जयनन्दन की यह कहानी “लोकतंत्र की पैकिंग”
हमारे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों ने आजादी के बाद के भारत में जिस लोकतन्त्र का सपना देखा था उसमें प्रमुख रूप से यह भाव समाहित था कि सबको आर्थिक सुरक्षा मिले। सभी को जीने के लिए आधारभूत चीजें मुहैया हो। भारत की मिट्टी में पले-बढे कबीर ने भी कभी सोचा था ‘सांई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय।।’ लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे पूर्वजों के सपने सिर्फ सपने ही रह गए। सफ़ेद अंग्रेज गए तो गद्दी पर काले अंग्रेज सवार हो गए। ये काले अंग्रेज भी उतने ही असंवेदनशील हैं जितने कभी सफ़ेद अंग्रेज हुआ करते थे। असमानता का आलम यह है कि देश के कुछ धनाढ्य तबके विश्व के चुनिन्दा अरबपतियों की सूची में शामिल है, वहीँ लगभग एक तिहाई लोगों को दूसरे समय के भोजन के लिए तरसना पड़ता है। इस आर्थिक विषमता को केन्द्र में रख कर ही जयनन्दन ने यह कहानी लिखी है। इस कहानी का संवेदनशील पात्र मुदित, जब इस आर्थिक समानता के लिए एक कोशिश करता है, तो उसे न केवल सामाजिक अपितु पारिवारिक प्रतिरोध का भी सामना करना पड़ता है। आइए पढ़ते हैं जयनन्दन की यह उम्दा कहानी “लोकतंत्र की पैकिंग ” । ...