बटरोही जी का आलेख ‘औरतें नहीं हो सकतीं हिंदी-रसोई की शेफ़’


बटरोही

 

लेखन ऐसा क्षेत्र है जिसमें हर किसी को अपने लेखन के जरिए ही साबित करना होता है यहाँ कोई भी जोड-तोड काम नहीं आताकोई लेखक अपने जीवन में जोड-तोड कर के ख्याति बटोर तो सकता है, लोकप्रिय नहीं हो सकताऐसे लोग समय बीतने के साथ ही बीत जाते हैं हिंदी लेखन में स्त्रियों ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर अपने को साबित किया है। इन स्त्री लेखिकाओं ने उस मिथक को तोडा है जो अभी तक हमारे समाज की मान्यता हुआ करती थी कि औरतें ही हिंदी-रसोई की शेफ़ हो सकतीं हैंशिवरानी देवी, शिवानी, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, ममता कालिया, मृदुला गर्ग, मधु कांकरिया आदि अनेक ऐसे नाम हैं जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि उन्होंने उम्दा लेखन किया है। बटरोही जी हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित लेखक हैं। अपने एक आलेख में हिंदी की बड़ी लेखिकाओं शिवरानी देवी प्रेमचंद, शिवानी, मन्नू भंडारी, मृदुला गर्ग और मधु कांकरिया के संपर्क को याद करते हुए उन्होंने महत्त्वपूर्ण बातें रखी हैं। आइए आज पहली बार पर पढते हैं बटरोही जी का आलेख औरतें नहीं हो सकतीं हिंदी-रसोई की शेफ़      

     

 

औरतें नहीं हो सकतीं हिंदी-रसोई की शेफ़

 

 (हिंदी की बड़ी लेखिकाओं शिवरानी देवी प्रेमचंद, शिवानी, मन्नू भंडारी, मृदुला गर्ग और मधु कांकरिया के संपर्क को याद करते हुए)

 

 

बटरोही

 

 

ढलती उम्र में पुराने संकल्प बार-बार याद आते हैं और तब एक अजीब किस्म का अपराध-बोध तारी होने लगता है जरूरी नहीं कि पचहत्तर की उम्र में आदमी बूढ़ा हो ही जाता है, फिर भी यादों के सिलसिले को ले कर नौस्टेल्जिक होने की उम्र तो यह है ही मेरी तरह स्मृतियों का यह खुर्द-बुर्द और भी हम-उम्र लोगों के साथ होता होगा, जब एक लाचार स्वीकृति के अलावा आपके हाथ में कुछ नहीं होता आप ही बताइए, ऐसे में हम कर ही क्या सकते हैं?

उम्र की ढलती सांझ पर मेरी यह आप-बीती आपके पेशे-नज़र है

 

++++

 

शुरुआत करता हूँ आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य की प्रथम महिला (फर्स्ट लेडी) श्रीमती शिवरानी देवी प्रेमचंद से

 

++++

 

अमृत राय जी ने राजकमल प्रकाशन से नई कहानियांके अधिकार खरीद लिए थे और इलाहाबाद के अशोक नगर स्थित उनके आवास धूप-छांहमें उसका कार्यालय बन गया था इलाहाबाद में उन दिनों, जब मेरे पास कोई आर्थिक आधार नहीं था, उन कठिन दिनों में अमृत जी ने मुझे अपना सहायक नियुक्त कर के मुझे सुरक्षा और ऊर्जा प्रदान की थी मैं एम. . करने के बाद कस्बाई शहर नैनीताल से नया-नया बाहर निकला था और हिंदी समाज के सबसे बड़े बौद्धिक केंद्र प्रयाग में शोध-कार्य के लिए पहुंचा था कोई आर्थिक सहारा नहीं, सिर्फ साहित्यकारों की नगरी में लेखकों के बीच रहने का आकर्षण था, जिसे मैं किसी भी हालत में खोना नहीं चाहता था मटियानी जी के साथ रहता था जो खुद भी आर्थिक दृष्टि से बेहद असुरक्षित थे चार बच्चे, दो मियां-बीबी और एक मैं, कुल सात लोग; सभी सिर्फ शैलेश जी पर आश्रित उनकी कोई स्थायी नौकरी नहीं थी, अलबत्ता उन दिनों वह एक बड़े प्रकाशक किताब महलके साथ एक अनुबंध के तहत जुड़े हुए थे प्रकाशक ने उन्हें एक कमरे में बैठ कर लिखने और कूलर, चाय-पानी की सारी सुविधाएँ दी हुई थीं वो दिन भर में जितना भी लिखते थे, शाम को ज्यों-का-त्यों कम्पोजिंग में चला जाता था और दूसरे दिन प्रूफ पढ़ते हुए ही वह उसमें कोई संशोधन करते थे उनका सारा लेखन ऐसे ही भागमभाग में संपन्न हुआ है इन्हीं किताबों की रॉयल्टी से उनका काम चलता था

 

मटियानी जी के स्नेह और वात्सल्य के बावजूद मेरे लिए उनके साथ लम्बे समय तक टिक पाना संभव नहीं था, रिसर्च और अध्ययन के लिए अलग कमरा चाहिए था; उन्होंने विकल्पनाम से एक पत्रिका भी शुरू कर ली थी जिसके कारण उन पर काम का दबाव और व्यस्तता बढ़ गई थी यह एक अलग कहानी है कि मैं किस तरह आर्थिक मदद के लिए अमृत जी के पास पहुंचा और उन्होंने मुझे सिर्फ इतना पैसा दिया कि मैं अलग कमरा ले कर रहने लगा और खाने-पीने, लिखने-पढ़ने का सुविधाजनक माहौल प्राप्त कर सका; बाद में उन्होंने ही बनारस के अपने पैतृक आवास (जहाँ उनके पिता प्रेमचंद जी ने हंसका प्रकाशन शुरू किया था) जा कर रहने और शोध कार्य करने के लिए सुविधा प्रदान की

मगर मैं यहाँ एक और सन्दर्भ में बात करना चाहता हूँ

 

अमृत राय जी की धूप-छांह कोठी उस वक़्त पूरे इलाहाबाद में मशहूर थी ईर्ष्यालु हिंदी लेखक-समाज उसके आवास के सुरुचिपूर्ण विन्यास और विशालता को ले कर तरह-तरह के किस्से सुनाता था, जिनमें सबसे रोचक यह था कि प्रेमचंद आज जीवित होते तो उनकी इस घर में घुसने की हिम्मत नहीं होती मैं अमृत जी के प्रति रवैये को लेकर हैरान रहता था, मगर हिंदी समाज हवा के रुख से संचालित होने वाला मानव-समूह है, जो अपने विवेक से नहीं, प्रभावशाली लोगों की प्रतिक्रियाओं से संचालित होता है मेरे लिए इस बात का कोई मतलब नहीं था क्योंकि उन्होंने मुझे आर्थिक आधार दिया था; फिर भी मैं रहता तो चौबीसों घंटे मध्यवर्गीय हिंदी लेखकों के खुसफुसाहट के बीच ही, इसलिए संत तो नहीं हो सकता था कब तक बकरी खैर मनाती!

 

नई कहानियांका सम्पादकीय कमरा धूप-छांहके अन्दर एक हॉल और उससे लगे दो-तीन कमरों से जुड़ा था अमृत जी तो अपनी स्टडी से ही सम्पादकीय काम-काज निबटाते थे, हॉल में कुछ अलमारियां और किताबों के रैक के अलावा दो-तीन लोगों के बैठने के लिए मेज-कुर्सियां लगी थीं, जिनमें मैं और कार्यालय से जुड़े बाबू बैठते थे हॉल के ठीक बगल में एक और बड़ा कमरा था, जो कमरा हो कर हॉल का ही विस्तार-जैसा था अमृत जी की स्टडी से आते-जाते यह कमरा बीच में पड़ता था कमरे में उनकी माँ रहती थीं, और यह कमरा भी एक आदमी के रहने लायक जगह से कहीं बड़ा था अन्दर के कमरों में उनका बेडरूम और दोनों बेटों के कमरे थे जो मैंने कभी देखे नहीं भीतर बगीचा और दालान था, जहाँ अनेक पालतू जानवर भी रहते थे महादेवी जी की तरह अमृत जी और उनकी पत्नी सुधा जी को भी अनेक पशु-पक्षी पालने का शौक था मैं नैनीताल के छोटे-से घर में पला था, जिसके लिए यह घर रहस्यलोक से कम नहीं था बीस-इक्कीस की उम्र थी, इसलिए उस माहौल को ले कर अधिक ही भावुक था

 

मेरे लिए उस घर की सबसे बड़ी उपलब्धि थीं शिवरानी देवी जी जिन्हें मैं भी मांजी कहता था, यद्यपि वो मेरी दादी की उम्र की थीं थी भी दादी ही, मेरे लिए इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता था कि मैं खुद को आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य के प्रथम पुरुष का पौत्र महसूस करूं एक ही घर में मुझे हिंदी साहित्य से जुड़े शीर्षस्थ लेखकों की विरासत मिली अमृत जी की पत्नी सुधा चौहान मिथक बन चुकी कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की बेटी थीं इस रूप में अमृत राय, जिनकी शरण में मैं था, हिंदी कथा-सम्राट के पुत्र और खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थीकी अमर गायिका के दामाद थे स्कूली जीवन में मैं ऐसे माहौल में बड़ा हुआ था जहाँ प्रेमचंद को लोग उनके उपन्यास गोदानके नायक होरी की नियति के समानांतर देखते थे, जहाँ उनके लिए इस बात पर यकीन कर पाना (आज भी) कठिन है कि हिंदी के कथाकार के एक बेटे की विशाल कोठी हो सकती है और दूसरा चित्रकार बेटा भारत के अलावा विदेश में भी एक घर जोड़ सकता है

 

 

शिवरानी देवी


करीब पचपन साल बाद अपने उन दिनों को याद करता हूँ तो मुझे मांजी को देख कर अपने मन में बसाई गयी कुलदेवी नंदा की छवि एकदम अविश्वसनीय नहीं लगती जब कि मैं बचपन से ही मूर्ति पूजा का विरोधी रहा हूँ

 

घर की सबसे सयानी सदस्य होने के बावजूद शिवरानी जी परिवार के मामले में कोई दखल नहीं देती थीं; शायद उनकी उम्र ऐसी थी भी नहीं; मगर परिवार का संचालन सुधा जी के हाथों होते हुए और दिन भर अपने कमरे में रहते हुए भी पूरे घर में उनकी उपस्थिति महसूस की जा सकती थी रसोई में वह उपस्थित नहीं रहती थीं, इसके बावजूद वही मानो घर की शेफ़ थीं मुझे नहीं मालूम कि प्रेमचंद जी की रसोई का वह कैसे संचालन करती थीं, मगर प्रेमचंद जी और उनके दोनों बेटों श्रीपत राय और अमृत राय को उसका स्वाद तो मालूम होगा ही, जिसके चलते वो इतनी बड़ी हस्तियाँ बन सके थे प्रेमचंद का फटा जूता तो लोग खूब याद करते हैं मगर उनके घर की छटांक भर घी चुपड़ीरोटी के स्वाद को कोई याद नहीं करता जिसने उनके पति और बच्चों को भले ही सीमित उम्र की देह दी हो, विश्व साहित्य को भारतीय कथाकार के रूप में ऐसी देह दी जिसका लगातार विस्तार होता जा रहा है शिवरानी जी के उल्लेखनीय साहित्यिक योगदान के बारे में तो हिंदी समाज अनभिज्ञ है ही, हिंदी परिवार को जन्म देने और उसे पोषित करने में भी उनका जो अतुलनीय योगदान रहा है, कितने लोग उसके बारे में जानते हैं! क्या इसे हिंदी लेखक समाज की अहसान-फरामोशी नहीं कहा जायेगा?

 

उस घर में रहते हुए मेरे मन में भी अनेक जिज्ञासाएं पैदा हुई थीं, लेकिन विगत पचास सालों में मैं ही उन बातों को ले कर कितना सोच सका हूँ, मैं तो उसका रत्ती-भर कोना हूँ, इतना विशाल हिंदी समाज इस साहित्यिक परंपरा के विस्तार और विन्यास में अपना कितना योगदान दे सका है!

 

++++

 

शिवानी

 

मैं जब बी. . का छात्र था, नैनीताल की अयारपाटा पहाड़ी में एक स्वप्निल बंगला हुआ करता था, प्रायरी लॉज सीधी पहाड़ी पर खड़ी इस विशाल कॉटेज में नैनीताल के जिला विद्यालय निरीक्षक का कार्यालय था जिसकी छवि इलाके के एक ईमानदार और सख्त अफसर के कार्यालय के रूप में दूर-दूर तक फैली हुई थी डीआईओएस शुकदेव पन्त हिंदी की अनोखी शैली की कथा-लेखिका शिवानी के पति थे जो इसी घर में रहते थे जाहिर है कि उस बंगले की तरह उसमें रहने वाली दंपत्ति का भी हम पर जबरदस्त आतंक था बंगले तक पहुँचने के लिए एक लम्बी सीधी चढ़ाई पड़ती थी, जिस पर चढ़ कर जाना तो हमारे लिए समस्या नहीं थी, मगर उस उच्च-मध्यवर्गीय परिवार का हम निम्न-मध्यवार्गियों पर इतना आतंक रहता था कि उनसे बात करने की हिम्मत नहीं होती थी मजेदार बात यह थी कि शिवानी जी और उनके बच्चों का हमारी बुआ के घर में खूब आना-जाना था मेरी बुआ की ननद शिवानी जी का साथ देने के लिए शान्तिनिकेतन में रही थीं और वे दोनों खुद को गहरी सहेली मानती थी शिवानी ने अपना लेखन इसी घर में रह कर करीब चालीस साल की उम्र में शुरू किया उसी घर में रहते हुए उनकी पहली उल्लेखनीय कहानी लाटी’ ‘धर्मयुगमें प्रकाशित हुई थी और छपते ही वह हिंदी पाठकों के बीच इतनी लोकप्रिय हो गयी कि हिंदी में लोकप्रिय बनाम साहित्यिक लेखन की ऐसी बहस खड़ी हो गयी कि अंग्रेजी-आतंकित हिंदी के पाठक को उन्हें निगलते बना, थूकते उन्हें तो गुलशन नंदा या कुशवाहा कान्त की तरह सस्ते लेखकों की लाईन में खड़ा किया जा सकता था, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा की तरह की आभिजात लेखकों के साथ और रेणु, शैलेश मटियानी जैसे आंचलिक कथाकारों के साथ आज भी वह वहीँ पर खड़ी हैं जहाँ पचास साल पहले थीं. आंकड़े बताते हैं कि आजादी के बाद के शिष्ट हिंदी लेखन में सबसे अधिक बिकने वाली रचनाकार वही हैं. आज तक भी आजादी के बाद का कोई भी हिंदी उपन्यासकार और इतर-गद्य लेखक लोकप्रियता में उनका मुकाबला कर सका है

 

 

मैंने उन्हें ले कर जितना समझ में सका है, लिखा, भक्त के रूप में नहीं, एक जिज्ञासु पाठक के रूप में, मगर जैसा कि मैंने शुरू में कहा, हिंदी में चर्चा हवा के रुख को देख कर होती रही है; दिग्गजों के द्वारा जो हवा बना दी जाती है, मजाल कि कोई उसमें दखल देने की हिम्मत कर सके ऐसा नहीं है कि लेखकों के बीच साहसी लोग नहीं हैं, मगर हर लेखक डरता है कि दुस्साहसिक कदम उठाते ही उसे भी तिरस्कार के अंधे कुँए में धकेल दिया जाए मैं खुद भी अपनी किशोर उम्र में हिंदी साहित्यकारों की हवा के कारण उन्हें घरेलू समस्याओं को उजागर करने वाली लेखिका मानता था (हालाँकि आज तक नहीं समझ पाया कि इसमें गलत कहाँ था) मगर किसी एक लेखक के इशारा करने से क्या फर्क पड़ता है? हमारे यहाँ छवि बनने और खंडित करने का काम तो सिर्फ दिग्गज करते हैं क़स्बे में रहने वाले अपढ़ किशोर की भला क्या बिसात

 

 

तीस साल पुराना एक वाकया बताता हूँ उनकी कहानियों पर कुछ फ़िल्में बनी थीं जो बेहद घटिया थीं मेरे मन में इन बातों को ले कर सवाल थे, जिन्हें ले कर मैंने कुछ पत्रिकाओं में लिखा भी