स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'एक सिनेमाबाज की कहानी' का अन्तिम और दसवाँ खण्ड।

 

 


 

विभिन्न तकनीकों के चलते सिनेमा भी अपना रूप बदल रहा था। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में सिनेमाहाल की जगह मल्टीप्लेक्स लेने लगे थे। हिन्दी सिनेमा पर अब पूंजीपतियों और कारपोरेटों का आधिपत्य स्थापित होने  लगा था। अब फिल्मों के नाम ही नहीं उनके वर्ण्य विषय भी बदलने लगे थे। आम आदमी, उसकी समस्याएं और उसके दुःख सुख सिनेमा से गायब होने लगे थे। सिनेमाहाल बन्द होने से चवन्निया दर्शक भी गायब होने लगे थे। सैकड़ो रुपये खर्च कर सिनेमा देखना इनके ही नहीं बल्कि निम्न माध्यम वर्ग के लिए भी बूते के बाहर था। कोरोना महामारी ने सिनेमाहालों का एक तरह से वारा न्यारा ही कर दिया। विकल्प की खोज टी टी (ओवर टॉप) प्लेटफॉर्म की खोज के साथ हुई। अब नई फिल्में इसी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने लगीं। यह एक वैश्विक प्लेटफॉर्म है जिस तक आम आदमी की पहुँच मुश्किल है। सिनेमा पूरी तरह अपना रूप बदल चुका है। सिनेमा का ऐसा अवसान हमारी कल्पना के परे था। आज पहली बार पर प्रस्तुत है स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'एक सिनेमाबाज की कहानी' का अन्तिम और दसवाँ खण्ड।

 

 

एक सिनेमाबाज की कहानी - 10

 

 

 

॥चौंतीस॥

 

 

फैज़ाबाद मेरे नौकरी के जीवन का आखिरी स्टेशन था, उसके आगे जीवन की रेल नहीं जाती थी। अयोध्या उसका उपनगर था। जबसे बाबरी मस्जिद शहीद की गयी, वह विश्वविख्यात हो चुका था। दोनो समुदाय के लोगों का वह शरणस्थल बना, राजनीति के साथ वहां अन्य गतिविधियां होती थीं। कुछ लोग तो रातो-रात समृद्ध हो गये, उन्होंने समाज में अपनी हैसियत बना ली। ये चतुरसुजान लोग थे, कोई   कोई संस्था बना कर अपना उल्लू सीधा करते थे, उनका धर्म या मजहब से कोई रिश्ता नहीं था।

 

 

अयोध्या के बारे में मैं सिर्फ यही जानता था कि राम यहीं पैदा हुए थे और जब राजा बनने के योग्य हुए, एक षडयंत्र के तहत उन्हें चौदह साल का वनवास दे दिया गया लेकिन अति धार्मिक किस्म के लोग इसकी व्याख्या दूसरी तरह से करते है, उन्हें वे  मनुष्य नहीं ईश्वर समझते थे। रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास की यही  प्रस्थापना थी। इन सारी मान्यताओं के ऊपर वे हमारे लोकनायक थे, अवध प्रदेश के अलावा देश के विभिन्न इलाकों में वे पूज्यनीय थे। विभाग के कामकाज के  अलावा मुझे फैज़ाबाद के बारे में जानने की दिलचस्पी थी। अयोध्या के तमाम मंदिर देख डाले लेकिन पंडों की हरकत देख कर मन खिन्न हो गया जिस मंदिर में जाओ, वे हमें बंदरों की तरह  घेर लेते थे। हम तो  किसी तरह बच जाते थे लेकिन जो गांव या देश के सुदूर इलाकों से आते थे, उनकी तो खैर नहीं। कर्मकांड के नाम पर उनकी जेब खाली हो जाती थी।

 

 

गुप्तारघाट

 

 

अयोध्या की दो जगहें मुझे अब भी प्रिय है एक है गुप्तारघाट और दूसरा अयोध्या का  सरयू-तट। सुबह हो या शाम दोनो समय ये जगहें अच्छी लगती थींडूबती हुई शाम में नांवों का आना-जाना और उसके बाद की खामोशी दिल मोह लेती थी। लेकिन अयोध्या आने हुक्मरानों का आना-जाना बढ़ गया था, वे प्राय: छुट्टियों के  दिन डेरा डालते थे और धार्मिक जगहों को देखते थे। सर्किट हाउस या किसी होटल में उनके ठहरने की व्यवस्था करनी पड़ती थी, हमारी तो जेब कट जाती थी। जाते समय वे धन्यवाद का एक वाक्य नहीं बोल पाते थे। इस व्यस्तता में मैं फैज़ाबाद के बारे में कुछ ठीक से नहीं जान पाया था  

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बहू बेगम का मकबरा, फैज़ाबाद

 

फैज़ाबाद का इतिहास बहुत रोचक था। इस शहर को अवध के पहले नबाब सआदत अली  खान ने 1730 में बसाया  था और उसे अपने रियासत की राजधानी बनाया था। तीसरे नबाब शुजाउद्दौला ने इस शहर में बहुत निर्माण कार्य किये थे। बहू बेगम का मकबरा, गुलाबबाड़ी यहाँ की मशहूर जगहों में शुमार है। यहाँ के  बागबगीचे को देखने के  लिए लोग दूरदूर से आते थे। अंगूरी बाग, नहर बाग, मोतीबाग अब भी फैज़ाबाद के मुहल्लों के नाम हैं। शुजादुल्ला के कार्यकाल में फैज़ाबाद का खूब विकास हुआ। उनके बेगम के नाम  पर बहू बेगम का मकबरा स्थापत्य का अदभुत नमूना है। मोती महल यहाँ का यादगार स्मारक है जहां से सूबे के राज-काज का संचालन किया जाता था। यहाँ पर दरबार-खास और दरबार-आम नाम की जगहें थी। यह जगह अफीम कोठी के नाम से जानी जाती है, जो जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, उसकी तरफ पुरातत्व विभाग कोई ध्यान नहीं देता  और    नागरिक समाज ही अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करता है।

 

मोती महल, फैज़ाबाद

 

  

फैज़ाबाद का जिक्र हो और मिर्जा मुहम्मद सौदा जैसे शायर का नाम लब पर जरूर आयेगा, वे अवध नबाब के  दरबार के अनुपम रत्न थे। वे मशहूर शायर मीर तकी मीर के समकालीन थे लेकिन उन्हें उर्दू के अदब में बहुत कम जगह मिली थी। वे  फरूखाबाद से आ कर यहाँ बस गये थे। जब अवध के नबाबों की राजधानी लखनऊ स्थानांतरित हुई, वे उनके साथ वहां चले गये। लखनऊ में ही उनका  इंतकाल हुआ। उनका एक  शेर अक्सर याद आता है

 

सावन के बादलों की तरह  भरे हुए हैं

ये वे नयन हैं जिनसे कि जंगल हरे हुए हैं..

 

 

मिर्जा मुहम्मद सौदा

 

 

उस दौर के इतिहास के बारे में मौलवी अब्दुल हमीद शरर की किताब तफ्सील से बयान करती हैं। आसफउद-औला ने अवध की राजधानी लखनऊ बनायी, इस  तरह फैज़ाबाद का इतिहास बदल गया। वर्तमान समय ये स्मारक वीरानी में दफ्न हो गए हैं, बस केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज हो कर रह गए हैं। 13 नवम्बर 2018 में फैज़ाबाद जनपद का नाम फैज़ाबाद से बदल कर अयोध्या कर दिया गया  है। फैज़ाबाद शहर केवल राजनीति और संस्कृति का केन्द्र रहा हैं।

 

  

फैज़ाबाद उमराव जान अदा की सरजमीन रही है। उर्दू  के प्रसिद्ध अफसानानिगार मिर्जा हादी रूसवा  ने उमराव  जान अदा जैसा उपन्यास लिख  कर उन्हें साहित्य में अमर कर दिया। उमराव जान का असली नाम अमीरन था। अमीरन से उमराव जान अदा का सफर बेहद दिलचस्प और संघर्षपूर्ण रहा है, उसे कई मरहलों  से गुजरना पडा था इसी के बीच उसकी शायरी ने जन्म लिया। उनका एक शेर अक्सर याद आता है - 

 

किसको  सुनाएँ हालदिल जोर अदा

आवारगी में हमने जमाने की सैर की..

 

मुजफ्फर अली ने उमराव जान फिल्म बना कर सिनेमा दर्शकों को एक नायाब तोहफा दिया था इस फिल्म के सारे  गीत बेहद मकबूल हुए थे। इस फिल्म के गीत मशहूर शायर शहरयार ने लिखे थे।

 

जुस्तजू जिसकी  की, उसको तो ना  पाया हमने

इसी बहाने से  मगर देख ली दुनिया हमने

 

या

 

दिल क्या चीज है आप मेरी जान लीजिए

बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए।

 

इन गीतों और  फिल्मों के जरिए फैज़ाबाद के अतीत की यादें ताजा  हो जाती हैं।

 

बेगम अख्तर

 


इसी तरह की एक  शख्सियत थी बेगम अख्तर जिनकी गज़लों में बला का दर्द था। वे  इस जनपद के एक  नामालूम कस्बे भदरसा में 07 अक्टूबर 1914 को पैदा  हुई थी, वह एक तवाइफ की औलाद थी, उनके बचपन का नाम बिम्बी था बिम्बी से  वह अख्तरी बाई हुई फिर वक्त और हालात नें उन्हें गजलों की मलिका बना  दिया। उन्होंने गालिब, फैज, शकील बदायूनी और सुदर्शन फाकिर की  गज़लों को डूब कर गाया है। ठुमरी और दादरा को वे  जिस मनोयोग से गाती थी कि उसकी धुन कलेजे को छू जाती थी। गज़लअदायगी का यह हुनर उन्हें आसानी से हासिल नहीं हुआ है, जिन्दगी में उन्हें इसकी कीमत अदा करनी पड़ी है। उनकी आवाज में कशिश और दर्द है, वह किसी दूसरी गज़लगायिका में नजर नहीं आता। कुछ लोग कंठ से गाते हैं  लेकिन बेगम अख्तर दिल से गाती थी उनकी आवाज में जादू था।

     

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अविभाजित फैज़ाबाद में दो शख्सियतें थी जिन्होने भारतीय राजनीति को गहरे प्रभावित किया था पहले बुद्धिजीवी नेता थे राममनोहर लोहिया और दूसरे आचार्य नरेंद्र देव। वे 1889 में सीतापुर में पैदा हुए थे और फैज़ाबाद में वकालत की शुरूआत की थी। वे राजनेता के साथ शिक्षाविद भी थे, बौद्ध दर्शन पर उन्होंने  महत्व का काम किया है। उन्होंने आजादी की लड़ाई और आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई है। लोहिया, नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण ने भारत में समाजवादी आंदोलन का सूत्रपात किया है। 1934 में अपने उपर्युक्त साथियों के साथ मिल कर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की थी। उन्हें मार्क्सवादी समाजवादी कहा जाता था। यह बिडम्बना ही है कि इस विभूतियों की यथोचित चर्चा नहीं होती, बस कुछ संस्थाओं का नामकरण इनके नाम पर कर दिया गया है लेकिन इनकी  विरासत को आगे  बढ़ाए जाने का  काम नहीं हुआ है।

 

आचार्य नरेंद्र देव

 

 

कुल मिला कर फैज़ाबाद का परिक्षेत्र राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद सम्पन्न रहा है लेकिन उसे विकसित करने का काम अभी भी बाकी है। इस अवध क्षेत्र प्रचंड प्रतिभाओं का कार्यक्षेत्र रहा है लेकिन इस निजाम के केन्द्र में अयोध्या  हैं। रामायणकालीन संस्कृति का उपयोग राजनीति को ध्यान में  रख कर किया जा रहा है जिसमें व्यापकता की जगह एक संकीर्णता है। कितना अच्छा होता कि राम की संस्कृति के  साथ बौद्ध और जैन संस्कृति को इस अभियान में सम्मिलित किया जाता।

     

 

॥पैतीस॥

 

किसी मशहूर जगह पर होने के फायदे और नुकसान अलगअलग होते हैं।  फैज़ाबाद में पहुंच कर मुझे चैन नहीं मिला। वैसे भी नौकरी में कोई जगह राहत की जगह नहीं होतीहमारे शासक हमें चैन से रहने नहीं देते, वे  हमें कोई कोई   हुक्म देते रहते हैं जैसे कोई मालिक अपने गुलाम को देता रहता है। जैसे हम चाकरी में आते हैं गुलामी हमारी तकदीर में लिख दी जाती है। फैज़ाबाद आने के  बाद आला अफसरों का अमला अक्सर कैम्प करता रहता था, हमें उनके नखरे उठाने पड़ते थे। अधिकांश अफसर धार्मिक प्रवृति के होते थे, उनके भीतर अंधविश्वास भरा रहता था, वे  पूजा का ढोंग करते रहते थे। उनके साथ मठमंदिर घूमना पड़ता था। मैं नास्तिक नहीं था, ईश्वर के बारे में मेरी अवधारणा अलग थी।  मंदिरों में किस तरह के साधुसंत रहते हैं, यह तथ्य मुझसे छिपा नहीं था।  बहुतेरों  की पृष्ठभूमि अपराधिक होती थी, वे अपनी जिंदगी और अपराध से  भाग कर मठों में छिप जाते थे। दाढ़ी मूंछ बढ़ा कर साधु बन जाते थे। मठोंमंदिरों में हुई  हत्याओं  में यह तथ्य हमारे सामने आया है लेकिन वे बहुत ठाट से रहते थे, बड़ेबड़े अधिकारी और व्यवसायी उनके पांव छूते रहते थे। प्राकारांतर से वे  अपने भक्त अधिकारियों की ट्रांसफर और पोस्टिंग में मदद करते रहते थे और उसके बदले मंदिर के लिए दान लेते रहते थे।

 

 

मेरा एक सहायक मुझे बताता था कि  ये  मठाधीश अव्वल दर्जे के  सूदखोर होते थे, प्रतिमाह 10% ब्याज लेते थे। पैसा देने के पहले उनकी माली हालत का मूल्यांकन किया जाता था, उसके पास ऋण दिया जाता था, उसके लिए शर्तों का पालन आवश्यक होता था। समय से ब्याज देने पर उनके गुर्गों की सेना उनके  घर धमकाने जाती थी। जो भी उनके चंगुल में फंस जाता था, वह उबर नहीं पाता था। मेरे सहायक को लोन से मोटरसायकिल लेनी थी लेकिन महकमे से उतनी रकम नहीं मिली जितने की जरूरत थी, उसकी भरपाई उसने महराज जी से लोन दे कर की। उसने प्राथमिकता के आधार पर उधार लौटाया इसलिए उसे कोई संकट नहीं उठाना पड़ा, लेकिन कम लोग ऐसा कर पाते थे। आदमी की मजबूरियां क्याक्या   कराए। 

  


इसी  तरह एक आला अधिकारी अयोध्या के  एक मठ की  शरण में पहुंच गये , वे  किसी बड़े केस में  फंसे हुए थे। मठाधीश की रूचि ज्योतिष और कर्मकांड में थीउन्हें महाराज जी ने बताया कि उनकी इस समस्या का निदान ज्योतिष द्वारा किया जा सकता है। उसके लिए तांत्रिक कार्यवाही करनी पड़ेगी। वे राजी हो गये, उनका मठ में आनाजाना शुरू हो गया लेकिन नजला तो हमारे ऊपर ही  गिरता था। उन्हें ठहराना उनके लिए मनचाहे व्यंजन की व्यवस्था करना दिन भर उनकी  परिक्रमा करना मेरे लिए ऊबाऊ और थकाऊं दोनों था। सबसे ज्यादा चिंताजनक थी उनकी मूर्खताजो बात एक आम आदमी आसानी से समझ सकता था, वह उनकी समझ से बाहर था। कई बार मैंने अपनी बात विनम्रता से कहने की कोशिश करता तो उल्टे मुझे ही आंख दिखाने लगते थे और उसे जस्टीफाई करने की कोशिश करने लगते। क्या मूर्खताओं का औचित्य सिद्ध किया जा सकता है?  दरअसल ये नौकरशाह अपने कुकर्मो से डरे हुए होते है जिसका फायदा राजनेता और मठ के साधुसंत उठाते हैं।

  

 

एक बार मुख्यालय बुला कर मुझे चेक दिया और कहा कि यह चेक मैं स्वामी जी को दे दूं मैंने उड़ती नजर से देखा कि चेक पच्चीस हजार का  था इस चेक को  देख कर मुझे अच्छा नहीं लगा,  यह पैसा तो  व्यर्थ में खर्च हो रहा  है। दफ्तर पहुंच कर मैंने एकाउन्टेंट से कहा कि वह इस पच्चीस हजार के चेक का फोटोस्टेट कर के रख ले। एकाउटेंट ने मुस्कराते हुए मुझसे कहा सर मुझे मालूम है कि आपकी  गणित कमजोर है क्या इतनी है कि ढ़ाई लाख को पच्चीस हजार पढ़े। उसकी इस बात से मैं झेंप गया- हिसाबकिताब में मैं शुरू से फिसड्डी रहा हूं, यह बात सचमुच हैरान करने वाली थी कि बास इतनी बड़ी रकम महराज को दे रहे थे।

 

 

मठ के महराज जी देखने में अदभुत लगते थे, गौर वर्ण, लम्बा ललाट और उस पर चंदन का बड़ा चमकता हुआ टीका। वे सफेद ड्रेस में सुसज्जित थे मामूली से  मामूली भक्त उनके गोड़ पर सौ रूपये का नोट धर कर उनसे आशीर्वाद हासिल करता था और कृतज्ञता से भर जाता था, उसे वे अपने बलिष्ट बाहों में उठा कर स्नेहासिक्त कर देते थे। मैं ही ऐसा  नराधम था कि इस औपचारिकता का निर्वाह नहीं कर पाता था। बड़े भक्त उनके अन्त:पुर में डेरा डाले रहते थे, ओहदों के  हिसाब से उनके तोहफे कीमती रहते थे। वे किसी किसी विभाग के बड़े अधिकारी होते थे या बड़े पूंजीपति।  प्राय: दिल और  दिमाग से कमजोर लोग ऐसे बाबाओं के शिकार बनते है। साधुमहात्माओं को ऐसे लोगों के मनोविज्ञान का  पता होता है, वे उड़ती चिडिया का पंख पहचान लेते हैं।

 

 

जब मैंने यह चेक दिया तो उनका चेहरा खिल उठा, वे  मुझे अपने अन्त :पुर  में ले  गये और लोगों से मेरा परिचय कराया। उनके बीच में जिस तरह की बातचीत हो रही थी, उससे मेरा दम  घुट रहा था। थोड़ी देर बाद मुझे एक कोठरी में ले गये  जो  मिठाई के डिब्बे से भरी हुई थी, उस कमरे से मुझे हलवाई के दुकान की  गंध   रही थी।

 

 

महराज जी का