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अमनदीप कौर की कविताएँ

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अमनदीप कौर यह दुनिया जो आज इतनी खूबदूरत दिख रही है उनमें उन कामगारों का बड़ा हाथ है जो बहुत ही अमानवीय परिस्थियों में किसी तरह अपना गुजारा करते हैं। इनके हाथ दुनिया के वे खूबसूरत हाथ हैं जिन्होंने सब कुछ बेहतर बना रखा है और हमें किंचित भी असुविधा का सामना नहीं करना पड़ता। शासक की मंशा होती है कि ये मजदूर ' हाथ बाँधे/ इनके सामने फ़र्माबरदारी करें ' और ' बिना हक़ मांगे/ अपने स्वाभिमान की/ अपनी मेहनत की/ लूट का तमाशा देखें। ' लेकिन यह भी सच है कि ' सत्ता के गलियारे/ सिहर उठते हैं/ महज यह सोच कर कि/ ग़र/ नाले पार के इन/ इंसान से दिखने वालों को/ वास्तव में यकीं हो गया/ कि वो इंसान ही हैं/ तो क्या होगा ?…' ऐसी मर्म भरी बेहतरीन पंक्तियाँ   लिखने वाली कवयित्री अमनदीप कौर   की कविताएँ आज पहली बार के पाठकों के लिए पेश हैं। अमनदीप ने पंजाबी व हिंदी में कई बेहतरीन कविताएँ लिखी हैं। और छपने-छपाने के इस दौर में भी कहीं कविताएँ भेजने से आमतौर से बचती रही हैं।   अमनदीप कौर की कविताएँ हाथ हाथ होना ही तो हाथ होना नहीं कुछ हाथ किसी चेहरे के मोहताज़...

योगिता यादव की कहानी 'झीनी झीनी बिनी रे चदरिया'

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योगिता यादव युवा लेखिका योगिता यादव को हाल ही में “ कलमकार पुरस्‍कार” से सम्‍मानित किया गया। उन्हें यह पुरस्कार उनकी नयी कहानी “झीनी-झीनी बिनी रे चदरिया” के लिए दिया गया। कहानी में चादर एक ऐसा बिम्ब है जिसे अपने शिल्प के बल पर योगिता ने अनूठा स्वरुप दे दिया है और उसके हवाले से ही उन्होंने स्त्री जीवन के उन अछूते कोने-अंतरे की बातों को उठाया है, जिस पर बात करने की हमारे समाज में प्रायः मनाही है। स्त्री जीवन की इस विडम्बना को समेटे यह कहानी प्रतीकों में ही सब कुछ बया कर देती है। तो आइए पढ़ते हैं यह कहानी।           झीनी-झीनी बिनी रे चदरिया योगिता यादव पहाड़ों की तलहटी में चादरों पर एक राष्ट्रीय स्तर का सेमिनार चल रहा था। चादर बनाने और ओढ़ाने में अभ्यस्त वरिष्ठ जन बड़े आदर के साथ आमंत्रित किए गए थे। उनके साथ उन नए बुनकरों को भी बुलाया गयाए जो अपनी - अपनी मर्जी की चादरें बुन रहे थे। अपने आकार , अपने प्रकार से। वरिष्ठों में वरिष्ठतम ने मंच संभाला और बताया कि इतिहास में हमारे समाज की चादरें बहुत महान हुआ करती थीं। आरामदायक भले ही न हो पर सब कुछ ...