गरिमा श्रीवास्तव का आलेख 'स्त्री की दृष्टि, गति और लांछन'


गरिमा श्रीवास्तव 


हमारा पितृसत्तात्मक समाज आधुनिक और विकसित होने का चाहें जितना दावा कर ले, स्त्रियों को ले कर अपने पूर्वाग्रहों को वह आज भी छोड़ नहीं पाता। जाने अनजाने वह स्त्रियों पर अपने अभिभावकत्व, और उसके चलते अधिकार और अनुशासन को आयद करने का परोक्ष या प्रत्यक्ष प्रयास करता ही रहता है। लेकिन बदले हुए समय में स्त्रियों ने न केवल 'खुद की पहचान' को स्थापित किया बल्कि उसे कला के विभिन्न माध्यमों के जरिए संप्रेषित भी किया है। आलोचना के क्षेत्र में गरिमा श्रीवास्तव की एक प्रतिष्ठित जगह है। उन्होंने आलोचना के अपने तरीके विकसित करते हुए अपनी बातें सुस्पष्ट तरीके से रखी है। अनुराधा सिंह की एक कविता ‘मुड़ कर न देखने का अभियोग’ की जिस तरीके से उन्होंने तहकीकात की है वह नायाब है। अपने विस्तृत आलेख में वे लिखती हैं "अनुराधा सिंह की कविता जिस ‘अभियोग’ की बात करती है, वह क़ानूनी या औपचारिक के बजाय सांस्कृतिक है। यह वह अभियोग है जो परंपरा, स्मृति और सामूहिक नैतिकता के नाम पर स्त्री पर न जाने कब से स्वतः लगता रहा है। यहाँ कोई न्यायाधीश नहीं, कोई अदालत नहीं, कोई लिखित नियम नहीं—फिर भी निर्णय हो चुका होता है। स्त्री दोषी है, क्योंकि उसने वह नहीं किया जो ‘किया जाना चाहिए था’।" आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं गरिमा श्रीवास्तव का आलेख 'स्त्री की दृष्टि, गति और लांछन'।  


'स्त्री की दृष्टि, गति और लांछन' 

(अनुराधा सिंह की ‘मुड़ कर न देखने का अभियोग’ कविता का वैश्विक स्त्रीवादी पाठ)


गरिमा श्रीवास्तव 


समकालीन हिंदी कविता में स्त्री-अनुभव की अभिव्यक्ति अब केवल निजी संवेदना या आत्मकथात्मक पीड़ा की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रह गई है। वह सामाजिक सत्ता, सांस्कृतिक अनुशासन, नैतिक निगरानी और प्रेम की पितृसत्तात्मक व्याख्याओं से मुठभेड़ का एक सघन बौद्धिक और भावनात्मक क्षेत्र बन चुकी है। अनुराधा सिंह की कविता ‘मुड़ कर न देखने का अभियोग’ इसी व्यापक स्त्रीवादी काव्य-परंपरा में एक अत्यंत सूक्ष्म, किंतु निर्णायक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। यह कविता प्रेम जैसी सहज, स्वाभाविक और निजी मानी जाने वाली अनुभूति को सामाजिक अपेक्षाओं, आरोपों और लांछनों की संरचना में बदलते हुए दिखाती है और इस प्रक्रिया में स्त्री की गति, उसका मौन, उसकी एजेंसी तथा उसकी आंतरिक स्वतंत्रता जैसे प्रश्नों को केंद्र में रखती है।


पाठ-विश्लेषण से पूर्व मूल कविता का टेक्स्ट स्वभावत: पुनर्पाठ की दरकार रखता है :


मुड़कर न देखने का अभियोग


जाते हुए एक बार मुड़ कर देखना होता है

प्रेम की रीत यही है


पर हमने मुड़ कर नहीं देखा


प्रार्थना में साँस लेने की जगह थी

कबड्डी के खेल में भी

भीड़ भरी बस में भी एक पैर रखने की जगह थी

पृथ्वी पर ऐसी जगह न थी

जहां ठहर कर लड़कियां मुड़कर देखतीं

प्रेमी की ओर


हम तक यह बात आरोप की तरह आई

और लांछन की तरह

कि लड़कियाँ जाते हुए मुड़ कर नहीं देखतीं


हमने इसे प्यार की तरह स्वीकार किया

और शील सराहना की तरह


पर तुमने नहीं देखा

कि हम गई नहीं थीं

ले जाई जा रही थीं तुमसे दूर


कितने अदृश्य हाथ हमें थामे थे

तुमने नहीं देखा

कि नहीं देख रही थीं जब तुम्हारी ओर

तब भी हमारी आत्मा का मुख उस ओर था

जहाँ तुम हमारे पलटने की प्रतीक्षा कर रहे थे


अनुराधा सिंह 



अनुराधा सिंह 



कविता की आरंभिक पंक्तियाँ—


“जाते हुए एक बार मुड़ कर देखना होता है 

प्रेम की रीत यही है”


—प्रेम को भावनात्मक सत्य के बजाय एक सांस्कृतिक संहिता में बदल देती हैं। यहाँ प्रेम किसी आत्मिक आवेग या व्यक्तिगत अनुभूति के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक रूप से निर्धारित आचरण के रूप में उपस्थित है। ‘रीत’ शब्द स्वयं में परंपरा, अनुशासन और अपेक्षा का संकेतक है। स्त्रीवादी आलोचना लंबे समय से यह प्रश्न उठाती रही है कि क्यों स्त्री से प्रेम का प्रमाण माँगा जाता है, जबकि पुरुष का प्रेम स्वयंसिद्ध मान लिया जाता है। इस कविता में ‘मुड़ कर देखना’ उसी प्रमाण की माँग का रूपक है।


जब कविता कहती है—“पर हमने मुड़ कर नहीं देखा”—तो यह प्रेम के इनकार की घोषणा नहीं है, बल्कि प्रेम की उस पितृसत्तात्मक व्याख्या का अस्वीकार है जिसमें स्त्री का आचरण नैतिक निगरानी के अधीन होता है। यहाँ ‘न देखना’ निष्क्रियता नहीं, बल्कि एक वैचारिक असहमति है। जूडिथ बटलर के परफॉर्मेटिव सिद्धांत के आलोक में देखें तो प्रेम यहाँ एक ऐसा प्रदर्शन बन जाता है जिसे बार-बार दोहराना आवश्यक है। स्त्री यदि इस प्रदर्शन से हटती है, तो वह तुरंत संदेह और अभियोग के दायरे में आ जाती है।


एड्रिएन रिच अपनी प्रसिद्ध कविता ‘Diving into the Wreck’ में लिखती हैं—


“The words are purposes.

  The words are maps.”


ये पंक्तियाँ बताती हैं कि शब्द केवल भाषा नहीं होते, वे अनुभव को दिशा देने वाले मानचित्र होते हैं। अनुराधा सिंह की कविता में ‘मुड़ कर देखना’ भी ऐसा ही एक मानचित्र है—एक ऐसा सांस्कृतिक संकेत जिसके माध्यम से स्त्री के प्रेम, उसकी निष्ठा और उसकी नैतिकता को पढ़ा जाता है। जब स्त्री इस मानचित्र पर चलने से इंकार करती है, तो वह प्रेमहीन नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से संदिग्ध घोषित कर दी जाती है।


कविता में आगे जिन स्थलों का उल्लेख आता है—प्रार्थना, कबड्डी का खेल, भीड़ भरी बस—वे सभी अस्थायी और नियंत्रित स्थान हैं। 


“प्रार्थना में साँस लेने की जगह थी 

कबड्डी के खेल में भी 

भीड़ भरी बस में भी एक पैर रखने की जगह थी”


—कविता की ये पंक्तियाँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि स्त्री के लिए स्थान हमेशा सीमित और उधार का होता है। उसे जीवन में समायोजित किया जा सकता है, पर ठहरने की अनुमति नहीं है। इसी संदर्भ में कविता की यह पंक्ति अत्यन्त निर्णायक हो जाती है—


“पृथ्वी पर ऐसी जगह न थी 

जहां ठहर कर लड़कियां मुड़कर देखतीं।” 


यह पंक्ति केवल भौगोलिक स्थान की अनुपस्थिति नहीं बताती, बल्कि स्त्री की स्थायी अस्थिरता को रूपायित करती है। यहाँ वर्जीनिया वुल्फ की ‘A Room of One’s Own’ की अनायास याद आती है। वुल्फ के लिए स्त्री की स्वतंत्रता और रचनात्मकता की पहली शर्त अपना स्थान है। अनुराधा सिंह की कविता दिखाती है कि स्त्री के पास प्रेम के लिए भी अपना स्थान नहीं है। वह चलते-चलते प्रेम करे, यही उससे अपेक्षित है।


यह अस्थिरता केवल भौतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और नैतिक भी है। कविता में कहा गया है—


“हम तक यह बात आरोप की तरह आई 

और लांछन की तरह।” 


यहाँ ‘आरोप’ और ‘लांछन’ स्त्री के अनुभव को अपराध के दायरे में ले आते हैं। यह कोई प्रत्यक्ष हिंसा नहीं, बल्कि भाषिक और नैतिक हिंसा है। माया एंजेलो ‘Still I Rise’ में लिखती हैं—


“You may shoot me with your words,

You may cut me with your eyes.”


अनुराधा सिंह की कविता में भी शब्द और निगाहें ही हिंसा के औज़ार हैं। स्त्री का ‘न देखना’ उसकी नैतिकता पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। कविता का एक अत्यंत जटिल और महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि स्त्री इस लांछन को अक्सर ‘प्यार’ और ‘शील-सराहना’ की तरह स्वीकार कर लेती है—


“हमने इसे प्यार की तरह स्वीकार किया 

और शील सराहना की तरह।” 


यह वही प्रक्रिया है जिसे सिमोन द बोउवार स्त्री के सामाजिक निर्माण की प्रक्रिया कहती हैं। स्त्री धीरे-धीरे उन मूल्यों को अपना लेती है जो उसे सीमित करते हैं, और उसी को अपना गुण मानने लगती है।


कविता का केंद्रीय स्त्रीवादी क्षण तब आता है, जब वाचक कहती है—


“पर तुमने नहीं देखा 

कि हम गई नहीं थीं 

ले जाई जा रही थीं तुमसे दूर।” 


यह पंक्ति स्त्री की एजेंसी को निर्णायक रूप से पुनर्परिभाषित करती है। यहाँ गति स्वैच्छिक चुनाव नहीं, बल्कि संरचनात्मक बाध्यता है। ‘ले जाई जा रही थीं’ में जो ‘अदृश्य हाथ’ हैं, वे केवल किसी एक व्यक्ति के हाथ नहीं हैं, बल्कि परिवार, परंपरा, जाति, मर्यादा और सामाजिक अनुशासन के हाथ हैं।


एड्रिएन रिच इसी संरचनात्मक यथार्थ को स्पष्ट करते हुए लिखती हैं—


“The thing I came for:

the wreck and not the story of the wreck.”


अनुराधा सिंह की कविता प्रेम की कहानी नहीं कहती, बल्कि उसके सामाजिक ढाँचे के ध्वंस को सामने लाती है। यह कविता प्रेम के मिथक को तोड़ती है और दिखाती है कि प्रेम भी सत्ता-संरचना से मुक्त नहीं है।


सिल्विया प्लाथ की कविता ‘Lady Lazarus’ में स्त्री की पीड़ा सार्वजनिक तमाशे में बदल जाती है—


“The peanut-crunching crowd 

Shoves in to see…” 


यह दृश्य उसी सामाजिक निगरानी की याद दिलाता है, जिसमें अनुराधा सिंह की कविता की स्त्री भी घिरी हुई है। उसका न मुड़ना, उसका मौन, उसका निर्णय—सब कुछ सार्वजनिक निगाह के अधीन है।


मौजूदा सन्दर्भ में ऑद्रे लॉर्ड का कथन—“For the master’s tools will never dismantle the master’s house”— विशेष अर्थ ग्रहण करता है। यदि प्रेम, शील और त्याग की भाषा पितृसत्ता के औज़ार हैं, तो उन्हीं औज़ारों से स्त्री की मुक्ति संभव नहीं। ‘न देखना’ इसी औज़ार-भाषा से बाहर निकलने का प्रयास है।


कविता का अंतिम खंड—


“तुमने नहीं देखा 

कि नहीं देख रही थीं जब तुम्हारी ओर 

तब भी हमारी आत्मा का मुख उस ओर था”


—स्त्री की आंतरिक स्वतंत्रता की घोषणा है। देह को नियंत्रित किया जा सकता है, आत्मा को नहीं। यह वही चेतना है, जिसे माया एंजेलो “Still I rise” कह कर व्यक्त करती हैं। यह उठना किसी बाहरी विद्रोह का नहीं, बल्कि आंतरिक अस्मिता के जागरण का उठना है।


स्त्री के ‘न मुड़ कर देखने’ को ले कर जिस प्रकार का नैतिक अभियोग कविता में निर्मित होता है, वह केवल व्यक्तिगत प्रेम-संबंध तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भारतीय सामाजिक संरचना में स्त्री की दृश्यता और गति से जुड़े व्यापक प्रश्नों को सामने लाता है। यहाँ यह स्मरणीय है कि भारतीय समाज में स्त्री का देखा जाना, स्वयं देखना और दृष्टि लौटाना—तीनों ही राजनीतिक और नैतिक रूप से विनियमित क्रियाएँ रही हैं। अनुराधा सिंह की कविता में ‘न देखना’ केवल प्रेम-संकेत का अभाव नहीं है, बल्कि दृष्टि की उस सत्ता से इंकार है, जो स्त्री को हमेशा प्रत्युत्तर देने वाली, प्रमाण प्रस्तुत करने वाली इकाई के रूप में देखना चाहती है।


लौरा मुलवे के “मेल गेज़” (male gaze) सिद्धांत के आलोक में यदि इस कविता को पढ़ा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यहाँ प्रेम भी एक प्रकार की दृश्य संरचना है, जहाँ पुरुष देखता है और स्त्री से प्रत्युत्तर की अपेक्षा करता है। ‘मुड़ कर देखना’ उस प्रत्युत्तर का अनुष्ठानिक रूप है। स्त्री जब यह प्रत्युत्तर नहीं देती, तो दृश्य-सत्ता संकट में पड़ जाती है और वही संकट ‘आरोप’ और ‘लांछन’ में बदल जाता है। इस संदर्भ में सिल्विया प्लाथ की कविता ‘Mirror’ की पंक्तियाँ स्मरणीय हैं—


“I am silver and exact. 

I have no preconceptions.”


परंतु वास्तविक सामाजिक दर्पण निष्पक्ष नहीं होता; वह स्त्री को उसी रूप में देखना चाहता है, जैसा उसे देखा जाना चाहिए। अनुराधा सिंह की कविता इस कृत्रिम निष्पक्षता को अस्वीकार करती है।


कविता में जिन स्थानों का उल्लेख है—प्रार्थना, खेल, बस—वे तीनों ही सामूहिक अनुशासन के स्थल हैं। प्रार्थना में शरीर नियंत्रित होता है, खेल में नियमों से बंधा होता है, और बस में भीड़ द्वारा दबा होता है। इन तीनों के बीच स्त्री की उपस्थिति यह संकेत देती है कि उसका जीवन हमेशा किसी न किसी अनुशासनात्मक ढाँचे में घटित होता है। यहाँ मिशेल फूको के अनुशासन और निगरानी के सिद्धांत को स्मरण किया जा सकता है, जहाँ शरीर को ‘आज्ञाकारी’ बनाने के लिए स्थानों और दिनचर्याओं का निर्माण किया जाता है। स्त्री का प्रेम भी इसी अनुशासन का हिस्सा बन जाता है।


अनुराधा सिंह की कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह स्त्री की चुप्पी को कमजोरी नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से निर्मित रणनीति के रूप में प्रस्तुत करती है। 


“हमने इसे प्यार की तरह स्वीकार किया 

और शील सराहना की तरह”


—यह स्वीकार्यता सहमति नहीं, बल्कि सामाजिक जीवित रहने की शर्त है। गायत्‍री चक्रवर्ती स्पिवाक जब पूछती हैं—“Can the Subaltern Speak?”—तो उनका आशय यही होता है कि क्या हाशिये पर खड़ी इकाई की आवाज़ बिना विकृत हुए सुनी जा सकती है। अनुराधा सिंह की कविता में स्त्री बोलती है, पर उसके बोलने से पहले ही उसे ‘शील’ और ‘मर्यादा’ के अर्थों में अनूदित कर लिया जाता है।


इसी संदर्भ में हिंदी स्त्री कविता की परंपरा से इसका संवाद अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। महादेवी वर्मा की कविता में भी स्त्री का मौन एक आध्यात्मिक और दार्शनिक गहराई ग्रहण करता है—वह मौन, जो सामाजिक शोर से अलग खड़ा है। परंतु अनुराधा सिंह की कविता का मौन आध्यात्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक है। यह मौन आरोपों के बीच से गुजरता हुआ, अपनी ही व्याख्या रचता है।


निर्मला पुतुल की कविताओं में आदिवासी स्त्री की गति और देह सामाजिक निगरानी के अलग रूपों से टकराती है। वहाँ भी स्त्री का चलना, रुकना, देखना—सब कुछ संदिग्ध ठहराया जाता है। अनुराधा सिंह की कविता इसी व्यापक स्त्री-अनुभव का शहरी, मध्यवर्गीय संस्करण प्रस्तुत करती है। दोनों के बीच का अंतर अनुभव का है, पर सत्ता-संरचना एक ही है।


अनामिका की कविताओं में स्त्री अक्सर प्रेम के भीतर ही उसके छल को पहचानती है। अनुराधा सिंह की कविता में यह पहचान और भी सूक्ष्म है—यहाँ छल प्रेम की भाषा में नहीं, बल्कि प्रेम की अपेक्षाओं में छिपा है। ‘मुड़ कर देखना’ प्रेम का प्रमाण बन जाता है और वही प्रमाण स्त्री के विरुद्ध प्रयुक्त होता है।


अनुराधा सिंह की कविता में टकराव उतना प्रत्यक्ष नहीं है। वस्तुत: यहाँ विद्रोह देह के माध्यम से नहीं, बल्कि दृष्टि और दिशा के माध्यम से घटित होता है। स्त्री यह तय करती है कि वह किस ओर देखेगी और किस ओर नहीं।


इसी बिंदु पर अंग्रेज़ी स्त्री कविता के उदाहरण विशेष अर्थ ग्रहण करते हैं। एड्रिएन रिच की कविता ‘Snapshots of a Daughter-in-Law’ में स्त्री घरेलू अपेक्षाओं के बीच अपनी बौद्धिक और भावनात्मक स्वतंत्रता तलाशती है। वहाँ भी स्त्री की गति सीमित है, पर उसकी चेतना सीमाओं को पार करती है। अनुराधा सिंह की कविता में “हमारी आत्मा का मुख उस ओर था”—यही चेतना का उद्घोष है।



माया एंजेलो की कविता ‘Phenomenal Woman’ में स्त्री अपनी उपस्थिति को किसी बाहरी प्रमाण से नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व से वैध ठहराती है। अनुराधा सिंह की कविता भी इसी आत्म-वैधता की ओर बढ़ती है। स्त्री यह नहीं कहती कि उसने प्रेम नहीं किया; वह कहती है कि प्रेम को सिद्ध करने के नियम उसने स्वीकार नहीं किए। यहाँ प्रेम की पुनर्परिभाषा घटित होती है। प्रेम अब देखने और देखे जाने का खेल नहीं, बल्कि आंतरिक प्रतिबद्धता और चेतना का अनुभव बनता है। यह पुनर्परिभाषा पितृसत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि इससे नियंत्रण की भाषा निष्प्रभावी हो जाती है।


अनुराधा जी की कविता का अंतिम महत्त्वपूर्ण बिंदु वह है जहाँ आत्मा की दिशा देह की दिशा से अलग हो जाती है। यह स्त्रीवादी दर्शन के उस केंद्रीय सूत्र को मूर्त करता है, जिसमें स्त्री को केवल शरीर नहीं, बल्कि चेतन, अपना फ़ैसला खुद लेने में समर्थ इकाई के रूप में देखा जाता है। सारा अहमद जब ‘The Cultural Politics of Emotion’ में यह कहती हैं कि भावनाएँ सामाजिक रूप से निर्मित और सत्ता से जुड़ी होती हैं, तो अनुराधा सिंह की कविता उस कथन की काव्यात्मक पुनर्रचना प्रतीत होती है। यहाँ प्रेम, अपराध-बोध और शील—तीनों भावनाएँ सत्ता द्वारा निर्मित और नियंत्रित हैं।


इस प्रकार ‘मुड़ कर न देखने का अभियोग’  कविता स्त्री के प्रति लगाए जाने वाले उन असंख्य अदृश्य अभियोगों की संवेदनात्मक सूची है, जो उसके चलने, देखने, प्रेम करने और न करने से जुड़े हैं। कविता इन अभियोगों को दर्ज भी करती है और उनके विरुद्ध एक शांत, किंतु अडिग प्रतिरोध भी रचती है।


स्त्री की दृष्टि और दिशा को ले कर जो प्रश्न इस कविता में उभरते हैं, वे केवल प्रेम-संबंधों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि आधुनिक समाज में स्त्री के नैतिक उत्तरदायित्व-निर्धारण की पूरी प्रणाली को उद्घाटित करते हैं। ‘मुड़ कर न देखने का अभियोग’ वस्तुतः उस काफ़्काई अदालत का कवित्वपूर्ण रूपक है, जहाँ स्त्री को बिना अपराध किए, बिना अपनी दलील पेश किए , दोषी मान लिया गया  है। यहाँ न्यायिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक मानसिकता के तहत लगाया गया अनुमान काम करता है। स्त्री का व्यवहार—उसका देखना या न देखना—उसकी भावनात्मक ईमानदारी का एकमात्र सबूत मान लिया जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ स्त्रीवादी आलोचना के लिए यह कविता को अत्यंत महत्त्वपूर्ण ठहराती है। वजह यह कि स्त्रीवादी विचारकों ने बार-बार यह प्रश्न उठाया है कि क्यों स्त्री से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने प्रेम, दुःख, समर्पण या निष्ठा को अपनी देहभाषा के माध्यम से दिखाती चले । जूडिथ बटलर की परफॉर्मेटिविटी की अवधारणा यहाँ प्रासंगिक हो उठती है। यदि लिंग और उससे जुड़े व्यवहार सामाजिक प्रदर्शन (performance) हैं, तो ‘मुड़ कर देखना’ भी प्रेम का एक प्रदर्शन है, जो पितृसत्ता द्वारा  स्त्री से  है। अनुराधा सिंह की कविता इस प्रदर्शन से इनकार करती है। वह कहती है—हमने वह भूमिका नहीं निभाई, जो हमारे लिए लिख दी गई थी।


इस इनकार का मूल्य स्त्री को आरोप और लांछन के रूप में चुकाना पड़ता है। 


“हम तक यह बात आरोप की तरह आई 

और लांछन की तरह”


—यह पंक्तियाँ केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि सामूहिक स्त्री-अनुभव की अभिव्यक्ति हैं। हर वह स्त्री कमोबेश इस आरोप से परिचित है, जिसने कभी प्रेम को अपने ढंग से जीने का दुस्साहस किया  है। यह आरोप कभी ‘ठंडी’ होने का होता है, कभी ‘अहंकारी’ होने का, कभी ‘भावनाहीन’ होने का। अनुराधा सिंह की कविता इन सभी आरोपों को एक ही बिंदु पर समेट देती है—न मुड़ कर देखना।


इसी संदर्भ में एलिज़ाबेथ बैरेट ब्राउनिंग की कविता ‘Aurora Leigh’ को याद किया जा सकता है, जहाँ स्त्री कवि अपने रचनात्मक और भावनात्मक स्वातंत्र्य को सामाजिक अपेक्षाओं से ऊपर रखती है। वहाँ भी स्त्री से यह अपेक्षा की जाती है कि वह प्रेम और विवाह को ही अपनी पूर्णता माने। अनुराधा सिंह की कविता उस परंपरा को आगे बढ़ाती है, जहाँ स्त्री प्रेम को नकारती नहीं, पर उसकी शर्तों को अस्वीकार करती है।


हिंदी कविता की समकालीन स्त्री परंपरा में यह अस्वीकार विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। यहाँ स्त्री प्रेम से बाहर नहीं जाती, बल्कि प्रेम के भीतर छिपी सत्ता-संरचनाओं को पहचानती है। यह पहचान उसे निष्क्रिय नहीं, बल्कि अधिक सजग बनाती है। कविता की पंक्ति—


“हम गई नहीं थीं 

ले जाई जा रही थीं”


—इसी सजगता का सबसे तीव्र रूप है। यह पंक्ति प्रेम के स्वैच्छिक आख्यान का विखंडन करती है। यहाँ जाना फ़ैसला नहीं, बल्कि नतीज़ा  है; और वह नतीज़ा स्त्री ने नहीं चुना।यह उस पर थोप दिया गया था,जिसे क़ुबूल करने को अब वह तैयार नहीं है।


केदार नाथ सिंह की सुप्रसिद्ध ‘हाथ’ कविता में आए ‘गर्म, कोमल और सुन्दर’ हाथ से भिन्न अनुराधा सिंह के यहाँ ‘अदृश्य हाथ’ का बिंब इस कविता को केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि समाजशास्त्रीय गहराई प्रदान करता है। ये हाथ कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि संस्थाएँ हैं—परिवार, परंपरा, जाति, धर्म, वर्ग, मान-प्रतिष्ठा विषयक बद्धमूल धारणाएँ आदि। स्त्री को इन हाथों के स्पर्श का आभास भी नहीं होता, क्योंकि यह स्पर्श सामान्यीकृत हो चुके होते हैं। यही सामान्यीकरण सबसे खतरनाक है। अनुराधा सिंह की कविता इस सामान्यीकरण को असामान्य बना कर दिखाती है। विचित्र बात यह है कि अक्सर स्त्रियाँ इस लांछन को ‘प्यार’ और ‘शील-सराहना’ की तरह स्वीकार कर लेती हैं। यह वही प्रक्रिया है जिसे सिमोन द बोउवार ‘स्त्री का पैदाइशी के बजाय सामाजिक निर्माण’ कहती हैं।


माया एंजेलो ‘Still I Rise’ में लिखती हैं:


“You may shoot me with your words,

You may cut me with your eyes.”


(“तुम अपने शब्दों से मुझे घायल कर सकते हो,

अपनी निगाहों से मुझे काट सकते हो।”)


कहने की ज़रूरत नहीं कि यहाँ शब्द और निगाहें ही हिंसा के औज़ार हैं। अनुराधा सिंह की कविता में ‘आरोप’ और ‘लांछन’ इसी भाषिक हिंसा के रूप हैं। टॉनी मॉरिसन के उपन्यासों में जिस प्रकार अदृश्य ऐतिहासिक शक्तियाँ पात्रों के जीवन को संचालित करती हैं, उसी प्रकार यहाँ भी अदृश्य हाथ स्त्री की दिशा तय करते हैं। परंतु कविता का स्त्री-वाचक इन हाथों को पहचान लेता है। पहचान स्वयं में प्रतिरोध का पहला चरण है।


इस प्रतिरोध का सबसे सशक्त रूप कविता के अंतिम खंड में सामने आता है, जहाँ देह और आत्मा के बीच एक स्पष्ट विभाजन उभरता है। स्त्री की देह नहीं मुड़ पाती, पर उसकी आत्मा मुड़ती है। यह विभाजन द्वैतवादी नहीं, बल्कि रणनीतिक है। यह स्त्री को यह कहने की अनुमति देता है कि बाहरी नियंत्रण के बावजूद उसकी आंतरिक स्वतंत्रता अक्षुण्ण है।  एमिली डिकिंसन लिखती हैं : “I’m nobody! Who are you?” डिकिंसन का ‘कोई न होना’ सामाजिक पहचान से इंकार का रूप है। अनुराधा सिंह की कविता में भी स्त्री उस परम्परागत पहचान से इंकार करती है, जो उसे आरोपों के माध्यम से दी जा रही है। वह ‘दोषी प्रेमिका’ की पहचान स्वीकार नहीं करती।


माया एंजेलो की कविता ‘Still I Rise‘ में ‘उठना’ जिस प्रकार ऐतिहासिक दमन के विरुद्ध आत्मा की विजय का प्रतीक है, उसी प्रकार अनुराधा सिंह की कविता में आत्मा का मुड़ना एक आंतरिक उठान है। यह उठान शोर नहीं मचाती, नारे नहीं लगाती, पर अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखती है। यह चुप्पी की राजनीति है—वह चुप्पी, जो बोलने से अधिक अर्थपूर्ण हो जाती है। इस प्रकार अनुराधा सिंह की कविता हिन्दी की स्त्रीवादी काव्य परंपरा में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरती है। यह कविता न तो केवल पीड़ा का बयान है, न ही केवल प्रतिरोध का घोष। यह दोनों के बीच की वह सूक्ष्म जगह है, जहाँ स्त्री अपने अनुभव को समझती है, उसका विश्लेषण करती है और उसे भाषा देती है। इसे पढ़ते हुए यह भी प्रतीत होता है कि स्त्रीवादी आलोचना केवल स्त्री की मुक्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रेम, नैतिकता और सामाजिक व्यवहार की पुनर्संरचना का प्रश्न है। ‘मुड़ कर न देखने का अभियोग’ कविता प्रेम को निर्दोष और स्वाभाविक मानने की धारणा को चुनौती देती है और दिखाती है कि प्रेम भी सत्ता-संबंधों से मुक्त नहीं होता।


यही कारण है कि इस कविता को माया एंजेलो, एड्रिएन रिच, सिल्विया प्लाथ, एमिली डिकिंसन, और हिंदी की समकालीन स्त्री कवियों के साथ संवाद में पढ़ना आवश्यक हो जाता है। यह संवाद कविता को स्थानीय से वैश्विक बनाता है, और व्यक्तिगत से राजनीतिक।


इस विस्तृत स्त्रीवादी पाठ के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि अनुराधा सिंह की कविता समकालीन हिंदी कविता में स्त्री-अनुभव की एक सशक्त, सजग और वैचारिक अभिव्यक्ति है। यह कविता स्त्री को नायक या शिकार के रूप में नहीं, बल्कि विचारशील, आत्मचेतस और फ़ैसलाकुन इकाई के रूप में प्रस्तुत करती है।


यह भी ध्यान देने योग्य है कि अनुराधा सिंह की कविता जिस ‘अभियोग’ की बात करती है, वह क़ानूनी या औपचारिक के बजाय सांस्कृतिक है। यह वह अभियोग है जो परंपरा, स्मृति और सामूहिक नैतिकता के नाम पर स्त्री पर न जाने कब से स्वतः लगता रहा है। यहाँ कोई न्यायाधीश नहीं, कोई अदालत नहीं, कोई लिखित नियम नहीं—फिर भी निर्णय हो चुका होता है। स्त्री दोषी है, क्योंकि उसने वह नहीं किया जो ‘किया जाना चाहिए था’। इस संदर्भ में हन्ना अरेंट की ‘बनालिटी ऑफ़ ईविल’ की अवधारणा पर अगर गौर करें तो अरेंट बताती हैं कि बुराई कई बार असाधारण क्रूरता के बजाय सामान्य कर्तव्य-बोध के भीतर पनपती है। ठीक उसी प्रकार स्त्री के प्रति यह नैतिक हिंसा भी सामान्य सामाजिक अपेक्षाओं के भीतर घटित होती है।


‘जाते हुए एक बार मुड़ कर देखना होता है’—यह पंक्ति अपने आप में किसी आदेश जैसी नहीं लगती, पर यही उसकी सबसे बड़ी हिंसा है। यह आदेश की तरह प्रस्तुत नहीं होती, इसलिए प्रश्नातीत हो जाती है। स्त्री यदि इसका पालन करती है, तो वह ‘अच्छी’ प्रेमिका है; यदि नहीं करती, तो उसके प्रेम पर संदेह के घेरे में आ सकता है। इस द्विभाजन में स्त्री के अनुभव की जटिलता के लिए कोई स्थान नहीं बचता। इस कविता में अनुराधा सिंह की कविता इसी अनुपस्थित स्थान को भाषा देती है।



यहाँ यह भी समझना ज़रूरी है कि ‘देखना’ केवल आँखों  की क्रिया नहीं है। यह सामाजिक संचार का एक माध्यम है। स्त्री का देखना, झुकना, मुस्कुराना, कुपित होना, लौटना या न लौटना—सब कुछ अनेकार्थी होता है और अगर वह विवाहित होने के बावजूद स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वामिनी है या अकेली स्त्री है, तब तो पितृसत्तात्मक समाज में अविवाहित से कहीं ज्यादा विवाहित पुरुषों के लिए वह अनंत संभावनों का द्वार मानी जाती है । इस कविता में ‘न देखना’ इतनी तीव्र प्रतिक्रिया को जन्म क्यों देता है, इसे उदाहरण दे कर समझाने की आवश्यकता नहीं है। यह प्रतिक्रिया प्रेमी से अधिक समाज की है, क्योंकि समाज ही यह तय करता है कि प्रेम कैसे दिखना चाहिए।


सांस्कृतिक स्त्रीवाद (cultural feminism) या पॉप-फेमिनिज़्म (popular feminism) के संदर्भ में समकालीन ब्रिटिश नाटककार, पटकथा लेखिका और अभिनेत्री फोएबे वालर-ब्रिज को पढ़ते हुए  स्त्रीवादी आलोचकों ने ‘दृश्यता’ (visibility) और ‘अस्वीकार’ (refusal) को प्रतिरोध की रणनीति के रूप में देखा गया है। अनुराधा सिंह की कविता में यह अस्वीकार अत्यंत शालीन, किंतु दृढ़ है। वह न तो आरोपों का खंडन करती है, न ही अपने प्रेम को सिद्ध करने का प्रयास। वह केवल इतना कहती है—हम नहीं मुड़े। यही कथन अपने आप में पर्याप्त है।


हिंदी कविता में यह ‘न करना’ भी एक सशक्त काव्यात्मक उपकरण रहा है। मुक्तिबोध की कविता में ‘अस्वीकृति’ राजनीतिक है, नागार्जुन में यह व्यंग्यात्मक है, और स्त्री कविता में यह अस्तित्वगत है। अनुराधा सिंह की कविता इस अस्तित्वगत अस्वीकृति का प्रतिनिधि उदाहरण है। यहाँ स्त्री यह तय करती है कि वह किस खेल का हिस्सा बनेगी और किसका नहीं। यह आकस्मिक नहीं कि इस कविता में प्रेमी का स्वर लगभग अनुपस्थित है। वह केवल एक प्रतीक्षा और अपेक्षा करता हुआ ‘तुम’ के रूप में मौजूद है। वजह यह कि कविता का नैतिक केंद्र प्रेमी नहीं, ख़ुद स्त्री है। यह केंद्रांतरण (re-centering) स्त्रीवादी लेखन की बुनियादी रणनीति है। प्रेमी की प्रतीक्षा महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि स्त्री की परिस्थिति, उसकी बाधाएँ और उसकी आंतरिक अवस्था महत्वपूर्ण हैं।


‘तुमने नहीं देखा’—यह पंक्ति दृष्टि के एकतरफ़ा स्वामित्व को चुनौती देती है। यहाँ पहली बार कविता प्रेमी को लगभग ‘अंधा’ ठहराती है। वह देख रहा था, पर देख नहीं पा रहा था। यह अंधापन केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संरचनात्मक है। प्रेमी उन अदृश्य हाथों को नहीं देख पाता, क्योंकि वे उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं, जिससे उसे लाभ मिलता है। बेल हुक्स सही कहती हैं कि प्रेम तब तक मुक्तिदायक नहीं हो सकता, जब तक वह सत्ता-संबंधों को अस्वीकार नहीं करता। अनुराधा सिंह की कविता इसी अस्वीकार को सामने लाती है। यहाँ प्रेम सत्ता से मुक्त नहीं है, इसलिए वह स्त्री के लिए बोझ बन जाता है।


कविता में प्रयुक्त बहुवचन ‘हम’ भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह ‘मैं’ नहीं, बल्कि ‘हम’ है। यह संकेत देता है कि यह अनुभव अकेली स्त्री का नहीं, बल्कि सामूहिक है। यह सामूहिकता स्त्री को अकेलेपन से मुक्त करती है और उसके अनुभव को राजनीतिक बनाती है। यही कारण है कि यह कविता निजी दुःख की कविता होते हुए भी सामाजिक दस्तावेज़ बन जाती है।


यदि इस कविता को उत्तर-औपनिवेशिक स्त्रीवादी दृष्टि से पढ़ा जाए, तो यह भी स्पष्ट होता है कि भारतीय संदर्भ में स्त्री की गति हमेशा सामुदायिक सम्मान से जुड़ी रही है। स्त्री का अकेले चलना, अकेले रुकना, अकेले देखना—सब कुछ संदेह के घेरे में आता है। अनुराधा सिंह की कविता इस सामुदायिक निगरानी को प्रेम के भीतर पहचानती है। यह पहचान कविता को केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक बनाती है। कविता पाठक से सहानुभूति नहीं, बल्कि पुनर्विचार की माँग करती है। पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि उसने स्वयं कितनी बार किसी स्त्री के व्यवहार को प्रेम का प्रमाण मान कर आँका है।इस प्रकार यह कविता न केवल स्त्री के लिए, बल्कि समाज के लिए भी एक आइने की तरह  है—पर वह सिल्विया प्लाथ के दर्पण की तरह निर्दोष नहीं, बल्कि प्रश्नवाचक है। यह दर्पण पूछता है: क्या तुम सचमुच देख रहे हो, या केवल वही देख रहे हो जो देखने की आदत है?


सच तो यह है कि ‘मुड़ कर न देखने का अभियोग’ समकालीन हिंदी कविता में स्त्रीवादी चेतना का एक अत्यंत परिपक्व उदाहरण है। यह कविता न तो आक्रोश में लिखी गई है, न ही आत्मदया में; यह विवेक, अनुभव और बौद्धिक सजगता से उपजी है।


इस कविता को केवल स्त्री-अनुभव की अभिव्यक्ति के रूप के बजाय  भाषा, नैतिकता और सत्ता के अंतर्संबंधों की पड़ताल  के रूप में भी पढ़ा जाए। अनुराधा सिंह की कविता जिस तरह ‘अभियोग’ शब्द का प्रयोग करती है, वह प्रेम की भाषा को क़ानूनी और नैतिक अनुशासन की भाषा से जोड़ देता है। प्रेम, जो सामान्यतः स्वतंत्रता और स्वैच्छिक भावनात्मक आदान–प्रदान का क्षेत्र माना जाता है, यहाँ एक जाँच–प्रक्रिया में बदल जाता है। स्त्री प्रेम करती है या नहीं—इसका निर्णय उसके आचरण से नहीं, बल्कि एक विशेष दृश्य संकेत से किया जाता है। यह दृश्य संकेत—‘मुड़ कर देखना’—प्रेम की कसौटी बन जाता है। यह कसौटी अपने आप में निर्दोष नहीं है। यह कसौटी उसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था से आती है, जो स्त्री को भावनात्मक पारदर्शिता के लिए बाध्य करती है, जबकि पुरुष की भावनात्मक अस्पष्टता को सहज मान लेती है। पुरुष यदि न मुड़े, न देखे, न जताए—तो यह उसका स्वाभाविक संकोच, सलज्जता और मर्यादित व्यवहार माना जाता है; स्त्री यदि वही करे, तो उस पर प्रेम में निष्ठा की कमी का आरोप लगता है। अनुराधा सिंह की कविता इस दोहरे मानदंड को बिना किसी अतिरिक्त बयानबाजी के उजागर कर देती है।


इस बिंदु पर सिमोन द बोउवार का यह कथन विशेष रूप से प्रासंगिक हो उठता है कि स्त्री को ‘अन्य’ (the Other) के रूप में परिभाषित किया गया है—वह स्वयं में पूर्ण नहीं, बल्कि पुरुष के संदर्भ में अर्थ ग्रहण करती है। ‘मुड़ कर देखना’ उसी संदर्भ-निर्माण की प्रक्रिया है। स्त्री का मुड़ कर देखना इसलिए आवश्यक माना जाता है, ताकि पुरुष स्वयं को प्रेम का केंद्र समझ सके। जब स्त्री ऐसा नहीं करती, तो वह इस केंद्र को हिला देती है। कविता की पंक्ति—“पर तुमने नहीं देखा”—इसी हिलते हुए केन्द्र की ओर संकेत करती है। यह पंक्ति आरोप को पलट देती है। अब स्त्री नहीं, बल्कि पुरुष और समाज देखने में असफल ठहरते हैं। वे स्त्री की परिस्थितियों को नहीं देखते, उसकी विवशताओं को नहीं देखते, उसके चारों ओर फैले अदृश्य हाथों को नहीं देखते। वे केवल अपनी अपेक्षा देखते हैं। इन अदृश्य हाथों की उपस्थिति कविता को गहरे सामाजिक यथार्थ से जोड़ती है। ये हाथ परिस्थिति भिन्नता से कभी-कभार स्त्री की अपनी आंतरिकीकृत भय-व्यवस्था के भी हो सकते हैं। ये हाथ इतने सामान्य हो चुके हैं कि उन्हें हाथ की तरह नहीं, बल्कि स्वाभाविक हवा की तरह महसूस किया जाता है। कविता इस हवा को ठोस बना देती है—उसे दिखाई देने योग्य बनाती है। यही दृश्यता स्त्रीवादी कविता का मूल उद्देश्य रही है—अदृश्य को दृश्य बनाना। चाहे वह सिल्विया प्लाथ की मानसिक पीड़ा हो, एड्रिएन रिच का वैवाहिक बंधन हो, या माया एंजेलो का नस्लीय और लैंगिक दमन—हर जगह कविता वह दिखाती है, जिसे सामान्य भाषा छिपा लेती है। अनुराधा सिंह की कविता इसी परंपरा में खड़ी दिखाई देती है।


हिन्दी कविता के संदर्भ में यह और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहाँ लंबे समय तक स्त्री की पीड़ा को त्याग, सहनशीलता और आदर्श के रूप में महिमामंडित किया गया। आधुनिक स्त्री-कविता ने इस महिमामंडन को प्रश्नांकित करना तभी शुरू किया जब महादेवी वर्मा ने ‘कीर का प्रिय आज पिंजर खोल दो’ सरीखी मार्मिक पंक्ति रची। अनुराधा सिंह की कविता उस प्रश्नाकुल परंपरा का एक सघन उदाहरण है। यहाँ स्त्री न तो त्याग का महिमामंडन करती है, न ही स्वयं को पीड़िता के रूप में प्रस्तुत करती है। वह केवल स्थिति का विश्लेषण करती है—और यही विश्लेषण सत्ता के लिए असहज हो जाता है।



कविता में बहुवचन ‘हम’ का प्रयोग इस विश्लेषण को और व्यापक बना देता है। यह ‘हम’ पाठक को भी अपने भीतर खींच लेता है। पाठक केवल दर्शक नहीं रहता, बल्कि उस सामूहिक अनुभव का हिस्सा बन जाता है। यही वह क्षण है, जहाँ कविता व्यक्तिगत अभिव्यक्ति से आगे बढ़ कर राजनीतिक हस्तक्षेप बन जाती है।


यह भी ध्यान देने योग्य है कि कविता का प्रतिरोध आक्रामक नहीं है। यह प्रतिरोध भाषा के भीतर घटित होता है—संयमित, संतुलित और आत्मचेतस। यही कारण है कि यह कविता अधिक देर तक असर करती है। यह पाठक को अपराध-बोध से नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण से भरती है।


अंततः कविता का केंद्रीय कथन—कि स्त्री की देह भले ही न मुड़ी हो, उसकी आत्मा उसी दिशा में थी—स्त्रीवादी दर्शन के उस सूत्र को मूर्त करता है, जिसमें बाहरी नियंत्रण और आंतरिक स्वतंत्रता के बीच अंतर को पहचाना जाता है। यह अंतर स्त्री को पूरी तरह मुक्त नहीं करता, पर उसे पूर्णतः पराजित भी नहीं होने देता। यही अधूरी, किंतु जीवित स्वतंत्रता स्त्रीवादी संघर्ष की वास्तविक भूमि है।


इस प्रकार ‘मुड़ कर न देखने का अभियोग’ को पढ़ते हुए यह स्पष्ट होता है कि यह कविता प्रेम, दृष्टि, नैतिकता और सत्ता के जटिल संबंधों की एक सूक्ष्म, पर अत्यंत प्रभावशाली पड़ताल है। यह कविता हमें सिखाती है कि कभी-कभी न देखना, न कहना, और न मुड़ना—सबसे बड़ा कथन हो सकता है।


अनुराधा सिंह की कविता किसी एक भावनात्मक क्षण की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि स्त्री के सामाजिक अस्तित्व की एक संरचनात्मक जाँच है। यह कविता उस बिंदु पर हस्तक्षेप करती है, जहाँ प्रेम, नैतिकता और सामाजिक अनुशासन एक-दूसरे में इस तरह गुँथे होते हैं कि उनके बीच की सीमाएँ अदृश्य हो जाती हैं। ‘मुड़ कर न देखने का अभियोग’ इन अदृश्य सीमाओं को दृश्य बनाती है और यह दिखाती है कि किस प्रकार प्रेम भी स्त्री के लिए एक परीक्षण-स्थल में बदल दिया जाता है।


कविता यह भी स्पष्ट करती है कि स्त्री के विरुद्ध लगाए जाने वाले अभियोग प्रायः उसके इरादों से नहीं, बल्कि उसकी व्याख्याओं से जन्म लेते हैं। स्त्री क्या महसूस करती है, यह गौण हो जाता है; उसने क्या किया या नहीं किया—और उससे भी अधिक, उसे कैसे पढ़ा गया—यह निर्णायक हो जाता है। इस प्रकार स्त्री का अनुभव उसके नियंत्रण से बाहर चला जाता है। कविता इसी अनुभव-अपहरण को पुनः स्त्री के पास लौटाने का प्रयास करती है। इस प्रसंग में वर्जीनिया वुल्फ की यह स्थापना विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि स्त्री को अपने अनुभवों के लिए ‘एक निजी कमरा’ चाहिए—एक ऐसी जगह जहाँ वह स्वयं को बिना निगरानी के समझ सके। अनुराधा सिंह की कविता बताती है कि स्त्री के पास प्रेम में भी ऐसा कमरा नहीं है। प्रेम भी एक सार्वजनिक कर्मकांड बन चुका है, जिसमें हर इशारे पर निगरानी है, हर चुप्पी पर संदेह है। कविता इसी निगरानी की आलोचना करती है।किन्तु, आलोचना किसी एक पुरुष या एक संबंध के विरुद्ध नहीं है, बल्कि उस सामाजिक ढाँचे के विरुद्ध है जो स्त्री से निरंतर भावनात्मक श्रम (emotional labour) की अपेक्षा करता है। स्त्री को यह सिद्ध करना पड़ता है कि वह प्रेम करती है, कि वह जुड़ी हुई है, कि वह कृतज्ञ है। पुरुष के प्रेम को स्वतःसिद्ध मान लिया जाता है, स्त्री के प्रेम को प्रमाणित होना पड़ता है। ‘मुड़ कर देखना’ इसी प्रमाणिकरण का एक प्रतीक है।


अंग्रेज़ी स्त्री-कविता में यह प्रश्न बार-बार उभरा है। एड्रिएन रिच ने स्त्री के अनुभवों को मिथकीय कथाओं से मुक्त करने का आह्वान किया, माया एंजेलो ने दमन के भीतर से आत्मसम्मान की आवाज़ उठाई, सिल्विया प्लाथ ने स्त्री की आंतरिक विखंडन को भाषा दी। अनुराधा सिंह की कविता और ऐसी ही कुछ अन्य स्त्री-कवियों की रचनाएँ वैश्विक साहित्यिक-सांस्कृतिक पटल पर सक्रिय शब्दकर्मियों की कृतियों में निहित  इन सभी प्रवृत्तियों के साथ कैसे रचनात्मक संवाद में है, इसकी उधेड़बुन हिन्दी के विद्वान-आलोचकों द्वारा की जानी चाहिए।


हिंदी स्त्री कविता की परंपरा में यह कविता इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह न तो घोषणात्मक है, न ही आत्मकथात्मक अतिरेक में जाती है। यह संयमित भाषा में एक गहरी संरचनात्मक आलोचना प्रस्तुत करती है। यह कविता चिल्लाती नहीं, पर उसका मौन भी निष्क्रिय नहीं है। यह वही मौन है, जो सोचने को बाध्य करता है।


स्त्रीवादी शब्दावली में कहें तो कविता का केंद्रीय बिंदु ‘एजेंसी’ है—स्त्री की निर्णय-क्षमता, चाहे वह निर्णय न करने का ही क्यों न हो। ‘हम मुड़ कर नहीं देखे’ कहना एक नकारात्मक वाक्य है, पर उसका नकार सकारात्मक हस्तक्षेप बन जाता है। यह कहना कि 


“हम गई नहीं थीं 

ले जाई जा रही थीं”


—स्त्री के अनुभव को पुनः परिभाषित करना है, उसे अपराधबोध से मुक्त करना है।


कविता का अंतिम भाव—आत्मा की दिशा—स्त्रीवादी काव्य की उस धारा से जुड़ता है, जहाँ मुक्ति को केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना से जोड़ा जाता है। यह चेतना संपूर्ण स्वतंत्रता नहीं है, पर वह आत्मसमर्पण भी नहीं है। यह बीच की वह जगह है, जहाँ स्त्री जीवित रहती है, सोचती है, और भविष्य की संभावना को सुरक्षित रखती है।


अंत में ज़ोर दे कर कहना चाहूंगी कि ‘मुड़ कर न देखने का अभियोग’ समकालीन हिंदी कविता में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है—एक ऐसी कविता जो प्रेम को उसके नैतिक आवरण से मुक्त कर सामाजिक सत्ता-संरचनाओं के भीतर रख कर देखती है। यह कविता पाठक को यह सिखाती है कि हर अनुपस्थिति रिक्त नहीं होती, हर चुप्पी कमजोरी नहीं होती, और हर न करना भी एक गहन राजनीतिक कृत्य हो सकता है। यही कारण है कि यह कविता केवल पढ़ी जाने के बजाय संवेदनशील पाठक को भीतर से देर तक मथती  है। यह उसके देखने के तरीकों पर प्रश्न उठाती है, उसकी अपेक्षाओं को असहज करती है, और उसे यह सोचने पर विवश करती है कि उसने कितनी बार किसी स्त्री के प्रेम को उसके व्यवहार के तराजू पर तौला है।


अनुराधा सिंह की यह कविता स्त्री की गति, मौन और सामाजिक लांछन के बीच के संबंधों को जिस संवेदनशीलता और बौद्धिक स्पष्टता के साथ उजागर करती है, वह इसे न केवल एक सशक्त स्त्रीवादी कविता बनाती है, बल्कि समकालीन हिंदी साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक दस्तावेज़ के रूप में भी स्थापित करती है।


एक भारतीय स्त्री-कवि के रूप में अनुराधा सिंह की यह रचना में प्रेम और स्त्री-एजेंसी की विस्तृत पड़ताल के साथ जो स्थानीय अनुभव से उठ कर वैश्विक स्त्रीवादी विमर्श से कैसे संवाद करती है और उसे हिंदी कविता की ज़मीन पर किस अंदाज़ में पुनर्संयोजित करती है, इसे उजागर करना स्त्रीवादी ही नहीं, हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में सक्रिय आलोचकों के साथ ही कवि-आलोचकों का भी सांस्कृतिक दायित्व है।


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सिंह, केदारनाथ. प्रतिनिधि  कविताएँ. नई दिल्ली: राजकमल पेपरबैक्स.



सम्पर्क


गरिमा श्रीवास्तव

प्रोफ़ेसर,

भारतीय भाषा केंद्र, 

जे.एन.यू.,नयी दिल्ली -110067 


ईमेल:  drsgarima@gmail.com

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