स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'देवरिया के दिन'
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| स्वप्निल श्रीवास्तव |
महानगरों से जुड़े जनपदों की मुसीबत यह होती है कि उनका उतना विकास नहीं हो पाता जितना होना चाहिए था। गोरखपुर के पड़ोसी देवरिया ऐसा ही जनपद है। देवरिया मूलतः एक कस्बाई शहर है। जनपद के दूर दराज के क्षेत्रों से आने वाले लोगों की वजह से यह गुलजार रहता है। देवरिया भोजपुरी भाषाभाषी जिला है। यहां लोगों का लोकप्रिय भोजन लिट्टी चोखा है। साहित्यिक हलकों में भी मोतीराम बी ए, शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी, ध्रुवदेव मिश्र पाषाण जैसे प्रमुख रचनाकारों ने इसे केन्द्र में बनाए रखा। कवि स्वप्निल श्रीवास्तव अपनी रोजी रोटी के क्रम मे कुछ दिन देवरिया में भी पदस्थापित रहे। आजकल वे उन शहरों के बारे में तफसील से लिख रहे हैं। इस बार उन्होंने देवरिया की यादों को स्मृतिबद्ध किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'देवरिया के दिन'।
'देवरिया के दिन'
स्वप्निल श्रीवास्तव
वे शहर मुझे बहुत अच्छे लगते है खासकर वे शहर जो शहर होने की प्रक्रिया में होते है उसमें लोकगंध बची रहती है। शहर के चारों तरफ गाँव की आबादी हो और गाँव के लोगों का शहर में आना जाना लगा रहे तो लगता है, शहर में गाँव जीवित हैं। ऐसे शहर की याद करते हुए देवरिया की याद आती है। अविभाजित देवरिया की सीमाएँ बिहार से जुड़ी हुई थीं। तमकुही रोड, प्रतापपुर और सलेमपुर जैसे कस्बे जनपद के सीमांत कस्बे थे, जहां से बिहार की सीमा शुरू होती थी। इन सीमाओ पर अपराधी तत्व सक्रिय रहते थे। वे बिहार में अपराध कर के देवरिया में आ कर छिप जाते थे। यही काम इधर के लोग करते थे। वे दोनों प्रांतों के लिये मुश्किल पैदा करते थे। दोनों तरफ से पुलिस की आमदरफ्त बनी रहती थी। लोगों को अपराध की दुनिया के समाचार मिलते रहते थे।
देवरिया के ज्यादातर लोग सरल स्वभाव थे। देहात के लोग बिना किसी साज–सजावट के कचहरी या बाजार चले आते थे। शहर के निवासी भी सहज ढंग से रहते थे। अभी तक आधुनिकता का ज्वार वहाँ के जीवन में नही व्याप्त हुआ था। हाँ, बाहर से आये अफसरान थोड़ा अलग जरूर थे – वे सज धज के साथ रहते थे और लोगों पर रोब गालिब करते थे –जैसे वे किसी अन्य लोक से आये हुये हों।
देवरिया के बाजार में सब्जियां किसी मंडी से नहीं आती थी, गाँव के लोग ही बेचते थे। खेतों में देसी खाद का प्रयोग किया जाता था। वे अपनी दुकानें कचहरी रोड पर लगाते थे और शाम तक अपनी सब्जी बेच–बाच कर चले जाते थे। हर शहर की अपनी डिश (व्यंजन) होती है। देवरिया का मशहूर व्यंजन लिट्टी चोखा था। उसके साथ सत्तू की लस्सी का प्रचलन था। गाँव–गिराव से जो लोग किसी कार्य के लिये आते तो लिट्टी चोखा का लंच करते थे। यह आम आदमी का भोज्य पदार्थ था, जिनका जीवन स्तर ऊंचा था, वे रेस्तरा जाते थे। रेस्तरा तेजी के साथ खुल रहे थे। जब लिट्टी चोखा आधुनिक होटलों में नये तरह से बनाया जाने लगा तो वहाँ वह भी लोकप्रिय होने लगा।
कचहरी देवरिया का मुख्य कौतुक केंद्र था। जिधर भी देखो उधर काले कोट दिखाई देते थे।मेरे एक मित्र उनको काले कौवे कहते थे कि वे जिस किसी के पीठ पर बैठ जाय तो वह बर्बाद हो जाय। लंबे लंबे दिनों तक मुकदमे चलते थे।केस की जटिलता और वकील के शोषण के कारण पुरानी पीढ़ी का मुकदमा बाद की पीढ़ी के लोग भुगतते थे।
मेरा दफ्तर कचहरी के बीच में होता था इसलियें वकील और मुवक्किल के बीच बाघ और बकरी के संबंध से वाकिफ था। कचहरी में मुवक्किल से ज्यादा वकील ही दिखाई देते थे। मुवक्किलों का खूब शोषण होता था। बस उनकी तारीखे पड़ती रहती थी, फैसले उनसे दूर जाते रहते थे। वकील चाहते थे किसी केस का फैसला जल्दी न हो जिससे उन्हें हर पेशी पर फीस मिल सके। पहले मैं रहस्य को नहीं जानता था लेकिन जब मैं एक कुचक्र में पड़ा तो इस हकीकत का पता चला। इस बात से कोई फर्क नही पड़ता था कि वकील आपका मित्र है।
हरिशंकर परसाई कहते थे कि अगर आप कचहरी चढ़ गये हो तो सबसे पहले अपने वकील से बचो।
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| देवरिया का मानचित्र |
देवरिया मेरे लिये अपरिचित शहर नहीं था। अविभाजित देवरिया में पिता नौकरी करने आयें थे। एक समय में देवरिया गोरखपुर का हिस्सा था। 16 अगस्त 1946 को नये जिले देवरिया का सृजन हुआ और 16 मई 1994 को इसके पेट से नया जिला कुशीनगर पैदा हुआ। अविभाजित देवरिया जिले के कस्बे रामकोला में मेरी हाई स्कूल और इंटर की पढ़ाई हुई थी। यह 1965 के आसपास का समय था। देवरिया में पिता का जिला कार्यालय था। पिता के मित्र रोडवेज में ड्राइवर थे जो रामकोला से देवरिया तक बस ले कर जाते थे। पिता उसी बस से जाते आते थे। उन दिनों बसें संख्या में कम थी इसलिये जल्दी जाना पड़ता था। पिता के आफिस का बाबू उनका बस्ता बस की सीट पर रख देता था और उनके आने का इंतजार करता था। उन्हीं दिनों मैं पिता के साथ देवरिया गया था। उस समय देवरिया एक तहसील की तरह लगता था। अब उसे स्वतंत्र जनपद का दर्जा मिल गया है। देवरिया अब विभाजित कर दिया गया था – दूसरे जनपद का नाम कुशीनगर था। जनपद के कार्यालय पडरौना में स्थित थे।
मेरा तबादला झांसी से हुआ था लेकिन यहाँ ज्वाइन करने का कोई उत्साह नहीं था। इक्कीसवीं सदी के शुरू में अपनी संगिनी और पिता को गंवा चुका था और दो महीने के अवकाश पर था। मेरी दुनिया बदल चुकी थी। सोचा था कि नई सदी मेरे लिये भिन्न होगी लेकिन मेरे उपर विपत्तियों का पहाड़ टूट चुका था। पिता जीवित होते तो यह खबर सुन कर कितने प्रसन्न होते। जिस जनपद देवरिया में उन्होंने नौकरी की शुरुआत की थी, उसी जनपद में अफसर के रूप में मेरी पोस्टिंग हो गयी है। यह खुशी मेरी नसीब में नही थी। पिता के न रहने पर गाँव का उत्तरदायित्व संभालना था और अपने जीवन की निसंगता अलग थी। इन दोनों रिश्तों की भरपाई नही हो सकती थी। इस दर्द और तकलीफ को जीवन भर ढोना था। कामकाज में मन नही लगता था। नींद नहीं आती थी। गालिब का शेर दिमाग में घूमता था –
मौत का एक दिन मुअय्यन हैं
नींद क्यों रात भर नहीं आती।
लेकिन जिंदगी के मसले शेरो शायरी से हल नहीं होते। रात भर दरों–दीवारों और छतों को देखता रहता था। मित्रों ने सलाह दी कि मैं किसी मनोचिकित्सक को दिखाऊँ।
मैंने लखनऊ के मनोचिकित्सक को दिखाया उन्होंने कुछ दवाएं दी और योग आसन बताएं। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मुझे मीर तकी मीर का यह शेर याद आया –
उल्टी हो गयी सब तदबीरें
कुछ न दवा ने काम किया।
मित्रों ने सलाह दी अपने को व्यस्त रखा करो। मैं अपने इलाके में खूब घूमने लगा। अपने आपको थका देता था। मेरा ऐसा काम था उसमें जिले भर का दौरा करना पड़ता था। जहां शाम होती थी, वहीं रुक जाता था।
***
कठवा के नैइया बनइहे रे मलहवा
नदिया के पार दे उतार
अहा अहा हा, छपक छपक चले तोरी नैया
रे महलवा आई पुरवाई के बहार
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| मोती बी ए |
यह भोजपुरी के प्रसिद्ध गीतकार मोती बी ए (1 अगस्त 1919–18 जून 2009) का गीत है जो फिल्म 'नदिया के पार' में शामिल था। इस फिल्म के नायक दिलीप कुमार और नायिका कामिनी कौशल थी। मोती बी ए अपने जीवन काल में किंवदंती के रूप में मशहूर थे। कुछ दिनों के लिये वे फिल्मी दुनिया में चले गये थे। वहाँ उनका जी नहीं लगा और 1950 में लौट आये।उनका जन्म बरहज के पास के बरेजी गाँव में हुआ था। उन्होंने श्रीकृष्ण इंटर कालेज में अध्यापन किया और 1980 में रिटायर हुये। वे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी शामिल हुये थे। वे भोजपुरी के अदभुत गीतकार थे। कवि सम्मेलनों में लोकप्रिय थे। उनसे मिलने का मुझे भी सौभाग्य मिला था। उनके पास फिल्मी दुनिया के अद्भुत संस्मरण थे। वे भोजपुरी में बात करते थे। उत्तर जीवन में वे लंबे समय तक अस्वस्थ थे।
बरहज की याद शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी के कारण भी आती है। वे बरहज के रहनवार थे। वे शांति निकेतन में हिन्दी के प्रोफेसर थे। उनसे उनसे खतो–किताबत होती रहती थी। वे 'सरयू धारा' नाम से महत्वपूर्ण पत्रिका का सम्पादन करते थे जिसमें उन्हें कई बार प्रकाशित किया था। जब उन्हें पता चला कि मेरा तबादला देवरिया हो गया है तो वे मुझसे मिलने आए थे। ध्रुव नारायण पाषाण की कविता की किताब दी थी। दुखद यह है कि वे असमय हमारे बीच से चले गये। उन्हें ब्लड कैसर था जिसे वे दोस्तों से छिपाते रहे।
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| ध्रुव देव मिश्र पाषाण |
पाषाण जी देवरिया मूल के कवि थे। उनकी शुरुआत पत्रकारिता से हुई। उनके जीवन का अधिकांश हिस्सा कोलकाता में बीता था। वे देवरिया के इमलिया (भटनी) गाँव के रहने वाले थे। जीवन के उत्तर समय में वे देवरिया लौट आये थे। देवरिया में उनके बेटे का घर था। वे शहर और गाँव दोनों मिला कर रहते थे। अभी दो तीन साल पहले उनसे मिल कर आया था। उनका स्नेह पा कर विभोर हो गया था। वे उन लोगों में थे जो शहर में जा कर नहीं बदले थे।उनके प्रसिद्ध कविता संग्रहों के नाम – 'शीर्षक विहीन कविता', 'बन्दूक और नारे', 'मैं भी गुरिल्ला', 'धूप के पंख' और 'पतझड़ पतझड़ वसंत' हैं। वे वामपंथी विचारों के कवि थे। उन पर मैंने लेख भी लिखा था जिसे पढ़ कर वे काफी प्रसन्न हुए।
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| अरुणेश नीरन |
देवरिया–प्रवास में अरुणेश नीरन से अक्सर मिलना होता था। उनका निवास मेरे क्वार्टर से दूर नहीं था। वे कुशीनगर के कालेज में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष थे। वे भोजपुरी के आधिकारिक विद्वान थे – 'समकालीन भोजपुरी साहित्य' के नाम से महत्वपूर्ण पत्रिका निकालते थे। उन्होंने देश–विदेश में विश्व भोजपुरी सम्मेलनों का आयोजन किया था। देश दुनिया के लोकजीवन से विलुप्त होते जा रहे विभिन्न प्रसंगों के गीतों का कैसेट तैयार कराया था। वे देवरिया में हिन्दी के कवियों/लेखकों को आमंत्रित करते थे। उन्हें लोग मनोयोग से सुनते थे। उन्होंने देवरिया नगर को साहित्य और संस्कृति के नक्शे पर दर्ज करने काम किया। नीरन ने अज्ञेय सम्मान की स्थापना की जिसे कुशीनगर (अज्ञेय का जन्मस्थान) में दिया जाता है।
देवरिया का सीमांत बिहार से मिलता था इसलिये बोलचाल की भाषा भोजपुरी थी। जब कभी प्राइवेट बसों से सफर करता था तो भोजपुरी गाने बजते थे जिसमें अधिकांश गीत मोती बी ए और भोलाराम गहमरी के थे। गहमरी के इस गीत का मैं दीवाना था
कवने खोंतवा में लूकइलू
अहि रे बालम चिरई।।
जब यह गीत बसों में बजता था तो लोग अपनी मूडी घूमाने लगते थे। यही तो गीतों की खासियत होती है कि लोग सुनने के बाद झूमने लगे।
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| भोला राम गहमरी |
धीरे धीरे जनपद के पन्ने खुल रहे थे। नयी नयी जानकारियाँ मिल रही थी। मैं किसी कस्बे में सिर्फ सरकारी काम से नहीं जाता था। उस इलाके के इतिहास भूगोल को जानने की कोशिश करता था और इसी में व्यस्त रहता था। मुझे नागरी प्रचारिणी के पास किराये पर कमरा मिल गया था जिससे सड़क और होटल थोड़ी दूर थे। देर रात गये वहाँ होटल से खाना जिम कर लौटता था और सोने की असफल कोशिश करता था। नागरी प्रचारणी सभा में साहित्यिक गतिविधियाँ होती रहती थीं, अब भी यह केंद्र इंद्र कुमार दीक्षित जैसे मित्रों के कारण सक्रिय रहता है।
देवरिया आये कई माह बीत चुके थे। नयी जगह पर व्यवस्थित होने का प्रयत्न कर रहा था। नयी जगहें मुझे नई कमीज की तरह लगती थी, उन्हें देह में जगह बनाने में समय लगता था। इतवार के दिन कोई किताब पढ़ता और कुछ लिखने का यत्न करता रहता था। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खोला तो एक लड़की सामने खड़ी थी। मैंने कहा – 'आप कौन हैं और किससे मिलना है।' मैं स्वप्निल जी से मिलना चाहती हूँ। मैं बोला 'आपके सामने हूँ'। उसने हाथ जोड़ कर मुझे प्रणाम किया।
मैं जिसे लड़की समझता था वह शहर से बीस किमी दूर एक कालेज में हिन्दी की प्रवक्ता थी।उसका नाम निशा था। उसने भीष्म साहनी पर शोध किया था। वह लेख इत्यादि लिखती थी। निशा से तो नहीं लेकिन उसके परिवार से मेरे रिश्ते बन गये थे। उसके भाई मेरे मित्र बन चुके थे। उनके साथ अक्सर शाम गुजरती थी। उनकी माँ मेरे लिये ममतालु थीं। उस परिवार ने मुझे जो भावनात्मक सुरक्षा दी उसे मैं भूल नहीं सकता।
निशा मुझे जनपद के उन जगहों पर ले जाती थी जहां जा कर मुझे अच्छा लगता था। एक बार कहा 'चलिये आपको अपनी सहेली से मिलवाएं'। उसकी सहेली शहर से थोड़ी दूर रहती थी। मेरे पास स्कूटर था जिसे देवरिया प्रवास में नया नया खरीदा था। निशा की सहेली बहुत अच्छी थी। उसने कहा –यहाँ से कुशीनगर थोड़ी दूर रह गया है आप लोग वहाँ भी चले जाए।
कुशीनगर मैं कई बार जा चुका था लेकिन निशा के साथ कुशीनगर देखना अच्छा लगा। जब वह बुद्ध के महापरिनिर्वाण स्थल पर सिर पर दुपट्टे रखे हुये कुछ मांगने की मुद्रा में थी तो मैंने उससे कहा – बुद्ध से क्या मांगा है? उसने उत्तर दिया – अगर बता दिया तो मांगना व्यर्थ हो जाएगा। आपने क्या मांगा है – मैंने बुद्ध से तुम्हारे लिये एक अच्छा जीवन साथी और सुखद जीवन मांगा है। यह सुन कर उसकी आँख भर आयी। मेरे जीवन का आधा हिस्सा बीत चुका था, मांगने के लिये कुछ भी नहीं बचा था, अभी तो निशा के जीवन की शुरुआत होनी थी। यह मुझसे उम्र में बीस साल छोटी थी लेकिन मुझसे ज्यादा समझदार थी। एक दिन जब बाजार से लौट कर उसके घर गया तो उसने पूछा –
कहां से आ रहे हैं –
बाजार से आ रहा हूँ।
क्या खरीदने गये थे?
दुख खरीदने गया था।
उसने पलट कर जबाब दिया कि दुख तो आपके जीवन में भरपूर है, उसे खरीदने की क्या जरूरत है।
वह अक्सर अपनी बातों से चौंका देती थी। एक दिन मैंने उससे पूछा – तुम्हारा नाम निशा क्यों हैं? जबाब मिला कि इसलिये कि मैं रात में पैदा हुई थी। अगर दिन में इस दुनिया में आती तो तुम्हारा नाम दिवा होता। उसकी बातों और नोकझोंक से मुझे बहुत राहत मिलती थी। उसके घर के लोग मुझे अक्सर बुलाते रहते थे। उसने अपने घर में कई बार मुझे बुलाया तो एक बार मैंने कहा – 'बार बार मुझे क्यों बुलाती हो, लोगों को बुरा लग सकता है'। उसने हँस कर उत्तर दिया कि 'मैं लोगों की परवाह नहीं करती'।
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| दिनेश कुशवाह |
मेरे भुईधरे (आवास) में आने वालों में जय प्रकाश धूमकेतु और दिनेश कुशवाह थे। मैं मऊ के बाद झांसी होते हुये देवरिया आया था। दिनेश से मेरी कई मुलाकाते थीं। झांसी प्रवास में रहते हुये मुझे ओरछा की केशव जयंती में शामिल करते थे। वे मध्य प्रदेश के अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और विभाग के अध्यक्ष थे। कवि होने के साथ अच्छे लोकगायक थे। वे अयोध्या में पैदा हुए लेकिन उनका बचपन देवरिया के उनके गाँव गहिला में बीता था। जय प्रकाश धूमकेतु बहुत अच्छे कवि और 'अभिनव कदम' के सम्पादक थे और उस शहर से सामाजिक जीवन से जुड़े हुए थे। उनके साथ मऊ में दो वर्ष का अदभुत समय व्यतीत हुआ था। वे दोनों मुझसे मिलने बारिश के दिनों में आये थे। मैं वह बारिश नहीं भूल सकता था जब मैं धूमकेतु जी और दिनेश के साथ दिन भर बारिश में भीगते रहे। मुझे सुदर्शन की यह पंक्ति याद आ रही थी –
हम तो समझे थे बारिश में बरसेगी शराब
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया।
इस गजल को बेगम अख्तर ने शिद्दत के साथ गया था और इस गजल को जिन्दा कर दिया था।
मैं दुख की बारिश मे तो पहले से ही भीग रहा थ लेकिन मौसम की बारिश में भीगने का अनुभव अलग था। बारिश में घूमने का मजा वे क्या जाने जो हमेशा छाता ले कर चलते हैं।
ऐसी ही एक याद गोरखपुर के बारिश की आ रही है। नाट्यकर्मी नंदलाल अपने साथ लेखक रमेश बक्षी को मेरे घर ले कर आये थे। वे साहित्यकारों से मिलना चाहते थे और बारिश रुक नहीं रही थी।रमेश बक्षी जी ने कहा कि उनके पास समय नहीं है। हम बारिश में ही लोगों से मिल लेते हैं। एक स्कूटर में तीन जन लद कर शहर की साहित्यिक यात्रा को संभव किया। उस यात्रा में बेफिक्री थी। देवरिया की बारिश अलग तरह की लगती थी। जीवन की बारिशे एक रंग की नहीं होती, उनके रंग बदलते रहते हैं।
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| रमेश बक्षी |
जीवन के रेगिस्तान में कभी कभी नखलिस्तान भी मिल जाते हैं। थोड़ी देर के लिये तपिश से मुक्ति मिल जाती है लेकिन वह अस्थायी होती है। बाकी दिन तो गर्द–ओ–गुबार में गुजारने पड़ते हैं। नौकरी के तनाव कम नही होते वे नित नयी नयी शक्ल में आते रहते हैं। मुख्यालय और जनपद में मीटिंग के दौर पहले हफ्ते से शुरू हो जाते थे। शत–प्रतिशत राजस्व प्राप्त करने के लिये दबाव पड़ते रहते थे। कारण बताओ की नोटिस और चरित्र पंजिका में प्रतिकूल टिप्पणी की धमकी तक दी जाती थी। मैं इन सब का अभ्यस्त हो चुका था। जब मैं इन सबके बारे में निशा से कुछ कहता था तो वह कहती कि आप अपनी डियूटी करते रहे बाकी ईश्वर पर छोड़ दे।उसे क्या बताता कि ईश्वर ने कभी मेरी कोई मदद नही की है। मुझे उस गुनाह की सजा मिली जिसे मैंने किया ही नहीं था।
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| राम प्रसाद बिस्मिल की समाधि |
कुछ दिन बाद एक इन्क्वायरी के लिये बरहज जाना था। काम–काज निबटाने के बाद मैंने उस स्थल को देखा जहां राम प्रसाद बिस्मिल की समाधि बनी हुई थी। यह समाधि बाबा राघवदास के आश्रम में बनायी गयी थी। बाबा राघवदास को पूर्वाञ्चल का गांधी कहा जाता था। वे पुणे में पैदा हुये थे जहां से वे किसी सिद्ध संत की खोज में लग गये। गाजीपुर में उनकी मुलाकात मौनी बाबा से हुई, उनसे उन्होंने हिन्दी सीखी। अनंत महाप्रभु को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया। वे उनकी पीठ के उत्तराधिकारी हुये। अध्यात्म में रुचि होने के साथ उन्होंने आजादी की लड़ाई में भी भाग लिया। वे गांधी के साथ जेल गये थे और विभिन्न आंदोलनों में उनके साथ रहे हैं। उनके आश्रम में बिस्मिल, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे लोग छिपने आते थे। वे सभी लोग अंग्रेजों के विरुद्ध जंग लड़ रहे थे। जब बिस्मिल की फांसी गोरखपुर में हुई तो राघव दास ने बरहज में उनके शव का अंतिम संस्कार किया। बाबा राघव दास ने कई सामाजिक संस्थाए स्थापित की थी। लोगों को शिक्षित करने का काम किया। गोरखपुर मेडिकल कालेज का नाम उनके नाम पर रखा हुआ है।
देवरिया में एक और संत की चर्चा होती थी। वे थे देवरहवा बाबा जिन्हें योगिराज भी कहा जाता था। वे सिद्ध पुरुष थे। वे लार के पास मईल नामक जगह पर सरयू नदी पर बने मचान पर रहते थे। उनकी उम्र के बारे में तमाम कथाएं प्रचलित थीं। जैसे कि उनकी उम्र दो सौ साल से अधिक है। उनके भक्त उनकी कथाओं को लोगों के बीच प्रचारित करते थे और उसे सच मान लिया जाता था। उनके आश्रम में भारत के प्रथम राष्ट्रपति के साथ जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी आदि आ चुके थे। उनके आशीर्वाद देने का ढंग अलग था। जो संकट में होता था उसके सर पर पाँव रख कर उसे अभिमंत्रित कर देते थे। राजनेता अक्सर राजनीतिक संकट में होते थे और उनकी शरण में चले जाते थे। बाबा राघव दास का आजादी की लड़ाई में योगदान था देवरहवा बाबा इससे दूर रहे। अपने अध्यात्म और सिद्धि साधन में रमे रहे। बाबा राघव दास की तरह उन्होंने कोई सामाजिक कार्य नहीं किया न किसी संस्था की स्थापना की। देवरहवा बाबा अपने चमत्कारों के कारण जाने जाते रहे।
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भट भट भटनी
मुझे लगता था कि रेलवे स्टेशन भटनी की उत्पत्ति भटकने से हुई होगी। देवरिया प्रवास में अक्सर भटनी रेलवे स्टेशन की याद आती थी। उन दिनों मैं कंपटीशन की तैयारी में इलाहाबाद रह रहा था और त्रिवेणी एक्सप्रेस से गोरखपुर लौटता था। इलाहाबाद से भटनी नैरोगेज की रेलवे लाइन थी। वहाँ से गोरखपुर जाने के लिये भटनी में गाड़ी बदलनी पड़ती थी। वह भी तीन चार बजे रात में। यह कष्ट साध्य काम था। उसके बाद तो नींद हवा हो जाती थी। मेरे देवरिया पहुँचने के पहले ही यह संकट दूर हो गया था। यह रूट ब्राड गेज में बदला जा चुका था।
अब एक ऐतिहासिक ट्रेन की बात बताते हैं उसका नाम है बरहजिया। यह ट्रेन सलेमपुर से बरहज के बीच चलती थी। इस ट्रेन की शुरुआत अंग्रेजों ने 1896 में की थी। इस ट्रेन में केवल चार बोगिया लगती थीं। इस ट्रेन को चलाने का उद्देश्य माल को बरहज तक पहुंचना था। यह धुआँ उड़ाते हुये चलती थी और स्टेशन धुएं से भर जाता था। उस समय अधिकांश ट्रेनें कोयले की खुराक से चलती थी। बरहजियाँ इस रूट का अंतिम स्टेशन था। बरहज एक समय में बड़ा व्यवसायिक केंद्र था जहां से पानी के जहाज ढाका तक चलते थे। बरहज एक प्रमुख जलमार्ग था। यह घाघरा नदी के तट पर बसा हुआ है।
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सप्ताह के छः दिन दफ्तर में गुजर जाते थे लेकिन रविवार का दिन मुश्किल से बीतता था। यादों के पक्षी मुझे घेर लेते थे। बहुत सारे दृश्य याद आने लगते थे। अकेले कमरे में बैठे हुये लगता था कि मेरे ऊपर दीवारे गिर पड़ेगी। छुट्टी के दिन लोग आराम करते थे या घर के छूटे हुए काम निपटाते थे। मुझे मित्रों के काम में खलल डालना अच्छा नही लगता था। मैं कोई पत्थर नहीं, आदमी था। मुझे भी विश्राम चाहिये था। मेरी दिमागी हालत आराम के योग्य नहीं थी। मुझे व्यस्तता चाहिये थी ताकि मुझे कुछ भी याद न आये।
इस हेतु मैंने दो विकल्पों का चुनाव किया। पहला विकल्प था दिन भर कुशीनगर में बिताना और शाम के वक्त डेरे पर लौट आना। देवरिया से कुशीनगर 35 किमी दूर था स्कूटर से मात्र 40-45 मिनट का समय लगता था लेकिन मैं इत्मीनान से चलता था। कहीं रुक कर चाय पी तो कही किसी पेड़ की छाह में रुक गये। रविवार के दिन मेरे पास वक्त की कमी नहीं थी। बस मुझे खर्च करना नहीं आता था। कुशीनगर पहुंचते पहुंचते दोपहर हो जाती थी। घर से सिर्फ चाय पी कर चलता था। उ प्र पर्यटन के होटल में लंच लेता था। थोड़ी देर तक आराम करता था और फिर कुशीनगर घूमता था।
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| रामाभार स्तूप |
बुद्ध का महापरिनिर्वाण स्थल, रामाभार स्तूप और हिरण्यमयी नदी मेरी प्रिय जगहें थी। उनकी मूर्ति को देख कर मन को शांति मिलती थी। बुद्ध मुझे बहुत प्रेरणा देते थे। बुद्ध ने अपने जीवन का वैभव और राजपाट छोड़ कर इस दुनिया को बेहतर बनाने के लिये साधना की थी। उनकी तुलना में हमारे दुख तिनके के बराबर नही हैं। वे महाप्राण थे और हम तुच्छ मनुष्य हैं। थोड़े से दुख से घबड़ा जाते हैं। हिरण्यमयी नदी के तट पर बैठ कर सोचता था कि बुद्ध ने किस मनस्थिति में इस नदी को पार किया होगा।
दूसरा विकल्प था जनपद के सुदूर कस्बे में मुआयने के लिये जाना। अन्य दिनों में किसी सहयोगी के बिना नहीं जाता था। छुट्टी के दिन अकेले जाता था और किसी की छुट्टी नही बर्बाद नहीं करता था। एक बार प्रतापपुर के लिये योजना बनाई। यह जगह मुख्यालय से साठ किमी दूर थी। यह बिहार से लगा हुआ कस्बा था। इस जगह एक ही बस जाती थी और वहीं लौटती भी थी। यह बस मंथर गति से चलती थी, कोई कही भी रास्ते पर मिल जाय उसे साथ ले जाना नहीं भूलती थी। बस की उदारता मुझे हैरान करती थी। ड्राइवर और कंडक्टर भी गजब के थे। थोड़ी थोड़ी दूरी पर रुक कर चाय से अपनी प्यास बुझाते थे। बस ड्राइबर कंडक्टर और मुसाफिर जल्दी में नहीं होते थे। यह उन लोगों का स्थायी भाव था।
प्रतापपुर बिहार की सीमा से लगा हुआ था ,इसलिये इस कस्बे का ऐतिहासिक महत्व था।उससे थोड़ी दूर पर बिहार का मैरवा रेलवे स्टेशन था। यह कस्बा सुगर मिल के कारण मशहूर था। यहाँ 1903 में एशिया की पहली सुगर मिल स्थापित हुई थी जिसके संचालन बजाज हिंदुस्तान शुगर लिमिटेड द्वारा किया जा रहा था। इसकी शुगर क्वालिटी बहुत उम्दा थी काम –काज करते हुए देर हो गयी थी और बस छूट गयी थी। मेरे यजमान ने कहा – सर रात में रुक जाइये लेकिन रुकने का जी नही कर रहा था | बाहर रुकने पर मुझे बेचैनी होती थी। विकल्प यह था कि मैरवा से सलेमपुर जानेवाली बस से जाया जाए।
बस देख कर मैं दंग रह गया जितने लोग बस के अंदर थे उतने ही बस की छत पर विराजमान थे। लोगों से यह सुनता था कि बिहार की बस यात्रायें बहुत रोचक होती हैं। लोग नीचे और ऊपर बैठने में कोई भेदभाव नहीं करते थे। जो कोई टोकता था उसे उसकी सजा भुगतनी पडती थी। अब मैं उस मंजर को साक्षात देख रहा था।
व्यापारी बस संचालक को जानता था। उसके कारण बस में एक सीट मिल गयी थी। बस असंतुलित हो कर चल रही थी, लोग मगन हो कर बैठे हुये थे। उनकी सेहत पर कोई फर्क नही पड़ रहा था। जो भी रास्ते में मिलता था, उसे उठा लेते थे। मेरे तो प्राण अटके हुये थे, राम राम करके रास्ता तय कर रहा था। जब बस सलेमपुर पहुंची तो देह में प्राण आये। यह मेरे जीवन की अत्यंत दुर्गम यात्रा थी।
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देवरिया को 'चीनी का कटोरा' कहा जाता था। इस अविभाजित जनपद में 16 चीनी मिलें थीं।। जैसे जाड़े की शुरुआत होती, मिलें चालू होने लगती थी। गन्ने से लदी हुई बैलगाड़ियों से कस्बे भर जाते थे। मिल में घंटे बजने लगते थे। जिधर भी देखो गन्ने के खेत लहलहाते हुये दिखाई देते थे। यह हरीतिमा अब भी मुझे याद है। उस इलाके की संपन्नता के पीछे ये गन्ने के खेत थे। धीरे –धीरे गन्ने की मिठास कम होने लगी। मिलें बंद होने लगी, गन्ने के खेत उजड़ने लगे। मौजूद देवरिया जिले में स्थित बैतालपुर, गौरी बाजार, देवरिया सदर की मिलें खंडहर बन गई हैं केवल प्रतापपुर की मिल जीवित हैं। बंद मिलों की जमीने बिक चुकी हैं लेकिन उसका कोई उपयोग नही हो रहा है।
यह वृतांत लिखते समय मुझे हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा – क्या भूलू क्या याद करूं की याद आ रही है। जब हम कोई संस्मरण लिखते हैं तो लिखने से ज्यादा बहुत कुछ छूट जाता है। स्मृतियों का संसार कम मोहक नही है, उसे व्यक्त करने के लिये शब्द अपर्याप्त हो जाते हैं। देवरिया में मुश्किल से डेढ़ साल ही बीते थे कि ट्रांसफर परवाना आ गया। अभी इस जनपद को जीभर देखा और जिया नहीं था, अफ़साने को अधूरा छोड़ कर जाना पड़ा। सच यह भी है कि अपूर्ण कथाएं पूर्ण कथाओं से ज्यादा याद रहती हैं। जब मैं इस शहर को छोड़ कर जा रहा था तो कई लोगों की आँखें भीगी हुई थी, उसमें मेरी भी आँख शामिल थी। यही मेरा हासिल था जिसे गठरी में बांध कर दूसरे शहर की ओर रवाना हो रहा था।
सम्पर्क
स्वप्निल श्रीवास्तव
510- अवधपुरी कालोनी – अमानीगंज
फैजाबाद – 224001
मोबाईल – 9415332326











बहुत अच्छा लिखा है स्वप्निल । बधाई
जवाब देंहटाएंस्वप्निल जी का यह संस्मरण महज़ एक यात्रा वृत्तांत नहीं, बल्कि देवरिया की समृद्ध आत्मा का एक सजीव दस्तावेज़ है। लेखक की उंगली थामकर पाठक कब इस माटी के साहित्यिक गलियारों, सिनेमाई विमर्शों और लोक-संस्कृति के अनछुए कोनों में उतर जाता है, इसका अहसास ही नहीं होता।
जवाब देंहटाएंस्वप्निल जी ,नमस्कार! अविभाजित देवरिया और बाद में कुशीनगर जनपद को अलग
जवाब देंहटाएंछोड़ने के बाद बचे देवरिया के भौगोलिक ,आर्थिक,साहित्यिक
और वहां के लोक जीवन के साथ साथ पत्नी और पिता के विछोह के बाद झेल रहे मानसिक और शारीरिक संताप के बारें में आपने जो भी लिखा है,वह राय रत्ती सही है।आपने साहित्य, अध्यात्म और देश सेवा के व्रती जिन शख्सियतों के बारे में लिखा है वे वास्तव में अपने अपने क्षेत्र में विशिष्ट पहचान रखती हैं।उनमें से किक्के दुक्के लोग ही अब बचे हैं जो आपके इन स्मृतियों की गवाही दे सकते हैं। आदमी की विडंबना यह है कि वह हो चाहता है अथवा सोचता है नियति उसे अपने तरीके से उलट पलट देती है। मैं उन व्यक्तियों में से एक हूँ जिसका परिचय उन दिनों आपसे जरूर रहा लेकिन शायद आपको याद न हो उन दिनों स्वभाव से एक फक्कड़ टाइप के कवि योगेंद्र नारायण वियोगी के संचालन में नागरी प्रचारिणी सभा की द्वितीय शनिवारी कवि गोष्ठियोंकी शुरुआत हुई थी ,और सभा के बगल वाली गली में जहां आप रहते थे वहीं के एक श्रीवास्तव युवक जो स्वयं को गजलकार कहते थे गोष्ठी में आया करते थे। मेरी और कवि वियोगी काआपसे भेंट होने की वजह भी निशा(वास्तविक नाम इसका पर्याय पर कुछ और) ना मक लड़की का परिवार ही था।वहां ही आपसे भेंट हुई और लड़की की मां हो अध्यापिका थीं ने हमारा परिचय आपसे कराया था कि आप भी एक कवि हैं,बाद में दो तीन मतव आपसे मिलना आपके कार्टर पर हुआ मै आपसे इंग्लिश में चार्ली चैपलिन की बायोग्राफी
आपसे लाकर पढ़ा,कुछ साहित्यिक बातें भी होती थीं,पर आपका साहित्यिक टेस्ट उन्नत था और हम प्राय: तुकबंदी की कविताओं तक सीमित थे तो यह सिलसिला आगे बढ़ नहीं सका,लेकिन मुझे ठीक से याद है उन दिनों नैना टॉकीज( बाद में सूरज टॉकीज़) में आपके सौजन्य से एक फिल्म ( नाम याद नहीं) मुझे ,वियोगी ,सरोज पाण्डेय और परमेश्वर जोशी जी को देखने का अवसर मिला था।
जिस परिवार में आपका आना जाना था ,हम चाहते थे कि उस परिवार में ही आपका रिश्ता हो जाय ,आपके पेशतर हमने बात भी चलाई , उनके परिवार वालों में आधी सहमति आधी असहमति की स्थिति दिख रही थी ,क्योंकि आपका भावनात्मक जुड़ाव उस परिवार से हम देख रहे थे, पर वही कहा कि यह नियति को मंजूर नहीं था और संभवतः: उसी बीच आपका फैजाबाद ट्रांसफर हो गया, और नियति ने जो संबंध बाद में कराया कुछ वर्षों के अंदर ही अंदर उसकी नींव दरकने लगी और वह रिश्ता
दुस्सह हो उठा, जिसकी जानकारी आपको भी अवश्य होगी।एक बेहद जहीन प्रतिभा जीवन के इम्तहान में असफल साबित हुई,जिसका दुःख हम सभी को है। संस्मरण पढ़ते पढ़ते जैसे सारी बातें सामने रील की तरह चल रही हों,आपके संस्मरण इतने जीवंत होते हैं! राजनीति को छोड़कर प्राय: देवरिया जैसे छोटे कस्बे शहर के लोक जीवन और नागर जीवन की सभी विशेषताएं मूर्त हो उठी हैं।
इस बहाने मेरे जेहन में भी कुछ स्मृतियां उभर आईं जिनकी चर्चा मुझे प्रासंगिक लगा।हो सकता है आप या संबंधित को कुछ असहज लगे पर यह सही है। देवरिया पर यह आपका संस्मरण आपकी अनुमति हो तो नागरी प्रचारिणी सभा देवरिया की आगामी पत्रिका में प्रकाशित करना चाहूंगा। सादर~~~~