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यादवेन्द्र का आलेख 'कविता से सिनेमा, बरास्ते (पट) कथा'

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रबीन्द्र नाथ ठाकुर  आमतौर पर विधाएं रचनाकार की अभिव्यक्ति का माध्यम होती हैं। हरेक विधा की अपनी विशिष्टता होती है जो उसे खास बनाती है। खुद एक ही रचनाकार अलग अलग विधाओं में आवाजाही करता दिखाई पड़ता है। सिनेमा अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। इसके मूल में पटकथा होती है जिसे पटकथा लेखक किसी कहानी, कविता या उपन्यास को आधार बना कर लिखता है। गुरुदेव रबीन्द्र नाथ ठाकुर की बांग्ला कविता 'फाँकी' को आधार बना कर चर्चित बाँग्ला फ़िल्मकार बुद्धदेब दासगुप्ता ने एन एफ़ डी सी की आर्थिक मदद से हिंदी में छोटी सी फ़िल्म बनाई है जो रबीन्द्र नाथ ठाकुर की डेढ़ सौवीं वर्षगाँठ के अवसर पर तेरह कविताओं पर आधारित फीचर फ़िल्म "त्रयोदशी" का हिस्सा है।  यह आम धारणा है कि इस कविता में उद्धृत 'मैं' स्वयं कवि रबीन्द्र नाथ ठाकुर हैं और बीनू उनकी दिवंगत पत्नी मृणालिनी देवी हैं जिन्हें वे इलाज के लिए पेंड्रा रोड के टीबी सेनेटोरियम ले कर आए थे। मृणालिनी देवी (पूर्व नाम भवतारिणी देवी) का जन्म   1 मार्च 1874 को हुआ था। आज 1 मार्च को  मृणालिनी देवी की स्मृति को  सम्मानपूर्वक स्मरण करते...