ललन चतुर्वेदी का डायरी अंश 'जीवन की भाषा'


ललन चतुर्वेदी 


कहावतें ऐसे ही नहीं बनतीं। इनके बनने के पीछे एक व्यापक अनुभव और सामाजिक स्वीकृति होती है। कहा जा सकता है कि कहावतों की अपनी खुद की सामाजिकी होती है। इसीलिए ये घटनाओं या किसी परिप्रेक्ष्य के क्रम में  सटीक लगती हैं। एक कहावत है दीवारों के भी कान होते हैं। कभी कभी हमारी मुश्किलों को आसान बनाने के लिए कोई स्वतःस्फूर्त ढंग से उठ खड़ा होता है। कुछ लोग मुसीबत के वक्त सहारा बन जाते हैं। इस कहावत के बारे में कवि ललन चतुर्वेदी अपनी डायरी में लिखते हैं : 'दीवार के भी कान होते हैं यह मैंने सुना ही नहीं देखा भी है। कई मौके आये हैं जब लोग अदृश्य रूप से पीछे खड़े होते हैं। कुछ जासूसी में लगे होते हैं तो कुछ अयाचित सहयोग के लिए तत्पर होते हैं। संसार है और इसके अपने गुण-दोष तो बने ही रहेंगे। इसी संघर्ष में जीवन खिलता है। बहरहाल, दीवार के सन्दर्भ में जो महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूँ वो यह है कि इसके केवल कान ही होते तो फिर भी जीवन आसान होता लेकिन समय-समय पर इसमें आँख, हाथ, पैर आदि अनेक अंग उग जाते हैं। ये कबंध राक्षस की तरह आपका रास्ता रोक कर खड़े हो जायेंगे।' सेवानिवृत्ति के पश्चात ललन जी साहित्य की पूरावक्ती साधना में लगे हुए हैं। इसी क्रम में वे डायरी लेखन कर रहे हैं जिसमें हमारे समय का समाज अपने जीवन्त रूप में दिखाई पड़ता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का डायरी अंश।


डायरी अंश

'जीवन की भाषा'


ललन चतुर्वेदी



राँची

15 दिसंबर 2025


जिन्दगी समझौता एक्सप्रेस है


कहा जाता है कि समान विचार वालों की दोस्ती निभती है। दाम्पत्य जीवन में भी पति-पत्नी के विचारों में समानता आवश्यक है। पर ऐसा कहाँ हो पाता है। यह संभव भी नहीं है। दो व्यक्ति एक समान हो ही नहीं सकते। यह सर्वथा प्राकृतिक है। समान हो जाएँ तो भारी विषमता पैदा हो जाएगी। उथल-पुथल मच जाएगा। विज्ञान का सिद्धांत हैरत में डालता है। यहाँ समान ध्रुवों में विकर्षण होता है। विद्युत् धारा के सुचारू संचरण के लिए धनात्मक और ऋणात्मक बिन्दुओं का योग अनिवार्य है। यदि प्लस को प्लस से जोड़ दें तो स्पार्किंग होगा, आग लगेगी। इस तरह हम समझ सकते हैं कि कनेक्टिविटी यदि सही है तो विद्युत धारा बहेगी, प्रकाश फैलेगा। गलत कनेक्टिविटी अन्धकार का कारक है। यह खतरा पैदा करने वाला है। ज्ञानी या संत स्वभाव का व्यक्ति विपरीत विचारों के इंसानों के साथ भी तालमेल बिठा लेता है। उसका प्रभामंडल ऐसा होता है कि स्याह भी उसके सान्निध्य में थोड़ी देर के लिए ही सही रौशन हो उठता है। जीवन पहेली है। इसे सुलझाने बैठोगे तो जीवन बीत जाएगा। हरेक की समस्या का एक समाधान नहीं है। कुल मिला कर जीवन समझौता एक्सप्रेस है। सवार हो जाओ और गंतव्य तक पहुँच जाओ। जरूरी नहीं कि सहयात्री सहयोगी हों, पर यह याद रखना जरूरी है कि सफ़र छोटा ही है।





वाराणसी

दिनांक: 20.12.2025


बनारस में एक दिन 


कल ही एक पारिवारिक कार्यक्रम के तहत वाराणसी आना हुआ। कहीं जाता हूँ तो साहित्यिक मित्रों से मिलने का लोभ बना रहता है। हालांकि जानता हूँ कि वे भी इसी दुनिया के नागरिक हैं तमाम खूबियों और खामियों सहित। फिर भी मनुष्य के रूप में उनकी कल्पना करना सुखद लगता है। खैर, गजलकार विनय मिश्र से मुलाक़ात अच्छी रही। करीब दो घंटे तक उनका संग-साथ बना रहा। साहित्य के कुछ मुद्दों पर सार्थक चर्चा हुई। तेज ठंडक के मौसम में श्री लोलार्क ‌द्विवेदी जी भी मिलने आये। वे समर्पित भाव से पिछले कुछ वर्षों से आर्यकल्प नामक पत्रिका निकाल रहे हैं। इसके कुछ उल्लेखनीय विशेषांक भी निकले हैं। वहाँ मैं पप्पू की चाय दुकान पर गया, जहाँ वाराणसी के तमाम दिग्गज साहित्यकार जुटते हैं। यद्यपि उस दोपहर में दुकान बंद थी। इसलिए लोलार्क जी द्विवेदी के साथ दूसरी जगह पर चाय का आनंद लिया। हम तीनों का मिलन तुलसी घाट पर हुआ। मैं कृत्य-कृत्य महसूस कर रहा था कि इसी पावन भूमि पर मेरे प्रिय कवि ने रामचरित मानस की रचना की थी। विनय जी के मार्गदर्शन में वह कक्ष भी देखा जहाँ तुलसीदास जी बैठ कर युग काव्य रचा करते थे। तुलसी घाट पर गोस्वामी जी का अखाड़ा आज भी जीवंत है। वहीं से अस्सी घाट का अभिराम दृश्य भी देखा, जहाँ तुलसीदास जी रामलीन हुए थे। एक बात का दुःख अवश्य हुआ कि इस पावन स्थल का संरक्षण और रखरखाव मर्यादानुरूप नहीं है। भारतवर्ष का यह श्रेष्ठ कवि अपने देश में शेक्सपियर या अन्य पाश्चात्य साहित्यकारों की तरह सम्मान प्राप्त करने की पात्रता अवश्य रखता है। बहरहाल, विनय जी ने कहा कि बनारस देखना हो तो कम से कम महीने दिन का समय ले कर आइये। बात सही लगी। चलने के पूर्व विनय जी लक्ष्मीबाई की जन्मस्थली पर भी ले गए। वहां महारानी की प्रतिमा लगी हुई है। एक अच्छी अनुभूति के साथ उस दिन की यात्रा संपन्न हुई। विनय जी ने गुलाबजामुन का रसास्वादन कराया। उसकी मिठास बनी रहेगी।





राँची

27.12.2025


दीवार के भी कान होते हैं 


कल एक पंक्ति का विचार सामने आया कहानी जहाँ खत्म होती है, वहीं से असली कहानी शुरू होती है। मुझे लगता है जीवन और साहित्य दोनों के लिए यह बात समान रूप से सत्य है। यदि कहानी खत्म ही हो गयी तो न जीवन बचेगा न साहित्य। कुछ साहित्यकार ही ऐसा रच पाता है जो जीवित बच जाता है इस धरती के रंगमंच पर कितने इनसान आते हैं और विदा हो जाते हैं। उनका आना-जाना लगभग वैसा ही होता है जैसे टीवी स्क्रीन पर कुछ चेहरे आते हैं और मिनटों में नेपथ्य में चले जाते हैं। लोगों को भूलने में देर कहाँ लगती है। काल के कपाल पर अमिट हस्ताक्षर करने वाले बहुत कम लोग हैं। इसी तरह कृतियाँ नोबेल और बुकर से जीवित नहीं होतीं।


दीवार के भी कान होते हैं यह मैंने सुना ही नहीं देखा भी है। कई मौके आये हैं जब लोग अदृश्य रूप से पीछे खड़े होते हैं। कुछ जासूसी में लगे होते हैं तो कुछ अयाचित सहयोग के लिए तत्पर होते हैं। संसार है और इसके अपने गुण-दोष तो बने ही रहेंगे। इसी संघर्ष में जीवन खिलता है। बहरहाल, दीवार के सन्दर्भ में जो महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूँ वो यह है कि इसके केवल कान ही होते तो फिर भी जीवन आसान होता लेकिन समय-समय पर इसमें आँख, हाथ, पैर आदि अनेक अंग उग जाते हैं। ये कबंध राक्षस की तरह आपका रास्ता रोक कर खड़े हो जायेंगे। ऐसी स्थिति में ही यह लोकोक्ति बनी होगी- 'दीवार पर सर फोड़ने का कोई फायदा नहीं है'। जो लोग जीवन-पथ पर खड़ी ऐसी दीवारों को हटाने में कामयाब हो जाते हैं उनका जीवन सफल हो जाता है। परन्तु ऐसे मूढ़-मति भी हैं जो अपने ही हाथों से दीवार खड़ा करते हैं यदि उसमें दरार आती है तो जी-जान लगा कर उसकी मरम्मत करते हैं। ऐसे लोगों को दीवारों से घिरे रहने में आनंद आता है तो दूसरे को क्या पड़ी है कि उसकी दीवार को हटाने जाएं। दीवारों से मिल कर तो रोना ही आएगा। अच्छा या बुरा का निर्णय स्वयं करना पड़ता है।

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लिखने और सीखने का आनन्द एक सा है। कोई बालक क अक्षर लिख कर कितना खुश हो जाता है। वह तत्काल स्लेट ले कर गुरु या माता-पिता के पास पहुँच जाता है। एक अक्षर सीखने की खुशी में वह यह भूल जाता है कि अभी तो उसे कवर्ग के सभी वर्णों को लिखना है। फिर उसे पूरी वर्णमाला सीखनी है. शब्द और वाक्य-निर्माण तो बहुत आगे की बात है। सर्जनात्मक साहित्य में मेरे जैसे लोगों की स्थिति यही है। कभी-कभी कुछ रचनाएँ भेज कर लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ती है जो अधैर्य उत्पन्न करती है। 'हंस' अपने तमाम विरोधों और अंतर्विरोधों के बाद निर्णय लेने में तत्परता दिखाती है। किसी सम्पादक को अपनी रचनाओं के सन्दर्भ में स्मरण दिलाना अच्छा नहीं लगता। कुछ सम्पादक तो ऐसे भी मिले जो स्वीकृति के बाद भी मुकर जाते है। भाई, कुर्सी की अपनी व्यस्तताएं और मान्यताएं तो होती ही हैं। आश्चर्य तो तब होता है जब अन्यत्र प्रकाशित औसत और कमजोर रचनाओं का महिमामंडन कर दोबारा छापा जाता है। टिप्पणी लेखक तथा आलोचक सूरजमुखी हो ही गए हैं। इससे ईमानदार पाठकों का अहित होता है। लोगों ने बिगाड़ के डर से ईमान की बात कहना छोड़ दिया है। साहित्य, राजनीति और समाज सब जगह यही हाल है।





समृद्ध संस्कृत साहित्य विलुप्ति के कगार पर


वर्षों से मन में यह इच्छा बनी हुई है कि अपने प्राचीन संस्कृत साहित्य का अध्ययन करूँ। इस बार भी वाराणसी गया तो अत्यधिक ठंडक के कारण चौखम्भा जाने की इच्छा स्थगित कर देनी पड़ी। वर्तमान में नोबेल और बुकर पर लहालोट होने वाली पीढ़ी संस्कृत साहित्य के वैभव से पूरी तरह अनभिज्ञ है। मैं स्वयं कठघरे में हूँ। बाणभट्ट, कालिदास, भवभूति या भारवि प्रभृति कितने महान लेखकों को पढ़ा? इन्हें पढ़ने वाला नोबेल और बुकर पुरस्कार प्राप्त पुस्तकों को पढ़ कर इतराएगा नहीं. मेरी अल्प जानकारी में इस देश में अँगुलियों पर गिनने लायक संस्कृत साहित्य के गंभीर अध्येता बचे हैं। वरिष्ठ लोगों में राधावल्लभ त्रिपाठी जी अपने अध्ययन से चौंकाते हैं। कभी-कभी कुशाग्र अनिकेत के संस्कृत साहित्य के शोधपरक लेखों को देख कर प्रसन्नता होती है। अमेरिका में कार्यरत अनिकेत का प्राच्य विद्वया पर श्रमसिक्त काम देख कर सुखद आश्चर्य होता है। संस्कृत को ले कर सरकारें कभी गंभीर नहीं रहीं। जन मानस में भी यह भ्रम बना रहा कि यह पंडितों की भाषा है। हिंदी को ले कर ही कहाँ उत्साहजनक स्थिति है? मैंने तीन दशकों तक राजभाषा के क्षेत्र में काम करते हुए घुटन महसूस किया है। बहुत सारे उल्लेख्य काम अन्धकार के गर्त में हैं। दुःख होता है कि क्या अर्थकरी विद्वताएँ ही जीवित रहेंगी? यदि ऐसा है तो विश्ववि‌द्यालयों से अनेक विषय पाठ्यक्रम से हट जायेंगे। कला और साहित्य का क्या महत्व रह जाएगा? लोग दर्शन क्यों पढ़ेंगे? अनुवाद के सेतु का निर्माण कौन करेगा? वर्षों पूर्व स्वर्गीय हवलदार त्रिपाठी सहृदय का अनुवाद कार्य देख कर कई दिनों तक खुश रहा। इन्होंने मेघदूत का भोजपुरी में शानदार अनुवाद किया है। अब तो यह पुस्तक भी दुर्लभ है। इसकी भूमिका पढ़ते हुए मैं कालिदास के भूगोल-ज्ञान पर दंग रह गया। कालिदास ने मेघ को न केवल दूत बनाया बल्कि उसके मार्गदर्शन के लिए पूरा गूगल मैप ही प्रस्तुत कर दिया। मुझे मालूम नहीं संस्कृत साहित्य में उपलब्ध भौगोलिक विवरणों का कितना अध्ययन हुआ है। यह दिलचस्प और महत्वपूर्ण काम हो सकता है। कुल मिला कर यदि किसी को व्यक्तिगत रुचि है वही इस गैर-आर्थिक कार्य में स्वयं को संलग्न कर सकता है।





फेसबुक की दुनिया


फेसबुक की अपनी दुनिया है। इसके अपने फायदे-नुकसान हैं। जहाँ तक मेरा मानना है इसके मैदान में थोड़ी देर तक टहलना अच्छा है। यह लॉन्ग ड्राइव के लिए अच्छा नहीं है और सेहतमंद भी नहीं। सूचनाएँ अवश्य मिलती हैं और इनका सकारात्मक उपयोग किया जा सकता है। यहीं आ कर समझा कि लाइक का अर्थ देखना है, बहुधा पसंद करना नहीं। लाइक, कमेन्ट और शेयर की त्रिवेणी का अपना भंवर जाल है। यहाँ दो बार अनोखे अनुभव भी हुए। एक महोदया तो कमेन्ट करने से बुरी तरह नाराज हुई। आज भी नाराज हैं। सीख मिली कि कमेन्ट करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। दूसरी ने तो मिनट भर में ही अन्फ्रेंड कर दिया। बाद में इन्हें महसूस हुआ कि अच्छा नहीं किया तो आधे घंटे में ही पुनः फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दिया। मैंने स्वीकृति में कोई विलम्ब नहीं किया। खैर यह सब तो यहाँ चलता ही रहता है। जो भी हो, इसके माध्यम से रचनात्मक संसार में मेरा प्रवेश सुगम हुआ है। जैसे कल ही अक्षर छाया ब्लॉग के लिए कुछ कविताएँ भेजी। भाई नरेन्द्र कुमार पटना में रहते हैं और इसे संचालित करते हैं। उन्होंने जल्द ही इसे लगाने का आश्वासन दिया। रचनाओं पर जब सम्पादक की मुहर लगती है तो थोड़ा आत्मविश्वास बढ़ जाता है। यह समय वेब का है और बहुत हद तक सही भी है। इससे रचनाएँ दूर तक पहुँचती है और सर्व सुलभ हो जातीं हैं। हिन्दवी, हिंदी समय, कविता कोश आदि अनेक प्रतिष्ठित पोर्टलों के माध्यम से हम उपकृत होते रहते हैं। हाशिये पर धकेले गए रचनाकारों को पढ़ने और जानने का दुर्लभ सुख इन्हीं पोर्टलों ने दिया है। हिंदी के शताधिक वर्षों के इतिहास में विपुल सृजन हुआ है। सारी चीजें प्रिंट रूप में तो उपलब्ध नहीं हो सकतीं। समय, स्थान और सुविधा की दृष्टि से वेब बहुत उपयोगी हैं, जहाँ एक क्लिक पर हम अपनी पसंद को पा सकते हैं, पढ़ सकते हैं।





जीवन संयोगों का खेल है


सुबह उठ कर डायरी लिखने के पश्चात मन हुआ कि भजन सुना जाए। टीवी खोलते ही नजर 25 पर चली गयी। नयी फिल्म एक दीवाने की दीवानियत में दो घंटे तक डूबा रहा। फिल्मों में अभिनय का अपना महत्व तो होता ही होता है लेकिन संवाद उसे मार्मिक बनाते हैं। मैं यहाँ भी शब्दों का जादू महसूस करता हूँ। तो कहने का मतलब यह कि बिना कोई योजना के फिल्म देखने बैठ जाना, वह भी सुबह सात से नौ तक क्या यह संयोग नहीं है जबकि मैं प्रायः फ़िल्में नहीं देखता। दर्शन में भी संभवतः संयोग के महत्व को रेखांकित किया गया है। यह संयोग है कि आपको किसी से प्रेम मिलता है तो किसी से नफरत। ऐसा सोचते हुए मन थोड़ा हलका लगता है। महाभारत में कहीं पढ़ा था कि हम संसार में उससे तरह मिलते हैं जैसे समुद्र में काठ के दो टुकड़े कभी मिल जाते हैं तो कभी प्रवाह में बिछुड़ जाते हैं। सम्पूर्ण महाभारत फिर से पढ़ने की इच्छा हो रही है। बचपन के दुर्दिनों में इसने बहुत सहारा दिया है। छोटी से जिन्दगी में बहुत से काम हैं। विडंबना यह है चाह कर भी प्राथमिकताएं तय नहीं कर पाता। काठ के टुकड़े की तरह संसार-सागर में बह रहा हूँ। यह यात्रा किसी अज्ञात द्वीप पर रुक जायेगी।






राँची

30.12.2025


जीवन की भाषा


जीवन हो या साहित्य दोनों से जीवन की भाषा गायब होती जा रही है। इन दोनों मोर्चों पर हम औपचारिकताओं से लिथड़े हुए नजर आते हैं। यही कारण है कि हम जीवन और साहित्य दोनों से दूर होते जा रहे हैं। केवल जीना जीवन नहीं है। केवल रचना या लिखना साहित्य नहीं है। भाव का अभाव नहीं है। स्वभाव का अभाव है। सब कुछ आयोजित-प्रायोजित सा चल रहा है। जीवन की भाषा आकाश से नहीं टपकती। वह जीवन से आती है। आज भी कहीं जीवन या साहित्य में ऐसी भाषा दिखती है तो लोग उससे हृदय से जुड़ जाते हैं। किसी आदमी से मिलते हुए या किसी रचना को पढ़ते हुए इसे सहजता से महसूस किया जा सकता है। भाषा और भाव की जगह नकली इमोजी ने ले लिया है। क्या हम चित्रलिपि के दौर में लौट जायेंगे? शब्दों के प्रयोग को ले कर हमारे पूर्वज साहित्यकार कितने सतर्क थे, यह उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है। प्रेमचंद की किसी कहानी का शीर्षक बदल कर देख लीजिए। कहानी प्रभाव खो देगी। पूस की रात के बदले नवम्बर की रात लिखा नहीं जा सकता। पूस में जो व्यंजना है, वह नवम्बर में नहीं है। तुलसी दास की एक चौपाई है। राम वन गमन के समय गाँव से गुजर रहे हैं, ग्रामीण संस्कृति को तुलसी ने कैसे आत्मसात किया है, देखिए, सीता से गाँव की स्त्रियाँ पूछ रहीं है- "ये आपके कौन हैं?" वह उत्तर देने के पहले अपने आँचल से एक बार फिर सिर ढंकती हैं। तुलसी ने लिखा है-


बहुरि बिधु तन अंचल ढाँकी। 

पिय तन चितै भौंह कर बांकी।।


अब यहाँ बहुरि शब्द का प्रयोग ही बतला देता है कि सीता के सिर पर पहले से भी आँचल है। लेकिन प्रश्न पूछने के बाद इस क्रिया को दोहराना और भौं को तिरछा कर संकेत देना ही काफी है। यह अतिरिक्त सतर्कता स्त्री-सुलभ लज्जा है। फिर भी उत्तर न देना अशालीनता है। वह उत्तर देती हैं। एक बहुरि शब्द के अनूठे प्रयोग ने इस चौपाई में सौन्दर्य का सागर भर दिया है।


आज की जो पीढ़ी है ऐसी अधीर पीढ़ी अतीत में नहीं देखी गयी। यह तीव्र अधीरता जीवन और साहित्य दोनों जगहों में खतरनाक रूप से दिखाई दे रही है हम। प्रतीक्षा के पावन सुख से वंचित होते जा रहे हैं। यह अधैर्य है। छपने के लिए लिखने से बेहतर है नैतिकता के आधार पर चुप रह जाना। यही किसी लेखक की वास्तविक नैतिकता होती है। छपने के लिए लिखने से हम परिदृश्य से एक दिन उसी तरह गायब हो जाते हैं जैसे चील के घोंसले से मांस गायब हो जाता है। कल्पना कीजिए एक नर्तकी अपने मन से नृत्य कर रही है। इस क्रिया में उसे आत्मिक आनंद या सुख प्राप्त हो रहा है। अचानक उससे कोई फरमाइश करता है। उसकी लय भंग हो जाती है। वह नृत्य करेगी, उसे प्रशंसा मिलेगी। धन भी मिल सकता है लेकिन आत्मिक सुख नहीं मिलेगा। साहित्य और कला का यही मर्म है। जैसे ही हम स्वभाव से बाहर होते हैं हमारा जीवन और साहित्य दोनों प्रभाव खो देते हैं। मेरा मानना है कि साहित्य और जीवन दोनों औपचारिकता से नहीं हार्दिकता से सुन्दर और समृद्ध होते हैं। यह बेहद हास्यास्पद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि औपचारिकता ने हार्दिकता को विस्थापित कर दिया है। दृश्य की जगह दिखावा ने ले लिया है।


संपर्क: 


ई मेल : lalancsb@gmail.com

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