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मयंक मिश्र की कविताएं

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मयंक मिश्र  इस सृष्टि में छोटी हो या बड़ी, सभी की अपनी कुछ न कुछ विशिष्टताएं होती हैं। अलग बात है कि नींव के पत्थर को सब देख नहीं पाते, जिस पर पूरी इमारत ही खड़ी होती है। उसे देखने के लिए अंतर्दृष्टि की जरूरत पड़ती है। इसी तरह  नुक्ता यानी कि एक बिन्दु का भी अपना महत्व है। इसके बिना शब्दों की संरचना अक्सर लड़खड़ा जाती है। अलग बात है कि यह नुक्ता प्रायः अलक्षित ही रह जाता है। लेकिन कवि की  अंतर्दृष्टि  से वह अलक्षित नहीं रह पाता। मयंक मिश्र नवोदित कवि हैं, लेकिन उनके पास चीजों, घटनाओं, परिस्थितियों को देखने की  अंतर्दृष्टि है। उनकी  कविताओं को पढ़ते हुए यह कहा जा सकता है कि उनके पास एक कवि दृष्टि है। अपनी कविता 'नुक्ता' में वे लिखते हैं 'हिल जाती घास/  इधर-उधर/ हो जाता है वह बूंद/  ओस का/ और/ बदल जाता है अर्थ'। कवित्व के सफर में मयंक की ये प्रारंभिक कविताएँ हैं। वे यह जानते हैं कि यह सफर आसान नहीं है। फिर भी चयन तो व्यक्ति को खुद करना होता है कि उसे किस रास्ते पर आगे बढ़ना है। कबीर लिखते हैं ' सुखिया सब संसार है, खाए अरु सो...

भरत प्रसाद की लम्बी कविता 'मणिपुर! मेरे देश के मणि'

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भरत प्रसाद  युद्ध हमेशा मानवता के विरुद्ध होता है। आंतरिक युद्ध तो और भी भयावह होता है। जब एक साथ रहने और सुख दुःख में शिरकत करने वाले लोग एक दूसरे के खून के प्यासे बन जाएं तो स्थितियां बेकाबू हो जाती हैं। आजादी के समय भारत में सांप्रदायिक वातावरण के चलते जो भयावह मार काट हुई वह इतिहास का एक काला अध्याय है। तब शताब्दियों से एक साथ रह रहे हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के खून के प्यास बन गए थे। आखिरकार देश का बंटवारा हुआ और धार्मिक सांप्रदायिक तांडव कुछ समय के लिए थम गया।   भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में 3 मई 2023 को इम्फाल घाटी में रहने वाले बहुसंख्यक मैती जनजाति और कुकी जनजाति के आदिवासी समुदाय के बीच एक झगड़ा शुरू हो  गया। इस झगड़े में मानवता एक बार फिर शर्मसार हुई। हत्या, आगजनी, बलात्कार जैसी घटनाएं एक के बाद एक घटती रहीं। हजारों लोग मारे गए। आज तक इस घटना का पटाक्षेप नहीं हो पाया है और रह रह कर इसकी चिंगारियां भड़कती रहती हैं। कवि भरत प्रसाद ने एक कवि के नजरिए से मणिपुर घटना की तहकीकात करते हुए एक लम्बी कविता लिखी है। भरत प्रसाद अपनी कविता में लिखते हैं : 'मेरी...

मार्कण्डेय जी के बारे में ममता कालिया से शालिनी बाजपेयी की बातचीत

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कथाकार मार्कण्डेय का अपना एक अलग सादगी भरा व्यक्तित्व था। सही मायनों में वे एक रचनाकार थे। उनमें संवेदनशीलता के साथ साथ सहृदयता भी थी। उनका अपना एक पाठक वर्ग था। रचनाकारों खासकर नयी पीढी के साथ वे सहज ही अपना तादात्म्य स्थापित कर लेते थे। 'कथा' पत्रिका का सम्पादन करते हुए अनेक रचनाकारों को सामने लाने का महत्त्वपूर्ण कार्य मार्कण्डेय जी ने किया। जब भी कथा के किसी नए अंक को लाने की योजना बनती, वे कुछ रचनाकारों का नाम चयनित कर लेते। उनमें ममता कालिया का नाम आवश्यक रूप से शामिल होता। ममता जी भी मार्कण्डेय जी के लेखन की मुरीद हुआ करतीं। मार्कण्डेय जी का कथा के लिए लिखने का आग्रह इतना अपनत्व और साधिकार भरा होता कि कोई भी इंकार नहीं कर पाता। पिछले वर्ष 'कथा' के मार्कण्डेय अंक का अतिथि सम्पादन कवि बसंत त्रिपाठी ने किया था। इस अंक में मार्कण्डेय जी के बारे में शालिनी बाजपेई ने ममता कालिया से एक विशेष बातचीत की थी। मार्कण्डेय जी की पुण्यतिथि पर विशेष आयोजन के क्रम में आज हम इस बातचीत को प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे हमने कथा के मार्कण्डेय अंक से साभार लिया है। तो आइए आज पहली बार पर हम...

मार्कण्डेय की कहानी 'नौ सौ रुपए और एक ऊंट दाना'

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मार्कण्डेय  कुछ समय पहले तक भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता था। कृषि व्यवस्था की रीढ़ मुख्य रूप से हमारे  गाँव हुआ करते थे।  ग्रामीण जीवन और संस्कृति को समझने के लिए साहित्य से ही आधारभूत स्रोत उपलब्ध हो पाता है। इस सन्दर्भ में जिन साहित्यकारों की चर्चा की जाती है उनमें कथाकार मार्कण्डेय का नाम अग्रणी है।  अगर आपको गाँव की गलियों को अनुभूत करना हो, अगर आपको मिट्टी की सोंधी गन्ध महसूस करनी हो, अगर आपको अपनी ठेठ बोली भाषा से बात मुलाकात करनी हो तो आपको मार्कण्डेय के पास जाना पड़ेगा। नई कहानी आन्दोलन के अग्रणी कथाकारों में से एक मार्कण्डेय की प्रांजल भाषा एक पाठक के तौर पर आपको सहज ही अपनत्व से भरी लगेगी। आज जब हर जगह दिखावे का प्राधान्य है और भाषा भी इससे अछूती नहीं है मार्कण्डेय की कहानियां मन को छूती हैं और पढ़ जाने के लिए विवश करती हैं। उनके यहां भाषा का तिलिस्म नहीं है बल्कि भाषा की मौलिकता है। 'नौ सौ रुपए और एक ऊंट दाना' कहानी को पढ़ते हुए आप अपने अतीत में चले जाते हैं। वह अतीत जो अब दूभर हो चला है। अपनी कहानियों में वे बारीकी से उन विडंबनाओं की बात करते हैं जो स...