राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'हिंदी दिवस: भाषा का उत्सव या हमारी भाषाई पराजय का स्मरण?'


राकेश कुमार गुप्ता 


हाल की एक खबर यह है कि मध्य प्रदेश सरकार ने चिकित्सा शिक्षा के लिए हिन्दी में किताबें प्रकाशित करवाया। चार साल बाद स्थिति यह है कि एक भी विद्यार्थी ने माध्यम के रूप में हिन्दी का चयन नहीं किया। हाल ही की एक खबर यह भी है की भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने को ले कर कुछ लोगों ने यह आपत्ति दर्ज कराई कि इससे हिंदी कमजोर होगी। हिन्दी को ले कर आए दिन तमाम बातें होती रहती हैं। रूस, चीन, जर्मनी और जापान जैसे देशों में चिकित्सा, तकनीक और अभियांत्रिकी की पढ़ाई वहां की भाषाओं में ही होती है। ये दुनिया के ताकतवर देश हैं और यह इन देशों ने अपनी भाषा में ही काम कर यह उपलब्धि हासिल की है। फिर हिन्दी में वह क्या कमी है जो हमारे देश के युवकों को तैयार कर पाने में असफल रही है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानीय भाषाएँ हिन्दी के लिए रीढ़ की तरह हैं। ये हिन्दी को समृद्ध करती हैं न कि कमजोर। होना तो यह चाहिए कि हिंदुस्तान में हर दिन हिन्दी के लिए होता। लेकिन हम साल में सिर्फ एक बार हिन्दी दिवस मना कर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। राकेश कुमार गुप्ता ने हिन्दी दिवस के बहाने से कुछ महत्वपूर्ण बातें की हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'हिंदी दिवस: भाषा का उत्सव या हमारी भाषाई पराजय का स्मरण?'


'हिंदी दिवस: भाषा का उत्सव या हमारी भाषाई पराजय का स्मरण?'


राकेश कुमार गुप्त


हम हिंदी भाषी लोग अपनी भाषा का दिवस मनाते हैं। यह बात अपने आप में न तो अनुचित है और न ही असामान्य। दुनिया की अनेक भाषाओं के लिए विशेष दिवस मनाए जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र भी विभिन्न भाषाओं के संरक्षण और बहुभाषिकता को प्रोत्साहित करने के लिए भाषा दिवसों का आयोजन करता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हिंदी भाषी समाज ही दुनिया का अकेला ऐसा समाज है जो अपनी भाषा का दिवस मनाता है। लेकिन हिंदी दिवस के अवसर पर एक अधिक गंभीर प्रश्न अवश्य उठता है कि क्या हिंदी हमारे दैनिक जीवन, शिक्षा, प्रशासन, न्याय, विज्ञान, चिकित्सा, अभियांत्रिकी और शोध की सक्रिय भाषा बन पाई है, या हम अभी भी उसे मुख्यतः भावनात्मक गौरव, भाषणों और औपचारिक आयोजनों तक सीमित रखे हुए हैं?

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। संविधान के अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी निर्धारित की गई, जबकि अनुच्छेद 351 ने संघ को हिंदी के प्रसार और विकास का दायित्व सौंपा। किंतु संविधान ने हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया। यह अंतर समझना आवश्यक है। हिंदी भारत की एक महत्त्वपूर्ण संपर्क और राजकीय भाषा है, परंतु भारत की भाषाई संरचना बहुभाषिक है। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगला, असमिया, उड़िया, पंजाबी, गुजराती, उर्दू, कश्मीरी, संस्कृत और अन्य भाषाओं ने भारतीय सभ्यता, ज्ञान और राष्ट्रीय आंदोलन के निर्माण में समान रूप से महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। हिंदी का विकास इन भाषाओं के विरोध में नहीं, बल्कि उनके साथ संवाद और सह-अस्तित्व के आधार पर होना चाहिए।

हिंदी के आधुनिक स्वरूप का निर्माण किसी एक दिन या किसी एक संस्था ने नहीं किया। यह अनेक सामाजिक, साहित्यिक और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का परिणाम है। इंशा अल्लाह ख़ाँ की ‘रानी केतकी की कहानी’ हिंदी गद्य के विकास का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। उसमें भाषा के संस्कृतनिष्ठ, फारसीनिष्ठ और बोलचाल के रूपों के बीच प्रयोगधर्मिता दिखाई देती है। आगे चल कर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी को आधुनिक पत्रकारिता, नाटक और सार्वजनिक चेतना की भाषा बनाया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भाषा को अनुशासन और विचार की शक्ति दी। प्रेमचंद ने किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, मध्यवर्ग और ग्रामीण समाज के जीवन को हिंदी साहित्य के केंद्र में स्थापित किया। जयशंकर प्रसाद ने इतिहास, दर्शन और मानवीय संवेदना को काव्यात्मक ऊँचाई दी। निराला, महादेवी वर्मा, रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु और निर्मल वर्मा जैसे रचनाकारों ने हिंदी को विविध अनुभवों और विचारों की भाषा बनाया।

हिंदी पत्रकारिता ने भी राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई। समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और सार्वजनिक लेखन ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक चेतना को व्यापक बनाया। हिंदी ने गांवों, कस्बों और नगरों के बीच संवाद का माध्यम बनकर स्वतंत्रता आंदोलन को जनभाषा दी। महात्मा गांधी ने भारतीय भाषाओं में शिक्षा और सार्वजनिक संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। राजेंद्र प्रसाद, पुरुषोत्तम दास टंडन, काका कालेलकर और अनेक अन्य नेताओं ने भारतीय भाषाओं को लोकतांत्रिक भागीदारी से जोड़ा। परंतु स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी की भूमिका का अर्थ यह नहीं था कि भारत की अन्य भाषाओं का योगदान कम था। बंगला, मराठी, तमिल, पंजाबी, उर्दू, मलयालम और असमिया पत्रकारिता तथा साहित्य ने भी राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक आधार दिया।

समस्या यह है कि जिस हिंदी ने जनता को राजनीतिक चेतना दी, वह स्वतंत्रता के बाद ज्ञान और सत्ता की सभी प्रमुख संस्थाओं की भाषा नहीं बन सकी। संविधान के अनुच्छेद 343 में प्रारंभिक रूप से अंग्रेजी के प्रयोग को पंद्रह वर्षों तक जारी रखने की व्यवस्था की गई थी। बाद में राजभाषा अधिनियम, 1963 के माध्यम से अंग्रेजी के प्रयोग को आगे भी जारी रखा गया। इसका व्यावहारिक परिणाम यह हुआ कि संघीय प्रशासन, उच्च न्यायपालिका, उच्च शिक्षा, वैज्ञानिक शोध और तकनीकी ज्ञान में अंग्रेजी की केंद्रीय भूमिका बनी रही। हिंदी का प्रयोग बढ़ा, लेकिन वह अनेक क्षेत्रों में अंग्रेजी का पूर्ण विकल्प नहीं बन पाई।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अंग्रेजी का विरोध करना हिंदी का विकास नहीं है। अंग्रेजी आज अंतरराष्ट्रीय संवाद, विज्ञान, तकनीक, व्यापार और उच्च शिक्षा की महत्त्वपूर्ण भाषा है। भारतीय विद्यार्थियों और पेशेवरों के लिए अंग्रेजी का ज्ञान उपयोगी और आवश्यक हो सकता है। वास्तविक प्रश्न अंग्रेजी को हटाने का नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं को ज्ञान से वंचित न रखने का है। यदि कोई विद्यार्थी हिंदी माध्यम से विद्यालय तक पढ़ता है, लेकिन विश्वविद्यालय में प्रवेश करते ही उसे कानून, चिकित्सा, अभियांत्रिकी, अर्थशास्त्र या विज्ञान की पूरी दुनिया अंग्रेजी में मिलती है, तो भाषा उसके लिए ज्ञान का माध्यम न हो कर बाधा बन जाती है।

कानून के क्षेत्र में यह समस्या और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। संविधान का अनुच्छेद 348 उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही तथा विधेयकों, अधिनियमों और संवैधानिक दस्तावेजों के प्रामाणिक पाठ के लिए अंग्रेजी को महत्त्वपूर्ण स्थान देता है। यद्यपि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में न्यायिक निर्णयों के अनुवाद तथा कुछ न्यायालयों में भारतीय भाषाओं के प्रयोग की व्यवस्था है, फिर भी उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय की विधिक संस्कृति मुख्यतः अंग्रेजी पर आधारित है। इसका परिणाम यह है कि कानून की भाषा और जनता की भाषा के बीच दूरी बनी रहती है। कोई साधारण नागरिक अपने अधिकारों, अधिनियमों, न्यायिक निर्णयों और संवैधानिक उपायों को सीधे समझने में कठिनाई अनुभव करता है। न्याय तक पहुँच केवल न्यायालय की इमारत तक पहुँचने का नाम नहीं है; न्याय तक पहुँच का अर्थ कानून को समझ पाने की क्षमता भी है।

इतिहास और दर्शन के क्षेत्र में भी हिंदी की स्थिति विरोधाभासी है। हिंदी में इतिहास, संस्कृति और दर्शन पर बहुत-सा साहित्य उपलब्ध है, लेकिन विश्वविद्यालय स्तर पर मूल शोध, अंतरराष्ट्रीय विमर्श और उच्चस्तरीय अकादमिक संवाद में अंग्रेजी का प्रभुत्व बना हुआ है। परिणामतः हिंदी में लिखने वाला शोधार्थी अक्सर दोहरी कठिनाई से गुजरता है। उसे पहले अपने विषय पर शोध करना पड़ता है और फिर उसे अंग्रेजी के अकादमिक ढाँचे में प्रस्तुत करने का दबाव झेलना पड़ता है। इससे ज्ञान का लोकतंत्रीकरण बाधित होता है। भारत का इतिहास यदि केवल अंग्रेजी में लिखा और पढ़ा जाएगा, तो इतिहास की समझ समाज के सीमित वर्ग तक सिमट जाएगी।

चिकित्सा और अभियांत्रिकी में भाषा की समस्या और गंभीर है। किसी ग्रामीण या छोटे शहर से आया विद्यार्थी यदि हिंदी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करके चिकित्सा महाविद्यालय में पहुँचता है, तो उसे शरीर-विज्ञान, औषधि-विज्ञान, रोग-विज्ञान और शल्य-चिकित्सा की जटिल शब्दावली से परिचित होने के लिए अतिरिक्त संघर्ष करना पड़ता है। यही स्थिति अभियांत्रिकी, कंप्यूटर विज्ञान, भौतिकी, रसायन, गणित और जैव-प्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों की होती है। कई बार विद्यार्थी विषय को समझने में सक्षम होता है, लेकिन भाषा की अपरिचितता उसके प्रदर्शन को प्रभावित करती है। यह प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि शिक्षा-व्यवस्था की संरचनात्मक समस्या है।

दुनिया के अनेक देशों ने अपनी भाषाओं में आधुनिक ज्ञान का निर्माण किया है। जापान ने जापानी भाषा में विज्ञान, तकनीक और उच्च शिक्षा का व्यापक ढाँचा विकसित किया। जर्मनी, फ्रांस, रूस और चीन ने भी अपनी भाषाओं में विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और वैज्ञानिक साहित्य का निर्माण किया। इन देशों ने विदेशी भाषाओं से ज्ञान ग्रहण किया, लेकिन उसे अपनी भाषाओं में अनूदित, विकसित और संस्थागत किया। भारत में भी ऐसा प्रयास हुआ है, किंतु वह अभी तक पर्याप्त व्यापक और निरंतर नहीं बन पाया है। भारतीय भाषाओं में उच्चस्तरीय पाठ्यपुस्तकों, शोध-पत्रों, शब्दकोशों, डिजिटल संसाधनों और वैज्ञानिक डेटाबेस की कमी आज भी बड़ी चुनौती है।

हिंदी की एक और समस्या उसकी शब्दावली को ले कर है। एक ओर अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ और कठिन शब्दावली सामान्य पाठक से दूरी बना देती है, दूसरी ओर केवल बोलचाल की भाषा में गंभीर वैज्ञानिक और विधिक अवधारणाओं को व्यक्त करना कठिन हो सकता है। समाधान किसी एक छोर पर जाना नहीं, बल्कि ऐसी जीवंत हिंदी विकसित करना है जो सरल भी हो, सटीक भी हो और आवश्यकता के अनुसार संस्कृत, अरबी, फारसी, अंग्रेजी तथा भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करने में संकोच न करे। भाषा का विकास शुद्धता के कृत्रिम आग्रह से नहीं, बल्कि प्रयोग, संवाद और सृजन से होता है।

हिंदी के विकास के लिए केवल सरकारी कार्यालयों में हिंदी पखवाड़ा मनाना पर्याप्त नहीं है। यदि पूरे वर्ष कार्यालयी कामकाज अंग्रेजी में चलता रहे और सितंबर आते ही हिंदी में निबंध, भाषण, कविता और प्रतियोगिताएँ आयोजित कर दी जाएँ, तो यह भाषा-प्रेम का स्थायी कार्यक्रम नहीं, बल्कि औपचारिक अनुष्ठान बन जाता है। हिंदी दिवस तभी सार्थक होगा जब विश्वविद्यालयों में हिंदी में उच्चस्तरीय पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध होंगी; जब कानून के विद्यार्थी हिंदी में संविधान, दंड विधि, सिविल प्रक्रिया, साक्ष्य विधि और न्यायिक निर्णय पढ़ सकेंगे; जब चिकित्सा और अभियांत्रिकी के विद्यार्थी अपनी भाषा में मूल अवधारणाएँ समझ सकेंगे; जब शोधार्थी हिंदी में शोध कर सकेंगे और उनके शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुवाद तथा संवाद का अवसर मिलेगा।

डिजिटल युग ने हिंदी के सामने नई संभावनाएँ भी खोली हैं। इंटरनेट, सामाजिक मीडिया, ऑनलाइन शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन अनुवाद और डिजिटल पुस्तकालय हिंदी के प्रसार को नई शक्ति दे सकते हैं। आज हिंदी में समाचार, साहित्य, व्याख्यान, शिक्षण सामग्री और सार्वजनिक विमर्श पहले की तुलना में अधिक उपलब्ध हैं। लेकिन डिजिटल विस्तार को ज्ञान की गहराई में बदलना अभी बाकी है। मनोरंजन, राजनीतिक बहस और तात्कालिक प्रतिक्रियाओं के साथ-साथ उच्चस्तरीय विज्ञान, शोध, दर्शन, विधि, अर्थशास्त्र और तकनीकी शिक्षा की सामग्री भी हिंदी में तैयार करनी होगी।

हिंदी का विकास भारतीय लोकतंत्र के विकास से जुड़ा हुआ है। लोकतंत्र में नागरिक केवल मतदान करने वाला व्यक्ति नहीं होता; वह कानून समझने वाला, नीति पर विचार करने वाला, प्रशासन से प्रश्न पूछने वाला और अपने अधिकारों का दावा करने वाला नागरिक होता है। यदि शासन और ज्ञान की भाषा जनता की भाषा से अलग हो जाए, तो लोकतंत्र में एक भाषाई अभिजात वर्ग पैदा होता है। इसलिए भारतीय भाषाओं में ज्ञान का विस्तार सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है। भाषा के कारण किसी विद्यार्थी, किसान, मजदूर, महिला, आदिवासी, पिछड़े वर्ग या ग्रामीण नागरिक को ज्ञान और अवसर से वंचित नहीं होना चाहिए।

हिंदी को राष्ट्रव्यापी संवाद की भाषा बनाने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि वह अन्य भारतीय भाषाओं पर प्रभुत्व स्थापित करे। हिंदी का वास्तविक गौरव तभी होगा जब वह तमिल से सीखे, बंगला से संवाद करे, मराठी और गुजराती के ज्ञान-संसार से जुड़े, उर्दू की अभिव्यक्ति-समृद्धि को स्वीकार करे, संस्कृत से दार्शनिक शब्दावली ग्रहण करे और भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद का सेतु बने। भारत की भाषाई एकता एक भाषा की विजय से नहीं, बल्कि अनेक भाषाओं के सम्मान और परस्पर सहयोग से निर्मित होगी।

आज हिंदी दिवस के अवसर पर हमें केवल यह नहीं कहना चाहिए कि हिंदी महान है। हमें यह भी पूछना चाहिए कि हिंदी में कितने नए वैज्ञानिक शोध प्रकाशित हुए, कितनी उच्चस्तरीय विधिक पुस्तकें लिखी गईं, कितनी चिकित्सा और अभियांत्रिकी की पाठ्यपुस्तकें तैयार हुईं, कितने विश्वविद्यालयों ने हिंदी में शोध की वास्तविक सुविधा दी और कितने प्रशासनिक निर्णय जनता की समझ में आने वाली भाषा में उपलब्ध कराए गए। किसी भाषा की महानता उसके अतीत के गौरव से ही नहीं, उसके वर्तमान उपयोग और भविष्य की क्षमता से भी निर्धारित होती है।

हिंदी दिवस को त्रासदी का प्रतीक बनने से बचाने का एक ही उपाय है—हिंदी को भाषण की भाषा से ज्ञान की भाषा बनाना। उसे केवल भावनाओं, नारों और समारोहों में नहीं, बल्कि न्यायालयों, विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, अस्पतालों, तकनीकी संस्थानों, संसद, प्रशासन और शोध-केंद्रों में जीवंत बनाना होगा। हिंदी का भविष्य केवल हिंदी भाषियों की भावुकता पर निर्भर नहीं है; वह हमारी शैक्षिक नीतियों, संस्थागत इच्छाशक्ति, अनुवाद-व्यवस्था, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञान-सृजन की क्षमता पर निर्भर है।

जिस दिन हिंदी में कोई विद्यार्थी बिना भाषाई भय के उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकेगा, कोई नागरिक अपने अधिकारों को स्वयं पढ़ और समझ सकेगा, कोई शोधार्थी अपनी भाषा में विश्वस्तरीय शोध कर सकेगा और कोई चिकित्सक या अभियंता जटिल ज्ञान को जनता तक सहज भाषा में पहुँचा सकेगा, उसी दिन हिंदी दिवस वास्तव में उत्सव बनेगा। तब हिंदी का सम्मान केवल मंचों पर नहीं, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देगा।


टिप्पणियाँ

  1. Sir Aapki baten 100% sahi hai parantu Hindi kangali ke Daur se Gujar Rahi hai.,"Path ke kanton se Kaun hamen aagah Karen jab phoolon mein rahnuma hamare doob Gaye"

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