मनीष चौरसिया की रपट 'प्रयागराज की साहित्यिक विरासत और प्रतिरोध की गूंज: 'चेतना के दस द्वीप'




इलाहाबाद की ख्याति एक अरसे तक हिन्दी साहित्य की राजधानी के तौर पर रही है। एक से बढ़ कर एक दिग्गज साहित्यकार यहां की मिट्टी से निकले और साहित्य जगत में उन्होंने ख्याति अर्जित की। आज भी यहां अनेक ऐसे कवि हैं जिनके बिना हिन्दी कविता का कोई भी वृत्त पूरा नहीं। होता। प्रतिरोध की परम्परा यहां के मन मिजाज में है। गंगा जमुनी तहजीब यहां को धरोहर है। रणविजय सिंह सत्यकेतु ने इलाहाबाद के दस कवियों को ले कर एक किताब 'चेतना के दस द्वीप' सम्पादित की है जो न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। सत्यकेतु ने किताब की एक सुविचारित भूमिका लिखी है जिसमें उन्होंने यह बताया है कि इस किताब में 1967 से 1977 के बीच जन्मे ऐसे कवियों की कविताओं का चयन किया गया है जो मूलतः कवि हैं और जिन्होंने इलाहाबाद से ही अपने लिखने का क्रम शुरू किया। आत्म कथ्य के साथ सभी कवियों की चुनिंदा पांच कविताएं भी दी गई हैं। इस किताब पर 27 जनवरी 2026 को एक बातचीत का आयोजन किया गया जिसकी विस्तृत रपट मनीष चौरसिया ने तैयार की है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मनीष चौरसिया की रपट 'प्रयागराज की साहित्यिक विरासत और प्रतिरोध की गूंज: 'चेतना के दस द्वीप'।


रपट 

प्रयागराज की साहित्यिक विरासत और प्रतिरोध की गूंज : 'चेतना के दस द्वीप' 


मनीष चौरसिया


प्रयागराज, जो सदियों से भारतीय मनीषा और वैचारिक क्रांतियों का उर्वर केंद्र रहा है, आज एक अजीबोगरीब वैचारिक शून्यता के दौर से गुजर रहा है। इसी पृष्ठभूमि में, वरिष्ठ कवि हरिश्चंद्र पांडे की अध्यक्षता में मंगलवार को चौधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय (सीएमपी डिग्री कॉलेज), प्रयागराज के सभागार में कथाकार रणविजय सिंह ‘सत्यकेतु’ द्वारा संपादित काव्य-संकलन ‘चेतना के दस द्वीप’ पर संगत और आखर (साहित्यिक–सांस्कृतिक मंच) के संयुक्त तत्वावधान में परिचर्चा एवं कविता पाठ का आयोजन किया गया। 


कार्यक्रम महज़ एक साहित्यिक विमोचन नहीं, बल्कि 'साझा विरासत' और 'गंगा-जमुनी संस्कृति' को बचाने की दिशा में एक साहसी ललकार बन कर उभरा। आयोजन का रणनीतिक महत्व इस तथ्य से और गहरा हो जाता है कि जहाँ हाल ही में निराला जैसे महाप्राण कवि की जन्मतिथि (23 जनवरी) स्थानीय स्तर पर उपेक्षा का शिकार रही, वहीं यह मंच उस रिक्तता को भरने के संकल्प के साथ खड़ा हुआ।


यह कार्यक्रम प्रयागराज की उस अनूठी परंपरा का उत्सव था जिसे यहाँ के 'कलमी आम' (वे साहित्यकार जो बाहर से आ कर यहाँ बसे और यहीं की मिट्टी में रच-बस गए) ने सींचा है। इन कवियों ने स्पष्ट किया कि प्रयागराज आज भी हिंदी साहित्य में प्रतिरोध का वही प्रखर केंद्र है, जो सत्ता के सुविधानुसार गढ़े जा रहे नैरेटिव को चुनौती देने का माद्दा रखता है।



पूरा कार्यक्रम मुख्यतः दो चरणों में बंटा था। कार्यक्रम के पहले चरण में संकलन में शामिल कवियों और प्रतिभागियों द्वारा कविता पाठ किया गया। तथा दूसरे चरण में कवि हरिश्चंद्र पाण्डेय की अध्यक्षता में डॉ.सुधांशु मालवीय, प्रो. आशुतोष पार्थेश्वर, प्रो. प्रणय कृष्ण, प्रो. सरोज सिंह तथा प्रो. कुमार बीरेंद्र ने वक्ता के तौर पर किताब पर अपनी बात रखी।


कवि अंशु मालवीय ने 'अवस्थी ट्रंक स्टोर' और ' कसूर की घटना' का पाठ किया। कविता 'अवस्थी ट्रंक स्टोर' सुनाई, जो एक पुराने लोहे के बक्से और उसमें रखी चीजों के माध्यम से बचपन, यादों और समय के गुजरने का वर्णन करती है। कविता में कानपुर शहर के विभिन्न पहलुओं और समय के साथ उनके बदलाव को दर्शाया गया है, जैसे फैक्ट्रियों का शॉपिंग मॉल में बदलना और मजदूरों की बदलती स्थिति।


'कसूर की घटना', जो 2005 में पाकिस्तान में एक अहमदिया या बच्ची की मौत की घटना पर आधारित है, जिसे सुन्नी कब्रिस्तान से निकाल कर अहमदिया कब्रिस्तान में दफनाया गया था। यह कविता धर्म, कट्टरता और मानवीय संवेदनाओं के बीच के संघर्ष को दर्शाती है, जिसमें बच्ची के पिता के दर्द और समाज के सवालों को उठाया गया है। कविता में बाबा बुल्ले शाह के पद "माटी कुदम करेनदी यार" का संदर्भ दिया गया है, जो मिट्टी और इंसान के रिश्ते पर आधारित है। अंशु मालवीय जी ने बताया कि कैसे किताबें और धर्म सरहदों और नस्लों के बीज बोते हैं, और कैसे इंसान मिट्टी का बना होने के बावजूद मिट्टी में मिल नहीं पाता।


बसन्त त्रिपाठी 


बसंत त्रिपाठी ने ' युद्ध के बाद जीवन' और 'रात बहुत है बाकी अभी' का पाठ किया। 'युद्ध के बाद जीवन' यह कविता युद्ध के बाद के जीवन की आशा और पुनरुत्थान को दर्शाती है। कवि युद्ध के विनाश के बाद भी प्रेम, सुंदरता और मानवीय संबंधों को बनाए रखने की इच्छा व्यक्त करता है। 'रात बहुत बाकी है अभी' यह कविता रात के विभिन्न पहलुओं का वर्णन करती है, जिसमें बेचैनी, अकेलापन और अज्ञात का डर शामिल है। कवि रात के सन्नाटे में अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करता है। दोनों कविताएं मानवीय संबंधों की जटिलता और परिवर्तनशीलता को दर्शाती हैं। कवि परिचित और अपरिचित चेहरों के बीच के अंतर को उजागर करता है, और यह सवाल करता है कि क्या हम वास्तव में उन लोगों को जानते हैं जिन्हें हम जानते हैं। कविताओं में आशा और निराशा दोनों के तत्व मौजूद हैं। युद्ध के बाद जीवन में आशा की किरण है, जबकि रात बहुत बाकी है अभी में निराशा और अकेलापन हावी है।


रविकांत ने 'जीवन', 'भीम पलाशी', 'चमाईन' और 'औरंगजेब' कविता का पाठ किया। "जीवन भीम पलाशी" कविता में कवि ने खुद को लू सहने वाला फट्ठे जैसा कुछ और न बनने की इच्छा व्यक्त की। "चमाइन" कविता में कवि ने अपनी जाति "चमार" के बारे में बात की, जिसे बचपन में अपमान का कारण बताया गया था। समाज सुधारकों ने इस शब्द को गाली में बदल दिया, और अब इसे कहने पर जेल हो सकती है। वक्ता जानना चाहता है कि क्या उसे अभी भी पीठ पीछे "चमाइन" कहा जाता है। "औरंगजेब" कविता में कवि ने औरंगजेब के भाई की हत्या के 350 साल बाद सत्ता के लिए फिर से करवट लेने की बात की। औरंगजेब ने दाराशिकोह के गुणों का प्रचार किया और श्री कृष्ण जन्मभूमि को मुक्त कराने की बात कही। कविता में राजनीति और सत्ता के खेल को दर्शाया गया है।


सन्ध्या नवोदिता


कवयित्री संध्या नवोदिता ने "चाँद पर मालिकाना", "आप तो नहीं हैं चूहा" और "देश–देश" कविता का पाठ किया। "चांद पर मालिकाना" कविता सुनाई, जिसमें अंधेरे और उजाले के बीच के संबंध को दर्शाया गया है।।कवियित्री  ने बताया  कि कैसे खूबसूरत घर खूबसूरत औरतों की कब्रगाह बन जाते हैं। उन्होंने "आप तो नहीं हैं चूहा" कविता सुनाई, जिसमें बताया गया है कि कैसे लोग खुद को चूहा नहीं मानते, लेकिन शेर की निगाह में वे चूहे से ज़्यादा नहीं हैं। यह कविता सत्ता और शक्ति के दुरुपयोग पर कटाक्ष करती है। इसके बाद उन्होंने "देश देश" कविता सुनाई, जिसमें देश के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया गया है - उसके खेत, जंगल, नदियाँ, पहाड़, और उसकी पीड़ाएँ। यह कविता देश की वर्तमान स्थिति और उसके इतिहास को भी छूती है। कविता में देश को एक मछुआरे, समंदर, हिमालय, दंडकारण्य, और अबूझमाड़ के रूप में चित्रित किया गया है।कविता में देश को लोहे का बस्तर, उड़ीसा के लाल कोयले की आग, टिहरी, और मरती गंगा के रूप में भी दर्शाया गया है।।कविता में देश को बेलाडीला की खदान, मानेसर का माल, उत्तर पूर्व का उपनिवेश, और इरोम शर्मिला की आँखों से देखा गया लुटियंस की दिल्ली के रूप में भी दिखाया गया है। कविता में देश को 2002 का जलता गुजरात, अशफाक, भगत, सुखदेव, राजगुरु, आजाद, और जलियांवाला की गोलियों से छलनी दीवार के रूप में भी चित्रित किया गया है।।कविता में देश को आंसुओं का महाराग, 47 का तहस-नहस दाग, और टूटे सपनों की भयानक परछाई के रूप में भी दर्शाया गया है। अंत में, कविता में देश को प्यार, गर्व, और चुनौतियों से टकराती जिजीविषा के रूप में चित्रित किया गया है।


इसके बाद कवि विवेक निराला जी की अनुपस्थिति में उनके कवि मित्र बसंत त्रिपाठी जी ने उनकी दो छोटी कविताएं पढ़ीं। पहली कविता "पासवर्ड" में, वक्ता ने अपने पूर्वजों की संपत्तिहीनता और अपने पिता के पास एक हारमोनियम होने का उल्लेख किया, जिसके स्वर उनकी निजी संपत्ति थे। वक्ता ने अपनी निजता और सामाजिकता के लंबे पासवर्ड का भी जिक्र किया। दूसरी कविता के दो छोटे हिस्से थे। पहले हिस्से का शीर्षक "रिक्ति" था, जिसमें आत्मा के उधड़ने, दिन भर भागने, और तुरपन के लिए सुई-धागे की कमी का वर्णन किया गया था।दूसरे हिस्से में ऋतुओं के पंख फड़फड़ाने, एक साल और उड़ जाने, राग के गाढ़ा होने, और एक खोए हुए स्वर की खाली जगह का जिक्र था, जो उदास करती है। इसमें स्वरों की गंभीरता, आलाप में बचा हुआ विलाप, और एक छोटे ख्याल के बड़े ख्याल से वंचित होने का भी वर्णन था।


संतोष चतुर्वेदी ने  "स्टेपनी" और "पिता जी जब छोटे हो जाएंगे" कविता पढ़ी। कवि ने एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बात की जो अक्सर उपेक्षित होता है, हमेशा पंक्ति में सबसे पीछे खड़ा रहता है, और जिस पर किसी का ध्यान नहीं जाता। ऐसे लोग जीवन में सबसे पीछे होते हैं, लेकिन जब सभी हार मान लेते हैं, तो अंततः यही काम आते हैं। संतोष ने "पिताजी जब छोटे हो जाएं" शीर्षक वाली एक कविता सुनाई। इसमें एक पिता अपनी चार साल की बेटी नव्या के साथ बातचीत का वर्णन करता है। नव्या की बड़ी बहन काव्या पूछती है कि पिता चलते समय हमेशा उनकी उंगली क्यों पकड़ते हैं। नव्या जवाब देती है कि जब पिताजी छोटे हो जाएंगे, तो वे उन्हें अपनी उंगली पकड़ कर टहलाएंगी।संतोष जी ने बताया कि यह सुनकर उन्हें लगा कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, माता-पिता छोटे होते जाते हैं। संतोष जी अपनी मां के निधन के कारण भावुक हो गए और आगे कविता नहीं पढ़ पाए।


अंशुल त्रिपाठी


अंशुल त्रिपाठी ने दो कविताएं पढ़ी पहली  "अलगाव" शीर्षक से कविता पढ़ी, जिसमें एक सर्द रात में कार के शीशे पर जमी दो लोगों की सांसों की परत का वर्णन है। यह परत न तो वाष्प है और न ही कोहरा, बल्कि कवि के लिए यह बारिशों के गुल की खुशबू है जो दुनियावी कारोबार और उनके बीच एक पर्दा है। कवि पूछता है कि यदि अलग होना ही है, तो इस परत से अपनी सांसें पहचान लो। दूसरी कविता "साधु कन्हाई और सांस्कृतिक केंद्र की एक शाम" एक मित्र को समर्पित है जिसने युवावस्था में थिएटर छोड़ दिया था। कविता मित्र की आंखों में कॉकटेल में घुली शाम के नशे और अधूरे सपनों का वर्णन करती है। कवि मित्र से पूछता है कि क्या नदियों का बहना उसे सुकून देता है या परेशान करता है, और क्या उसे अपने लिए न जी पाने की कसक कभी नहीं उठती। मित्र की शिकायत न करने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाया गया है। मित्र की बेपरवाह जीवनशैली का वर्णन किया गया है: बढ़ी हुई दाढ़ी, बिना मोजे के जूते, पुरानी जींस, न घड़ी, न मोबाइल, न पेन। कवि पूछता है कि यह सब किसके लिए है, क्योंकि यह अपने लिए तो नहीं है। मित्र का मानना है कि यदि दीर्घा में एक भी दर्शक हो तो नाटक होना ही चाहिए। इस बात को कहते हुए उसकी आंखों में बीते दिनों के सारे पाठ झलकते हैं, जैसे होरी, हेमलेट, लैना सिंह, बावन दास, नत्था, तुगलक, मनु, कृष्ण और अश्वत्थामा। कविता में कोर्ट मार्शल के बाद की एक शाम का भी जिक्र है, जब मित्र ने सिगरेट का धुआं जमीन की ओर फेंकते हुए कहा था, "कमली जा रही है डॉक्टर प्रशांत?" कवि को महीनों के रिहर्सल, स्पर्श, पात्र, प्रेम और नाटक सब याद हैं। कवि उन महिलाओं को याद करता है जिनकी हथेलियों पर मित्र की नमी उतर आती थी, जो उसे ओथेलो की डेस्डिमोना की तरह कस लेती थीं, और जिनकी उंगलियों से वह पक्षी की तरह खेला करता था।इन स्मृतियों के साथ, अधूरे मन से मौसम आज सांस्कृतिक केंद्र के आंगन में उतर रहा है। प्रेक्षागृह में तीसरी घंटी बज चुकी है, शकुंतला ने अपनी बेड़ी में केतकी के फूल लगा लिए हैं, और ग्रीन रूम खुशबू से भर गया है। फिडल बोर्ड केस मित्र के इंतजार में बेचैन हैं, और कवि पूछता है, "मेरे मित्र, तुम आओगे?"



इसके बाद शोध छात्रा मनीता यादव ने वाजदा खान की कविता" नफरतों का दौर" का पाठ किया। वाजिदा खान की कविता 'नफरतों का दौर' में कवयित्री ने आधुनिक युग में बढ़ती नफरत और दूरियों को दर्शाया है। कविता में चांद को संबोधित करते हुए कहा गया है कि अब लोग उसे अपनी शायरी या जीवन में शामिल करने पर विश्वास न करें, क्योंकि उसे कभी भी हटाया जा सकता है। सूर्य और चांद के रिश्ते का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि कैसे वे एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, जबकि दुनिया अब विज्ञान और गणित के फॉर्मूलों की तरह सब कुछ सिद्ध करने में लगी है। कवयित्री कहती हैं कि दुनिया हर चीज़ को अलग-अलग करने में लगी है, चाहे वह चांद हो, धरती हो या पेड़-पौधे।अंत में, कवयित्री 'मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना' पंक्ति को याद करती हैं, लेकिन अब उन्हें केवल 'मज़हब सिखाता है आपस में बैर रखना' की प्रतिध्वनि सुनाई देती है, जो यह दर्शाता है कि कैसे 'नहीं' शब्द की हत्या हो गई है।


एम. ए. के छात्र अंकित ने बोधिसत्व की कविता  "माँ का नाच"  का पाठ किया। कविता "मां का नाच" में, कई स्त्रियां खेत या आंगन में नाच रही थीं, विभिन्न रंगों की साड़ियां पहने हुए, एक-दूसरे की मदद कर रही थीं। मां की बारी आने पर, उसने सधे ढंग से नाचना और पुराना गीत गाना शुरू किया, जिससे सभी अचंभित रह गए। मां के पैरों में बिवाइयां थीं, घुटने टूट चुके थे और कमर झुक चुकी थी, फिर भी वह बवंडर की तरह नाच रही थी, क्योंकि उसे बहुत दिनों बाद नाचने का मौका मिला था। अचानक मां का गाना बंद हो गया, पर वह इतनी गति में थी कि नाचती रही। गाने की जगह विलाप का स्वर उठा और वह बिलखते हुए नाचती रही। इसके बाद अंजनी शुक्ला ने वसुंधरा पाण्डेय की कविता का पाठ किया।


आधार वक्तव्य देते हुए डॉ. सुधांशु मालवीय ने कहा कि यह संकलन आज के कवियों के प्रतिरोध के स्वर को सहेजता है। सुधांशु जी ने इलाहाबाद के दस कवियों की कविताओं के संग्रह की चर्चा की, जिसमें अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध और गंगा-जमुनी संस्कृति को बढ़ावा देने की बात कही गई है। इसके अतिरिक्त उन्होंने इलाहाबाद के महान कवि निराला को याद न किए जाने पर दुख व्यक्त किया और उनकी जयंती पर शहर में कोई कार्यक्रम न होने की आलोचना की। वक्ता ने आज के समय में साहित्य और कविता की सबसे बड़ी जरूरत "प्रतिरोध का स्वर" बताया और कहा कि यह पुस्तक इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।उन्होंने महमूद दरवेश, फैज, ब्रेख्त, नजरुल इस्लाम, निराला और पाश को स्मरण करते हुए कहा कि किसी भी साहित्य की सबसे बड़ी शर्त समय से संवाद है। आज संवाद, मंच और संस्थाओं की नितांत आवश्यकता है, क्योंकि पाठक वर्ग की उपेक्षा कविता की धार को कुंद करती है।


हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. आशुतोष पार्थेश्वर ने "चेतना के दस द्वीप" नामक कविता संग्रह पर अपने विचार प्रस्तुत किए, जिसमें उन्होंने अपनी व्यक्तिगत राय और कविताओं की अपनी समझ को स्पष्ट किया। उन्होंने संग्रह में शामिल कवियों और कविताओं के चयन के लिए संपादक सत्यकेतु जी की प्रशंसा की, विशेष रूप से इलाहाबाद से जुड़े कवियों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए।पार्थेश्वर ने संग्रह की कुछ कविताओं का विशेष रूप से उल्लेख किया, जैसे "पागल दास", "अत्तार युसुफ और गलजिल का किस्सा", और "संजीव हुसैन" "पागल दास" कविता के माध्यम से उन्होंने समाज में सच बोलने वालों की स्थिति और उनके प्रति उदासीनता पर प्रकाश डाला।"अत्तार युसुफ और गलजिल का किस्सा" कविता के माध्यम से उन्होंने कश्मीर की अशांत स्थिति और मानवीय त्रासदी को दर्शाया, जिसमें एक कहानी के माध्यम से भावनाओं को व्यक्त किया गया है।"संजीव हुसैन" कविता के माध्यम से उन्होंने पहचान और नाम के महत्व को उजागर किया, और कैसे एक नाम व्यक्ति की पहचान को पूरा करता है।



वक्ता ने कविताओं की शिल्प कौशल, उनकी लय और कहानी कहने के तरीके की सराहना की, जो उन्हें पाठकों के लिए आकर्षक और यादगार बनाती हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कविताएं केवल शब्दों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि वे स्मृतियों में जीवित रहती हैं और पाठकों को सोचने पर मजबूर करती हैं।



प्रो. प्रणय कृष्ण  ने  कहा कि  यह संग्रह इसलिए भी महत्वपूर्ण  है क्योंकि इसमें प्रेम, सामाजिक असमानता और वर्तमान समय की विभीषिका जैसे विभिन्न विषय शामिल हैं। कविताओं में उदासी, आग, अनंत रात और उल्लास जैसे अनेक रूप देखने को मिलते हैं। कुछ कवि बाजार और सत्ता द्वारा निर्मित "एस्पिरेशनल भारत" के विचार के खिलाफ हैं, जो अधिक से अधिक हड़पने की आकांक्षा के विपरीत है। कविताओं में इतिहास और लोक परंपराओं को वर्तमान के साथ जोड़ कर प्रस्तुत किया गया है, जिससे वर्तमान अधिक पहचान योग्य और संवेद्य बन गया है। अंशु मालवीय जी की कविताएं विशेष रूप से मिथक, इतिहास और संस्कृति का पुनरपाठ करती हैं, जो समय की विभीषिका को गहरा और व्यापक बनाती हैं। सामग्री में अयोध्या घटना (1992) के बाद की उदासी और न्याय की हत्या पर भी प्रकाश डाला गया है, जिसमें लाल दास जैसे पात्रों का उल्लेख है। कविताओं में कला और कविता को सत्य और न्याय की उपेक्षा के बाद की उदासी और प्रतिरोध के रूप में दर्शाया गया है। वर्तमान की विभीषिका को "अग्नि" के रूपक के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है, जिसमें नगर सेठों की लिप्सा, राजाओं की वासना और समाज में जलते हुए लोगों और परंपराओं का वर्णन है। "खांडव वन जल रहा है" जैसी कविताएं कोरोना काल की त्रासदी और अनागरिकों (किसान, मजदूर, आदिवासी, अल्पसंख्यक) के विनाश को दर्शाती हैं। कविताओं में बुद्ध से जुड़े प्रतीकों का जलना, वर्चस्वशाली वैदिक परंपरा और प्रतिरोधी श्रमण परंपरा के बीच संघर्ष को दिखाता है। कवि अतीत की घटनाओं को वर्तमानकालिक क्रियाओं में व्यक्त करते हैं, यह दर्शाने के लिए कि वे चीजों के बीचोबीच होना चाहते हैं और वर्तमान में शामिल हो कर उसे बदलना चाहते हैं। 

सरोज सिंह


प्रो. सरोज सिंह ने कहा कि संचयन की भूमिका  सारगर्भित, विशद और विद्वत्तापूर्ण लिखा गया है, जो पाठक में रचनाओं के प्रति जिज्ञासा जगाती है। उन्होंने वाज़दा खान की कविताओं को जीवन, प्रकृति और प्रेम पर केंद्रित बताया, जिनमें सहजता, सकारात्मकता और इंसानियत का तकाजा है। वसुंधरा पांडे की कविताओं में सामाजिक विसंगतियों, स्त्री मन की गहनता और सामाजिक संरचना के बोध को रेखांकित किया गया। विवेक निराला की कविताओं में देश, दुनिया और शहर की हलचल के साथ-साथ सामाजिक सत्य को उजागर करने की क्षमता पर प्रकाश डाला गया। संतोष की कविताओं में आम समाज का प्रतिबिंब, धार्मिक-सामाजिक विषमताएं और जीवन के द्वंद्वों को दर्शाया गया। संध्या जी की 'सुनो जोगी' कविता को नकारात्मकता से भरी दुनिया में मानवीय संकटों के प्रति चिंता और रचनाकार की घुटन, बेचैनी व सामाजिक दायित्वों को व्यक्त करने वाली बताया।


कुमार बीरेंद्र 


कार्यक्रम के अंतिम वक्ता के रूप में प्रो. कुमार वीरेन्द्र ने अपने वक्तव्य में इलाहाबाद में साहित्यकारों के योगदान पर प्रकाश डाला, विशेष रूप से उन लोगों पर जो बाहर से आ कर शहर को साहित्य का केंद्र बनाया। उन्होंने इसे "कलमी आम" की संज्ञा दी। उन्होंने निराला की जयंती और पुण्यतिथि पर होने वाले कार्यक्रमों का उल्लेख किया, जिसमें राजेंद्र कुमार जी की अनुपस्थिति महसूस की गई। उन्होंने  "प्रेम और प्रतिरोध" के विषय पर बात की और बताया कि कैसे इन कवियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया है। उन्होंने निराला की "राम की शक्ति पूजा" का उदाहरण दिया, जिसमें प्रेम और प्रतिरोध दोनों का चित्रण है। उन्होंने ने बोधिसत्व की कविता "पागल दास" और अयोध्या के "रिड्यूस" होने के सवाल पर चर्चा की। उन्होंने मंटो की कहानी और निराला की "देवी" कहानी का भी जिक्र किया, जो सवाल उठाने वाले को "पागल" करार देने की प्रवृत्ति को दर्शाती हैं। वाजदा खान की कविताओं में प्रेम के महत्व पर जोर दिया, खासकर नफरत के इस दौर में। उन्होंने कुंवर नारायण की कविता "एक अजीब सी मुश्किल" का उदाहरण दिया, जिसमें "खून के घूंट" को "प्यार के घूंट" में बदलने की बात कही गई है। बीरेंद्र जी ने अंशु मालवीय के आत्मकथ्य का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कविता लिखने के पीछे की प्रेरणा को "हालात को बदलने" की इच्छा बताया। उन्होंने संध्या नवोत्थान की कविता "खांडव वन जल रहा" का भी जिक्र किया, जो पर्यावरण और विकास के दर्द पर केंद्रित है। कुमार बीरेंद्र ने संतोष चतुर्वेदी की कविताओं की प्रशंसा की, विशेष रूप से "बथुआ" और "कांटे" कविताओं की। उन्होंने "कांटे" कविता के माध्यम से "फूलने वाले लोगों" को चेतावनी दी कि वे कांटों को कम न आंकें। उन्होंने बसंत त्रिपाठी की कविता "रात बहुत है बाकी अभी" की तुलना रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता से की और कवि के "जगे होने" और "दूसरों को जगाने" के काम पर जोर दिया। उन्होंने सामूहिक ताकत और साथ की आवश्यकता पर भी बात की। वक्ता ने वसुंधरा पांडे की कविता "गुरु क्यों आवाज देते हो?" का जिक्र किया, जिसमें बुझी हुई आग के फिर से भड़कने की संभावना को दर्शाया गया है। उन्होंने सूफी संत राबिया की कहानी और आग के दोहरे स्वरूप (सृजन और विनाश) पर भी बात की।


बीरेंद्र जी ने विवेक निराला की कविताओं और आलोचकों के प्रति उनकी नाराजगी पर टिप्पणी की। उन्होंने निराला और पंत के बीच हुए विवाद का भी उल्लेख किया, जिसमें आलोचकों की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। वक्ता ने अंशु मालवीय की कविता "इलाहाबाद में प्रेम" का जिक्र किया और इलाहाबाद के उन स्थानों को याद किया जो अब गौण हो रहे हैं, जहां लोग बैठ कर संवाद करते थे। उन्होंने रविकांत की कविता "पाताल कोट के मेहमान" की संवेदनशीलता पर प्रकाश डाला, जिसमें रोटी और मानवीय संवेदनाओं का चित्रण है। उन्होंने संध्या नवोदिता की कविता "एनेस्थीसिया" की गहराई पर चर्चा की, जिसमें प्रेम, भरोसा, धोखा और जीवन की कठोर वास्तविकताओं को दर्शाया गया है। उन्होंने "सुनो जोगी" शीर्षक से उनके संकलन का भी उल्लेख किया।


और कार्यक्रम के सबसे अंत में अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ कवि हरिश्चंद्र पांडे ने कहा कि  लंबे अंतराल (41 साल) के बाद ऐसा महत्वपूर्ण काव्य-उपक्रम सामने आया है, जिसमें प्रेम, प्रकृति, श्रमशील जीवन और प्रतिरोध के स्वर एक साथ उपस्थित हैं। यह उपक्रम 1980-90 के दशक के लेखकों पर केंद्रित है। वक्ता को 40-45 साल पहले श्रीनिवास मिश्र जी के संपादन में निकली 'उन्नयन' पत्रिका का इलाहाबाद अंक याद आता है, जिसकी भूमिका जगदीश गुप्त ने लिखी थी।


हरिश्चंद्र पांडे जी संपादक के मंतव्य को रेखांकित करते हैं, जिसमें अनुचित का सहज प्रतिकार, अन्य का हित और मानवता व मोहब्बत जैसे शब्द प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि संकलन में शामिल कवि अपने काव्य-प्रयोगों और नए छंदों के माध्यम से समकालीन कविता को समृद्ध करते हैं।



ध्यातव्य हो कि इस कार्यक्रम का संचालन डॉ प्रेम शंकर कर रहे थे। "चेतना के दस द्वीप'' केवल कविताओं का संचयन नहीं, बल्कि प्रयागराज की उस उर्वर भूमि का ऋण है जो हमेशा 'कलमी आम' जैसे साहित्यकारों को अपनी गोद में पनाह देती रही है। यह आयोजन निष्कर्ष निकालता है कि आज के वैचारिक संकट के दौर में 'संवाद' ही अंतिम विकल्प है। ये कविताएं हमें विश्वास दिलाती हैं कि प्रतिरोध के स्वर को दबाया नहीं जा सकता, क्योंकि वे स्मृतियों में 'पखावज की लय' और 'इत्र की झील' की तरह जीवित रहती हैं।


साहित्य की सामाजिक जिम्मेदारी महज़ शब्दों की कलाबाजी नहीं, बल्कि उस 'नहीं' को पुनर्जीवित करना है जिसे सत्ता और कट्टरता ने मिलकर दफ़्न कर दिया है; क्योंकि जब तक संवाद जीवित है, तब तक रोशनी के ये दीप बुझ नहीं सकते।



सम्पर्क 


मनीष चौरसिया 

शोधार्थी, हिन्दी विभाग

सी. एम. पी. डिग्री कॉलेज

इलाहाबाद विश्वविद्यालय


मोबाइल : 09792787475





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