आज की कविता में ज्ञान का ज्यादा आधिक्य दिखाई पड़ता है जबकि कवि के लिए ज्ञान नहीं बल्कि संवेदना का होना जरूरी होता है। जनकवि दुर्गेन्द्र 'अकारी 

जनकवि दुर्गेन्द्र 'अकारी' (स्मृति दिवस 5 नवम्बर)



यहां इस धरती ने आदमी आदमी को चंदबरदाई बना के पैदा किया है 

(अकारी जी से एक मुलाकात)


प्रस्तुति : सुधीर सुमन


‘मत कर भाई, तू बनिहारी सपन में’- इस गीत से उन्होंने अपने बारे में बताने की शुरुआत की। इस गीत को उन्होंने अपने ही गांव में एक रूपक की तरह मंच से प्रस्तुत किया था, जिसे सुनने के बाद हलवाहों ने हल जोतने से मना कर दिया था। चूंकि बनिहारों की पीड़ा को उस गीत में उन्होंने बड़ी प्रभावशाली तरीके से आकार दिया था, इसी कारण उनके नाम के साथ अकारी शब्द जुड़ गया। गीत का असर देख कर नौजवान अकारी का मन उसी में रमने लगा। इसी बीच नक्सलबाड़ी की चिंगारी भोजपुर में गिरी और उससे जुड़े सवाल और संघर्ष के मुद्दे इनके गीतों में आने लगे। वे सामंतों और सरकार के खिलाफ गीत लिखने लगे। उन्होंने चंवरी, बहुआरा, सोना टोला आदि गांवों में पुलिस-सीआरपीएफ से लोहा लेने वाले क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के बहादुराना प्रतिरोधों और उनकी शहादतों की घटना को अपने गीतों में पिरोया। उनकी पहली किताब का नाम था - 'जनजागरण'। यह बताते हुए वे गर्व से भर उठे कि उनके गीतों को सुन कर लोगों का उत्साह बढ़ता था। जिस समय नक्सल का नाम सुन कर कोई अपने ओरी, छप्पर के किनारे भी नहीं ठहरने देता था, वैसी हालत में उन पर उन्होंने गीत लिखा।


हमने सवाल किया कि गीत लिखने के अलावा और क्या करते थे? उन्होंने कहा कि उनके लिए भी बड़ा गंभीर सवाल था कि जीविका के लिए क्या करें। किसी का नौकर बन के रहना उन्हें मंजूर न था। उसी दौरान उन्हें एक विचार आया कि मड़ई कवि की तरह किताब छपवा कर वे भी बेच सकते हैं। लेकिन मड़ई कवि से उन्होंने सिर्फ तरीका ही लिया, विषय नहीं लिया। मड़ई कवि सरकारी योजनाओं के प्रचार में गीत गा कर सुनाते थे, जबकि अकारी गीतों के जरिए सरकार की पोल खोलने लगे।


अकारी जी 74 के आंदोलन के साथ रहे। उन्होंने बताया- ‘जब इमरजेंसी लगा तो सब नेता करीब-करीब अलोपित हो गए। कुछ नेपाल की तराई में चले गए। हमको लगा कि इस तरह तो कहां क्या हो रहा है, इस बारे में कोई बातचीत ही नहीं हो पाएगी। तो उसी दौर में किताब छपवा के बेचने लगे ट्रेन में।’ उस वक्त का इनका एक मशहूर गीत था- 'बे बछरू के गइया भोंकरे, ओइसे भोंकरे मइया, बिहार तू त सून कइलू इंदिरा'। अपने गीतों के जरिए जनता पार्टी को वोट देने की अपील भी उन्होंने की और 1974 के आंदोलन की जनभावना से गद्दारी करने वालों पर व्यंग्य भी किया-


'जनता जनता शोर भइल, जनता ह गोल भंटा हो

हाथ ही से तूरी ल, ना मारे पड़ी डंटा हो।'


अपनी पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछने पर अकारी जी ने बताया कि वे स्कूल नहीं गए। बुढ़वा पाठशाला में गए, पर वहां कुछ सीख नहीं पाए। एक दिन दलान पर लड़के पढ़ रहे थे तो उन्हीं से कहा कि भाई हमें भी कुछ पढ़ा दो। उन सबों ने एक टूटी स्लेट दी और उस दिन उन्होंने 'क' वर्ग के सारे अक्षर रात भर मे याद किए। इस तरह पांच-छह दिन में सारे अक्षरों को लिखना सीख गए। हमने पूछा कि अब तो किताब धड़ल्ले से पढ़ लेते होंगे, तो हंसते हुए बोले- पढ़ लेता हूं, पर ह्रस्व-इ और दीर्घ-ई अब भी समझ में नहीं आता।


शिक्षा के अभाव या शब्दों और भाषा के स्कूली ज्ञान के अभाव का जो सच था उसे भी उन्होंने एक तरह का ढाल बना लिया और अपने नाम के साथ एल एल पी पी लिखने लगे-दुर्गेंद्र अकारी, एल एल पी पी। उनके गीतों के पुराने संग्रहों में आज भी यही लिखा मिलता है। तो इस एल एल पी पी से जुड़ा एक किस्सा उन्होंने सुनाया कि एक बार जीआरपी वालों ने उन्हें पकड़ लिया। एक ने पूछा कि एल एल पी पी किसने लिखा है? अकारी बोले- हमने। उसने सवाल किया- इसका मतलब? अकारी- आप लोग पढ़े लिखे आदमी हैं अब हम क्या सिखाएं आपलोगों को। तो उसने कहा- इसका मतलब तो लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर होता है। अकारी बोले - वही है सर। उसने पूछा- गीत कैसे लिखते हो? अकारी के पास जवाब तैयार- क ख ग किसी तरह जोड़ के। फेयर किसी दूसरे से कराते हैं। उसमें से किसी ने कहा कि सिर्फ क ख ग के ज्ञान से इतना लिख पाना संभव नहीं है। उनमें एक बड़ा बाबू था, कुछ समझदार, उसने इनके इंदिरा विरोधी कुछ गीतों को सुना और कहा- समुद्र में बांध बनाया जा सकता है, लेकिन कवियों के विचारों को बांध नहीं जा सकता। उसने यह भी कहा कि गीत तो आपका अच्छा है, पर यहां हम लोगों की जिम्मेवारी है। हम लोगों की बदनामी होगी। यहां मत गाइए-बजाइए। तो अकारी बोले- कहां जाएं, भाई? कचहरी पर जाते हैं, तो आप ही लोग हैं। बाजार में जाते हैं तो आप ही लोग हैं। यहां स्टेशन पर आते हैं, तो आप ही लोग हैं। हम मैदान में गाने के लिए गीत तो बनाए नहीं है। बड़ा बाबू बोला- नहीं मानिएगा, तो विदाउट टिकट में आपको पकड़ लेंगे।


विदाउट टिकट में तो अकारी जी नहीं पकड़े गए। लेकिन प्रलोभन और धमकी के जरिए उन्हें गीत लिखने से रोकने की कोशिश जरूर की गई। एक दिन वे आरा रेलवे स्टेशन पर किताब ले के पहुंचे तो वहां असनी गांव के कामेश्वर सिंह से मुलाकात हुई। अकारी ने बताया कि कामेश्वर सिंह उस तपेश्वर सिंह के भाई थे, जिन्हें सत्ता और प्रशासन के लोग बिहार के सहकारिता आंदोलन का नायक बताते हैं और आम लोग को-आपरेटिव माफिया। कामेश्वर सिंह ने अकारी से कहा कि वे किताब बेचना छोड़ दें। वे उनको नौकरी दिला देंगे। अकारी बोले- नौकरी तो नौकरी ही होती है। नौकर की तरह ही रहना होगा। लेकिन हमने जो किताब छपवाई है वह नौकर बन कर नहीं छपवाई है। इससे कम या ज्यादा पैसा भी आ रहा है। कामेश्वर सिंह ने कहा कि कुछ हो जाएगा तब? कोई घटना घट जाएगी तब? अकारी के पास सटीक जवाब था- होगा तो होगा, किसी भी काम में कुछ हो सकता है। कामेश्वर सिंह चिढ़कर बोले- तुम चंदबरदाई नहीं हो न! अकारी कहां चुप रहने वाले थे, पलट कर जवाब दिया- एक चंदबरदाई हुए तो आप गिन रहे हैं, यहां इस धरती ने आदमी आदमी को चंदबरदाई बना के पैदा किया है।


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