कुमार मंगलम की कविताएं

 

कुमार मंगलम 




सत्ता का मूल कार्य होता है जनता का कल्याण। क्योंकि सत्ता जनता से ही उद्भूत होती है। लेकिन सत्ता के साथ एक बड़ी त्रासदी यह होती है कि उसके पास अकूत अधिकार जमा हो जाता है। यह अधिकार आखिरकार अहंकार को जन्म देता है। तुलसीदास ने भी कहा है 'प्रभुता पाई काहिं मद नाहीं।' अधिकार पा कर विनम्र बने रहने की कला के उदाहरण विरल ही मिलते हैं। युवा कवि कुमार मंगलम अपनी कविता सत्ता में लिखते हैं 'सत्ता का चाबुक/ धीरे-धीरे पर अनवरत चलता है... / या तो तुम टूट जाओगे/ या तुम क्रूर हो जाओगे।' वैसे लोकतन्त्र की रीढ़ होती है अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता। लेकिन सत्ता यही तो नहीं चाहती। उसे अपने मन के अनुकूल काम करने की आदत पड़ जाती है। प्रतिकूल उसे कुछ भाता ही नहीं। यही नहीं वह बीच का रास्ता भी नहीं छोड़ती। कुमार मंगलम ने कुछ इसी आस्वाद की कविताएं लिखी हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कुमार मंगलम की कविताएं।



कुमार मंगलम की कविताएं


समय की संभावना 


एक सिरा पकड़ते ही

दूसरा छूटने लगता है

कितना भी समेटने का जतन करूं

समेटते-समेटते

धागा अचानक टूट जाता है


जब भी संभलता हूं

एक भारी पत्थर अचानक आ गिरता है

संबंधों को लहूलुहान करने


कई बार

यह महसूस होता है

कि यह हमारा समय नहीं 


कितना भी जतन कर लूं

हर बार कुछ कमी रह ही जाती है

अचानक सब कुछ सामने चुनौती देता आ खड़ा होता है। 


मुझे डर लगता है

जो कुछ है 

बंद मुट्ठी की रेत की तरह सरकता जा रहा है

आत्मा और शरीर 

के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है।


इस समय में 

किसी अन्य समय के निवासी हैं

जैसे दूसरे ग्रह के निवासी हैं इस ग्रह पर

या अपदस्थ कर दिये गए हैं

अपनी ही धुरी से


बीज होने की संभावनाओं को 

समय के लिए सुरक्षित रख लिया है

और 

समय खो गया है


तलाश 

अपनी 

समय की

अथवा बीज की। 



रियाज़ 


वह घूरता रहता है

उसकी देह-भाषा अकड़ी हुई है

वह जोर से बोलता है

चुगली करता है

अफवाहें फैलाता है

वह सत्ता के चाबुक से 

डर कर

बिछ जाता है गलीचे की तरह

लिजलिजे रीढ़विहीन अस्तित्व में

अपने जीवन का नया अर्थ पाता है।


वह मरता जा रहा है

वह जीते जी फरेब हो गया है

वह सहानुभूति पाने के लिए स्वांग रचता है

जरूरत पड़ने पर रो देता है

उसने असत्य के महामंडलेश्वर से सीखा है-- 

अवसरानुकूल रोना 

और अकड़ना भी


वह अपनी महानता के शिगूफे को 

फुंफकारता घूमता रहता है 

इधर-उधर


उसने अपने इर्द-गिर्द 

व्यक्तित्व-विहीन

उसके लिए मूल और अन्यों के लिए वाचाल

हुल्लड़बाज चमचे पाले हैं

जो कबूतरों की तरह फड़फड़ाते हैं-- 

पर उसके दिए दाने के मोह में

वे उसके पालतू हुए जाते हैं


वह सदैव उपेक्षित महसूस करता है

उसे सबसे खतरा है

वह नारे उछलता है

वह सबसे पहले आपको 

अपनी मूर्खता की जमीन पर 

लाता है 

और फिर 

आपको वहीं पटखनी देता है


वह क्रूरता का रियाज़ कर रहा है इन दिनों।



अ - जीवन


स्मृतियों की हत्या

मृत्यु है

जादू है दिया की लौ को

नीचे कर दिया जाना


ठीक वैसा ही जादू 

यह महादेश देख रहा है

और जी रहा है

मृत्यु का सामूहिक उत्सव


स्मृति विहीन - कल्पना विहीन


अपाहिज बना दी गई जनता

या तो चुप्पी रचती है

या स्वीकार्यता


हिंसा है

हत्या है

क्रूरता है


जो कुछ है 

आपके पीछे है

और आगे सिर्फ भ्रम है

अ - जीवन है। 





अपराध


कुछ अपराध

रात के अंधेरे में घटित हुए

और कुछ

दिन दहाड़े


कुछ अपराध

दर्ज हुए

और कुछ

रह गए बेनामी


कुछ अपराधों को

सत्ता ने दबा दिया

और कुछ को

हमारी नैतिकता ने


कुछ डायरी के पन्ने में दर्ज हुए

और कुछ रह गए

मन के उन कोने अतरे में

जहां कभी खुद हमने ही फेरा नहीं लगाया

जिन अपराधों की सजा मिलनी थी

उनसे हुए सम्मानित

जो अपराधी हैं

बेदाग़ नज़र आए

शफ़्फाक 


मैंने कई अपराध किए हैं

जिनकी कोई सज़ा मुकर्रर नहीं

मैं उन अपराधों के लिए सजायाफ्ता हूं

जो मैंने किए ही नहीं


अपराध और दंड के विधान में

अपराजित मैं अकेला

नितांत


अपने अपराधों को ढोता हूं

सज़ा के इंतज़ार में

और यही सबसे बड़ी सज़ा है


कि निरपराधी और शफ़्फाक 

क्रूरता में आपदमस्तक डूबे इस समय में


अपराधी होने और नहीं होने के बीच

अपराधी ही सज्जन है

और सज्जनता के भीतरी तहों में कई जघन्य अपराध छिपा है

और

हरेक के पास अपने फैसले हैं

जिसने साबित किया जुर्म 

वही मुंसिफ है

हत्यारा भी

और 

निरपराध भी


अपनी आस्थाओं में डुबकी लगाते 

अपराधी को निर्णायक बना

हमने सारे अपराध धो दिए। 



जीवन


तुम मेरी प्रेमिका भी हो सकती थी

कोई पुरानी परिचित

जिससे मेरी वर्षों मुलाक़ात नहीं 

अपनों के बीच तुम्हारा जिक्र नहीं 

या कोई नितांत नजदीकी संबंधी

मां सरीखी, मित्र या कि सहपाठी

या कोई अपना ही हृदयांश कोमलतम बहन सरीखी


मैं अपने संबंधों के सभी चेहरे भूल गया हूं

अपने आत्मरति में अनवरत रतिरत 

मशगूल रहा 

कि अपना ही चेहरा भूल गया


अपरिचय का पहाड़ हिलाए नहीं हिलता


अक्सर सोचता हूं

जिन्हें कोई सपने नहीं आते

नहीं है जिनके पास कोई जैविक स्मृति

बस जीवन जी रहे हैं

थू है इस कबाड़ी जीवन पर

अफसोस!

अधिसंख्य जीवन ऐसा ही है


मेरे दोस्त कहते हैं 

तुमसे अवसाद की बू आती है

तुम अंधेरे में जीते हो

तुमने अपना अंधेरा खुद बुना है

वे सच तो क्या कहते

वो मित्रता और प्रेम को

क्रूरता में बदल देते हैं


क्रूरता स्थाई भाव है जीवन का

सभी चाहे अनचाहे 

क्रूर हो जाते हैं दूसरे के प्रति


जब तुम मुझे मिली

उपेक्षा से, अपरिचय से, बेदिली से मिला

मुझे इतना याद है

मुझसे कोई अपना नहीं खोया किसी कुंभ मेले और जीवन में

और तुम यकीन दिलाती रही

कि कोई एक रेशा है हम दोनों के बीच परिचय का

पर

कोई गाँठ, कोई ट्यूमर, कोई बीमारी है


जेहन पर जोर डालूं

या तलाशी लूं अपने भीतर की

कहीं कोई आवाज नहीं

बस एक सुन्न सन्न सन्नाटा


एक गांठ शेष : अपरिचय का

यही बस

बिगुचित यथार्थ मेरा अपना

और तुम


जो भी हो

दफा हो जाओ जीवन


तलाश पूरी हो

और बदले यथार्थ को कांधा न दूं 


जो है बचा : संभले। 


स्मृति का बीज पानी में सुरक्षित

मुख से समुंदर तक यात्रा पूरी

और अंधेरी रात में एक नौका अटल : ध्रुव तारा

हिलोरें हैं बस

कहीं कोई किनारा : असंभावित


जीवन है, जीवन है, जीवन है

अनवरत

शिनाख्त अपनी

तलाश खुद की

और यादें : कुछ नहीं। 





मन-के


टूट 

कर

बिखर जाना


फिर 

कतरा-कतरा जोड़ना

फिर बिखरना


मृत्यु के दिन समेट लिए जाएंगे

अपार्थिव प्रेम और अमिट क्रांति

के एक एक मनके।



सत्ता


तोड़ने

या कि तोड़ देने

या कि तोड़ते रहने की : क्रूरता

सत्ता में बने रहने की आदत है


सत्ता का चाबुक

धीरे-धीरे पर अनवरत चलता है


या तो तुम टूट जाओगे

या तुम क्रूर हो जाओगे


सत्ता या तो तोड़ती है या अपने अनुकूल बना लेती है। 



 हूँ 


आऊंगा 

या शायद नहीं आऊंगा


आया 

तो सदेह आऊंगा


और

नहीं आया

तो आता रहूंगा विदेह


आता रहूं

ताकि सनद रहे

कि हूँ।



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



सम्पर्क 


मोबाइल : 8840649310

टिप्पणियाँ

  1. मंगलम जी को इधर उधर जब भी पढ़ा, उनके कहन ने आकृष्ट किया | केवल कहने के ढंग ने ही रूचि जगाई हो सो बात नहीं जो कहा गया वो भी भारी भरकम शिला सरीखा सीने पड़ा ही रहा | बेचैन कर्ता हुआ चुनौती देता हुआ |
    उनका एक खास निजी मुहावरा है जो यहाँ भी बिलकुल खुद के भीतर ही उधेड़बुन कर रहा है | सत्ता , क्रूरता और जन की दिलचीर देने वाली दारुण त्रासदी का त्रिकोण इन कविताओं का बीज बना हुआ है |
    समय कि अनंत क्रूरता व्यक्ति की अनथक चेतना की अभिव्यक्ति ढांढस बढ़ाती है |
    आपको और कवि को धन्यवाद और बधाई |
    सादर

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  2. मंगलम जी को इधर उधर जब भी पढ़ा, उनके कहन ने आकृष्ट किया | केवल कहने के ढंग ने ही रूचि जगाई हो सो बात नहीं जो कहा गया वो भी भारी भरकम शिला सरीखा सीने पड़ा ही रहा | बेचैन कर्ता हुआ चुनौती देता हुआ |
    उनका एक खास निजी मुहावरा है जो यहाँ भी बिलकुल खुद के भीतर ही उधेड़बुन कर रहा है | सत्ता , क्रूरता और जन की दिलचीर देने वाली दारुण त्रासदी का त्रिकोण इन कविताओं का बीज बना हुआ है |
    समय कि अनंत क्रूरता व्यक्ति की अनथक चेतना की अभिव्यक्ति ढांढस बढ़ाती है |
    आपको और कवि को धन्यवाद और बधाई |
    सादर

    राजेन्द्र कैड़ा

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