यतीश कुमार की किताब 'बोरसी भर आंच' का एक अंश
जीवन में स्मृतियों के लिए एक बड़ा स्पेस होता है। ये खट्टी मीठी स्मृतियां हमारे जीने का संबल बनती हैं। इनसे बहुत कुछ सीख मिलती है। रचनात्मकता तो बहुत हद तक स्मृतियों की ऋणी होती है जिसमें सार्वभौमिकता होती है। अक्सर ऐसा होता है कि किसी लेखक की स्मृतियां या अन्य कोई रचना अपने जीवन से मेल खाने लगती हैं। कवि यतीश कुमार की हाल ही में संस्मरणों की एक किताब आई है 'बोरसी भर आंच'। यतीश का शुरुआती जीवन सामान्य ही रहा है। और उस जीवन में सामान्य का वह संघर्ष भी है जो आमतौर पर हम सबका संघर्ष होता है। इन संस्मरणों में कविता जैसी ही रवानी और प्रवहमानता है। स्थानीय बोली भाषा के शब्द अचानक हमें ठिठकने के लिए मजबूर कर देते हैं। यह लेखक के अपने मिट्टी से जुड़े होने का प्रमाण है। हम पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं यतीश कुमार की किताब 'बोरसी भर आंच' का एक अंश। इन संस्मरणों में गोता लगाने के लिए आप यह किताब राजकमल प्रकाशन से खरीद कर पढ़ सकते हैं। कितने ही अफ़सानों की छाप गुम हैं यतीश कुमार वर्जनायें बेलौस होती हैं और स्मृतियाँ कभी जल जैसी तरल तो कभी वाष्प की तरह सुसुम और कभी बर्फ की तरह ठं...