नामवर सिंह का आलेख 'उन्नीसवी सदी का भारतीय पुनर्जागरण :यथार्थ या मिथक, हिन्दी अनुवाद - पंकज पराशर

 

नामवर सिंह

 

नामवर सिंह को सुनना हमेशा एक उम्दा समय से गुजरना होता था। उनको सुनते हुए ज्ञान के तमाम ऐसे पक्ष हमारे सामने आते थे, जिनसे हमारा परिचय लगभग नहीं होता था। उन्होंने देश भर में घूम कर तमाम महत्त्वपूर्ण व्याख्यान दिए, जिन्हें आज भी संकलित करने की प्रक्रिया चल ही रही है। लेकिन उनके कुछ ऐसे भी व्याख्यान हैं जो अभी हमारी ज्ञेयता से दूर हैं।  ऐसे ही एक आलेख को पुनर्जीवन प्रदान किया है कवि आलोचक पंकज पराशर ने। पंकज ने 'क्रिटिकल प्रेक्टिस' पत्रिका में अंग्रेजी में छपे नामवर सिंह के आलेख का हिन्दी में बेहतरीन अनुवाद किया है। इस अनुवाद को पढ़ते हुए कहीं भी नामवर जी की भाषा शैली से हम विरत नहीं होते। तो आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं नामवर सिंह का आलेख 'उन्नीसवी सदी का भारतीय पुनर्जागरण :यथार्थ या मिथक।

 

 

 

अनुवाद-कथा

 

लगभग आठ-नौ साल पुरानी बात है. नामवर जी ने राजकोट विश्वविद्यालय के अंग्रेजी एवं तुलनात्मक अध्ययन विभाग में 19वीं शताब्दी के पुनर्जागरण पर एक व्याख्यान दिया था. यह व्याख्यान हिंदी में तो कहीं प्रकाशित नहीं हुआ, लेकिन अंगरेजी में अनूदित हो कर क्रिटिकल प्रैक्टिस में प्रकाशित हुआ. अंगरेजी में इसे पढ़ने के बाद मेरी जिज्ञासा बढ़ गई कि किसी तरह इस व्याख्यान को मूल हिंदी में सुना जाए. परंतु इस व्याख्यान का टेप पाने में कामयाबी नहीं मिली. बात आई-गई हो गई और मैं चुप बैठ गया. इस व्याख्यान की जानकारी नामवर जी व्याख्यानों के संकलन और संग्रह के कार्य में मनोयोग से लगे बी.एच.यू. के विद्वान प्राध्यापक डॉ. आशीष त्रिपाठी को नहीं थी और स्वयं नामवर जी को. कुछ वर्ष पहले जब इस व्याख्यान की चर्चा मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ.  विनोद तिवारी से की, तो उन्होंने इसमें दिलचस्पी दिखाते हुए इस काम को जल्दी पूरा करने का आग्रह किया और यह आलेख पक्षधर में प्रकाशित हुआ. यदि वे एक मित्र और लगनशील संपादक की तरह बार-बार फोन करके इस काम को जल्दी पूरा करके देने के लिए दबाव डालते, तो यह काम पता नहीं कब तक टलता रहता. अब ये आपके सामने है, तो इसका काफी कुछ श्रेय विनोद जी को भी जाता है.

 

 

पक्षधर पत्रिका की अपनी एक सीमा है, जहाँ तक इंटरनेट की दुनिया और इसके बाहर के भी अनेक मित्रों की पहुँच नहीं है इसलिए सोचा कि इस आलेख को इंटरनेट की दुनिया में भी होना चाहिए. हालांकि मूल हिंदी की थाती के पुनः मूल रूप में आने के बीच में अंग्रेजी गई, मगर फिर भी नामवर जी की अदा, उनकी भाषा, उनकी शैली को आप कुछ हद तक यहां भी शायद लक्षित कर पाएंगे.

-पंकज पराशर

 

उन्नीसवीं सदी का भारतीय पुनर्जागरण : यथार्थ या मिथक

 

नामवर सिंह

(अंग्रेजी से हिंदीः पंकज पराशर)

 

 

पिछले पच्चीस-तीस वर्षों से मैं इस पर सोचता रहा हूं और इस विषय पर कुछ खंड लिख भी चुका हूं. 19वीं सदी के गुजराती साहित्य में और विशेष रूप से नवलराम और गोवर्धनराम के लेखन में मेरी रूचि है. मगर दुर्भाग्य से गोवर्धनराम का सरस्वतीचंद्र हिंदी में उपलब्ध नहीं है. यहां मैं गोवर्धनराम के उस भाषण का खास तौर पर उल्लेख करना चाहता हूं, जो उन्होंने 1892 में विल्सन कॉलेज की लिटरेरी सोसाइटी में अंग्रेजी में दिया था. विषय था-क्लासिकल पोयट्स ऑफ गुजरात. नरसी मेहता, अखो और प्रेमानंद पर वहां उन्होंने भाषण दिया था. 17वीं शताब्दी के दो प्रसिद्ध कवियों प्रेमानंद और शामल भट्ट पर विशेष रूप से उन्होंने टीका प्रस्तुत की थी. मैं यह देख कर आश्चर्यचकित था कि केवल पचास वर्षों के अंतराल के बाद ही कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने अपनी किताब गुजराती साहित्य का इतिहास में उनके विचारों का खंडन किया. बाद में मनसुखलाल झावेरी ने अपने गुजराती साहित्य के इतिहास में इसकी ठीक विपरीत व्याख्या की. इस प्रकार शामल भट्ट का यह मूल्यांकन स्पष्ट रूप से तीन परिवर्तनों से गुजर चुका है.

 

 

 

गोवर्धनराम का काम मुझे यह सोचने के लिए विवश करता है कि कितनी खूबसूरती से उन्होंने 15वीं और 17वीं शताब्दी के साहित्यिक परंपराओं का निर्धारण किया. वे खुद भी 19वीं और 20वीं शताब्दी के बीच की कड़ी रहे हैं. उनका जन्म 1855 में हुआ था और मृत्यु 1907 में हुई थी. वे केवल सरस्वतीचंद्र के लेखक के रूप में ही नहीं, बल्कि एक विचारक के रूप में भी याद किये जाते हैं. जो लोग गुजराती भाषी नहीं, मेरी तरह हिंदी भाषी हैं, उनको ध्यान में रख कर मैं यहां 19वीं सदी के गुजराती लेखकों पर पड़े प्रभावों के संदर्भ में कुछ चर्चा करना चाहता हूं. गुजराती साहित्य की आज की यह यात्रा मेरे लिए भी बिल्कुल नई यात्रा होगी.

 

 

 

मैं बात उस प्रश्न से शुरू करना चाहता हूं, जो प्रश्नों की जननी है कि- प्रश्न क्या है?’ क्या हम 19 सदी के साहित्य या रेनेसां जैसे शब्द पर ठीक से विचार-विमर्श करते हैं? समस्या तब उत्पन्न होती है, जब साहित्य का कोई विद्वान इतिहास और समाजविज्ञान पर विचार-विमर्श करता हैं. बहुत कम लोग आधुनिक भारत के इतिहास पर लिख रहे हैं. महाराष्ट्र, बंगाल और तमिलनाडु के इतिहासकार साहित्य की अपेक्षा आधुनिक भारतीय इतिहास के संदर्भ में अधिक सफल हैं. इसलिए आज फिर से हम एक ऐसी रंगभूमि में खड़े हैं जहां साहित्य के लोगों को अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए मजबूती से पैर जमाना होगा. इस विषय में जो कुछ लिखा गया है पहले उसका हमें गभीरता से अध्ययन करना चाहिए, फिर इस पर कुछ बात करनी चाहिए.

 

 

एरिक हॉब्सबाम

 

पहला सवाल यह है कि इस कालखंड को 19वीं शताब्दी कहने की शुरूआत कब हुई? क्या कभी हमने इस विषय पर सोचा है? कुछ समय पहले मैंने एरिक हॉब्सबाम की एक किताब पढ़ी थी जिसमें वे फ्रांसीसी क्रांति के बारे में प्रचलित कहानियों का वर्णन करते हैं और समाजवाद को चार हिस्सों में बांटते हैं. इन चार कालों को वे क्रमशः क्रांति युग, पूंजी युग, सम्राटों का युग और अंतिम 20वीं सदी को वे अतिरेकों का युग कहते हैं. हॉब्सबाम कहते हैं कि सन् 1900 में उन्नीसवीं शताब्दी समाप्त नहीं हुई, बल्कि प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वर्ष 1919 में 19वीं शताब्दी का अंत हुआ. इसी तरह 20वीं शताब्दी 1999 में समाप्त नहीं हुई. इसका क्या मतलब हुआ? यहां मैं भारतीय संदर्भ में कुछ बातें आपके सामने रखता हूं. हमारी 19वीं शताब्दी की शुरुआत कब हुई, सन् 1800 में या 1857 में? दूसरी बात, क्या हमारी 19वीं शताब्दी का अंत 1900 में या 1920 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु के बाद हुआ जब गांधी जी राजनीतिक परिदृश्य में आए? 19वीं शताब्दी के प्रारंभ और अंत को यदि हम गौर से देखें, तो पाएंगे कि इसी समय से हमारे देश का इतिहास नये सिरे से दिखाई देने लगता है.

 

 

 

एक इतिहासकार जब इस दौर को देखेगा तो वह सबसे पहले उस दौरान हुए मुख्य परिवर्तनों को देखेगा और तब कुछ कहेगा. इसलिए साहित्यिक वाद-विवाद पर बात करने से पहले हमें उपर्युक्त प्रश्नों के ऊपर विचार कर लेना चाहिए. जैसे 19वीं शताब्दी वस्तुतः कब शुरु हुई? हिंदी साहित्य में 19वीं शताब्दी सन् 1800 से शुरू नहीं होती है. इसलिए गुजराती के विद्यार्थियों को भी खुद निर्णय लेने दिया जाए कि उनके यहां 19वीं शताब्दी कब से शुरू हुई? वास्तव में हिंदी में 19वीं शताब्दी की शुरूआत 1857 के बाद मानी जाती है. 1850 में भारतेंदु का जन्म हुआ. 1857 के ठीक बाद से उन्होंने लिखना शुरू किया. 19वीं शताब्दी के विकास तक मैथिलीशरण गुप्त अपना भारत-भारती पूरा कर चुके थे. यद्यपि यह खड़ी बोली में लिखी गई थी और इसका अंत 1917-18 के आसपास हुआ, जब छायावादी कवि और प्रेमचंद साहित्य के ऊंचे शिखर पर पहुंचे. गुजराती साहित्य के अध्येता 20वीं शताब्दी का प्रारंभ 1900 के अंत में निर्धारण करते हैं. मैं समझता हूं कि 20वीं शताब्दी के गुजराती साहित्य का वह सुधार युग था, जो इस युग में अधिक विकसित हुआ. इससे यह स्पष्ट होता है कि 20वीं शताब्दी वर्ष 1900 के बाद शुरू होती है.

 

 

 

अब बचा यह प्रश्न के उस दौर के साहित्य क्या ना दें? क्या हम इसे रेनेसां कहेंगे? अंग्रेजी के अध्यापक जानते हैं कि अंग्रेजी साहित्य में रेनेसां पर विचार-विमर्श स्टीफेन ग्रीनबेल्ट के लेख के बाद शुरू हुआ. नये इतिहासवाद में ग्रीनबेल्ट कहते हैं कि क्या सभ्य बनाने की परंपरा रेनेसां के बाद शेक्सपीयर के समय में शुरू हुई थी? क्या आपको रेनेसां शब्द हिस्ट्री ऑफ इंग्लिश लिटरेचर में मिलता है? इसके लिए हमें लगोइस और केजेमियां के विश्वसनीय हिस्ट्री ऑफ इंग्लिश लिटरेचर को देखना चाहिए. इंग्लैंड में सुधार शब्द ने अपना स्थान प्राप्त कर लिया, लेकिन पुनर्जागरण को सदैव इटालियन पुनर्जागरण माना गया. फ्रेंच रेनेसां की तरह वहां ऐसी कोई चीज नहीं है. इसलिए रेनेसां ऐसा कोई सार्वभौम विचार नहीं है जिसे आसानी से ग्रहण किया जा सके. जब विश्व साहित्य से संबंधित इतिहास लिखा गया, तो इटालियन रेनेसां उपयुक्त शब्द रहा होगा. यह शब्द दंतकथाओं के युग में उपयुक्त रहा. जैकब बर्चर्ड द्वारा रेनेसां की संस्कृति और सभ्यता लिखने के बाद जर्मन लोगों ने इसे इटालियन रेनेसां की तरह संवारा. कभी-कभी ऐसा होता है कि बच्चा पहले पैदा हो जाता है और जन्म-संस्कार जन्म के लंबे समय बाद होता है. उन दिनों इटली में जो कुछ हुआ उसे इटालियन जागरण की तरह नहीं जाना गया. जैकब बर्चर्ड के पहले किसी ने इस नाम से नहीं पुकारा था. 19वीं शताब्दी में उन्हें इसे रेनेसां कहना पड़ा, क्योंकि जर्मन ज्ञान पहले से स्थान ग्रहण कर चुका था और दोनों के बीच एक अंतर मौजूद था. 14वीं शताब्दी में इटली में क्या हुआ और कांट तथा हीगेल के समय जो कुछ हुआ, उन दोनों में बहुत अंतर था. इसलिए पहले वाले को तो रेनेसां कहा गया और बाद वाले को ज्ञान.

 

 

 

रेनेसां के दो अर्थ हैं. अंग्रेजी में एक अर्थ है और फ्रेंच में दूसरा. इन दोनों शब्दों की उत्पत्ति के दो स्थान होने चाहिए, क्योंकि रेनेसां इंग्लैंड में नहीं हुआ. हेनरी अष्टम ने इंग्लैंड को ईसाईयों से पृथक बताया और इस प्रकार रेनेसां का मार्ग प्रशस्त किया. तब जाकर शेक्सपीयर आए. इसलिए मैं अनुरोध करूंगा कि हमारे विद्वान पहले अंग्रेजी का इतिहास पढ़ें, तब हमें हमारा इतिहास बताएं. तथ्य यह है कि जागरण एक सार्वभौम नाम नहीं है.

 

 

 

रेनेसां शब्द अमेरिका में कब पैदा हुआ ? यह 1776 में अमेरिका को स्वतंत्रता मिलने के बाद अस्तित्व में आया. जेफर्सन के समय में जब बोस्टन टी पार्टी हुई थी, वही अमेरिकी जागरण का समय है. अब अगला सवाल यह है कि क्या रेनेसां चीन में हुआ था? क्या यह कभी रूस में हुआ था ? चीनी लोगों का विश्वास है कि रेनेसां चींग राजवंश के काल में हुआ, जब वहां मई की चौथी क्रांति हुई.  यह सनयात सेन के समय हुआ, मगर चीन इसके पीछे इतिहास में नहीं जाता, क्योंकि वहां इसका प्रवेश ही देर से हुआ. जापान में रेनेसां मैची के समय शुरू हुआ. जहां यह कायदे से चीन से पहले शुरू हुआ. इसलिए हम बेकार में इस पर वक्त जाया करें, क्योंकि रेनेसां एक प्रक्रिया है. बंगाली, हिंदी, गुजराती या मराठी में इसे क्या कहा गया यह महत्वपूर्ण नहीं है. मराठी में यह प्रबोधन काल के रूप में जाना जाता है, परंतु इसका अर्थ जागरण है.

 

 

 

दूसरा विंदु जिसे मैं उठाना चाहता हूं, वह मात्र नामकरण की समस्या नहीं है. यह राष्ट्रीय या क्षेत्रीय विचारों पर पर निर्भर करता है. अलग-अलग जातियों और सभ्यता से संबंधित होने के कारण लोगों ने इसको विभिन्न नामों से अभिहित किया. मेरा विश्वास है कि संपूर्ण समस्या का संबंध इसके प्रत्यक्ष होने से है. क्योंकि, एडवर्ड सईद ने कहा कि यह एशियावासियों का मृत्यु पत्र द्वारा प्राप्त धन था. जब पाश्चात्य विद्वानों ने पुरातन सभ्यता का अध्ययन किया तो भारत उनमें से एक था. उन लोगों ने अपने विचारों का प्रभाव हमारे ऊपर डालने का प्रयास किया, क्योंकि वे पूरे मानव इतिहास को अपने हाथों में जकड़ कर प्रभावी होना चाहते थे, जिसे उन्होंने ज्ञान की शक्ति के नाम से पुकारा और इस प्रयत्न का सबसे अधिक मनोरंजक उदाहरण स्वयं रेनेसां नाम था. इसका प्रयोग सबसे पहले बंगाल में अंग्रेजी लेखन में हुआ और ऐसा कहा जाता है कि इसका प्रयोग सबसे पहले एक अंग्रेज अलेक्जेंडर डेफ ने किया. बाद में राजा राममोहन राय ने इसे स्वीकार कर लिया. इसके बाद बंगाल के लोग इस शब्द का प्रयोग करने लगे.

 

 

 

ईस्ट इंडिया कंपनी का केंद्र कलकत्ता था. इसलिए कलकत्ता भारत की प्रथम संघीय राजधानी हुई. औपनिवेशीकरण का सर्वाधिक प्रभाव बंगाल में था और पुनः बंगाल ही इसको रोकने के लिए मजबूत प्रयास करने का गवाह भी बना. केवल बंगाल में ही बंकिम और रवींद्र नाथ हो सके. रेनेसां शब्द बंगाली भद्रलोक द्वारा औपनिवेशिक प्रभाव के अंतर्गत आए हुए शब्द के रूप में ग्रहण किया गया. यह औपनिवेशिक विचार उस समय तक मस्तिष्क में बना रहा और किसी ने इस पर नहीं सोचा. फिर लोग भूल गए, जैसे कोई मरने के बाद भुला दिया जाता है. इसका सबसे ताजा और नया उदाहरण है दीपेश चक्रवर्ती की किताब प्रोविंसियल योरोप. बंगाल के बारे में यह काफी परिश्रमपूर्वक लिखी गई किताब है. मुझे यह किताब पसंद आई. प्रोविंसियल योरोप में जो अर्थ सन्निहित है, वह ये कि विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं में भारत की सभ्यता सबसे पुरानी सभ्यता है. हड़प्पा की सभ्यता भारत में ही फली-फूली. विश्व की पहली पुस्तक ऋगवेद भारत में ही लिखी गई. इसलिए भारत इसका केंद्र हो सकता था. चीन और पश्चिम एशिया भी इसका केंद्र हो सकता था, लेकिन आधुनिक समय में इसका केंद्र तो भारत है और चीन. विकास और गतिशास्त्र का केंद्र योरोप है, इसलिए सभी देशों को योरोप के अनुसार चलना पड़ेगा.

 

 

 

औपनिवेशिक विचार क्या है? अभी इस उत्तर औपनिवेशिक समय में बंगाली भद्रलोक पूरी तरह से यूरो-एशियाई हो गये हैं. वह बंकिम और रवींद्र नाथ को पूरी तरह भूल चुके हैं. यह संगोष्ठी भारतीय भाषाओं, जैसे गुजराती और हिंदी की जागृति के विषय में नये सिरे से विचार करने का एक प्रयास है. 19वीं शताब्दी के बारे में मैंने जो कुछ सोचा है उस पर पहले जरा विचार कर लें. यदि यह जागरण है, तो वह क्या है जो कबीर और नामदेव के समय हुआ था? इटली की तरह उसी समय स्पष्ट रूप से हमारे देश में भी जागृति फैली. यह बात मैं इटली के साथ समानता का दावा करने के लिए नहीं कह रहा हूं, लेकिन तथ्य यह है कि आधुनिक भारतीय भाषाएं दसवींग्यारहवीं शताब्दी से ही जन्म लेने लगी थी. प्राकृत पहले ही अस्तित्व में थी. संस्कृत की संस्कृति अपनी अवनति के दौर से गुजर रही थी और यह वह समय था जब जनभाषा साहित्यिक भाषाओं की ओर उन्मुख हो रही थी. जैसे गुजराती, हिंदी, मराठी, बंगाली आदि.

 

 

 

उन दिनों आर्थिक हालत बेहद खराब थी. विद्वानों, पंडितों और रियासती राजाओं के बुरे दिन गए थे. इस युग के बाद एक नया वास्तुशिल्प, संगीत का एक नया ढंग जो हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत कहलाया, की शुरुआत हुई. ध्रुपद का स्थान खयाल गायकी ने ले लिया. यह एक परिवर्तन था, जिसके परिणामस्वरूप संस्कृति मध्य एशिया का संगम हो गई. घर के दरवाजे कलात्मक होने लगे. इमारतों में गुंबद बनने लगे. रंग-रोगन में परिवर्तन हुआ. वास्तुशिल्प में बिल्कुल नये तरीके से बदलाव होने लगा. अगर अजंता और एलोरा की पेंटिंग देखें और उसकी तुलना छोटे चित्रों से करें, तो एक बड़ा फर्क दिखाई देगा. साहित्य का ढंग भी परिवर्तित हुआ. प्रांतीय कहानियों का मुख्य केंद्र प्रेम था, जिसके प्रभाव से नई परंपरा के अनुसार प्रेमाख्यान हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में लिखा जाने लगा. ध्यान से देखें तो इश्क’, श्रृंगार रस के समान नहीं है. इश्क एक नया दर्शन था-सूफी-संतों और स्वदेशी परंपरा के समझौते के फलस्वरूप यह क्रांतिकारी विचार विकसित हुआ. यह श्रीमदभागवतगीता की भक्ति गीता में नहीं मिलता है. यद्यपि गीता में भक्ति योग है फिर भी इश्क का यह रूप भागवत् की भक्ति गीता में नहीं मिलता. मीरा की भक्ति आर्याशप्तसती या गाथाशप्तसती दोनों में नहीं पायी जाती है. इसलिए संगीत की नई शैली, वास्तुशिल्प, पेंटिग और साहित्य में साथ-साथ- एक नयी संस्कृति विकसित हुई. जिन लोगों ने इसे संभव बनाया वे निम्न श्रेणी के लोग थे. नाई, धोबी, दर्जी इत्यादि. ये लोग हिंदू और मुस्लिम दोनों की नजर में निम्न श्रेणी के थे. इसलिए शिल्पकार, मजदूर और किसानों का एक समूह सामने आया, जिन लोगों ने भारत को एक नया स्वरूप दिया.

 

 

 

यह साधारण लोगों का जागरण इटली के जागरण से कहीं अधिक महान था. ये धनी और शक्तिशाली लोगों द्वारा नहीं चलाया गया, बल्कि मजदूर वर्ग के लोगों ने यह अनोखा कार्य किया. विश्व-साहित्य में यह पहला आश्चर्यजनक प्रभाव था. इसलिए मैं इसे पुनर्जन्म या जागरण कह रहा हूं. यह वह युग है जब संस्कृति, दर्शन और उपनिषद पर चर्चा की गई. पहली बार उपनिषद, ब्रह्म समाज के सदस्यों द्वारा पुनर्जीवित नहीं हुआ था. सच तो यह है कि शंकराचार्य के बाद रामानुज ने इस क्रांति को नई दिशा दी थी. उन्होंने मंदिरों के शिखर पर लिखे मंत्रों को आम लोगों के लिए प्रकाशित किया. यह सब उन्होंने कुछ विशेष लोगों के लिए नहीं किया था. इसी युग में वल्लभाचार्य और विशिष्टाद्वैतवाद सामने आया. यह रेनेसां उन लोगों ने लाया, जो प्राचीन परंपरा का सम्मान करते थे. वे आज के दलितों की तरह नहीं थे, जो ब्राह्मण की बुराई करते हैं और यह मान कर चलते हैं कि ऐसा कर के वे सामाजिक क्रांति ले आएंगे.

 

 

 

दक्षिण में भक्ति आंदोलन शुरू हो चुका था. आलवार और नार ने इसकी शुरूआत की थी. जिसमें शैव और वैष्णव दोनों मतों के लोग शामिल थे. निर्गुणवादियों का एक पृथक समूह भी था, इसलिए बौद्ध-युग के बाद हमारी सभ्यता में एक बड़ा परिवर्तन हुआ. इतिहासकारों ने इस सामाजिक परिवर्तन को रेखांकित किया है. वास्तव में 13वीं -14वीं शताब्दी में क्या हुआ? डॉ. राम विलास शर्मा ने अपनी आलोचना में उल्लेख किया है कि उसी दौर में हिंदी में एक नया जागरण पैदा हुआ. बकौल डॉ. शर्मा, आधे दर्जन से अधिक सुधार हुए. वह प्रत्येक घटना को एक रेनेसां का नाम देते हैं. क्या कोई अपनी बेटियों का नाम इस तरह रखता है कि पहली पुत्री का नाम सावित्री नं.1 और दूसरी का सावित्री नं.2 हो? यह इंग्लैंड में एक परंपरा हो सकती है, जहां हेनरी-I, हेनरी-II और हेनरी-VIII होते हैं. हम उनकी नकल क्यों करें? केवल एक ही रेनेसां या पुनर्जन्म ने यह स्थान लिया है और वह रेनेसां 13वीं-14वीं शताब्दी का था. जो कुछ बाद में हुआ उसे हमें दूसरा नाम देना पड़ा. अब यह आप पर निर्भर करता है कि मेरे इस विचार से आप सहमत हैं या नहीं हैं, और यदि आप इस ओर जाने के लिए सहमत हैं तो इसे खोजि और सुधारने की कोशिश कीजि.

 

 

 

अब हम यह समझने का प्रयत्न करें कि वास्तव में 19वीं शताब्दी में क्या हुआ. 1893 में बांग्ला साहित्य परिषद् का गठन हुआ और बंगला जातीय साहित्य पर पहला भाषण रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने दिया. जो बाद में उनके निबंध संग्रह के रूप में छपा. रवींद्र नाथ ठाकुर ने लक्षित किया कि 19वीं शताब्दी में हमारी संस्कृति का संबंध अतीत से अलग हो गया है. हम फिर भी अतीत के बारे में बात करते हैं, जो सांसारिक अधिक है. यह बिना अभिप्राय के एक मृत संस्कृति बन चुकी है. यह हमारी धमनियों, नसों में नहीं बहती और हमारे हृदय तक पहुंचती है. इसका संबंध टूट चुका है, हमारे बंधन अलग हो गए हैं. आखिर कैसे और क्यों हमारा संबंध टूटा? हमें इस प्रश्न पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए. इसके कारणों के खोजने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है.

 

 

 

19वीं शताब्दी के लोग नहीं जानते थे कि एक राजा अशोक था, जिसने अपने शासन काल में खंभों पर कुछ अंकित करवाया था. जेम्स प्रिंसेप-I ने अशोक द्वारा खुदवाए गए अक्षरों को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया और ऐसे विद्वानों की खोज आरंभ की, जो इस नेक काम में उनकी सहायता कर सके. लेकिन भारत में कोई ऐसा पंडित उन्हें नहीं मिला. लोग ब्राह्मी लिपि को भूल चुके थे. इसी काल में बहुत-सी जगहों की खुदाई आरंभ हुई. हम इतने अनभिज्ञ थे कि हड़प्पा के बारे में भी कुछ नहीं जानते थे. सायण के बाद किसी ने वेद पर टीका लिखने के बारे में नहीं सोचा. बाद में दयानंद ने कुछ लिखा. उपनिषद या स्मृत्ति पर इस लंबे अंतराल में क्या आपने किसी का लिखा कुछ देखा या सुना है? हम अपने बीते हुए पांच-छह सौ सालों की पैतृक संपत्ति को भूल चुके थे.

 

 

रवींद्र नाथ ठाकुर

 

रवींद्र नाथ ठाकुर ने बहुत उचित बात कही कि हमें अपने अतीत को स्थापित करना चाहिए. तब मैंने इस तथ्य पर विश्वास