हितेन्द्र पटेल का आलेख 'भारतीय वैचारिकता, भाषा, राष्ट्रीयता और इतिहास दृष्टि : राहुल सांकृत्यायन का संघर्ष'।

राहुल सांकृत्यायन


 

राहुल सांकृत्यायन का नाम लेते ही हमारे जेहन में उस प्रगतिशील शख्स का अक्स उभर कर सामने आता है जिसने बने बनाए खांचों को केवल तोड़ा बल्कि नई अवधारणाएँ भी स्थापित की। राहुल जी ने साहित्य, दर्शन और इतिहास की त्रिवेणी रच कर सामन्ती-पूंजीवादी जड़ता पर करारा प्रहार किया। राहुल जी ने विपुल लेखन किया है। उनके लेखन में एक युग ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव समाहित हैं। तिब्बत जैसे दुर्गम क्षेत्र से पांडुलिपियाँ ला कर उस साहित्य को पुनर्जीवित किया जिससे इतिहास के अनेक नए अध्यायों की पुनर्रचना हुई। हितेन्द्र पटेल ने धर्म, भाषा और राष्टीयता के कुछ प्रसंगों को ऐतिहासिक सन्दर्भों में रख कर राहुल सांकृत्यायन के अवदानों को समझने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है। हितेन्द्र पटेल का यह आलेख राजकमल से प्रकाशित पत्रिका 'सामाजिकी' के पहले अंक में प्रकाशित आलेख का विस्तृत रूप है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं हितेन्द्र पटेल का आलेख 'भारतीय वैचारिकता, भाषा, राष्ट्रीयता और इतिहास दृष्टि : राहुल सांकृत्यायन का संघर्ष'

 

भारतीय वैचारिकता, भाषा, राष्ट्रीयता और इतिहास दृष्टि : राहुल सांकृत्यायन का संघर्ष[1]

 

 

हितेन्द्र पटेल

अध्येता , भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला 

 

 

राहुल सांकृत्यायन (1893-1962) की ख्याति इस रूप में सबसे अधिक है कि उन्होंने हिन्दी प्रदेश में मार्क्सवाद को अपने साहित्य लेखन से लोकप्रिय बनाया और पाठकों को अपने अतीत से, उसकी बौद्धिक संपदा से और अपने इर्द-गिर्द सामंती-पूंजीवाद की जड़ता से परिचित करवाने में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह काम उन्होंने दर्शन, साहित्य और इतिहास तीनों क्षेत्रों में किया। कहते हैं कि जगत को समझने का प्रयत्न दर्शन बुद्धि द्वारा, साहित्य भावना द्वारा और इतिहास अनुभव के उपलब्ध विवरण के आधार पर करता है राहुल ने बुद्धि, भावना और अनुभव तीनों के क्षेत्र में काम करके ही संतोष नहीं किया। उनके जीवन का बड़ा उद्देश्य था इस ज्ञान को समाज को बेहतर बनाने के स्वप्न के साथ इसे जोड़ कर देखना।  राहुल सांकृत्यायन ने एक ही जीवन में सनातनी, आर्य (जिस दौर में वे बड़े हो रहे थे सनातनी और आर्य आपस में बुरी तरह से लड़ रहे थे), फिर बौद्ध, फिर मार्क्सवादी और अन्त में स्वाधीन चेता भारतीय प्रगतिशील चेतना स्तर से विपुल लेखन इसी उद्देश्य से किया। इस क्रम में वे सिर्फ लेखक के रूप में नहीं एक चिंतक के रूप में भी उभरते हैं हिन्दी के प्रति स्वाभिमान रखते हुए और अपनी वैचारिकता के प्रति विश्वास से भरे इस महान पंडित को पाठकों का पंडित के रूप में बहुत सम्मान मिला, और यह सम्मान कम नहीं हुआ है। आज़ाद भारत के चौदह वर्षों में राहुल सांकृत्यायन ने अपने विचारों का जो निचोड़ अपने जीवन के अंतिम दौर में प्रस्तुत किया। इस कार्य में उन्हें सांस्थानिक सहयोग नहीं मिल सका। भिन्न भिन्न प्रकार की बौद्धिक प्रवृत्तियों का रचनात्मक संवाद राहुल के शेष दो दशकों के लेखन में इतने जटिल रूप में है कि उनकी बौद्धिक विरासत को समझने वालों के लिए एक चुनौती खड़ी हो जाती है। जिन तीन चिंतन दिशाओं में वे गए (जब जब जिस ओर गए पूरे विश्वास के साथ गए) वहाँ से संचित ज्ञान में से जो कुछ उन्हें उपयोगी लगा उसे उन्होंने छोड़ा नहीं। इस कथन से कई लोग असहमत हो सकते हैं किअपने जीवन में उन्होंने अनेक राहें बदलीं, पर उनकी मंजिल हमेशा या तो हिन्दी रही या हिंदुस्तान की गरिमा, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि वे हिन्दी को और भारतीय बौद्धिक परंपरा के प्रति बहुत सजग रहे।

           

राहुल की वैचारिक यात्रा चकित कर देने वाली है। पर सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने सनातनी, आर्यसमाजी, बौद्ध, मार्क्सवादी सबको मिला कर एक प्रगतिशील भारतीय दृष्टि पैदा करने की कोशिश की है। इनमें से किसी धारा के लोगों में से एक का चुनाव करते तो वे उनके द्वारा आदर पाते लेकिन जोखिम लेते हुए वे अपनी राह पर ही चले। इस क्रम में वे इनमें से किसी के भी नहीं हैं और कोई भी उनको पूरा स्वीकार नहीं कर पाता। उनके विराट रचनात्मक व्यक्तित्व के सम्यक विश्लेषण के लिए उसी तरह की चेष्टाओं की जरूरत है जैसी कि रवीन्द्र नाथ ठाकुर के लिए की जाती रही है। अधिकतर लोग उनके बारे में उनकी महान पांडित्य की, तिब्बत से ला कर प्राचीन सामग्री ला कर भारत चर्चा के क्षेत्र में योगदान की और उनके वोल्गा से गंगा की चर्चा करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। जरूरत है कि उनके वैचारिक अवदान का विश्लेषण करें, उसकी आलोचना करें और उनकी पीड़ा के बहाने हिन्दी के बौद्धिक की त्रासदी को भी समझें।

           

ऐसा क्यों है कि वे एक ही जीवन में इतनी दिशाओं की ओर गए? प्रारम्भिक जीवन के उनके संघर्षों की कथा के बारे में सब जानते हैं। इसलिए इस आलेख में बौद्ध धर्म की ओर उन्मुख होने से ही बात शुरू करना उचित होगा। 1916 में बौद्ध धर्म की पुस्तकों के महत्त्व के  प्रति एक बौद्ध विद्वान के सुझाव के कारण उन्मुख हुए वे उस समय सनातन धर्म से आर्य धर्म की ओर बढ़ चले थे। पर उसी समय वे 1917 के रूसी क्रांति के बारे में भी वे उत्साह के साथ सोचने लगे थे! राहुल 1926 के बाद भद्नत आनंद कौशल्यायन की प्रेरणा से बौद्ध धर्म के प्रति प्रवृत्त हुए 16 मई 1927 से 1 दिसंबर 1928 तक वे श्री लंका में रहे। इस दौरान वे एक समर्पित बौद्ध अध्येता  थे और उन्होंने बौद्ध धर्म की बौद्धिक विरासत के लिए महान कार्य किए। जब उन्होंने अपने बौद्ध होने की घोषणा की उस समय भी उनको लगता था कि वे साम्यवाद के प्रति भी झुके हुए हैं ! 1928 के दिसंबर में लौटने के बाद एक जगह उन्होंने लिखा है कि वे अब आर्य समाजी नहीं थे। उनके ही शब्दों मेंउनका एक पाँव बौद्ध धर्म में था  और दूसरा साम्यवाद में।[2] अगले दस बारह वर्षों तक बौद्ध राहुल सांकृत्यायन (यह नाम उन्हें 1930 में मिला जब वे बौद्ध हुए ) खूब घूमे, प्राचीन दुर्लभ बौद्ध ग्रन्थों का संग्रह किया और प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा का गंभीर परिचय प्राप्त किया। अगले चरण में वे मार्क्सवादी विचारों के प्रभाव में ज़्यादा रहे और यह प्रभाव उन पर अन्त तक बना रहा। हालांकि सांगठनिक रूप से साम्यवादी दलों से उनका जुड़ाव 1942 के बाद थोड़ा कम हुआ। उसके बाद वे रूस में अध्यापन हेतु गये और वहाँ से लौटने के बाद उनके विचारों और कम्युनिस्ट पार्टी के बीच एक अन्त था जिसके कारण उनका पार्टी से अलगाव हुआ। उनके जीवन के एक गंभीर अध्येता विष्णु चंद्र शर्मा ने लक्षित किया है कि 1939 तक राहुल जी की मानसिक प्रवृत्ति बुद्धि प्रधान थी। इसके बाद वे साधारण लोगों के बीच श्रद्धा-प्रधानता के तत्त्व पर ध्यान दे रहे थे।[3]  पार्टी से अलग रह कर भी वे पार्टी के हित में ही सोचते रहे और साम्यवादी पार्टियों के आपसी मतभेदों से दुखी भी होते थे पर यह स्पष्ट है कि 1947 से 1956 के महत्त्वपूर्ण वर्षों में उनके चिंतन की भाव भूमि और पार्टी की नीतियों के बीच एक अन्त है। बाद में जब वे तकनीकी रूप से पार्टी से फिर से जुड़ गए थे भी वे अपने चिंतन को पार्टी से नियंत्रित समझते हों ऐसा मानना कठिन है।[4]

 


 

           

राहुल बड़ी उम्मीदें और योजनाएँ ले कर अगस्त 1947 में भारत लौटे थे। इसके बाद से 1961 में कोलकाता में उनके स्मृति विलोप के बीच के चौदह पंद्रह सालों के उनके जीवन के बारे में अब तक चर्चा कम हुई है। इस दौर में ही राहुल ने सबसे अधिक लिखा है। इस दौर में परिपक्व राहुल सांकृत्यायन[5] एक तरह से अपनी वैचारिक यात्रा का निचोड़ पेश करते हैं। संभवत: इस दौर के लेखन में वे किसी संगठन या विचारधारा के बारे में कम और अपनी वैचारिक दृष्टि के अनुसार अधिक लिखते हैं। स्वाधीन भारत में राहुल ने जो कुछ सोचा, लिखा और जीवन के जैसे उनके अनुभव हुए उसके बारे में चर्चा करने से वे भी कतराते हैं जो उनके पहले के कार्यों के लिए उनकी सराहना करते नहीं थकते। भाषा, राष्ट्रीयता, धर्म आदि विषयों पर वे अलग तरीके से सोचते हैं। जो उन्हें ठीक लगता है उसको वे कहते हैं और इसकी परवाह नहीं करते कि साम्यवादी दल, उस समय की सरकार और साहित्यिक संगठन से जुड़े प्रभावशाली लोग उनकी बातों को किस प्रकार लेंगे। राहुल सांकृत्यायन के बारे में, उनके बौद्धिक संघर्ष में हिन्दी जगत के बौद्धिक इतिहास की बहुत सारी समस्याओं के बारे में विचार करने की गुंजाइश पैदा हो सकती है। अभी भी इतिहासकारों ने उनके जीवन में दर्शन, इतिहास और साहित्य की त्रिधारा में एक नये भारत के बनने के स्वप्न को समझने की ठीक से कोशिश नहीं की है। इस आलेख की परिधि में इस ओर जाना संभव नहीं है कि पर यह कहा जा सकता है कि आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले जवाहर लाल नेहरू के जन्म के चार साल बाद पैदा और दो साल पहले इस पृथ्वी से जाने वाले इस महापंडित के जीवन और इतिहास दृष्टि, उनके बौद्धिक विकास का नेहरू के साथ तुलनात्मक अध्ययन करें  तो हो सकता है कि एक दूसरे प्रकार के वैकल्पिक भारत निर्माण का मानचित्र उभरे। इन दोनों के बीच भारत के अतीत, औपनिवेशिक युगीन साम्राज्यवाद विरोध और नये भारत के उनके स्वप्न के बीच की समानता और अन्त को देखना बहुत उपयोगी हो सकता है। इस आलेख में  तीन विषयोंधर्म, भाषा, राष्ट्रीयता के कुछ प्रसंगों को उसके इतिहास के संदर्भ  में रख कर राहुल सांकृत्यायन के बारे में टिप्पणी की गई है। साथ ही उनके लिए इतिहास की जरूरत और उसके बारे में सोचते हुए किस तरह एक बेहतर मानव भविष्य के स्वप्न को जोड़ा गया है उसके बारे में भी कुछ प्रसंगों की चर्चा की गई है।

           

राहुल के लिए इतिहास एक जरूरत को पूरा करने के लिए है। उन्होंने कई बार यह कहा है कि उन्होंने जीने के लिए उपन्यास 1938 में लिखने के बाद महसूस किया कि उन्हें ऐतिहासिक उपन्यास लिखना चाहिए क्योंकि हिन्दी में ऐसे लेखकों का अभाव है जो इस काम को ठीक से कर सकें।  भगवत शरण उपाध्याय की लिखी 1941-42 की कहानियों को पढ़ने के बाद उन्होंने इसे देखा और अगर उपाध्याय इस तरह की पर्याप्त कहानियाँ लिखते तो राहुल इस ओर जाते ऐसा खुद राहुल ने कहा है।[6] उनका उद्देश्य था –“अतीत के प्रगतिशील प्रयत्नों को सामने ला कर पाठकों के हृदय में आदर्शों के प्रति प्रेरणा पैदा करना।[7] वे कहते हैं कि अगर यह उद्देश्य उनके सामने रहता तो वे कहानी या उपन्यास नहीं लिखते। भगवत शरण उपाध्याय ने राहुल के इतिहास लेख्नन के बारी में बहुत सकारात्मक टिप्पणी की है उन्हें लगता है किमहापंडित राहुल सांकृत्यायन की बहुमुखी प्रतिभा ने विविध दिशाओं में जो जो स्थायी उपलब्धियां की थीं, उन सबके मूल में संभवत: इतिहास ही था। साहित्य के क्षेत्र में उनके जो भी प्रयत्न हुए, उनका अधिकांश इतिहास के आधार पर उठा। ... (राहुल की) प्राचीन की पकड़ इतनी सही, इतनी अनुसंधानशील और इतनी मौलिक थी कि जहां वह बीते संसार की काया सहज ही अंगांगों सहित सिरज देती थी, वहीं वह एक ऐसी दिशा की ओर भी संकेत कर देती थी, जिधर का मार्ग लोगों को जाना था।... इस दिशा में अपने प्रयत्नों में वे प्राय: निर्मम हो उठे, क्योंकि असत्य के वह शत्रु थे... पिछले युगों के भारतीय बौद्धिक नेताओं में एक प्रकार के असत्य का भी पोषण हुआ है, जिसके प्रभाव में वे ... अंधविश्वासों, प्रथाओं, असामाजिक संस्थाओं का समर्थन करते रहे हैं ... राहुल जी ने मूल पर ही प्रहार किया है।[8] 

           

यह एक दिलचस्प शोध का विषय हो सकता है कि राहुल सांकृत्यायन ने अतीत को समझने के लिए किस किस तरह से कोशिशें की। उनके लिए ऐतिहासिक स्रोतों की समझ इतिहासकारों की तरह संकीर्ण नहीं है और वे आम लोगों के प्रति विश्वास से भर कर अतीत चिंतन करते रहे और उन्हें कभी भी यह नहीं लगा कि मध्य वर्ग आम भारतीय लोगों से तत्वत: अधिक प्रगतिशील हैं। उनके पूरे साहित्य में और विशेषकर उनकी आत्मकथा और यात्रा-वृत्तान्तों में ऐसे अनेक सूत्र बिखरे पड़े हैं जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अगर कोई ध्यान से उनको पढे तो ऐसी बहुत सारी बातें कोई जान सकता है जिसे उस समय और बाद में समाजविज्ञानियों ने महत्त्वपूर्ण पाया।[9] पहले सनातनी, फिर आर्यसमाजी और फिर बौद्ध के रूप में जो कुछ उन्होंने अतीत में पाया उसे सुव्यवस्थित रूप में वे लिख नहीं पाए। जब वे इतिहास लिखने लगे तब तक उनके ऊपर साम्यवादी प्रभाव बढने लगा था।[10] कुछ समय तक यह मार्क्सवादी दबाव ज्यादा रहा। लेकिन इस आलेख के लेखक के अनुसार आगे के दौर के  हिन्दू , आर्यसमाजी प्रभावों को राहुल ने पूरी तरह नहीं छोड़ा। इस छोडने को कुछ लोग गलत तरीके से भी व्याख्यायित कर लेते हैं। हाल ही में राहुल पर  अङ्ग्रेज़ी में प्रकाशित पुस्तक में उन्हें हिन्दी राष्ट्रवाद के समर्थक के रूप में देखा गया है ! कई विद्वानों ने उनके मध्य एशिया का इतिहास (तीन खंडों में) को दूसरे उपलब्ध स्रोतों पर अत्यधिक निर्भर बताया है लेकिन उस पुस्तक को लिखने की प्रक्रिया पर कमला सांकृत्यायन के विवरण पर अगर ध्यान दिया जाए तो लगता है कि इसके लिए भी राहुल जी ने बड़ी मेहनत की थी। अगर उन्हें समुचित सहयोग रूस में मिला होता तो वे और अधिक बेहतर प्रयास कर पाते।[11] 

 

 


          

ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ चीजें उनके अतीत-चिंतन में बनी रहीं जिसको उसी रूप में लिख देने के कारण राहुल से उनके साम्यवादी मित्रों को भी दिक्कत हुई थी कम से कम दो मुद्दे ऐसे हैं जिन पर वे अपने तरीके से सोचते रहे और तमाम दबावों के बावजूद उन्होंने अपने मत को नहीं बदला।  वे दो हैंभारतीय मुसलमान के भारतीयकरण  और हिन्दी के मुद्दे। निश्चित रूप से राहुल सांप्रदायिक दृष्टि से बहुत ऊपर थे और इस्लाम और भारतीय मुसलमानों के भारतीयकरण के सवाल पर बेबाकी से व्यक्त उनके विचारों को ध्यान से पढ़ने के बाद यह कहना गलत ही होगा कि वे सांप्रदायिक सोच के व्यक्ति थे। वे उस समय के कई वामपंथी विचारों के लोगों की  इस बात को नहीं मानते थे कि मुसलमानों की आलोचना की जाए या इस्लाम के बारे में कुछ कहा जाए क्योंकि इससे सांप्रदायिक सौहार्द पर खतरा पैदा होता है। लेकिन राहुल इसे नहीं मानते। जब वे रूस से भारत लौट रहे थे उस समय के बारे में उन्होंने जो लिखा है उसको पढ़ने से उनके विचारों का पता चलता है।

             

हिन्दी के बारे में भी उनकी राय उस समय के साम्यवादियों से अलग थी। राहुल हिन्दी ही नहीं सभी भारतीय भाषाओं के अधिकार के प्रति सचेत थे और कहीं से भी हिन्दी के अंध समर्थक या उर्दू या अङ्ग्रेज़ी विरोधी नहीं थे। वे अतीत चिंतन करते हुए उन दिशाओं में गए हैं जहां से हम अपने अतीत की इतिहासकारों से बेहतर व्याख्या कर सकते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में जाति (नेशन) और धर्म की जैसी व्याख्या राहुल के पास है उससे हम लाभान्वित हो सकते हैं। हिन्दी प्रदेश के बौद्धिक इतिहास के आधुनिक पर्व के इतिहास लेखन में भी उनकी दृष्टि से हमें मदद मिल सकती है।

 

यह हमारा दुर्भाग्य है कि राहुल सांकृत्यायन के बारे में बहुत कम अध्ययन के बावजूद उनके बारे में बड़े विद्वान भी कभी कभी बहुत चलताऊ किस्म की टिप्पणी करने में संकोच नहीं करते। एक ही उदाहरण देना यहाँ पर्याप्त होगा। समाज विज्ञान से जुड़े अंतराष्ट्रीय ख्याति के कई विद्वानों के सहयोग से एक पुस्तक का प्रकाशन हुआ है जिसे आक्सफोर्ड इंडिया कंपेनियन के रूप में दो वॉल्यूम में छापा गया है। इसका सम्पादन वीणा दास ने किया है। इस बहुपठित पुस्तक की भूमिका में प्रो दास ने लिखा है “… the engagement of sociology and social anthropology in the questioning of colonial representations of Indian polity and society was evident: moreover, social anthropologists such as N. K. Bose, and historians like Kosambi and Rahul Sankrityayan had worked in close collaboration with Gandhi and the national movement.”[12]  यह एक वक्तव्य है जिसमें एक तरह से राहुल को उस धारा के लिए कम करने वाला सिद्ध किया जा रहा है जिसके साथ राहुल के मतभेद थे। दिलचस्प है कि दो खंडों में इसके अलावा कहीं फिर राहुल के बारे में एक भी शब्द नहीं है।  वीणा दास ने तो कम से कम उनका उल्लेख किया है, अधिकतर इतिहास और समाज विज्ञान के लोग तो उनकी चर्चा भी नहीं करते।

 


 

 

राहुल जी के विचार, इतिहास के बाते में उनकी समझ और उनका संघर्ष  

           

राहुल की अतीत के बारे में दृष्टि बहुत साफ थे। वे अतीत के ज्ञान का सम्मान करते थे और उसकी रक्षा के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करते थे। लेकिन वे अतीत से चिपके रहने के सख्त खिलाफ थे। जब वे कम्युनिस्ट नहीं हुए थे उस समय भी इलाहाबाद में जवाहर लाल नेहरू की उपस्थिति में 1937 में उन्होंने कहा – “ज़्यादातर पुरानी पोथियों में 75 प्रतिशत तो बेवकूफियां ही बेवकूफियां भरी पड़ी हैं। हाँ, कहीं कहीं अकल की बातें भी हैं। पंडितों की नगरी काशी के बारे में उनका मत कठोर है। वे लिखते हैं- “इसमें संदेह है, कि ऐतिहासिक काल अथवा पिछली सात शताब्दियों में काशी ने कभी देश और राष्ट्र की तत्कालीन या भावी महत्त्वपूर्ण समस्याओं पर माथापच्ची की हो। काशी ने देश को हमेशा पीछे की तरफ खींचने की कोशिश की। एक से एक प्रतिगामी पंडित और परिब्राजकों को उसने प्रदान किया।[13] 

           

अगर हम राहुल के बारे में लिखे संस्मरणों को ध्यान से पढ़ें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि 1947 के बाद जब पार्टी से उनकी दूरी बढ़ गई थी और उन्होंने अपने लेखन पर अपना ध्यान केन्द्रित कर दिया था उनके विचारों को ले कर विद्वानों की असुविधा बढ़ गई थी। संकेत तो स्पष्ट रूप से उनके चालीस के दशक के लेखन में भी हैं लेकिन यह पूरी तरह से स्पष्ट तब हुआ जब वे हिन्दी, इस्लाम, भारतीय इतिहास में  लोक और बौद्धिक परम्पराओं,  भारत के नवनिर्माण को ले कर बगैर शक्तिशाली राजनैतिक और अकादमिक संस्थानों की परवाह किए लिखने-बोलने लगे। दाम्पत्य जीवन में आने के बाद एक स्थायी पारिवारिक जीवन की जिम्मेदारियों को झेलते हुए राहुल के लिए परिस्थितियाँ कितनी दुरूह हो गई थीं और उनका मुक़ाबला करते हुए उन्हें कितनी तकलीफें उठानी पड़ीं इसके बारे में अलग से बातचीत हुई है। दुर्भाग्य से इस ओर सभी तरह की जानकारी होते हुए भी राहुल साहित्य से जुड़े लोगों ने और खुद उनके परिवार के लोगों ने चर्चा करना जरूरी नहीं समझा।[14]  

           

राहुल जी के विचार धीरे धीरे इस प्रकार के हो गए थे कि तत्कालीन अकादमिक समूहों को उनकी बातों से बहुत  असुविधा होने लगी थी। जब राहुल जी का स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं था उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय में डा. नगेन्द्र के विशेष आग्रह पर व्याख्यान के लिए जाना पड़ा। अध्यापक  विजयेन्द्र स्नातक ने उनसे सिद्ध साहित्य पर बोलने का अनुरोध किया। उन्होंने अपने भाषण में यह सिद्ध किया कि कण्णपा अपने युग के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति थे। और भी इसी तरह की बातें बोले। स्नातक ने विनम्रता पूर्वक प्रतिवाद किया और उनसे कहा कि वे प्रमाण दें। इस पर राहुल जी ने यह कहा- “ मैं नहीं चाहता कि आप मेरी मान्यता को ग्रहण करें, किन्तु मैं इतना अवश्य चाहता हूँ कि आप इतिहास के पृष्ठ पलटें। अंग्रेजों द्वारा लिखा गया इतिहास हमारे देश का दूषित, त्रुटित और पक्षपात रंजित इतिहास है। मैं इस इतिहास पर सिद्ध साहित्य को नहीं परखता। क्या आप बता सकते हैं कि सिद्धों की विशाल परंपरा से कौन सा अंग्रेज़ इतिहासकार परिचित है? किसने पूर्वमध्य युग पर प्रामाणिक दृष्टि से लिखा है। आप इन इतिहास ग्रन्थों को पढ़ कर कण्णपा या किसी सिद्ध या नाथपंथी योगी का परिचय नहीं पा सकते क्योंकि इनकी दृष्टि सन-सम्वतों में सिमटी रह जाती है। मैं देखता हूँ कि गौतम बुद्ध के बाद देश में तीन-चार बार क्रांतियाँ हुई हैं। किन्तु किसी क्रांति को जनमानस की व्यापक क्रांति के रूप में हमारे इतिहास लेखकों ने अंकित नहीं किया। महेशों और नरेशों का इतिहास लिखने वाले क्या जानें कि जनमानस को जागृत करने वाले विलासी नरेश नहीं होते, साधु, महात्मा और सिद्ध होते हैं। जो राज्य सत्ता से कहीं अधिक प्रभाव जनता पर डालते हैं। आप लोग पहले इतिहास की दृष्टि को स्वच्छ करें, इतिहास के पृष्ठों पर पड़ी धूल को साफ करें और तब इतिहास पढ़ने का उपक्रम करें। मैं सिद्धों और नाथों का समर्थक नहीं हूँ किन्तु इतिहास में उनके महत्त्व की कथाओं को पा कर यह कहने को बाध्य हुआ हूँ।[15]

           

राहुल के साथ आज़ाद भारत में बौद्धिक परिवेश के साथ तादात्म्य बिठाना बहुत मुश्किल हुआ और उन्हें बहुत कठिनाई हुई इसकी चर्चा आगे भी हुई है, पर जो सबसे उद्वेलित करने वाली बात है कि अन्त में वे बाध्य हुए श्रीलंका जा कर नौकरी करने को ताकि उन्हें 1500 रुपए माहवार मिल सके ताकि उनके बच्चों की शिक्षा दीक्षा ठीक से हो सके। श्री लंका में रहते हुए उनके बारे में लिखते हुए भदंत आनंद कौशल्यायन ने लिखा है –“राहुल जी के हस्ताक्षर सुपाठ्य नहीं रहे थे। उनके दिनो दिन बिगड़ने वाली स्वाक्षरी उनके बढ़ते हुए स्नायु दौर्बल्य की सूचना दे रही थी। बहु-मूत्र का रोग। असन्तोषजनक भोजन। बच्चों और परिवार से दूर। किसी प्रकार का खास मनोविनोद नहीं। रात दिन लिखना पढ़ना। वही काम और वही आराम ! ...बाद में देखा कि कभी कभी किसी भी समय राहुल जी सोने लग गये थे। दिन में आठ और नौ बजे सोते पाये जाने लगे। ...राहुल जी का क्लास में पढ़ाने जाना बंद कर दिया गया। ...उचित समझा गया कि राहुल जी जया-जेता के पास जा कर रहें क्योंकि उन दोनों बच्चों को बिना एक चिट्ठी लिखे हुए, रात को राहुल जी कभी सोते ही नहीं थे।...थोड़ी से चंगे हो कर राहुलजी एक बार फिर सिंहल आए। वे पढ़ा सकते थे उन्हें किसी ने पढ़ाने के लिए कहा। उन्हें खानेपीने की सुविधा-असुविधा का ख्याल करके उन्हें उनके एक परम मित्र श्री एम के कापड़िया के यहाँ ही रखा गया।[16]

             

उनकी पत्नी का यह कथन बहुत कष्टदायी है –“औघरदानी तो वे थे ही, इसलिए भी धन के प्रति उनकी आसक्ति नहीं थी। मनुष्य को अपने जीवन निर्वाह के लिए धन की भी आवश्यकता पड़ती है, इस सत्यता का बोध महापंडित को अपने जीवन के अंतिम वर्षों में ही हुआ।[17] राहुल ने एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने जलवायु प्रतिकूल होने के बावजूद वे सिंहल में ही रहना चाहते हैं क्योंकि भारत में रहने