विहाग वैभव के कविता संग्रह पर शैलेन्द्र कुमार शुक्ल की समीक्षा 'हिंसा की शिनाख़्त करती बेबाक कविता का विकल कवि: विहाग वैभव'






समीक्षा

'हिंसा की शिनाख़्त करती बेबाक कविता का विकल कवि: विहाग वैभव'


शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

 

हिंदी कविता का यह विलोम युग है। जो जैसा है, वैसा वह बिलकुल भी दिखाई और सुनाई नहीं देता। ख़ैर, ऐसा भी नहीं है कि यह प्रवृत्ति अचानक से हिंदी टोले में आ धमकी है, इसकी जड़ें मनुष्यता के बौद्धिक आविर्भाव के साथ वर्चस्व की सामाजिक राजनीति में अनंत काल से चली आ रही हैं। लेकिन पहले कल्पित विश्वासों की लक्ष्यपूर्ति के केंद्रीय राजमार्ग बौद्धिक प्रचंडता के महानगरों में धड़ल्ले से घुसते हुए अपरंपार आस्थाओं के चौराहों से पार पाते हुए मंजिल की ओर रुख करते थे लेकिन अब बाजार की व्यवसायिक आपूर्ति केंद्र के प्रतिकेन्द्रों से होती है बाकी मुख्यताएं बाईपास से भारीभरकम आख्यान लेकर सारश्वत प्रदेश की गोदाम में पहुँचती रहती हैं। आज सगरी दुनिया आवारा पूँजी के गुलाम जिन्नों-  विज्ञान, तकनीक और राजनीति की कृतिदास बन कर व्यवस्था के प्रचार-प्रसार के नवीनतम मायावी जंजालों से घिरी सड़ी ‘पटुआ बोरी’ गड़ही की तरह गंधा रही है। आज व्यवस्था के बाजार में प्रचार की सबसे टिकाऊ और रोचक प्रविधि प्रतिरोध और प्रतिहिंसा हैं। ये प्रतिरोध और प्रतिहिंसा विरोध और हिंसा के स्वाभाविक विरोधी नहीं बल्कि केन्द्रीयता के समर्थक हैं। इस वाणिज्यिक प्रचार से जनता की भावनाओं पर हत्यारे राज करते हैं और सरकारें बना कर हुकूमत चलाते हैं। इस विलोमियत के विलासी वैश्विक समय में हिंदुस्तान की हिंदी कविता अपने समय की साजिश की बनावट को उघाड़ने का जतन कर रही है। 2010 के बाद हिंदी कविता में जिस पीढ़ी ने कदम रखा उनके संग्रह एक दशक बाद साहित्य की दहलीज पर दिखाई देने लगते हैं। और इधर 2023 का वर्ष तो इस पीढ़ी का अक्षौहिणी प्रदर्शन का वर्ष रहा। बीसों शानदार संग्रह इस वर्ष प्रकाशित हुए जिन्हें हाथोहाथ लिया गया। इस समय के सबसे चर्चित हिंदी कवि विहग वैभव और उनका पहला कविता-संग्रह ‘मोर्चे पर विदागीत’ 2023 की ही देन है। इस संग्रह की कविताएँ विलोमियत की सबसे शातिर प्रवृत्तियों को बड़े स्वाभाविक मनोविकारों के साथ खोलती हैं।  

कोसल महाजनपद के सांस्कृतिक जिलामुख्यालय शिराज-ए-हिन्द जौनपुर के अंतर्गत सिकरौर गाँव में रहने वाले काशिका-भोजपुरी लोकभाषा के कवि मास्टर होरीलाल ‘अशांत’ के घर सन 1994 ई. में दो जुड़वा पौत्र हुए। मास्टर जी ने नाम रखा विहाग वैभव और पराग पावन। ‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ आज मास्टर साहब के इन कवि शावकों को हिंदी साहित्य की दुनिया में भला कौन नहीं जनता ! विहाग और पराग दोनों आज की हिंदी के चर्चित नाम है। मुझे याद है विहाग वैभव की पहली बार प्रमुखता से तेरह कविताएं एक साथ रविकांत जी के सम्पादन में लखनऊ से निकलने वाली प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अदहन’ के जनवरी-मार्च 2017 अंक में प्रकाशित हुई थीं। इन कविताओं के माध्यम से हिंदी समाज ने गर्मजोशी से विहाग का स्वागत किया। इस पत्रिका के संपादक बताते हैं कि अगले किसी अंक में पराग पावन की भी कविताएं आनी थीं लेकिन दुर्भाग्य से अंक न आ सका और पत्रिका बंद हो गई। ख़ैर, अब तो पराग का काव्य संग्रह भी आ चुका है और विहाग की किताब 2023 में ‘मोर्चे पर विदागीत’ राजकमल प्रकाशन से आ चुकी है। 

‘मोर्चे पर विदागीत’ 21वीं सदी के दूसरे दशक के भारत का वैश्विक महाख्यान है। इसकी विषयवस्तु मुक्तक परंपरा में होते हुए भी एक सम्बद्ध प्रबंधात्माकता लिए हुए है। सारी कविताएं एक धागे में पिरोई हुई हैं, एक सूत्र में जुड़ी हैं। इस कृति की कविताएं उन तमाम अनछुवे मनकों के बिम्ब सदृश हैं जो प्रबंधात्मक करुणा के विद्रोही धागे में पुहे गए हैं। यहाँ कविता का केन्द्रीय स्वभाव विद्रोहात्मक करुणा ने ले लिया है। यह इस दूसरे दशक की कविता का प्राथमिक स्वभाव है। यह दशा इस कवि में अभी तक अपने शिखर पर शीर्ष बनी दिख रही है। कुछ महीन परिवर्तन हुए हैं इधर बीच हिंदी कविता के मायर में। जहाँ करुणा शांत से ऊब कर अशांत विद्रोह की तरफ मुड़ गई है। यह करुण विद्रोह हमरे युग दर्शन के स्वभाव को बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। विहाग इस संग्रह की पहली कविता में युगदर्शन की करवट की ओर हमें सजग करते हैं और चेतावनी देते हुए दिखाई पड़ते हैं। इस कविता का शीर्षक ही युगवाणी प्रस्तुत कर रही है-‘इस मोड़ से जो लौटना चाहते हैं, लौट जाएँ’। वे घोषणा करते हैं और यह हमारे युग दर्शन की चेतावनी भी है-


यहाँ से आगे 

अतिरिक्त नींद के स्वप्न में तितली का अमलतास को चूम पाने का कपासी दुख नहीं होना है 

यहाँ से आगे 

महुआ की गंध से देश के विस्थापन का घाव भर लेना नामुमकिन होगा 

यहाँ से आगे 

ठुमरी पर बजता पखावज सदियों दूर से आती मानुष-चीख में बदल जाएगा 

यहाँ से आगे कत्थक करते कमल-दल से पाँव मानुष-लोहू में डूबने लगते हैं  


ये पंक्तियाँ संवेदना के उस महान कौशल की बानगी हैं जो किसी भाषा के बड़े कवियों में देखने को मिलता है। करुणा के प्राथमिक विद्रोह का सबसे कोमल वितान इस कृति का मंगलाचरण है जो अमांगलिक तत्वों की समूची संलयन संरचना को एक लयात्मक गति में खोलता जाता है। जैसे-जसे यह कविता आगे बढ़ती है तापमान बढ़ता जाता है, सहनशीलता असहनीय होती जाती है, दुख पथरा कर सहानुभूति की परवाह से ऊपर उठ जाता है। करुणा शांत द्रव अहिर्निस दाब से विस्फोट तक विद्रोह गैस में बदलकर बहुत ताकतवर और मारक होकर आबोहवा में मिलने की तैयारी कर रहा होता है। यह कलेवर इस कवि का युग सम्मत वैश्विक कलेवा बन गया है। इसलिए विहाग यह कहते है - ‘बहुत भीषण है यहाँ से कलाओं की दुनिया / बहुत दुर्गम हैं यहाँ से आगे संवेदनाओं के रास्ते / यहा से बदलते हैं कहानी के पात्र / यहा से बदलती है कविता की भाषा / यह इस नई सदी और सभ्यता का आख़िरी मोड़ है / इस मोड़ से जो लौटना चाहते हैं, लौट जाएँ।’


विहाग वैभव


टी.एस. इलियट का एक विचार याद आता है ‘केवल वे लोग जो बहुत दूर जाने का जोख़िम उठाएंगे संभवतः यह जान पाएंगे कि कितनी दूर तक जाया जा सकता है।’ यह परंपरागत संघर्षो की ताकतों से अर्जित प्रतिभा के विस्फोट से संभव होता है। यह जोख़िम उठाना सबके बूते की बात नहीं। विहाग वैभव की एक कविता है ‘कुम्हार के हाथ से’। संस्कृत और हिंदी साहित्य के क्लासिक में कुम्हार का रूपक अपनी विलक्षण व्यंजनाओं के साथ खूब आया है। लेकिन यह कबीर, सूर, तुलसी से इतर भाव रूपक अपनी सम्पूर्ण परंपरा में होते हुए भी एकदम अलग और अद्भुत चित्र उपस्थित कर रहा है। यह कुम्हार नई दुनिया का स्रष्टा है जिसमें कवि भी अपनी पूरी ताकत से शामिल है। कवि उन तत्वों का प्रतिकात्मक आह्वान करता है जिनसे नई दुनिया बनती है, नई सृष्टि सजती है। यह बड़े बदलाव की एक शिनाख्त है- ‘चींटियों, अब गह लो पाताल की नींद / ध्वनियो, सन्नटा रचो / अर्थो, वापस आओ अपने शब्दों में / पीड़ाओ मुझे अचेत करो / जंगलो, पर्वतो, असमानो / नए आकार के लिए पिघलो / मनुष्यो, अपनी देह से बाहर निकलो / यही सही समय है / मनुष्यता की पुनर्रचना की / मुनादी पिटवाकर / इसी दम / मनुष्य की सभी करवाहियाँ स्थगित की जाएँ।’ यह कविता विहाग की काव्य-चेतना का मेनिफेस्टो है। वे समग्र समूलताओं में बदलाव की बात करते हैं जहाँ से वर्चस्व शोषण की तकनीक और औज़ार जुटाते हैं। विहाग ऐसे कवि हैं जो इस तंत्र की ताकत और कमजोरियाँ जानते हैं। वे वर्ग संघर्ष के जिस ठौर पर खड़े हैं वहाँ से पूरी पक्षधरता उन्हें ताकत देती है। वे अपने लोगों पर वर्चस्व के मायावियों के कल्पित विश्वासों को उतार फेंकना चाहते हैं। विहाग ताकतवरों के उस वर्चस्व उद्योग की तकनीकी और रसायनिकी की सारी माया सरेआम बेपर्दा करने की पूरी ताकत अपनी कविताओं में झोंक देते हैं। वे हिंसकों पर पड़े बहुत सफ़ेद कपड़े को एक झटके में खिचते हुए नग्नता को ही नग्न कर देते हैं। इस संग्रह की सबसे शानदार कविता ‘क़त्ल का लहू बोलता है’ में लिखते हैं-

‘रक्त-पिपासु, ज्ञान के ठेकेदारों से कहो कि मेरी अंगुलियाँ ही नहीं, समूचा बाजू काट ले जाएँ / जब तक ये हाथ रहेगा तब तक / कुआँ खोदते सभ्यता के पाताल में गिरकर मर गए मेरे अनपढ़ बाबा को स्कूल से भगाए जाने के विरुद्ध तनता रहेगा / लेकिन नहीं, मैं खूब समझता हूँ तुम्हारी विकसित हुई हत्या तकनीकों को / तुम्हारी नवीन हो चुकी बदली हुई प्राथमिकताओं को।’ 

विहाग वैभव जिस जमीन से कविता की दुनिया में आते हैं वहाँ से इतना तेजस्वी स्वर अभी तक नहीं दिखाई पड़ा था। विहाग जैसे तरुणों का इस तरह कविता में आना रंगरोगन वाली दुनिया का अचानक से स्वेत-श्याम हो जाना तो था ही, यह बहुत-बहुतों को नागवार गुजरा। वे दलितों, मज़लूमों और कमजोरों की बहुत ताकतवर आवाज बन कर उभरते हैं। वे अपने लोगों को इकठ्ठा करते हुए युग-परिवर्तन का विगुल फूँकते हैं- ‘इतिहास के शस्त्रागारों से विचारों के हथियार लाओ / इकट्ठा होवों और अपनी धार मजबूत करो / हमारी आवाज सटीक, तेज और दूरगामी होनी चाहिए / हममें से कुछ शहीद होंगे / पर याद रहे हमने भूख और भय से उपजी मौतों को चकमा दिया है / मगर शहीद होने के लिए कभी मत लड़ो / और अब उस तरफ कूँच करो / जिधर हमारे पुरखों की लाशों के ढेर पर अश्लील भव्यता के किले खड़े हैं / जिधर हमारी अजन्मी पीढ़ियों को दफ़नाए जाने की योजनाएँ बन रही हैं।’ विहाग वर्चस्व के हिंसक समाजशास्त्र को बखूबी जानते हैं और इस बर्बर हिंसा की शिकार अपनी पूरी जमात को वे कविता से सचेत करते हैं।

हमारे समय का केंद्रीय स्वभाव विलोमियत और उसकी स्थाई प्रवृत्तियाँ विडम्बना और विसंगति बाजार हित में कल्पित विश्वासों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक व्यभिचारों के तांडव करने में लगी हैं। ऐसे समय में जब सत्ता की चाटुकार साहित्यिक पलटन एकेडमिया पर क़ाबिज़ हो तो एक संस्थानिक शोधरत तरुण को कविता के जगत में ज़िम्मेदारी से आना कितना बड़ा ख़तरा मोल लेना है, यह बताने की आवश्यकता नहीं। विहाग यह ख़तरा उठाते हैं, वे नवोदित राष्ट्रीयता में मनुष्यता के बर्बर विकास को वर्चस्व के आभूषणों  से अलगा कर सदी का सबसे नग्न चित्र प्रस्तुत करते हैं। यह नग्नता साहित्य के पुराने सौंदर्य लोभियों को कतई पसंद नहीं आएगी। लेकिन अन्याय के विरुद्ध पवित्र क्रोध का जो आँखे सौन्दर्य देखने में सक्षम होंगी, उन्हें यह नया सौंदर्य करुणा से विकल कर देगा। अपने समय के युग-दर्शन की विलोमता का आख्यान प्रस्तुत करती कविता ‘हत्या-पुरस्कार के लिए प्रेस-विज्ञप्ति’ इस तथ्य का सबसे जोरदार उदाहरण प्रस्तुत करती है। वे इस कविता में विलोम-युग की सच्चाई लिखते हैं- ‘मसलन / बच्चों की हत्या करें, चिकित्साधिकारी बनें / स्त्रियों की हत्या करें, सुरक्षाधिकारी बनें/ विधर्मियों की लाशें कब्रों से निकलें फिर हत्या करें / मुख्यमंत्री बनें / देश की छाती में धर्म का धुआँ भरकर देश की हत्या करें / प्रधानमंत्री बनें / इच्छुक अभ्यर्थी हत्या-पुरस्कार के लिए / निःशुल्क आवेदन करें और आश्वस्त रहें / पुरस्कार-निर्णय की प्रक्रिया में / बरती जाएगी पूरी लोकतांत्रिकता।’ जड़ सौन्दर्य रुचियों के पारखी शास्त्रियों को यह कविता मात्र नारेबाजी लग सकती है। लेकिन नारा और कविता के बीच एक महीन अंतर है कि नारे प्रतिरोध में हो सकते हैं किन्तु एक वर्चस्व के ऊपर दूसरी वर्चस्व की भावना ही वहाँ प्रधान राजनीति होती है जबकि कविता वर्चस्व के विरुद्ध घातक शक्तियों को वर्चस्वहीन कर, पवित्र क्रोध से बर्बरता को नेस्तनाबूत कर, मनुष्यता को करुणा के उपचार-शिविर में दाखिल कारती हैं। यहाँ कवि अपने युग-दर्शन की शिनाख़्त कर उन महीन तत्वों की चालबाजियाँ टटोलता है जिनसे हमारे समय की युगीनता घायल हुई है। वह प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, चिकित्साधिकारी, सुरक्षाकर्मी आदि का कोई जातीय दुश्मन नहीं वरन इनकी बनावट में शामिल विलोमीयत के बर्बर वर्चस्व के खिलाफ कविता को सबसे ताकतवर हथियार बना जटिलताओं की छाती पर चढ़कर मायावियों की दुर्धष युद्धभूमि में उतरता है। विहाग इस उत्तर-आधुनिक युग के उत्तर सत्यों के चक्रव्यूह में फँसे अपने सामयिक जन अभिमन्यु की संरचना प्रस्तुत करते हैं। वे प्रतिरोध की परंपरा से प्रतीक लेते हैं लेकिन अपने अभिमन्यु को सातवें दरवाजे को तोड़ने का नया सुफल गढ़ते हुए दिखाई देते हैं- ‘हजार बरसों में अभिमन्यु ने मृत्यु का अभ्यास किया है / तुम देखना सारे शूरवीर जब उसे / मरा हुआ समझ चले जाएंगे / तब वह खून से लथपथ देह में / सांस भरेगा / धूल झाड़ उठेगा और भेद देगा सातवाँ दरवाजा / यह आखिरी दरवाजा वह किसी रथ-चक्र से नहीं / जाँत के एक पाट से तोड़ेगा।’ यह कविता पढ़ते हुए एक बात याद आती है जो डॉ. अंबेडकर ने किसी द्वारा निरक्षरों के मताधिकार न देने की वकालत के जवाब में कही थी।  उन्होंने कहा था कि जब पढे-लिखे लोग लोकतन्त्र को मिटाने की साजिश कर रहे होंगे तब इस देश के लोकतन्त्र को अनपढ़ बचा लेंगे। यह कितनी मजे की बात है कि डॉ. अंबेडकर आजादी के पूर्व से लेकर बाद तक शिक्षा की सबसे जोरदार पक्षधर वकालत करने वाले सजग चिंतक थे, फिर इस भरोसे से बिलकुल भिन्न बात पर इतना यकीन क्यों जताया ! यह बहुत सचेत चिंतन है जिसे विहाग ने बहुत मार्मिक तौर पर समझा है और कविता में उसे उतार दिया है। शिक्षा जहाँ मूल्य थी वहीं शिक्षित आज कीमत बनकर  रह गया है। शिक्षा आज न्याय से अधिक अन्याय के लिए उपयोगी होती जा रही है। आज शिक्षा भी एक संसाधन बन कर रह गई है जिस पर अत्यंत शक्तिशाली मृत पूँजी के प्रेतों का कब्जा है। जिसने लोकतन्त्र और राजतंत्र की परस्पर विलोमता का अद्भुत रहस्यवाद रचा है। लोकतन्त्र की देह में चोट खाए खूंखार सामंतवादी विषधर आत्मा के रूप में विराज रहा है। पूंजीवाद ने इस राजनीतिक युग को जन्म दिया है। इस युग में आज जो भी उत्पादक या उपभोक्ता है, इसी का तानाबाना है। सत्ता के सर्वोच सिंहासन पर बैठा जनतंत्र का चौकीदार सिर्फ सचमुच में पूँजी-प्रेतों का सिक्योरिटीगार्ड ही है। उसकी हैसियत इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। इस सिक्योरिटीगार्ड का काम इतना ही है कि मुल्क की निन्यानबे फीसदी अवाम अपने असली दुश्मन को पहचान ही न सके। और जो भी सही दुश्मन को पहचानते हैं यदि वे जमीन पर उतर कर जनता को सच समझाने की कोशिश करते हुए मिलें, या तो उन्हें खरीद ले या उन्हें फर्जवाड़े में फंसाकर उनका अस्तित्व ही मिटा दें। यह हमारे कथित लोकतन्त्र की सामयिक सच्चाई है। विहाग इस सच्चाई को लिखने वाले ऊर्जावान कवि हैं। वे शाहेवक़्त द्वारा दी गई ‘इस देश में नागरिकता की नयी अर्हताएँ’ बताते हुए लिखते हैं- ‘अपने मस्तिष्क में धर्म का धुआँ भर लो इस कदर कि / तुम अपनी बेटियों, पत्नियों और माँओं के लिए / कुतिया, रंडी और छिनाल जैसे संबोधनों का समर्थन कर सको / और सोच सको कि / मेरा प्रधानमंत्री इसके समर्थन में है / तो अवश्य ही अपूर्व गौरव की बात है।’ विहाग की ही भाषा में कहूँ तो कह सकता हूँ कि ‘यह इस नई सदी और सभ्यता का आखिरी मोड़ है’। डॉ. अंबेडकर ने लोकतन्त्र पर जिस ख़तरे की बात की थी, यह समय उस ख़तरे के चरम उत्कर्ष तक पहुँच चुका है। आज स्टेट अपने सिस्टम में फिट बैठाने वाले डेप्लोमेट तैयार करने में शिक्षा के सारे संसाधनों का उपयोग बहुत शातिर चक्र-व्यूह के माध्यम से कर रहा है। जबकि हमारा बहुत पुराना प्रतिरोध यह मानता आया है कि ‘शिक्षा वही है जो मुक्ति दिलाए’। लेकिन संसाधनों के वर्चस्वशाली ठीकेदार शिक्षा का उपयोग गुलाम बनाने के लिए कर रहे हैं। शिक्षा की आत्मा यदि ज्ञान है तो इस ज्ञान का हनन धुआँधार रूप में किया जा रहा है। ज्ञान जिस सतह पर खड़ा हो सकता है आज वह सतह उससे छिन ली गई है। वह आज आधारहीन हो उत्तर-मीडिया युग के सीमित दायरे के भीतर हवा में झूल रहा है। उसका मूल्य ही आधार था जिसे सत्ता की ताकत ने छिन्नभिन्न कर दिया। मुझे पराग पावन का एक विचार याद आता है कि ‘लाइब्रेरी से लौट रहा था लेकिन यह कहना नहीं भूला था कि ज्ञान पर फ़िदा मत होइए, वह बहुत मामूली चीज है’। उपरोक्त उदाहरण मैंने जिस कविता से दिया है उसी के अंत में विहाग लिखते हैं- ‘जुबान को काटकर रख आओ सत्ता के पैरों पर / आँखों का पानी बेंच आओ संप्रदाय की दुकान में / आने से पहले थोड़ा लाश हो जाओ / थोड़ा-थोड़ा हो जाओ पत्थर / फिर तुम्हारा स्वागत है इस देश में / एक देशभक्त और सम्मानित नागरिक की तरह’। कविता की इन पंक्तियों में जितनी जोरदार अभिधा है, उतनी ही शानदार लक्षणा और सबसे धारदार है व्यंजना। दरअसल यह ध्वनि-काव्य का पूरी समकालीन कविता में सबसे असरदार उदाहरण है। अभिधा है-  रख आओ, बेंच आओ, लाश हो जाओ, पत्थर हो जाओ।  लक्षणा है- जुबान याने स्वाद और वाणी। आँखों का पानी याने करुणा का तेज। लाश याने संवेदन शून्य जड़। पत्थर याने निष्ठुर। व्यंजना जब हम देखेंगे तो पाएंगे यहाँ जितने अंग आए हैं वे सब ज्ञानेन्द्रियां हैं। मतलब ज्ञान के प्राथमिक तत्वों पर सत्ता के विचारों का एक घनघोर आक्रमण। गुलाम नागरिकता की एक जटिल साजिश। जब इन तत्वों पर वर्चस्व की पाबन्दियाँ लागू हो सकती हैं तो यह निश्चित है ज्ञान अपने मूल्यों में ही अर्थवान हो सकता है। दूसरों के मूल्य पर हम अपना बलिदान क्यों दें। पराग की बात भी यहाँ अपना निहतार्थ कह देती है।  

सितंबर 2022 में हिंदी मासिक ‘हंस’ में चर्चित युवा सबाल्टर्न इतिहासकार डॉ. रमाशंकर सिंह का लेख ‘हसरतों का लोकतन्त्र’ छपा था जिसमें स्लम क्षेत्रों में फ़ील्डवर्क के दौरान कानपुर की एक चालीस-पैंतालीस साल की धरकार महिला से उनके द्वारा पूछे गए सवाल-जवाब हैं। वे पूछते हैं कि ‘आपका जीवन इतने कम संसाधनों में कैसे चल पाता है ? महिला ने जवाब दिया ‘चल जाता है किसी तरह। हमारा क्या, हमारा तो चल ही जाता है लेकिन मुश्किल हमारे बच्चों के साथ आएगी।’ उन्होंने कुछ क्षण चुप्पी साध ली और फिर कहा ‘एक न एक दिन जरूर हमारा देश बन जाएगा और हमारे बच्चे भी पढ़-लिख जाएंगे तो उनका जीवन ठीक से चलने लगेगा।’ रमाशंकर जी फिर पूछते हैं कि ‘क्या यह आप का देश नहीं है ? यह भी तो आप का ही देश है, जितना औरों का, उतना ही आपका।’ वे कहती हैं ‘नहीं जो परेशानी हमारी है, वह आप लोगों की नहीं है। अभी हमारा देश नहीं बना है।’ वे पुनः पूछते हैं कि आपका देश कब तक बन जाएगा ? वे कहती हैं कि ‘यह तो पता नहीं लेकिन बन जाएगा एक दिन।’ रमाशंकर सिंह लिखते हैं कि ‘फिर वे अंदर गईं। एक मुड़ा-तुड़ा कैलेंडर जैसा कुछ ले आईं। उसमें बाबा साहब बी. आर. अंबेडकर की फोटो छपी थी। टाई और कोट पहने डॉ. अंबेडकर।’ वे कहती हैं ‘इन्होंने यही कहा था बच्चों को पढ़ना चाहिए। बाबा साहब ने हमें भारत का संविधान दिया था। जो कुछ होगा, इसी से होगा।’ विहाग की कविताओं को समझते हुए इतना लम्बा उद्धरण देने से मैं खुद को रोक नहीं पाया। एक बहुत बड़े वर्ग में आत्म गौरव की ऐसी आशा रैदास, कबीर के बाद सबसे बड़ा विश्वास डॉ. अंबेडकर बनते हैं। अपने मौलिक अधिकारों के लिए लड़ती कोई क़ौम ही देश की सच्ची और असली नागरिक होती है। इसी सजग नागरिकता की सदस्यता के लिए प्रेरित करती विहाग की कविताएं हमारे समय की सुंदरतम उपलब्धि हैं। वे अपनी किताब में एक प्रेम कविता ‘सूर्य के नदी में डूबने की भाषा में विदा’ के हवाले से कहते हैं-

‘हंसदा, हमारा प्रेम दो देशों की लड़ाई में कुर्बान नहीं होगा 

वह सिमडेगा के जंगलों में फूलता रहेगा 

जिसकी गंध बीच की दीवार पार कर एक दिन मेरे जौनपुर तक ज़रूर आएगी।’              

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि विहाग सिर्फ अस्मितामूलक विमर्श के कवि नहीं हैं। उनका फ़लक बहुत व्यापक है। वे मनुष्यता की आदिम सभ्यता से लेकर इस अत्यधिक आधुनिकता के उत्तरोत्तर संस्कारों में छिपी शातिर हिंसा हो पहचानते हैं। वे उस पीड़ित, शोषित, अन्याय से आहात हर जन को कविता का सबसे ताकतवर हथियार देने की ऐतिहासिक कोशिश करते दिखाई पड़ते हैं। आज ऐसे कवियों की आवश्यकता ख़ासकर हिंदी समाज को सबसे अधिक है।


शैलेन्द्र शुक्ला


सम्पर्क


मोबाइल : 7498653618


ईमेल: Shailendrashukla.mgahv@gmail.com



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