता मौन को तोड़ने के बजाय उसे सुनने की नैतिक कोशिश करती है। कविता का अंतिम दृश्य, जहाँ बूढ़ा मुसलमान सिर झटक कर आसमान की ओर देखता है, पूरी संरचना को समेट लेता है। यह न पूरी तरह धार्मिक है, न पूरी तरह लौकिक। यह क्षण मनुष्य के आत्म-संवेदन का क्षण है। देरिदा (Jacques Derrida, 1930–2004) की ‘डिफ़रांस’ (Différance) की अवधारणा के आलोक में देखें तो यह दृश्य किसी निश्चित अर्थ पर समाप्त नहीं होता। अर्थ यहाँ स्थगित हो जाता है, टल जाता है। यह स्थगन कविता की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि है, क्योंकि यह पाठक को किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचने देती।
इस प्रकार संरचनावादी दृष्टि से ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ एक ऐसी कविता के रूप में सामने आती है, जिसमें अर्थ द्वैतों, संबंधों, गति, मौन और दृश्य-विन्यास के माध्यम से निर्मित होता है। यह कविता किसी विचार को स्थापित नहीं करती, बल्कि एक ऐसी संरचना रचती है, जिसके भीतर पाठक स्वयं सामाजिक, नैतिक और मानवीय अर्थों को पहचानने के लिए विवश होता है। यही इसकी सबसे बड़ी काव्यात्मक शक्ति है।
अगर संरचनावादी दृष्टि कविता के भीतर अर्थ-निर्माण की प्रणालियों और द्वैतों को पहचानने में सहायता करती है, तो उत्तर-संरचनावादी दृष्टि उन्हीं प्रणालियों की अस्थिरता, अपूर्णता और अंतर्विरोधों को उजागर करती है। अशोक वाजपेयी की ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता किसी स्थिर अर्थ, किसी एक नैतिक निष्कर्ष या किसी अंतिम राजनीतिक कथन पर समाप्त नहीं होती। यह बार-बार अर्थ को स्थगित करती है, टालती है और पाठक को व्याख्या की अनिश्चितता में बनाए रखती है। यही उत्तर-संरचनावादी संवेदना इस कविता की वैचारिक गहराई का मूल स्रोत बन जाती है।
उत्तर-संरचनावाद का केंद्रीय आग्रह यह है कि भाषा किसी पूर्व-निर्धारित सत्य को पारदर्शी रूप में व्यक्त नहीं करती, बल्कि वह स्वयं अर्थ को उत्पन्न भी करती है और विघटित भी करती है। जाक देरिदा (Jacques Derrida, 1930–2004) ने ‘Of Grammatology’ (1967) में यह प्रतिपादित किया कि अर्थ कभी पूर्ण उपस्थिति में नहीं होता, बल्कि वह अनुपस्थिति, अंतर और स्थगन के माध्यम से बनता है। ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ इस सिद्धांत का एक सशक्त काव्यात्मक उदाहरण है। कविता बूढ़े मुसलमान के अनुभव को पूरी तरह शब्दों में नहीं कहती। ‘यातना से तपा चेहरा’ जैसी पंक्ति यह नहीं बताती कि यातना किसने दी, कब दी, किस रूप में दी। यह अस्पष्टता कविता की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी रणनीति है। कविता किसी एक व्याख्या को निर्णायक नहीं बनाती, बल्कि कई संभावनाओं को एक साथ उपस्थित रखती है।
यह अनिर्णय उत्तर-संरचनावादी अर्थ में ‘डिफ़रांस’ (Différance) की प्रक्रिया को सक्रिय करता है। बूढ़ा मुसलमान कौन है, वह क्या सोचता है, उसे किससे भय है, यह सब कविता में स्थगित रहता है। पाठक इन रिक्त स्थानों को अपने सामाजिक अनुभव, ऐतिहासिक स्मृति और वैचारिक स्थिति के अनुसार भरता है। इस प्रकार कविता एक बंद पाठ नहीं, बल्कि एक खुला पाठ बन जाती है, जो हर पाठक के साथ नए अर्थ-संबंध रचती है। यह खुलापन कविता को किसी एक राजनीतिक व्याख्या में सीमित होने से बचाता है।
विखंडनवादी नज़रिए से देखें तो इस कविता का सबसे महत्वपूर्ण तत्त्व उसका मौन है। देरिदा के अनुसार किसी भी पाठ में जो अनुपस्थित है, जो कहा नहीं गया है, वही अक्सर सबसे अधिक अर्थपूर्ण होता है। ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ में सबसे अधिक अर्थ वही है जो कविता नहीं कहती। कविता यह नहीं कहती कि समाज अन्यायी है, यह नहीं कहती कि बूढ़ा मुसलमान पीड़ित है, यह नहीं कहती कि वह भयभीत है। इसके बावजूद यह सब कविता में उपस्थित है। मालिक मुहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ पर लिखते हुए विजय देव नारायण साही ने इस तरह के मौन को ‘दहाड़ती हुई चुप्पी’ कहा है। यह उपस्थिति भाषा के माध्यम से नहीं, बल्कि भाषा के अंतरालों, विरामों और चुप्पियों के माध्यम से निर्मित होती है।
कविता में बूढ़ा मुसलमान बोलता नहीं है, लेकिन उसका मौन निष्क्रिय नहीं है। यह मौन एक ऐतिहासिक और सामाजिक संरचना का परिणाम है। यहाँ मिशेल फूको (Michel Foucault, 1926–1984) के विचार विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाते हैं। मिशेल फूको के 'बायोपॉलिटिक्स' और 'अनुशासन' के सिद्धांतों के आलोक में यदि हम अशोक वाजपेयी के उस 'बूढ़े मुसलमान' को देखें, तो वह सत्ता की निगरानी की परिधि से बाहर अपनी एक निजी नैतिकता का निर्माण करता है। वह नई कॉलोनी के दफ़्तर में रात भर चौकीदारी करता है। यहाँ चौकीदारी केवल एक पेशा नहीं है, बल्कि एक रूपक है—उस जिम्मेदारी का जो एक अल्पसंख्यक समुदाय ऐतिहासिक रूप से उस समाज की सुरक्षा के लिए निभाता आया है जो शायद उसे अपना मानने में हिचकता है। फूको के अनुसार, आधुनिक समाज 'पैनोप्टिकॉन' (सर्वत्र निगरानी) की तरह कार्य करता है, जहाँ हाशिए के समुदायों को निरंतर देखा जाता है, पर उनकी पीड़ा को अनदेखा कर दिया जाता है। फ़ूको ने ‘The Archaeology of Knowledge’ (1969) और ‘Discipline and Punish’ (1975) में यह दिखाया है कि सत्ता केवल दमन के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुशासन और सामान्यीकरण के रूप में कार्य करती है। सत्ता यह भी तय करती है कि कौन बोलेगा, क्या बोलेगा और किसे चुप रहना होगा। बूढ़े मुसलमान का मौन किसी व्यक्तिगत स्वभाव का परिणाम नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनुशासन का प्रभाव है।
कविता में ‘चौकीदारी’ केवल एक पेशा नहीं है, बल्कि सत्ता की एक तकनीक है। फूको के अनुसार आधुनिक समाज निगरानी के माध्यम से स्वयं को सुरक्षित रखता है। बूढ़ा मुसलमान रात भर नई कॉलोनी के किसी दफ़्तर की निगरानी करता है। वह स्वयं निगरानी की प्रक्रिया का अंग है, लेकिन वह निगरानी की दृष्टि से मुक्त नहीं है। वह सत्ता की आँख का विस्तार है, लेकिन स्वयं उस आँख में शामिल नहीं है। यह स्थिति एक गहरे उत्तर-संरचनावादी विरोधाभास को जन्म देती है। जो व्यक्ति व्यवस्था की सुरक्षा करता है, वही व्यवस्था उसे संदेह की दृष्टि से देख सकती है। कविता इस विरोधाभास को किसी आलोचनात्मक वक्तव्य के बिना, केवल स्थिति के माध्यम से प्रकट करती है।
‘नई कॉलोनी’ और ‘पुराना शहर’ का द्वैत भी उत्तर-संरचनावादी ढंग से अस्थिर किया गया है। सामान्यतः नई कॉलोनी को आधुनिक, सुरक्षित और व्यवस्थित माना जाता है, जबकि पुराना शहर अव्यवस्थित, भीड़भाड़ वाला और पिछड़ा समझा जाता है। लेकिन कविता इस पदानुक्रम को स्थिर नहीं रहने देती। बूढ़ा मुसलमान नई कॉलोनी की सुरक्षा करता है, लेकिन उसका अपना जीवन पुराने शहर में है। लाभ-लोभ के व्याकरण से परिचालित आधुनिकता उसकी श्रम-शक्ति का उपयोग करती है, लेकिन उसे पूरी तरह स्वीकार नहीं करती। इस तरह यह कविता आधुनिकता और परंपरा के बीच स्थापित स्थिर द्वैत को भीतर से हिला देती है।
‘ख़ुद अपनी बनाई पगडंडी’ देरिदा के ‘विखंडनवाद’ (Deconstruction) की दृष्टि से कविता की सबसे निर्णायक पंक्ति है। पगडंडी मुख्य रास्ते का निषेध नहीं है, बल्कि उसके समानांतर एक वैकल्पिक अस्तित्व है। देरिदा के अनुसार हाशिया हमेशा केंद्र पर निर्भर नहीं होता; कई बार हाशिया ही अर्थ का वास्तविक स्रोत बन जाता है। पगडंडी पर चलना कोई रोमांटिक विकल्प नहीं, बल्कि जीवित रहने की व्यावहारिक बुद्धि है। कविता इस पगडंडी को महिमामंडित नहीं करती, बल्कि उसे सहज रूप में स्वीकार करती है। यही सहजता कविता की ‘विखंडनवादी’ शक्ति है।
‘देवता’ की उपमा भी ‘विखंडन’ की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बूढ़ा मुसलमान ‘देवता की तरह निस्संग और नि:स्पृह’ है। यह उपमा देवता और मनुष्य, पवित्र और सांसारिक, ऊँच और नीच के पारंपरिक द्वैतों को तोड़ देती है। देवता यहाँ सर्वशक्तिमान नहीं है, बल्कि बूढ़ा, थका हुआ और अकेला है। इस उपमा के माध्यम से कविता धर्म की सत्ता को भी मानवीय स्तर पर ले आती है। धर्म यहाँ किसी राजनीतिक पहचान का उपकरण नहीं, बल्कि एक निजी, लगभग अस्तित्वगत अनुभव बन जाता है।
कविता का अंतिम दृश्य, जहाँ बूढ़ा मुसलमान सिर झटक कर आसमान की ओर देखता है, उत्तर-संरचनावादी अर्थ में किसी निष्कर्ष पर नहीं, बल्कि एक प्रश्न पर समाप्त होता है। ‘मानो किसी बूढ़े ईश्वर की तरफ़’—में यह ‘मानो’ शब्द वस्तुत: अर्थ को स्थगित कर देता है। यहाँ कोई निश्चित धार्मिक आश्वासन नहीं है, कोई आध्यात्मिक समाधान नहीं है। यह अनिश्चितता ही कविता की नैतिक ईमानदारी है। साम्प्रदायिक यथार्थ स्वयं किसी एक उत्तर में नहीं सिमटता, और कविता उसी असमापन को अपना रूप बनाती है।
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से इस कविता को पढ़ने पर यह और स्पष्ट हो जाता है कि यह रचना केवल समकालीन साम्प्रदायिकता की नहीं, बल्कि औपनिवेशिक आधुनिकता से विरासत में मिली सामाजिक संरचनाओं की भी आलोचना करती है। एडवर्ड सईद (Edward Said, 1935–2003) ने ‘Orientalism’ (1978) में दिखाया है कि उपनिवेशवाद केवल राजनीतिक शासन नहीं था, बल्कि उसने ज्ञान, इतिहास और पहचान की ऐसी संरचनाएँ निर्मित कीं, जो स्वतंत्रता के बाद भी जीवित रहीं। भारत में मुसलमान की पहचान भी इसी औपनिवेशिक ज्ञान-रचना और बाद की राष्ट्रवादी राजनीति से गहराई से प्रभावित रही है।
नई कॉलोनी, दफ़्तर, चौकीदारी और निगरानी—ये सभी औपनिवेशिक शहरी संरचना के अवशेष हैं। औपनिवेशिक शासन ने शहरों को इस तरह विभाजित किया कि शासक, मध्यवर्ग और श्रमिक के लिए अलग-अलग निर्धारित स्थान हों। स्वतंत्र भारत में इन स्थानों ने अपना रूप बदला, लेकिन उनकी मानसिकता बनी रही। बूढ़ा मुसलमान इस औपनिवेशिक-उत्तर औपनिवेशिक शहर का एक जीवित अवशेष है। देरिदा इसे ‘ट्रेस’ (trace) कहते हैं । वह राष्ट्र के लिए उपयोगी है, लेकिन राष्ट्र की कल्पना के केंद्र में नहीं है।
रोमिला थापर ने ‘अर्ली इंडिया’ (2002) और ‘द पास्ट एंड प्रेजेंट’ (2014) में यह दिखाया है कि आधुनिक भारत में साम्प्रदायिक दृष्टि के तहत इतिहास को किस तरह सांप्रदायिक और एकरेखीय रूप में पुनर्गठित करने की कोशिशें होती रही हैं। इस प्रक्रिया में मुसलमानों की ऐतिहासिक उपस्थिति को या तो आक्रमणकारी के रूप में प्रस्तुत किया गया या एक समाप्त अध्याय के रूप में। ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता इस इतिहास-बोध को भीतर से चुनौती देती है। यह कविता मुसलमान को किसी ऐतिहासिक आख्यान में नहीं, बल्कि वर्तमान के एक जीवित शरीर में रखती है।
हरबंस मुखिया ने ‘द मुग़ल ऑफ़ इंडिया’ (2004) और ‘मिडिवल इंडिया: हिस्टोरिओग्राफ़ी’ (2014) में दिखाया है कि किस तरह आधुनिक युग में साम्प्रदायिक दृष्टियाँ अतीत को वर्तमान की राजनीति के अनुसार पढ़ती हैं। अशोक वाजपेयी की इस कविता में इतिहास किसी ग्रंथ या स्मारक के रूप में नहीं, बल्कि देह पर अंकित अनुभव के रूप में उपस्थित है। ‘यातना से तपा चेहरा’ किसी एक घटना का नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शासन, विभाजन, उसके बाद की असुरक्षा और लगातार संदेह की स्थिति के एक लंबे ऐतिहासिक सिलसिले का संकेत है।
अमर्त्य सेन ने ‘आइडेंटिटी ऐंड वायलेंस’ (2006) में यह तर्क दिया है कि हिंसा तब जन्म लेती है जब व्यक्ति की बहुस्तरीय पहचान को घटा कर एक इकहरी पहचान बना दिया जाता है। ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता इसी संकुचन का प्रतिरोध करती है। यह बूढ़ा व्यक्ति केवल मुसलमान नहीं है। वह श्रमिक है, बूढ़ा है, चौकीदार है, शहर का निवासी है और एक ऐसा मनुष्य है जिसे अपने आदमी होने की पूरी ख़बर है। कविता उसकी पहचान को किसी एक श्रेणी में बंद नहीं करती। इस प्रकार यह कविता इकहरी पहचान की राजनीति को सौंदर्यबोध के स्तर पर अस्वीकार करती है।
देवी प्रसाद मिश्र की कविता 'मुसलमान' इसी इकहरी पहचान के विरुद्ध एक विराट समाजशास्त्रीय दस्तावेज़ की तरह खड़ी होती है। मिश्र उन ऐतिहासिक मिथकों और पूर्वाग्रहों पर चोट करते हैं जो मुसलमानों को 'विपत्ति', 'प्रदूषण' या 'व्याधि' की तरह देखते रहे हैं। वे याद दिलाते हैं कि ये लोग केवल बाहर से आए आक्रमणकारी नहीं थे, बल्कि वे सभ्यता के निर्माता थे। लखनऊ, इलाहाबाद, मेहराब, गुंबद, और यहाँ तक कि 1857 का स्वतंत्रता संग्राम भी उनके बिना अधूरा है। ह़सन सरूर ने अपनी विमर्शों में अक्सर यह रेखांकित किया है कि भारतीय मुसलमान एक 'दोहरी अस्मिता' के संकट से गुजरता है—जहाँ उसे अपनी भारतीयता को प्रमाणित करने के लिए निरंतर दबाव में रहना पड़ता है। मिश्र की कविता में यह डर और हिचक स्पष्ट दिखती है जब वे कहते हैं कि वे
'इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे
वे ख़ुश होते थे और ख़ुश हो कर डरते थे।
यह 'डर' एक मनोवैज्ञानिक विकार नहीं, बल्कि एक सामाजिक संरचना का परिणाम है।
केदार नाथ सिंह की कविता 'सन् 1947 को याद करते हुए' उस स्मृति के घाव को कुरेदती है जिसे समाजशास्त्री अक्सर ‘सामूहिक आघात’ (कलेक्टिव ट्रॉमा) कहते हैं। नूर मियाँ का अचानक गायब हो जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक साझा भूगोल और साझा संस्कृति के एक हिस्से का कट जाना है। इस कविता में वाचक का प्रश्न—'हर साल कितने पत्ते गिरते हैं पाकिस्तान में?'—उस भौगोलिक विडंबना की ओर संकेत करता है जहाँ भावनाएं और स्मृतियाँ सीमाओं के गणित में उलझ कर रह गई हैं। यह गणित की विफलता है, जैसा कि कवि स्वयं स्वीकार करता है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से, यह उस 'अन्य' (The Other) के प्रति हमारे अलगाव को दर्शाता है। हम नूर मियाँ के साथ पढ़ते थे, उनसे सुरमा खरीदते थे, पर एक दिन वे हमारी 'स्लेट' से मिटा दिए गए। यह विलोपन ही सांप्रदायिकता की पहली सीढ़ी है, जहाँ मनुष्य को 'आँकड़ों' और 'मानचित्रों' में बदल दिया जाता है।
अशोक वाजपेयी की कविता में जो 'पान की पोटली' और 'छोटी-सी झोली' है, वह उस सांस्कृतिक संचय का प्रतीक है जिसे एक बूढ़ा मुसलमान अपने साथ ढोता है। वह 'देवता की तरह निस्संग' है। यहाँ 'निस्संगता' एक रक्षा तंत्र (Defense Mechanism) है। जब समाज आपको निरंतर संदिग्ध नज़र से देखता है, तो आप अपने भीतर एक एकांत रच लेते हैं। अशोक वाजपेयी का पात्र उस 'पँखुरियों के चकत्ते पर सोई आदिवासी मज़दूरिन' की ख़बर तो नहीं रखता, लेकिन उसे अपने 'आदमी होने की पूरी ख़बर' है। यह 'आदमी होना' ही सबसे बड़ा प्रतिरोध है।
यहाँ देरिदा की ‘हॉस्पिटैलिटी’ की अवधारणा पर गौर करना ज़रूरी है जो हमें यह समझने के लिए बाध्य करती है कि नैतिकता कोई सहज या आरामदेह स्थिति नहीं है। ‘अन्य’ को स्वीकार करना हमेशा जोखिम से भरा होता है और इसी जोखिम में नैतिकता का वास्तविक अर्थ निहित है। Hospitality एक ऐसी असंभव माँग है जिसे हम कभी पूरी तरह पूरा नहीं कर सकते, लेकिन जिसके बिना न्याय, मनुष्यता और सह-अस्तित्व की कल्पना भी संभव नहीं है। कहना न होगा कि भारतीय समाज में मुसलमान को अक्सर एक 'अनंत मेहमान' की तरह देखा जाता रहा है जिसे अपनी जगह के लिए बार-बार किराया चुकाना पड़ता है—चाहे वह चौकीदारी के रूप में हो या वफ़ादारी के सबूत के रूप में।
'हॉस्पिटैलिटी' (Hospitality) के सिद्धांत के अनुसार, मेजबान और मेहमान के बीच का संबंध हमेशा सत्ता संतुलन पर टिका होता है। देरिदा के ‘हॉस्पिटैलिटी’ (hospitality) का दार्शनिक और सैद्धान्तिक संदर्भ केवल ‘अतिथि-सत्कार’ पदबंध से व्यक्त नहीं होता, क्योंकि उसमें केवल स्वागत या सेवा नहीं, बल्कि सत्ता, शर्त, सीमा और ‘अन्य’ के प्रति नैतिक खुलापन शामिल हैं। इस अर्थ में अतिथि-सत्कार कोई साधारण नैतिक सद्गुण नहीं है, बल्कि यह एक गहन दार्शनिक समस्या है जो ‘अन्य’ के साथ हमारे संबंध की पूरी संरचना को प्रश्नांकित करती है। देरिदा इस प्रश्न से शुरुआत करते हैं कि क्या हम वास्तव में किसी अजनबी को, किसी बाहरी को, उसकी पूर्ण भिन्नता के साथ स्वीकार कर सकते हैं, या हर बार उसे स्वीकार करते समय हम उससे कुछ न कुछ शर्तें जोड़ देते हैं। उनके लिए ‘हॉस्पिटैलिटी’ का अर्थ केवल किसी को अपने घर में प्रवेश देना नहीं है, बल्कि अपने अर्थ-तंत्र, अपनी पहचान, अपनी सत्ता और अपने स्वामित्व को दाँव पर लगा कर ‘अन्य’ के लिए जगह बनाना है। देरिदा यह स्पष्ट करते हैं कि जिसे हम सामान्यतः अतिथि-सत्कार कहते हैं, वह प्रायः सशर्त होता है। हम अतिथि का नाम पूछते हैं, उसकी पहचान जानते हैं, उसके आने के उद्देश्य को समझना चाहते हैं और यह तय करते हैं कि वह कितनी देर ठहरेगा। यह सब हमें सुरक्षित महसूस कराता है क्योंकि इससे मेज़बान की सत्ता बनी रहती है। घर, राष्ट्र या समाज की सीमाएँ सुरक्षित रहती हैं। यह ‘हॉस्पिटैलिटी’ क़ानून, नियम और व्यवस्था से जुड़ी होती है और आधुनिक राज्य इसी प्रकार के अतिथि-सत्कार पर आधारित है। इसमें कोई व्यक्ति तभी स्वीकार्य होता है जब वह निर्धारित शर्तों को पूरा करता है।
इसके विपरीत देरिदा एक ऐसी ‘हॉस्पिटैलिटी’ की कल्पना करते हैं जो पूरी तरह निशर्त हो। इसमें अतिथि से कोई प्रश्न नहीं किया जाता, न उसका नाम पूछा जाता है, न उसकी पहचान, न उसका धर्म, न उसकी भाषा और न ही उसके आने का कारण। वह बिना बुलाए भी आ सकता है और फिर भी उसका स्वागत किया जाना चाहिए। यह इतनी कट्टर नैतिक माँग है कि इसमें मेज़बान स्वयं को असुरक्षित कर लेता है। वह अपने घर, अपनी सत्ता और अपने नियंत्रण को खोने के जोख़िम को स्वीकार करता है। देरिदा के अनुसार सच्चा अतिथि-सत्कार तभी संभव है जब मेज़बान इस जोख़िम के लिए तैयार हो, भले ही इसका अर्थ यह हो कि वह स्वयं अपने ही घर में पराया हो जाए।
यहीं देरिदा एक मूलभूत तनाव की ओर संकेत करते हैं। निशर्त हॉस्पिटैलिटी नैतिक रूप से अनिवार्य है, लेकिन व्यावहारिक और संस्थागत स्तर पर लगभग असंभव है। यदि कोई समाज पूरी तरह निशर्त हॉस्पिटैलिटी को अपनाने का प्रयास करे, तो उसकी व्यवस्था, क़ानून और सीमाएँ टूट सकती हैं। इसके बावजूद देरिदा कहते हैं कि यदि हम केवल सशर्त हॉस्पिटैलिटी पर ही टिके रहें, तो नैतिकता का मूल प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। इस प्रकार हॉस्पिटैलिटी एक ऐसी स्थिति बन जाती है जहाँ पूर्ण समाधान संभव नहीं है, लेकिन उसी असंभव माँग में नैतिकता ही जीवित रहती है।
देरिदा इसे क़ानून और न्याय के अंतर से भी जोड़ते हैं। क़ानून हमेशा सशर्त होता है, वह नियम बनाता है, सीमाएँ खींचता है और तय करता है कि कौन भीतर आएगा और कौन बाहर रहेगा। न्याय इसके विपरीत हमेशा असीम और निशर्त होता है। न्याय की माँग यह होती है कि हर ‘अन्य’ को उसकी मानवता के आधार पर स्वीकार किया जाए। उनकी अवधारणा इसी न्याय की माँग का रूप है, जो क़ानून को लगातार चुनौती देती रहती है और उसे अस्थिर करती है। इसीलिए देरिदा के लिए न्याय कभी पूरी तरह साकार नहीं हो सकता, लेकिन वह क़ानून के लिए एक नैतिक दबाव बना रहता है।
इस पूरी अवधारणा के केंद्र में ‘अन्य’ का प्रश्न है। देरिदा के अनुसार ‘अन्य’ वह है जिसे ‘मैं’ पूरी तरह समझ नहीं सकता और अपने अर्थ-तंत्र में समाहित नहीं कर सकता। सच्ची हॉस्पिटैलिटी का अर्थ यह नहीं है कि हम ‘अन्य’ को अपने जैसा बना लें, बल्कि यह है कि बिना उसे मिटाए हम उसकी भिन्नता को स्वीकार करें। इस दृष्टि से ‘हॉस्पिटैलिटी’ समायोजन या आत्मसात करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक नैतिक खुलापन है, जिसमें ‘अन्य’ अपनी अपरिचितता के साथ उपस्थित रहता है।
आधुनिक दुनिया में यह अवधारणा विशेष रूप से शरणार्थियों, प्रवासियों, अल्पसंख्यकों और हाशिये पर खड़े समुदायों के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। राज्य और समाज अक्सर उनसे पहचान, प्रमाण और वैधता की माँग करते हैं, जबकि देरिदा की नैतिक माँग यह है कि पहले उन्हें मनुष्य के रूप में स्वीकार किया जाए। यही कारण है कि हॉस्पिटैलिटी की यह अवधारणा केवल दार्शनिक नहीं रह जाती, बल्कि गहरे राजनीतिक और नैतिक प्रश्नों को जन्म देती है।
हसन सुरूर ने भारतीय मुसलमान की असुरक्षित नागरिकता और ‘संदेह के नागरिक’ की स्थिति पर पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक मसलों पर टिप्पणी के रूप में बार-बार लिखा है। अशोक वाजपेयी की कविता में बूढ़ा मुसलमान इस असुरक्षा को किसी बयान में नहीं, बल्कि जीवन की लय में जीता है। वह रात भर पहरा देता है, सुबह चुपचाप लौट जाता है और अपनी पगडंडी पर चलता है। कविता इस चुप्पी को राष्ट्रभक्ति का प्रमाण नहीं बनाती, बल्कि उसकी विडंबना को दर्ज करती है।
इस प्रकार ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता उत्तर-संरचनावादी, विखंडनवादी और उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टियों से एक ऐसा पाठ बन जाती है, जो सत्ता, पहचान, इतिहास और भाषा की स्थिर संरचनाओं को बिना किसी घोषित प्रतिरोध के भीतर से प्रश्नांकित करती है। यह कविता सिद्धांतों का उदाहरण नहीं, बल्कि एक ऐसा काव्यात्मक अनुभव है, जिसकी व्याख्या करने में सिद्धांत बहुत दूर तक साथ नहीं देते। सच तो यह है कि ऐसी काव्यात्मक संरचनाओं से कभी-कभार प्रभावशाली सिद्धांत जन्म लेते हैं।
अत: यह स्पष्ट होता है कि अशोक वाजपेयी की ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता केवल एक संवेदनशील मानवीय दृश्य का काव्यात्मक चित्रण नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारतीय समाज की सांप्रदायिक संरचनाओं, उत्तर-औपनिवेशिक नागरिकता, सत्ता और मौन के जटिल संबंधों का एक गहरा टेक्स्ट है। यह कविता किसी एक सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं करती, बल्कि अनेक सैद्धांतिक दृष्टियों से संवाद करते हुए भी अपनी काव्यात्मक स्वायत्तता बनाए रखती है। यही वह बिंदु है जहाँ यह कविता आलोचनात्मक सिद्धांतों के उदाहरण होने से बच कर स्वयं एक आलोचनात्मक उपकरण में बदल जाती है।
अंतर्वस्तु और रूप के द्वंद्वात्मक संबंध को यदि इस कविता के संदर्भ में समझा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यहाँ रूप किसी बाहरी सौंदर्य-बोध से संचालित नहीं है। कविता का शिल्प उस जीवन-लय से उत्पन्न होता है, जिसे वह देख रही है। बूढ़ा मुसलमान धीरे चलता है, चुपचाप चलता है, और कविता भी उसी धीमी, संयत और लगभग निर्विकार गति में आगे बढ़ती है। लंबी पंक्तियाँ, दृश्यात्मक विस्तार, विरामों की प्रचुरता और किसी भी प्रकार के भाषिक आवेग का अभाव—ये सभी रूपात्मक तत्त्व उस सामाजिक स्थिति के अनुरूप हैं जिसमें पात्र स्थित है। इस प्रकार कविता का रूप उसके कथ्य का अनुकरण नहीं करता, बल्कि उसका विस्तार बन जाता है। यही रूप–वस्तु का द्वंद्वात्मक संबंध है, जहाँ दोनों एक-दूसरे को गढ़ते हैं। विश्व विख्यात जर्मन-अमरीकी दार्शनिक एवं सौन्दर्यशास्त्री हर्बर्ट मार्क्युज़ (Herbert Marcuse : 1898-1979) ने ‘एस्थेटिक डायमेंशन’ (The Aesthetic Dimension: Toward a Critique of Marxist Aesthetics, 1978) पुस्तक में इसे ही ‘रूप होती हुई अंतर्वस्तु’ (कंटेंट हविंग बिकम फॉर्म) कहा है। उनके शब्दों में "साहित्य तभी क्रांतिकारी है जब वह स्वयं के प्रति सच्चा हो, यानी जब उसका 'कंटेंट फॉर्म बन चुका हो'।" दूसरे शब्दों में मार्क्युज़ के लिए, 'कंटेंट हविंग बिकम फॉर्म' का मतलब है कि कला सामाजिक यथार्थ को अपनी विशिष्ट शैली में ढाल कर उसे एक नया अर्थ देती है, जिससे वह यथार्थ के 'मृगतृष्णा' को तोड़ सके।
याद रहे कि पारंपरिक मार्क्सवादी विचारक मानते थे कि साहित्य का 'कंटेंट' (विषय-वस्तु) सबसे महत्वपूर्ण है और वह समाज के आर्थिक आधार (Base) या वर्ग-संघर्ष को प्रतिबिंबित करना चाहिए। मार्क्युज़ इसके विपरीत तर्क देते हैं कि साहित्य की क्रांतिकारी शक्ति उसके 'कंटेंट' (क्या कहा गया है) में नहीं, बल्कि उसके 'फॉर्म' (रूप/शैली) में होती है। कंटेंट' के स्वत: 'फॉर्म' बन जाने (Content becoming Form) की प्रक्रिया को समझाते हुए वे कहते हैं कि जब एक लेखक सामाजिक सच्चाई, दुख या संघर्ष (कंटेंट) को उठाता है, तो वह उसे जस का तस पेश नहीं करता। वह उसे भाषा, लय, संरचना और शैली (Form) के माध्यम से एक 'कलात्मक रूप' दे देता है। यहाँ कंटेंट खुद फॉर्म बन जाता है, यानी वह सामाजिक सच्चाई अब केवल एक रिपोर्ट नहीं रह जाती, बल्कि एक 'स्वतंत्र कलात्मक कृति' बन जाती है। जब कंटेंट 'फॉर्म' में बदल जाता है, तो वह रोज़मर्रा की सामान्य भाषा और समझ से अलग हो जाता है। मार्क्युज़ इसे 'एस्थेटिक सब्लिमेशन' कहते हैं। यह पाठक को मौजूदा दमनकारी वास्तविकता से दूर ले जाकर संभावना की दुनिया एक ऐसी दुनिया दिखाता है जो 'हो सकती है'। मार्क्युज़ का मानना है कि अगर कला केवल राजनीतिक संदेश (कंटेंट) देने का जरिया बनेगी, तो वह 'प्रचार' (Propaganda) बन जाएगी। कला की असली मुक्तिदायी शक्ति उसकी स्वायत्तता में है, जो उसे समाज के बंधनों से ऊपर उठाती है।
इस सैद्धांतिक चर्चा को तत्काल स्थगित कर के मूल विषय की और लौटते हुए निवेदन है कि कविता में अंतर्वस्तु और रूप के बीच की यह द्वंद्वात्मकता संरचनावाद के उस आग्रह से जुड़ती है, जिसके अनुसार अर्थ किसी एक तत्त्व से नहीं, बल्कि संबंधों और अंतरालों से बनता है। ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता के भीतर दिन और रात, नई कॉलोनी और पुराना शहर, मुख्य रास्ता और पगडंडी, बोलना और चुप रहना—ये सभी द्वैत किसी स्थिर विरोध के रूप में नहीं आते, बल्कि निरंतर परस्पर संवाद में रहते हैं। बूढ़ा मुसलमान इन द्वैतों के बीच चलता हुआ एक जीवित संबंध बन जाता है। वह न पूरी तरह भीतर है, न पूरी तरह बाहर। यही ‘बीच की स्थिति’ अशोक वाजपेयी की इस कविता का केंद्रीय अनुभव बन जाती है।
उत्तर-संरचनावादी दृष्टि से यह ‘बीच’ कोई अस्थायी स्थिति नहीं, बल्कि एक स्थायी अस्तित्वगत दशा है। कविता किसी समाधान की ओर नहीं बढ़ती, बल्कि इस बीच की स्थिति को स्वीकार करती है। देरिदा के अनुसार अर्थ का स्थगन ही अर्थ की वास्तविक प्रक्रिया है। इस कविता में भी अर्थ किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता। बूढ़ा मुसलमान कौन है, उसका भविष्य क्या है, समाज उसे स्वीकार करेगा या नहीं—इन प्रश्नों का उत्तर कविता नहीं देती और उत्तर न देना ही कविता की वैचारिक ईमानदारी है।
यहाँ मौन का सवाल ख़ास तौर से महत्वपूर्ण हो जाता है। मौन इस कविता में केवल भाषिक अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि एक सामाजिक संरचना है। मिशेल फूको (Michel Foucault, 1926–1984) के ‘सत्ता-सिद्धांत’ के आलोक में देखें तो यह मौन उस अनुशासन का परिणाम है, जो तय करता है कि कौन बोल सकता है और कौन नहीं। बूढ़ा मुसलमान उस व्यवस्था का हिस्सा है जो उससे सुरक्षा का श्रम तो लेती है, लेकिन उसे आवाज़ नहीं देती। कविता इस मौन को तोड़ने का दावा नहीं करती, बल्कि उसे ध्यान से सुनती है। यह सुनना ही कविता का नैतिक हस्तक्षेप है।
यही नैतिकता विवेच्य कविता के ‘बूढ़ा मुसलमान’ को दया का पात्र और कविता को किसी करुण-पाठ में बदलने से बचाती है। कविता बूढ़े मुसलमान के प्रति सहानुभूति की माँग नहीं करती। वह उसे पीड़ित के रूप में प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि एक ऐसे मनुष्य के रूप में देखती है, जिसे अपने आदमी होने की पूरी ख़बर है। यह पंक्ति कविता की केंद्रीय नैतिक घोषणा है, लेकिन यह घोषणा किसी नारे के रूप में नहीं आती। यह एक साधारण दृश्य के भीतर, लगभग अनायास घटित होती है। यही कविता की सौन्दर्यशास्त्री राजनीति (Aesthetic politics) है। कवि यहाँ बड़े सत्य को छोटे संकेत में प्रकट करता है। यह विशेष प्रकार का कवि कौशल सिर्फ़ श्रेष्ठ कवियों की कुछ रचनाओं में दिखाई पड़ता है।
उत्तर-औपनिवेशिक संदर्भ में यह कविता भारतीय आधुनिकता की सीमाओं को उजागर करती है। औपनिवेशिक शासन ने जिस तरह नगरों, नागरिकता और श्रम को विभाजित किया, वह संरचना स्वतंत्रता के बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। नई कॉलोनी और पुराना शहर, इस विभाजन के भौतिक रूप हैं। बूढ़ा मुसलमान इस विभाजन के बीच फँसा हुआ नागरिक है ।वह आधुनिकता की सेवा करता है, लेकिन आधुनिकता उसे पूरी तरह स्वीकार नहीं करती। यह स्थिति एडवर्ड सईद द्वारा वर्णित ‘अन्य’ (अदर) की अवधारणा से गहरे रूप में जुड़ती है।
रोमिला थापर और हरबंस मुखिया ने भारतीय इतिहास के सांप्रदायिक पुनर्लेखन की जो आलोचना की है, अशोक वाजपेयी की यह कविता उसी आलोचना को कलानुभूति के स्तर पर वर्तमान के एक क्षण में रूपांतरित कर देती है। यहाँ मुसलमान कोई ऐतिहासिक प्रतीक नहीं, बल्कि एक जीवित, थका हुआ, काम करता हुआ शरीर है। इतिहास यहाँ स्मारकों और ग्रंथों में नहीं, बल्कि देह और श्रम में दर्ज है। यह दृष्टि इतिहास को सत्ता के आख्यान से निकाल कर जीवन के अनुभव में स्थापित करती है।
अमर्त्य सेन (Amartya Sen, 1933–2023) की बहुस्तरीय पहचान की अवधारणा इस कविता में अत्यंत स्वाभाविक रूप से साकार होती है। वजह यह कि ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ का बूढ़ा केवल मुसलमान नहीं है। विवेच्य कविता उसकी पहचान को किसी एक खांचे में बंद नहीं करती। यही वह बिंदु है जहाँ कविता इकहरी पहचान की राजनीति का प्रतिरोध करती है। कवि द्वारा यह प्रतिरोध किसी वैचारिक वक्तव्य से नहीं, बल्कि जीवन की जटिलता को दिखा कर किया गया है। कविता बताती है कि मनुष्य को एक पहचान में सीमित करना ही हिंसा की शुरुआत है।
हसन सुरूर ने भारतीय मुसलमान की जिस असुरक्षित नागरिकता की बात की है, वह इस कविता में किसी भयावह घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक स्थायी, अंतर्निहित तनाव के रूप में उपस्थित है। बूढ़ा मुसलमान डरता है, लेकिन यह डर उसे निष्क्रिय नहीं बनाता। वह अपने लिए रास्ते बनाता है, अपनी पगडंडी पर चलता है। यह पगडंडी किसी विद्रोह का उद्घोष नहीं, बल्कि ज़िंदा रहने की व्यावहारिक बुद्धि है। यही वह स्थान है जहाँ हाशिया अर्थ का केंद्र बन जाता है।
कविता का सौंदर्य इसी बुद्धि में निहित है। यह सौंदर्य किसी अलंकरण में नहीं, बल्कि संयम में है। यह कविता चिल्लाती नहीं, आरोप नहीं लगाती, समाधान नहीं देती। यह केवल देखती है—और हमें भी देखने के लिए विवश करती है। साम्प्रदायिकता जैसे शोरगुल से भरे विषय पर यह चुप्पी साधे यह कविता अपने मौन से अधिक तीव्र हस्तक्षेप करती है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि शायद सबसे बड़ा नैतिक कार्य बोलना नहीं, बल्कि सही ढंग से देखना और महसूस करना है।
साम्प्रदायिकता को सामान्यतः राजनीतिक रणनीति या धार्मिक कट्टरता के रूप में समझा जाता है, किंतु वस्तुतः यह एक जटिल मनो–सामाजिक प्रक्रिया है, जो भय, असुरक्षा, ऐतिहासिक स्मृति, सत्ता-संबंधों और सामाजिक संरचनाओं से निर्मित होती है। हिंदी कविता ने इस प्रक्रिया को प्रत्यक्ष घोषणाओं के बजाय मानवीय अनुभवों, मौन, विस्थापन और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सूक्ष्म बिंबों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। अशोक वाजपेयी, केदार नाथ सिंह और देवी प्रसाद मिश्र की मुस्लिम–केंद्रित कविताएँ साम्प्रदायिकता के मनोविज्ञान को तीन अलग-अलग लेकिन परस्पर जुड़े स्तरों—व्यक्ति, समुदाय और सभ्यता—पर उद्घाटित करती हैं।
अशोक वाजपेयी की कविता ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ साम्प्रदायिकता के उस रूप को सामने लाती है, जो हिंसक नहीं, बल्कि अदृश्य और मौन है। कविता का बूढ़ा मुसलमान कोई ऐतिहासिक पात्र या धार्मिक प्रतिनिधि नहीं, बल्कि एक साधारण चौकीदार है, जो रात भर की ड्यूटी के बाद चुपचाप अपने घर लौटता है। उसकी सफ़ेद दाढ़ी, यातना से तपा चेहरा और आत्मसंतोष का भाव यह संकेत देता है कि उसका जीवन संघर्ष और श्रम से निर्मित है, न कि किसी वैचारिक आक्रामकता से। वह शहर की वारदातों, अख़बारों की सुर्ख़ियों और सुबह की सैर करने वाले संपन्न नागरिकों से लगभग अनभिज्ञ है। यह अनभिज्ञता अज्ञान नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना द्वारा थोपी गई दूरी का परिणाम है। वह बग़ीचे के तय रास्तों के बजाय अपनी बनाई पगडंडी पर चलता है, जो अल्पसंख्यक समुदाय की उस मनोवैज्ञानिक स्थिति को प्रकट करती है, जिसमें सुरक्षा के लिए अलग रास्ता चुनना अनिवार्य हो जाता है। यहाँ साम्प्रदायिकता किसी दंगे या नारे के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था के रूप में उपस्थित है, जो मुसलमान को स्वीकार तो करती है, पर केवल श्रमिक और मौन नागरिक के रूप में।
केदार नाथ सिंह की कविता ‘सन् 47 को याद करते हुए’ साम्प्रदायिकता को स्मृति और अपराधबोध के धरातल पर रखती है। नूर मियाँ कोई प्रतीकात्मक मुसलमान नहीं, बल्कि कवि के बचपन की स्मृतियों से जुड़ा हुआ एक परिचित चेहरा है—रामगढ़ बाज़ार से सुरमा बेचकर लौटने वाला साधारण आदमी। कविता का केंद्रीय प्रश्न यह नहीं है कि नूर मियाँ क्यों चले गए, बल्कि यह है कि हम यह गणना क्यों नहीं कर पाते कि वे क्यों चले गए। यहाँ विभाजन एक ऐतिहासिक घटना न होकर एक मनोवैज्ञानिक आघात बन जाता है, जिसकी पीड़ा आज भी प्रश्नों के रूप में जीवित है। कवि का बार-बार पूछना और फिर चुप हो जाना बहुसंख्यक समाज की उस मानसिक अवस्था को दर्शाता है, जिसमें स्मृति तो है, पर स्वीकार करने का साहस नहीं। साम्प्रदायिकता यहाँ हिंसा से अधिक विस्मृति का नाम है—उस विस्मृति का, जिसमें पड़ोसी अचानक पराया हो जाता है और उसके चले जाने का उत्तर किसी के पास नहीं होता।
देवी प्रसाद मिश्र की लंबी कविता ‘मुसलमान’ साम्प्रदायिकता के मनो–सामाजिक विश्लेषण को सबसे व्यापक और तीव्र रूप में प्रस्तुत करती है। यह कविता भारतीय मुसलमान को एक साथ आक्रमणकारी, अप्रवासी, कारीगर, नागरिक और भयग्रस्त व्यक्ति के रूप में चित्रित करती है। मुसलमानों को विपत्ति, प्रदूषण और व्याधि कहे जाने की स्मृतियाँ उस सामूहिक मानस को उजागर करती हैं, जिसमें बहुसंख्यक समाज अपने डर को घृणा में बदल देता है। कविता यह भी रेखांकित करती है कि मुसलमान भारतीय सभ्यता के निर्माण में अनिवार्य रहे हैं—वास्तुकला, संगीत, भाषा और विद्रोह की चेतना में उनकी उपस्थिति के बिना उपमहाद्वीप की कल्पना ही अधूरी है। इसके बावजूद वे संदेह, कर्फ़्यू, पुलिस और अफ़वाहों के बीच जीने को विवश हैं। वे राम से भी डरते हैं और सत्ता से भी, जो यह दर्शाता है कि उनका भय धार्मिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर सक्रिय है। यहाँ साम्प्रदायिकता एक ऐसी स्थिति बन जाती है, जिसमें नागरिक का अपने ही मुल्क में फ़ैली फ़िरकापरस्ती के ज़हरीले माहौल में दम घुटता रहता है।
इन तीनों कविताओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि साम्प्रदायिकता केवल धर्मों के टकराव की कहानी नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की सामाजिक असुरक्षा, ऐतिहासिक विस्मृति और सत्ता-प्रेरित भय का परिणाम है। अशोक वाजपेयी के यहाँ मुसलमान एक अकेला, चुप और श्रमशील व्यक्ति है; केदारनाथ सिंह के यहाँ वह स्मृति से विस्थापित पड़ोसी है; और देवी प्रसाद मिश्र के यहाँ वह पूरी सभ्यता का अनिवार्य, किंतु संदेहास्पद नागरिक। मनो–सामाजिक दृष्टि से ये कविताएँ बताती हैं कि जब समाज डर और अफ़वाह से संचालित होने लगता है, तब सबसे पहले मनुष्य की सहजता और भरोसा नष्ट होता है। हिंदी कविता इस संदर्भ में किसी वैचारिक प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि आत्म-परीक्षण का गहन उपकरण बन जाती है, जो साम्प्रदायिकता को एक मानवीय त्रासदी के रूप में हमारे सामने रखती है।
सांप्रदायिकता का समाजशास्त्र हमें बताता है कि घृणा का निर्माण शून्यता में नहीं होता। देवी प्रसाद मिश्र की कविता में 'पी.ए.सी. के सिपाही' का डर और 'पवित्र रंगों' का डर उस सांस्थानिक सांप्रदायिकता की ओर संकेत करता है जहाँ राज्य की मशीनरी और धार्मिक प्रतीक डराने के औज़ार बन जाते हैं। वे लिखते हैं कि वे 'दमिश्क' के नहीं थे, वे 'यमुना का पानी पीते थे'। यह तर्क उस वैश्विक इस्लामवाद के मिथक को तोड़ता है जो अक्सर सांप्रदायिक विमर्शों में इस्तेमाल किया जाता है। यहाँ का मुसलमान इसी मिट्टी के दुख और श्रम से निर्मित है। उनके 'कपड़े बुनने', 'ताले बनाने' और 'बक्से बनाने' के श्रम की आवाज़ें शहर की धड़कन हैं। इसके बावजूद उन्हें 'शहर के बाहर' रहना पड़ता है। यह 'स्थानिक पृथक्करण ' (स्पेशल सेग्रेगेशन) सांप्रदायिकता का एक भौतिक रूप है, जहाँ मुहल्लों को 'मिनी पाकिस्तान' जैसे अपमानजनक नाम दे दिए जाते हैं।
मनोवैज्ञानिक स्तर पर, इन तीनों कविताओं में एक साझा स्वर 'असुरक्षा' का है। केदारनाथ सिंह के नूर मियाँ का पलायन हो या देवी प्रसाद मिश्र के पात्रों का 'जंग लगे तालों की तरह न खुलना', यह सब उस मनोवैज्ञानिक दमन को दर्शाता है जहाँ एक समुदाय अपनी अभिव्यक्ति को सीमित कर लेता है। अशोक वाजपेयी की कविता में आए बूढ़े मुसलमान का चेहरा 'यातना से तपा' है, फिर भी वह 'मुतमईन' (संतुष्ट) होने का भाव रखता है। यह संतुष्टि आत्म-सम्मान की अंतिम शरणस्थली है। वह अपनी पगडंडी खुद बनाता है—यह पगडंडी बहुसंख्यक विमर्श के राजमार्ग से अलग है। यह पगडंडी उस अस्तित्व की है जो हाशिए पर रह कर भी अपनी केंद्रिकता को बचाए हुए है।
सांप्रदायिकता केवल दंगे के बजाय उन मौन क्षणों में भी जीवित रहती है जब हम किसी का नाम सुन कर अपनी धारणाएँ बदल लेते हैं। ह़सन सरूर के अनुसार, भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा इस बात में है कि वह अपने अल्पसंख्यकों को 'अदृश्य' किए बिना कितनी गरिमा दे पाता है। देवी प्रसद मिश्र की कविता में जब वे पूछते हैं कि 'इस लाल किले का हम क्या करें', तो वे उस ऐतिहासिक अलगाव को चुनौती देते हैं जो आज के मुसलमान को उसके अपने गौरवशाली अतीत से बेदखल करना चाहता है। यह एक प्रकार का 'सांस्कृतिक विलोपन' है जिसे फूको के 'पावर/नॉलेज' (सत्ता/ज्ञान) के ढांचे में रख कर देखा जा सकता है—जहाँ इतिहास को इस तरह फिर से लिखा जाता है कि एक पूरा समुदाय उसमें 'विदेशी' प्रतीत होने लगे।
वस्तुत: ये कविताएँ सांप्रदायिकता के विरुद्ध एक मानवीय घोषणापत्र हैं। अशोक वाजपेयी का वह बूढ़ा व्यक्ति जो सुबह-सुबह पुराने शहर की ओर जाता है, वह केवल एक व्यक्ति नहीं है, वह भारतीय उपमहाद्वीप की उस साझी विरासत का अवशेष है जिसे सांप्रदायिकता की आँधी ने झुलसा तो दिया है, पर बुझा नहीं पाई है। वह 'बूढ़े ईश्वर' की तरफ ऐसे देखता है जैसे वह ईश्वर भी उसी की तरह थक चुका हो, पर ज़िंदा हो। सांप्रदायिकता का समाजशास्त्र और मनोविज्ञान हमें अंततः इसी बिंदु पर लाता है कि जब तक हम 'अन्य' में अपने ही 'आदमी होने' की छवि नहीं तलाशेंगे, तब तक नूर मियाँ गायब होते रहेंगे और बूढ़े चौकीदार यातना के चेहरे लिए पगडंडियों पर चलते रहेंगे। ये कविताएँ हमें उस 'सच' को सुनने के लिए मजबूर करती हैं जिसे देवी प्रसाद मिश्र 'सच की तरह' कहने की वकालत करते हैं—एक ऐसा सच जो चट्टान और ऊन की तरह ठोस और मुलायम दोनों है, जो सिंधु और हिंदुकुश की तरह अटल है, और जो अफ़वाह नहीं, बल्कि इस मिट्टी की नागरिकता का अनिवार्य नियम है।
साम्प्रदायिकता को यदि केवल राजनीतिक रणनीति या धार्मिक उन्माद के रूप में देखा जाए तो उसका सबसे गहरा और टिकाऊ पक्ष ओझल रह जाता है। वस्तुतः साम्प्रदायिकता एक ऐसी मनो–सामाजिक संरचना है जो धीरे-धीरे रोज़मर्रा के जीवन, भाषा, स्मृति, चुप्पी, देह-भंगिमा और सामाजिक व्यवहार में समाहित हो जाती है। यह व्यक्ति को अचानक शत्रु नहीं बनाती, बल्कि उसे पहले संदिग्ध, फिर अदृश्य और अंततः अनावश्यक बना देती है। हिंदी कविता, विशेषकर आज़ादी के बाद की कविता, साम्प्रदायिकता को इसी सूक्ष्म और अदृश्य स्तर पर पकड़ती है। अशोक वाजपेयी की कविता ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ इस संदर्भ में एक असाधारण पाठ है, क्योंकि यह साम्प्रदायिकता को न तो हिंसा के दृश्य में बदलती है, न प्रतिरोध के नारे में, बल्कि उसे एक साधारण, थके हुए, चुपचाप चलते हुए मनुष्य के जीवन में पढ़ती है।
यह कविता ऐसे समय में लिखी गई है जब भारतीय समाज में साम्प्रदायिकता एक स्थायी मनोवृत्ति का रूप ले चुकी है। अशोक वाजपेयी का बूढ़ा मुसलमान कोई प्रतीकात्मक ‘मुसलमान’ नहीं है, न ही वह इतिहास या राजनीति का पात्र है। वह नई कॉलोनी के किसी दफ़्तर का चौकीदार है, जो रात भर की चौकीदारी के बाद भोर में अपने घर लौटता है। यही साधारणता इस कविता की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि है। साम्प्रदायिक समाज में मुसलमान को प्रायः असाधारण रूपों में देखा जाता है—या तो ख़तरे के रूप में, या दया के पात्र के रूप में। अशोक वाजपेयी इस बद्धमूल दृष्टि को तोड़ते हैं और मुसलमान को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में रखते हैं, जो अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करके संतोष के साथ घर लौट रहा है। यह संतोष किसी धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि श्रम और नैतिकता से उपजा है।
इस प्रकार अशोक वाजपेयी की ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता समकालीन हिंदी कविता में एक ऐसी रचना के रूप में स्थापित होती है, जो साहित्य और समाज, सौंदर्य और राजनीति, रूप और अंतर्वस्तु के बीच किसी भी सरल विभाजन को अस्वीकार करती है। यह कविता हमें यह महसूस कराती है कि आलोचना हमेशा प्रत्यक्ष वक्तव्य के रूप में नहीं होती। कभी-कभी एक चुपचाप चलता हुआ बूढ़ा आदमी, उसकी चाल, उसकी देह और उसकी दृष्टि—यह सब मिल कर उस सामाजिक हिंसा को अधिक गहराई से उजागर कर देते हैं, जिसे शब्द अक्सर ढक देते हैं। इस कविता की सार्वकालिक प्रासंगिकता इस बात में निहित है कि कविता किसी एक समय, किसी एक घटना या किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती। यह मनुष्य की उस नियति को गतिशील अवस्था में पकड़ती है, जहाँ वह समाज के भीतर रहते हुए भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं होता, लेकिन फिर भी अपनी गरिमा, अपनी नैतिकता और अपने आदमी होने की ख़बर को बचाए रखता है।
यही ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ कविता का सौंदर्य है, और यही उसकी सबसे बड़ी कलात्मक तथा वैचारिक उपलब्धि भी जो इसे इस विषय पर रचित अनेकानेक कविताओं से भिन्न और विशिष्ट बनाती है ।
संदर्भ :
प्राथमिक साहित्यिक पाठ
वाजपेयी, अशोक (1996). ‘कुछ और कविताएँ’. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।
(इसी संग्रह में कविता ‘वह बूढ़ा मुसलमान’ संकलित है। ‘हिन्दवी’ पर भी उपलब्ध)
अन्य उद्धृत ग्रन्थ
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पत्रकारिता और समकालीन सामाजिक टिप्पणी
सुरूर, हसन (2010). ‘मुसलमान इन इंडिया: इन सर्च ऑफ़ सिक्योरिटी’. नई दिल्ली: हार्पर कॉलिन्स इंडिया।
(टिप्पणी: हसन सुरूर के विचार मुख्यतः पत्रकारिता और स्तंभ-लेखन में प्रकाशित हुए हैं; यह पुस्तक उनके सामाजिक-राजनीतिक लेखन का प्रतिनिधि संकलन मानी जाती है।)
लेखक परिचय
प्रोफ़ेसर रवि रंजन
जन्म : 1962, मुज़फ्फ़रपुर, बिहार
शिक्षा : पी-एच.डी.
रूचि के क्षेत्र : भक्तिकाव्य, आधुनिक हिन्दी कविता, आलोचना, साहित्य का समाजशास्त्र,
प्रकाशित कृतियाँ : ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’, ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन, दिल्ली (2011), ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012), वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’ (2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’, वाणी प्रकाशन।
विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में सौ से अधिक आलेख प्रकाशित।
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी।
‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान’ (2023)
प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय, बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय, पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा स्थापित पीठ (चेयर) पर विज़िटिंग प्रोफ़ेसर।
सम्प्रति: प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद – 500 046
ई.मेल. : raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742









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